सोमवार, 30 जून 2008

केदारनाथ अग्रवाल का आलेख : गीत और कविता

गीत भी कविता की अनेक विधाओं में से एक विधा है। इस विधा में व्यक्त हुई कविता गेय होती है। इसलिए गीत की पहचान उसकी गेयता में निहित होती है। इसलिए गीत तभी गीत है जब वह गेय हो। इसलिए जो कविता गेय नहीं है वह गीत नहीं है। कविता के गेय होने का मतलब है कि उसमें गान के तत्त्व हैं और वह गायी जा सकती है।

गान के वह तत्त्व, जो कविता को गेयता प्रदान करते हैं, वह उसकी लय में प्रवाहित रहते हैं और लय में प्रवाहित रहना ही उनका अचूक धर्म और आचरण है। इसलिए बिना गान के तत्वों की लय की कविता गीत नहीं हो सकती। गान के वह तत्व-लय में प्रवाहित वह तत्त्व-गीत में सन्नद्व शब्दों की व्यवस्था कायम किये रहते हैं। वह व्यवस्था स्वर-मुखर व्यवस्था होती है। उस स्वर-मुखर व्यवस्था में व्यंजनों के उच्चारणों के रूप (आकार) प्रतिष्ठित रहते हैं।

उच्चारणों के इन्हीं रुपों की संहति लय का नाम पाती है। उस संहति में आदमी की साँस की एक निश्चित लम्बान-चौड़ान और ऊँचान-नीचान होती है। उस संहति में सन्नद्ध शब्दों के अक्षर-अक्षर के बीच का अन्तराल ह्रस्व और दीर्घ स्वरों से भरा रहता है और इसी प्रकार शब्द-शब्द के बीच का अन्तराल भी वैसे ही स्वरों के भराव से भरा रहता है। यदि स्वरों का भराव न हो तो अक्षर-अक्षर के बीच की दूरी तय करना कठिन होगा। ऐसे भराव के अभाव में शब्द-शब्द के बीच की दूरी भी तय करना कठिन होगा। इसलिए गेयता और कुछ नहीं, गीत की गतिमयता है।

गीत की यह गतिमयता जब स्वरों के भराव से एक सुनियोजित क्रम-बद्वता पा लेती हैं तब संगीतात्मक हो जाती है। संगीतात्मक हो जाने का मतलब है कि गीत को उसका सुनियोजित प्रवाह किया जाता है और वह गाया जा सकता है। कोई भी कभी उसे गाये तो उसे उसी प्रवाह से गाना होगा। उस प्रवाह की दिशा निर्धारित दिशा होती है।

निर्धारित दिशा से उच्चारित होकर ही गीत ग्रहणीय होता है और ग्रहण करने वाले पर अपना प्रभाव डालता है। लेकिन गीत मात्र-संगीत की अभिव्यक्ति या इकाई नहीं होता। जो गीत मात्र-संगीत की अभिव्यक्ति या इकाई होता है वह काव्य का गीत नहीं होता। वह तो मात्र ध्वनियों का नियोजित प्रवाह होता है। काव्य के गीत और संगीत के गीत का यह स्पष्ट अन्तर कभी भी अवहेलित करने योग्य नहीं है।

काव्य के गीत में कथ्य का होना अनिवार्य है। यह भी अनिवार्य है कि वह कथ्य शब्द और अर्थ की संश्लिष्ट और संयुक्त इकाई होकर दूसरों के लिए अभिव्यक्तिशील हो जाय। संगीतात्मकता काव्य के गीत की लय को अधिक स्वर-मुखर बनाती है और अपने सूक्ष्म अमूर्तन से कथ्य को अधिक स्पंदनशील कर देती है। यह नहीं, कथ्य को कविता के तत्त्वों के अलावा भी संगीत का एक और आयाम सुलभ हो जाता है।

