अनुज खरे की कविता

खूब सौंधी सी मेरी अम्मा

-अनुज खरे

 


ममता के एक धागे से
घर गूंथती मेरी अम्मा
तन गला मनके बन जाती
त्याग-तपस्या मेरी अम्मा

 
दवा दर्द में, दुख में छांव
खुश में खुशियां मेरी अम्मा
रोटी संग गुड़, वो दाल में घी
खूब सौंधी सी मेरी अम्मा


चौका बासन छौंक लगाती
खट्टी इमली सी मेरी अम्मा
प्यार जताती, नेह लुटाती
दादी-नानी सी मेरी अम्मा


गुड्डी संग गुड़िया बन जाती
गुड्डे-गुड़िया ब्याह रचाती
विदाई में आंसू भर लाती
ऐसी भोली सी मेरी अम्मा


विपदा-दुख में आस जगाती
लोहे की पेटी मेरी अम्मा
खलिहानों और चौपालों में
चाची-ताई मेरी अम्मा


बड पर बनती भाग्य का डोरा
मंदिर में सूरत मेरी अम्मा
खेती-मिट्टी बाबूजी
सबकी चिंता मेरी अम्मा


बन्ना-बन्नी में मां-सास सी
खूब हुलसती मेरी अम्मा
कथा-बुलउए में जान वो
गीत भजन सी मेरी अम्मा


तीजों में त्योहार सी
पावन उमंग मेरी अम्मा
बारिश में छाता बन जाती
सर्दी में स्वेटर मेरी अम्मा


देहरी पर बनती घर का दर्पण
सांझ-सुबहरिया मेरी अम्मा
आंगन में तुलसी, घर में दीप
सूरज बन जाती मेरी अम्मा


बडी-बडी सी ठेस को
हंसकर पी जाती मेरी अम्मा
जब ढलते रुपयों में रिश्ते
आंसू बन जाती मेरी अम्मा


नफरत के इस संसार में
भोर का तारा मेरी अम्मा

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