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सोमेश शेखर चन्द्र का यात्रा संस्मरण : एवरेस्ट का शीर्ष - समापन किश्त



एवरेस्ट का शीर्ष
- सोमेश शेखर चन्द्र

(पिछले अंक से जारी....)

वहाँ मुझे बच्चों से जैसी आत्मीयता और सम्मान मिला था और वहाँ इकट्ठा परियों सरीखी खूबसूरत लड़कियों में, उतना ही खूबसूरत उनका दिल और दिमाग देखने को मिला था उसे देखकर मैं चमत्कृत था। लेकिन उससे भी बड़ा चमत्कार मेरी आँखों के सामने, बड़ी तादाद में, टेबुल पर, सजे, तरह तरह के पकवानों और व्यंजनों के रूप में, घटा था। अपने यहाँ शादी ब्याह जैसे समारोहों पर, व्यंजन बनाने में माहिर कैटरर्स, दो दिन पहले से, अपनी बड़ी टोली के साथ, दिन रात जुटकर काम करते हैं तब जाकर इतने वेराइटी के व्यंजन तैयार कर पाते हैं लेकिन उस लड़के के घर तो, न ही कोई कैटरर था न ही मालकिन का कोई मददगार मुझे कहीं दिखाई पड़ा था, बावजूद इसके वहाँ मुझे इतने वेराइटी के व्यंजन तैयार मिले, यह कैसे संभव हुआ? यह बात, किसी अनबूझ पहेली की तरह, मुझे परेशान किए हुई थी लेकिन मेरे भीतर की यह पहेली, एक दिन, खुद बखुद सुलझ कर, इसका बड़ा सहज सा हल मुझे समझा गई थी।

उस दिन मेरे खुद के घर में इसी तरह के एक समारोह का आयोजन था, और उसमें आमंत्रितों की तादाद भी ठीक वैसी ही थी। अपने यहाँ, छोटे से छोटे समारोह के लिए लोग हफ्तों पहले से, कैटरर, टेंट हाउस तथा खाने पीने के सामान तथा सब्जी भाजी, तेल मसाले इकट्ठा करने में व्यस्त हुए रहते हैं, लेकिन मेरे यहाँ, यहाँ के हिसाब से, इतना बड़ा आयोजन था फिर भी बच्चों में किसी भी तरह का तनाव या व्यस्तता नहीं थी। एक दिन पहले बहू बेटा, दुकान गए और कार में लादकर सारा सामान घर ले आए। आयोजन के दिन मैं काफी तनाव में था कैसे बेवकूफ हैं ये बच्चे इनके घर में इतना बड़ा आयोजन है लेकिन इन्हें इसकी जरा सी भी कोई परवाह ही नहीं है। उस दिन मैं सुबह काफी जल्दी उठ गया था और नहा धोकर तैयार हो लिया था लेकिन बच्चे सुबह काफी देर तक सोते रहे थे। देख रही हो न, आज इनके घर में इतना बड़ा आयोजन है और ए लोग अभी तक टांग पसारे सो ही रहे हैं मैंने पत्नी से उनकी शिकायत किया था तो, उसने भी, बच्चों के लापरवाह रहने की बात पर, उन्हें कोसा था लेकिन, जैसा भारतीय बापों की, बे-जरूरत जैसी बातों को भी जरूरी बनाकर, अपने बच्चों पर बिगड़ने और अपनी बघारने की आदत होती है, मेरा बिगड़ा मूड देखकर पत्नी समझी गयी थी कि मैं जरूर बच्चों को कुछ न कुछ उल्टा पुल्टा बोलने वाला हूँ। उसने मुझे समझाया था कि झूठमूठ का हम लोगों को अपना दिमाग खराब नहीं करना चाहिए, करना और संभालना उनको है इसलिए यह उनका हेडेक है हम लोग इसको लेकर बेकार का क्यों झखें। इतना ही नहीं सुबह काफी देर सो लेने के बाद, जब दोनों उठे थे तो भी, बेटा चाय पीकर सोफे पर लदकर पसर गया था और बहू रसोई में नाश्ता बनाने चली गई थी। अजीब बात है आज इनके घर, साठ सत्तर लोगों का खाना है लेकिन उसके लिए यहाँ मुझे तैयारी नाम की कोई चीज ही नहीं दिख रही है ऊपर से वे इतने सुस्त और बेपरवाह है जैसे आयोजन, इनके घर में नहीं बल्कि दूसरे के घर में हैं और ए लोग होस्ट नहीं, बल्कि अपने ही घर में गेस्ट होकर पहुँचे हों।

