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16 मार्च 2008

उदय प्रकाश की कहानी : टेपचू

(उदय प्रकाश के ब्लॉग पर टेपचू का जिक्र हुआ तो उनसे इस बेहद चर्चित, मार्मिक कहानी के वेब लिंक के बारे में पूछा गया. उन्होंने वहां उत्तर दिया :

" 'टेपचू' के बारे में आपने पूछा है. यह कहानी 'अभिव्यक्ति' (पूर्णिमा वर्मन) ने १-२ साल पहले प्रकाशित की थी. वहां के 'आर्काइव' में ज़रूर मिल जायेगी. इसका एक अन्ग्रेजी अनुवाद (अनु:राबर्ट ह्यूक्स्टेड, वर्जीनिया, यू.एस.ए.) भी नेट पर उपलब्ध है. लिन्क मैं भेज दूंगा. साफ़्ट कापी नहीं है, वर्ना आपका आदेश मैं ज़रूर पूरा करता. लेकिन इस कहानी की भी एक कथा है. २३ साल की उमर में (१९७६) जे.एन.यू. का छात्र होने के दौरान, आपातकाल के समय इसे लिखा था. यह जे.एन.यू. के छात्रों के बीच बहुत लोकप्रिय हुई. बाद में १९८०-८१ में यह 'सारिका' (संपा: कन्हैयालाल नन्दन) प्रकाशित हुई. वहां भी इसे अपार लोकप्रियता मिली. बस यही मेरा 'अपराध' हो गया. आप जानते होंगे, छत्तीसगढ मे टेपचू, लेपचू, समनू, छन्गू जैसे नाम आम होते हैं. इसकी देशव्यापी लोकप्रियता और चर्चा से चिढ कर दिल्ली के एक ताकतवर गुट्बाज पहाडी ब्राह्मण ने इसे लूशुन की विख्यात कहानी 'आह्क्यू की सच्ची कहानी' की नकल घोषित कर दिया. (टेपचू' के 'चू' से उन्होंने अन्दाजा लगाया कि इसका चीन से कुछ लेना-देना होगा.) और बस 'विवाद' शुरू हो गया. ऐसे 'विवादों' ने मेरे और मेरे परिवार के जीवन को पिछले लगभग ३० वर्षों से बहुत आहत और छतिग्रस्त किया है. मैं अपने ब्लाग पर कभी इसकी मज़ेदार 'अकाउन्टिंग' करूंगा. अपने वतन से दूर होकर 'अल्पसंख्यक' और 'अकेले' होने का असली संघर्ष मेरे जैसे राज्धानियों के हाशिये के लेखक-रचनाकार जानते हैं. राजनीति में 'अल्पसंन्ख्यक' शब्द का दूसरा अर्थ है. वह 'पोलिटिकल कांस्ट्रक्ट' है. एक 'पावर-टूल'. गुजरात के अल्पसंख्यकों पर कविता लिखकर पार्टी और मित्र-मंड्ली की वाह-वाह पाने वाले और सारे पद-पुरस्कार प्राप्त करने वाले इलाकावादी और जातिवादी कवि किसी वास्तविक अल्पसंख्यक और अकेले व्यक्ति को अपने इलाके में पाकर कितने क्रूर और हिंसक हो सकते हैं, इसका व्रित्तान्त आज के उत्तर-आधुनिक समय में ज़रूरी है, जिससे हम और हमारे बाद आने वाली पीढियां अपनी मासूमियत के हाथों छ्ली न जा सकें. हिन्दी साहित्य और हिन्दी-पट्टी की राजनीति, दोनों एक-दूसरे के भ्रष्ट 'एलीट' का 'विस्तार' और 'रेप्लिका' हैं. यह मेरा आत्मबोध और जीवनबोध दोनों है. उस जीवन का सारांश जिसकी संध्या घिरने लगी है.." 

तो प्रस्तुत है यह बेहद प्रसिद्ध और चर्चित कहानी टेपचू . यह कहानी अभिव्यक्ति पर शुषा फ़ॉन्ट में यहां उपलब्ध है, जिसे यूनिकोडित कर साभार यहाँ पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है. इसे पद्मा प्लगइन के जरिए स्वचालित यूनिकोडित किया गया है, जिससे वर्तनी की अशुद्धियाँ बनी रह सकती हैं, जिसके लिए क्षमा प्रार्थी हैं. उदय प्रकाश से आग्रह है कि इस ऐतिहासिक कहानी की मज़ेदार अकाउन्टिंग अपने ब्लॉग पर शीघ्र ही करें. हम सब को बेसब्री से इन्तजार है...)

 

 

कहानी

 

टेपचू

-उदय प्रकाश

यहां जो कुछ लिखा हुआ है¸ वह कहानी नहीं है। कभी–कभी सच्चाई कहानी से भी ज्यादा हैरत अंगेज होती है। टेपचू के बारे में सब कुछ जान लेने के बाद आपको भी ऐसा ही लगेगा।

टेपचू को मैं बहुत करीब से जानता हूं। हमारा गांव मड़र सोन नदी के किनारे एक–दो फर्लांग के फासले पर बसा हुआ है। दूरी शायद कुछ और कम हो¸ क्योंकि गांव की औरतें सुबह खेतों में जाने से पहले और शाम को वहां से लौटने के बाद सोन नदी से ही घरेलू काम–काज के लिए पानी भरती है। ये औरतें कुछ ऐसी औरतें हैं¸ जिन्हें मैंने थकते हुए कभी नहीं देखा है। वे लगातार काम करती जाती है।

गांव के लोग सोन नदी में ही डुबकियां लगा–लगाकर नहाते हैं। डुबकियां लगा पाने लायक पानी गहरा करने के लिए नदी के भीतर कुइयां खोदनी पड़ती है। नदी की बहती हुई धार के नीचे बालू को अंजुलियों से सरका दिया जाए तो कुइयां बन जाती है। गर्मी के दिनों में सोन नदी में पानी इतना कम होता है कि बिना कुइयां बनाए आदमी का धड़ ही नहीं भींगता। यही सोन नदी बिहार पहुंचते–पहुंचते कितनी बड़ी हो गई है¸ इसका अनुमान आप हमारे गांव के घाट पर खड़े होकर नहीं लगा सकते।

हमारे गांव में दस–ग्यारह साल पहले अब्बी नाम का एक मुसलमान रहता था। गांव के बाहर जहां चमारों की बस्ती है¸ उसी से कुछ हटकर तीन–चार घर मुसलमानों के थे। मुसलमान¸ मुर्गियां¸ बकरियां पालते थे। लोग उन्हें चिकवा या कटुआ कहते थे। वे बकरे–बकरियों के गोश्त का धंधा भी करते थे। थोड़ी बहुत जमीन भी उनके पास होती थी।

