शुक्रवार, 30 मई 2008

साक़िब अहमद की कविताएं

यादें

saquib 29 (WinCE)

-साक़िब अहमद

 

तुम्हारी कुछ यादें,

दिल में आती जाती हैं.

बातें, तुम्हारी प्यारी प्यारी बातें,

यादें बन कर दिल को तड़पाती हैं.

तुम्हारी आखों की वो शरारत,

तुम्हारी प्यारी सी मुस्कुराहट,

मुझसे मिल कर तुम्हारा वो मचलना,

आंखों आंखों वक्त गुजरना,

मुझको हर पल की याद आती है.

यादें बन दिल को तड़पाती हैं.

हमने साथ गुजारे थे जो पल,

खायी थी प्यार भरी जो कसमें,

थाम कर हाथ, हाथ में हमने,

किये थे साथ निभाने के जो वादे,

उन कसमों वादों की याद आती है.

यादें बन दिल को तड़पाती हैं.

क्यूं तुम मुझसे दूर चली गयी,

क्यूं मुझको तन्हा छोड़ चली गयी.

......

‘बेजान फूल’

जब आखिरी बार,

मैंने देखा था तुम्हें.

तुम कितनी मासूम लग रही थी.

तुम्हारा संदली चेहरा,

जैसे हरसिंगार का फूल,

जो, सूरज की पहली किरण पड़ते ही,

साख से जुदा हो कर,

जमीन पर आ गिरा हो.

खामोश, बेजान फूल.

..........

मगर

तन्हा मुझको छोड़ कर,

तुम चली तो गई,

मगर, तुम भी मेरी ही तरह,

तड़पती होगी.

एक मजबूरी, एक बेचैनी,

साथ तुम्हारे भी तो होगी.

पास मेरे हर पल,

साया बन रहती तुम होगी.

मेरी तन्हाई, मेरी खामोशी,

तुझसे कुछ कहती तो होगी.

.....

गम

जाऊं कहा मैं,

गम से घबरा कर.

यह गम तो,

सौंपी हुई तुम्हारी,

विरासत है मुझको.

हजार कोशिशें कर भी लूं लेकिन,

दिल है मेरा कि,

बहलता नहीं है.

मेरी जिंदगी तो,

सिर्फ तुम्हारे लिए ही थी.

तुम ही थी मेरी मसीहा.

तन्हा मुझे छोड़ कर,

तुम चली तो गयी मगर,

अभी तक ढूंढ़ती हैं तुम्हें मेरी निगाहें,

अभी तक तुम्हारी,

सिर्फ तुम्हारी जरूरत है मुझको.

-------------.

 

संपर्क-

साक़िब अहमद

सी@1447@5, इंदिरा नगर, लखनऊ.

ई मेल - saquibdilse@gmail.com

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