शुक्रवार, 27 जून 2008

बालेंदु दाधीच का आलेख : सरकार छिपाए, इंटरनेट दिखाए

दुनिया भर की दमनकारी, अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारों तथा संस्थानों के विरुद्ध संघर्ष करते लोगों को इंटरनेट के जरिए एक नया हथियार मिल गया है।

- बालेन्दु दाधीच

wikileaks

दुनिया भर की दमनकारी, अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारों तथा संस्थानों के विरुद्ध संघर्ष करते लोगों को इंटरनेट के जरिए एक नया हथियार मिल गया है। इन सरकारों ने जिन गोपनीय सूचनाओं और रहस्यों को बड़े जतन से छिपाकर रखा था उन्हें कुछ वेबसाइटों के जरिए लीक किया जा रहा है। यानी करीब-करीब वही काम जो खोजी पत्रकार करते रहे हैं। लेकिन खोजी पत्रकारों और उनके संस्थानों का दमन अपेक्षाकृत आसान है, सूचनाओं की आजादी और पारदर्शिता में यकीन रखने वाले इंटरनेट योद्धाओं का मुंह बंद करना उतना सरल नहीं। आम आदमी के पक्ष में सूचना-युद्ध लड़ती इन वेबसाइटों को कौन, कहां से संचालित कर रहा है, उनमें गोपनीय आंकड़े प्रकाशित करने वाले लोग कौन हैं, यह स्वयं उनके अलावा कोई नहीं जानता। ऐसे में कोई त्रस्त सरकार उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई करे तो कैसे?

सन 2006 में लांच हुई विकीलीक्स.ऑर्ग ऐसी वेबसाइटों में अग्रणी है जिसने थाईलैंड और चीन ही नहीं, अमेरिका तक की सरकार की नींद हराम कर दी है। और सरकारों ही क्यों, अनेक धार्मिक संगठनों, नौकरशाहों और संस्थानों को समझ नहीं आ रहा कि लोहे के संदूकों में बरसों से दबे उनके राज इंटरनेट पर किसने फास कर दिए और अब वे करें तो क्या? विकीलीक्स की स्थापना करने वाले वे लोग हैं जो खुद सरकारी दमनचक्र और यातनाओं के शिकार हो चुके हैं, या फिर इस किस्म के दमन के धुर-विरोधी हैं। इसीलिए विश्व में कहीं भी होने वाली अलोकतांत्रिक और मानवाधिकार-विरोधी कार्रवाइयों के विरुद्ध उनके मन में गहरा आक्रोश है, उनसे पीड़ित हुए लोगों के प्रति सहानुभूति और जुड़ाव है। उनका सीधा सा लक्ष्य है- विश्व को शांतिपूर्ण तथा अन्याय-मुक्त बनाने के लिए सूचनाओं के हथियार का साहसिक और कुछ हद तक चालाकी भरा इस्तेमाल।

विकीलीक्स की स्थापना करने वाले कुछ तिब्बती शरणार्थियों, चीनी असंतुष्टों और थाई राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने शायद ही कल्पना की हो कि दो साल के भीतर उनके पास दुनिया भर से आए करीब 12 लाख सरकारी-गैरसरकारी गोपनीय दस्तावेजों का भंडार होगा। हां, उन्हें इस काम में निहित जोखिमों का अंदाजा जरूर था और वे यह भी जानते थे कि अगर उनकी वेबसाइट चल निकली तो वह संसदों और अदालतों की बहसों का केंद्र बन जाएगी, विश्व की बड़ी से बड़ी ताकत भी गोपनीय सूचनाओं के मुक्त प्रकाशन को बर्दाश्त नहीं कर सकती। जल्दी ही विकीलीक्स के खिलाफ मुकदमों की झड़ी लग गई और एकाध बार तो उसे इंटरनेट से मिटा ही दिया गया। लेकिन दूसरों के संघर्षों को ताकत देती यह वेबसाइट अब तक हारी नहीं है। वह आघात सहती है और फिर खड़ी हो जाती है। वह खुद भी एक जीवंत विद्रोह की मिसाल बन रही है।

पिछले साल नवंबर में विकीलीक्स पर अमेरिका की कुख्यात गुआंतनामो जेल के अमानवीय हालात के बारे में एक आधिकारिक रिपोर्ट लीक की गई थी। इसने अमेरिकी प्रशासन और सैनिक तंत्र को हिला दिया जिन्होंने बाद में खिसियाने अंदाज में स्वीकार किया कि 238 पेजों की यह रिपोर्ट (जेल मैनुअल) असली है। इसमें गुआंतनामो जेल में कैदियों को लाने और रखने संबंधी खेदजनक परिस्थितियों से लेकर वहां हो रहे जिनेवा समझौते के खुले उल्लंघन तक का ब्यौरा था। अगस्त 2008 में इसी वेबसाइट ने केन्या के पूर्व शासक डेनियल अलाप मोई के परिवार वालों द्वारा किए गए एक अरब यूरो से अधिक के गबन संबंधी 110 पेज की एक गोपनीय जांच रिपोर्ट भी उजागर कर दी थी जिससे केन्या की राजनीति में भारी उथल-पुथल मची। ब्रिटेन में नार्दर्न रॉक नामक वित्तीय संस्थान के पतन के बाद वहां की अदालत ने अखबारों में उसके लीक हुए सेल्स प्रोस्पेक्टस के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी। लेकिन विकीलीक्स ने यह प्रोस्पेक्टस प्रकाशित कर दिया और साथ ही साथ उसके प्रकाशन पर लगी रोक संबंधी आदेश भी।