हालॉकि मैं उनको कुछ बोला नहीं था लेकिन भीतर ही भीतर, उनकी लापरवाही और सुस्ती देख, जल भुनकर खाक हुआ जा रहा था। लेकिन निर्धारित समय से काफी पहले, हमारे यहाँ जब कारों में भर भर कर लोग पहुँचना शुरू किए थे तो उनके साथ सिर्फ उनकी पत्नियाँ और बच्चे नहीं थे बल्कि सबके साथ, बड़े बड़े भगौनों में, घर में तैयार, तरह तरह के पकवान और व्यंजन भी थे। जब लोग उसे ला लाकर किचेन में रखना शुरू किए थे तो वहाँ इतने भगौने इकट्ठा हो गए थे कि उतनी बड़ी रसोई, उन्हें रखने के लिए छोटी पड़ने लग गई थी। आने वालों में अपनी माओं के साथ आए बच्चे तो, धमा चौकड़ी मचाने के लिए गेमरूम में चले गए थे और उनके बाप, हाल के कुर्सी, सोफे पर लद पसरकर, गप्पे लडाने में जुट गए थे लेकिन उनकी पत्नियाँ किचेन में, घर से बनाकर लाते लाते जो सामान ठंडे होकर बेमजा और बेस्वाद हो जाते, कुछ तो, ऐसे व्यंजन तलने, भूजने और पकाने में जुट गई थीं और कुछ सलाद और चटनी जैसी चीजें काटने पीटने में व्यस्त हो गई थीं। कोई भी औरत या मर्द, किसी दूसरे के घर या रसोई में घुसेगा तो उसे, उस घर के भीतर, या रसोई में, उसकी जरूरत के सामान कहाँ कहाँ रखे हुए है इतना तक तो, घर वाले से पूछना ही पड़ेगा। लेकिन, यहाँ किचन में जुटी लड़कियाँ, अपनी जरूरत के सामान, किचेन के खानों से इस तरह निकाल निकाल कर ले रही थीं जैसे वह उनका खुद का किचन हो और सारे सामान, उन्होंने खुद से सजाकर रखा हुआ हो। अरे वाह....... घर का मालिक सोफे पर पसरा लोगों से गप्पें लगाने में जुटा हुआ है तथा मालकिन बिना काम के खाली बैठी हमजोलियों के साथ दुनिया जहान की बातें बतियाने में मशगूल हैं। यही है भारतीय संस्कृति में, हमारे बुजुर्गों की सामूहिकता और सहयोग की असल परिकल्पना, जो मुझे उसके खांटी स्वरूप में, भारत में तो कहीं देखने को नहीं मिली थी लेकिन अमरीका आकर न सिर्फ मैंने, अपनी ऑखों के सामने उसे उसके खांटी स्वरूप में, घटित होते देखा था बल्कि यहीं पर, मैंने अपनी संस्कृति में सामाजिक समरसता तथा सह अस्तित्व के लिए, सामूहिकता और सहयोग के माध्यम से हमारे मनीषियों ने सबको एक माला में गूंथने पिरोने का जो बड़ा सरल सा और कारगर नुस्खा ईजाद किया है उसे भी बड़े अच्छे से जाना था।

अपने घर से, दो तीन घर हटकर, एक दक्षिण भारतीय परिवार रहता था। एक दिन, उनके यहाँ, हम सपरिवार खाने पर आमंत्रित थे। अपने घर मे, समारोह के आयोजन के बाद, मैं इन लोगों के आयोजनों के पीछे का सारा रहस्य जान गया था। जो लड़की जिस तरह का व्यंजन बनाने में सिद्धहस्त होती है, जब दूसरे के घर, किसी समारोह का आयोजन होता है तो वह उसमें, उस व्यंजन को बनाकर ले जाती है मैं यही समझता था। लेकिन जब मुझे अपने पड़ोसी के घर पर भी उसी तरह, बड़ी तादाद में, तरह तरह के स्वादिष्ट और लजीज व्यंजन खाने को मिला तो मैं, फिर सोच में पड़ गया था। इसके यहाँ तो सिर्फ मेरा ही परिवार आमंत्रित था और मेरे यहाँ से कोई उसकी मदद में भी नहीं पहुँचा था, फिर भी यहाँ, इतने वेरायटी के लजीज व्यंजन, यह कैसे संभव हुआ? खाने के बाद, घर की मालकिन की तारीफ करते समय, मेरे मन में आया था कि उससे पूछूं, कि तुम्हारे अकेले से, इतने सारे स्वादिष्ट और लजीज व्यंजन तैयार करना संभव कैसे हुआ? लेकिन मैंने उससे पूछा नहीं था। घर आकर, बहू से यह बात पूछा, तो उसने बताया था कि, पाँच सात दिन पहले से ही लोग इसे बनाने में जुट जाती है और बना बनाकर फ्रिज में रखती जाती हैं इसलिए ऐसा संभव हुआ।

