-------------------

आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

अनुज नरवाल रोहतकी की ग़ज़लें

ग़ज़लें

krishna kumar ajnabi meriawaz

-अनुज नरवाल रोहतकी

 

खिचड़ी के चार यार

घी, पापड़, दही, अचार

 

बगुला भक्त दुनिया में

मुंह देखे का प्यार

 

कभी तोला, कभी मासा

जीवन का यही सार

 

नंगे से खुदा डरे, जब

नंगा नाचे बीच बाजार

 

न रही हैं न रहेंगी

इक म्यान में दो तलवार

 

दाम दीजे , दाम लीजे

दाम से चले संसार

 

नज़र मैली है सबकी

संभलके तुम रहना यार

 

जी हाजिरी की नौकरी

मन-मर्जी का व्यापार

 

सीधी-साधी बात है

नौ नकद न तेरह उधार

 

खाली दिमाग शैतान का घर

खाली से भला बेगार

 

साला खावे घर को

आला खावै दीवार

 

सुनो सबकी, करो मन की

‘अनुज‘ कहे यही बार-बार।।

------.

 

सोच और गहरा सोच

कुछ तो यार ताज़ा सोच

 

सर्द शब है लम्बी गहरी

कब होगा सवेरा सोच

 

हर तकल्लुफ़ हट जाएगा

खुदको तू मेरा सोच

 

इश्क करने वालो पर

होता है क्यूं पहरा सोच

 

अरमानों को मिलेगी मंजिल

हर पल तू कुछ नया सोच

 

जो सबने सोचा है

उससे कुछ न्यारा सोच

 

तनहाई में बैठकर अक्सर

दिनभर ‘अनुज‘ किया क्या सोच।।

 

-----.

सब्ज खेतों, उन ताजा हवाओं के जानिब

शहरों लौट चलो तुम गांवों के जानिब

 

शोर परेशां करने लगे, इससे पहले ही चलो

दस्त में कोयलों की सदाओं के जानिब

 

शर्तिया होगी तुम्हें नसीब जन्नत जीते जी

सर तो झुकाओं बुजुर्गों के पांवों के जानिब

 

तुम्हारा बीता बचपन तुम्हें ढ़ूंढ रहा है

जाकर देखो पीपलों की छावों के जानिब

 

भाईचारे की मिसालें मिलेंगी वहां बहुत

नज़र दौड़ाओगे अगर तुम गांवों के जानिब

 

भूल चुके हो तुम जिनको वो राह तुम्हारी तकते हैं

इक बार हो आओ उन मात-पिताओं के जानिब

 

नेता कम चोर-डकैत ज्यादा नजर आते हैं मुझको

देखता हूं जब इन भारतीय नेताओं के जानिब

 

घर के रहोगे न तुम घाट के ‘अनुज‘ रहोगे

ध्यान अगर लगाओगे इन हसीनाओं के जानिब।।

 

-------------.

 

इस नफरत को मार ही डालो

और उल्फत को तुम बचा लो

 

दरार-ए-ग़लतफ़हमी में यारो

मिट्टी तुम ऐतबार की डालो

 

आपस में तखल्लुफ नहीं अच्छा

हाथ छोड़ो दिलों को मिला लो

 

दैर-ओ-हरम का झगड़ा छोड़ो

इक मयखाना यहां बना लो

 

दुश्मनी में कुछ नहीं रक्खा

न यकीं तो इतिहास उठा लो

 

पहले खुदको आईना-सा बना लो

और आईने से आंख मिला लो ।।

-----.

संपर्क:

डॉ. अनुज नरवाल रोहतकी
454/33 नया पड़ाव, काठमंडी, रोहतक – 124001
 
(चित्र – कृष्ण कुमार अजनबी की कलाकृति)

टिप्पणियाँ

  1. अरमानों को मिलेगी मंजिल

    हर पल तू कुछ नया सोच

    vaha kya bat hai.likhate rhe.

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.