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14 जून 2008

आधुनिकता और भारत का धर्म

 

भविष्य का भारत

 

-दिनकर

 

आजकल मेरा ध्यान इस सवाल की ओर बार-बार जाता है कि आज से सौ-पचास वर्ष बाद भारत का रूप क्या होने वाला है। क्या वह ऐसा भारत होगा, जिसे कंबन, कबीर, अकबर, तुलसीदास, विवेकानंद और गांधी पहचान सकेंगे अथवा बदलकर वह पूरा-का-पूरा अमरीका और यूरोप बन जाऐगा? पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों से भारत आधुनिकता की ओर बढ़ता आ रहा है, लेकिन समझा यह जाता है कि भारत अब भी आधुनिक देश नहीं है, वह मध्यकालीनता से आच्छन्न है। स्वतंत्रता के बाद से आधुनिकता का प्रश्न अत्यंत प्रखर हो उठा है, क्योंकि चिंतक यह मानते हैं कि हमने अगर आधुनिकता का वरण शीघ्रता के साथ नहीं किया, तो हमारा भविष्य अंधकारपूर्ण हो जायेगा। अतएव यह प्रश्न विचारणीय है कि आधुनिक बनने पर भारत का कौन-सा रूप बचने वाला है और कौन बलिदान में जायेगा। नैतिकता सौंदर्य-बोध और अध्यात्म के समान आधुनिकता कोई शाश्वत मूल्य नहीं है।