उस आयाम से कविता का कथ्य गीत के रूप में ढल जाता है। ऐसे ढलने में-गीत का रूप पाने में-कविता में आकाश तत्त्व अधिक आ जाता है और इस तत्त्व के समाहित होने से वह, साधारण कविता से कहीं अधिक मात्रा में ध्वनिपरक होकर दूर-दूर तक देश-काल और मानव-मस्तिष्क में व्याप्त हो जाती है और अपना चेतन और अचेतन प्रभाव दीर्घकाल तक डाले रहती है। निश्चय ही गीत की गतिमयता का गेयता का संगीतमयता का यह तत्व गीत के कथ्य को व्यंजित करने वाले शब्दों के संघटन से निरुपित और निबद्ध होता है।

गीत के कथ्य को व्यंजित करने वाले शब्द भी उसकी गतिमयता-गेयता-संगीतमयता के तत्व से संघबद्व होने के लिए विवश होते हैं और समर्पित होते हैं और तब कहीं वह संघटन का कृतिरूप पाते हैं। मतलब यह कि गीत का कथ्य तत्त्व और गेय तत्त्व एक-दूसरे के नियामक और निर्धारक होते हैं। उनमें एक-दूसरे के प्रति प्रगाढ़ आत्मीयता होती है।

एक के बिना दूसरा जी नहीं सकता, पूरा विकास नहीं पा सकता। एक का पर्यवसान दूसरे का पर्यवसान होता है। इसलिए गीत के गेय-तत्त्व की, गीत से अलग, उसके कथ्य से अलग, व्याख्या करना मूलभूत भूल होगी। वैसे ही गीत के कथ्य-तत्व की, गीत से अलग, उसकी गेयता से अलग, व्याख्या करना मूलभूत भूल होगी। उन दोनों तत्वों का आकलन उनके संयुक्त और संपुष्ट रूप में ही करना होगा। गीत अपने जिस रूप और अर्थ में आज गीत स्वीकार किया जाता है अपने उस रूप औऱ अर्थ में वह पहले स्वीकार नहीं किया जाता था।

कारण यह था कि पहले कभी वह सम्भावनाएँ उत्पन्न नहीं हुई थीं जो सम्भावनाएँ आज उत्पन्न हो चुकी हैं और गीत को अपने अनुरूप गढ़ रही हैं। गीत भी अपने रूप और अर्थ के लिए उतना ही परिवेश पर निर्भर होता है जितना आदमी और आदमी के कर्म और भाव और विचार।

इतिहास की युगीन प्रवृत्तियाँ आदमी के युग-बोध को और उसकी कला-क्षमता को अधिक-से-अधिक प्रभावित करती हैं। गीतकार का व्यक्तित्व अपने युग के इतिहास की सीमाओं में बनता है। यदि गीतकार सशक्त और समर्थ हुआ तो उसका व्यक्तित्व भी अपने युग के इतिहास को बनाता है। वैसे, साधारणतया, वस्तु-स्थिति यही रहती है कि गीतकार अपने युग से प्रभावित रहा करता है और जो गीत वह देता है अपने युगबोध के अनुरूप ही देता है।

गीत के कथ्य और शिल्प दोनों ही युगबोध को ही रुपायित किये रहते हैं। पहले, यानी बहुत पहले, हिन्दी में कविता ही गायी जाती थी। वह कविता, चाहे मात्रिक हो या वर्णिक, इसका कोई असर उसके गाये जाने में नहीं पड़ता था। उसे संगीतज्ञ गाते थे। साधारणजन भी उसे अपनी क्षमता के अनुसार गाने की तरह गुनगुना लेते थे। वाद्ययंत्रों के साथ भी वह गायी जाती थी।