अपने ग्राहकों संबंधी सूचनाओं को गोपनीय रखने वाले जूरिख के जूलियस बायर बैंक को भी विकीलीक्स ने जबरदस्त झटका दिया जब उसने वहां बेनामी खाते रखने वाले अनेक लोगों का ब्यौरा प्रकाशित कर दिया। उसने बताया कि किस तरह स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले लोग विदेशी न्यासों में अपना धन छिपाकर रखते हैं। इन लोगों में पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर से संबंध रखने वाला एक व्यक्ति भी था जिसने एक गोपनीय न्यास में करीब दस करोड़ डालर की रकम छिपाई हुई थी। विकीलीक्स से उजागर हुई सूचनाओं के आधार पर जर्मनी में कई कर-अपवंचकों के यहां छापे मारे गए और स्विस बैंक विकीलीक्स को होस्ट करने वाली कंपनी के खिलाफ अदालत में चली गई। अमेरिकी न्यायाधीश जैफ्री व्हाइट ने वेबसाइट पर पाबंदी लगा दी और वह बंद हो गई। अलबत्ता, नागरिक अधिकार गुटों की तरफ से मचाए गए हो-हल्ले के बाद न्यायाधीश को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने प्रतिबंध के दो सप्ताह बाद ही इसे फिर शुरू किए जाने की अनुमति दे दी।

अमेरिकी अदालत की इस कार्रवाई के अलावा भी इस वेबसाइट को कई सरकारों के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। चीन में तो कठोर सरकारी नियंत्रणों के कारण विकीलीक्स या उससे जुड़ी किसी भी अन्य वेबसाइट को देखना लगभग असंभव है और करीब-करीब यही स्थिति थाईलैंड की है जहां के विपक्षी कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में इस वेबसाइट पर सरकारी धतकरमों की पोल खोली है।

विकीलीक्स से पहले भी इंटरनेट पर गोपनीय सूचनाएं उजागर करने के प्रयास हो चुके हैं। न्यूयॉर्क का एक वास्तुकार जॉन यंग पिछले कुछ साल से अपनी वेबसाइट क्रिप्टोम.ऑर्ग पर इसी तरह के टॉप सीक्रेट दस्तावेज उपलब्ध कराता रहा है। लाइवलीक.कॉम नामक एक अन्य वेबसाइट ने भी कुछ दमदार रहस्योद्धाटन किए हैं। लेकिन विकीलीक्स ने बहुत जल्दी सबको पीछे छोड़ दिया और अब वह दुनिया में अपनी श्रेणी की सबसे बड़ी, सबसे सफल और सबसे कारगर वेबसाइट है। इसके नाम से यह भ्रम हो सकता है कि विकीलीक्स का इंटरनेट आधारित विश्वकोश विकीपीडिया से कोई संबंध होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। विकीपीडिया और इस वेबसाइट में नाम के अलावा सिर्फ एक ही समानता है कि दोनों बुनियादी रूप से एक ही टेक्नॉलॉजी (विकी) का इस्तेमाल करती हैं। ऐसी टेक्नॉलॉजी का, जो विश्व के किसी भी व्यक्ति को इन वेबसाइटों पर सूचनाएं दर्ज करने का अधिकार देती हैं। लेकिन विकीपीडिया पर मौजूद सूचनाओं को जहां कोई भी व्यक्ति संपादित कर सकता है, वहीं विकीलीक्स के मामले में ऐसा नहीं है। इस पर रखी सामग्री पूरी तरह एनक्रिप्टेड (कूट संकेतों में परिवर्तित कर रखी गई) है जिसे संपादित करना तो दूर, हैक करना भी लगभग असंभव है।

विकीलीक्स की लोकतांत्रिक प्रकृति के कारण वहां कोई भी व्यक्ति किसी भी किस्म का गोपनीय दस्तावेज भेजने के लिए स्वतंत्र है। ऐसे लोगों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है और संभवत: यह उसकी सफलता का बड़ा कारण है। इसके संस्थापक यह भी मानते हैं उनके यहां उपलब्ध सौ फीसदी दस्तावेज प्रामाणिक ही हों, यह जरूरी नहीं है। इस संदर्भ में वे व्यक्तिगत विवेक का हवाला देते हुए कहते हैं कि जो दस्तावेज प्रामाणिक नहीं होंगे, वे स्वयं ही पाठकों द्वारा उपेक्षित कर दिए जाएंगे।

क्या गोपनीय सूचनाओं को लीक करना या उजागर करना नैतिक रूप से उचित है? इस सवाल पर विकीलीक्स से जुड़े लोगों का कहना है कि हां, निरंकुश सरकारों, दमनकारी संस्थानों और भ्रष्ट कंपनियों पर इस किस्म का दबाव डालना जरूरी है। जहां अन्याय और पराधीनता को कानूनी रूप दे दिया गया हो वहां इस तरह की 'नागरिक अवज्ञा' वाली कार्रवाई की जरूरत है। कुछ-कुछ गांधीजी वाली भावना लगती है!

(लेखक हिंदी पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के संपादक हैं)।

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संबंधित आलेख : विकिलीक्स बताएगा पर्दे के पीछे का सच

2 blogger-facebook:

  1. वाकई एक नया हथियार है.....ओर जिसके लिये इसका सदुपयोग भी बेहद जरूरी है....पर इस चेतना के ज्ञान का तोड़ वाकई मुश्किल है....

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  2. यह टिप्पणी बक्सा काम का है या नहीं ?

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