सच पूछिये तो वह मूल्य है ही नहीं, वह केवल समय-सापेक्ष्य धर्म है। नवीन युग, समय-समय पर आते ही रहते है और जैसे आज के नये जमाने पर आज के लोगों को नाज है, उसी तरह हर जमाने के लोग अपने जमाने पर नाज करते है। संसार का कोई भी समाज किसी भी समय इतना स्वाभाविक नहीं रहा है कि वह हर आदमी को पसंद हो। और कोई समाज ऐसा भी नहीं बना है, जिसके बाद का काल उसका आलोचक नहीं हुआ हो। वैदिक युग भारत का प्राय: सबसे अधिक स्वाभाविक काल था। यही कारण है कि आज तक भारत का मन उस काल की ओर बार-बार लोभ से देखता है।
वैदिक आर्य अपने युग को स्वर्णकाल कहते थे या नहीं, यह हम नहीं जानते, किन्तु उनका समय हमें स्वर्णकाल के समान अवश्य दिखायी देता हैं। लेकिन जब बौद्ध युग का आरंभ हुआ। वैदिक समाज की पोल खुलने लगी और चिंतकों के बीच उसकी आलोचना आरंम्भ हो गयी। बौद्ध युग अनेक दृष्टियों से आज के आधुनिकता-आन्दोलन के समान था। ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के विरुद्ध बुद्ध ने विद्रोह का प्रचार किया था. जाति-प्रथा के बुद्ध विरोधी थे और मनुष्य को वे जन्मना नहीं कर्मणा श्रेष्ठ या अधम समझते थे। नारियों को भिक्षुणी होने का अधिकार देकर उन्होने यह बताया था कि मोक्ष केवल पुरूषों के ही निमित्त नहीं है, उसकी अधिकारणी नारियां भी हो सकती हैं। बुद्ध की ये सारी बातें भारत को याद रही हैं और बुद्ध के समय से बराबर इस देश में ऐसे लोग उत्पन्न होते रहे हैं, जो जातिप्रथा के विरोधी थे, जो मनुष्य को जन्मना नहीं कर्मणा श्रेष्ठ या अधम समझते थे।
आज की आधुनिकता के प्रसंग में देखें, तो बुद्ध के युद्ध-विरोधी विचार भी आधुनिक थे। किंतु बुद्ध में आधुनिकता से बेमेल बात यह थी कि वे निवृतिवादी थे। गृहस्थी के कर्म से वे भिक्षु-धर्म को श्रेष्ठ समझते थे। उनकी प्रेरणा से देश के हजारों-लाखों युवक, जो हट्टे-कट्टे थे, हल जोतने और गाड़ी हांकने के योग्य थे. उत्पादन बढ़ाकर समाज का भरण-पोषण करने के लायक थे. संन्यासी हो गये और उनकी युवा पत्नियां जीवित वैधव्य की वेदना से कहारने लगीं। संन्यास की संस्था समाज-विरोधिनी संस्था है। हंसी-हंसी में एक बार स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि संन्यास का एक बड़ा दोष यह है कि वह अच्छे लोगों को समाज से अलग कर देता है। किंतु विवेकानंद फिर भी अधिक आधुनिक निकले, क्योंकि अपने संन्यासियों को उन्होंने समाजसेवी बना दिया।
विवेकानंद के संन्यासी एक दरवाजे से संसार से निकल जाते हैं, किंतु दूसरे दरवाजे से वे संसार में ही वापस आ जाते है: अपनी गृहस्थी छोड़कर वे सबकी गृहस्थी में सहायता करते हैं। किंतु बुद्ध की दृष्टि ऐहिक थी ही नहीं। वे मनुष्य को यह उपदेश देते थे कि जीवन जलता हुआ मकान है और बुद्धिमानी की बात यह है कि हम इस आग से निकल भागें। जीवन दु:खपूर्ण है और सारे दु:खों की जड़ मनुष्य का जन्म है। अतएव हमें वह रास्ता पकड़ना चहिए, जिससे जन्म लेना ही असंभव हो जाय। सृष्टि के विषय में बुद्ध की दृष्टि क्या थी, इसका स्पष्टीकरण बुद्ध ने कभी नहीं किया। इस पर बुद्ध को कई नास्तिक अथवा संदेहवादी मानते हैं। गरचे अधिक सच्चा मत यह मालूम होता है कि बुद्ध एगनास्टिक थे, क्योंकि उनका विचार था कि जो तत्व भौतिकोत्तर और इंद्रियों की पहुंच के पार हैं, उन्हें बुद्धि नहीं जान सकती है। और उनकी यही नास्तिकता और संदेहवादिता उन्हें आधुनिक युग के लिए आकर्षक बना देती है।
