शनिवार, 31 मई 2008

आकांक्षा यादव की कविताएं

कविताएं

-आकांक्षा यादव

akansha yadav

श्मशान

कंक्रीटों के जंगल में

गूँज उठते हैं सायरन

शुरू हो जाता है

बुल्डोजरों का ताण्डव

खाकी वर्दियों के बीच

दहशतजदा लोग

निहारते हैं याचक मुद्रा में

और दुहायी देते हैं

जीवन भर की कमाई का

बच्चों के भविष्य का

पर नहीं सुनता कोई उनकी

ठीक वैसे ही

जैसे श्मशान में

चैनलों पर लाइव कवरेज होता है

लोगों की गृहस्थियों के

श्मशान में बदलने का।

--------.

सिमटता आदमी

सिमट रहा है आदमी

हर रोज अपने में

भूल जाता है भावनाओं की कद्र

हर नयी सुविधा और तकनीक

घर में सजाने के चक्कर में

देखता है दुनिया को

टी० वी० चैनल की निगाहों से

महसूस करता है फूलों की खुशबू

कागजी फूलों में

पर नहीं देखता

पास-पडोस का समाज

कैद कर दिया है

बेटे को भी

चहरदीवारियों में

भागने लगा है समाज से

चौंक उठता है

कॉलबेल की हर आवाज पर

मानो

खड़ी हो गयी हो

कोई अवांछित वस्तु

दरवाजे पर आकर।

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रचनाकारा परिचय:

जीवन-परिचय

नाम-            आकांक्षा यादव

जन्म -                   ३० जुलाई १९८२, सैदपुर, गाजीपुर (उ० प्र०)

शिक्षा-                 एम० ए० (संस्कृत)

विधा-            कविता और लेख

                 
प्रकाशन-          देष की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। वेब-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। विभिन्न काव्य संकलनों में कविताओं का प्रकाशन।

                   
सम्पादन-         ‘‘क्रान्ति यज्ञ : १८५७-१९४७ की गाथा‘‘ पुस्तक में सम्पादन सहयोग।
सम्मान-           विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा साहित्य गौरव, साहित्य श्री, साहित्य रत्न से सम्मानित।
     राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘ एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा
     ’’वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान’’ से अलंकृत।
अभिरूचियाँ-    रचनात्मक अध्ययन व लेखन।नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक समस्याओं सम्बन्धी विषय में विशेष रूचि

सम्प्रति-         प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज, नरवल, कानपुर (उ०प्र०)-२०९४०१

                          
सम्पर्क-             आकांक्षा यादव, पत्नी-श्री कृश्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिश्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर

 

kk_akanksha@yahoo.com

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