गुरुवार, 1 मई 2008

सोमेश शेखर चन्द्र का यात्रा संस्मरण : एवरेस्ट का शीर्ष



एवरेस्ट का शीर्ष
- सोमेश शेखर चन्द्र


दिसंबर 2004। यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी। मन में, जहाँ, एक तरफ नई जगह, भिन्न लोगों और संस्कृति को देखने समझने का उत्साह और ललक थी, तो दूसरी तरफ, अनजाने लोगों, अचीन्ही जगहों से गुजरकर अपने गंतव्य तक पहुँचने के बीच की, काल्पनिक दुश्वारियों की सोच सोचकर मन में घबराहट भी थी। दिल्ली से जर्मनी तक की करीब सात घंटों की उड़ान में तो कुछ पता नहीं चला था लेकिन उसके आगे डलास तक की, ग्यारह घंटे की उड़ान, काफी उबाऊ थी। सुन रखा था कि अमरीका में, एयरपोर्ट पर, बाहर से आने वाले यात्रियों के सामानों की गहन तलाशी ली जाती है। रास्ते में, अमरीका पहुँचने के पहले, जहाज में हमें एक फार्म भरने के लिए दिया गया था जिसमें नीचे लिखा हुआ था कि एयरपोर्ट के स्टाफ आफ सामानों की गहन तलाशी ले सकते हैं लेकिन वे आफ साथ पूरे सुहृद और सहयोगी रहेंगे। कृपया जाँच में उनका सहयोग करें। फार्म में लिखी इस बात ने, मुझे आश्वस्त करने की बजाए और ज्यादा डरवा दिया था। इसके पीछे कारण यह था कि दिखावे के लिए, जिधर देखिए, अच्छी अच्छी और आदर्श की बातें, लिखी जरूर दिखती हैं लेकिन हकीकत, उससे एकदम भिन्न तरह की या कहें कि एकदम उलट तरह की होती है। एयरपोर्ट पर विदेशियों के लिए पारगमन की औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए लाइन में लगा था तो देखा था कि काउंटर पर बैठा स्टाफ, किसी किसी के, सामानों की सघन तलाशी के लिए, उसे, एक गलियारे नुमा जगह की तरफ भेज देता था और किसी किसी को थोड़ी पूछताछ के बाद बाहर जाने की इज्जत दे दिया करता था। मेरे ठीक आगे, एक दक्षिण भारतीय बुजुर्ग महिला थी। वे एकदम अकेली थी, काउंटर पर बैठा स्टाफ उन्हें तलाशी गलियारे की तरफ जाकर, अपने सामान चेक करवा लेने को कहा था तो मैं बेहद डर गया था। अपनी बारी आने पर वह हमारे कागज़ात जांचने के बाद, मुझसे पूछा था आफ बक्से में खाने पीने की चीजें, किसी तरह के बीज या पौधे तो नहीं हैं? उसके पूछने पर मैंने बड़ा झिझकते हुए, इनकार में अपना सिर हिला दिया था। मेरे बक्से में कुछ नहीं, बल्कि कपड़ों के अलावे, अचार, पिसे गरम मसाले, चावल का आटा, सत्तू, गुझिया और मिठाइयाँ, जिसे बच्चे खुद तथा उनके माँ, बाप, भारत से चलते समय, उनके लिए, अपनी अटैची में ठूंस कर रखते हैं, वह सब कुछ था। ऐसा नहीं है कि, एयरपोर्ट के स्टाफ, भारत से आने वाले लोगों के बक्सों के भीतर ठूंस कर रखे इस तरह के सामानों से आगाह नहीं होते। वे सबकुछ जानते हैं। खैर, उस स्टाफ ने मेरा चेहरा और देह की भाषा पढ़कर जान लिया था कि बक्से में जरूर कुछ है तो वह मुझे बड़े गहरे से ताककर मुसकुरा दिया था। मेरी झूठ पकड़ने के बाद, जब वह मुझे, बड़े गहरे से ऊपर से नीचे तक ताकने लगा था, तो उस एक क्षण, मेरी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की सांस नीचे ही थम गई थी। और उसका उस खास अंदाज में मुसकुराना देख, मेरा तो खून ही सूख गया था। मैं समझ गया था कि आ गई मेरी शामत। अब यह आदमी, मुझे भी तलाशी गलियारे की तरफ भेजेगा, और बच्चों के लिए इतनी मेहनत से जो सामान, हमने बक्से में ठूंस रखा है उसे या तो जब्त कर लिया जाएगा या निकाल कर बाहर फेंक दिया जाएगा। इतना ही नहीं, हमारे बक्से के अंदर हमारी रोजमर्रा के और भी कई सामान थे। किसी इमर्जेंसी के लिए कुछ दवाइयाँ भी मैं साथ लेकर चला था, हालाँकि उस सबका प्रेस्क्रिप्सन हमारे साथ था, लेकिन अपने यहाँ, ऐसे मौकों पर, सबकुछ ठीकठाक होने के बावजूद, संबंधित स्टाफ अपने ही नियम कानून चलाकर, तरह तरह की ऊटपटाँग की बातें कर करके, लोगों को परेशान करके रख देते हैं, यह बात मेरे जेहन में थी इसलिए, जब काउंटर पर बैठा स्टाफ मुझे ऊपर से नीचे तक ताककर अजीब तरह के कटखने लहजे में मुस्कराया था तो मैं बुरी तरह घबरा गया था। धन्यवाद, आप बाहर जा सकते हैं। मेरे कागज़ात मेरे हाथ में थमकर जब उसने मुझे बाहर जाने की इजाजत दिया था तो, मेरी समझ में ही नहीं आया था कि वह मुझे तलाशी गलियारे की तरफ जाने के लिए कह रहा है या कि बाहर जाने के लिए। मैं थोड़ी देर तक उसका मुँह निहारता वही खड़ा रहा था, यह जानने के लिए कि उसने मुझसे आखिर कहा क्या है? यूँ कैन गो ओ ऽ ऽ ऽ ऽ ........... मुझे पसोपेश में पड़ा देख, वह यू...