मंगलवार, 6 मई 2008

महेन्द्र भटनागर का काव्य संग्रह : अनुभूत क्षण

काव्य संग्रह

अनुभूत क्षण

- डॉ. महेंद्र भटनागर



(1) प्रेय
आस्था - दीप / जलता रहे
सपना एक / पलता रहे
आत्म-साधन के लिए इतना बहुत है !

जीवन - चक्र / चलता रहे
यम का पाश / छलता रहे
प्राण - धारण के लिए इतना बहुत है !
......-......
(2) भाग्य-विरुद्ध

प्रतिपल जब हिलते हैं
रचना-धर्मी हाथ,
चरणों का मिलता है
जब गति-धर्मी साथ,

तब बनती है तसवीर !
तब बनती है तक़दीर !
......-......
(3) संघर्ष

घुटन, बेहद घुटन है !
होंठ.... / हाथ.... / पैर
निष्क्रिय बद्ध
जन - जन क्षुब्ध.... / क्रुद्ध !

प्राण - हर
आतंक - ही - आतंक
है परिव्याप्त
दिशाओं में / हवाओं में !

इस असह वातावरण को
बदलना
ज़रूरी है !
इंसानियत को
बचाने के लिए
हर आदमी का अब सँभलना
ज़रूरी है !

जलन, बेहद जलन है,
तपन, बेहद तपन है !

हर क्षितिज
गहरे धुएँ से है घिरा
आग....
शोले उगलती आग,
लहराती
आकाश छूतीं अग्नि लपटें !
इनको बुझाना
ज़रूरी है !
......-......
(4) अनुभव-सिद्ध

तय है कि
काली रात गुज़रेगी,
भयावह रात गुज़रेगी !
असफल रहेगा
हर घात का आघात,
पराजित रात गुज़रेगी !

यक़ीनन हम
मुक्त होंगे
त्रासदायी स्याह घेरे से,
रू-ब-रू होंगे
स्वर्णिम सबेरे से,
अरुणिम सबेरे से !

तय है
अंधेरे पर
उजाले की विजय
तय है !

पक्षी चहचहाएंगे,
मानव प्रभाती गान गाएंगे !

उतरेंगी
गगन से सूर्य-किरणें
नृत्य की लय पर,
धवल मुसकान भर - भर !

तय है कि
संघातक कठिन दु:सह अंधेरी
रात गुज़रेगी !

कुचक्रों से घिरा आकाश
बिफरेगा,
आहत ज़िन्दगी इंसान की
सँवरेगी !
......-......
(5) सावधान

अंधेरा है, अंधेरा है,
बेहद अंधेरा है !
घुप अंधेरे ने
सारी सृष्टि को
अपने जाल में / जंजाल में
धर दबोचा है,
घेरा है !

नहीं; लेकिन
तनिक भयभीत होना है,
हार कर मन में
पल एक निष्क्रिय बन
न सोना है !
तय है
कुछ क्षणों में
रोशनी की जीत होना है !

आओ
रोशनी के गीत गाएँ !
सघन काली अमावस है
पर्व दीपों का मनाएँ !

तम घटेगा
तम छँटेगा
तम हटेगा !
......-......
(6) इच्छित

घूमा बहुत हूँ
घन अंधेरे में,
भटका बहुत हूँ
मन-अंधेरे में !

लिए
तम-राख लथपथ तन,
अविराम घूमा हूँ,
दिन - रात घूमा हूँ !

अब तो
रोशनी की धार में
जम कर नहाऊंगा,
सत्य के
आलोक-झरने में उतर
शेष जीवन-भर नहाऊंगा !

रोशनी में डूब कर
रोशनी में तैर कर
तन बहाऊंगा
मन बहाऊंगा
जी - भर नहाऊंगा !
......-......
(7) अदम्य

दूर-दूर तक
छाया सघन कुहर
कुहरे को भेद
डगर पर बढ़ते हैं हम !

चट्टानों ने जब-जब
पथ अवरुद्ध किये
चट्टानों को तोड़
नयी राहें गढ़ते हैं हम !

ठंडी तेज़ हवाओं के
वर्तुल झोंके आते हैं
तीव्र चक्रवातों के सम्मुख
सीना ताने
पग-पग अड़ते हैं हम !
सागर-तट पर टकराता
भीषण ज्वारों का पर्वत
उमड़ी लहरों पर चढ़
पूरी ताक़त से लड़ते हैं हम !

दरियाओं की बाढ़ें
तोड़ किनारे बहती हैं
जल भँवरों / आवेगों को
थाम;
सुरक्षा-यान चलाते हैं हम !

काली अंधी रात क़यामत की
धरती पर घिरती है जब-जब
आकाशों को जगमग करते
आशाओं के / विश्वासों के,
सूर्य उगाते हैं हम !
मणि-दीप जलाते हैं हम !

ज्वालामुखियों ने जब-जब
उगली आग भयावह
फैले लावे पर
घर अपना
बेख़ौफ़ बनाते हैं हम !

भूकम्पों ने जब-जब
नगरों गाँवों को नष्ट किया
पत्थर के ढेरों पर
बस्तियाँ नयी
हर बार बसाते हैं हम !