नास्तिक तो चार्वाक और बृहस्पति भी थे, किंतु चार्वाक और बृहस्पति भारतीय विचारधारा अथवा उसके दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं करते। किंतु बुद्ध भारतीय विचारधारा के बहुत बड़े प्रतिनिधि है। उनका भारतीय चिंतन पर प्रभाव है और भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि होने के कारण ही वे विष्णु के नवम अवतार माने जाते हैं। गौतम बुद्ध प्रचंड बुद्धिवादी थे। वे जनता की श्रद्वा का शोषण करके उस पर अपना मत लादना चाहते थे। अपने शिष्यों से भी उन्होने कहा था, 'आत्मदीपो भव'। तुम अपना दीपक आप बनो। तुम मेरी कोई भी बात इसलिए मत मानो कि वह मेरी कही हुई है। तुम्हें उन्हीं बातों में विश्वास करना चाहिए, जो तुम्हारी खुद की समझ में आती हों। जिन प्रश्नों का समाधान बुद्धि से नहीं हो सकता और जिनके उत्तर पाने या न पाने से आदमी का कुछ बनता- बिगड़ता नहीं, वैसे सभी प्रश्नों को तथागत ने अवयाकृत कोटि में डाल दिया था और उनके पूछे जाने की मनाही कर दी थी दीर्यनिकाय के पोट्ठपाद-सुत्त में बुद्ध करते है: पोद्वपाद! लोग नित्य है, और दूसरा मत यह कि लोक निरर्थक है, इसे मैंने अव्याकृत (कथन का अविषय) कहा है।' पोट्ठपाद के यह पूछने पर कि किसलिए भंते, भगवान ने इसे अव्याकृत कहा है? तथागत ने बतलाया कि 'इसलिए कि ये प्रश्न न तो अर्थयुक्त हैं, न धर्मयुक्त, न आदि ब्रह्मचर्य के उपयुक्त, न निर्वेद (वैराग्य) के लिए, न निरोध के लिए, न उपशम के लिए।' अर्थात इन प्रश्नों के विवेचन में पड़ने से मनुष्य को कुछ भी प्राप्त होने वाला नहीं है।
किंतु, बुद्ध का अव्याकृत चारों ओर से निश्छिद्र नहीं है, क्योकि परलोक को वे मानते थे, देवताओं की योनि में उनका विश्वास था और, गरचे आत्मा को वे नाशवान समझते थे, किंतु आवागमन के सिद्वांत में उनका अटल विश्वास था और वे मानते थे कि जो आत्मा शरीर के साथ नष्ट होती है, उसी का पुनर्जन्म भी होता है। अतएव जन्मांतरवाद और कर्मफलवाद में उनका पूरा विश्वास था और इस मामले में उनका दर्शन वही था, जो वैदिक धर्म वालों का रहा है। बुद्ध के पहले भारत में संस्कृति की एक ही धारा बहती थी, जिसे हम वैदिक संस्कृति के नाम से जानते है। किंतु बुद्ध के आविर्भाव के बाद से इस देश में संस्कृति की दो धाराएं बहने लगी है।
पहली धारा संस्कृति की वह मात्-धारा है, जो वर्णाश्रम-धर्म का समर्थन करती है, जाति-प्रथा को कायम रखना चाहती है, शूद्रों को ऊपर उठने देना नहीं चाहती छुआछूत में विश्वास करती है। और अन्य धर्मों और संस्कृतियों के प्रभाव से बचकर जीना चाहती है। दूसरी धारा वह है, जो बुद्ध के कमंडलु से निकली है। यह धारा बृहत् मानवता की धारा है। अब तो इस धारा का भी ईश्वर में विश्वास है और वह जन्मांतरवाद और कर्मफलवाद को उसी दृढ़ता से मानती है, जिस दृढ़ता के साथ वैदिक धर्म उसमें विश्वास करता है, किन्तु यह धारा वर्णाश्रम-धर्म के विरुद्ध है, जात-पात को वह नहीं मानती है, छुआछूत को वह अधर्म समझती है, शूद्रो और दलितों के लिए उसके भीतर खास पक्षपात है तथा अन्य धर्मों और संस्कृतियों से वह द्वेष नहीं, प्रेम करती है, कम-से- कम उनके प्रति वह पूर्ण रूप से सहनशील है।