हमारे, घर की ही लाइन के आखिर के घर में, एक मलयाली परिवार रहता था। उन लोगों ने अपने यहाँ एक दिन, सत्य नारायण व्रतकथा का आयोजन किया हुआ था। जो पुरोहित कथा सम्पन्न करवाने के लिए वहाँ आए हुए थे वे धोती कुर्ता में थे और अपनी कार से आए थे। घर का मालिक, कुर्ता और पीली धोती पहने था और मालकिन खूबसूरत बनारसी साड़ी में, किसी दुल्हन की तरह सजी हुई थी। पूजा का घर उन्होंने किसी मंडप की तरह सजाया हुआ था। पंडित जी जब पूजा करवाने बैठे तो उस बड़े कमरे में सभी बच्चे तथा वहाँ जुटे औरत मर्द भी आकर बैठ गए थे। पूजा के पहले, संस्कृत में मंत्र बोलकर कुल देवता, ग्राम देवता से लेकर तमाम देवी देवताओं और दिगपालों तथा नवग्रह के देवताओं का आवाहन करके उनको आसन देकर, नैवेद्य समर्पित करने के बाद उनका धूप दीप से पूजन किया जाता है, इसके बाद सत्यनारायण कथा के पाँचों अध्याय कहे जाते हैं और अंत में हवन और आरती होती है। पंडित जी, देवताओं के आवाहन के लिए संस्कृत के जो भी श्लोक बोलते थे वे, इतने स्पष्ट और शुद्ध होते थे, साथ ही उनकी आवाज और देह की भंगिमा ऐसी होती थी जैसे सचमुच के सारे देवता, आकाश में बैठे हुए हो, और पंडित जी अपने मंत्रोच्चार से उन्हें आकाश से उतरकर, वेदी पर आ बिराजने का निवेदन कर रहे हो। उनके निवेदन पर, जब देवता वहाँ आ उतरते थे तो बड़े आदर के साथ वे उन्हें, उनका आसन देकर, उनके स्थान पर बैठा देते थे। इहा तिष्ठ। सत्य नारायण कथा का पाँचों अध्याय उन्होंने खुद से नहीं कहा था। उसे कहने के लिए, वहाँ आए, जितने भी बच्चे थे, सबको उन्होंने पाँच ग्रुपों में बाँट दिया था। इसके बाद, उन्होंने, अपने बैग से, पहले से तैयार रखी, चार पाँच पन्नो की नत्थी की हुई, कई पर्चियाँ निकाला था और एक एक अध्याय की पर्चियाँ पाँचो ग्रुप में बांट दिया था। उन पर्चियों में पाँचों अध्याय के संस्कृत के श्लोक, रोमन लिपि में लिखे हुए थे। श्लोक के बाद, उनका अर्थ और भाव उन्होंने अंग्रेजी में अनुवाद किया हुआ था। जिस ग्रुप के बच्चों को, कथा का जो अध्याय कहने को मिला था वे पहले संस्कृत का श्लोक पूरा पढ़ते इसके बाद उसका अंग्रेजी में अर्थ कहते। जहाँ कहीं बच्चे, संस्कृत के श्लोकों के उच्चारण में गलती कर देते पंडित जी बड़े प्यार से, उसे टोंक कर, उसका सही उच्चारण, सुनाकर उससे फिर से वह श्लोक बोलवाते। वहाँ जितने बच्चे ग्रुपों में बैठे हुए थे उनके संस्कृत के श्लोकों का गायन सुनकर लगता था कि सभी श्लोक पहले से ही, उन्हें याद है और उन श्लोकों के भाव और अर्थ का भी उन्हें अच्छा ज्ञान है। जितनी देर तक पूजा होती रही, सबके सब बड़े भक्तिभाव से वहाँ बैठे उसमें शामिल रहे थे। वहाँ पर बच्चों से लेकर बडो तक में जैसी तन्मयता और श्रद्धा मैंने पूरी पूजा के दौरान देखा, वैसा भाव, भारत में मुझे न ही यहाँ के पुरोहितों में देखने को मिलता है और न ही, कथा में पहुँचे लोगों में ही।

खाना पीना खत्म करके, जब मैं पति पत्नी, वहाँ से चलने को हुए, तो मैं घर के मालिक मालकिन को तलाशने लग गया था। मालकिन औरतों के बीच घूम घूमकर उन्हें खिलाने में जुटी हुई थी और मालिक खाने से निवृत्त हो चुके अपने मित्रों के बीच बैठा, गप्पें मार रहा था। मैंने उसे बुलाकर, उससे चलने की इजाजत लिया था तो उसने, मेरा निहोरा करते हुए मुझसे निवेदन किया था बस एक मिनट अपना समय हमें और दीजिए अंकल जी, बस एक मिनट, मुझसे इतना निवेदन करने के बाद, वह भागता हुआ औरतों के बीच व्यस्त, अपनी पत्नी की बांह पकड़कर उसे खींचते घसीटते हमारे सामने ले आकर खड़ी कर दिया था। मैं और पत्नी, अगल बगल ही खड़े थे। दोनों हमारे, सामने खड़ा होकर अपने दोनों हाथ अपने सीने पर जोड़, आँखे बंद कर, हमारी प्रार्थना में कुछ बुदबुदाए थे इसके बाद दोनों हाथ जोड़े जोड़े ही अपने घुटनों पर बैठ गए थे और उसी तरह वहाँ भी प्रार्थना किए थे इसके बाद दोनों जमीन पर दंडवत लोट गए थे और अपने दोनों हाथ हमारे पाँवों की तरफ बढ़ा कर जमीन पर काफी देर तक उसी रूप में दंडवत पड़े रहे थे।

