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अनुज नरवाल रोहतकी की ग़ज़लें

ग़ज़लें

krishna kumar ajnabi meriawaz

-अनुज नरवाल रोहतकी

 

खिचड़ी के चार यार

घी, पापड़, दही, अचार

 

बगुला भक्त दुनिया में

मुंह देखे का प्यार

 

कभी तोला, कभी मासा

जीवन का यही सार

 

नंगे से खुदा डरे, जब

नंगा नाचे बीच बाजार

 

न रही हैं न रहेंगी

इक म्यान में दो तलवार

 

दाम दीजे , दाम लीजे

दाम से चले संसार

 

नज़र मैली है सबकी

संभलके तुम रहना यार

 

जी हाजिरी की नौकरी

मन-मर्जी का व्यापार

 

सीधी-साधी बात है

नौ नकद न तेरह उधार

 

खाली दिमाग शैतान का घर

खाली से भला बेगार

 

साला खावे घर को

आला खावै दीवार

 

सुनो सबकी, करो मन की

‘अनुज‘ कहे यही बार-बार।।

------.

 

सोच और गहरा सोच

कुछ तो यार ताज़ा सोच

 

सर्द शब है लम्बी गहरी

कब होगा सवेरा सोच

 

हर तकल्लुफ़ हट जाएगा

खुदको तू मेरा सोच

 

इश्क करने वालो पर

होता है क्यूं पहरा सोच

 

अरमानों को मिलेगी मंजिल

हर पल तू कुछ नया सोच

 

जो सबने सोचा है

उससे कुछ न्यारा सोच

 

तनहाई में बैठकर अक्सर

दिनभर ‘अनुज‘ किया क्या सोच।।

 

-----.

सब्ज खेतों, उन ताजा हवाओं के जानिब

शहरों लौट चलो तुम गांवों के जानिब

 

शोर परेशां करने लगे, इससे पहले ही चलो

दस्त में कोयलों की सदाओं के जानिब

 

शर्तिया होगी तुम्हें नसीब जन्नत जीते जी

सर तो झुकाओं बुजुर्गों के पांवों के जानिब

 

तुम्हारा बीता बचपन तुम्हें ढ़ूंढ रहा है

जाकर देखो पीपलों की छावों के जानिब

 

भाईचारे की मिसालें मिलेंगी वहां बहुत

नज़र दौड़ाओगे अगर तुम गांवों के जानिब

 

भूल चुके हो तुम जिनको वो राह तुम्हारी तकते हैं

इक बार हो आओ उन मात-पिताओं के जानिब

 

नेता कम चोर-डकैत ज्यादा नजर आते हैं मुझको

देखता हूं जब इन भारतीय नेताओं के जानिब

 

घर के रहोगे न तुम घाट के ‘अनुज‘ रहोगे

ध्यान अगर लगाओगे इन हसीनाओं के जानिब।।

 

-------------.

 

इस नफरत को मार ही डालो

और उल्फत को तुम बचा लो

 

दरार-ए-ग़लतफ़हमी में यारो

मिट्टी तुम ऐतबार की डालो

 

आपस में तखल्लुफ नहीं अच्छा

हाथ छोड़ो दिलों को मिला लो

 

दैर-ओ-हरम का झगड़ा छोड़ो

इक मयखाना यहां बना लो

 

दुश्मनी में कुछ नहीं रक्खा

न यकीं तो इतिहास उठा लो

 

पहले खुदको आईना-सा बना लो

और आईने से आंख मिला लो ।।

-----.

संपर्क:

डॉ. अनुज नरवाल रोहतकी
454/33 नया पड़ाव, काठमंडी, रोहतक – 124001
 
(चित्र – कृष्ण कुमार अजनबी की कलाकृति)
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अरमानों को मिलेगी मंजिल

हर पल तू कुछ नया सोच

vaha kya bat hai.likhate rhe.

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