परमाणु-बमों / उद्जन-शस्त्रों की
मारों से
आहत भू-भागों पर
देखो कैसे
जीवन का परचम फहराते हैं हम !
चारों ओर
नयी अंकुराई हरियाली
लहराते हैं हम !

कैसे तोड़ोगे इनके सिर ?
कैसे फोड़ोगे इनके सिर ?

दुर्दम हैं,
इनमें अद्भुत ख़म है !

काल-पटल पर अंकित है
'जीवन-अपराजित है !'
......-......
(8) सार्थकता

आओ
दीवारों के घेरों
परकोटों से
बाहर निकलें !
अपने सुख-चिन्तन से
ऊपर उठ कर
जग-क्रन्दन को
स्वर-सरगम में बदलें !

मुरझाये रोते चेहरों को
मुसकानें बाँटें,
उनके जीवन-पथ पर
छितराया कुहरा छाँटें !
रँग दें
घनघोर अंधेरे को
जगमग तीव्र उजालों से,

त्रासों और अभावों की
निर्मम मारों से,
हारों को, लाचारों को
ढक दें
लद-लद पीले-लाल गुलाबों की
जयमालों से !

घर-घर जाकर
सहमे-सहमे बच्चों को
प्यारी-प्यारी मोहक किलकारी दें,

कँकरीली और कँटीली परती पर
रंग-बिरंगी लहराती फुलवारी दें !
......-......
(9) जीवन

हर आगत पल का
स्वागत है !

मेरे हाथ पकड़
उठता है दिन,
मेरे कंधों पर चढ़
बढ़ता है दिन !

मेरे मन से
अभिनव रचना
करता है दिन,
मेरे तन से
सृष्टि नयी
गढ़ता है दिन !

लड़ मेरे बल पर
जीता है दिन,
क्षण-क्षण मेरे जीने पर
जीता है दिन !

मेरी गति से
सार्थक होता काल अमर,
मैं ही हूँ
अविजित अविराम समर,

मेरे सम्मुख हर
पर्वत-बाधा नत है,
हर आगामी कल का
स्वागत है !
......-......
(10) प्रतिक्रिया

अणु-विस्फोट से
जाग्रत महात्मा बुद्ध की बोली

सुनिश्चित शान्ति हो,
सर्वत्र
सद्गति-सतग्रह की कान्ति हो !
सुरक्षित
सभ्यता, संस्कृति, मनुजता हो,
दुनिया से लुप्त दनुजता हो !

मानव-लोक
हिंसा-क्रूरता से मुक्त हो,
परस्पर प्रेम-ममता युक्त हो !
मना पाये नहीं
पशु-बल कहीं भी अब
मरण-त्योहार !

सार्थक तभी
यह ज्ञान का, विज्ञान का
उत्कृष्ट आविष्कार !
अनुपम और अद्भुत
मानवी उपहार !
......-......
(11) शुभकामनाएँ

रक्त-रंजित
इस शती का वर्ष अंतिम
शक्ति-पूजा का
तपस्या-साधना का वर्ष हो !

आगत शती में
जय मनुजता की दनुजता पर
सुनिश्चित हो,
प्रत्येक मुख पर
सिद्धि की उपलब्धि का
अंकित
सरल-सुन्दर हर्ष हो !

मानव-हृदय से
दुष्टता, पशुता, निठुरता दूर हो,
हिंसा-दर्प सारा चूर हो;
दृष्टि में ममता भरी भरपूर हो !

हर व्यक्ति दूषित वृत्तियाँ त्यागे,
परस्पर प्रेम हो
सद्भावना जागे !
हर व्यक्ति को हो प्राप्त
नव-बुद्धत्व
मानस-तीर्थ।
आत्मा का सतत उत्कर्ष हो !
शुभ-कामनाओं से भरा नव वर्ष हो !
......-......
(12) यथार्थ / आदर्श

जीवन और जगत जैसा हमको प्रत्यक्ष दिखा,
वैसा, हाँ केवल वैसा, हमने निष्पक्ष लिखा !

मानव-समता का स्वप्न, हमारा आदर्श सदा,
जिसको धारण कर, जन-जन जीवन-उत्कर्ष सधा !

प्रतिश्रुत हैं हम, शोषण-रहित समाज बनाएंगे,
प्रतिबद्ध कि हम जगती पर ही स्वर्ग बसाएंगे !

इतिहास बनाने की अभिनव दृष्टि हमारी है,
उत्कृष्ट समुन्नत नव जीवन-सृष्टि प्रसारी है !
(13) साहस

माना, निरीह है आदमी किसी
अनहोनी के प्रति,
चाहे कितना समर्थ हो कोई
पर, जीतती नियति !
क्षण में ढह जाती मानव-निर्मिति
बलवान है प्रकृति,

है लेकिन स्वीकार हर चुनौती
हो जो भी परिणति,

नहीं रुकेगी, मानव ज्ञान और
विज्ञान की प्रगति !
......-......
(14) कारगिल-प्रयाण पर

सीमाओं की रक्षा करने वाले वीर जवानो !
दुश्मन के शिविरों पर चढ़ कर भारी प्रलय मचा दो,
मातृभूमि पर बर्बर हत्यारों की बिखरें लाशें
तोपों के गर्जन-तर्जन से दुश्मन को दहला दो !
......-......
(15) हमारा गौरव

भारत का चट्टानी सीना है
कारगिल !
टकराएँ चाहे कितने ही
अणु-बम
इसका पाया लेकिन
कभी न सकता हिल !

