बुधवार, 7 मई 2008

शेर सिंह की कविता - मेरे पहाड़



मेरे पहाड़

- शेर सिंह

काफी लंबे अंतराल के पश्चात
मैं तुम से
मिलने आया था
मेरे पहाड़ ।

पर, जब
तुम्हारे पास आया
तो लगा नहीं कि
तुम वही हो
जिस से मिलने
नजर भर देखने को
मैं अपने मन में
तड़प लिए
तरसता था ।

है तो
तुम्हारी काया
उसी शुचित माटी से ढंकी हुई
और पहने हुए हो मुकुट
देवदार- चीड़ के
छितरा चुके पेड़ों का
जल भी
पहले सा ही
बेशक शीतल है
लेकिन बदल गया है कुछ
तो, वह है हवा
और, हवा का रूख ।

सौंदर्यीकरण, प्रगति और
आधुनिकरण के रथ पर सवार
पर्यटकों को
लुभाने के मोह में
ऊंचे, लंबे देवदार के
घने पेड़, मगर


नंगे और सूखते
उखड़ते ही जा रहे हैं
जड़ों से ही ।

मेरे पहाड़ !
तुम तो सचमुच
एकदम बदल गए हो
और बदलते ही जा रहे हो
बदलने की इस दौड़ में
नंग- धडंग होते जा रह हो
मुकुट विहीन, श्रीहीन
जैसे कोई ऋषि केशविहीन
जैसे कोई तपस्वी जटाविहीन ।

मेरे पहाड़ !
क्या तुम
महानगर बनने की
होड़ में हो ?

महानगर जहां साधन है
लेकिन संवेदनाएं नहीं
सुख - सुविधा, एशोआराम है
पर संतोष नहीं
भीड़ है पर दिल नहीं
रफ्तार है पर पड़ाव नहीं
कोमल भावनाएं हैं भी तो
कद्र करने वाले नहीं ।

मेरे पहाड़
क्या तुम
महानगरों से पिछड़ने के डर से
इस अंधी दौड़ में
शामिल हो चुके हो
अपनी मर्जी से
या फिर
किये गए हो
जबरन शामिल !
--------------------
परिचय
- शेर सिंह
जन्मः हिमाचल प्रदेश ।
आयु : ५२ वर्ष ।
शिक्षा : एम.ए.(हिन्दी) पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ ।
संप्रति : एक राष्ट्रीयकृत बैंक में नौकरी ।
साहित्यिक अभिरूचि : देश के विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में कहानी, लघुकथा, कविता
एवं आलेख । कई कहानी एवं काव्य संकलनों में रचनाएं शामिल ।

पुरस्कार : राष्ट्र भारती अवॉर्ड ।

अनेक वर्ष अध्यापन, अनुवादक के पदों पर कार्य करने के पश्चात लगभग २४ वर्षों से सिडिकेट बैंक में प्रबंधक (राजभाषा) । अब तक हिमाचल प्रदेश (कुल्लू ,कांगडा) चण्डीगढ, उडुपि (कर्नाटक), भुवनेश्वर, अहमदाबाद, भोपाल, लखनऊ में कार्य और जून - २००४ से हैदराबाद में पदस्थ । लगभग संपूर्ण भारत को देखने , जानने का अवसर ।

संपर्क:
४०७, बी - १, आर के टावर्स, मयूर मार्ग
बेगमपेट, हैदराबाद- ५०० ०१६.
E-Mail- shersingh52@gmail.com

4 blogger-facebook:

  1. बहुत सुंदर भाई शेर सिह जी को बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. Beautiful sentiments written in the most simple of the words...such that anyone can undersatnd an feel the attachmemnt that you have for your native land of Kullu_manali
    Cheers !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही व्याख्या की है....शेर सिंह जी आपने पहाड की यही हालत, सारे पहाड़ों की है, मैं उत्तराखण्ड से हूं और यही हालत हमारी पहाड़ों की है।

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------