के. पी. सक्सेना के दो व्यंग्य

किसान...बैल, और...

आदमी और जानवर के बीच का सांस्कृतिक अन्तर जानते हैं आप ? नहीं जानते होंगे। मै बताता हूँ।...मोटे तौर पर अगर कोई जानवर मनुष्यों जैसा कर्म कर बैठे तो रातों रात प्रसिद्ध हो जाता है...खबरों में आ जाता है।...इसके विपरीत, आदमी जानवरों जैसा आचरण करता रहे तो इसे कोई खास खबर नहीं माना जाता।...आदमी के सारे गुनाह माफ हैं, क्योंकि जुर्म भी आदमी ही करता है और कानून भी आदमी ही बनाता है। ...आपको एक बैल की सच्ची श्री कथा सुना रहा हूं।...सुनिये और जन-तांत्रिक ढंग से गुनिये।...

भिन्ड (ग्वालियर) के इलाके में एक किसान अनाज बेचकर नोटों की मोटी गड्डी लाया। अपनी इस कमाई को सुरक्षित रखने के लिए, नोटों को भूसे के ढेर में दबा दिया। किसान जी की वाइफ ने रोजाना के नियमानुसार भूसा बैलों को डाला और साथ ही नोटों की गड्डी भी बैल महोदय के लंच में चली गई। बैल जी थके माँदे खेत से लौटे थे, सो दनादन भूसा खाना शुरू कर दिया। मालूम तब हुआ जब यान (चारे की जगह) की सफ़ाई करते समय नोटों के चबाये और अध चबाये टुकड़े पड़े मिले। बैल चुपचाप जुगाली कर रहा था और मुंह से नोटों के टुकड़े बह रहे थे। किसान जी माथा पीट कर रह गये। बैल जी निर्दोष खड़े थे।

इस सत्य कथा से सरकारी निष्कर्ष यह निकलता है कि आप अपने पैसे बैंक-पोस्ट आफिस में जमा करो और देश की तरक्की में योगदान दो। ...मेरे पास चूंकि आम हिन्दुस्तानी की तरह जमा करने के लिए पैसे ही नहीं बचते, सो मैं इस पूरे प्रसंग पर जरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चिन्तन कर रहा हूं। बैल क्या हैं ?...नोट क्यों है ?...चारा किसे कहते हैं ? वगैरा-वगैरा..इतना तो आपने किताबों में पढ़ा ही होगा कि हमारा भारत एक कृषि प्रधान और राजनीति प्रधान देश है। दोनों ही क्षेत्रों में बैलों की कमी नहीं है।...बैल उस पशु को कहते हैं जो चुपचाप आंखें मिलाये बगैर माल डकार लेता है और सिर झुकाये जुगाली करता रहता है।...उसके सम्बन्ध में कौन क्या कह रहा है, इसका बैल की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। एकदम निर्विकार...सीधा सादा।...खेती से 'भूतपूर्व' हो जाने के बाद भी बैल संचित माल की जुगाली करता रहता है।...उसे किसी की कटु आलोचनाओं की कोई चिन्ता नहीं।...जो चाहे कमीशन बिठा दे।...

अब प्रश्न यह उठता है कि जब एक-से-एक हाई पावर भूतपूर्व बैल नोटों की गड्डियाँ पर गड्डियाँ डकार गया और जुगाली तक न की तो फिर इस बेचारे भिन्ड के बैल को बदनाम करने से क्या हासिल। ...इसे परम्परा क्यों नहीं मान लिया जाता कि जो बैल है उसे नोट डकारने का हक है।...

आप भाई साहब, पिछले ३६ वर्षों का इतिहास और गणित उठाकर देख लो कि कितना किसान के हिस्से में आया, कितना बैलों के ? बैल हमेशा किसान के आगे-आगे चलता है। आगे चलने वाले का हिस्सा भी ज्यादा हो सकता है। किसान माथा पीट कर रह जाता है कि काश वह एक विशेष किस्म का 'सफेद बैल' हो जाता और उसे भी नोट चबाने की सुविधा रहती।...होटल एग्री-कल्चर पर निगाह डालें, आप! किसान वहीं का वहीं है...जमीन वहीं की वहीं हैं...बैल अपनी घण्टी बजाता हुआ आगे बढ़ गया है।...ग्रामसभा से कमेटी...कमेटी से असेम्बली, असेम्बली से संसद...संसद से...जाने कितने ही खेत-खलिहान लांघ गया बैल। किसान की आँख में अब भी उतने ही आंसू हैं जितने गाँधी बाबा या लार्ड कर्जन के टाइम में थे...बल्कि कुछ ज्यादा ही।