तब इस बात का भी ध्यान नहीं रक्खा जाता था कि गेय कविता को वर्णना-त्मक या तथ्यपरक न होना चाहिए बल्कि उसे आन्तरिक मनोवेगों की अभिव्यक्ति करना चाहिए। गायक का कंठ उन कविताओं को अपने संगीत से बाँध लेता था। वह ताल और तान से निबद्ध होकर गेयता का तत्त्व पा लेती थी। जब वह गायी नहीं जाती थी तब वह मात्र छंद रहती थी। कवित्त और सवैये भी बड़ी खूबी से संगीतपरकता पा लिया करते थे। तब छंदों से अलग गीत का अपना निजी अस्तित्व न था। यह भी होता था कि संगीत की रागिनियों में-रागों में कुछेक कुशल गायक कुछ कथ्य समाहित कर लेते थे और उन्हें ही संगीत की कृति के रूप में उनके अनुयायी शिष्य गा-बजा लेते थे।

तब भी लोक गीत थे। परन्तु वह काव्य के अन्तर्गत नहीं आते थे। काव्य की मान्यताएँ उनके प्रतिकूल थीं। अतएव वह लोक गीत जनसाधारण के दैनिक जीवन के विशेष अवसरों से जुड़ कर कंठ-कंठ से निकलते रहे और लोकमानस का मनोरंजन करते रहे। उन्हें तब तक साहित्यिक प्रतिष्ठा नहीं मिली थी। कविगण काव्य के सिद्धान्तों के आधार पर ही कविताओं का सृजन करते रहे। वह लोग लोक धुनें लेकर कविता की रचना करने में संलग्न नहीं हुए। वह कविताएँ देवी-देवताओं से सम्बन्धित हों या निराकार या साकार ब्रह्म से हों अथवा प्रेमी ईश्वर और प्रेयसी आत्मा से हों सब-की-सब काव्य की मूल मान्यताओं के मानदण्ड पर ही आधारित होती थीं।

"आल्हा" भी ढोलक और मृदंग के साथ गाँव-गाँव में गाया जाता था। वीर रस के निरूपण में छंद-के-छंद शब्दों की ध्वनियों से झनझना उठते थे। तेग-तलवार की चाल और चमक बिजली को भी मात करने में सक्षम होती थी। सेनाओं की उमड़-घुमड़ को और उनके वेग और बल को घनघोर बरसात के बादलों की घटा का घमंड भी नहीं लजा सकता था। वीर योद्धाओं की मूर्तियाँ ऐसी गढ़ी जाती थीं कि स्वयं वीर की मूर्ति तक तुच्छ जान पड़ने लगती थी।

युद्ध-स्थल के वर्णनों में भी अपरिमित काव्य-कौशल का परिचय दिया जाता था। वीर रस के कथ्य में यही सब व्यंजित होता था। उसके कथ्य के छंदों को चारण कवि और संगीतज्ञ गा-बजा कर गीत-जैसा अस्तित्व दे देते थे। रसराज श्रृंगार को प्रतिष्ठित किये छंद भी अपने कथ्य में अनेकानेक नायक-नायिकाओं की मुद्राओं को ही समाहित किये रहते थे। नायक लोभी, लालची, रूपासक्त, वासना-विलास -भोगी होते थे।

नायिकाएँ काम-कला की सार्थकता सिद्ध करने में अपने सम्पूर्ण आंगिक, वाचिक और मानसिक अस्तित्व का खुला कामुक प्रदर्शन करती थीं। छंद-के-छंद उनके देह-सौन्दर्य की यष्टि बन जाते थे। प्रकृति उनके रमण करने के लिए ही उद्दीपित दिखायी जाती थी। यह छंद भी बड़े चाव से सुमधुर कंठों से राजदरबारों में गाये-बजाये जाते थे।

