बुधवार, 21 मई 2008

अनुज खरे की कविताएं


..... कैसे जहां में आ गए हम’

---- अनुज खरे


किलकारियां भी डराती हों
हंसी भी बिखेरती हो मायूसी,
गर्मजोशी से गायब जैसे गर्माहट,
आंसुओं पर भी होता शुबहा,
प्यार पर शक का आलम,
खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।

भावनाएं लगे डराने
रिश्ते करें परेशान,
दुख करें हंसी पैदा,
निश्छलता पर लगा हो पहरा,
करुणा का हो निर्वासन
खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।
मिले कोई अपना तो फासले ना घटें
तेरे-मेरे की दिखें दरारें,
मिलन में आए बिरह की सदां,
सहयोग पर पाबंदी का कोहरा,
नफरत ने लिया आदर का स्थान,
खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।
उम्मीदों में दिखती हो आशंका,
एहसास कराते हों कांटें पैदा,
दोस्ती में दिखे दर्द का सबब,
बात अब हों कुछ बेमतलब,
झूठ ने पैदा किए सारे भरम,
खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।

मिट्टी की गंध बिखेरती हो दुर्गंध,
सावन की झड़ी नहीं लगती पावन,
सर्दी की धूप भी नहीं देती कोमल एहसास,
तपती दोपहरी नहीं नींद की आस,
सारे मौसम करने लगे जीना हराम,
खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।

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बाड़मेर .... त्रासदी के बाद


जिजीविषा पर गर्व था जिन्हें,
अपनी संघर्ष शक्ति पर भरोसा,
रैला रेत पर मिटा गया विश्वास
ताकत की तसल्ली, जवां आस ।

फूस की झोंपड़ी, टंगा था पसीना,
कुछ गेहूँ और मेहनत का ‘हल’
अपने ही नहीं, जिनके लिए,
उगानी थी, सपनों की फसल ।

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खो गई हैं ख्वाहिशें


खामोशियां टकराती हैं
सूनी आंखों से
कहीं तो कोई तिनका आस का
नजर आए
कहीं तो किसी चेहरे पर दिखे
हमदर्दी
कहीं तो कोई सैलाब
इंकलाब का लाए
कहीं तो भिंचें मुट्ठियां,
सितम पर
कहीं तो कोई गीत
अमन का गाए
कहीं तो बेबसी के खिलाफ
जिंदा हो कौमें
कहीं तो कोई लाचारगी में
ना मारा जाए
इस वक्त में खो गई हैं
ख्वाहिशें
या खुदा ये वक्त न दूसरा
ढाला जाए ।।
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वक्त के इस दौर में....


ठुकराए गए लोग
बहिष्कृत लोग
उजाड़े गए लोग
भटके हुए लोग
अस्मिता खो चुके लोग
पहचान से जूझते लोग
फिर लौटते हैं
जड़ों की तरफ
जहां खंगालते हैं
अपना अस्तित्व
अपनी पहचान
अपना आधार
वक्त के इस दौर में
खोखली जड़ें
खुद ढूंढ रही हैं
अपनी पहचान
अब कहां मिलते हैं
कोई पुराने बरगद।।

1 blogger-facebook:

  1. बेहद अच्छी रचनायें हैं...बधाई स्वीकारें।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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