हे भगवान .......... मैं यह क्या देख रहा हूँ? दंडवत पड़कर, प्रणाम करने की बात मैं किस्से कहानियों में बहुत सुना था। छठ जैसे पर्व के मौके पर, कई औरत मर्दों को, जमीन पर लोट लोट कर घाट की तरफ जाते भी देखा था। देव स्थानों को जाते रास्तों पर भी दंड़ीरूप में, अपने इष्ट के दरबार में हाजिरी लगाने जाते लोगों को भी मैंने देखा था लेकिन वह सब, महज मेरे देखने और सुनने तक ही सीमित था। उन्हें देखकर अगर कभी कुछ मेरे ध्यान में आया था तो बस इतना ही कि वे, लोग, किसी उद्देश्य के लिए मन्नतें माने रहे होंगे और उनकी वह मन्नत पूरी हो गई होगी इसलिए वे इस तरह लोट लोट कर अपने आराध्य के पास जा रहे है। इसके सिवा, दंडवत पड़कर प्रणाम करने के पीछे का असल क्या है इसके बारे में कभी मेरा ध्यान ही नहीं गया था। लेकिन जब उस घर में, पति पत्नी दोनों दंडवत होकर, अपने हाथ हमारे पाँवों की तरफ बढ़ाकर जमीन पर पड़ गए थे तो मेरा समूचा शरीर गनगना उठा था और मुझे लगा था मेरे भीतर का चैतन्य, उन दोनों की तरफ उंड़ेलता चला जा रहा है। मेरे लिए, यह बड़े अजीब तरह का और अलौकिक अनुभव था। वहीं पर, अपनी संस्कृति में, श्रेष्ठों और महात्माओं के पाँव छूकर तथा दंडवत पड़कर प्रणाम करके, उनका आशीर्वाद लेने के पीछे का असल मतलब मेरी समझ में पहली दफा आया था। पाँव छूकर या दंडवत पड़कर प्रणाम करने का मतलब, हैं अपने सम्पूर्ण का समर्पण, ऐसा समर्पण जिसमें दो आत्माओं के बीच चैतन्य के प्रवाह के मार्ग में, अहंकार, जो एक बड़ी दीवार बनकर आ खड़ा होता है, उसके विसर्जन का एक बड़ा सरल और कारगर नुस्खा। अहंकार का विसर्जन होते ही जिस तरह पानी की धार ढलवा की तरफ बहने लगती है ठीक उसी तरह चैतन्य, प्रणाम करने वाले की तरफ प्रवाहित होना शुरू हो जाता है। चैतन्य का प्रवाह, एक अलौकिक घटना है, यह याचक और दाता के बीच कुछ मांगने या देने या लेन देन जैसी दुनियावी क्रिया नहीं है। बल्कि दोनों का, दोनों को, अपना सम्पूर्ण न्योछावर कर देने जैसा है। दुनिया के सभी ग्रंथों में और संतों और महात्माओं ने, ईश्वर प्राप्ति के लिए जिस समर्पण की बात कहा है वह यही समर्पण है। ऐसा ही समर्पण, दो लोगों के बीच, जब प्रेम होता है तब भी देखने को मिलता है। प्रेम के होने पर, दोनों में से कोई, किसी से न तो कुछ माँगता है न ही किसी को कुछ देता है, बल्कि दोनों ही दोनों पर न्योछावर हुए रहते हैं, वहाँ दोनों में लूटने और लुटाने जैसी कोई दुनियावी क्रिया नहीं होती बल्कि दोनों ही अपना संपूर्ण दूसरे पर लुटा देने को उतावले हुए रहते हैं।

हमारे घर में एक नए मेहमान का आगमन होने वाला था। उसके आने के दिन, सुबह, अभी हम लोग सोए ही हुए थे कि बेटे ने हमें आकर बताया था कि मेहमान ने अपने आने की सूचना की घंटी बजा दिया है। उसके आने की सूचना से वह, बुरी तरह उत्तेजित था। इसके पहले, तीसरी पीढ़ी के प्रसाद से दादा दादियों, नाना नानियो की पुलक और उनका किलकना, कुदकना मैं देख चुका था लेकिन इसका अनुभव, कितना अलौकिक और रोमांचकारी होता है, वह अपने के आने पर ही समझ पाया था। बेटा, हमें हड़बड़ाया देख, हमसे कहा था, आप लोग आराम से तैयार होइए, मैं पत्नी को लेकर अस्पताल जा रहा हूँ और वह उसे लेकर अस्पताल चला गया था। उसके जाने के बाद, मैंने देखा था कि अस्पताल वालों ने डिलीवरी के बाद, जच्चा और बच्चा दोनों की जरूरत की एक किट, तथा दूसरे कई सामानों की लिस्ट, बेटे को, इस हिदायत के साथ पकड़ाया हुआ था कि वह उन्हें, अस्पताल आते समय, अपने साथ जरूर लेकर आवे। लेकिन बेटा, हड़बड़ी में, सारा सामान, घर पर ही छोड़कर, अस्पताल भाग लिया था। उसके जाने के बाद, पत्नी ने मुझे बताया था कि, बेटे को जो सामान लेकर अस्पताल जाना था वह तो यही रह गया है। हे भगवान, अब मैं क्या करूँ? एक तो मेरे लिए यह एकदम अनजानी जगह, दूसरे बिना कार के यहाँ, एक कदम भी जा सकना नामुमकिन होता है। हम लोग कार भी चलाना नहीं जानते और अगर चलाना भी जानते होते तो भी, हम इंटरनेशनल ड्राइविंग लाइसेंस, कहाँ से लाते। खुदा न खास्ता हमारे पास वैसा ड्राइविंग लाइसेंस भी होता तो भी यहाँ के यातायात का जैसा सख्त कानून है सड़कों पर सब कुछ जितना स्वचालित और हाईटेक है, एक सौ तीस चालीस किलोमीटर से कम की रफ्तार पर सड़कों पर कारें चलाई ही नहीं जा सकती और इस सबसे ऊपर, भारत में रोड पर बाएँ चलने का नियम है जबकि यहाँ सब कुछ दाहिने चलता है वैसे में भारत के माहिर से माहिर ड्राइवर तक, यहाँ की सड़कों पर कारें चलाने की हिम्मत न करे, तो हम जैसे कमजोरों की क्या मजाल जो यहाँ कार चलाने की बात सोच भी लें। हम दोनों के बीच, सामान को लेकर, अभी चर्चा चल ही रही थी कि इसी बीच, हमारे घर की घंटी घनघना उठी थी। लो आधे रास्ते से ही लौटना पड़ा न उसे? बेटा हड़बड़ी में जो बड़ी चूक कर दिया था इस पर खीझ में बड़बड़ाता मैं, जाकर दरवाजा खोला था तो, मेरे घर की लाइन की दो लड़कियाँ मुझे नमस्ते करके, भड़भड़ाती सीधा बहू के बेडरूम में घुसकर अस्पताल ले जाने वाले सामानों से भरी अटैची उठाकर, बाहर हाल में निकाल लाई थीं और उसे खोलकर उसमें रखे सामानों का, लिस्ट से मिलान करने लग गई थी। अटैची में, लिस्ट के मुताबिक दो तीन सामान नहीं थे। इतनी सुबह, इस समय कहाँ कहाँ के स्टोर खुले होंगे, और किस स्टोर में, वे सामान उन्हें मिलेंगे इस पर दोनों ने चर्चा किया था। इसके बाद एक लड़की, बिना मुझसे कुछ पूछे या बताए या पैसे की जिक्र के, अपनी कार लेकर, उसे लाने के लिए दौड़ पड़ी थी और दूसरी लड़की, सारा सामान अटैची में सहेज कर अपनी कार की पिछली सीट पर डाला था और उसे लेकर अस्पताल दौड़ गई थी। इसके बाद जो मेरे घर की तथा फोन की घंटी घनघनाना शुरू हुई थी और लोगों का, अपने घरों से मेरे घर और वहाँ से फिर अस्पताल के बीच, दौड़ारी शुरू हुई थी तो, जब तक जच्चा, बच्चा वापस घर नहीं आ गए थे तब तक उनकी दौड़ चलती ही रही थी। कोई अपने घर से हम दोनों के लिए खाना बनाकर पहुँचा रही है तो कोई नाश्ता कोई थर्मस भरभरकर चाय ला रही हैं, तो कोई बेटे बहू के लिए, टिफिन में भरकर खाना और नाश्ता अस्पताल पहुँचा रही है। उन लोगों ने, उस समय अपना घर संभालने के साथ साथ अस्पताल से लेकर, हम दोनों तक को जितनी कुशलता से संभालकर हमें निश्चित कर दिया था और इस बात का हमें जरा सा कही, आभास तक नहीं होने दिया था कि वे अपने नहीं है उसे देखकर मैं न सिर्फ गहरे तक अभिभूत था बल्कि बुरी तरह चकित भी था। भारतीय समाज में, इस तरह का बहनापा भाईचारा और पारिवारिकता, आज कहाँ कहीं देखने को मिलती है?