कोई आश्चर्य नहीं कि भारत का निर्यात-धर्म बौद्ध धर्म निकला। कोई आश्चर्य नहीं कि आज के युग में भारत का सार्वभौम सत्कार बुद्ध का कारण अधिक, किसी अन्य धर्म-नेता के कारण कम है। और कोई आश्चर्य नहीं कि इस देश में धर्म के जो शक्तिशाली ठेकेदार थे, उन्होने बौद्ध मत को खदेड़कर देश से बाहर निकाल दिया। किंतु बौद्ध केवल शरीर से ही हारा है। मन तो उसका संपूर्ण हिंदुत्व के भीतर आज भी जीवित और सचेत है। ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है हम मनु के पक्ष में कम, बुद्ध के पक्ष में अधिक होते जाते हैं, तुलसी की ओर कम, कबीर की ओर अधिक झुकते जाते हैं। लगता है बुद्ध ने जिन बातों के खिलाफ विद्रोह किया था, हमें भी उनके विरुद्ध आवाज उठानी चहिए, क्योंकि वैदिक धर्म की जो बातें बुद्ध को नापसंद थीं, वे धर्म के तत्व नहीं, उसके ऊपर जमी हुई रूढ़ियों की पपड़ियां है और उन्हें तोड़कर झाड़े बिना भारतधर्म नवीन नहीं होगा। जिसका अर्थ यह है कि वह अपने असली स्वरूप पर नहीं पहुंचेगा।
किंतु आधुनिकता के प्रसंग में स्वभावत: ही यह प्रश्न उठता है कि तब असली भारत कौन है? वह जिसके शास्त्रकार मनु और वशिष्ठ दार्शनिक शंकर रामानुज और वल्लभाचार्य तथा कवि वाल्मीकि, कंबन और तुलसीदास हैं? अथवा वह जिसके शास्त्रकार स्वयं बुद्ध, दार्शनिक नागार्जुन और वसुबंधु तथा कवि तिरूवल्लुवर, वेमन्ना और कबीर हैं? प्रश्न बड़ा ही बीहड़ है, लेकिन खैरियत यह है कि इतिहास ने उसे सुलझाकर हमारे लिए आसान कर दिया है। हिंदु-धर्म अब वहीं नहीं है, जो कंबन और तुलसी अथवा वेमन्ना और कबीर के समय था। यूरोपीय संपर्क का एक बहुत बड़ा शुभ परिणाम हम यह मानते हैं कि उसने हिंदुतत्व को हिलकोर कर उसके भीतर एक क्रान्ति उत्पन्न कर दी और उस क्रांति ने मनु और बुद्ध वाली दोनों धाराओं को मिलाकर एक कर दिया है।
हिंदुत्व अब वही नहीं है, जो मनु की स्मृति तथा विद्यापति के निंबधों में लिखा मिलता है। उसका शाश्वत, चिर-नवीन और जाग्रत् रूप अब वह है, जिसका आख्यान परमहंस रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद ने किया है, अरविंद और महर्षि रमण ने किया है, गांधी और स्वामी दयानंद ने किया है। यह ठीक है कि विवेकानंद और गांधी के बताये हुए मार्ग पर सारी जनता अभी नहीं चल रही है। किंतु यह भी ठीक है ताकि समाज के अग्रणी लोग, जिनका आचरण देखकर समाज अपना आचरण बदलता है, पुराने हिंदुत्व को छोड़कर अभिनव हिंदुत्व पर आ गये हैं और जहाँ समाज के अग्रणी लोग आज पहुंचे है, वहाँ सारा समाज कल पहुंचकर रहेगा।
किंतु क्या अपने सामाजिक आचार बदल देने से हिंदू पूर्ण रूप से आधुनिक हो जोयेंगे? भारत के पूर्ण रूप से आधुनिक होने में बाधाएं कौन-कौन-सी है? आधुनिकता क्या है और भारत-धर्म के किन मूल तत्वों से उसका विरोध पड़ता है? क्या पूर्ण रूप से आधुनिक बनने के प्रयास में हम भारत-धर्म के इन मूल तत्वों का भी बलिदान करेंगें? अगर हां तो राममोहनराय, विवेकानंद और गांधी के इस स्वप्न का क्या बनने वाला है कि हमें भारतीय परंपरा के शिव-अंश को कायम रखना है, हमें अपनी परंपरा के सर्वश्रेष्ठ तत्वों को पाश्चात्य सभ्यता के उन तत्वों से एकाकार करना है, जो उस सभ्यता के सर्वश्रेष्ठ अंश है? और कहीं हमने अपनी परंपरा का पक्षपात करने के प्रयास में आधुनिकता का पूर्ण रूप, से वरण नहीं किया, तो इससे हमारा और संसार का कोई अकल्याण तो नहीं होने वाला है? संसार में जब भी कोई नया युग आरंभ होता है, वह युद्ध के कारण आरंभ नहीं होता, पराजय या विजय के कारण आरंभ नहीं होता, क्रांति के कारण आरंभ नहीं होता, न देश का नक्शा बदलने से आरंभ होता है। नया युग बराबर नये प्रकार के लोगों के जन्म के साथ उदित होता है।