कैन..गो के एक एक शब्द का अलग अलग उच्चारण करके मुझे जाने के लिए कहा था बावजूद इसके मेरी समझ में नहीं आया था। स्पष्ट होने के लिए मैंने उससे पूछा था दिस वे आर दैट वे... मैं तलाशी गलियारे की तरफ जाऊँ या एयरपोर्ट से बाहर निकलने के रास्ते? मेरे इतना पूछने पर उसने मुझे उंगलियों के इशारे से एयरपोर्ट से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया था तो मेरा मन खुशियाली से भर उठा था। पत्नी साथ में थी। एयरक्राफ़्ट में एक आदमी को चौंसठ किलो वजन तक का सामान ले जाने की इजाजत थी। हम दोनों ने इसका भरपूर फायदा लिया था। हमारे पास एक सौ अट्ठाइस किलो वजन के बैगेज के साथ आठ-आठ किलो के दो केबिन बैग भी थे। इस तरह हमारे पास न सिर्फ कई नग बक्से थे, बल्कि वे काफी वजनी भी थे। इस सबको रोलर से उठाना और कार्ट में लादकर बाहर निकलना भी हमारे लिए एक बड़ी समस्या थी। यह सब किया कैसे जायगा इसे सोच सोचकर मैं काफी परेशान था लेकिन जब हम अपना सामान, रोलर से लेने के लिए वहाँ पहुँचे तो यह देखकर मुझे बड़ी राहत मिली थी कि वहाँ पर, एक लंबा चौड़ा बलिष्ठ काला आदमी, लोगों के सामान, रोलर से उठाकर, कार्ट में लादने में, उनकी मदद कर रहा था। यात्रियों में कई ऐसी भारतीय महिलाएँ थीं जो उम्रदराज होने के साथ, साथ एकदम अकेली थी और उनके पास वजनी बक्से भी थे। काला आदमी, हालांकि अपने श्रम के एवज में लोगों से पाँच डालर ले रहा था लेकिन उसमें, पैसे के प्रति एक तरह की निस्पृहता सी थी। उसे देखकर ऐसा लगता था कि वह वहाँ पैसा कमाने के लिए नहीं, बल्कि नर नारायण की सेवा में जुटा हुआ हैं। उसे पैसे से कोई मतलब ही नहीं है। हाँ, जिसे उसकी मदद की दरकार होती थी और वह, उससे जाकर कहता था, तो वह, बड़े अपनेपन से उसका सामान उतारने में उसकी मदद करने लग जाया करता था। अलावे इसके, यदि वह देखता था कि, किसी को उसके मदद की दरकार है तो वह उससे पूछ भी लेता था। वह वहाँ लोगों की, इतने मनोयोग और आत्मीयता से सहयोग कर रहा था जैसे लोग, पराए देश से आने वाले यात्री नहीं, बल्कि उसके ही परिवार के सदस्य हों। मैं अपने सामान के इंतजार में जितनी देर वहाँ रुका था, सिर्फ उसे ही देखता खड़ा रहा था। करीब सात फुट लंबी और वैसी ही बलिष्ठ और मजबूत काया का धनी वह शख्स, जितना सुदर्शन था उससे भी ज्यादा विनम्र, निस्पृह और आत्मीय था। सच कहता हूँ ऐसा इंसान, अपनी जिंदगी में, मैं पहली दफा देख रहा था। मैं उसे देखकर चकित था। क्या इतना गरिमामयी इंसान इस पृथ्वी पर आज भी मौजूद है? वह शख्स, जिसकी मदद कर देता था उसकी तरफ पलट कर ताकता भी नहीं था। उनका काम खत्म करने के बाद, वह दूसरे लोगों की मदद करने में जुट जाता था। कोई यदि उससे पूछ लेता था कि आपको कितना दूँ तो वह उसे बता देता था पाँच डालर, और पाँच डालर वह उससे, बड़ी निस्पृहता से थाम कर अपनी जेब के हवाले करता था जैसे कह रहा हो, इसकी क्या जरूरत थी मैं तो सिर्फ आप लोगों की सेवा में यहाँ जुटा हुआ हूँ। वहीं खडे़ खडे़ मैंने कई लोगों को उसे बिना कुछ दिए ही अपना कार्ट लेकर चले जाते देखा। वे उसके सामने से ही चले गए थे लेकिन उसके चेहरे पर जरा सा कोई विकार नहीं उभरा था वह पहले की ही तरह निस्पृह और विनम्र, लोगों की मदद करने में जुटा रहा था। एयरक्राफ़्ट से उतरने के बाद, जितना मैं डरा हुआ था वहाँ पर जिस जगह भी मैं पहुँचा था, अपनी डर के विपरीत, मुझे वहाँ के सभी स्टाफ काफी सुहृद, विनम्र मिले थे।