सब कुछ अच्छा अच्छा निपट जाने के बाद, एक दिन, दोपहर के समय मैं, अपने घर के मकानों की कतार के चारों तरफ बने रास्ते पर टहल रहा था तो, दो अगल बगल के घरों की मालकिनें, दोनों भारतीय, अपने अपने घर से बाहर निकल कर, धूप सेंकती हुई आपस में गपिया रही थीं। मुझे देखकर दोनों अपने हाथ जोड़कर मुझे प्रणाम की थी तो मैं, उनके करीब जाकर खड़ा हो गया था। दरअसल, यहाँ आकर, जो भारत मैं, अपनी आंखों के सामने गुजरते देख रहा था वह मेरे लिए था तो पुराना ही, लेकिन उसका रूप, अर्थ और मायने, एकदम नया और अनूठा था। वह इसलिए कि जो लड़कियाँ, भारत के लड़कों के साथ ब्याहकर, यहाँ उनकी बहुएँ बनकर आई हैं, वे सबकी सब युनिवर्सिटियों, टेक्निकल इन्स्टीट्यूटों तथा प्रबंधन संस्थानों से अच्छी डिग्रियाँ लेकर निकली लड़कियाँ है और जिन घरों से वे आई है उनके माँ बाप भी अच्छी ही हैसियत रखते होंगे। भारत की इस स्तर और हैसियत वाले घरों की बेटियों और बहुओं को, मैं काफी करीब से देखा था। कई में जिस तरह के ठसके मैंने देखे, इसे देखकर मुझे लगा कि जैसे उन्हें कोई सुर्खाब के पर लगे हुए हों और पृथ्वी की दुनियादारी से उनका कोई मतलब ही न हो। माडर्न और अपड़ेट दिखने और दिखाने, के नशे में कोई कोई इतना चूर हुई रहती है और दूसरों के सामने ऐसी शेखी बघारती है जैसे समूची दुनिया उनकी जूतियों तले हो। चाय बनाना? ना बाबा ना, यह अपने बस की बात ही नहीं है, मुझे तो यह तक पता नहीं है कि चाय में चीनी डाली जाती है कि नमक। ओ गाड... तुम रोटियाँ सेंकती हो? सेंकोगी ही, क्यों कि तुम बहिन जी जो ठहरी, मेरे घर के माली, वो, वो, घसीटे जैसा कोई नाम है न तेरे बाप का और तेरी माँ का नाम, मेरी नौकरानी रमपियारिया जैसा कुछ है न? किसी ने अगर उनके सामने, चूल्हे चौके या दुनियादारी निभाने की बात कर दिया तो उस समय, उनका बिगड़ा मुंह देखने लायक होता है। लेकिन यहाँ, जितनों को मैंने देखा सब, की सब, को आला दर्जे की माँ, पत्नी और कुशल गृहस्थिन देखा। आखिर ए लड़कियाँ भी तो उन्हीं के बीच से आई हुई है और यहाँ आने के पहले ऐसा भी नहीं है कि उनके माँ बापों ने, उन्हें, किसी अच्छे स्कूल में, दुनियादारी की, अलग से तालीम देकर भेजा हो। फिर दोनों में इतना बड़ा अंतर कैसे है? यह सवाल मुझे भीतर ही भीतर परेशान किए हुए था। हमारे घर के बगल की दोनों पड़ोसिनों ने, जब मुझे देखकर, अपने हाथ जोड़, मुझे प्रणाम किया था तो यह सोचकर कि, अपने प्रश्न का उत्तर जानने का मेरे लिए यह एक अच्छा मौका है क्यों न मैं इन दोनों से ही जो पूछपछोर करना है, उसे करके, अपने भीतर की अकुलाहट शांत कर लूँ। इसलिए मैं उनके थोड़ा और करीब जाकर रूक गया था। ऐसा है बेटे कि मेरे भीतर का एक प्रश्न, मुझे काफी दिनों से परेशान कर रखा है, उसे मैं तुम दोनों से पूछना चाहता हूं यदि तुम्हारी इजाजत हो तो..........।