अब्बी आवारा और फक्कड़ किस्म का आदमी था। उसने दो–दो औरतों के साथ शादी कर रखी थी। बाद में एक औरत जो ज्यादा खूबसूरत थी¸ कस्बे के दर्जी के घर जाकर बैठ गई। अब्बी ने ग़म नहीं किया। पंचायत ने दर्ज़ी को जितनी रकम भरने को कहा¸ उसने भर दी। अब्बी ने उन रूपयों से कुछ दिनों ऐश किया और फिर एक हारमोनियम खरीद लाया। अब्बी जब भी हाट जाता¸ उसी दर्ज़ी के घर रुकता। खाता–पीता¸ जश्न मनाता¸ अपनी पुरानी बीवी को फुसलाकर कुछ रूपए ऐंठता और फिर खरीदारी करके घर लौट आता।

कहते हैं¸ अब्बी खूबसूरत था। उसके चेहरे पर हल्की–सी लुनाई थी। दुबला–पतला था। बचपन में बीमार रहने और बाद में खाना–पीना नियमित न रहने के कारण उसका रंग हल्का–सा हल्दिया हो गया था। वह गोरा दिखता था। लगता था¸ जैसे उसके शरीर ने कभी धूप न खाई हो। अंधेरे में¸ धूप और हवा से दूर उगने वाले गेहूं के पीले पौधे की तरह उसका रंग था। फिर भी¸ उसमें जाने क्या गुण था कि लड़कियां उस पर फिदा हो जाती थीं। शायद इसका एक कारण यह रहा हो कि दूर दराज शहर में चलने वाले फैशन सबसे पहले गांव में उसी के द्वारा पहुंचते थे। जेबी कंघी¸ धूप वाला चश्मा¸ जो बाहर से आईने की तरह चमकता था¸ लेकिन भीतर से आर–पार दिखाई देता था¸ तौलिए जैसे कपड़े की नंबरदार पीली बनियान¸ पंजाबियों का अष्टधातु का कड़ा¸ रबर का हंटर वगैरह ऐसी चीजें थी¸ जो अब्बी शहर से गांव लाया था।

जब से अब्बी ने हारमोनियम खरीदा था¸ तब से वह दिन भर चीपों–चीपों करता रहता था। उसकी जेब में एक–एक आने में बिकने वाली फिल्मी गानों की किताबें होतीं। उसने शहर में कव्वालों को देखा था और उसकी दिली ख्वाहिश थी कि वह कव्वाल बन जाए¸ लेकिन जी–तोड़ कोशिश करने के बाद भी . . ."हमें तो लूट लिया मिल के हुस्नवालों ने" के अलावा और दूसरी कोई कव्वाली उसे याद ही नहीं हुई।

बाद में अब्बी ने अपनी दाढ़ी–मूंछ बिल्कुल सफाचट कर दी और बाल बढ़ा लिए। चेहरे पर मुरदाशंख पोतने लगा। गांव के धोबी का लड़का जियावन उसके साथ–साथ डोलने लगा और दोनों गांव–गांव जाकर गाना–बजाना करने लगे। अब्बी इस काम को आर्ट कहता था¸ लेकिन गांव के लोग कहते थे¸ "ससुर¸ भड़ैती कर रहा है।" अब्बी इतनी कमाई कर लेता था कि उसकी बीवी खा–पहन सके।

टेपचू इसी अब्बी का लड़का था।
टेपचू जब दो साल का था¸ तभी अब्बी की अचानक मौत हो गई।

अब्बी की मृत्यु भी बड़ी अजीबो–गरीब दुर्घटना में हुई। आषाढ़ के दिन थे। सोन उमड़ रही थी। सफेद फेन और लकड़ी के सड़े हुए लठ्ठे–पटरे धार में उतरा रहे थे। पानी मटैला हो गया था¸ चाय के रंग जैसा¸ और उसमें कचरा¸ काई¸ घास–फूस बह रहे थे। यह बाढ़ की पूर्व सूचना थी। घंटे–दो घंटे के भीतर सोन नदी में पानी बढ़ जाने वाला था। अब्बी और जियावन को जल्दी थी¸ इसलिए वे बाढ़ से पहले नदी पार कर लेना चाहते थे। जब तक वे पार जाने का फैसला करें और पानी में पांव दे तब तक सोन में कमर तक पानी हो गया था। जहां कहीं गांव के लोगों ने कुइयां खोदी थीं¸ वहां छाती तक पानी पहुंच गया था। कहते हैं कि जियावन और अब्बी बहुत इत्मीनान से नदी पार कर रहे थे। नदी के दूसरे तट पर गांव की औरतें घड़ा लिए खड़ी थीं। अब्बी उन्हें देखकर मौज में आ गया। जियावन ने परदेसिया की लंबी तान खींची। अब्बी भी सुर मिलाने लगा। गीत कुछ गुदगुदीवाला था। औरतें खुश थीं और खिलखिला रही थीं। अब्बी कुछ और मस्ती में आ गया। जियावन के गले में अंगोछे से बंधा हारमोनियम झूल रहा था। अब्बी ने हारमोनियम उससे लेकर अपने गले में लटका लिया और रसदार साल्हो गाने लगा। दूसरे किनारे पर खड़ी हुई औरतें खिलखिला ही रही थीं कि उनके गले से चीख निकल गई। जियावन अवाक होकर खड़ा ही रह गया। अब्बी का पैर शायद धोखे से किसी कुइयां या गड्‌ढ़े में पड़ गया था। वह बीच धार में गिर पड़ा। गले में लटके हुए हारमोनियम ने उसको हाथ पांव मारने तक का मौका न दिया। हुआ यह था कि अब्बी किसी फिल्म में देखे हुए वैजयंती माला के नृत्य की नकल उतारने में लगा हुआ था और इसी नृत्य के दौरान उसका पैर किसी कुइयां में पड़ गया। कुछ लोग कहते हैं कि नदी में 'चोर बालू' भी होता है। ऊपर–ऊपर से देखने पर रेत की सतह बराबर लगती है¸ लेकिन उसके नीचे अतल गहराई होती है . . .पैर रखते ही आदमी उसमें समा सकता है।

अब्बी की लाश और हारमोनियम¸ दोनों को ढूंढ़ने की बहुत कोशिश की गई। मलंगा जैसा मशहूर मल्लाह गोते लगाता रहा¸ लेकिन सब बेकार। कुछ पता ही नहीं चला।