एयरपोर्ट से बाहर निकला, तो देखा पारगमन की औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए, मेरे ठीक आगे, लाइन में खड़ी दक्षिण भारतीय बुजुर्ग महिला, जिसे काउंटर पर बैठा स्टाफ, समान तलाशी के लिए दूसरे गलियारे की तरफ भेज दिया था वे, बड़े खुशी मन मुसकराती हुई अपना कार्ट लिए चली आ रही है। काउंटर पर बैठे स्टाफ का, इतनी उम्रदराज महिला को सामानों की गहन तलाशी के लिए, चेकिंग गलियारे की तरफ भेजना मुझे अच्छा नहीं लगा था। बत्तीस-बत्तीस किलो के दो बक्से जिस तरह सामानों से ठंसे रहते हैं उसे खोलकर सारे सामान बाहर निकालना और फिर उसे वापस बक्से में समेटना, कितना दुष्कर होता है यह मैं भली भांति जानता था। ऐसे में उस अकेली और उम्रदराज महिला को तलाशी गलियारे की तरफ जाने की बात सोच सोचकर मैं परेशान हो रहा था। लेकिन जब मैं उन्हें उस तरफ से खुशी मन आते देखा था तो मुझे बड़ी खुशी हुई थी।

एयरपोर्ट से निकलकर, जब हमारी कार सड़क पर तेज रफ्तार भागने लगी थी तो मेरी आँखों के सामने से जो दृश्य गुजर रहे थे वे मुझे किसी स्वप्न लोक में विचरने जैसा लग रहे थे। चार चार, छः छः लेन की सड़कें, इतनी साफ और सपाट थीं कि उस पर एक सौ बीस किलोमीटर की रफ्तार में दौड़ती कार, ऐसे भागती चली जा रही थी जैसे वह जमीन में नहीं बल्कि हवा में उड़ रही हो। न कहीं कोई झोल न कोई धचक, न कोई रूकावट न बाधा। कार के शीशे बंद थे इसलिए बाहर की हमें कोई आवाज भी सुनाई नहीं पड़ रही थी। कार के स्पीडो मीटर पर मेरी निगाह पड़ी तो देखा उसकी स्पीड पचासी मील पर था यानी कि एक सौ तीस किलोमीटर की। मैंने लड़के को, कार की स्पीड कम करने के लिए कहा तो वह हँसने लग गया था। उसने मुझे बताया कि अगर हमें कार चलाना है तो इतनी ही स्पीड में चलाना होगा इससे कम स्पीड पर इस रास्ते पर कारें चलाने की इजाजत ही नहीं है। उसने मुझे सड़क से थोड़ी दूर समानांतर पर चलती एक और सड़क को दिखाते हुए बताया, कि जो लोग नौसिखिया होते हैं या जिन्हें तेज रफ्तार कार चलाने में डर लगती है उनके लिए बगल की रोड है। एक फ्लाई ओवर के करीब जब हमारी कार पहुँची तो देखा वहाँ हर लेन की कार को फ्लाई ओवर के दो खंभों के बीच से गुजारा गया था। जैसे ही हमारी कार, अपनी लेन के दो खंभों से करीब सौ गज दूर थी, तो जिस तरह अपने यहाँ, सड़कों पर टाल टैक्स वसूलने के लिए लोग, लोहे के खंभे, बीच सड़क में, वाहनों को रोकने के लिए लगाए रखते हैं और जो वाहन वहाँ से गुजरते हैं उनसे टाल टैक्स के भुगतान की रसीद देखने के बाद ही, उस खंभे को ऊपर उठाकर उसे आगे बढ़ने की इजाजत देते हैं उसी तरह अमरीका में भी जगह जगह टाल टैक्स वसूलने के बूथ बने होते हैं। हमारी कार जब खंभे के करीब पहुँची, तो लोहे का एक बड़ा राड, बीच सड़क में आकर हमारा रास्ता रोक लिया था। अचानक से बीच में आ रूकें उस राड को देखकर मेरी तो सांस ही रूक गई थी। इतनी तेज रफ्तार भागती कार को ब्रेक लगाकर, किसी भी सूरत में, राड के पहले रोक सकना कतई मुमकिन नहीं था। मैं लड़के की बगल आगे की सीट पर बैठा हुआ था लेकिन लड़का था कि कार को उसी स्पीड में भगाए लिए चला जा रहा था। राड और कार के बीच इतनी कम दूरी देख मैं उस पर चीखने ही वाला था यार, तुम्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है कि आगे लोहे का राड हमारी लेन रोके पड़ा हुआ है और तुम हो कि कार फर्राटा उड़ाए लिए चले जा रहे हो। लेकिन मैं उस पर चीखता, इसके पहले ही लोहे का राड, विद्युत गति से, ऊपर खड़ा होकर हमारी लेन निर्विघ्न कर दिया था और हमारी कार सरसराती आगे निकल गई थी। हालांकि हमारी कार बिना किसी हादसे के सुरक्षित, आगे बढ़ गई थी किंतु, मैं लड़के पर बुरी तरह उखड़ा हुआ था और हांफ रहा था लेकिन लड़का था कि मेरी स्थिति से बेपरवाह कार, उसी स्पीड में उड़ाए लिए चला जा रहा था। क्यों तुम्हें सड़क रोक कर खड़ा वह राड दिखाई नहीं पड़ा? वह भला बीच सड़क में आकर क्यों खड़ा हो गया था? जरा ध्यान से चलाओ हम लोग