इन छंदों के अतिरिक्त भी सूर, तुलसी, मीराँ और कबीर के पद भी गाये-बजाये जाते थे। वह सब अब भी लोक जीवन में, गाँव-गाँव में, मधुर स्वर से गूँजते पाये जाते हैं। इन पदों को ही आज के गीत का पूर्वज कहना न्यायसंगत होगा। वे ही तब गेय तत्वों को पाकर हवा में तैरते पाये जाते थे और वे ही नर-नारी (दोनों) के कंठों से निकल कर मन की व्यथा-मन का अनुराग-मन की दीनता-आत्मसमर्पण-आराध्य के प्रति आराधना-आदि सूक्ष्म मनो-भावनाएँ व्यक्त कर रहे थे। वे भक्त को भगवान् से जोड़ते थे। वे दीन-हीन को जीने की आस्था देते थे। राम, रहीम और कृष्ण उनमें ही निरूपित हो-कर जन-मानस के ह्रदयेश्वर बन गये। उनकी लीलाओं से वलयित वे पद केवल गेय होकर ही देश-काल में गूँजते रहे।

पद वास्तव में, उस युग के गीत हैं। गेयता में उनकी बराबरी छंदों में लिखी और गायी गयी कविताएँ नहीं कर सकीं-नहीं कर सकीं। काव्य की पारम्परिक रुढ़ियाँ पदों में भी आयीं पर उस सीमा तक नहीं जिस सीमा तक वे और कविताओं में आयीं। पद फिर भी सहजता, स्वाभाविकता और निश्छलता से छलकते रहे। इसीलिए वे जनता के गले लगे रहे और आज भी गेय बने गुनगुनाये जाते हैं। गेय पद अगेय छंद-बद्ध कविताओं से कोई बातों में भिन्न और विशिष्ट होते थे। गेय पदों की बुनावट अन्य कविताओं की बुनावट से गझिन कम और आत्मपरक अधिक होती थी। गझिन कम की बुनावट के पद साधारणतया आदमी की सहज स्वाभाविक प्रवृत्तियों के पद होते थे। उनके बनाने वाले काव्य के सिद्धान्तों के आचार्य नहीं होते थे।

पदों के रचयिता जीवन भोगते थे और अपने भोगे हुए जीवन को जीवन की वाणी में व्यक्ति करते थे। इसके विपरीत काव्य की रीतियों के अनुगामी कवि जीवन को उन रीतियों के सन्दर्भ में देखते, सुनते, समझते और पकड़ते थे और उन्हीं के सन्दर्भ में उसे विशिष्ट बना कर कविता का रूप देते थे। इस वजह से गेय पदों में जीवन की झाँकी कुछ और ही होती थी और अगेय छंद-बद्ध कविताओं में कुछ और ही होती थी।

काव्य की रीतियाँ, काव्य के सिद्धान्त, काव्य के अलंकरण, काव्य के संस्कार-सब कुछ आदमी की सहज वृत्तियों की प्राकृत स्थिति में मूलभूत परिवर्तन कर देते थे। परिणाम यह होता था कि आदमी की सहज वृत्तियाँ व्यक्त होकर आदमी की सहज बोधगम्यता से दूर चली जाती थीं और विशिष्ट व्यक्तियों की सम्प्रेषणीयता पा लेती थीं। तभी अगेय छंद-बद्ध कविताओं की सम्प्रेषणीयता गुणज्ञ सामाजिकों की रुचि को तुष्ट करती थी। पदों की सम्प्रेषणीयता जन-साधारण की रुचि को पुष्ट करती थी।

जब राज-दरबार में काव्य-गोष्ठी होती थी तब वाणी का वैभव-विलास राजा की राजकीय मनोवृत्तियों की पुष्टि के लिये होता था। उस राज-दरवार का सम्पर्क जनता के जीवन से नहीं होता था। अतएव पदों का वाचन और पाठन राज-दरबारों में नहीं होता था। अतएव पदों के नायकों को राज-दरबार का कवि नहीं बनाया जाता था। जनता ही-राज-दरवर से बाहर-उन पदों के गायकों को आश्रय देती थी और उसी में रह कर उसी के सुख-दु:ख में वह डूबे रहते थे। हाँ, मंदिरों के प्रांगणों में भी उन्हें अपने पद गाने का सुअवसर सुलभ होता था।

