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पुस्तक समीक्षा - विचारों की दस्तावेजी धरोहर : अनुभूतियाँ और विमर्श

anubhutiyan aur vimarsh

 

निबंध संग्रह : अनुभूतियाँ और विमर्श

 

लेखकः कृष्ण कुमार यादव

 

समीक्षक : डॉ0 सूर्य प्रसाद शुक्ल

 

मनुष्य एक विचारवान प्राणी है। उसे साहित्य, समाज और परिवेश से प्राप्त मानस संवेदनों के सन्देशों से जिन अनुभूतियों की उपलब्धि होती है, उनके ही विमर्श से नई-नई व्याख्याओं को आधार मिलता है। युवा चिन्तक एवं लेखक तथा भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव का नागरिक उत्तर प्रदेश, लखनऊ से प्रकाशित द्वितीय निबंध संग्रह ‘‘अनुभूतियाँ और विमर्श” इसी चिन्तन, मनन और विवेचन को आधार देती मानसी वृत्ति का परिणाम है, जिसमें लेखक ने साहित्य और साहित्यकार, व्यक्ति और समाज, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, वैश्विक चेतना तथा सांस्कृतिक अध्ययन के अनेक आधुनिक और उत्तर आधुनिक तथ्यों को व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। लेखक का इससे पूर्व ‘‘अभिव्यक्तियों के बहाने” नामक निबन्ध संग्रह प्रकाशित हो चुका है। प्रशासनिक सेवा में रहकर भी चिन्तन मनन करना एवं साहित्यिक लेखन करना अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि है। राजकीय सेवा के दायित्वों का निर्वहन और श्रेष्ठ कृतियों की सर्जना का यह मणि-कांचन योग विरल है। कृष्ण कुमार यादव के निबन्धों में उनका बहुआयामी चिन्तन मुखर हुआ है।

समीक्ष्य निबन्ध संग्रह ‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ में कृष्ण कुमार यादव के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित विभिन्न 15 लेखों को निबन्ध संग्रह के रूप में संकलित कर प्रस्तुत किया गया है। इस संग्रह के निबंधों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है-व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित निबंध, सांस्कृतिक प्रतिमानों पर आधारित निबंध एवं समसामयिक व ज्वलन्त मुद्दों पर आधारित निबंध। व्यक्तित्व व कृतित्व आधारित लेखों में देश के मूर्धन्य साहित्यकारों व मनीषियों - मुंशी प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, मनोहर श्याम जोशी, अमृता प्रीतम व डा0 अम्बेडकर के जन्म से महाप्रयाण तक के सफर को क्रमशः लिपिबद्ध कर बिखरे मनकों को एकत्र कर माला के रूप में तैयार कर उनके जीवन-संघर्ष व भारतीय समाज में योगदान को रेखांकित करने का सार्थक प्रयास किया गया है। आज जब हर लेखक पुस्तक के माध्यम से सिर्फ अपने बारे में बताना चाहता है, ऐसे में ‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ में तमाम साहित्यकारों व मनीषियों के बारे में पढ़कर सुकून मिलता है और इस प्रकार युवा पीढ़ी को भी इनसे जोड़ने का प्रयास किया गया है। लेखक की श्रेष्ठ-जीवन मूल्यों के प्रति प्रखण्ड आस्था, भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध अनुराग तथा समग्रता भारतीयता के प्रति एकनिष्ठा की स्पृहणीय चेतना से प्राणवान ये निबन्ध हिन्दी जगत की स्थायी निधि हैं। इनमें लेखक का स्वाध्याय तथा अभिव्यक्ति की निश्छलता अपने पूर्ण वैभव के साथ विद्यमान है। वैज्ञानिक विश्लेषण की दक्षता लेखक में है, इसलिए उसका कथ्य प्रत्येक पाठक का कथ्य बन गया है।

प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य ही नहीं विश्व साहित्य के पटल पर मनुष्य की यथार्थ जिन्दगी के हमराही रहे हैं। स्वतंत्रता पूर्व के वर्षों में जब भारतीय समाज अनेक कुरीतियों और विसंगतियों के कारण सभी नैतिक मूल्यों से च्युत हो रहा था, तब इस लेखक की कहानियों में व्याप्त प्रगतिशील विचारों और जनजागृति के सन्देशों से साहित्य लोकहित के संवर्धन का एक नया आन्दोलन बना था। राष्ट्रप्रेम, स्त्री विमर्श, जातिप्रथा, अशिक्षा, निर्धनता, साधनहीनता, किसान, मजदूर,सरकारी तंत्र आदि के तत्कालीन स्वरूप और उनके परिणाम और दुष्परिणाम प्रेमचन्द के साहित्य में किस प्रकार रचे बसे हैं, कृष्ण कुमार यादव की इस पुस्तक में गम्भीर अध्ययन का विषय बनकर उभरे हैं। प्रेमचंद के ऊपर आज जिस तरह के आक्षेप किये जा रहे हैं, उनकी रचनायें जलायी जा रही हैं, उनकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं, ऐसे में यह लेख और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