छल और कपट से
लुक-छिप कर घुस आये
दुश्मन को धकियानेवाला
पर्वतराज कारगिल !
नहीं कभी यह हुआ / न होगा
गाफ़िल !
बर्बर धोखेबाज़ों की
लाशों का ढेर लगाने वाला
काल - कारगिल !
अब तो भैया
इसका नाम सिर्फ़
दुश्मन का दहलाता दिल !

सीमा का प्रहरी सैनिक है यह
कार - कारगिल !
भारत-माता का स्वस्तिक है यह
कार - कारगिल !
......-......
(16) निष्फल

प्रमाणित यह कि
जिसके पास
है अधिकार; है धन
शक्तिशाली
वह।

शक्तिशाली ने
स्वार्थ-साधन में,
वासनाओं की अहर्निश पूर्ति में
दुर्बल-वर्ग को
लूटा - खसोटा,
जिस तरह चाहा
समय भोगा !

हर जगह निर्मित
वैभव-द्वीप उसके,
फैला हुआ है
चक्रवर्ती राज्य उसका,
उसी का गूँजता सर्वत्र
जय-जयकार !

दुष्कर दीखता बनना
शोषण-मुक्त, समता-युक्त
अभिनव विश्व का आकार।
शक्तिशाली
क्यों नहीं बनता
महा मानव,
न्याय-धर्मी लोकप्रिय
अवतार !
......-......
(17) दीप

अवशेष स्वयं को कर
दहता जो
जीवन - भर !

दूर-दूर तक
राहों का
हरता अंधियारा,
अन्तर - ज्वाला से
घर - घर
भरता उजियारा :

उसके सर्वोत्तम सक्षम
प्रतिनिधि हम,
तम-हर ज्योतिर्गम !
(18) संकल्पित

प्रज्ज्वलित-प्रकाशित
दीप हैं हम !
सिर उठाये,
जगमगाती रोशनी के
दीप हैं हम !
वेगवाही अग्नि-लहरों से
लहकते चिन्ह-धर,
ध्रुव-दीप हैं हम !

शांत प्रतिश्रुत
दृढ़ प्रतिज्ञाबद्ध
छायी घन-अंधेरी शक्ति का
पीड़न-भरा
साम्राज्य हरने के लिए,
सर्वत्र
नव आलोक-लहरों से
उफ़नता ज्वार
भरने के लिए !

हमारा दीप्त
द्युति-अस्तित्व
करता लोक को आश्वस्त,
जन-समुदाय की प्रत्येक आशंका
विनष्ट-निरस्त !
भर उठता
सहज हर्षानुभूति से
हर दबा भय-त्रस्त !
होता एक क्षण में
रुद्ध मार्ग प्रशस्त !
प्रतिबद्ध हैं हम
व्यक्ति के मन में
उगी-उपजी
निराशा का, हताशा का
कठिन संहार करने के लिए !
हर हत हृदय में
प्राणप्रद उत्साह का
संचार करने के लिए !
......-......



(19) अभिलषित

दिन भर
धरती पर लेटी पसरी
रेशम जैसी
चिकनी-चिकनी दूब से,
ऑंगन में उतरी
खुली-खुली
फैली बिखरी
हेमा-हेमा धूप से,
यह अलबेला
एकाकी
जम कर खेला !
दिन भर खेला !

दिन भर
ताजे टटके गदराए
फूलों की छाँह में,
हरिआए - हरिआए
शूलों की बाँह में,
उनकी मादक-मादक गंधों में
अटका-भटका;
ऊला-भूला !
शर्मीली-शर्मीली भोली
कलियों की,
लम्बी-लम्बी पतली-पतली
फलियों की,
डालों-डालों झूला !
लिपट-लिपट कर
टहनी-टहनी पत्ती-पत्ती झूला !
दिन भर झूला !

दिन भर
सुन्दर रंगों छापों वाली साड़ी पहने
उड़ती मुग्धा तितली पर,
वासन्ती रंग-रँगी
मदमाती प्रेम-प्रगल्भा
प्रौढ़ा सरसों पर,
जी भर राँचा,
संग-संग खेतों-खेतों नाचा !
दिन भर नाचा !

दिन भर
इमली के / अमरूदों के पेड़ों पर
चोरी-चोरी डोला,
झरबेरी के कानों में
जा-जा,
चुपके-चुपके
जाने क्या-क्या बोला !
दिन भर डोला !
......-......
(20) बसंती हवा

तन को
छूती गुज़री
जो मतवाली युवा हवा
इतनी अच्छी
पहले कभी
न, सचमुच, मुझे लगी !

