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अन्जू - अनुज नरवाल का भाषा सम्प्रेषण पर आलेख

भाषा सम्प्रेषण का एक लोकप्रिय माध्यम है। भाषा का प्रयोग लिखकर या बोलकर किया जाता है। रोजमर्रा के जीवन में ज्यादातर हम अपने विचारों का आदान-प्रदान बोलकर ही करते हैं। क्या कभी विचार किया है कि हमने बोलना कैसे सीखा ?

भाषा के बिना बोलना असंगत-सा प्रतीत होता है। प्रारम्भ से ही मनोवैज्ञानिकों की रूचि भाषा के विकास एवं कार्यों के अध्ययन में रही है। इनमें से कुछ मनोविज्ञानविदों ने अपने सिद्धान्तों के आधारों पर यह
बताने की कोशिश की है कि हम बोलना कैसे सीखते हैं? मनोवैज्ञानिकों का मत है कि भाषा का विकास शरीर से मात्रा एक अंग से नहीं बल्कि रसना (जीभ), दन्त,तालू और नाक के विकास पर निर्भर करता है। हम जब बाल्यावस्था में होते है तो हम अपने आप अपने वातावरण में उपलब्ध उद्दीपकों या बड़ों का अनुकरण कर के बोलना सीखते हैं। उद्दीपकों-अनुक्रिया के बीच साहचर्य हो जाने से भी हम बोलना सीखते हैं । उदाहरणार्थ किसी बच्चे को ‘सेब‘ दिखाकर बार-बार ‘सेब‘ शब्द का उच्चारण करेंगे तो बच्चे के मस्तिष्क में ‘सेब‘ की छवि अंकित हो जाती है और बच्चा ‘सेब‘ के अर्थ को समझने लगता है।

बोलना हमारे प्रारम्भिक विकास, अधिगम सिस्टम के परिवर्तनों और परिपक्वता पर भी निर्भर करता है। भाषा का सीखना, स्नायुविक संरचना के कार्यों पर निर्भर करता है। हमारे मस्तिष्क के दो भाग होते हैं। भाषा का सम्बन्ध मस्तिष्क के बाएं भाग से होता है। यदि बचपन में दो-तीन साल की उम्र में बायां भाग यानी हेमिस्फेयर श्रतिग्रस्त हो जाता है तो निश्चय ही भाषा विकास पिछड़ जाता है। बचपन में १२-१८ माह की अवधि में स्पीच मैकेनिजम (Speech Mechanism)और मस्तिष्क का साहचर्य क्षेत्र इतना परिपक्व हो जाता है कि बोलना सीखा जा सके बशर्ते अभ्यास के लिए पर्याप्त अवसर और उपयुक्त वातावरण भी उपलब्ध होना चाहिए।

संरक्षकों द्वारा बालकों को बोलने के लिए प्रेरित किया जाता है। उदाहरणार्थ यदि कुछ संरक्षक बालक को बोलने के बजाय उसके रोने पर ही या संकेत करने पर ही उसके मनमाफिक चीज उपलब्ध करा देते हैं, ऐसे में बालक बोलने के लिए प्रेरितन होकर बोलने की कोशिश करना बन्द कर देता है । आगे जाकर जो सम्प्रेषण बाधाओं का रूप धारण कर लेता है। कुछ माँ-बाप बच्चे को निर्देशन देने का पर्याप्त ज्ञान नहीं रखते तथा कुछ इस मुआमले में आलसी होते हैं जो कि निर्देश देना नहीं चाहते। ऐसे में उन बच्चों भाषा विकास सम्मुच्य ढंग से नहीं हो पाता। ऐसी परिस्थिति में माँ-बाप को चाहिए को बच्चे के सामने उचित निर्देशन के लिए मॉडल शब्द प्रयुक्त करें और इन शब्दों को शुद्ध रूप में बोलने के लिए बालकों को प्रेरित करें ताकि बच्चा उन्हें ग्रहण कर सके। मॉडल जितने ही अच्छे होते हैं बालकों का विकास उतना ही जल्दी और उन्नत होता है और बालक बड़ा होकर सही सम्प्रेषण करने में परिपक्व हो पाता है।
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नोट- इस लेख के लेखक एवम लेखिका-डॉ० अनुज नरवाल रोहतकी और डॉ०अन्जू नरवाल रोहतकी हैं।

हमारा पता....... डॉ० अन्जू व डॉ० अनुज नरवाल रोहतकी
४५४/३३ नया पडाव,काठ मण्डी, रोहतक-हरियाणा
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