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श्याम नरायण कुंदन की कहानी - इंटरव्यू


कहानी
इण्टरव्यू

-श्याम नरायण ‘कुन्दन‘


अब हम तीनों लोग बस स्टाप पर थे। रंग-बिरंगी गाड़ियाँ सामने से सर्र से निकल जाती थी। हरी और पीली रंग की बसें लोगों की एक भारी भरकम भीड़ बस स्टाप पर छोडती और दूसरे ही पल वह भीड़ दूसरी बसों द्वारा बादलों की मानिद छँट जाती।

विचित्र दुनिया। माडलों सी दीखने वाली लडकियाँ इतराकर चलती थीं, जैसे वे लडकियाँ नहीं थीं, तितलियाँ थीं, तितलियाँ, रंग-विरंगी तितलियाँ। उनकी उपस्थिति मात्र से ही पूरा का पूरा माहौल एक अजीब किस्म के आकर्षण से भर जाता था।

युवकों के क्या कहने। सब के सब निराले। अगर कोई अकेला था तो कोई बात नहीं, लेकिन जिनकी साथ गर्लफ्रैंड साथ में थी तो कार्यक्रम रंगारंग। वे उचकते थे, खिलखिलाते थे और अंग्रेंजी में पता नहीं क्या-क्या कह जाते थे।

लोगों से बेखबर कभी वे अपनी गर्लफ्रैंड को अपने बगल में दबा लेते तो कभी उनके आँखों मे आँखें डालकर उनके नितम्बों को हौले-हौले ठोक देते। फिर उनके कमर में हाथ डालकर भीड़ के परे खींच ले जाते।

लडकियों को भी किसी तरह कम नहीं कहा जा सकता। वे भीड़ को चिढ़ाने के लिए हर पल कुछ नये-नये तरीके ईजाद कर-कर रहीं थी। साथी लड़कों को अपने उपर हावी होने के लिए उकसा रही थी।

हम सबको अभिभूत देख रहे थे। सभी को लेट लतीफी का भूत सवार था। हर चेहरे पर संभावित समय पर पहुँचने का भय व्याप्त था। पर हमारे पास न समय का अभाव था न ही कुछ खोने का भय, बल्कि हम तो चाहते थे कि समय वहीं थम जाए।

इलाका साकेत का था। हम वहाँ इण्टरव्यू के लिए गए थे और इण्टरव्यू की समाप्ति के बाद हमें वापस कटवरिया सराय जाना था।

मन चिड़चिड़ा था और चेहरे का भाव ऐसा जैसे हम पचासों जूते खाकर चले आ रहे हों। सिर में दर्द, आँखों में जलन और भूख के मारे का बुरा हाल था।

आते समय तो हम कुल दस थे, पर लौटते समय अब केवल तीन थे। मैं, संतोष और कोई तीसरा।

उम्र और डिग्रियों के मामले में मैं अपने दोनों साथियों पर भारी था, लेकिन व्यवहारिकता और तर्कपटुता में मैं संतोष के सामने बिल्कुल ही लिजलिजा था। इसलिए मैं उससे बात करने से हमेशा कतराता रहता था।

उस दिन भी मैं उससे बात करने से बच रहा था लेकिन जब कटवरिया सराय की तरफ जाने वाली अनगिनत बसें आकर चली गई तो मुझसे रहा नहीं गया और हकलाते हुए मैंने उससे पूछ ही लिया- ‘यार संतोष चलना नहीं है क्या।‘

‘चलो, मैंने कब मना किया है चलने को।
संतोष ने मेरी तरफ कनखी नजर से देखते हुए जवाब दिया।
‘लेकिन प्रायवेट बस तो आने दो।‘ थोड़ा रुककर उसी ने फिर कहा।
‘प्रायवेट बस ही क्यों? तीसरा उत्सुकता बस पूछ बैठा।

‘क्योंकि प्राइवेट बस में कण्डक्टर की नजर बचाकर बिना टिकट यात्रा किया जा सकता है। पकड़े जाने पर वे अधिक से अधिक लताड़कर छोड देते है पर डी.टी.सी. वाले तो जुर्माना अदा न करने पर लताड़ते भी हैं और हवालात की हवा भी खिलाते हैं।‘

इतना कहकर संतोष चुप हो गया और सामने की तरफ देखने लगा। हम दोनों ही उसके चालाक दिमाग पर दंग रह गये।