वैसे जिसे हम आधुनिकता कहते है। वह कई बातों का एक सम्मिलित नाम है। औद्योगीकरण आधुनिकता की पहचान है। साक्षरता का सर्वव्यापी प्रसार आधुनिकता की सूचना देता है। नगर-सभ्यता का प्राधान्य आधुनिकता का गुण है। सीधी-सादी अर्थ-व्यवस्था मध्यकालीनता का लक्षण है। आधुनिक देश वह देश है, जिसकी अर्थ-व्यवस्था जटिल और स्वभावत: ही प्रसरणशील हो, जो 'टेक-आफ' की स्थिति को पार कर चुकी हो। बंद समाज वह है जो अन्य समाजों से प्रभाव ग्रहण नहीं करता: जो अपने सदस्यों को भी धन या संस्कृति कि दीर्घा में ऊपर उठने की खूली छूट नहीं देता, जो जाति-प्रथा और गोत्रवाद से पीड़ित है, जो अंधविश्वासी, गतानुगतिक और संकीर्ण है।
बंद समाज मध्यकालीनता का समाज होता है। आधुनिक समाज में उन्मुक्ततता होती है, उस समाज के लोग अन्य समाजों से मिलने-जुलने में नहीं घबराते, न वे उन्नति का मार्ग खास जातियों और खास गौत्रों के लिए ही सीमित रखते हैं। आधुनिक समाज का एक लक्षण यह भी है कि उसकी हर आदमी के पीछे होने वाली आय अधिक होती है, हर आदमी के पास कोई धंधा या काम होता है, और अवकाश की शिकायत प्राय: हर एक को रहती है। लेकिन ये आधुनिकता के बाहरी लक्षण हैं। यूरोप और अमरीका का समाज, सच्चे अर्थों में, आधुनिक समाज है और ऊपर के लक्षण मैंने यूरोपीय समाज को ही देख कर दिये हैं। किंतु उद्योग और रोजगार, साक्षरता और ऊंची आय, यद्यपि इस समाज के प्रमुख लक्षण है मगर यूरोपीय समाज के वे मौलिक गुण नहीं है।
यूरोप और अमरीका में जो आधुनिकता फैली है, उसका असली कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्राथमिकता और प्राबल्य है। यह दृष्टि उद्योग और टेक्नालॉजी से नहीं उत्पन्न हुई है, बल्कि टेक्नालॉजी और उद्योग ही इस दृष्टि के परिणाम हैं। यूरोप और अमरीका का सबसे बड़ा लक्षण वैज्ञानिक दृष्टि है, निष्ठुर होकर सत्य को खोजने की व्याकुलता है। और इस खोज के क्रम में श्रद्रा, विश्वास, परंपरा और धर्म, किसी भी बाधा को बुद्धि स्वीकार करने नहीं है। आधुनिक मुनष्य के बारे में सामान्य कल्पना यह है कि अपने चिंतन में वह निर्मम होता है, निष्ठुर और निर्भीक होता है। जो बात बुद्धि की पकड़ में नहीं आ सकती, उसे वह त्रिकाल में भी स्वीकार नहीं करेगा और जो बातें बुद्धि से सही दिखायी देती हैं, उनकी वह खुली घोषणा करेगा, चाहे वे धर्म के विरुद्ध पड़ती हों, नैतिकता के खिलाफ जाती हों अथवा उनसे मानवता का चिरपोषित विश्वास खंड-खंड हो जाता हो। इसीलिए लोग अक्सर आधुनिकता को नास्तिकता का पर्याय समझ लेते हैं और यह सोचने लगते हैं कि आधुनिकता का एक लक्षण यह भी है कि वह नैतिक नियमों की अवहेलना करती है। यही नहीं, जिन्होंने आधुनिकता की रूह को पहचानने की कोशिश नहीं की हैं, वे 'जाज' संगीत और 'ट्रिवस्ट' नृत्य तथा माता-पिता के साथ लड़कों के दुर्व्यवहार को भी आधुनिकता का ही लक्षण मान लेते हैं।
किंतु ये चीजें आधुनिकता की नहीं, उच्छृंखलता कि निशानी हैं और वे आधुनिक हों भी, तो मै तो उन्हें आधुनिकता की प्रकृति नहीं, विकृति ही कहूँगा। ये कुरीतियां आधुनिकता की शोभा नहीं बढ़ातीं, पुराने देशों में उसे अग्राहय बना देती है। उन्नीसवीं सदी में आधुनिकता की लहर भारतवर्ष में बड़े जोर से उठी थी और जहाँ तक उसके मूलतत्त्व यानी बुद्धिवाद का संबंध है, हमारे महापुरुषों ने उसे स्वीकार भी किया था।
किंतु दो कारणों से आधुनिकता भारत में बदनाम हो गयी। एक कारण तो यह था कि जितने लोगों ने आधुनिकता की रीढ़ यानी और वैज्ञानिक दृष्टि और बुद्धिवाद को पकड़ा तथा स्वस्थ स्वाधीन चिंतन के लिए उसकी महिमा स्वीकार की, उनसे कई गुना अधिक लोग स्वाधीन चिंतक होने का स्वांग भरने लगे। ऐसे युवक उस समय अपने को 'यंग बंगाल' कहते थे। और अपनी आधुनिकता की अभिव्यक्ति वे शराब पीकर, अपने धर्म की निंदा करके बल्कि मंदिरों में गोमांस फेंककर करते थे। इनसे से बहुत-से लोग ईसाई भी हो गये थे ओर कई मामलों में देखा गया था कि उनके धर्म-परिवर्तन की प्रेरणा आध्यात्मिक जिज्ञासा नहीं, कोई इहलौकिक लोभ अथवा प्रेम था।