अब्बी की औरत फिरोज़ा जवान थी। अब्बी के मर जाने के बाद फिरोज़ा के सिर पर मुसीबतों के पहाड़ टूट पड़े। वह घर–घर जाकर दाल–चावल फटकने लगी। खेतों में मज़दूरी शुरू की। बगीचों की तकवानी का काम करना शुरू किया¸ तब कहीं जाकर दो रोटी मिल पाती। दिन भर वह ढेंकी कूटती¸ सोन नदी से मटके भर–भरकर पानी ढोती¸ घर का सारा काम काज करना पड़ता¸ रात खेतों की तकवानी में निकल जाती। घर में एक बकरी थी¸ जिसकी देखभाल भी उसे ही करनी पड़ती। इतने सारे कामों के दौरान टेपचू उसके पेट पर¸ एक पुरानी साड़ी में बंधा हुआ चमगादड़ की तरह झूलता रहता।

फिरोजा को अकेला जानकर गांव के कई खाते–पीते घरानों के छोकरों ने उसे पकड़ने की कोशिश की¸ लेकिन टेपचू हर वक्त अपनी मां के पास कवच की तरह होता। दूसरी बात¸ वह इतना घिनौना था कि फिरोजा की जवानी पर गोबर की तरह लिथड़ा हुआ लगता था। पतले–पतले सूखे हुए झुर्रीदार हाथ–पैर¸ कद्दू की तरह फूला हुआ पेट¸ फोड़ों से भरा हुआ शरीर। लोग टेपचू के मरने का इंतजार करते रहे। एक साल गुजरते–गुजरते हाड़–तोड़ मेहनत ने फिरोजा की देह को झिंझोड़कर रख दिया। वह बुढ़ा गई। उसके बाल उलझे हुए सूखे और गंदे रहते। कपड़ों से बदबू आती। शरीर मैल पसीने और गर्द से चीकट रहा करता। वह लगातार काम करती रही। लोगों को उससे घिन होने लगी।

टेपचू जब सात–आठ साल का हुआ¸ गांव के लोगों की दिलचस्पी उसमें पैदा हुई।
हमारे गांव के बाहर¸ दूर तक फैले धान के खेतों के पार आम का एक घना बगीचा था। कहा जाता है कि गांव के संभ्रांत किसान घरानों¸ ठाकुरों–ब्राह्मणों की कुलीन कन्याएं उसी बगीचे के अंधेरे कोनों में अपने अपने यारों से मिलतीं। हर तीसरे–चौथे साल उस बगीचे के किसी कोने में अलस्सुबह कोई नवजात शिशु रोता हुआ लावारिस मिल जाता था। इस तरह के ज्यादातर बच्चे स्वस्थ¸ सुंदर और गोरे होते थे। निश्चित ही गांव के आदिवासी कोल–गोंडों के बच्चे वे नहीं कहे जा सकते थे। हर बार पुलिस आती। दरोगा ठाकुर साहब के घर में बैठा रहता। पूरी पुलिस पलटन का खाना वहां पकता। मुर्गे गांव से पकड़वा लिए जाते। शराब आती। शाम को पान चबाते¸ मुस्कराते और गांव की लड़कियों से चुहलबाजी करते पुलिस वाले लौट जाया करते। मामला हमेशा रफा–दफा हो जाता था।

इस बगीचे का पुराना नाम मुखियाजी का बगीचा था। वर्षों पहले चौधरी बालकिशन सिंह ने यह बगीचा लगाया था। मंशा यह थी कि खाली पड़ी हुई सरकारी जमीन को धीरे–धीरे अपने कब्ज़े में कर लिया जाए। अब तो वहां आम के दो–ढ़ाई सौ पेड़ थे¸ लेकिन इस बगीचे का नाम अब बदल गया था। इसे लोग भुतहा बगीचा कहते थे¸ क्योंकि मुखिया बालकिशन सिंह का भूत उसमें बसने लगा था। रात–बिरात उधर जाने वाले लोगों की घिग्घी बंध जाती थी। बालकिशन सिंह के बड़े बेटे चौधरी किशनपाल सिंह एक बार उधर से जा रहे थे तो उनको किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। जाकर देखा . . .झाड़ियों¸ झुरमुटों को तलाशा तो कुछ नहीं। उनके सिर तक के बाल खड़े हो गए। धोती का फेंटा खुल गया और वे 'हनुमान–हनुमान' करते भाग खड़े हुए।

तब से वहां अक्सर रात में किसी स्त्री की कराहने या रोने की करुण आवाज सुनी जाने लगी। दिन में जानवरों की हड्‌िडयां¸ जबड़े या चूड़ियों के टुकड़े वहां बिखरे दिखाई देते। गांव के कुछ लफंगों का कहना था कि उस बगीचे में भूत–ऊत कुछ नहीं रहता। सब मुखिया के घराने द्वारा फैलाई गई अफवाह है। साले ने उस बगीचे को ऐशगाह बना रखा है।

एक बार मैं पड़ोस के गांव में शादी के न्यौते में गया था। लौटते हुए रात हो गई। बारह बजे होंगे। संग में राधे¸ संभारू और बालदेव थे। रास्ता बगीचे के बीच से गुजरता था। हम लोगों ने हाथ में डंडा ले रखा था। अचानक एक तरफ सूखे पत्तों की चरमराहट सुनाई पड़ी। लगा¸ जैसे कोई जंगली सूअर बेफिक्री से पत्तियों को रौंदता हुआ हमारी ओर ही चला आ रहा है। हम लोग रूककर आहट लेने लगे। गर्मी की रात थी। जेठ का महीना। अचानक आवाज़ जैसे ठिठक गई। सन्नाटा खिंच गया। हम टोह लेने लगे। भीतर से डर भी लग रहा था। बालदेव आगे बढ़ा¸ कौन है¸ बे¸ छोह–छोह। उसने जमीन पर लाठी पटकी हालांकि उसकी नसें ढीली पड़ रही थीं। कहीं मुखिया का जिन्न हुआ तो? मैंने किसी तरह हिम्मत जुटाई¸ "अबे¸ होह¸ होह।" बालदेव को आगे बढ़ा देखा संभारू भी तिड़ी हो गया। पगलेटों की तरह दाएं–बाएं ऊपर–नीचे लाठियां भांजता वह उसी ओर लपका।

तभी एक बारीक और तटस्थ सी आवाज़ सुनाई पड़ी¸ "हम हन भइया¸ हम।"
"तू कौन है बे?"बालदेव कड़का।
अंधेरे से बाहर निकलकर टेपचू आया¸ "काका¸ हम हन टेपचू।" वह बगीचे के बनते–मिटते घने अंधेरे में धुंधला सा खड़ा था। हाथ में थैला था। मुझे ताज्जुब हुआ। "इतनी रात को इधर क्या कर रहा है कटुए?"