उस पल मैं सामने की तरफ न देखकर संतोष के तरफ ही देख रहा था, सोच रहा था कि- ‘वह सामने देखकर भी सड़कों पर आती-जाती गाड़ियों की तरफ नहीं देख रहा होगा, बल्कि वह सामने खड़ी टाइट जींस वाली लड़कियों के नितम्बों के पार अपने भाग्य को देख रहा होगा।‘

निःसन्देह वह भाग्यवादी था और मैं भाग्य विरोधी। हम दोनों ही अपने पक्ष के प्रति अड़ियल रुख रखते थे लेकिन वाद-विवाद के क्रम में मुझे याद नहीं है कि मैं कभी भी संतोष से विजयी हुआ हूँगा। पता नहीं क्यों उसके तर्क के सामने मेरी हमेशा ही घिग्घी बँध जाती थी और मैं उसके सामने एक मेमने की भाति सिर्फ में... में....में ही करता रह जाता था। अन्त में वह विजयी मुद्रा में कहता जाता- ‘भाग्य से अधिक न आज तक किसी को कुछ मिला है न ही भविष्य में मिलेगा।‘

मुझे लगा जैसे संतोष उस पल चुप रहकर अपने उसी अवधारणा को पुष्ट कर रहा हो।
कभी-कभी तो मुझे संतोष की बातें बिल्कुल भी गलत नहीं लगती। लगता उसका भाग्यवाद ही सही और बाकी सब झूठ। मैं और मेरी अक्खड़ता तो बस एक छलावा है, जिसके बल पर मैं केवल तुतला तो सकता हूँ, लेकिन कुछ पा नहीं सकता। जैसे लाख प्रयास के बाद भी मैं एक छोटी सी नौकरी नहीं पा पाया। हाँ वही नौकरी जिसके लिए मैंने कहाँ-कहाँ इण्टरव्यू नहीं दिया लेकिन कही अंग्रेजी के नाम पर छंट गया तो कहीं घूस न दे पाने के कारण। कहीं मेरी डिग्रियाँ छोटी पड़ गयी तो कही अनुभव की न्यूनता बाधा बन गयी।

वैसे कहने के लिए तो मैंने उँचे-उँचे विश्वविद्यालयों से उँची-उँची डिग्रियाँ हासिल की है। देश के महानतम विश्वविद्यालयों की लाईब्रेरियों में दिन-रात बैठकर आँखे फोड़ी है। प्रतियोगिता के नाम पर बडे-बडे लोगों के सामने सारगर्भित व्याख्यान देकर अपने ज्ञान का लोहा भी मनवाया है लेकिन परिणाम नगण्य।
यह कितनी अजीब बात है, जिन्होंने कुछ नहीं किया, वे मेरे आँखों के सामने ही उँचाइयों पर पहुँच गए और मैं सब कुछ करके भी जहाँ का तहाँ रह गया। यह भाग्य का खेल नहीं तो और क्या है?

सामने के फुटपाथ पर दो विदेशी मूल की युवतियाँ कोका-कोला पी रही थी। उनके बगल में ही कुछ लोग गरमा गरम चाट-पकौड़े का आनन्द ले रहे थे। उनको देखकर मुझे भान हुआ कि कल शाम से ही मैं कुछ भी नहीं खाया हूँ। पेट में चूहे कूद रहे हैं और आँखों के सामने लुत्तियाँ नाच रहीं हैं।

पता नहीं कब रुम पर पहुँचना होगा? वैसे भी रुम पर कौन सा मनभोग लगाकर रखा होगा? अब तो दुकानदार उधार मांगने पर बकाया पैसा मांगने लगता है। उपर से मकान मालकिन। बाप रे ! डायन है डायन। कुत्ते की तरह सजग कान है उसके। कितना ही पांव दबाकर उपर की सीढयाँ चढूँ, वह जान जाती है। दरवाजा खोला नहीं कि जहर की घुट्टियाँ पिलाने लगती है।

क्या आज वापस जाने पर वह छोड़ देगी? कदापि नहीं। पहुँचते ही डाँट कर पूछेगी- ‘क्या रे ! पैसा आया की नहीं तेरा ? जब कहूगां नहीं ऑन्टी थोडा सब्र करो, बस एक दो दिनों में आने ही वाला है। तब वह गरजेगी- ‘तेरा तो दो महीणे से इसी तरह पैसा आ रहा है। बहुत सुण चुकी हूँ मैं, पर अब एक ण सुणूँगी........मेरा किराया चाहिए ..... और वह भी इसी समय।‘