सपरिवार एक ही कार में बैठे हैं इतनी तेज रफ्तार कार में अगर कुछ उल्टा सीधा हो गया तो हमारा तो सत्यानाश हो जाएगा। लड़का मेरी बात सुनकर हंस दिया था। उसने मुझे बताया कि अमरीका में टाल टैक्स वसूलने के लिए दो तरह की व्यवस्था है पहली व्यवस्था में वे लोग हैं जो अपनी कारों में टाल टैक्स कूपन डाले रखते हैं। कूपन वाले लोगों को कही रुककर टाल टैक्स भुगतान करने की जरूरत नहीं होती। इन कारों से, ऊपर लगा कम्प्यूटर अपने आप टाल टैक्स वसूल लेता है। दूसरे तरह के लोग जिनकी कारों में कूपन नहीं होता, वे जगह जगह रुककर इसका भुगतान करते हैं। ऐसे लोगों के लिए एक अलग ही लेन होती है। आगे जाकर उसने मुझे वह बूथ दिखाया था जहाँ लोग अपनी कारें लाइन में लगा कर टाल टैक्स का भुगतान कर रहे थे।

कार के भीतर बैठा जो कुछ मैं देख रहा था सब मुझे बड़ा मायावी लग रहा था। इतनी साफ और सपाट बिना किसी धूल धक्कड़ की, काफी चौड़ी सड़कें, ट्रैफिक निर्बाध बहता रहे इसके लिए, एक के ऊपर दूसरा और फिर तीसरा फ्लाई ओवर, इतनी, अच्छी व्यवस्था कि न कहीं कोई बाधा न टकराव और जहाँ पर फ्लाई ओवर नहीं थे वहाँ पर, मोटे-मोटे खंभों में, सड़क के बीचों बीच काफी ऊँचाई पर लगी लाल हरी बत्तियों से, समूचा ट्रैफिक बड़े व्यवस्थित और सुचारु रूप में बहता चला जा रहा था। ट्रैफिक नियंत्रित करने या उस पर नजर रखने के लिए न कही कोई पुलिस थी न वालंटियर। कारें भी यहाँ की इतनी चकचक करती और संभ्रांत दिखती थी जैसे उन्हें अभी अभी शोरूम से निकालकर सड़क पर लाया गया हो। यहाँ तक कि कारों के टायर तक एकदम साफ और चकचक करते दिखते थे।

कारों और सड़कों की मायावी दुनिया से निकलकर जब मैं सड़कों के दोनों किनारे के रिहायशी और व्यापारिक जगहों को देखना शुरू किया था तो वे भी मुझे वैसे ही संभ्रांत, अनूठे और अद्भुत दिखे थे। जैसी संभ्रांतता यहाँ की सड़कों पर बिखरी पड़ी थी, कारों और उसके भीतर बैठे लोगों में थी, वैसी ही संभ्रांतता और अनूठापन, यहाँ के सभी तरह के निर्माणों, चाहे वे पुल हों, फ्लाई ओवर, गगनचुंबी इमारतों, अपार्टमेंटों बस्तियों के घरों, यहाँ तक कि छोटी छोटी गुमटियों तक में दिखाई पड़ रही थी। जिस जगह रिहायशी बस्तियाँ बनी होती थी। वहाँ पर तीन पोलों में झंडे फहरा रहे होते थे। वे झंडे देखने में, ऐसा लगते थे कि जैसे उन्हें अभी अभी दुकान से लाकर टाँगा गया हो। यहाँ के मकानों और निर्माणों से जैसी संभ्रांतता टपकी पड़ रही थी ठीक वैसा ही बड़प्पन और अनूठापन यहाँ के वातावरण में भी विराजमान था। वातावरण यहाँ का, बिना किसी धुआँ या धूल कण के, इतना प्रछन्न और साफ था पेड़ पौधे इतने धुले पुंछे और ताजे दिखते थे कि उन्हें देखकर लगता था कि प्रकृति अपनी पूरी शान और गरिमा के साथ यहाँ के वातावरण पर अपना समूचा वैभव लेकर उतर आई हो।

इसके बाद इस महान देश के बारे में, मेरे भीतर वर्षों से दबी पड़ी कुछ जिज्ञासाएँ अपना सिर उठाने लग गई थी जिनके बारे में मैं, किताबों में पढ़कर नहीं जान पाया था। बताने वालों से भी मुझे मेरी उन जिज्ञासाओं के सही और मुझे संतुष्ट कर दे, ऐसी जानकारियाँ, नहीं मिल पाई थी। मेरे भीतर की वे जिज्ञासाएँ यह थी कि आखिर अमरीका में ऐसी कौन सी खासियत हैं ऐसे कौन से हीरे मोती बरसते हैं जो हमारे बच्चें, इतने अच्छे और विश्वस्तर के संस्थानों में पढ़ने के बाद, भारत में उनके स्तर के प्रचुर अवसर और सुख-सुविधाएँ मौजूद है फिर भी वे, अपना देश और आत्मीयों को छोड़कर, अमरीका भाग खड़ा होने के लिए पगलाए रहते हैं। दूसरे इस महान देश में दो सौ वर्षों से भी ज्यादा से प्रजातंत्र है। प्रजातंत्र भारत में भी पिछले पचास से ऊपर वर्षों से हैं, लेकिन उस देश में ऐसा क्या है कि वहाँ पर न तो कभी सीनेटर, सीनेट में आपस में जूतम पैज़ार करते हैं न एक दूसरे पर माइक और कुर्सियां फेंकते हैं, न कोई पार्टी कोई रैली या रैला करती है। हड़ताल घेराव या अमेरिका बंद कमी होते नहीं सुना। किसी