मंगलवार, 27 मई 2008

शालिनी मुखरैया की कविता : मेरे गीले बिस्तर को माँ तुमने, अपने आंचल से सुखा दिया


कविताएं

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शालिनी मुखरैया


माँ



जग में किसने देखा ईश्वर को
आखें खोलीं तो पहले पाया तुझको
मुझको लाकर इस संसार में
”माँ” मुझ पर तुमने उपकार किया
मुझे अपने रक्त से सींचा तुमने
मुझे सांसों का उपहार दिया
मेरे इस माटी के तन को
माँ तुमने ही आकार दिया
कैसे यह करज चुकाऊं मैं
इतना तो बता दे ”राम” मेरे
पहले ”माँ ” का कर्ज चुका लूं
फिर आऊं मैं द्वारे तेरे .

मेरी हर इच्छा को तुमने
बिन बोले ही पहचान लिया
सुख की नींद मैं सो पाऊं
अपनी रातों को भुला दिया
मेरे गीले बिस्तर को माँ तुमने
अपने आंचल से सुखा दिया
गर डिगा कहीं विश्वास मेरा
मुझे हौसला तुमने दिया
मुझे हर कठिनाइयों से
टकराने का साहस तुमने दिया

मेरी छोटी बड़ी सभी नादानियों को
तुमने हंसते हंसते बिसरा दिया
मेरे लड़खड़ाते कदमों को माँ तुमने
अपनी उंगली से थाम लिया
तेरे इस बुढ़ापे में माँ तेरी
लाठी मैं बन जाऊं
मुझको सहारा दिया था कभी तूने
तेरा सहारा मैं बन जाऊं हर दम
फिर भी न अहसान चुका पाऊं
चाहे ले लूं मैं कितने जनम

इस धरती पर ”माँ ”
ईश्वर का ही रूप है
कितने बदनसीब होते हैं वे
जो ढूंढते हैं ईश्वर तुझको
मंदिर, मस्जिद गुरूद्वारों में
अपने घर में झांक तो लें
वह मिलेगा तुझे माँ की छांव में

ना जानूं मैं काबा तीरथ
ना जानूं हरिद्वारे
ना जानूं मैं काशी मथुरा
ना ही तीरथ सारे
मैं तो जानूं ”माँ” बस तुझको
सारे तीरथ बस तेरे ही द्वारे.


भंवर


रिश्तों के भंवर में खुद को घिरा पाते हैं
कैसे समझायें दिल को समझ नहीं पाते हैं
उम्र गुजर जाएगी तुम को समझने में
फिर भी न समझ पाऐंगे हम तुम को

क्या चाहा था जिंदगी म हमने
बस दो कदम तुम साथ चलो
फिर भी कभी साथ न चल पाये हम मगर
शायद खुदा को यही मंजूर था

मयस्सर नहीं था इन रिश्तों को एक दूजे का विश्वास
फिर भी लगाए रहे मिलने की आस
कहीं न कहीं एक रिश्ता तो था हम दोनों के बीच
प्यार न सही नफरत तो थी हमारे बीच

कैसे कोई समझायें कि बेवफा हम नहीं
मगर इसमें भी किसी की कोई गलती नहीं
साथ अगर चलना होता तो क्यों बिछड़ते हम
रिश्तों की इस भंवर में क्यों घिरते हम .

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अस्तित्व का प्रश्न

आस्थाओं पर नित नये प्रश्न उठते हैं
क्या फिर भी हम अपने को इंसान कहते हैं
आज बुद्धिजीवी न जाने क्यों परेशान हैं
“राम” थे या नहीं हैरान हैं .
क्या एक दिन स्वयं इंसान को
अपने अस्तित्व का देना होगा प्रमाण
क्यों हम भूल जाते हैं
कि इस जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है
मगर यह उस प्रश्न का हल नहीं है

हर चीज वक्त के साथ छोड़ जाती है अपने निशां
अब तक य ही चलता आया है वक्त का कारवां
अगर य ही आस्थाओं पर प्रश्न उठते रहे
तो क्या हमें भी देना होगा अपने अस्तित्व का प्रमाण
क्या भविष्य की पीढ़ियाँ भी करेंगी प्रश्न
“ तुम” थे या नहीं, हमें भी दो इसका प्रमाण.

यदि इस तरह हम करते रहेंगे
एक दूसरे के अस्तित्व पर सवाल
इन्सान का इन्सान पर से उठ जाएगा विश्वास
क्या संस्कार दे पाएंगे हम आने वाली पीढीयों को

जो कभी वर्तमान था, आज भूत है
आज हम वर्तमान हैं, कल हो जाएंगे भूत
सिलसिला य ही अनवरत चलता रहेगा
अगर चाहते हो कि आने वाली पीढ़ियाँ रखें हमें याद
तो बन्द करो आस्थाओं पर झूठे सवाल .
क्यों कि हम जो बोते हैं, वही काटना पड़ता है
अपना किया खुद भी भुगतना पड़ता है



संपर्क:

श्रीमती शालिनी मुखरैया
लिपिक व खजांची
पंजाब नैशनल बैंक
क्षेत्रीय कार्यालय
अलीगढ.
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१८, बैंक कालोनी
मौरिस रोड, अलीगढ .उप्र.

1 blogger-facebook:

  1. बेनामी8:18 pm

    श्रीमती शालिनी मुखरैया ji aapki rachnaye kafi prabhav saali hai aapke lekhan mai ghajab ka jaadu hai such !!
    aap isi tarag likhti rahe main aapko bahut padna chahta hoon!!
    accha ho sake to apna emain addersh mujhe de de kyon main sahitya premiyon ke samay samey par sampark karta rahta hoon!!
    vaise meri bhi rachana hai yanha par!!sanjay sen sagar ke naam se!!
    mera email id hai!!
    mr.sanjaysagar@rediffmail.com

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