‘मगर आन्टी‘ बिगडती बात देखकर जब मैं उसके सामने दाँत निपोरुगाँ तो वह मुझे धिक्कारेगी और चिल्लाकर फिर डांटेगी -‘चुप बे झूठे, चोर, बेईमाण कहीं के।‘
ऐसे ही न जाने क्या-क्या कहेगी वह। और उसके जाते ही मैं तीर खाए पक्षी की तरह बिस्तर पर गिर पडूँगा। सारी रात बिना खाए करवट बदलते बितेगी। सुबह होगा, पेपर वाला पैसे के लिए तगादा करेगा। उसके सामने भी मैं गिड़गिड़ाउगाँ। जब वह चला जाएगा तो नवभारत टाइम्स के वर्गीकृत विज्ञापन में नजरें गड़ा दूँगा। रोज की ही भाँति हाथ में डिग्रियों का पुलिंदा दबाए इण्टरव्यू के लिए निकल जाऊगाँ। जैसे रोज निकलता हूँ, जैसे आज निकला था।
‘अरे वह प्राइवेट बस।‘ तीसरा चिल्लाया तो मेरे बड़बड़ाने की श्रृंखला टूटी।

‘अरे हाँ ! दौडो....पकडो...।‘ संतोष ने भी उसके हाँ मे हाँ मिलाया।
हम तीनों जान छोड़कर दौड़े पर दिल्ली की बसों में चढ़ने के लिए केवल दौड़ने भर से काम नहीं चलता, बल्कि भीड़ को धकियाने की शक्ति भी चाहिए जो शायद उस पल हम तीनों में किसी के अन्दर नहीं थी और अगर कहीं शक्ति थी भी तो बिना टिकट यात्रा का भय हमें आगे बढ़कर बस में चढ़ने से रोक रहा था।

कुल मिलाकर हम तीनों ही बस में चढ़ने का ढोंग करते हुए जहाँ के तहाँ रह गये और बस स्टाप बेसुमार भीड़ को लादकर चलती बनी।
हम वापस आकर फिर अपनी सीट पर बैठ गए। मैं अपने चारों ओर एक सरसरी नजर डाला तो पाया कि हमारे अलावा कुछ और भी लोग थे वहाँ जो बस में चढ़ने से वंचित रह गए थे, जैसे हमारी दायी तरफ खड़ा एक पागल, बायीं तरफ अपनी सात वर्ष की बेटी का सहारा लिए खड़ा एक कोढी भीखमंगा, तथा ठीक हमारे पीछे कूड़े के ढेर से अपना भाग्य तलाशकर खड़ा एक युवा।

उस पल मुझे लगा कि उनमें और हममें कोई खास अन्तर नहीं है। बल्कि कई मामलों में तो वे हमसे भी अच्छे हैं क्योंकि वे जो हैं, हैं, उन्हें हमारी तरफ कलई उघडने का भय नहीं रहता। जो मिला खा लिया, जो पाया पहन लिया, जहाँ नींद आयी सो लिया।
ठीक उसी समय सामने कोलाहल बढ़ा। शायद किसी स्कूल की छुट्टी हुई थी।

एक से एक सुन्दर बच्चे। जरुर अंग्रेजी माध्यम के होंगे। हिन्दी माध्यम के बच्चे इतने चिकने और चंचल नहीं होते। उन्हें इतने सुन्दर कपड़े और जूते भी पहनने को नहीं मिलता। वे गंदे कपड़े पहनते हैं और वे ठीक उसी के अनुरूप काले और भदेस होते हैं। मेरा मन पूर्वाग्रही हो आया। बोला- ‘आखिर ये फूल से कोमल और मक्खन से मुलायम बच्चे देश के किस काम आएंगे भला?‘

मेरे इस बचकाने सवाल पर धीरे-धीरे इकट्ठी होती भीड़ की कई एक मुण्डियाँ मेरी तरफ मुड़ गयी। कुछ पलों के लिए तो मैं समझ नहीं पाया कि भीड़ की वे तमाम मुण्डियाँ मेरे पक्ष में मुड़ी थी या विपक्ष में। लेकिन जैसे ही संतोष ने मुझे खा जाने वाली नजरों से घूरा, मैंने जान लिया कि मेरी खैर नहीं है।
संतोष के स्वभाव से मैं अच्छी तरह वाकिफ था। मैं यह भलीभाँति जानता था कि संतोष बिना वजह मेरे किसी बात में हस्तक्षेप नहीं करता। लेकिन जब करता है तो उसका मतलब बड़ा होता है।

