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साक़िब अहमद की कविताएं


कविताएं

-साकिब अहमद

‘राह’

मैं तन्हा था,
बिलकुल तन्हा.
कोई अपना न था,
कोई सपना न था.
न थी कोई मंज़िल,
न था कोई मकसद.
यूं ही राह चले जा रहा था,
तन्हा.
अचानक एक मोड़ आया,
और तुम मिल गये.
तुम भी तन्हा थे.
तुम्हारे चेहरे पे साफ दिखती थी,
एक उदासी, एक तन्हाई.
फिर दो तन्हा दिल,
हो लिए एक साथ.
दुनिया जैसे बदल सी गयी.
सब सतरंगी लगने लगा.
जिन आंखों में कल तक कोई सपना न था,
उन्हीं आंखों में प्यार भरे सपने सजने लगे.
हमने जीवन भर साथ निभाने के,
लिए कुछ वादें, खायी कुछ कसमें.
अब,
एक मंज़िल थी, एक मकसद था.
और थी,
तुम्हारे जु़ल्फ़ों की छांव.
मैं बहुत थका हुआ था.
तुम्हारी जु़ल्फ़ों की छांव तले,
मुझे नींद आ गयी.
फिर जब एक तेज़ हवा के झोंके से,
मेरी नींद टूटी,
मैंने खुद को फिर तन्हा पाया.
मुझे छोड़ कर तुम,
जाने कहां चली गयी.
जाते-जाते कुछ कहा भी नहीं.
अब,
मेरी जिंदगी फिर वीरान हो गयी.
मैं फिर तन्हा हो गया.
तन्हा बहुत तन्हा.
दिल कहता है बार-बार,
मैं भी तुम्हारे पास हो जाऊं.
लेकिन तुम हो दूर बहुत दूर,
तुम तक पहुंचने की राह कहां पाऊं!
----

‘तुम्हारा साथ’

ख़ुदा करे,
ऐसा पुरसुकून लम्हा,
मेरी जिंदगी में भी जल्द आये.
और मैं भी,
तुम्हारी ही तरह सो जाऊं,
पास, तुम्हारे बिलकुल पा हो जाऊं.
वो लम्हात,
कितने सुहाने होंगे.
अगरचे,
मौत के बाद भी महज़ ख़ुला है,
मगर,
उसमें तुम्हारा साथ तो होगा.
----

‘पल भर को तुम आ जाओ’

सुबह से शाम तक,
दूसरों के लिए कुछ करना है.
जिसमें खुद अपना नक्श नहीं,
रंग उस तस्वीर में भरना है.
जिंदगी क्या है-
सोचने लगता है ज़हन,
रूह पर छा जाते हैं,
दर्द के साये, उदासी का धुआं.
जिंदगी यही है तो,
मौत किसको कहते हैं.
एक तन्हाई, एक अन्तर्द्वंद्व,
एक अजीब सी बेचैनी से,
हर वक्त धीरा रहता हूं मैं.
पल भर को तुम आ जाओ,
बंद होती मेरी आंखों में,
मुहब्बत का एक ख़्वाब सजा आओ.
---
संपर्क:

- साक़िब अहमद
सी/1447/5,
इंदिरा नगर, लखनऊ

ई मेल: saquibdilse@gmail.com

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