सोमवार, 30 जून 2008

केदारनाथ अग्रवाल का आलेख : गीत और कविता

गीत भी कविता की अनेक विधाओं में से एक विधा है। इस विधा में व्यक्त हुई कविता गेय होती है। इसलिए गीत की पहचान उसकी गेयता में निहित होती है। इस...

रविवार, 29 जून 2008

सत्येंद्र शरत का बाल नाट्य : इच्छा पूर्ति

  राजकुमार चंद्रचूड़, राजकुमार कपिलदेव तथा उनका छोटा भैया, तीनों एक के पीछे एक मंच पर प्रवेश करते है। ये हमारे नाटक के मुख्य पात्र हैं। ये...

शुक्रवार, 27 जून 2008

बालेंदु दाधीच का आलेख : सरकार छिपाए, इंटरनेट दिखाए

दुनिया भर की दमनकारी, अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारों तथा संस्थानों के विरुद्ध संघर्ष करते लोगों को इंटरनेट के जरिए एक नया हथियार मिल गया...

महावीर शर्मा की पुस्तक समीक्षा : दिल से दिल तक

कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़ श्रीमती देवी नागरानी जी के अब तक दो ग़ज़ल संग्रह "ग़म में भीगी ख़ुशी" और "चराग़े-दिल...

गुरुवार, 26 जून 2008

मोहन वीरेन्द्र का आलेख : रचना क्या है?

  रचना और आलोचना का अंतर्वलंबन   -मोहन वीरेन्द्र   रचना जीवन की आलोचना का सांस्कृतिक प्रकार्य है और आलोचना उस रचना में व्यक्त जीवन...

मंगलवार, 24 जून 2008

के. पी. सक्सेना के दो व्यंग्य

किसान...बैल, और... आदमी और जानवर के बीच का सांस्कृतिक अन्तर जानते हैं आप ? नहीं जानते होंगे। मै बताता हूँ।...मोटे तौर पर अगर कोई जानवर मनु...

सोमवार, 23 जून 2008

अश्विनी केशरवानी का आलेख : पटते तालाब, कटते जंगल और बंजर होती जमीन

  पटते तालाब, कटते जंगल और बंजर होती जमीन   -प्रो. अश्विनी केशरवानी   गांव अब शहर में तब्दील होते जा रहे हैं। आज यहां बड़ी बड़ी इम...

सीताराम गुप्ता का आलेख : गंगाजल सा निर्मल मन क्यों ?

कबीर की एक साखी हैः कबीरा मन निर्मल भया , जैसे गंगा नीर, पाछे-पाछे हरि फिरै , कहत कबीर-कबीर। कबीर कहते हैं कि मनुष्य के मन के गंगा ...

पुस्तक समीक्षा : क्रान्ति यज्ञ (1857-1947 की गाथा)

  पुस्तक : क्रान्ति यज्ञ (1857-1947 की गाथा)   -समीक्षक : गोवर्धन यादव   राष्ट्रीय अस्मिता के रेखांकन का सार्थक प्रयास है ‘‘क्रान्...

रविवार, 22 जून 2008

कुणाल की एक फ़्यूज़न, कोड युक्त ग़ज़ल

हास्य-ग़ज़ल   -कुणाल   (मूल प्रकाशित रचना फ़ालतू की लाइनें यहाँ पढ़ें)   तुम भी तो कोडिंग किये जा रहे हो, हम भी ये कोडिंग किये...

शनिवार, 21 जून 2008

कवि कुलवंत के दो गीत

गीत - कवि कुलवंत सिंह   अभिलाषा बन दीपक मैं ज्योति जगाऊँ अंधेरों को दूर भगाऊँ, दे दो दाता मुझको शक्ति शैतानों को मार गिराऊँ...

शुक्रवार, 20 जून 2008

प्रभा मुजुमदार् की दो कविताएं

दो कविताएं Two Poems by Prabha Mujumdar -प्रभा मुजुमदार 1 समुन्दर की उफनती लहरों ने मन के अनजान द्वीपों को जहां बसती थी ...

मनोहर श्याम जोशी का व्यंग्य : नेताजी कहिन

नेताजी कहिन   -मनोहर श्याम जोशी   ब्रेकफास्ट के साथ नेताजी ने लठ-मार डिप्लोमेसी शुरू की। मक्खन और जैम दोनों से लिपे हुए एक टोस्ट को ...

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