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बिहार में जाति की सुविधा के बिना न तो कहीं कोई दोस्त पा सकते, न प्रेमी, न प्रशंसक और न मददगार – राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर


(नया ज्ञानोदय के मई 2008 अंक में राष्ट्रकवि स्व. श्री रामधारी सिंह दिनकर का 14 अगस्त 1953 का अपने मित्र को लिखा गया एक पत्र प्रकाशित हुआ है. पत्र में उन्होंने निजी बातों के अतिरिक्त समकालीन राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त से अपने संबंधों के बारे में भी लिखा है तथा बिहार के जातिवाद के बारे में भी छोटी सी टिप्पणी दी है. दिनकर बिहार के जातिवाद से इतने खिन्न थे कि उन्होंने बिहार को बुद्ध और महावीर की धरती मानने से इंकार कर दिया था. प्रसंगवश, हाल ही में, बिहार में जातिवादी दवाईयों पर प्रकाशित रवीश के चिट्ठे के कारण भी खूब बवाल मचा था. )

प्रस्तुत है प्रकाशित पत्र का कुछ अंश:

“…संसद में जाने से मेरी मुसीबतें बढ़ी हैं, इसका ज्ञान मुझे ही है. तब भी यह ठीक है कि आर्थिक संकटों का अनुमान मुझे पहले से ही था और ये संकट उतने ही हैं जितने कि नौकरी छोड़ने के पूर्व अनुमानतः दिखलाई पड़े थे, मगर कुछ और संकट भी हैं, जिनका कभी भी अनुमान नहीं था और वह यह कि लोग समझते हैं कि मैं मंत्री बनने को ही नौकरी छोड़कर दिल्ली आया हूं और इस प्रवाद को फैलाने में सर्वाधिक हाथ पितृवत् पूज्य, परम श्रद्धेय राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरणजी को है. वे संसद में आ गए ये उनका जन्मसिद्ध अधिकार था और मैं ग़रीब क्यों आया, इसका उन्हें क्रोध है. सच कहता हूँ, जन्मभर गुप्तजी पर श्रद्धा सच्चे मन से करता रहा हूं. हृदय को चीरकर देखता हूं तब भी यह दिखलाई नहीं पड़ता कि उनका मैंने रंचभर भी अहित किया हो. स्तुति में लेख लिखा, विद्वानों के बीच उनकी और से लड़ा, एक कांड को लेकर ब्रजशंकर जैसे निश्छल मित्र से रुष्टता मोल ली, यूनिवर्सिटी में उनकी किताबें कोर्स में लगवाता रहा, अभी-अभी एक किताब कोर्स में लगवा दी. दिल्ली में भी कम सेवा नहीं की है मगर फिर भी यह देवता कुपित है और इतना कुपित है कि छिप-छिपकर वह मुझे सभी भले आदमियों की आँख से गिरा रहा है. मेरे एक पत्रकार मित्र का यह कहना है कि प्रबन्ध काव्य लिखकर तुम गुप्तजी के मित्र नहीं रह सकते क्योंकि इससे उनके व्यापार पर धक्का आता है. अस्तु.

बेनीपुरी भी नाराज थे क्योंकि वे खेत चरना चाहते थे और मुझसे यह उम्मीद करते थे कि मैं लाठी लेकर झाड़ पर घूमता रहूं जिससे कोई खेतवाला भैंस को खेत से बाहर नहीं करे! और भी एक दो मित्र अकारण रुष्ट हैं. और यहां की विद्वानमंडली तो पहले जाति पूछती है. सबसे दूर, सबसे अलग, आजकल सिमटकर अपने घर में घुस आया हूं. बिहार नष्ट हो गया, इसका सांस्कृतिक जीवन भी अब विषाक्त है. अब तुम जाति की सुविधा के बिना यहाँ न तो कहीं कोई दोस्त पा सकते, न प्रेमी, न प्रशंसक और न मददगार. जय हो यहाँ की राजनीति की! और सुधार कौन करे? जो खड़ा होगा उस पर एक अलग क़िस्म की बौछार होगी. मेरा पक्का विश्वास है कि बुद्ध यहाँ नहीं आए थे, महावीर का जन्म यहाँ नहीं हुआ था. यह सारा इतिहास ग़लत है. साहित्य का क्षेत्र यहाँ बिलकुल गंदा हो गया है. ‘पंडित सोइ जो गाल बजावा’ भी नहीं, यहाँ का साहित्यकार अब वह है जो ‘टैक्स्ट-बुक’ लिखता है. बेनीपुरी रुपये कमाते कमाते भी थक गया, आजकल मूर्छा से पीड़ित रहता है. चारों ओर का वातावरण देखकर मैं भयभीत हो गया हूं. चारों ओर रेगिस्तान है, चारों ओर 'कैक्टस लैंड' का प्रसार है. ...”

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पत्रांश, साभार, नया ज्ञानोदय, मई 2008
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