मन को
ठंडक पहुँचाती गुज़री
जो मदहोश हवा
ऐसी मोहक
पहले कभी
न, सचमुच, मुझे लगी !

बिलकुल अपनी सगी-सगी,
बेहद.... बेहद प्यार पगी,
ठगने आयी थी; स्वयं ठगी !

लिपट-लिपट कर
बाहों - बाहों झूली,
सिहर-सिहर कर
झूमी,
सुधबुध भूली !

वस्त्रों से खेली,
केशों से खेली,
अंग - अंग से खेली !
ईश्वर जाने !
अल्हड़पन में
कितनी मदगंधा ले ली !
......-......
(21) कुहराच्छादित-नभ

पड़ा हुआ है कम्बल ओढ़े
पसरा-पसरा जागा अम्बर !

दिन चढ़ आया कितना; फिर भी
हिलने का लेता नाम नहीं,
केवल सोना - सोना; इसका,
किंचित भी कोई काम नहीं,
ठंड अधिक का किये बहाना
पक्का बना हुआ घन-चक्कर !
गर्म दुपहरी आने पर अब
लगता, सचमुच, कुछ हिला-डुला,
दूर क्षितिज की सीमाओं पर
दिखता कम्बल भी खुला-खुला,
तनिक क्षणों में, बाँधेगा लो
सारा अपना बोरा-बिस्तर !
......-......
(22) शीतार्द्र

उतरी धीमे-धीमे
फिर-फिर ओस रात-भर !

हिम-शीतल सन्नाटा
छाया सुप्त धरा पर,
फूलों - पत्तों नाची
प्रीति-पुतरिका बनकर,
कारीगर कुहरे ने
किया सृजन कनात-घर !

यहाँ-वहाँ जगह-जगह
बिखरे जल-कण हीरे,
घात लगाये फिरते
पवन झकोरे धीरे,
पहरेदार सरीखा
जागा, हर प्रपात, झर !

ख़ूब जमी है महफ़िल
अध्यक्ष बनी रजनी,
प्रिय को कस कर बाँधे
जागी-सोयी सजनी,
किसी दिशा में दबका
बैठा, नव प्रभात, डर !
......-......
(23) हेमन्त

भीगी-भीगी भारी रात,
नींद न आती सारी रात !

घोर अंधेरा चारों ओर
दूर अभी तो लोहित भोर
थमा हुआ है सारा शोर
ऐसे मौसम में चुप क्यों हो,
कहो न कोई मन की बात !

कुहरा बरस रहा चुपचाप
अतिशय उतरा नभ का ताप
व्योम-धरा का मौन मिलाप
ऐसे लमहों में पास रहो,
थर-थर काँपेगा हिम गात !

नीरवता का मात्रा प्रसार
तरुदल हिलते खेतों पार
जब-तब बज उठते हैं द्वार
खोल गवाक्ष न झाँको बाहर,
मादक पवन लगाये घात !
......-......
(24) निष्कर्ष

ज़िन्दगी में प्यार से सुन्दर
कहीं
कुभी भी नहीं !
कुछ भी नहीं !

जन्म यदि वरदान है तो
इसलिए ही, इसलिए !
मोह से मोहक सुगंधित
प्राण हैं तो इसलिए !

ज़िन्दगी में प्यार से सुखकर
कहीं
कुछ भी नहीं !
कुछ भी नहीं !

प्यार है तो ज़िन्दगी महका
हुआ इक फूल है !
अन्यथा; हर क्षण, हृदय में
तीव्र चुभता शूल है !

ज़िन्दगी में प्यार से दुष्कर
कहीं
कुछ भी नहीं !
कुछ भी नहीं !
......-......

(25) तुम....
जब - जब
मुसकुराती हो
बहुत भाती हो !
तुम
हर बात पर क्यों
मुसकुराती हो !

जब - जब
सामने जा स्वच्छ दर्पण के
सुमुखि !
शृंगार करती हो,
धनुषाकार भौंहों - मध्य
केशों से अनावृत भाल पर
नव चाँद की
बिन्दी लगाती हो,
स्वयं में भूल
फूली ना समाती हो
बहुत भाती हो !

नगर से दूर जा कर
फिर
नदी की धार में
मोहक किसी की याद में
दीपक बहाती हो
बहुत भाती हो !
मुग्धा लाजवंती तुम
बहुत भाती हो !
जब बार - बार
मधुर स्वरों से
मर्म-भेदी
चिर-सनातन प्यार का
मधु - गीत गाती हो
पूजा - गीत गाती हो
बहुत भाती हो !
......-......
(26) प्रतीक

अर्ध्द-खिले फूलों का
सह-बंधन
तुम
मेरे कमरे में रख
जाने कब
चली गयीं !
जैसे
चमकाता किरणें
कई-कई
अन-अनुभूत अछूते
भावों का दर्पण
तुम
मेरे कमरे में रख
जाने कब,

अपने हाथों
छली गयीं !

जीवन का अर्थ
अरे
सहसा बदल गया,
गहरे-गहरे गिरता
जैसे कोई सँभल गया
भर राग उमंगें
नयी-नयी !
भर तीव्र तरंगें
नयी-नयी !
......-......
(27) तुम...