थोड़ी देर टेपचू चुप रहा। फिर डरता हुआ बोला¸ "अम्मा को लू लग गई थी। दोपहर मुखिया के खेत की तकवानी में गई थी¸ घाम खा गई। उसने कहा कि कच्ची अमिया का पना मिल जाए तो जुड़ा जाएगी। बड़ा तेज जर था।"
"भूत–डाइन का डर नहीं लगा तुझे मुए? किसी दिन साले की लाश मिलेगी किसी झाड़–झंखाड़ में।" राधे ने कहा। टेपचू हमारे साथ ही गांव लौटा। रास्ते भर चुपचाप चलता रहा। जब उसके घर जाने वाली गली का मोड़ आया तो बोला¸ "काका¸ मुखिया से मत खोलना यह बात नहीं तो मार–मार कर भरकस बना देगा हमें।"

टेपचू की उम्र उस समय मुश्किल से सात–आठ साल की रही होगी।
दूसरी बार यों हुआ कि टेपचू अपनी अम्मा फ़िरोजा से लड़कर घर से भाग गया। फिरोजा ने उसे जलती हुई चूल्हे की लकड़ी से पीटा था। सारी दोपहर¸ चिनचिनाती धूप में टेपचू जंगल में ढोर–ढंगरों के साथ फिरता रहा। फिर किसी पेड़ के नीचे छांह में लेट गया। थका हुआ था। आंख लग गई। नींद खुली तो आंतों में खालीपन था। पेट में हल्की–सी आंच थी भूख की। बहुत देर तक वह यों ही पड़ा रहा¸ टुकुर–टुकुर आसमान ताकता। फिर भूख की आंच में जब कान के लवे तक गर्म होने लगे तो सूस्त–सा उठकर सोचने लगा कि अब क्या जुगाड़ किया जाए। उसे याद आया कि सरई के पेड़ों के पार जंगल के बीच एक मैदान है। वहीं पर पुरनिहा तालाब है।

वह तालाब पहुंचा। इस तालाब में¸ दिन में गांव की भैंसें और रात में बनैले सूअर लोटा करते थे। पानी स्याह–हरा सा दिखाई दे रहा था। पूरी सतह पर कमल और कुई के फूल और पुरईन फैले हुए थे। काई की मोटी पर्त बीच में थी। टेपचू तालाब में घुस गया। वह कमल गट्टे और पुरइन की कांद निकालना चाहता था। तैरना वह जानता था।

बीच तालाब में पहुंचकर वह कमलगट्टे बटोरने लगा एक हाथ में ढेर सारे कमलगट्टे उसने खसोट रखे थे। लौटने के लिए मुड़ा¸ तो तैरने में दिक्कत होने लगी। जिस रास्ते से पानी काटता हुआ वह लौटना चाहता था¸ वहां पुरइन की घनी नालें आपस में उलझी हुई थीं। उसका पैर नालों में उलझ गया और तालाब के बीचों–बीच वह "बक–बक" करने लगा।

परमेसुरा जब भैंस को पानी पिलाने तालाब आया तो उसने "गुड़प . . .गुड़प" की आवाज सुनी। उसे लगा¸ कोई बहुत बड़ी सौर मछली तालाब में मस्त होकर ऐंठ रही है। जेठ के महीने में वैसे भी मछलियों में गर्मी चढ़ जाती है। उसने कपड़े उतारे और पानी में हेल गया। जहां पर मछली तड़प रही थी वहां उसने गोता लगाकर मछली के गलफड़ों को अपने पंजों में दबोच लेना चाहा तो उसके हाथ में टेपचू की गर्दन आई। वह पहले तो डरा¸ फिर उसे खींचकर बाहर निकाल लाया। टेपचू अब मरा हुआ सा पड़ा था। पेट गुब्बारे की तरह फूल गया था और नाक–कान से पानी की धार लगी हुई थी। टेपचूं नंगा था और उसकी पेशाब निकल रही थी। परमेसुरा ने उसकी टांगे पकड़कर उसे लटकाकर पेट में ठेहुना मारा तो "भल–भल" करके पानी मुंह से निकला।

एक बाल्टी पानी की उल्टी करने के बाद टेपचू मुस्कराया। उठा और बोला "काका¸ थोड़े–से कमलगट्टे तालाब से खींच दोगे क्या? मैंने इत्ता सारा तोड़ा था¸ साला सब छूट गया। बड़ी भूख लगी है।"

परमेसुरा ने भैंस हांकने वाले डंड़े से टेपचू के चूतड़ में चार–पांच डंडे जमाए और गालियां देता हुआ लौट गया।

गांव के बाहर¸ कस्बे की ओर जाने वाली सड़क के किनारे सरकारी नर्सरी थी। वहां पर प्लांटेशन का काम चल रहा था। बिड़ला के पेपर मिल के लिए बांस¸ सागौन और यूक्लिप्टस के पेड़ लगाए गए थे। उसी नर्सरी में¸ काफी भीतर ताड़ के भी पेड़ थे। गांव में ताड़ी पीने वालों की अच्छी–खासी तादाद थी। ज्यादातर आदिवासी मजदूर¸ जो पी•डब्ल्यू•डी• में सड़क बनाने तथा राखड़ गिट्टी बिछाने का काम करते थे¸ दिन–भर की थकान के बाद रात में ताड़ी पीकर धुत हो जाते थे। पहले वे लोग सांझ का झुटपुटा होते ही मटका ले जाकर पेड़ में बांध देते थे। ताड़ का पेड़ बिल्कुल सीधा होता है। उस पर चढ़ने की हिम्मत या तो छिपकली कर सकती है या फिर मजदूर। सुबह तक मटके में ताड़ी जमा हो जाती थी। लोग उसे उतार लाते।

ताड़ पर चढ़ने के लिए लोग बांस की पंक्सियां बनाते थे और उस पर पैर फंसा कर चढ़ते थे। इसमें गिरने का खतरा कम होता। अगर उतनी ऊंचाई से कोई आदमी गिर जाता तो उसकी हड्‌िडयां बिखर सकती थीं।

अब ताड़ के उन पेड़ों पर किशनपालसिंह की मिल्कियत हो गई थी। पटवारी ने उस सरकारी नर्सरी के भीतर भी उस जमीन को किशनपालसिंह के पट्टे में निकाल दिया था। अब ताड़ी निकलवाने का काम वही करते थे। ग्राम पंचायत भवन के बैठकी वाले कमरे में¸ जहां महात्मा गांधी की तस्वीर टंगी हुई थी¸ उसी के नीचे शाम को ताड़ी बांटी जाती। कमरे के भीतर और बाहर ताड़ीखोर मज़दूरों की अच्छी–खासी जमात इकठ्ठा हो जाती थी। किशनपालसिंह को भारी आमदनी होती थी।

एक बार टेपचू ने भी ताड़ी चखनी चाही। उसने देखा था कि जब गांव के लोग ताड़ी पीते तो उनकी आंखें आह्लाद से भर जातीं। चेहरे से सुख टपकने लगता। मुस्कान कानों तक चौड़ी हो जाती¸ मंद–मंद। आनंद और मस्ती में डूबे लोग साल्हो–दादर गाते¸ ठहाके लगाते और एक–दूसरे की मां–बहन की ऐसी तैसी करते। कोई बुरा नहीं मानता था। लगता जैसे लोग प्यार के अथाह समुंदर में एक साथ तैर रहे हो।

