रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

साक़िब अहमद की कविताएं


---
चूड़ी, कंगन, झुमके, बिंदिया,
मेरे लिए ही सजती हो तुम...

- साक़िब अहमद

ख़त लिखूं


अजनबी देश के
अनजानी राहों पर भटकते राही,
दिल ने चाहा है कि
आज तुझे ख़त लिखूं.
लिखूं कि,
हरदम तेरे ही ख़्यालों में
खोये खोये से हम जिया करते हैं.
दिल लगता नहीं कहीं भी मेरा,
महफ़िल में भी तन्हा ही रहा करते हैं.
लिखूं कि,
नींद आती नहीं है आंखों में,
रात भर जागे जागे से रहा करते हैं.
धुंधलाई हुई रातों में मेरे बेबस आंसू,
डर के तन्हाई से, थम थम कर बहा करते हैं
लिखूं कि,
तू जो आ जाये तो, इन जलती हुई आंखों को,
तेरे होंठों तले, जन्नत सा आराम मिले.
तेरी बाहों में सिमट कर, तेरे सीने के तले,
मेरे बेचैन दिल को करार मिले.


................


एक लड़की,

अक्सर मेरे ख़्वाबों में आती है और,
धीरे से मेरे एहसासों को छूकर,
दिल में समां जाती है.
उसके सांसों की भीनी-भीनी सी खुश्बू,
मेरे सांसों में समा कर,
मन को भीतर तक महका जाती है.
उलझ जाता हूं मैं,
उसकी घनेरी जुल्फों में.
उसकी मदभरी आंखों में छायी खुमारी,
और भी मदहोश बना जाती है.
जाग उठता हूं मैं,
नींद से कसमसाकर.
जब वो मेरे पास आकर,
मेरे कानों में कुछ कह जाना चाहती है.
पूछता है मेरा दिल उससे कुछ घबराते हुए,
वो कुछ भी नहीं कहती,
सिर्फ मुस्कुराती है,
मुस्कुराती है और चली जाती है.

......

मेरी हो तुम
इठलाती फिरती हो तुम,
हां मुझपे मरती हो तुम.
सागर जैसी गहरी आंखें,
मुझको ही तकती हो तुम.
होंठ सुर्ख गुलाबों जैसे,
मुझसे ही कहती हो तुम.
चूड़ी, कंगन, झुमके, बिंदिया,
मेरे लिए ही सजती हो तुम.
मैं जब भी तन्हा रहता हूं,
साथ मेरे रहती हो तुम.
एक ग़ज़ल हो, नील कमल हो,
बस मेरी, मेरी हो तुम.
----------------.
संपर्क:


साक़िब अहमद,
सी/1447/5,
इंदिरा नगर, लखनऊ

(साक़िब अहमद पत्रकारिता में स्नातक हैं और वर्तमान में सिने मसाला, ओए बबली और सेप टुडे पत्रिकाओं के संपादक हैं)
विषय:

एक टिप्पणी भेजें

छू जाने वाली रचनयें हैं...बधाई स्वीकारें..


***राजीव रंजन प्रसाद

bahut badhiya,likhte rahe....

बेनामी

nai kalam ki behatrin soch...bahdai

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget