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अशोक कुमार वशिष्ठ की ग़ज़लें

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उसके नूर से ये मन रौशन‚
अंधियारों में भटकने वालो|

ग़ज़लें

-अशोक कुमार वशिष्ठ

 

ऐ दिल

अपने हर दर्द की‚ तू ही तो दवा है ऐ दिल

बददुआ भी तू‚ और तू ही दुआ है ऐ दिल।

 

तू जो रोता है‚ तो इतना भी‚ क्यों रोता है

तेरी खामोशी में‚ सारा मजा है ऐ दिल।

 

छोड़, दे अपनी तू‚ ये बेकार तमन्नाओं को‚

फिर तू जानेगा‚ तू कितना बड़ा है ऐ दिल।

 

तू जिधर देखेगा‚ जन्नत नजर आएगी उधर‚

तुझमें वो नूर‚ कुछ ऐसी कला है ऐ दिल।

 

खुदसे भागेगा तो तड़पेगा‚ पछताएगा‚

खुदसे जुड़ने में ही‚ तेरा भला है ऐ दिल।

 

जो तेरे पास है‚ दुनियां में कहीं और नहीं‚

खुदको पा लेगा तो‚ तू ही खुदा है ऐ दिल।

 

कोई अकेला नहीं जगत में

 

मुझे अकेला समझने वालो‚

नहीं अकेला चहकने वालो|

 

मुझमें मेरा यार भी रहता‚

थोड़ा समझो समझने वालो|

 

वो आंखों में और सांसों में‚

देखो‚ सुन लो बहकने वालो|

 

उसके नूर से ये मन रौशन‚

अंधियारों में भटकने वालो|

 

उसकी महक से महक रहा हूं‚

मद मदिरा से महकने वालो|

 

मुझमें वो और उसमें मैं हूं‚

बाहर से ही बहलने वालो|

 

कोई अकेला नहीं जगत में‚

गौर करो बस परखने वालो|

 

मौत से कैसा डरना

 

मौत तनको ही आती है‚ मौत से कैसा डरना‚

मिलन जुदाई एक खेल है‚ फिर आहें क्यों भरना|

 

मौत आती है आने दो‚ कहां ले जाए देखें‚

शायद बिछड़ों से मिलवा दे‚ जरा प्यार से चलना|

 

मौत नया जनम है ऐसा‚ ज्ञानीजन कहते हैं‚

यौवन में आए बेहतर है‚ उम्र ढले क्या मरना|

 

मौत पे मेरी तनिक न रोना‚ न कोई शोक मनाना‚

मुझको प्रेम नगर जाना है‚ विदा खुशी से करना|

 

मौत न होती तो हम कैसे‚ प्रेम नगर को जाते‚

न अपनों से बिछड़ना होता‚ और न उनसे मिलना|

 

मौत अपनी शुभचिंतक है‚ नए नए रूप दिलाए‚

हमको सॄष्टि की सैर कराए‚ उससे क्योंकर डरना|

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