टेपचू को लगा कि ताड़ी जरूर कोई बहुत ऊंची चीज है। सवाल यह था कि ताड़ी पी कैसे जाए। काका लोगों से मांगने का मतलब था¸ पिट जाना। पिटने से टेपचू को सख्त नफरत थी। उसने जुगाड़ जमाया और एक दिन बिल्कुल तड़के¸ जब सुबह ठीक से हो भी नहीं पाई थी¸ आकाश में इक्का–दुक्का तारे छितरे हुए थे¸ वह झाड़ा फिरने के बहाने घर से निकल गया।

ताड़ की ऊंचाई और उस ऊंचाई पर टंगे हुए पके नींबू के आकार के मटके उसे डरा नहीं रहे थे¸ बल्कि अदृश्य उंगलियों से इशारा कर उसे आमंत्रित कर रहे थे। ताड़ के हिलते हुए डैने ताड़ी के स्वाद के बारे में सिर हिला–हिलाकर बतला रहे थे। टेपचू को मालूम था कि छपरा जिले का लठ्ठबाज मदना सिंह ताड़ी की रखवाली के लिए तैनात था। वह जानता था कि मदना सिंह अभी ताड़ी की खुमारी में कहीं खर्राटें भर रहा होगा। टेपचू के दिमाग में डर की कोई हल्की सी खरोंच तक नहीं थी।

वह गिलहरी की तरह ताड़ के एकसार सीधे तने से लिपट गया और ऊपर सरकने लगा। पैरों में न तो बांस की पक्सियां थी और न कोई रस्सी ही। पंजों के सहारे वह ऊपर सरकता गया। उसने देखा¸ मदना सिंह दूर एक आम के पेड़ के नीचे अंगोछा बिछाकर सोया हुआ है। टेपचू अब काफी ऊंचाई पर था। आम¸ महुए बहेड़ा और सागौन के गबदू से पेड़ उसे और ठिंगने नजर आ रहे थे। "अगर मैं गीध की तरह उड़ सकता तो कित्ता मजा आता।" टेपचू ने सोचा। उस ने देखा¸ उसकी कुहनी के पास एक लाल चींटी रेंग रही थी¸ "ससुरी" उसने एक भद्दी गाली बकी और मटके की ओर सरकने लगा।

मदना सिंह जमुहाइयां लेने लगा था और हिल–डुलकर जतला रहा था कि उसकी नींद अब टूटने वाली है। धुंधलका भी अब उतना नहीं रह गया था। सारा काम फुर्ती से निपटाना पड़ेगा। टेपचू ने मटके को हिलाया। ताड़ी चौथाई मटके तक इकठ्ठी हो गई थी। उसने मटके में हाथ डालकर ताड़ी की थाह लेनी चाही . . .

और बस¸ यहीं सारी गड़बड़ हो गई।
मटके में फनियल करैत सांप घुसा हुआ था। असल नाग। ताड़ी पीकर वह भी धुत था। टेपचू का हाथ अंदर गया तो वह उसके हाथ में बौड़कर लिपट गया। टेपचू का चेहरा राख की तरह सफेद हो गया। गीध की तरह उड़ने जैसी हरकत उसने की। ताड़ का पेड़ एक तरफ हो गया और उसके समानांतर टेपचू वजनी पत्थर की तरह नींचे को जा रहा था। मटका उसके पीछे था।

जमीन पर टेपचू गिरा तो धप्प की आवाज के साथ एक मरते हुए आदमी की अंतिम कराह भी उसमें शामिल थी। इसके बाद मटका गिरा और उसके हिज्जे–हिज्जे बिखर गए। काला सांप एक ओर पड़ा हुआ ऐंठ रहा था। उसकी रीढ़ की हड्‌िड़यां टूट गई थीं।

मदना सिंह दौड़ा। उसने आकर देखा तो उसकी हवा खिसक गई। उसने ताड़ की फुनगी से मटके समेत टेपचू को गिरते हुए देखा था। बचने की कोई संभावना नहीं थी। उसने एक–दो बार टेपचू को हिलाया–डुलाया। फिर गांव की ओर हादसे की खबर देने दौड़ गया।

धाड़ मार–मारकर रोती¸ छाती कूटती फिरोजा लगभग सारे गांव के साथ वहां पहुंची। मदना सिंह उन्हें मौके की ओर ले गया¸ लेकिन मदना सिंह बक्क रह गया। ऐसा नहीं हो सकता – यही ताड़ का पेड़ था¸ इसी के नीचे टेपचू की लाश थी। उसने ताड़ी के नशे में सपना तो नहीं देखा था? लेकिन फूटा हुआ मटका अब भी वहीं पड़ा हुआ था। सांप का सिर किसी ने पत्थर के टुकड़े से अच्छी तरह थुर दिया था। लेकिन टेपचू का कहीं अता–पता नहीं था। आसपास खोज की गई¸ लेकिन टेपचू मियां गायब थे।

गांववालों को उसी दिन विश्वास हो गया कि हों न हों टेपचू साला जिन्न है¸ वह कभी मर नहीं सकता।

फिरोजा की सेहत लगातार बिगड़ रही थी। गले के दोनों ओर की हडिड्‌यां उभर आई थीं। स्तन सूखकर खाली थैलियों की तरह लटक गए थे। पसलियां गिनी जा सकती थीं। टेपचू को वह बहुत अधिक प्यार करती थी। उसी के कारण उसने दस्रूाा निकाह नहीं किया था।

टेपचू की हरकतों से फिरोजा को लगने लगा कि वह कहीं बहेतू और आवारा होकर न रह जाए। इसीलिए उसने एक दिन गांव के पंडित भगवानदीन के पैर पकड़े। पंडित भगवानदीन के घर में दो भैंसें थीं और खेती पानी के अलावा दूध पानी बेचने का धंधा भी करते थे। उनको चरवाहे की जरूरत थी इसलिए पन्द्रह रूपए महीने और खाना खुराक पर टेपचू रख लिया गया। भगवानदीन असल काइयां थे। खाने के नाम पर रात का बचा–खुचा खाना या मक्के की जली–भूनी रोटियां टेपचू को मिलतीं। करार तो यह था कि सिर्फ भैसों की देखभाल टेपचू को करनी पड़ेगी¸ लेकिन वास्तव में भैसों के अलावा टेपचू को पंडित के घर से लेकर खेत–खलिहान तक का सारा काम करना पड़ता था। सुबह चार बजे उसे जगा दिया जाता और रात में सोते–सोते बारह बज जाते। एक महीने में ही टेपचू की हालत देखकर फिरोजा पिघल गई। छाती में भीतर से रूलाई का जोरदार भभका उठा। उसने टेपचू से कहा भी कि बेटा इस पंडित का द्वार छोड़ दे। कहीं और देख लेंगे। यह तो मुआ कसाई है पूरा¸ लेकिन टेपचू ने इंकार कर दिया।