जब पद-गायक किसी देवस्थान से सम्बद्ध हो जाता था तब उसके पदों में धर्म-विशेष की छाप भी पड़ने लगती थी और तब ऐसी स्थित में उसके पदों से मानवीय प्राकृत सहजता विलुप्त होने लगती थी। चाहे राज-दरवार हो-चाहे देवस्थान-वहाँ पहुँच कर कवि सहज स्वाभाविक वृत्तियों का कवि नहीं रह जाता था। इसीलिए गेय पदों में भी बहुत-से ऐसे पद मिलेंगे जो धर्म के संस्कारों से संस्कृत हो चुके हैं और अपने मूल-गेय स्वरूप से दूर पहुँच चुके हैं।

धार्मिकता पदों की गेयता को धार्मिक संस्थानों की अपनी मान्यताओं से दूसरे प्रकार की गेयता में बदलती देखी गयी है। उस बदली गेयता में जो मानवीय प्रवृत्तियाँ व्यंजित होती देखी गयी हैं वह उदात्त भले ही रही हों-दैवी भले हों-मानव-मानव के जागतिक सम्बन्धों की व्यंजक होती कदापि नहीं देखी गयीं। उस गेयता से मानव से मानव जुड़ता नहीं देखा गया। उस गेयता का प्रमुख लक्ष्य रहा है कि वह धर्म की ध्वनि से, मानव को मानव की हैसियत से नहीं, बल्कि एक धार्मिक को दूसरे धार्मिक से जोड़ती रहे। यही उसने किया भी। उस किये का परिणाम यह हुआ कि गेय पदों के विभिन्न धार्मिक गेय स्वरूप हुए।

कभी-कभी यह भी हुआ कि भिन्न धर्मावलम्बियों के गेय पद एक-दूसरों से टकराये और त्याज्य भी समझे गये। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि आदमी जीवन जीने के बजाय धर्म जीने लगा था। ऐसी दशा में पदों के सहज स्वर का धार्मिक स्वर हो जाना स्वाभाविक था। कुछ हद तक तो ऐसे होने की विवशता थी। उस विवशता से इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन जब धार्मिक प्रवृत्तियाँ रूढ़ हो जाती हैं और उनकी रूढ़िवादिता सहज मानव के मन को दबोच लेती हैं। और उस पर भरपूर हावी हो जाती हैं तब इस रूढ़िवादिता से पदों की गेयता में भी भारी अन्तर आ जाता है और यह अन्तर इतना स्पष्ट हो जाता है कि गेय पद भी अगेय कविता की तरह के हो जाते हैं। वह गाये भले ही जायें लेकिन उनकी गेयता सहज स्वाभाविक मानवीय गेयता नहीं होती। काव्य का इतिहास इसे प्रमाणित कर चुका है।

धार्मिक मानव की मानवीयता सहज मानव की मानवीयता से अलग रूप और प्रकार की होती देखी गयी है। तभी तो जो सहज मानवीयता मीराँ और सूर के पदों में गेय होकर व्यक्त हुई है वह अधिक बोधगम्य, सम्प्रेषणीय और संवेदनशील है बजाय उस मानवीयता के जो अन्य धर्मानुयायी कवियों ने अपने धार्मिक पदों में गेय बना कर प्रस्तुत की थी।

मतलब यह कि पदों की गेयता वास्तव में सहज मानव के जागतिक सम्बन्धों की गेयता होती है जो आगे चल कर आज के युग के गीत की गेयता में परिणत हो जाती है।

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(टीडीआईएल के हिन्दी पाठ कार्पोरा से साभार)

2 blogger-facebook:

  1. इस महत्वपूर्ण लेख को यहां प्रस्तुत करने का धन्यवाद रवि जी.

    उत्तर देंहटाएं
  2. vijayshankar chaturvedi9:08 pm

    केदार जी का लेख प्रकाशित कर आपने बहुत अच्छा काम किया है. धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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