गौरैया हो
मेरे ऑंगन की
उड़ जाओगी !

आज
मधुर कलरव से
गूँज रहा घर,
बरस रहा
दिशि - दिशि
प्यार - भरा
रस - गागर,
डर है
जाने कब
जा दूर बिछुड़ जाओगी !

जब - तक
रहना है साथ
रहे हाथों में हाथ,
सुख - दुख के
साथी बन कर
जी लें दिन दो - चार,
परस्पर भर - भर प्यार,
मेरे जीवन - पथ की पगडंडी हो
जाने कब और कहाँ
मुड़ जाओगी !
......-......
(28) सुख-बोध

बड़ी प्रतीक्षा के बाद खिले हैं
गमले में फूल,
पीले - पीले पुलकित फूल
झबरीले गेंदे के
टटके फूल !

बड़ी प्रतीक्षा के बाद खिले हैं
जीवन में फूल,
कोमल - कोमल गद गद् फूल,
मादन - मन भावों के
मादक फूल !
बड़े दिनों के बाद
मिले हैं
सावन - भादों के उपहार,
बड़े दिनों के बाद
सजे हैं
दरवाज़ों पर बंदनवार !
......-......
(29) उपकृत

इन फूलों ने
मेरे घर - ऑंगन में
ख़ुशबू भर दी है,
एकाकी बोझिल
जीवन की
सारी तनहाई
हर ली है !
इन फूलों को
खिलने दो,
डालों पर
हिलने दो !

मेरे जर्जर तन से
ऊसर मन से
भावाकुल
मिलने दो !

इन फूलों ने
जग के ऑंगन को
महकाया है,
रंग - बिरंगी आभा से
लहकाया है !

इन फूलों को
खिलने दो,
डालों के झूलों पर
हिलने दो !

दुनिया-भर के लोगों से
हँस-हँस मिलने दो,
लिपट-लिपट कर
मिलने दो !

इन फूलों ने
भयंकर धरती
मनहर कर दी है,
हाँ, हाँ.....
नाना प्रेम-प्रसंगों से
भर दी है !

इन फूलों को
पर्वत - पर्वत
खिलने दो,
मरुथल - मरुथल
खिलने दो,
जंगल - जंगल
खिलने दो,
बस्ती - बस्ती
खिलने दो,
घर - घर
दर - दर
खिलने दो !
......-......



(30) उत्सव

फूलो !
रंग - बिरंगे फूलो !

गमले - गमले फूलो
क्यारी - क्यारी फूलो
आनन्द - मगन हो फूलो !

फूलो !
रंग - बिरंगे फूलो !
डालों - डालों झूलो
भर - भर पेंगें झूलो
मंद हवा में झूलो !

फूलो !
रंग - बिरंगे फूलो !
नव कलियों को छू लो
पत्ती - पत्ती छू लो
हारित चुनरी छू लो !
......-......
(31) असंगत

निर्जन जंगल में
खिलते-झरते फूलों का,
शूलों की शय्या पर
मूक विकल घायल फूलों का
हार्दिक स्वागत !

रंग - बिरंगे रस - वर्र्षी
रक्तिम फूलों का
उल्लास - भरा / उत्साह - भरा
मन - भावन स्वागत !

ऊबड़ - खाबड़
बाधक
कंटकमय पथ पर
राहत देते फूलों का
अन्तरतम से हार्दिक स्वागत !

लेकिन; केवल
पग - पग चुभते शूलों का अनुभव,
दूर - दूर तक बजता
खड़खड़ कर्कश उनका रव
करता तन आहत,
मन आहत !
हे स्रष्टा !
एकांगी जीवन की रचना से
बचना !
......-......
(32) एकाकी

भव्य भवनों से भरे
रौशनी में तैरते
सौन्दर्य के प्रतिबिम्ब
इस नगर में
कौन है परिचित तुम्हारा ?
कौन परिचित है ?

जिससे सहज बोलें
मिलें जब-तब.....
हृदय के भेद खोलें !
जिसे समझें
आत्मीय.....विश्वसनीय !
नि:संकोच जिसको
लिखें प्रिय-पत्रा,
या दूरवाणी से करें सम्पर्क,

जिसके द्वार पर जा
दें अधिकार से दस्तक
पुकारें नाम !

ऐसा कौन है
परिचित तुम्हारा ?
अजनबी हैं सब,
अपरिचित हैं,
इतने बड़े-फैले नगर में !
कोई-कहीं
आता नहीं अपना
नज़र में !
......-......
(33) अकेला

अब तो, अरे
कोई याद तक करता नहीं,
आता नहीं !

मृत्यु के आगोश में
ज़िन्दगी खामोश है
अब तो, अरे
कोई गीत
मन रचता नहीं,
गाता नहीं !
वाद्य चुप हैं
कोई स्वर
न बजता है / उभरता है !

जो थे
बीच पथ में खो गये,
जो हैं
थके - हारे / ऊब - मारे
सो गये !
किसको बुलाएँ,
किसको जगाएँ ?
दुनिया अपरिचित हो गयी,
हम बिराने हो गये !