पूछिए अंकल जी बड़ी खुशी से पूछिए अगर हम जानते होंगे तो उसका जवाब जरूर देंगे!
ऐसा है कि, तुम लोग, जो भारत से यहाँ ब्याह कर आई हो सबकी, सब अच्छी पढ़ी लिखी और अच्छे घरों से भी हो। तुम लोगों की जब शादियाँ हुई होगी तो तुममें से कोई अभी पढ़ ही रही होगी और कोई, अपनी पढ़ाई खत्म की होगी। दूसरी तमाम लड़कियों की तरह, तुम भी दुनियादारी के मामले में एकदम कच्ची, अनगढ़ और अनाड़ी ही रही होगी बावजूद इसके तुम लोग, सबकी सब, इतनी अच्छी माँ, पत्नी और कुशल गृहस्थिन होने के साथ साथ, तरह तरह के पकवान तथा व्यंजन बनाने में इतनी सिद्धहस्त और माहिर कैसे हो?

मेरा प्रश्न सुनकर दोनों में से एक लड़की, बड़े जोर से ठठ्ठाकर हँसी थी और थोड़ा सोचने के बाद, उसने मुझे जो जवाब दिया था उसे सुनकर मेरा मन गदगद हो उठा था।

ऐसा है अंकल जी कि अच्छी माँ, पत्नी और कुशल गृहस्थिन होना तो हम लड़कियों की सहजवृत्ति है। अलावे इसके, हमारी मांए और घर परिवार, हमारे पैदा लेने के साथ ही, सुगढ़ गृहिणी के सारे गुण, हमें हमारी घुट्टी में पिलाना शुरू कर देती है ऐसे में, हम दुनियादारी के मामले में अनगढ और अनाड़ी कैसे रह सकते हैं? रही हमारी पाक कला में सिद्धहस्त और माहिर होने की बात तो उसे हम करते करते सीख जाते हैं और जो हमें नहीं आता उसे हम दूसरों से पछकर सीख लिया करती है।

डलास में वैसे तो छोटे बड़े कई मंदिर है लेकिन जहाँ हमारा घर था वहाँ से साठ सत्तर किलोमीटर की दूरी पर, काफी लंबी चौड़ी जगह में एक बड़ा विशाल और भव्य मंदिर बना हुआ है। वह मंदिर यहाँ के लोगों ने अपनों के बीच, चंदे इकट्ठा करके बनवाया है। उस मंदिर का निर्माण, दक्षिण भारत के मंदिरों की तर्ज पर किया गया है। कहते हैं कि इस मंदिर को बनाने के लिए, दक्षिण भारत के शिल्पी और कारीगर, यहाँ आए हुए थे। मुख्य मंदिर के भीतर, बालाजी से लेकर, ब्रम्हा, महेश, दुर्गा, काली, हनुमान तथा दूसरे तमाम देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की हुई है। मंदिर से थोड़ा हटकर, एक बड़ा कान्फ्रेंस हाल बना हुआ है। समय समय पर भारत से बड़े बड़े संत और महात्मा यहाँ पधारते रहते हैं और जब वे पधारते हैं तो इसी मंदिर के प्रांगण में बने आवासों में उन्हें ठहराया जाता है और यहाँ के बड़े कान्फ्रेंस हाल में उनका सत्संग और प्रवचन होता है। भारत के सभी प्रमुख त्योहारों का भी यहाँ आयोजन किया जाता है, जिसमें यहाँ का भारतीय समुदाय बड़ी, तादाद में इकट्ठा होता है और सब मिलकर उसे विधिवत मनाते हैं।