‘सरासर गलत और निराधार बात।‘ संतोष ने अपने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा।
अब लोगों के मुण्डियों के मुड़ने की बारी संतोष की तरफ थी। संतोष ने आगे भी कहना जारी रखा- ‘जिसे आप इतना सुकोमल और कमजोर कह रहे हैं वे उस स्थान पर पूरी मजबूती और शक्ति के साथ खड़े हो सकते हैं, जहाँ अब से कुछ ही घण्टे पहले खड़े होने में हम सभी के शरीर की नसें चटकने लगीं थीं। हम पसीने-पसीने हो आए थे। पांवों में कम्पन था और थोबड़े पर जीवन निरर्थक होने का बोध।‘

बस स्टाप के उस भीड़ में मेरी सांसें उपर नीचे होने लगी। मैं चाह रहा था कि संतोष वापस कटवरिया सराय चलकर कुछ भी कह ले, मुझे इसके लिए जो भी सजा देना चाहे, दे ले लेकिन यहाँ इतने लोगों के बीच में मेरी इज्जत की धज्जियाँ मत उधेड़े। पर संतोष तो संतोष था वह जब एक बार शुरू हो जाता था तो रूकने नाम नहीं लेता था।
‘वे सामने के गोरे और डिब्बे के दूध वाले डाक्टर और इंजीनियर बन सकते हैं, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री बनकर विदेश जा सकते हैं, क्योंकि विदेशों में हिन्दी नहीं बल्कि अंग्रेजी ही चला करती है। यही नहीं वे अभिनेता और अभिनेत्री भी बन सकते हैं। मि. इंडिया और मिस इंडिया बनकर तहलका मचा सकते हैं। क्योंकि इसके लिए अंग्रेजी बोलने वाले मीठे चेहरों की ही जरुरत होती है, हम जैसे हिन्दी बोलने वाले बदसूरत चेहरों की नहीं।‘

‘अरे चुप यार संतोष, चुप। मैं भी तुम्हारी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। वह बात तो मेरे मुँह से गलती से निकल गयी थी।‘ मैंने संतोष को चुप कराने की गरज से बोला।

‘गलती........गलती...........गलती आखिर एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि हमेशा आप ही से गलती क्यों हो जाती है। आखिर कोई भी बात कहने से पहले आप अपनी जड़ों की ओर क्यों नहीं देख लेते। क्यों नहीं मान लेते कि हम हिन्दी वाले हिन्दी जानकर सिर्फ और सिर्फ असभ्य और गंवार हैं, बाहर तो कहीं जा नहीं सकते, अपने ही देश में एक छोटी सी नौकरी भी प्राप्त नहीं कर सकते।‘

‘और अगर कुछ कर सकते हैं तो सिर्फ इतना कि भूखों रहकर, इण्टरव्यू से निकाले जाकर, दाढी बढ़ाकर, बस स्टाप पर बैठकर, अंग्रेजी जानने वाली महानगरीय लडकियों की खूली जाँघों, उरोजों, पुष्ट नितम्बों और गहरी नाभि को लपलपाती नजरों से निहार सकते हैं और नहीं तो हिन्दी में कविता बनाकर खुद को ही सुना सकते हैं, क्योंकि इसमें अंग्रेजी जानने की जरुरत नहीं पड़ती, सिर्फ हिन्दी जानने भर से काम चल जाता है।

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संपर्क:
श्याम नरायण ‘कुंदन’
311-एमएचसी,
हैदराबाद विश्वविद्यालय
गाची बावली (GACHI BOWLI)
हैदराबाद -500046
ईमेल- shyam_kundan@yahoo.co.in

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सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकार हों !

बहुत अच्छी कहानी है...चित्रण और संवाद जोरदार हैं।

मजा आ गया लग रहा है कि प्रेमचंद ने कहानी लिखी है। आ हा हा हा...

लगा कि प्रेमचंद ने लिखा है। आ हा.. हा.. हा, मजा आ गया।

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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