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उमेश कुमार गुप्ता का व्यंग्य : रोड इंसपेक्टर

व्यंग्य

रोड इंस्पेक्टर

- उमेश कुमार गुप्ता



रोड इंस्पेक्टर उर्फ सड़क छाप मजनूं, समाज के ऐसे चिर-परिचित जीव हैं, जिनसे सभी परिचित हैं। ये नेता, अभिनेता, गुन्डे, बदमाशों की तरह समाज के अनिवार्य तत्व हैं। इनके बिना समाज का पूर्ण निर्माण नहीं हो पाता है, क्योंकि इनके कारण ही नारी जाति से जुड़ी दहेज की तरह की समस्या , छेड़छाड़ का अस्तित्व, समाज में मौजूद रहता है जो किसी बुजुर्ग के आशीर्वाद की तरह दिन दूना रात चौगुनी दर से महंगाई की तरह बढती चली जा रही है। इससे घर की गृहणी हो , स्कूल-कालेज जाती छात्रा हो, दफ्तरों में काम करती प्रौढा हो, कोई भी नहीं बचा है। सभी को घर से बाहर निकलते ही रोड इंस्पेक्टर की छेड़छाड़ का शिकार होना पड़ता है।

रोड इंस्पेक्टर सुबह से लेकर रात तक बस एक ही काम छेड़छाड़ करते है। जिस दिन गलती से ये छेड़छाड़ नहीं कर पाते है।, उस दिन ये उपवास धारण कर लेते हैं, क्योंकि बिना छेड़छाड़ के इन्हें खाना नहीं पचता है। समाज में इन्हें तलाशने के लिए कोई विशेष चश्मा लगाने की जरूरत नहीं है। ये पॉप स्टार माइकल जैक्शन की तरह बाल बढाये, अपने शरीर की चौडाई के बराबर बैगी पेंट कम पैजामा पहने गोविंदा चाल, अमीरखान मुस्कान के साथ अलग से सड़क पर घूमते नजर आ जाते हैं ये अपनी उपस्थिति का एहसास हमें स्वयं कराते हैं जब भी किसी कन्या को देखते है। तो अपने अर्द्धनारीश्वर बालों के पीछे हाथ फेरकर अपना रोड इंस्पेक्टर होने का परिचय देना यह प्रथम फर्ज समझते है।

रोड इंस्पेक्टरों के जीवन में सड़कों के किनारे स्थित पान ठेले का उतना ही महत्व ह, जितना कि नेताओं के पहनने के लिए खादी के कुर्त्ते के पैजामा का, चारा सुर्खियों में रहने के लिए घोटाले का है। इनकी सारी जवानी पान के ठेले पर सड़क ताकते हुए कट जाती है। ये सुबह सात बजे से रात दस बजे तक एक आदर्श सिपाही की तरह पान के ठेले पर ड्यूटी देते है। जिस तरह यातायात सिपाही की नजर से कोई ट्रक बचकर निकल नहीं पाता , उसी तरह इनकी गिद्ध निगाहों से कोई लड़की बचकर नहीं जा सकती हैं जो भी लड़की इन्हें भांती है उसके पीछे ये शहद की मक्खी की तरह लग जाते हैं और एक आदर्श पारिवारिक सदस्य की तरह उसे रोज घर से कालेज व कालेज से घर छोड़कर आते है। इस बीच में जितना भी समय इन्हें रास्ते में आसपास की मोटर कारों, ट्रकों, टैम्पों से बचने के बाद मिलता है, उतना समय ये प्रेम इजहार ( छेड़छाड़ ) करने में लगाते है। ऐसा दिन में ये चार -पांच लड़कियों के साथ अवश्य करते है।

रोड इंस्पेक्टर छेड़छाड़ में एक से एक चुनिंदा शब्दों का इस्तेमाल करते हैं इनकी कल्पनाओं के आगे कवियों की कल्पनायें भी फीकी पड़ जाती है। ये लोग अंग्रेज दिखती लड़की को परी सिन्ड्रेला, मिनी स्कर्ट छाता ली ऊंची एडी वाली लड़की को महारानी विक्टोरिया , घास न डालने वाली , पत्थर का जवाब ईंट से देने वाली लड़की को महारानी लक्ष्मीबाई, सैंडिल मारने वाली को महारानी दुर्गावती , जैसे ऐतिहासिक पात्रों से पुकारते हैं, इनमें कम पढे-लिखे आवारा नवयुवक ही नहीं, एम.ए.,बी.ए, पी.एच.डी., धारक पढे-लिखे समझदार लोग भी शामिल रहते हैं। जो अक्सर छेड़छाड़ में दुष्यंत की शकुंतला, तुलसी की रत्नावली, महाभारत की पांचाली , वृदावनलाल वर्मा की मृगनयनी जैसे साहित्यक पात्रों का इस्तेमाल करते हैं। ये लोग लड़कियों के संबंध में के.जी.बे.के जासूसों की तरह घर वालों से ज्यादा जानकारी रखते हैं।

रोड इंस्पेक्टर अपने आप को भगवान कृष्ण का अनुयायी समझते है। इसलिए सड़क चलती कन्याओं को बृज की गोपिकाओं की तरह छेड़ता ये अपना प्रथम कर्त्तव्य समझते है। ये लोग अपने गुरू का उपदेश ’कर्म किये जा फल की चिंता न कर’ पर विश्वास करते है। इसलिए ये अपना कर्म करते जाते हैं और उसका फल लात-जूते खाना, समाज में बदनामी होना, सर के बालों का चौराहा बनवाना, लड़कियों द्वारा एक से एक शब्दों -बंदर , गधा, खजूर, टिंगू, कद्दू जैसे शब्दों से संबोधित होना , मार खा जाना, आदि का इन पर कोई असर नहीं पड़ता है।

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