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कवि कुलवंत के दो गीत

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गीत

- कवि कुलवंत सिंह

 

अभिलाषा

बन दीपक मैं ज्योति जगाऊँ

अंधेरों को दूर भगाऊँ,

दे दो दाता मुझको शक्ति

शैतानों को मार गिराऊँ ।

 

बन पराग कण फूल खिलाऊँ

सबके जीवन को महकाऊँ,

दे दो दाता मुझको भक्ति

तेरे नाम का रस बरसाऊँ ।

 

बन मुस्कान हंसी सजाऊँ

सबके अधरों पर बस जाऊँ,

दे दो दाता मुझको करुणा

पाषाण हृदय मैं पिघलाऊँ ।

 

बन कंपन मैं उर धड़काऊँ

जीवन सबका मधुर बनाऊँ,

दे दो दाता मुझको प्रीति

जग में अपनापन बिखराऊँ ।

 

बन चेतन मैं जड़ता मिटाऊँ

मानव मन मैं मृदुल बनाऊँ,

दे दो दाता मुझको दीप्ति

जगमग जगमग जग हर्षाऊँ ।

 

 

आओ दीप जलाएँ

आओ खुशी बिखराएँ छाया जहां गम है ।

आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥

 

एक किरण भी ज्योति की

आशा जगाती मन में;

एक हाथ भी कांधे पर

पुलक जगाती तन में;

आओ तान छेड़ें, खोया जहाँ सरगम है।

आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥

 

एक मुस्कान भी निश्छल

जीवन को देती संबल;

प्रभु पाने की चाहत

निर्बल में भर देती बल;

आओ हंसी बसाएँ, हुई आँखे जहां नम हैं।

आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥

 

स्नेह मिले जो अपनो का

जीवन बन जाता गीत;

प्यार से मीठी बोली

दुश्मन को बना दे मीत;

निर्भय करें जीवन जहाँ मनु गया सहम है।

आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥

 

कवि कुलवंत सिंह

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dono geet bahut sundar hai,jaise charon aur aasha ke deep jagmagaye ho badhai

Dono geet behad achchey hain..
बन कंपन मैं उर धड़काऊँ

जीवन सबका मधुर बनाऊँ,

दे दो दाता मुझको प्रीति

जग में अपनापन बिखराऊँ
bahut hi umda bhaav hain.

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