बहुभाषाविद्, धर्म, दर्शन और अध्यात्म के तलस्पर्शी विद्वान, यायावर, महामानव राहुल सांकृत्यायन का सम्पूर्ण जीवन प्रायोगिक ज्ञान के कर्मशील चेतन का विकाससमान स्वरूप था। उन्होंने किसी एक दल के दलदल को कभी नहीं स्वीकारा था। वह विद्रोही आत्मा के ज्योर्तिमय प्रज्ञा पुरूष थे। विवेचना के क्रम में श्री यादव ने अपने कथनों को राहुल जी के जीवन दर्शन से, उनके लेखन से तथा उनकी राजनैतिक और प्रगतिशील अवधारणाओं के सन्दर्भों से बहुविध संवार कर जिस जटिल बौद्धिकता से मुक्त किया है, वह पाठक के मन को समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान इत्यादि से अनुप्राणित मनीषी के सन्यास से साम्यवाद तक ले जाकर उस भावभूमि पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास है, जहाँ लेखक कहता है- ‘‘भागो नहीं दुनिया बदलो।“

मनोहर श्याम जोशी का बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व, उनका आम आदमी के लिए लेखन, पत्रकारिता के उच्च आदर्श, हमलोग, बुनियाद, जैसे धारावाहिकों के सर्जक तथा क्याप जैसे साहित्यिक सृजन के लिए अकादमी पुरस्कार प्राप्त करना साहित्य के इतिहास की अभूतपूर्व उपलब्धि हैं । ‘‘खो गया किस्सागोई” शीर्षक से इस पुस्तक के लेखक ने परम्पराओं, रूचियों और विमर्शों के जीवन्त उद्धरण उद्धृत किये हैं, जो जोशी जी के प्रति श्रद्धांजलि है। अमृता प्रीतम के योगदान पर हिन्दी जगत में सशक्त रूप में अधिक नहीं लिखा गया है, ऐसे में अमृता प्रीतम को, जितने नजदीक से श्री यादव ने देखने का प्रयत्न ‘‘गुम हो गया रसीदी टिकट” नामक लेख में किया है स्वयं में एक जिज्ञासापूर्ण सतत उत्सुकता का निर्वाह करती कहानी का कथानक ही लगता है।

‘‘दलितों के मसीहाः डॉ0 अम्बेडकर” को अम्बावाडेकर से अपने इस नाम तक पहुंचने के लम्बे सफर में जिन सामाजिक विसंगतियों से होकर चलना पड़ा था तथा अपने कटु अनुभवों से उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया था, उनसे विचलित न होते हुए किस प्रकार शिक्षाविद राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता और संविधान निर्मात्री परिषद के महत्वपूर्ण पद तक पहुंचकर एक सर्वमान्य नेता बनने में सफलता पाई थी, उसका विवरण भी ‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ के पृष्ठों पर अंकित है। डॉ0 अम्बेडकर के अन्तर्विरोधों पर चर्चा के साथ-साथ वर्तमान राजनैतिक-सामाजिक परिवेश में जिस प्रकार उन्हें भुनाया जा रहा है, उस पर भी चर्चा करके इस लेख को और भी आयाम दिये जा सकते थे।