टेपचू ने यहां भी जुगाड़ जमा लिया। भैसों को जंगल में ले जाकर वह छुट्टा छोड़ देता और किसी पेड़ के नीचे रात की नींद पूरी करता। इसके बाद उठता। सोन नदी में भैसों को नहलाता¸ कुल्ला वगैरह करता। फिर इधर–उधर अच्छी तरह से देख–ताककर डालडा के खाली डिब्बे में एक किलो भैंस का ताजा दूध दुहकर चढ़ा लेता। उसकी सेहत सुधरने लगी।

एक बार पंडिताइन ने उसे किसी बात पर गाली बकी और खाने के लिए सड़ा हुआ बासी भात दे दिया। उस दिन टेपचू को पंडित के खेत की निराई भी करनी पड़ी थी और थकान और भूख से वह बेचैन था। भात का कौर मुंह में रखते ही पहले तो खटास का स्वाद मिला¸ फिर उबकाई आने लगी। उसने सारा खाना भैसों की नांद में डाल दिया और भैसों को हांककर जंगल ले गया।

शाम को जब भैसें दुही जाने लगीं तो छटांक भर भी दूध नहीं निकला। पंडित भगवानदीन को शक पड़ गया और उन्होंने टेपचू की जूतों से पिटाई की। देर तक मुर्गा बनाए रखा¸ दीवाल पर उकडू बैठाया¸ थप्पड़ चलाए और काम से उसे निकाल दिया।

इसके बाद टेपचू पी•डब्ल्यू•डी• में काम करने लगा। राखड़ मुरम¸ बजरी बिछाने का काम। सड़क पर डामर बिछाने का काम। बड़े–बड़े मर्दों के लायक काम। चिलचिलाती धूप में। फिरोजा मकई के आटे में मसाला – नमक मिलाकर रोटियां सेंक देती। टेपचू काम के बीच में¸ दोपहर उन्हें खाकर दो लोटा पानी सड़क लेता।

ताज्जुब था कि इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद टेपचू सिझ–पककर मजबूत होता चला गया। काठी कढ़ने लगी। उसकी कलाई की हड्‌िड़यां चौड़ी होती गईं¸ पेशियों में मछलियां मचलने लगीं। आंखों में एक अक्खड़ रौब और गुस्सा झलकने लगा। पंजे लोहे की माफिक कड़े होते गए।

एक दिन टेपचू एक भरपूर आदमी बन गया। जवान।
पसीने¸ मेहनत¸ भूख¸ अपमान¸ दुर्घटनाओं और मुसीबतों की विकट धार को चीरकर वह निकल आया था। कभी उसके चेहरे पर पस्त होने¸ टूटने या हार जाने का गम नहीं उभरा।

उसकी भौहों को देखकर एक चीज हमेशा अपनी मौजूदगी का अहसास कराती–गुस्सा¸ या शायद घृणा की थरथराती हुई रोशन पर्त।

मैंने इस बीच गांव छोड़ दिया और बैलाडिला के आयरन ओर मिल में नौकरी करने लगा। इस बीच फिरोजा की मौत हो गई। बालदेव¸ संभारू और राधे के अलावा गांव के कई और लोग बैलाडिला में मजदूरी करने लगे। पंडित भगवानदीन को हैजा हो गया और वे मर गए। हां¸ किशनपाल सिंह उसी तरह ताड़ी उतरवाने का धंधा करते रहे। वे कई सालों से लगातार सरपंच बन रहे थे। कस्बे में उनकी पक्की हवेली खड़ी हो गई और बाद में वे एम•एल•ए• हो गए।

लंबा अर्सा गुजर गया। टेपचू की खबर मुझे बहुत दिनों तक नहीं मिली लेकिन यह निश्चित था कि जिन हालात में टेपचू काम कर रहा था¸ अपना खून निचोड़ रहा था¸ अपनी नसों की ताकत चट्टानों में तोड़ रहा था – वे हालात किसी के लिए भी जानलेवा हो सकते थे।

टेपचू से मेरी मुलाकात पर तब हुई¸ जब वह बैलाडिला आया। पता लगा कि किशनपाल सिंह ने गुंडों से उसे बुरी तरह पिटवाया था। गुंडों ने उसे मरा हुआ जानकर सोन नदी में फेंक दिया था¸ लेकिन वह सही सलामत बच गया और उसी रात किशनपाल सिंह की पुआल में आग लगाकर बैलाडिला आ गया। मैंने उसकी सिफारिश की और वह मजदूरी में भर्ती कर लिया गया।

वह सन अठहत्तर का साल था।
हमारा कारखाना जापान की मदद से चल रहा था। हम जितना कच्चा लोहा तैयार करते¸ उसका बहुत बड़ा हिस्सा जापान भेज दिया जाता। मजदूरों को दिन–रात खदान में काम करना पड़ता।

टेपचू इस बीच अपने साथियों से पूरी तरह घुल–मिल गया था। लोग उसे प्यार करते। मैंने वैसा बेधड़क¸ निडर और मुंहफट आदमी और नहीं देखा। एक दिन उसने कहा था¸ "काका¸ मैंने अकेले लड़ाइयां लड़ी है। हर बार मैं पिटा हूं। हर बार हारा हूं। अब अकेले नहीं¸ सबके साथ मिलकर देखूंगा कि सालों में कितना जोर है।"

इन्हीं दिनों एक घटना हुई। जापान ने हमारे कारखाने से लोहा खरीदना बंद कर दिया¸ जिसकी वजह से सरकारी आदेश मिला कि अब हमें कच्चे लोहे का उत्पादन कम करना चाहिए। मजदूरों की बड़ी तादाद में छंटनी करने का सरकारी फरमान जारी हुआ। मजदूरों की तरफ से मांग की गई कि पहले उनकी नौकरी का कोई दूसरा बंदोबस्त कर दिया जाए तभी उनकी छंटनी की जाए। इस मांग पर बिना कोई ध्यान दिए मैनेजमेंट ने छंटनी पर फौरन अमल शुरू कर दिया। मजदूर यूनियन ने विरोध में हड़ताल का नारा दिया। सारे मजदूर अपनी झुग्गियों में बैठ गए। कोई काम पर नहीं गया।