किसके पास जाएँ,
किसे अपना बनाएँ ?
लीन हैं सब
स्वयं में,
अपने हर्ष में
ग़म में !
नहीं कोई रहा अब संग,
ज़िन्दगी बेरंग !
......-......
(34) पटाक्षेप

हो गयी शाम !

कोई नहीं आयगा,
भूल जाओ
सभी नाम !
हो गयी शाम !

मत करो रोशनी
अंधेरा भला है,
देख लूँ स्वप्न
हर बार जिसने
छला है !
विवश मूक मन में
पला है !

नहीं शेष
कोई काम !
हो गयी शाम !
सो लूँ
सरे-शाम,
अविराम!
आयाम.....
आयाम!
......-......
(35) विस्मय

कौन छीन ले गया हँसी फूलों की ?
कौन दे गया अरे, फ़सल शूलों की ?
कौन आह! फिर-फिर कलपाता, निर्दय
याद दिला कर, चिर-विस्मृत भूलों की ?
......-......
(36) मर्माहत

मुँह कड़वा है
घूँटें कैसे भरें ?

जीना लाचारी है
मन बेहद भारी है !
छद्म हँसी से
स्वागत कैसे करें ?

उजड़ा सूखा उपवन
नीरस नीरव जीवन
फूल कहाँ अब ?
पीले पत्ते झरें !
......-......
(37) खंडित मन

विश्वास
टूटता है जब
हिल उठती है धरती
अन्तर की,
अन्दर-ही-अन्दर
अपार रक्त-ज्वार बहता है !

लेकिन
व्यक्ति मौन रह
कुटिल - नियति के
संहारक प्रहार सहता है,
मूक अर्द्ध-मृत
अंगारों की शैया पर
पल-पल दहता है !

चीत्कारों और कराहों की
पृष्ठभूमि पर
मर - मर जीता है,
अट्ठहास भर - भर
काल-कूट पीता है !

विश्वास टूटता है जब,
साथ छूटता है जब !
......-......

(38) संन्यास - चेतना

अपनों का
कुटिल विश्वासघाती खेल
जब झेल लेता है
सरल विश्वास-धर्मी आदमी,
तब.....
एकांत में
रोता-तड़पता है,
दुर्भाग्य पर
रह-रह कलपता है !

किन्तु;
हत्या नहीं करता,
आत्म-हंता भी नहीं बनता;
अकेला
मानसिक नरकाग्नि में
खामोश जलता है,
स्वयं को दे असंगत सांत्वना
फिर-फिर भुलावे में भटकता है,
यों ही स्वयं को
बारम्बार छलता है !

उसे बुज़दिल नहीं समझो
जानता है वह
कुछ हासिल नहीं होगा
किसी को कोसने से।
भागना क्या
भोगने से !
......-......


(39) संबंध

विश्वास का जब दुर्ग
ढहता है
आदमी लाचार हो
गहनतम वेदना....
मूक सहता है !

तैयार होता है
निरर्थक ज़िन्दगी
जीने के लिए,
प्रति-दिन
कड़वी घूँट पीने के लिए !

जीवन-शेष दहता है !
विश्वास का जब दुर्ग
ढहता है !

या फिर
आत्म-हंता बन
शून्य में ख़मोश बहता है !
विसर्जित कर अस्तित्व
चुपचाप कहता है

किसी का भी
अरे, विश्वास मत तोड़ो,
विश्वास बंधन है,
विश्वास जीवन है !
......-......



(40) सहवर्ती

वेदना-धर्मी तरंगों !
और कितना
और कब-तक
गुदगुदाओगी मुझे ?

कितना और
कब-तक और
बेसाख्ता
हँसाओगी मुझे ?

भुज-बन्ध में भर
और कितनी देर तक
और कितनी दूर तक
अनुरक्त सहयोगी
बनाओगी मुझे ?

ओ वेदना-धर्मी तरंगों !
क्रूर
आहत-चेतना-कर्मी तरंगों !
......-......
(41) वेदना

जीवन
निष्फल जाता
सह लेता,
जब-तब
शोकाकुल स्वर से
कविता कह लेता !
लेकिन
रिसते घावों का
पीड़क अनुभव सहना,
जीवन-भर
तीव्र दहकती भट्ठी में
पल-पल दहना
संहारक है
निर्मम हत्या-कारक है !

यह तो
सारा सागर गँदला है,
जाने
कितने-कितने जन्मों का
बदला है !
......-......
(42) अंतिम अनुरोध

निर्धन
बेहद निर्धन हूँ,
जाते-जाते
मुझको भी
जीने को
कुछ दे दो !

जो सचमुच
मेरा अपना हो
सुखदायी
मीठा सपना हो !

प्यासा
बेहद प्यासा हूँ,
जाते-जाते
मुझको भी
पीने को
कुछ दे दो !

निर्मल गंगा-जल हो,
झरता मधु-स्रव कल हो !

यों तो
अंतिम क्षण तक
तपना ही तपना है,
यात्रा-पथ पर
छाया तिमिर घना है !