भारतीय संस्कृति के प्रतिमान विषयक लेखों में ‘‘नारी शक्ति के उत्कर्ष” में समाज में नारी-विकास के विभिन्न चरणों की व्याख्या करते हुए वर्तमान परिवेश में नारी जगत द्वारा प्राप्त की जा रही ऊँचाईयों को इंगित किया गया है, चाहे वह पंचायती राज द्वारा हो या घरेलू महिला हिंसा अधिनियम द्वारा हो या रूढ़िवादी वर्जनाओं के तोड़ने द्वारा हो। देह विमर्श के दौर में यह लेख अपनी प्रासंगिकता स्थापित करता है। ‘इतिहास के आयाम’ में लेखक ने ऐतिहासिक धरोहरों के महत्व को परिभाषित करते हुए, हाल के दिनों में इतिहास पुर्नलेखन को लेकर उठते सवालों के बीच इतिहास की विभिन्न धाराओं को रेखांकित किया है। ‘भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता’ लेख में पाश्चात्य व भारतीय सन्दर्भों में धर्म की तुलनात्मक महत्ता को रेखांकित करते हुए भारतीय समाज में धर्म के अवदानों व विभिन्न समयों में धार्मिक एकता को दर्शाते हुए अन्ततः संवैधानिक उपबन्धों के माध्यम से वर्तमान समाज में धर्म का विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया है। लेखक का कथन बड़ा सटीक है कि- ‘तुष्टीकरण की नीतियों के बीच हमने एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को तो अपना लिया है पर धर्मनिरपेक्षता अभी तक हमारे सामाजिक जीवन का अंग नही बन पायी है। ‘भारतीय संस्कृति और त्यौहारों के रंग’ इस संग्रह का सबसे लम्बा लेख है। इसमें लेखक ने देश के कोने-कोने में मनाये जाने वाले महत्वपूर्ण त्यौहारों, इनके पीछे छिपी मान्यताओं, रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक घटनाओं, उनको मनाने के ढंगों में विविधता और उनकी प्रासंगिकता पर रोचक ढंग से प्रकाश डाला है। लेखक ने इस लेख के माध्यम से अन्ततः सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता व अखण्डता एवं त्यौहारों- पर्वों को मनाने की मूल मानवीय भावनाओं को संजोने की कोशिश की है। यद्यपि इस लेख में भारतीय त्यौहारों पर विस्तृत जानकारी है लेकिन पोंगल आदि दक्षिणांचल और उत्तरांचल के त्यौहारों को जोड़कर इसे और भी रोचक बनाया जा सकता था। आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के द्रुतगामी विकास के बढ़ते चरण जिस प्रकार नित नये ज्ञान और विज्ञान के आलोकमयी झरोखे खोलते जा रहे हैं, उनसे ही युवामन चकाचौंध के भूलभुलैया पूर्ण जीवन में दिगभ्रमित हो रहा है। फिल्मी दुनिया, उसमें व्याप्त जीवन मूल्यों को तिलांजलि देती नई पीढ़ी और उस अधोगमन की ओर उत्सुकता भरी निगाहों में वास्तविक जिन्दगी से दूर के सपने तो चिन्ता का विषय हैं ही, विद्यार्थियों का राजनीतिज्ञों द्वारा शोषण, शिक्षा का गुणात्मक अवमूल्यन, नेतृत्व की अक्षमता, साहित्य, कला, संस्कृति और ज्ञान की अवहेलना से उपजी नकारात्मक सोच, ‘‘युवा भटकाव की स्थिति क्यों” शीर्षक लेख में बहुत सटीक ढंग से उकेरी गई है। इन सभी लेखों में लेखक की तथ्यात्मक दृष्टि बिना किसी भावुकता के, बिना किसी अत्युक्ति के भारतीय संस्कृति की सच्ची निष्ठा से परिचालित है। पूर्वाग्रहों से मुक्त कृष्ण कुमार यादव की लेखनी प्राचीनता एवं आधुनिकता का समन्वय प्रकट करते हुये एक विमर्श खड़ा करने में सफल रही है।

भूमण्डलीकरण एक वास्तविकता है। सूचना-प्रौद्योगिकी और यातायात के साधन तथा आर्थिक उदारीकरण के दौर में जीवन के सभी पक्ष प्रभावित हुए हैं, फिर भाषा और साहित्य अप्रभावित कैसे रह सकते हैं? हिन्दी भाषा पर इसका क्या प्रभाव हुआ है और क्या होगा, इस तथ्य को वर्तमान में देखते हुए अतीत के लेखन और पत्रकारिता के इतिहास तक पहुँचता लेखक ‘भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी’ द्वारा अनेक सार्थक प्रश्न करता व उनका उत्तर ढूँढ़ता प्रतीत होता है। ‘भूमण्डलीकरण के दौर में तेजी से बढ़ते भारतीय कदम’ में लेखक ने 1990 के बाद अर्थव्यवस्था में तेजी से आये उछाल को रेखांकित किया है और उद्घोषणा की है कि - ‘भारत को एक बार फिर से जगद्गुरु की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।‘ बाजारीकरण, दृश्य और श्रव्य मीडिया, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, उपभोक्तावाद आदि का ‘‘ब्राण्ड इमेज की महत्ता” “शीर्षक लेख में तथा ‘‘इण्टरनेट का बढ़ता प्रभाव” में विश्व-ग्राम की नजदीकियों से भाषा, संस्कृति, व्यापार, व्यवसाय, शिक्षा और जीवन के सभी क्षेत्रों की सूचनाओं के उपलब्ध होने के साधन रूप में भी इस पुस्तक में चर्चा का विषय बना है। ‘‘कोचिंग संस्थाओं का फैलता मायाजाल” भी लेखक के दृष्टिपटल से गुजरा है और उसने कोचिंग संस्थानों द्वारा अपनायी जाने वाली तकनीकों एवं उनके मायाजाल में फँसते सामान्य विद्यार्थियों की दुर्दशा पर बेबाकी से प्रकाश डालते हुए कोचिंग व्यवस्था के चलते विद्यालयों में अध्यापन के गिरते स्तर पर भी चिन्ता व्यक्त की गयी है।

‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ संकलित निबंध वर्णनात्मक होते हुए भी तथ्यपरक गम्भीर वैचारिकता के विमर्श हैं। लेखों में आँकड़े जुटाने में लेखक ने काफी श्रम किया है। उनमें रोचक शैली में कही गई विषयवस्तु का साहित्यिक मूल्यांकन किया गया है। परत दर परत नये-नये सन्देश जन ग्राहय भाषा में दिये गये हैं और प्रामाणिक सन्दर्भ प्रस्तुत किये गये हैं। लेखक ने अत्यन्त सरल-सुबोध भाषा में वर्णित विषयों को बड़ी गहराई में पकड़ा है। निबन्धों के बीच उपयोग में लायी गयी घटनायें, दृष्टान्त इत्यादि गद्य जैसी नीरस विधा में रोचकता का समावेश करते हैं और लेखन को तर्कपूर्ण-तथ्यपूर्ण-प्रमाण सम्मत बनाते हैं। कृष्ण कुमार यादव ने इस पुस्तक में साहित्य और साहित्यकार, व्यक्ति और समाज, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, वैश्विक चेतना तथा सांस्कृतिक अध्ययन के अनेक आधुनिक और उत्तर आधुनिक तत्वों को व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। लेखन कला में प्रबन्ध या निबन्ध का साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान होता है। इस पुस्तक के लेखक ने उस अपेक्षा की पूर्ति का प्रयत्न किया है। निबंध के स्वरूप विवेचन में ही नहीं बल्कि उनके सम्पादन में भी लेखक ने अपनी शोधपरक दृष्टि द्वारा विषय-वस्तु को ऐतिहासिक तारतम्य की चासनी के साथ परोस कर अपनी लेखनी के कौशल का परिचय दिया है, जो निश्चय ही पाठकों के लिए उपयोगी बन पड़ा है।

कुल मिलाकर कृष्ण कुमार यादव का अल्प समय में यह दूसरा निबंध संग्रह ‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है जो बडे़ श्रम, विवेक और विशेषता के साथ साध्य हुयी है। एक प्रशासक होने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं से गहरे रूप में जुड़े हुए कृष्ण कुमार यादव का यह संकलन वैश्विक जीवन दृष्टि, आधुनिकता बोध तथा सामाजिक सन्दर्भों को विविधता के अनेक स्तरों पर समेटे हिन्दी निबन्ध के जिस पूरे परिदृश्य का एहसास कराता है वह निबंध कला के भावी विकास का सूचक है। लेखक ने परम्परा से हटकर एक नये मार्ग का अनुसरण करके निबन्ध विधा को एक नया आयाम देने का प्रयास किया है। सर्वथा नई शब्द योजना, नई प्रासंगिकता, नई अनुभूतियाँ और नई विमर्श शैली के साथ यह एक दस्तावेजी निबंध संग्रह है, जो विचारों की धरोहर होने के कारण संग्रहणीय भी है। कुल मिलाकर प्रतिपाद्य, भाषा, शैली-तीनों ही दृष्टियों से ये निबन्ध प्रशंसनीय हैं। इनकी प्रस्तुति सर्वथा स्वागत योग्य है।

 

पुस्तक : अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह)@ लेखकः कृष्ण कुमार यादव मूल्य : 250@-

प्रकाशक : नागरिक उत्तर प्रदेश, प्लाट नं0 2, नन्दगाँव रिजॉर्टस्, तिवारीगंज, फैजाबाद रोड, लखनऊ-226019

समीक्षक : डॉ0 सूर्य प्रसाद शुक्ल, डी0 लिट् 119@501, सी-3, दर्शनपुरवा, कानपुर

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