नेता को कुर्सी के लिए षडयंत्र रचते या दूसरे की टांग खींचते भी नहीं सुना। जो कुछ भी यहाँ होता है सब कुछ गरिमापूर्ण और पूरी तरह मर्यादित ढंग से होता है क्यों? इसके अलावे दूसरी तमाम तरह की बुराइयाँ जो भारत में आज कैंसर बन चुकी है वह सब यहाँ कभी सुनने को नहीं मिलती। और सबसे अंत में अमरीका में ऐसी क्या खासियत है कि एक समय पृथ्वी पर जिनकी तूती बोलती थी उन हस्तियों की हस्तियां मिट गई लेकिन अमरीका, जस का तस, आज भी वैसे ही न सिर्फ बना हुआ है बल्कि आज वह दुनिया का सिरमौर कहलाने लग गया है। मेरे भीतर की इन जिज्ञासाओं और प्रश्नों का संतोषजनक जवाब, मुझे किताबों में मिल भी नहीं सकती थी और न ही किसी बताने वाले के पास ही इसका सही जवाब मिल सकना संभव था। इसका जवाब तो यहाँ जो है उसे देखकर ही समझा जा सकता था। मैं करीब पाँच महीने यहाँ रहा इस दौरान जो कुछ मैंने यहाँ देखा उसे देखकर कहूँ कि मेरी सारी जिज्ञासाएँ उत्तरित हो चुकी हैं तो ऐसा मेरा दावा करना, पूरी तरह गलत बयानी होगी। खैर एयरपोर्ट से लेकर घर पहुँचने तक में, रास्ते में हमारी कार, जिस रास्ते से भी गुजरी थी उसमें माल, अपार्टमेंट, रिहायशी बस्तियाँ सब कुछ गुजरी थी और जहाँ तक मेरी नजरें जा सकी थी चहुँ ओर मुझे वैभव और संभ्रांतता ही पसरी दिखी थी और उसे देखकर मैं पूरी तरह चमत्कृत था। लेकिन रास्ते में जे कुछ मैंने देखा था, वह सब किसी भी मुल्क की बाहर की चीजें होती हैं। उसकी असल आत्मा तो वहाँ के लोग और बाशिंदे होते हैं। जब तक उन्हें न देखा जाए, उनसे मिलकर उनके सुख दुख के बारे में न जाना समझा जाए उनका रहन, सहन, तीज त्योहार, परंपराएं, वेषभूषा और उससे भी बढ़कर उनका बात व्यवहार न देखा जाए तब तक उनके बारे में कुछ जाना समझा ही नहीं जा सकता। तेज रफ्तार भागती कार में बैठा मैं इन सब बातों से रूबरू हो भी नहीं सकता था। लेकिन सड़क के किनारे की आमदरफ़्त, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त लोग, पार्कों, उद्यानों, अपार्टमेंटों और रिहायशी बस्तियों में, अपने बच्चों की उंगलियां थामकर चलते माँ बाप, हल्ला गुल्ला मचाकर खेल में मशगूल, आपस में तू तू मैं मैं करते युवा और बच्चे। स्कूलों और कालेजों से छूटने के बाद, सड़क पर झुंड बनाकर पैदल और साइकिलों पर चलते छात्र, छात्राएँ। स्कूल बसों में अपने घर को लौटते गदबदे और गलगुथ बच्चे। एक हाथ में वाटर बोटल और दूसरे में स्कूल बैग संभाले माँएं, और उनकी बगल फुदकते उनके नन्हे मुन्ने। यह सब, और इसी तरह के और भी तमाम तरह के भारत में दिखने वाले दृश्य, मेरी जेहन में मौजूद थे और मैं वही सब कुछ, यहाँ भी तलाशने में जुटा हुआ था। लेकिन यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ था कि एयरपोर्ट से लेकर घर पहुँचने तक बीच रास्ते में मुझे आदमी का एक भी पूत नहीं दिखा था। अगल बगल भागती कारों में भी कोई नहीं दिखता था। वह इसलिए कि सभी कारों के शीशे बन्द होते थे और उसके भीतर बैठे लोग, कोशिश करने पर भी दिखाई नहीं पड़ते थे। मालों, अपार्टमेंटों, रिहायशी बस्तियों से लेकर सड़क तक पर, दिखती थी तो सिर्फ कारें। यह अनुभव मेरे लिए बड़ा विस्मयकारी था। क्या अमरीका में आदमी बसते ही नहीं है? यहाँ बसती है तो सिर्फ कारें? मैं अपनी इस जिज्ञासा को अपने भीतर ही दबाए रखा था। इसके बारे में किसी से कुछ नहीं पूछा था। लेकिन आपको सुनकर ताज्जुब होगा कि अमरीका में सचमुच कारें ही बसती हैं। पाँच महीनों के अमरीका प्रवास के दौरान सड़क के किनारे पैदल चलते, मुझे सिर्फ दो आदमी दिखे थे और जिस दिन वे मुझे दिखाई पड़े थे मैं चिल्ला उठा था वह देखो एक आदमी पैदल चलकर जा रहा है। हमारा घर बड़ी लंबी चौड़ी जगह में बसी बस्ती में था। इस बस्ती में हजारों मकान थे लेकिन आदमियों के बगैर, जो वीरानापन मैंने बाहर की सड़कों पर देखा था ठीक वैसी ही वीरानगी कालोनी के भीतर की सड़कों पर भी हमेशा पसरी रहती थी। बाहर की सड़कों पर की