एकाकी
जीवन अभिशप्त बना,
हँसना-रोना सख्त मना !
......-......
(43) सलाह

बहुत थके हो तन
हारे अशक्त मन
सो लो !

गुज़री ज़िन्दगी
अजब दुशवार में,
तेज़ चक्रवातों बीच
गूँजते हाहाकार में !

दुखी व्यथित मन,
गहन चोट खाये तन !
खो
याददाश्त,
तनिक स्वस्थ
हो लो !
बहुत थके हो
सो लो !
......-......
(44) दम्भ

मुझे :
छत दी / सुरक्षा दी
प्रतिष्ठा दी
एक प्यारा नाम
रिश्ते का दिया
क्या इसलिए
यह कथन चरितार्थ हो
'नफ़रत करो :
पाप-कारक कर्म से ;
पाप-चारी से नहीं ?'

पाप क्या है ?
पुण्य क्या है ?
सत्य क्या है ?
......-......
(45) अभिप्रेत-वंचित

जब
वांछित / काम्य / अभीप्सित
नहीं मिला,
जीने का क्या अर्थ रहा ?

कोसों फैले
लह-लह लहराते उपवन में
जब
हृदय-समायी : मन भायी
गंध-भरा
पुलकित पाटल नहीं खिला ;
जीवन-भर का तप व्यर्थ रहा !
जीने का क्या अर्थ रहा !

जब अन्तर-तम में
हर क्षण, हर पल
केवल मर्मान्तक त्रास सहा !

माना
बहुमूल्य अनेकों उपहार मिले
हीरों के हार मिले,
अनगिनत सफलताओं पर
असंख्य कंठों से
नभ-भेदी जय-जयकार मिले,
सर्वोच्च शिखर सम्मान मिले,
पग-पग पर वरदान मिले !

किन्तु;
नहीं पाया मन-चाहा
लगता है :
दुर्लभ जीवन निष्कर्म गया,
जैसे भंग हुई
लगभग साधित-कठिन तपस्या !

दहका दाह अभावों का,
हर सपना भस्म हुआ !
निर्धन, निष्फल, भिक्षु अकिंचन
जैसे नहीं किसी की लगी दुआ !
......-......


(46) अप्रभावित

वर्षों
जी लिया जीवन अकेले,
शेष भी
चुपचाप जी लेंगे !

विष-जल पी लिया
दिन.... रात
बेबस,
मृत्यु की उत्सुक प्रतीक्षा में !
भविष्य विनाश वीक्षा में !

विषज हर द्रव्य
हँस कर
शेष जीवन-हेतु
अपने-आप पी लेंगे !

मत करो चिन्ता -
निवासी विष-निलय का मैं,
महा शिवतीर्थ हूँ
अपने समय का मैं !
......-......
(47) आत्म-निरीक्षण

जीवन भर
कुछ भी
अच्छा नहीं किया !
ऐसे तो
जी लेते हैं सब,
कुछ भी लोकोत्तर
जीवन नहीं जिया !
अपने में ही
रहा रमा,
हे सृष्टा !
करना सदय क्षमा !
......-......
(48) वास्तविकता

सँभलते - सँभलते...
समय तीव्र गति से गुज़रता गया !
सब व्यवस्थित बिखरता गया !
हस्तगत था अरे जो
अचानक फिसलता गया ....
हर क़दम पर
सँभलते-सँभलते !

हर तार टूटा
सँवरते-सँवरते
कि फिरफ़िर उलझता गया !
बंध हर और कसता गया ;
सूत्र क्रमश: सुलझते-सुलझते
उलझता गया,
हर क़दम पर
सँवरते-सँवरते !

ज़िन्दगी कट गयी ज़िन्दगी
सीखते-सीखते,
खो गये कंठ-स्वर
चीखते-चीखते,
शास्त्र संगीत का
सीखते-सीखते !
......-......

(49) विराम - पूर्व : 1

स्मृतियाँ फ़ूल हैं !
रंग-बिरंगे
खिलखिलाते फूल हैं !

स्मृतियाँ
जागती हैं जब
लगता है कि मानों
सज गये हर द्वार बंदनवार
चारों ओर !
जीवन महकता है
सुगन्धों से,
जीवन छलकता है
मधुर मादन रसों से,
जीवन जगमगाता है
चटक नवजात रंगों से !
आदमी
ऐसे क्षणों में डूब जाता
स्वप्न के मधु लोक में
सुध-बुध भूल !

दीखता सर्वत्र
अनुकूल-ही-अनुकूल,
जैसे डालियों पर
झूलते हों फूल !

झूमते हों
प्रिय अनुभूतियों के फूल !
......-......


(50) विराम - पूर्व : 2

स्मृतियाँशूल हैं !
धँसते नुकीले शूल हैं !

