मंगलवार, 17 जून 2008

अशोक कुमार वशिष्ठ की ग़ज़लें

Artist07 

उसके नूर से ये मन रौशन‚
अंधियारों में भटकने वालो|

ग़ज़लें

-अशोक कुमार वशिष्ठ

 

ऐ दिल

अपने हर दर्द की‚ तू ही तो दवा है ऐ दिल

बददुआ भी तू‚ और तू ही दुआ है ऐ दिल।

 

तू जो रोता है‚ तो इतना भी‚ क्यों रोता है

तेरी खामोशी में‚ सारा मजा है ऐ दिल।

 

छोड़, दे अपनी तू‚ ये बेकार तमन्नाओं को‚

फिर तू जानेगा‚ तू कितना बड़ा है ऐ दिल।

 

तू जिधर देखेगा‚ जन्नत नजर आएगी उधर‚

तुझमें वो नूर‚ कुछ ऐसी कला है ऐ दिल।

 

खुदसे भागेगा तो तड़पेगा‚ पछताएगा‚

खुदसे जुड़ने में ही‚ तेरा भला है ऐ दिल।

 

जो तेरे पास है‚ दुनियां में कहीं और नहीं‚

खुदको पा लेगा तो‚ तू ही खुदा है ऐ दिल।

 

कोई अकेला नहीं जगत में

 

मुझे अकेला समझने वालो‚

नहीं अकेला चहकने वालो|

 

मुझमें मेरा यार भी रहता‚

थोड़ा समझो समझने वालो|

 

वो आंखों में और सांसों में‚

देखो‚ सुन लो बहकने वालो|

 

उसके नूर से ये मन रौशन‚

अंधियारों में भटकने वालो|

 

उसकी महक से महक रहा हूं‚

मद मदिरा से महकने वालो|

 

मुझमें वो और उसमें मैं हूं‚

बाहर से ही बहलने वालो|

 

कोई अकेला नहीं जगत में‚

गौर करो बस परखने वालो|

 

मौत से कैसा डरना

 

मौत तनको ही आती है‚ मौत से कैसा डरना‚

मिलन जुदाई एक खेल है‚ फिर आहें क्यों भरना|

 

मौत आती है आने दो‚ कहां ले जाए देखें‚

शायद बिछड़ों से मिलवा दे‚ जरा प्यार से चलना|

 

मौत नया जनम है ऐसा‚ ज्ञानीजन कहते हैं‚

यौवन में आए बेहतर है‚ उम्र ढले क्या मरना|

 

मौत पे मेरी तनिक न रोना‚ न कोई शोक मनाना‚

मुझको प्रेम नगर जाना है‚ विदा खुशी से करना|

 

मौत न होती तो हम कैसे‚ प्रेम नगर को जाते‚

न अपनों से बिछड़ना होता‚ और न उनसे मिलना|

 

मौत अपनी शुभचिंतक है‚ नए नए रूप दिलाए‚

हमको सॄष्टि की सैर कराए‚ उससे क्योंकर डरना|

2 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------