आधुनिकता की बदनामी का दूसरा कारण यह हुआ कि उसके प्रतीक हमारे अंग्रेज शासक थे, जिनमें हमें मोहब्बत नहीं, घृणा थीं। आधुनिकता के विरुद्ध भारतीय समाज ने जो कठोर प्रतिक्रिया अभिव्यक्त की थी, उसका प्रमाण हम उन्नीसवीं सदी में देख चुके हैं। आधुनिकता के छिछलेपन को देखकर भारत इतना नाराज हुआ कि यूरोप को स्वीकार करने के बदले उसने एक दूसरी ही राह पकड़ ली। हिंदू कहने लगे कि हमारी संस्कृति बहुत पुरानी हैं, हमारा साहित्य सर्वश्रेष्ठ है और धर्म के बारे में हम जितना जानते हैं, उससे अधिक जानकारी का दावा यूरोप के लोग नहीं कर सकते, अतएव वे हमसे चाहे तो धर्म सीख लें, हम उनकी विचार-पद्धति को कबूल नहीं करेंगें। और मुसलमान कहने लगे कि जो शिक्षाएं हमें यूरोप के लोग देने आये हैं, वे हमारे धर्म ग्रंथों में पहले से ही मौजूद हैं। नयी दुनिया से हमें कुछ भी नहीं लेना हैं। लेकिन भारत उस समय भ्रम में था। नयी दुनिया की हमने बहुत सारी बातें स्वीकार कर ली हैं और बहुत-सी बातों को स्वीकार करने की हमारी तैयारी जारी है।
औद्योगीकरण यूरोप और अमरीका की देन हैँ। भारत में नगरों की जो संख्या और प्रधानता बढ़ने लगी हैं, वह आधुनिकता का परिणाम है। कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों का आज का रूप बाहर से आया हैं, साक्षरता का विकास आधुनिकता के धक्के से हो रहा है। हमारे प्रजातंत्र की पद्धति यूरोप और अमरीका से ली गयी हैं। व्यक्तिवाद की प्रेरणा इस देश में यूरोप और अमरीका की देखा-देखी बढ़ रही है और सम्मिलित परिवार की परिपाटी पर जो खतरे मंडरा रहे हैं, वे भी आधुनिकता की ही देन है। नारियों की मर्यादा-वृद्धि आधुनिकता के कारण हो रही है और यदि आधुनिकता की प्रेरणा हमारे भीतर काम नहीं करती होती, तो हम हिंदू कोड को कानून का रूप नहीं दे सकते थे। कुछ बातों में आधुनिकता ने हमारी सहायता परोक्ष रूप से भी की है।
जिन प्रवृत्तियों को आज हम आधुनिक कहते हैं, वे बुद्ध में दिखायी पड़ी थीं, भक्त और संत कवियों में दिखायी पड़ी थी। उन्हें आधुनिकता ने कुछ तेज कर दिया और हम अस्पृश्यता को कानूनी अपराध घोषित करने में सफल हुए। इसी प्रकार हमारे संविधान में जो यह शर्त रखी गयी हैं कि नर-नारी के बीच कोई असमानता नहीं बरती जायगी तथा उन्नति के अवसर सभी जातियों के लोगों को, भेदभाव के बिना, उपलब्ध रहेंगे, वह शर्त, वैसे देखिये तो, मनुस्मृति के खिलाफ पड़ती है। लेकिन उस शर्त को जनता ने इसलिए कबूल कर लिया कि पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों के भीतर उसके कट्टरता के बहुत-से भाव बदल गये हैं या ढीले पड़ गये हैं और उसका मन धीरे-धीरे नवीन हो रहा है।
---.
(टीडीआईएल हिन्दी कार्पोरा से साभार)

1 टिप्पणी:

  1. शानदार!


    बुद्ध के पहले भारत में संस्कृति की एक ही धारा बहती थी....


    यहाँ आपत्ति है. जो धाराएं मन्द हो जाती है या लुप्त हो जाती है, इसका अर्थ यह नहीं की उनका अस्तित्व नहीं था. श्रवण धारा को भुलना महान भूल होगी. बुद्ध के समकालिन महावीर वास्तव में इसी के अनुयायी थे. उन्हे किसी धर्म का प्रवर्तक कहना इस दृष्टि से गलत है.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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