मैं यहाँ पर उन किसानों की बात नहीं कर रहा हूँ जिन्हें कृषि विकास प्रदर्शनियों के पोस्टरों में बीवी बच्चों के साथ हंसते गाते दिखाया जाता है। वे सब नुमायशी और काल्पनिक किसान हैं जो सिर्फ पोस्टरों पर सजते हैं... हल नहीं चलाते...उधर हर बैल हर किसान से अधिक पावरफुल होता है।...बैल बनते ही वह अपनी शक्ति आँक लेता है और किसान के भूसे के साथ-साथ उसके नोट भी चबा लेता है। किसान खामोश रहता है। वह जानता है कि इतिहास हमेशा बैलों से बनता है...किसानों से नहीं।

बैल की एक खास खूबी यह भी होती है कि चाहे वह किसी रंग का हो, खुद को किसानों का सच्चा हमदर्द कहता है।...किसान घबरा जाता है कि बैलों की इस भीड़ में सच्चा बैल कौन है।...उसकी आत्मा जानती है कि चाहे कोई सा भी बैल क्यों न हो चारे के साथ उसके नोट जरूर चवायेगा। फिर भी किसान रैली में जाता है और भेंट देकर लौट आता है। वह जानता है कि बैलों से उसका जनम-मरन का नाता है।...बैल ही उसका भाग्य विधाता है।...

मैंने यूंही बाई द वे, भिन्ड वाले बैल साहब से पूछा कि जनाब, आपने गरीब किसान की साल भर की कमाई क्यों चबा डाली ?...बैल साहब मुस्कराये ओर बोले-'चबाना और सींग मारना हमारी आदत है।...हम नहीं चबाते तो कोई दूसरा बैल चबा जाता।...किसान को नोटों की गड्डी की क्या जरूरत ? उसे सिर्फ अपना कर्म करना चाहिए और फल 'बैलों'के लिए छोड़ देना चाहिए, यही कृषक धर्म है ! जमींदारी युग से यही चला आ रहा है !...किसान के पास यदि नोट सही सलामत रह गये तो हम बैलों को पूछेगा कौन ?..वह ट्रैक्टर नहीं खरीद लेगा ?...श्री बैल के ऐसे श्रीवचन सुनकर बैलों के प्रति मेरी आस्था और भी बढ़ गई!...किसान का क्या? उसका यही धर्म है कि हर सुबह पीपल पर उगते सूरज की रोशनी में नई फसल का ख्वाब देखे और हम डूबते सूरज के साथ अपने सपने दफन कर दें !...उसे अपनी सारी उम्र बैलों के चारे का बन्दोबस्त करते हुए ही गुजारनी है !

इन दिनों 'बैल' और भी सक्रिय हो उठते हैं और अपनी आस्मानी हमदर्दी ऊपर से बरसाने लगते हैं।...किसान कृतज्ञ हो उठता है कि बैलों की हमदर्दी उसके साथ है !...बैलों की आंख़ों में भी आँसु हैं ! उसे और क्या चाहिये ?... मेरा ख्याल है कि अब आप आदमी और जानवर...किसान और बैल के बीच का फर्क समझ गये होंगे ! अत: भिन्ड के बैल ने किसान के नोट चबाकर सिर्फ अपना बैल धर्म निभाया है !...दोष किसान का है ! नोट भूसे में क्यों रखे?...क्या वह जानता था कि इन नोटों पर उसका कोई हक नहीं है ? क्या उसे पता था कि नोट अन्तत: 'बैल' के हवाले ही होने हैं। बैल से मैं बातचीत कर चुका हूँ...किसान का इटंरव्यू बेकार है !... सब कुछ दे चुकने बाद किसान इंटरव्यू देने लायक नहीं रह जाता है !

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चन्दनवुड चिल्ड्रन स्कूल...!

आँख मुलमुल...गाल...गुलगुल...बदन थुलथुल, मगर आवाज बुलबुल ! वे मात्र वन पीस तहमद में लिपटे, स्टूल पर उकडूं बैठे, बीड़ी का टोटा सार्थक कर रहे थे ! रह-रह कर अंगुलियों पर कुछ गिन लेते और बीड़ी का सूंटा फेफड़ों तक खींच डालते थे! जहां वे बैठे थे वहाँ कच्ची पीली ईंट का टीन से ढका भैंसों का एक तवेला था ! न कोई खिड़की न रौशनदान ! शायद उन्हें डर था कि भैंसें कहीं रोशनदान के रास्ते ख़िसक ने जाएं ! सुबह सवेरे का टाइम था और भैंसें शायद नाश्तोपराँत टहलने जा चुकी थीं ! तवेला खाली पड़ा था ! उन्होंने मुझे भर आँख देखा भी नहीं और बीड़ी चूसते हुए अंगुलियों पर अपना अन्तहीन केल्क्यूलेशन जोड़ते रहे !...