वीरानगी कुछ हद तक तेज रफ्तार भागती करें दूर कर देती हैं लेकिन कालोनी के भीतर पसरा सन्नाटा कुछ इस तरह का था जैसे चारों तरफ कर्फ्यू लगा हुआ हो। वह सन्नाटा कभी कभी मुझे भीतर तक बड़ा उदास, कर जाया करता था। मकान यहाँ के कुछ इस तरह के बने होते हैं कि घर के भीतर जब तक खिड़कियाँ न खोला जाए, बाहर की कोई आवाज ही नहीं पहुँचती। मैं कभी कभी आदमी का चेहरा देखने के लिए अपने घर से बाहर निकल कर खड़ा हो जाया करता था, जब कोई कार वहाँ से गुजरती थी तो, उसके भीतर बैठे आदमी को बड़े गौर से देखने लग जाया करता था। यदि किसी कार का शीशा पारदर्शी होता तो उसके भीतर बैठा आदमी या औरत मुझे दिख जाती नहीं तो ज्यादातर मौकों पर, कार के भीतर कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता था। आदमी का चेहरा अगर कहीं दिखता था तो अपना ही चेहरा और वह भी शीशे में या अपने घर के सदस्यों का चेहरा, इसके अलावे बाहर के किसी आदमी का चेहरा देखने के लिए हमें तरस जाना पड़ता। हमें ऐसा लगता था कि जैसे हम किसी ऐसे टापू पर सपरिवार रह रहे हों जहाँ बसने के लिए हजारों बाशिंदों ने अपना आशियाना बनाने के बाद, उसे छोड़कर कहीं और चले गए है बचा रह गया है तो सिर्फ हमारा एक परिवार, , जो सन्नाटे के खौफ से, अपने घर में दिनभर दुबका पड़ा रहा है। आशियानों को छोड़ कर चले गए उनके बाशिंदे कभी कभार आते भी है तो इतना चुपके से, और अपनी कारों में छुप छुपाकर, जिससे कि दूसरा कोई उन्हें देख न ले। यदि किसी दिन, घर के भीतर से शीशों के रास्ते, कोई मुझे पैदल चलता दिखाई पड़ जाता, तो मैं चिल्लाने लग जाता, वह देखो एक आदमी बाहर पैदल चलता चला जा रहा है। मेरे चिल्ला उठने पर मेरे बच्चे तो नहीं लेकिन पत्नी भागकर वहाँ पहुँच जाती और हम दोनों शीशे के इस पार से उसे, तब तक देखते रहते जब तक वह हमारी आँखों से ओझल नहीं हो जाता। उसके गुजर जाने के बाद भी, हम वहीं, बड़ी देर तक बैठे रहते। चलता फिरता आदमी अगर कही, यहाँ दिखाई पड़ता था तो बाजारों, मालों और वालमार्ट जैसे बड़े बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों में या पार्कों, नदियों, समुद्र और झीलों के किनारे या खेल और मनोरंजन की जगहों में इसके अलावे यहाँ पैदल चलता आदमी कभी कभार ही दिखाई पड़ता था।

शहरों में यहाँ, गगनचुंबी, चकचक करती, आभा बिखेरती इमारतें है और उसी के जोड़ की लंबी चौड़ी साफ सुथरी सड़कें हैं तो किराए के उद्देश्य से, पानी बिजली और सड़कों तथा सुरक्षा के लिए, सिक्योरिटी उपकरणों से लैस, पाँच पाँच सात सात मंजिल अपार्टमेंटों का समूह हैं, जिसमें लोग किराए देकर रहते हैं। बड़ी बड़ी रिहायशी कालोनियां हैं जिसमें छोटे बड़े सभी तरह के मकान बने होते हैं और लोग उन्हें खरीदकर उसमें रहते हैं। यहाँ पर शहर, अपार्टमेंट, बड़े माल, बाजार, दुकानें सब बड़ी प्लानिंग के साथ बने हुए होते हैं। उनकी प्लानिंग ऐसी होती हैं कि अगले दो सौ सालों तक वहाँ सभी तरह की सहूलियतें निर्बाध उपलब्ध रहें और उनसे दूसरे किसी को कोई बाधा टकराहट या असुविधा न हो। नालियाँ यहाँ पर कही देखने को नहीं मिलती, सीवेज की सारी व्यवस्था, जमीन के नीचे की हुई होती है। सड़कें यहाँ इतनी साफ सुथरी होती है कि उस पर कही कागज का एक छोटा सा टुकड़ा तक दिखाई नहीं पड़ता। कारें यहाँ इतनी है फिर भी यहाँ का आकाश और समूचा वातावरण एकदम साफ और निर्मल होता है इसके चलते शाम पश्चिम दिशा में उगता चाँद सोने की बड़ी परात की तरह, आकाश में टंगा दिखाई पड़ता है। सुबह का उगता सूरज भी वैसा ही साफ और सोने की बड़ी और चमकती परात की तरह लगता है। दूकानों, बाज़ारों, बड़े बड़े मालों जैसी भीड़भाड़ वाली जगहें तक वैसी ही साफ सुथरी होती है जैसा साफ सुथरा, घरों के अंदर का फर्श होता है। यहाँ की सफाई, स्वच्छ और निर्मल वातावरण, सपाट चौड़ी सड़कें चक चक करती कारें, आभा बिखेरते भव्य मकान और वहाँ की सारी व्यवस्था देख मैं दंग था। क्यों है ऐसा