जिंदगी चाहे देशों की हो, लोगों की या जीव जगत, की सबका संचालन और नियंत्रण प्रकृति करती है। उसी की यह सत्ता है और वही इसका बादशाह है। अपनी समूची सत्ता के कुशल संचालन और उस पर मजबूत नियंत्रण के लिए, भय को उसने, वज्रदंड की तरह अपनाया हुआ है। एक को, दूसरे का भोजन बनाकर, हर किसी के पीछे, उसके खाने वाले को दौड़ा रखा है झपट्टा मारो, नहीं मार सकते हो, तो फरेब करके खाओ अन्यथा भूख तुम्हें खा जाएगी। भागो, नहीं भाग सकते हो तो छल, कपट और पाखंड करके, अपनी जान बचा लो, नहीं तो तुम्हारे पीछे पड़ा तुम्हारा काल, तुम्हें खा जाएगा। यह खा लिए जाने की डर, जिस तरह सबके पीछे पड़कर, सबको भीषण रूप से आतंकित और असुरक्षित करके रखता है यही प्रकृति का, अपने साम्राज्य को संचालित और नियंत्रित रखने का, कारगर हथियार है। चूंकि आदमी भी, प्रकृति के साम्राज्य का ही एक जीव है इसलिए दूसरों द्वारा खा लिए जाने का भय और अपने जिंदा रहने के लिए दूसरों को खा लेने की भूख, उसमें भी वैसी ही है जैसा कि प्रकृति के जीव जगत के दूसरे सभी जीवों में है। लेकिन आदमी और दूसरे जीवों में एक बड़ा फर्क है और वह फर्क यह है कि, आदमी दूसरों से ज्यादा चतुर और समझदार है। साथ ही उसमें, अपनी चतुराई और समझदारी के बेहतर इस्तेमाल का हुनर भी है। अपने इसी हुनर के चलते, आज वह न सिर्फ, आदमी बना हुआ है, बल्कि प्रकृति के बाद, पृथ्वी का दूसरा सबसे बड़ा खिलाड़ी भी बन बैठा है, और उसी की तरह सबल, सक्षम और समर्थ भी। समझदारी की अपनी इसी खासियत के चलते, उसने भूख को, उसकी समग्रता में समझा है और अपनी चतुराई से वह उसे, पालकर अपना टहलुआ बना लिया है। उसने समझा है कि भूख, जो सभी, उत्पातों और उपद्रवों की जड़ है वह उसके पेट से शुरू होकर दिमाग और दिल से भी गहरे उसके, जीवन के मूल तक अपने पाँव पसारे बैठी हुई है और उसे खा जाने के लिए किसी भूधराकार कार राक्षस की तरह, दहाड़ती चिंघाड़ती उसके पीछे लगी रहती है, साथ ही उसने यह बात भी अच्छी तरह समझ लिया कि भूख इतनी प्रचंड और शक्तिशाली है कि उससे लड़कर इसे परास्त नहीं किया जा सकता। इसलिए उसने उसे, पालतू बनाना शुरू कर दिया। सबसे पहले उसने तन और पेट की भूख को, पालतू बनाने का विज्ञान विकसित किया और उसे अपने काबू में करके एक बड़ा और शक्तिशाली मोर्चा फतह कर लिया। फिर मन की भूख और वहाँ से चलकर जीवन के मूल पर कुंडली मारकर बैठी भूख तक को समझकर, उसे भी पालतू बनाने का विज्ञान विकसित किया। लेकिन उसने अपनी समझदारी से देह, मन और जीवन के मूल में लदी बैठी भूख को समझकर, अपनी चतुराई के बल पर, उस पर काबू रखने के विज्ञान के विकास से, अपने मनुष्य होने के जिस भी मुकाम पर पहुँच लिया हो, लेकिन अपने भीतर के जानवर के, हिंसा तथा झूठ फरेब का जाल रचकर, अपने शिकार को पटखनी देकर या फॉसकर उसे मारकर खा जाने की अपनी वृत्ति पर काबू नहीं कर सका। इसलिए, आज भी भीतर से, वह जानवर का जानवर ही है, ठीक उसी की तरह हिस्त्र, कुनबापरस्त, कबाइली तथा वैसा ही, आतंकित तथा असुरक्षा से ग्रस्त। ऐसा नहीं है कि वह अपने भीतर की इस भूख को समझा ही नहीं, समझा उसने और अच्छी तरह से समझा और इसे समझने के बाद, इसे भी पालतू बनाने के लिए उसने, दूसरों के द्वारा खुद को खा लिए जाने के डर और आतंक से मुक्ति के लिए, उसने, अपने को दूसरों का तथा दूसरों को अपना पोषक बनाने के लिए परस्पर के सहयोग और भाई, चारे, के माध्यम से सबको भय और आतंक से मुक्त करने का बड़ा कारगर, हथियार, विकसित कर लिया। लेकिन चूंकि यह हथियार उसका खुद का निर्मित था इसलिए वह, पूरी तरह खालिस और शुद्ध होने की बजाए, भीतर से लेकर बाहर तक, इसके रेशे रेशे में, बनतूपना और दोगलापन समाया हुआ था, जिसके चलते, उसका यह निर्माण पूरी तरह बनावटी और धोखे की टट्टी बनकर रह गया। परिणाम इसका यह हुआ, कि इससे लोगों में परस्पर विश्वास बढ़ने की बजाए, उन्हें, एक दूसरे के प्रति ज्यादा शंकालु और चौकन्ना रहने पर मजबूर कर दिया। इसीलिए आज जिंदगियाँ, चाहे आदमी की हो या देशों की, पृथ्वी के दूसरे जीव जगत की तरह ही, सब एक दूसरे से डरे सहमे रहते हैं और अपने भीतर के इसी डर और आतंक के चलते, एक दूसरे को पटक पछाड़कर परास्त कर देने के काम में जुटे रहते हैं। और इस तरह समूची पृथ्वी पर, हर समय, घोषित और अघोषित युद्ध छिड़ा रहता है। ऐसा युद्ध, जिसके