चारों तरफ पुलिस तैनात कर दी गई। कुछ गश्ती टुकड़ियां भी रखी गई¸ जो घूम–घूमकर स्थिति को कुत्तों की तरह सूंघने का काम करती थीं। टेपचू से मेरी भेंट उन्हीं दिनों शेरे पंजाब होटल के सामने पड़ी लकड़ी की बेंच पर बैठे हुए हुई। वह बीड़ी पी रहा था। काले रंग की निकर पर उसने खादी का एक कुर्ता पहन रखा था।

मुझे देखकर वह मुस्कराया¸ "सलाम काका¸ लाल सलाम।" फिर अपने कत्थे–चूने से रंगे मैले दांत निकालकर हंस पड़ा¸ "मनेजमेंट की गांड में हमने मोटा डंडा घुसेड़ रखा है। साले बिलबिला रहे हैं¸ लेकिन निकाले निकलता नहीं काका¸ दस हजार मजदूरों को भुक्खड़ बनाकर ढोरों की माफिक हांक देना कोई हंसी–ठठ्ठा नहीं है। छंटनी ऊपर की तरफ से होनी चाहिए। जो पचास मजदूरों के बराबर पगार लेता हो¸ निकालो सबसे पहले उसे¸ छांटो अजमानी साहब को पहले।"

टेपचू बहुत बदल गया था। मैंने गौर से देखा उसकी हंसी के पीछे घृणा¸ वितृष्णा और गुस्से का विशाल समुंदर पछाड़े मार रहा था। उसकी छाती उघड़ी हुई थी। कुर्ते के बटन टूटे हुए थे। कारखाने के विशालकाय फाटक की तरह खुले हुए कुर्ते के गले के भीतर उसकी छाती के बाल हिल रहे थे¸ असंख्य मजदूरों की तरह¸ कारखाने के मेन गेट पर बैठे हुए। टेपचू ने अपने कंधे पर लटकते हुए झोले से पर्चे निकाले और मुझे थमाकर तीर की तरह चला गया।

कहते हैं¸ तीसरी रात यूनियन ऑफिस पर पुलिस ने छापा मारा। टेपचू वहीं था। साथ में और भी कई मजदूर थे। यूनियन ऑफिस शहर से बिल्कुल बाहर दूसरी छोर पर था। आस–पास कोई आबादी नहीं थी। इसके बाद जंगल शुरू हो जाता था। जंगल लगभग दस मील तक के इलाके में फैला हुआ था।

मजदूरों ने पुलिस को रोका¸ लेकिन दरोगा करीम बख्श तीन–चार कांस्टेबुलों के साथ जबर्दस्ती अंदर घुस गया। उसने फाइलों¸ रजिस्टरों¸ पर्चों को बटोरना शुरू किया। तभी टेपचू सिपाहियों को धकियाते हुए अंदर पहुंचा और चीखा¸ "कागज–पत्तर पर हाथ मत लगाना दरोगाजी¸ हमारी डूटी आज यूनियन की तकवानी में हैं। हम कहे दे रहे हैं। आगा–पीछा हम नहीं सोचते¸ पर तुम सोच लो¸ ठीक तरह से।"

दरोगा चौंका। फिर गुस्से में उसकी आंखें गोल हो गई¸ और नथुने सांढ की तरह फड़कने लगे¸ "कौन है मादर . . .तूफानी सिंह¸ लगाओ साले को दस डंडे।"

सिपाही तूफानी सिंह आगे बढ़ा तो टेपचू की लंगड़ी ने उसे दरवाजे के आधा बाहर और आधा भीतर मुर्दा छिपकली की तरह ज़मीन पर पसरा दिया। दरोगा करीम बख्श ने इधर–उधर देखा। सिपाही मुस्तैद थे¸ लेकिन कम पड़ रहे थे। उन्होंने इशारा किया लेकिन तब तक उनकी गर्दन टेपचू की भुजाओं में फंस चुकी थी।

मजदूरों का जत्था अंदर आ गया और तड़ातड़ लाठियां चलने लगीं। कई सिपाहियों के सिर फूटे। वे रो रहे थे और गिड़गिड़ा रहे थे। टेपचू ने दरोगा को नंगा कर दिया था।

पिटी हुई पुलिस पलटन का जुलूस निकाला गया। आगे–आगे दरोगाजी¸ फिर तूफानी सिंह¸ लाइन से पांच सिपाहियों के साथ। पीछे–पीछे मजदूरों का हुजूम ठहाके लगाता हुआ। पुलिस वालों की बुरी गत बनी थी। यूनियन ऑफिस से निकलकर जुलूस कारखाने के गेट तक गया¸ फिर सिपाहियों को छोड़कर मस्ती और गर्व में डूबे हुए लोग लौट गए। टेपचू की गर्दन अकड़ी हुई थी और वह साल्हो दादर गाने लगा था।

अगले दिन सबेरे टेपचू झुग्गी से निकलकर टट्टी करने जा रहा था कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। और भी बहुत से लोग पकड़े गए थे। चारों तरफ गिरफ्तारियां चल रही थीं।

टेपचू को जब पकड़ा गया तो उसने टट्टीवाला लोटा खींचकर तूफानीसिंह को मारा। लोटा माथे के बीचोंबीच बैठा और गाढ़ा गंदा खून छलछला आया। टेपचू ने भागने की कोशिश की¸ लेकिन वह घेर लिया गया। गुस्से में पागल तूफानी सिंह ने तड़ातड़ डंडे चलाए। मुंह से बेतहाशा गालियां फूट रही थीं।

सिपाहियों ने उसे जूते से ठोकर मारी। घूंसे–लात चलाए। दरोगा करीम बख्श भी जीप से उतर आए। यूनियन ऑफिस में की गई अपनी बेइज्जती उन्हें भूली नहीं थी।

दरोगा करीम बख्श ने तूफानी सिंह से कहा कि टेपचू को नंगा किया जाए और गांड में एक लकड़ी ठोंक दी जाए। तूफानी सिंह ने यह काम सिपाही गजाधर शर्मा के सुपुर्द किया।

गजाधर शर्मा ने टेपचू का निकर खींचा तो दरोगा करीम बख्श का चेहरा फक हो गया। फिरोजा ने टेपचू की बाकायदा खतौनी कराई थी। टेपचू दरोगा का नाम तो नही जानता था¸ लेकिन उसका चेहरा देखकर जात जरूर जान गया। दरोगा करीम बख्श ने टेपचू की कनपटी पर एक डंडा जमाया¸ "मादर . . .नाम क्या है तेरा?"

टेपचू ने कुर्ता उतारकर फेंक दिया और मादरजाद अवस्था में खड़ा हो गया¸ "अल्ला बख्श बलद अब्दुल्ला बख्श साकिन मड़र मौजा पौंड़ी¸ तहसील सोहागपुर¸ थाना जैतहरी¸ पेशा मज़दूरी – "इसके बाद उसने टांगे चौड़ी कीं¸ घूमा और गजाधर शर्मा¸ जो नीचे की ओर झुका हुआ था¸ उसके कंधे पर पेशाब की धार छोड़ दी¸ "जिला शहडोल¸ हाल बासिंदा बैलाडिला . . ."