स्मृतियाँ
जागती हैं जब
लगता है कि मानों
उड़ रही है धूल चारों ओर,
जीवन दहकता
कष्टकर नरकाग्नि में,
जीवन लड़खड़ाता चीखता
सुनसान में,
भर हत हृदय में हूल !
आदमी
ऐसे क्षणों में टूट गिरता
तिमिरमय घन गुहा में
हिल उखड़ आमूल !
दीखता सर्वत्र
प्रतिकूल-ही-प्रतिकूल,
भेदते अन्त:करण को
तीव्र चुभते शूल !
अनइच्छित
दुखद अनुभूतियों कें शूल ।
......-......
(51) बोध

अद्भुत
कश-म-कश में
दिन.... हफ्ते... महीने....वर्ष
गुज़रते जा रहे,
विस्मय !
नहीं वश में
अरे, कुछ भी नहीं वश में,
'विवशता'
अर्थ :
जीवन तो नहीं ?

एक दिन
यों ही अचानक
हो जाएगा लय
सब !
कहीं क्या दीखती है
विभाजक-रेख ?
फिर क्या कहा जाए
सार्थक / व्यर्थ ?

अस्तित्व
लुप्त होने के लिए,
जन्म-जागृति
सुप्त होने के लिए,
फिर,
यह कश-म-कश किसलिए ?

गुज़रने दो
रात दिन / दिन रात
पल-क्षण,
काल-क्रम अविरत,
विषम-सम !
......-......




(52) सच है

ज़िन्दगी शुरू हुई
कि अन्त आ गया !
अभी-अभी हुई सुबह
कि अंधकार छा गया !

आसमान में
सतत बिखर-बिखर
किरण-किरण
विलीन हो गयी
कि दूर-दूर तक
प्रखर प्रकाश की
अजस्र धार खो गयी ?

यहाँ-वहाँ सभी जगह
अपार शोर था,
व्योम के हरेक छोर तक
लाल-लाल भोर था,
राग था,
गीत था,
प्यार था,
मीत था,
विलुप्त सब !

रुको ज़रा
प्रकाश आयगा,
प्रकाश का प्रवाह आयगा !
नया विहान छायगा !
......-......


(53) स्वागत : 21वीं शती का

आगामी सौ वर्षों में
वि-ज्ञान सूर्य की
अभिनव किरणों से
आलोकित हो
मानव-मन !

अंधे विश्वासों से
अंधी आस्था से
ऊपर उठ कर,
मिथ्या जड़ आदिम
तथाकथित धर्मों की
कट्टरता से
हो कर मुक्त
नयी मानवता का
सच्चा पूजक हो
जन-जन !

एक अभीप्सित
व्यापक विश्व-धर्म में
दीक्षित हो
पूर्ण लोक,
फेंके उतार
गतानुगत खोखले विचारों का
सड़ा-गला निर्मोक !
क्षयी विगलित
कुष्ठ-कोष आवरण कवच,
जिससे दीखे केवल
सच...सच !

आगामी सौ वर्षों में
स्थापित हो साम्राज्य
दया ममता करुणा का,
फैले
अभिमंत्रित संस्कृत शीतल
जल वरुणा का

वीभत्स घृणा-दर्शन
हिंसा से,
आहत मानव मन पर
तन पर !

वसुधा
आप्लावित हो
उन्नत भावों सद्भावों से,
आच्छादित हो
मर्यादित न्यायोचित प्रस्तावों से !
हो लुप्त जगत से
बर्बरता
क्रूर दनुजता
ध्वंसक वैर विकलता,
सब
देव सहिष्णु बनें,
पालनकर्ता विष्णु बनें !
......-......
(54) अभिनन्दित - क्षण

शुभ-संकल्पों की
फहराती
कल्याण-पताका
सौभाग्य-पताका,
आयी पृथ्वी पर
नयी शती
इक्कीसवीं शती !

उड़ती
अति-सुन्दर
स्वर्ग-वधू-सम
श्वेताम्बर लहराती,
नवयुग-मंडप में
स्थापित करती
शान्ति-कलश सुख,
स्वस्ति मुख ।
आयी पृथ्वी पर
नयी शती
इक्कीसवीं शती !

मानव के
चिर-इच्छित सपनों को
धरती पर
करने साकार,
देने
उसकी सर्वोत्तम रचना को
दृढ़ आधार,
उतरी
जन-मानस पर
नयी शती
इक्कीसवीं शती !
स्वागत !
श्रम-रत
हम
करते हार्दिक स्वागत !
......-......


(55) विजयोल्लास

हमने चाहा
जी लें जब-तक आये
नयी शती !
हमने चाहा
धड़कन बंद न हो
जब-तक आये
हँसती-गाती
नयी शती !
पूरी होती
इस इच्छा पर
कौतूहल है,
मानव-आस्था में
सच;
कितना बल है !
अद्भुत बल है !
हमने चाहा
जी लें जब-तक आये
नयी शती !
आख़िर आ ही गयी
थिरकती नयी शती ।
सचमुच
आ ही गयी
ठुमकती नयी शती !
मृत्यु पराजित
जीवन जीत गया !
सफल तपस्या,
पहनूंगा अब
सुविधा से परिधान नया !
......-......

संपर्क:
संपर्क:
डा. महेंद्र भटनागर
११० बलवंतनगर, गांधी रोड,
ग्वालियर - ४७४ ००२ (म. प्र.)
फोन : ०७५१-४०९२९०८
ई-मेल :
drmahendrabh@rediffmail.com

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