लड़े जाने का न तो कोई निश्चित मैदान तय होता है और न ही उसके लिए पहले से निर्धारित, कोई कायदा कानून ही बना है। चूँकि युद्ध जीतना ही सबका उद्देश्य होता है इसलिए अपने प्रतिद्वंदी को घेरकर, अपने शिकंजे में ले लेने के लिए, सब अपनी अपनी बिसातें बिछा कर अपनी अपनी गोटें और चालें चलते रहते हैं, और किसी के थोड़ा सा कमजोर या गाफिल पड़ते ही, उस पर टूट पड़ते हैं। जहाँ तक इस संग्राम में जीत का सवाल है तो इसके लिए जरूरी नहीं है कि प्रतिद्वंद्वियों में, अपने देह से जो सबसे ज्यादा मजबूत होगा वही जीतेगा। यहाँ जीत उसकी होती है जो अपनी शरीर से चट्टानी होने के साथ साथ, अपने दिल और दिमाग से भी जीवट वाला होता है जो अपने प्रतिद्वंदी की कमजोर नसों को अच्छी तरह पहचानता है और उसे दाबकर उससे छड़ी बुलवा लेता है। चकमा देकर, उसे हक्का बक्का कर देने की कला में माहिर होता है और उसकी मजबूतियों को भेदकर उसे घुटने टेकवा देने में सक्षम होता है, वही इस युद्ध में विजयी होता है और इस सब में प्रवीण और समर्थ वही हो सकता है जो धनबल जनबल और शस्त्रबल के साथ ज्ञान और विज्ञान में प्रबल रूप से संपन्न होता है।
अमरीका आज इसलिए अतिविशिष्ट और अद्वितीय नहीं है कि आर्थिक रूप में वह, अति सम्पन्न देश है कि उसके पास तरह तरह के नायाब और मारक हथियार है तथा अपने ज्ञान और विज्ञान से वह अंतरिक्ष से लेकर समुद्र की गहराईयाँ तक नाप लेने में समर्थ है। कि उसमें इतनी जीवटता है कि दुर्दांत और दुर्गम तक पहुँच लेने तथा अलंघ्य को लांघ लेने का उसमें अदम्य साहस है, कि प्रवाह को मनचाहे ढंग से मोड़कर अपनी इच्छानुकूल प्रवाहित कर लेने की उसमें प्रबल क्षमता है। इन तमाम क्षमताओं और धनसंपदा से सम्पन्न वह आज पृथ्वी का अकेला देश नहीं है बल्कि उस जैसी सम्पन्नता और क्षमता के और भी कई देश इसी पृथ्वी पर मौजूद है। फिर ऐसा खास क्या है, अमरीका में जिसके चलते वह आज दुनिया का अतिविशिष्ट और अद्वितीय का दर्जा प्राप्त देश है? इस प्रश्न पर बारीकी से गौर करने पर जो बात मेरी समझ में आई वह यह इन तमाम विशेषताओं और क्षमताओं के साथ साथ अमरीका में मुझे जो सबसे अलग और खास देखने को मिला था, वह था प्रकृति का अपने साम्राज्य के संचालन और नियंत्रण के लिए, मर्यादितों के प्रति विनम्रता तथा सहयोग तथा अमर्यादितों के प्रति पूरी तरह क्रूर और निष्ठुर हो उठने का उसका जो विधान है ठीक उसी से मेल खाता उनका समूचा सिस्टम और विधान। ऐसा सिस्टम, जिसमें न तो किसी लफ्फाज और खुरपंची को लफ्फाजी और खुरपंच करने की जरा सी भी छूट है न ही किसी फरेबी को फरेब करने की थोड़ी सी भी जगह दी हुई है। कुनबा परस्तों और कबाइलियों के लिए जिसमें सांस तक लेने तक की गुंजाइश नहीं है तथा लोगों की कमजोरियाँ और नकारात्मकताओं को भुनाकर, अपना उल्लू सीधा करने में माहिर लोगों को जहाँ थोड़ी सी भी मोहलत न हो, इतना निष्पक्ष और निष्ठुर सिस्टम कि यदि अमरीका का राष्ट्रपति भी कतार में खड़ा हो, तो उसे भी अपना नंबर अपने पर ही और वह भी जूते उतारने के बाद ही, आगे कदम बढ़ने की इजाजत दी जाती हों और यदि उसने भी किसी सिस्टम के उल्लंघन की गुस्ताखी कर दिया और वहाँ तैनात अदना सा कर्मी, उसकी बांह पकड़ लिया तो, दूसरों की तरह ही उसे भी, उसके सामने नतमस्तक हो जाना है और वह सब भोगने के बाद ही उसकी मुक्ति है जो वहाँ के विधान में लिखा हुआ है। दूसरी बड़ी खासियत जो मुझे इस महान देश में देखने को मिली थी वह था यहाँ के लोगों का आत्मविश्वास! इतना प्रचंड आत्मविश्वास कि दुश्मन से दुश्मन देश का ही कोई क्यों न हो, अमरीका की धरती पर पाँव रख दिया तो वह अपना है। फिर न तो वह यहूदी है और न ही ईसाई, या हिंदू या मुस्लिम। न वह रूसी है और न ही चीनी वह है तो सिर्फ और सिर्फ अमरीकी। और जिस देश के लोगों के भीतर इतना आत्मविश्वास भरा हो कि उन्हें हर चेहरा, जिस भी रूप या रंग का हो, सबके सब अपने आत्मीय के चेहरे सरीखे दिखें, तो वह महान धरती और उस धरती के महान बाशिंदे, अनुपम और अद्वितीय के अलावे, दूसरे कुछ हो ही नहीं सकते।
(समाप्त)
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संपर्क:

सोमेश शेखर चन्द्र
से.नि. यूको बैंक अधिकारी,
द्वारा - आर. ए. मिश्र,
2284/4 शास्त्रीनगर,
सुलतानपुर उ.प्र. 228001

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