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अशोक कुमार वशिष्ट का आलेख : निर्बलता

आलेख

निर्बलता

 

-अशोक कुमार वशिष्ट

 

ज्ञानी कहते हैं कि प्रभु आनंद है। वे प्रभु को परमानंद कहते हैं।हम उस परमानंद के अंश हैं। और हम भी आनंद हैं। लेकिन हम अपने आनंद को भूल गए हैं। हमने अपना आनंद खो दिया है। इसीलिए हर मानव की कोशिश होती है कि वह आनंद को प्राप्त करे। चाहे वह आनंद खाने से मिले‚ पीने से मिले‚ सोने से मिले‚ खेल कूद से मिले‚ संगीत से मिले‚ भोग से मिले या फिर योग से मिले,,,,,। बच्चे से लेकर बूढ़े तक की यही कोशिश होती है। हां‚ बुद्धि का स्तर अलग अलग होने से‚ हर मानव का आनंद प्राप्त करने का ढंग अलग अलग होता है। कोई गलत तरीके से पाता है तो कोई सही तरीके से। कोई कम पाता है तो कोई अधिक पाता है। लेकिन हर प्राणी का उद्देश्य एक ही होता है। चाहे वह किसी भी देश या धर्म का हो। चाहे वह किसी भी जाति का हो। चाहे वह कोई भी भाषा बोलने वाला हो। वह आनंद‚ आनंद और सिर्फ आनंद ही चाहता है।

जिस तरह कहीं पहुंचने के लिए‚ उस स्थान का पता जानना जरूरी होता है‚ तभी वहां पहुंचा जा सकता है। हर मंजिल तक जाने के लिए कोई रास्ता अवश्य होता है। नहीं तो मानव भटक भी सकता है। उसी तरह आनंद प्राप्ति के लिए भी सही और उचित रास्ते का पता होना जरूरी है। लेकिन ज्ञान के अभाव के कारण जीव आनंद की जगह‚ दु:खों के पीछे भागने लगता है। वह दु:ख को आनंद समझ लेता है और अपने जीवन को उसी में गर्क कर देता है। जब उसे इसका अहसास होता है कि उसका रास्ता गलत है और वह बहुत दूर आ चुका है तो वह बहुत पछताता है। वह वहां से निकलने‚ भागने का भरसक प्रयास करता है। लेकिन उस समय उसके पास विवशता और आंसुओं के सिवा कुछ नहीं होता। तड़पने और कष्ट सहने के सिवा कुछ नहीं होता। अपनी हार और पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं होता। जब उसे यह ज्ञात होता है कि अब उसके पास जीवन नहीं बचा। आयु नहीं बची। और न ही शक्ति और हिम्मत बची है। उस समय उसकी क्या हालत होती है‚ ये तो बस वही जानता है। उस समय वह स्वयं को प्रभु के प्रति समर्पित कर देता है और प्रभु से प्रार्थना करता है कि‚ हे प्रभु मुझे शक्ति दे‚ हिम्मत दे और बुद्धि दे‚ ताकि मैं सही रास्ते पर चल सकूं और आनंद को पा सकूं‚ तुझे पा सकूं। प्रार्थनाओं में चाहे लाख असर हो‚ लेकिन इस सॄष्टि का एक नियम है। जीवन का एक नियम है। और उस नियम का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। उस नियम के अनुसार‚ हर जीव की एक आयु होती है। और अपनी आयु से अधिक कोई भी जी नहीं सकता। हर जीव को अपनी अपनी आयु के अनुसार‚ इस संसार को विदा कहना ही पड,ता है। अपने जीवन को और अपने शरीर को छोड़ना ही पड़ता है।

भारतीय समाज में गुरू को भगवान के दूत का दरजा दिया गया है। ऐसा मानव जो है तो संसार में‚ लेकिन जिसकी पहुंच भगवान के लोक तक की है। जिसके ज्ञान चक्षु पूर्ण रूप से खुल चुके हैं। जो सॄष्टि के हर रहस्य को जान चुका है। इसीलिए वह ज्ञान देता है। मानव समाज को दिशा देता है। सही रास्ता बताता है। सही और गलत की खबर देता है। पर कितना खेद और दुर्भाग्य है कि हम गुरू को सुनते तो हैं। पूजते भी हैं। लेकिन अपनी निर्बलता के कारण‚ उसकी आज्ञाओं का और शिक्षाओं का पालन नहीं करते। और अक्सर वही रास्ता चुनते हैं‚ जिस पर चलने के लिए गुरू मना करते हैं। हममें इतनी शक्ति‚ इतनी हिम्मत‚ इतनी बुद्धि और इतना नियंत्रण नहीं होता कि हम सही रास्ते पर चल सकें। आनंद को पा सकें और प्रभु को पा सकें। जीवन के आनंद को सही और ठीक ढंग से पा सकें। अपनी आयु का उचित उपयोग कर सकें। लेकिन अपनी निर्बलता के कारण हम हार जाते हैं। हम न तो प्रभुके नियमों का पालन कर पाते हैं और न ही स्वयं पर नियंत्रण रख पाते हैं। परिणाम स्वरूप हम दु:खों को और विनाश को गले लगा लेते हैं। यूं ही जीवन पर जीवन बीतते चले जाते हैं। हम जन्म पर जन्म लेते जाते हैं। आखिर दु:ख और विनाश ही हमारा भूत‚ वर्तमान और भविष्य बन जाते हैं।

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