मैंने उनसे सन्दलवुड चिल्डन स्कूल का रास्ता पूछा तो उनकी आंखों और बीड़ी में एक नन्ही सी चमक उभरी !...धीरे से अंगुली आकाश की ओर उठा दी गोया नया चिल्ड्रन स्कूल कहीं अन्तरिक्ष में खुला हो ! मगर मैं उनका संकेत समझ गया ! नजर ऊपर उठाई तो तवेले की टीन के ऊपर एक तख्ती नजर आई, जिस पर गोराशाही अंग्रेजी में कोयले से लिखा था-दि सन्दलवुड चिल्ड्रन स्कूल !...प्रवेश चालू ! इंगलिश मीडियम से कक्षा ६ तक मजबूत पढ़ाई ! प्रिन्सिपल से मिलें !...

'तख्ती पढ़कर मैं दंग रह गया !...यही है चंदन लकड़ी स्कूल ?...चंदन दर किनार, कहीं तारपीन या कोलतार तक की बू नहीं थी ! मेरी मजबूरी अपनी जगह थी ! मुहल्ले के गनेशी लाल के पोते के दाखले की जिम्मेदारी मुझ पर थी ! खुद गनेशी लाल उम्र भर पढ़ाई लिखाई की इल्लत से पाक रहे और अपने बेटे को भी पाक रखा ! सिर्फ गुड़ की किस्में जान लीं और खान्दानी कारोबार चलाते रहे ! मगर पोता ज्यों ही नेकर में पांव डालने की उम्र को पहुंचा, उनकी पतोहू ने जिद पकड़ ली कि छुटकन्ना पढ़ि़ है जरूर, और वह भी निखालिस इंगलिश मीडियम से !...उसकी नजर में हिन्दी मीडियम से पढ़ने से बेहतर है कि गुड़ बेच ले !

पतोहू ने अपने मैके में देखा कि अंग्रेजी मीडियम से पढ़े छोकरे कैसे फट-फट आपस में इंगलिश में गाली गलौज करते हैं !...एक स्मार्टनेस सी रहती है सुसरी !...चुनांचे गनेशी लाल मेरे पीछे पड़ गये कि छोकरे को कहीं अंग्रेजी मीडियम में डलवा ही दूं !...उधर जुलाई-अगस्त की झड़ी लगते ही चिल्ड्रन स्कूलों में वह किच-किच होती है कि आदमी अपना मरा हुआ बाप भले ही दोबारा हासिल कर ले, मगर बच्चे को स्कूल में नहीं ठूंस सकता !...

अंग्रेजी के 'डोनेशन' और हिन्दी के 'अनुदान' का फर्क इसी वक्त समझ में आता है आदमी को ! अनुदान के बीस रूपयों में बच्चा हिन्दी मीडियम में धंस जाता है, मगर डोनेशन तीन अंकों से नीचे होता ही नहीं !...अंग्रेजी की ग्रेटनेस का पता यहीं पर चलता है ! खैर...! शिक्षा सन्दर्भ में यह एक अच्छी बात है कि बारिश में फूली लकड़ी पर उगे

कुकुरमुत्तों की तरह, जुलाई-अगस्त में चिल्ड्रन स्कूल भी दनादन उग आते हैं ! हर गली-मुहल्ले में भूतपूर्व लकड़ी की टालों और हलवाईयों की दुकानों पर नर्सरी मोन्टेसरी स्कूलों के बोर्ड टंग जाते हैं ! हर साइन बोर्ड का यही दावा होता है कि हमारे यहाँ बच्चा माँ की गोद जैसा सुरक्षित रहेगा और आगे चलकर बेहद नाम कमायेगा !...ऐसे ही दुर्लभ तथा नये उगे स्कूलों में 'सन्दल वुड चिल्ड्रन स्कूल' का नाम भी मेरे कान में पड़ा था !