यहाँ सब कुछ? इसका रहस्य मैं थोड़े ही दिनों में जान गया था। कारण इसका यह था कि यहाँ पर खाली जगहों और रोड के किनारे किनारे घास लगा दी गई है जिसके चलते आँधी तूफान आने पर भी यहाँ धूल नहीं उड़ती। कारों यहाँ तक कि बड़े वाहनों तक से धुआं निकलता नहीं दिखता और सबसे बड़ी बात तो यह कि यहाँ पर लोग कागज की एक चिंदी तक रोड पर या दूसरी जगहों में नहीं फेंकते। जगह जगह पर यहाँ कूड़ेदान रखे हुए होते हैं कचरे को लोग, उसी में डाल देते हैं यदि किसी जगह किसी को कूड़ेदान नहीं मिला तो वह, कचरे को अपनी जेब में रखकर अपने घर ले जाता है। यहाँ पर हर सिटी, एक स्वतंत्र इकाई होती है जिस तरह अपने यहाँ म्यूनिसिपल्टियाँ होती हैं। अपने यहाँ म्यूनिसिपल्टियों के जिम्मे, शहर की साफ सफाई और प्रकाश व्यवस्था जैसी चीजें ही होती हैं लेकिन यहाँ पर सिटी, अपने क्षेत्र की पुलिस व्यवस्था से लेकर स्कूल, लाइब्रेरी और दूसरी तमाम व्यवस्थाएँ देखती हैं। अपने संसाधन वे खुद से अपने क्षेत्र के व्यापारिक प्रतिष्ठानों से बिकने वाले सामानों पर टैक्स लगाकर गैस, बिजली, पानी और हाउस टैक्स से उगाहती हैं। घरों के कचरों का निस्तारण यहाँ बड़े वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है। इसके लिए यहाँ की सिटी हर घर को अलग अलग रंग के प्लास्टिक के दो बड़े ड्रम देकर रखती है। लोग अपने घरों के सब्जी के छिलके, कागज के टुकड़े, बच्चों के डाइपर, जूठन कूठन एक ड्रम में डालते हैं और दूसरे ड्रम में कांच और प्लास्टिक के शीशी, बोतल, लोहा, लक्कड़ डालते हैं। ड्रमों में कचरे डालने के लिए ऐसा नहीं है कि लोग उसे, अपने घर से उठाते हैं और ले जाकर ड्रम में डाल देते हैं। इसके लिए वे, अपने घर में दो अलग अलग कचरापेटी रखते हैं। उन कचरापेटियों में वे, एक बड़ा पॉलिथीन का बैग लगा देते हैं। एक कचरापेटी वे अपनी रसोई में रख लेते हैं और दूसरा किसी दूसरे एकांत में रखे रहते हैं। घर के सारे कचरे वे उन कचरापेटियों में डालते जाते हैं। जब वे पूरी तरह भर जाते हैं तो पॉलिथीन का मुंह बांधकर उसे संबंधित ड्रम में डाल देते हैं। सिटी द्वारा दिया हुआ ड्रम भी इतना मजबूत, साफ और चक चक कर रहा होता है जैसे उसे अभी अभी दुकान से लाकर रखा गया हो। हफ्ते में शुक्रवार के दिन सुबह सुबह लोग दोनों ड्रमों को अपने घर के पिछवाड़े रख देते हैं सिटी की ट्रक आती है और उसे ट्रक में भरकर ले जाती है। ड्रमों में दो पहिए लगे होते हैं जिससे उसे इधर से उधर बड़ी आसानी से ले जाया जा सके। इसके लिए उसमें एक हत्था लगा होता है। कचरे के कारण वह जितना भी वजनी हो जाए, उसे इधर से उधर करने में लोगों को कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ती। स्ट्रोलर की तरह लोग उसे बड़ी आसानी से, अपने बैकयार्ड से निकालकर घर के पिछवाड़े रख आते हैं। कचरा ढोने वाली ट्रकें, यहाँ खुली नहीं होती। दो बड़ी प्लास्टिक के ढक्कन से वे बंद होती है, कचरा उठाने के समय दोनों प्लास्टिक के ढक्कन, दोनों तरफ खुल जाते हैं। ड्रम उठाने के लिए, ट्रक में एक मशीन लगी होती है जिसमें दो लंबे हाथों की तरह दो सड़सियां होती है। ट्रक का ड्राइवर ड्रम के पास, ट्रक को लाकर खड़ा करता है, हाथ की तरह वाले सड़सियों से ड्रम पकड़ता है और उसे उठाकर समूचा ड्रम, ट्रक की बाड़ी में उल्टा करके सारा कचरा उंडेल कर ड्रम वापस उसी जगह छोड़ देता है। ड्रम का मुँह भी खुला हुआ नहीं होता वह पूरी तरह एक ढक्कन से बंद होता है। इस तरह कचरे का निस्तारण, बड़ी सहूलियत के साथ, एक ही आदमी करता चलता है।