टेपचू को जीप के पीछे रस्सी से बांधकर डेढ़ मील तक घसीटा गया। सड़क पर बिछी हुई बज़ड़ी और मुरम ने उसकी पीठ की पर्त निकाल दी। लाल टमाटर की तरह जगह–जगह उसका गोश्त बाहर झांकने लगा।

जीप कस्बे के पार आखिरी चुंगी नाके पर रूकी। पुलिस पलटन का चेहरा खूंखार जानवरों की तरह दहक रहा था। चुंगी नाकेपर एक ढाबा था। पुलिस वाले वहीं चाय पीने लगे।

टेपचू को भी चाय पीने की तलब महसूस हुई¸ "एक चा इधर मारना छोकड़े¸ कड़क।" वह चीखा। पुलिस वाले एक–दूसरे की ओर कनखियों से देखकर मुस्कराए। टेपचू को चाय पिलाई गई। उसकी कनपटी पर गूमड़ उठ आया था और पूरा शरीर लोथ हो रहा था। जगह–जगह से लहू चुहचुहा रहा था।

जीप लगभग दस मील बाद जंगल के बीच रूकी। जगह बिलकुल सुनसान थी। टेपचू को नीचे उतारा गया। गजाधर शर्मा ने एक दो डंडे और चलाए। दरोगा करीम बख्श भी जीप से उतरे और उन्होंने टेपचू से कहा¸ "अल्ला बख्श उर्फ टेपचू¸ तुम्हें दस सेकेंड का टाइम दिया जाता है। सरकारी हुकुम मिला है कि तुम्हारा जिला बदल कर दिया जाए। सामने की ओर सड़क पर तुम जितनी जल्द दूर–से–दूर भाग सकते हो¸ भागो। हम दस तक गिनती गिनेंगे।"

टेपचू लंगड़ाता–डगमगाता चल पड़ा। करीम बख्श खुद गिनती गिन रहे थे। एक–दो–तीन–चार–पांच।

लंगड़े¸ बुढ़े¸ बीमार बैल की तरह खून में नहाया हुआ टेपचू अपने शरीर को घसीट रहा था। वह खड़ा तक नहीं हो पा रहा था¸ चलने और भागने की तो बात दूर थी।

अचानक दस की गिनती खत्म हो गई। तूफानी सिंह ने निशाना साधकर पहला फायर किया धांय।

गोली टेपचू की कमर में लगी और वह रेत के बोरे की तरह जमीन पर गिर पड़ा। कुछ सिपाही उसके पास पहुंचे। कनपटी पर बूट मारी। टेपचू कराह रहा था¸ "हरामजादो।"

गजाधर शर्मा ने दरोगा से कहा¸ "साब अभी थोड़ा बहुत बाकी है।" दरोगा करीम बख्श ने तूफानी सिंह को इशारा किया। तूफानी सिंह ने करीब जाकर टेपचू के दोनों कंधों के पास¸ दो–दो इंच नीचे दो गोलियां और मारीं¸ बंदूक की नाल लगभग सटाकर। नीचे की जमीन तक उधड़ गई।

टेपचू धीमे–धीमे फड़फड़ाया। मुंह से खून और झाग के थक्के निकले। जीभ बाहर आई। आंखें उलटकर बुझीं। फिर वह ठंडा पड़ गया।

उसकी लाश को जंगल के भीतर महुए की एक डाल से बांधकर लटका दिया गया था। मौके की तस्वीर ली गई. पुलिस ने दर्ज किया कि मजदूरों के दो गुटों में हथियारबंद लड़ाई हुई। टेपचू उर्फ अल्ला बख्श को मारकर पेड़ में लटका दिया गया था। पुलिस ने लाश बरामद की। मुजरिमों की तलाश जारी है।

इसके बाद टेपचू की लाश को सफेद चादर से ढककर संदूक में बंद कर दिया गया और जीप में लादकर पुलिस चौकी लाया गया।

रायगढ़ बस्तर¸ भोपाल सभी जगह से पुलिस की टुकड़ियां आ गई थीं। सी•आर•पी•वाले गश्त लगा रहे थे। चारों ओर धुंआ उठ रहा था। झुग्गियां जला दी गई थीं। पचासों मजदूर मारे गए। पता नहीं क्या–क्या हुआ था।

सुबह टेपचू की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेजा गया। डॉ•एडविन वर्गिस ऑपरेटर थिएटर में थे। वे बड़े धार्मिक किस्म के ईसाई थे। ट्राली–स्ट्रेचर में टेपचू की लाश अंदर लाई गई। डॉ•वर्गिस ने लाश की हालत देखी। जगह–जगह थ्री–नॉट–थ्री की गोलियां धंसी हुई थीं। पूरी लाश में एक सूत जगह नहीं थी¸ जहां चोट न हो।

उन्होंने अपना मास्क ठीक किया¸ फिर उस्तरा उठाया। झुके और तभी टेपचू ने अपनी आंखें खोलीं। धीरे से कराहा और बोला¸ "डॉक्टर साहब¸ ये सारी गोलियां निकाल दो। मुझे बचा लो। मुझे इन्हीं कुत्तों ने मारने की कोशिश की है।"

डॉक्टर वर्गिस के हाथ से उस्तरा छूटकर गिर गया। एक घिघियाई हुई चीख उनके कंठ से निकली और वे ऑपरेशन रूम से बाहर की ओर भागे।

आप कहेंगे कि ऐसी अनहोनी और असंभव बातें सुनाकर मैं आपका समय खराब कर रहा हूं। आप कह सकते हें कि इस पूरी कहानी में सिवा सफेद झूठ के और कुछ नहीं है।

मैंने भी पहले ही अर्ज किया था कि यह कहानी नहीं है¸ सच्चाई है। आप स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि जीवन की वास्तविकता किसी भी काल्पनिक साहित्यिक कहानी से ज्यादा हैरत अंगेज होती है। और फिर ऐसी वास्तविकता जो किसी मजदूर के जीवन से जुड़ी हुई हो।

हमारे गांव मड़र के अलावा जितने भी लोग टेपचू को जानते हैं वे यह मानते हैं कि टेपचू कभी मरेगा नहीं – साला जिन्न है।

आपको अब भी विश्वास न होता हो तो जहां¸ जब¸ जिस वक्त आप चाहें¸ मैं आपको टेपचू से मिलवा सकता हूं।

*****

2 टिप्‍पणियां:

  1. भाई टेपचू की कहानी पढ़कर बड़ा आनंद आया आभार

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. जबरदस्त. अब तक हजारों की संख्या में टेपचू मारे गए है. उसके बाद फिर वो जिन्दा हो उठते हैं.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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