नाम में ही चंदन सी महक और हाली-वुड जैसी चहक थी !...और अब मैं टीन जड़ीत, रोशनदान रहित उसी स्कूल के सामने खड़ा था !... बीड़ी तहमद वाले थुलथुल सज्जन ने आखिरी कश खींच कर बीड़ी को सदगति तक पहुंचाया, और तहमद के स्वतन्त्र कोने से मुंह पोंछ कर आंखों ही आंखों में पूछा कि क्या चाहिए ?...मैंने दोनों हाथों से बच्चे का साइज बताया और धीरे से पूछा कि प्रिंसिपल कहाँ हैं...कब उपलब्ध होंगे ? वे भड़क गये ! गुर्रा कर बोले-'हम आपको क्या नजर आवे हैं ? टाई-कमीज अन्दर टंगी है तो हम प्रिन्सिपल नहीं रहे ? जरा बदन को हवा दे रहे थे ! आप बच्चा और फीस उठा लाइए ! भर्ती कर लेंगे ! '

मैं सटपटा गया और इस बार उन्हें उस ढंग से अभिवादन पेश किया जिस ढंग से अमूमन अंग्रेजी मीडियम से होता है ! यह पूछने पर कि बाकी टीचिंग स्टाफ कहाँ है, उन्होंने बताया कि बाकी का स्टाफ भी वह खुद ही हैं ! क्लास थ्री स्टाफ भी, और क्लास फोर (झाडू, पोंछा, सफाई) भी !...दो अदद लेडी टीचस भी हैं, जिनमें से एक उनकी मौजूदा पत्नी हैं और दूसरी भूतपूर्व ! फिलहाल दोनों घर में लड़ाई-झगड़े में मसरूफ हैं ! चट से टीचिंग सेशन शुरू होते ही आ जाएगी !...अभी कुल तेईस बच्चे नामजद हुए हैं ! पच्चीस पूरे होते ही ब्लैक बोर्ड मंगवा लेंगे और पढ़ाई जो है उसे शुरू करवा देंगे !...मुझे तसल्ली हुई ! डरते-डरते पूछा-खिड़कियां, रोशनदानों, पंखों और बैंचों वगैरा का झंझट आपने क्यों नहीं रखा ?'...

वे दूरदर्शी हो गए !...आप चाहते हैं कि बच्चों को अभी से आराम तलब बना दें ?... ग्लासगो कभी गए हैं आप ? वहाँ के सन चालीस के पैटर्न पर हमने स्कूल शुरू किया है ! बच्चों को, उसे क्या कहते हैं...हां...हार्डशिप की आदत डालनी होगी !...फिर धीरे-धीरे सब कुछ हो जइहे !...अगले साल रोशनदान खुलवा देंगे...फिर अगले साल पंखों वगैरा की देखी जाएगी !...पईसा चाहिए, कि नाहीं चाहिए ?...पच्चीस बच्चों की फीस लईके सुरू में ही आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी खोल दें का ?...टाइम पास होते-होते सब कुछ हुई जयिहे !...बच्चा ले आवो !...दो ही सीटें बची हैंगी !...

'सो साहब, चंदन वुड चिल्ड्रन स्कूल के प्रधानाचार्य के श्रीवचन सुनकर मैं काफी से भी अधिक प्रभावित हुआ ! सारी हिम्मत बटोर कर एक अन्तिम प्रश्न पूछा- 'माहसाब ! वैसे तो अपने इण् डिया में चारे-भूसे की कमी चाहे भले ही हो, मगर बच्चों का टोटा नहीं है ! फिर भी मगर दो बच्चे और न हाथ लगे तो क्या आप स्कूल डिजाल्व कर देंगे ?' वे पुन: भड़क गये !...आये गए सूबे-सूबे नहूसत फैलाने !... जिस भगवान ने तेईस बच्चे दिये, वह दो और नाहीं भेजिहे का ? डिजालव कर भी दें तो कौन सी भुस में लाठी लग जईहे ?...पहले इस टीन में पक्के कोयला कर गुदाम रहा !...सोचा कि इस्कूल डाल लें ! डाल लिया !...इन्ते पढ़े लिखे हैंगे कि कक्षा ६ तक पढ़ाये ले जावें ! नाहीं चल पईहे इस्कूल तो कोयले का लैसंस कोई खारिज हुई गवा है का ?...लपक के बच्चा लै आओ !...' मैं लपक कर चल पड़ा !...

रास्ते भर प्रधानाचार्य की उस अंग्रेजी से प्रभावित रहा जो एक फिल्मी गाने 'आकाश में पंछी गाइंग...भौरां बगियन में गाइंग' जैसी थी ! मास्साब दूर तक टकटकी बांधे मुझे उम्मीदवार नजरों से देख रहे थे, गोया कह रहे हों-बच्चा लईहे जरूर ! जईहे कहां ? इधर मैं यह सोच रहा था कि गनेशी लाल के पोते के भविष्य के लिए गुड़ बेचना मुनासिब रहेगा या सन्दलवुड चिल्ड्रन स्कूल में अंग्रेजी मीडियम से शिक्षा अर्जित करना ?...

(नोट-यदि किसी स्कूल का नाम यही हो, तो अन्यथा न लें ! नाम काल्पनिक है !...)

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(टीडीआईएल के हिन्दी पाठ कार्पोरा से साभार)

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