अमरीका हम दिसंबर के महीने में पहुँचे थे। उस समय क्रिसमस एकदम नजदीक था। क्रिसमस यहाँ का सबसे बड़ा त्योहार होता है और यह त्योहार यहाँ, बड़ी धूमधाम और उल्लास से मनाया जाता है। जिस तरह, अपने यहाँ, भारत में दुर्गापूजा मनाया जाता है और उस समय, बड़े बड़े भव्य पंडालों में माँ दुर्गा की कलात्मक और खूबसूरत मूर्तियाँ सजाई जाती है और झालरों की सजावटों से गली कूचे तक दगदगा उठते हैं तथा पंडालों को देखने के लिए जन सैलाब उमड़ पड़ता है करीब करीब, उसी तरह यहाँ क्रिसमस का त्योहार मनाया जाता है। लोग अपने घरों और उसके सामने के लॉन और बगीचों को, बिजली की झालरों से बड़ा कलात्मक ढंग से सजाते हैं। लकड़ी के पटरों से बनाए गए, घोड़े, हाथी हिरन, प्रभु ईशु की, तरह तरह तरह की मुद्राओं के कट आउट लगाकर, उसे बिजली के तरह तरह के रंग के बल्बों से, इतने कलात्मक ढंग से सजाते हैं कि मन करता है कि उसे ही देखते रहें। बल्बों की रोशनी में बड़े बड़े क्रिसमस ट्री, ऐसी आभा बिखेर रहे होते हैं और वे इतना भव्य दिखते हैं कि उन्हें देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। घर ही नहीं, यहाँ के बड़े बड़े माल, स्टोर दूकानें और बाजार भी क्रिसमस के मौके पर, बड़े कलात्मक और भव्य तरीके से सजाए जाते हैं। जिस तरह लोग कालोनियों की सजावटें देखने के लिए अपने परिवार और बाल बच्चों के साथ, बड़ी दूर दूर तक घूम आते हैं उसी तरह यहाँ के मालों और बाजारों की सजावटें देखने के लिए, काफी बड़ी तादाद में लोग, वहाँ पहुँचते हैं। कहाँ पर कैसी सजावट है और किस कालोनी और माल में लोगों की भारी तादाद पहुँच रही हैं इसकी जानकारी लोग, इंटरनेट से अपने कम्प्यूटर पर करके, वहाँ पहुँचने के लिए पहले से ही योजना बना लेते हैं। वैसे यहाँ पर सजावट में कोई भी कालोनी पीछे नहीं रहती लेकिन कुछ कालोनियाँ और माल ऐसे हैं जो अपनी कलात्मकता और भव्यता के लिए मशहूर होती है। उनकी कलात्मक सजावट इतनी अनूठी और भव्य होती है कि उसे देखकर दंग रह जाना पड़ता है लगता है उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा, हुनर और सोच उसमें उंडेल कर रख दिया है। ऐसा किसी एक दो या तीन घरों में नहीं होता, बल्कि समूची कालोनी में, अपना अपना हुनर दिखाने की जैसे होड़ सी लगी होती है। अपने यहाँ पूजा पंडालों को देखने के लिए जिस तरह जनसैलाब उमड़ पड़ता है और लोग उसे देखने के लिए पैदल ही चलकर वहाँ पहुँचते हैं उसी तरह यहाँ की कालोनियों की सजावटें देखने के लिए लोग, अपनी अपनी कारों में वहाँ पहुँचते हैं, उस समय कालोनियों में कारें चीटियों की तरह, एक के पीछे दूसरी रेंगती चलती है। यहाँ पर भी मैं कार के भीतर बैठे लोगों और उनके बच्चों के अलावे, किसी को पैदल चलते नहीं देखा। कारों की ऐसी भीड़, लेकिन न तो कहीं कोई पुलिस न वालंटियर न माइक, न एनाउंस सिस्टम, फिर भी सब कुछ इतना नियंत्रित और सुचारु था कि उसे देख मैं दंग था। ऐसा आत्मानुशासन, शायद पृथ्वी के किसी भी कोने में दिखना असंभव होगा। एक के पीछे दूसरी और दूसरी के पीछे तीसरी कार, इस तरह आती जाती तरह तरह की खूबसूरत कारों का सिलसिला, कालोनियों के भीतर रेंग रहा होता है। यहाँ पर मैं जितनी किस्म की कारे देखा हूँ और बेहद खूबसूरत, वैसी कारें मैं अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा था। उन कारों में किसी किसी कार की लंबाई अपने यहाँ दिखने वाली दो बड़ी कारों के बराबर थी। उन कारों की छतें मनचाहे ढंग से खोली जा सकती थी। इस तरह की कई कारों में मैंने, छोटे छोटे गदबदे बच्चों को ऊपर सिर निकालकर बैठे उन नज़ारों को देखते देखा। कारों के उस अनवरत सरकते सिलसिले में चार फुट की लंबाई के बराबर की छोटी और गिड्डी कारें, उसी शान और अकड़ से रेंगती चली जा रही थीं यह कहती हुई कि हम छोटी गिड्डी और नाटी है तो क्या हुआ, हम भी किसी से कम नहीं है और उसकी पीठ से सटी उसके पीछे लगी संभ्रांत, महारानी कार, इतनी गरिमामयी ढंग से, छोटी के पीछे पीछे सरकी चली जा रही होती थी इतनी मर्यादित और विनम्र, कि उसके आगे, ऐंठती, इठलाती और मटक मटककर अपने नखरे प्रदर्शन करती ठिगनी को वह, बर्दाश्त नहीं कर रही हो, बल्कि उसे पूरी इज्जत दे रही हो।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी....)

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