गुरुवार, 29 मई 2008

अनुज खरे का व्यंग्य : ये अपुन का बजट है मामू...

budget cartoon

बजट : ए टेलीफिल्म

ये अपुन का बजट है मामू

-- अनुज खरे

 

समयावधि : अनंतकाल तक कभी भी देख लें।

वैधानिक चेतावनी : ढेर सारे सास-बहूनुमा सीरियलों से अघाए धैर्यशील प्राणियों के लिए बिल्कुल नया रियलटी शो पेश है। पात्रों का चयन देश-काल की सीमा से परे जाकर किया गया है। पात्रों की वर्तमान देश के निवासियों से संरचनात्मक एकरूपता दुर्योगमात्र है।

सूत्रधार-संदेश (अर्थात् ब्रीफ में चल क्या रहा है की जानकारी) : बजट पेश किए जाने की बेला है। कब के मुक्त को प्राप्त हो चुके एक पुरातनकालीन महानुभाव धरा पर गमन कर रहे हैं। दिल्ली में विचरण करते हुए उनकी मुलाकात मुंबइया किस्म के एक मनुष्य से हो जाती है। बजट उर्फ वित्तीय खरीते पर उनकी निश्छल जिज्ञासाएं और टपोरी बीडू (नाम अपनी सुविधा से आप चाहे टीटी उर्फ टपोरी टाइप रख लें) के सहज भाईनुमासमाधानों के टकराने का प्रसंग संसद के नेपथ्य में तैयार है। संवाद प्रारंभ होने को आतुर है।

अतैव, रिमोट छोडें दृश्य पर ध्यान दें।

अहा! कैसा शुभ प्रसंग है। मनुष्य मात्र की चिंताओं के निवारणार्थ एक ज्ञानी कितना बुद्धि-वाणी श्रम कर रहा है? वंदनीय! दृश्य दृष्टिगोचर है।

टीटी उर्फ टपोरीटाइप : ऐ... बोले तो भाषा की दुकान! ईजी वर्ड बोलने का, हमारे फाइनेंस मिनिस्टर भाईहैं। अभी आंकडों के वोल्डर तेरेइच्च सिर पे मारेगा। तू अपनी चिंता भी भूल जाएगा बीडू।

महानुभावः लेकिन बंधु, ये इतने सारे प्रियजन कितना रस लेकर इनकी भाषण कला में निमग्न हैं।

टीटी : तू ऐडा है क्या? आंखों का शटर खोल निमग्ननहीं देख, सो रहे हैं। आंकडेबाजी के जाल में तडप रहे हैं, मछली के माफिक। बोले तो बाप भोत डेंजर बात बोल रहा है। तू कानों में अंगुली ठूंस, कल्टी कर यहां से ।

महानुभाव : ओह कैसा अप्रिय विलाप है आपका। इनके व क्तव्य में बीच-बीच में अन्न-आवास, रथ-ईंधन इत्यादि वस्तुओं की ध्वनि कर्णपटल की ओर चलायमान है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि यह मनुष्यमात्र का चिंतक, उसकी आवश्यकताओं का सचेतक, धरा पर मानव कल्याण को समर्पित मनीषी दीख पडता है।

टीटीः अबे पुराने जमाने का नया सामान तूने आज तक कोई सिंपल बातें नईं बोली क्या? भाई जो बता रैला है उस पे मत जा। ये इस जेब से देता है दूसरी से निकालता है। भोत टैम से ये हो रहा है। बोले तो लोग वहींच्च हैं, सरकारी आदमी बोत आगे बढ गयेला है। डेमोक्रेसी के फंडे नईंना जानता तू... जनता डंप, कार में अफसर। अपुन की तो यहीच्च डेफिनिशनहै। अब तू बता किस जुगाड में यहां फिरैला है?

महानुभाव : आप तो सदेच्छाओं के प्रति निष्ठुर व्यक्त जान पडते हैं? ये कितनी निपुणता से धन का राष्ट्रवासियों की भलाई में उपयोग किए जाने की तत्परता दिखा रहे हैं। आप मिथ्या वक्तव्य दे रहे हैं?

टीटी : तू समझेगा इच्च नईं, बाप। मिथ्या नईं मत्था तो तेरा फिरैला है। तू कहीं खानों में रहता है क्या? समझा, ‘फाइनेंस भाईतो मूनिसपिल्टी टाइप काम करता है। अच्छा-अच्छा देता है, तो फौरन ही टैक्स की टंगडी मार देता है। ये मुंबई की बारिश नहीं बीडू कि जब चाहे नहा लिया, ये तो सरकारी नल है इदर पानी ले, उदर जेब ढीली कर। अबी समझा कि नाईं कि तेरे कान के नीचे बजाकर तेरी आत्मा का दरवाजा भडभडा दूं।

महानुभाव : बंधुवर, विचार तो आफ उचित ही प्रतीत हो रहे हैं। यदि अपना देय-पण्यसमय पर नहीं निस्तारित करेंगे, तो समुचित विकास होगा भला।

टीटी : अबे तू तो ज्ञानी जैसा दिखरेला है बाप, जनता की पॉकिट से माल निकल जाता है। बोले तो वो तो गरीबीइच्च ही रैती है, पन चांद की बुझी चांदनी तूने कबी थिंकिंग किएला कि ये अमीर और अमीर कैसे होता जा रहैला है। बीडू अपुन का भेजा तो इसी टेंशन में आदा घिस गयेला है। ऐसेइच्च चलेगा तो अपुन खाएगा-पिएला किदर से । सोचा तूने, कबी झोपडपट्टी देखी है क्या? एकबार देख ले ये भारी शब्दों की टोकरी सर से गिर जाएगी तेरी। तू यहां से सरपट हो लेगा।

महानुभाव : आपने मेरी कई जिज्ञासाओं का हल किया। अब आपसे अंतिम समाधान हेतु मन उत्कंठित है?

टीटी : बोल न, प्यारे तू कुछ बी पूछ

महानुभाव : जब जीवन प्रवाह इतना विपरीत दिशा में प्रवाहमान है तो क्यों लोग यहां निवासित हैं? बेहतर जीवन की प्रत्याशा में क्यों नहीं पलायन का प्रयत्न करते?

टीटी : अपुन का देश है बीडू, अपुन का। भाइयों को छोडकर किदरीइच्च रहेगा। दिल में रखते हैं दिल में। सहलेंगे पन किदरीइच्च नईं जाने का।

महानुभाव : वंदन श्रीमान् आपकी सदेच्छाएं चहुंदिशा में विस्तारित हों। अच्छा अब विदाई दो मित्र, शुभकामनाएं।

सूत्रधार का पुनः प्रकटन : देखा आपने सदेच्छाओं पर ही बेहतर कल की नींव बनाई जा सकती है। उफ! ज्ञान तो वे दे गए मैं क्यों ट्राई मार रहा हूं। खैर, वे दोनों तो गमनायितहो गए। आप भी दूरस्थ यंत्र को कष्ट दें टीवी बंद करें, ताकि मैं भी अपना मजमा कहीं लगाऊं।

जय बजट-जय भारत।

(सौजन्य दैनिक भास्कर)

2 blogger-facebook:

  1. क्या बात है, मजा आ गया इस प्रस्तुति को देखकर रवि भाई.

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