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July 2008
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व्यंग्य

आतंकियों को पोटा और पोटा का आतंक

Virendra Jain

-वीरेन्द्र जैन

 

पहले हर घर में एक अस्त्र-शस्त्र हुआ करता था जिस का नाम सोंटा होता था। यह जब फेंक कर मारा जाता था तो अस्त्र कहलाता था और जब हाथ में पकड़े पकड़े इस से धुनाई की जाती थी तब ये शस्त्र बन जाता था। बाहर के चोर डकैत ही नहीं पत्नियाँ और बच्चे तक इससे डरते थे तथा इसी के कारण पत्नियाँ चरित्रवती और पुत्र आज्ञाकारी होते थे। अंग्रेजों के जमाने में यह दफ्तरों में रूलर की तरह भी प्रयोग किया जाता था जिससे रजिस्टरों में लाइनें खींची जाती थीं। यह पुलिस थाने में भी पाया जाता था और स्कूल के मास्टरों के पास भी पाया जाता था, जिससे अपराधी लाइन में रह कर पुलिस का हिस्सा दबा नहीं पाते थे और छात्र मास्टरजी के लिए घर में बने मालपुये लाने में कोताही नहीं करते थे। कुछ लोककथाओं में यह मिस्टर इंडिया की तरह अदृश्य हाथों में रह कर भी अपना काम करता हुआ बताया जाता है।

अब यह नहीं पाया जाता। अब दुनिया की सारी कमियों को इसकी अनुपस्थिति के नीचे ढका जा सकता है। अब तो अगर ट्रेन भी लेट होती है तो लोग कहने लगते हैं कि पहले ट्रेनें इतनी लेट नहीं होती थीं क्योंकि पहले की बात और थी, पहले सोंटा होता था। अगर सोंटा हो तो ट्रेन लेट क्यों हों!

आजकल कुछ लोग पोटा को भी इसी भाषा में याद करते रहते हैं। जैसे किसी प्रेत बाधा की आशंका होने पर लोग हनुमानजी को याद करने लगते हैं- भूत पिशाच निकट नहिं आवे महावीर जब नाम सुनावे।

अब पोटा नहीं है

पोटा नहीं है

पोटा होता तो ऐसा होता

पोटा होता तो वैसा होता

पोटा होता तो ये दिन काहे को देखना पड़ते

पोटा होता तो सूरज ठीक समय से निकलता

पोटा होता तो वर्षा सही समय से होती

पोटा होता तो चिड़ियाँ गाना गातीं

पोटा होता तो मोर नाचते

पोटा होता तो बेराजगारी नहीं होती

पोटा होता तो गरीबी नहीं होती

पोटा होता तो भ्रष्टाचार नहीं होता

पोटा होता तो रामराज्य आ जाता

‘‘ पर क्या रामराज्य में पोटा था? मैं पोटा पोटा की तोतारटंत करने वाले पोटावादियों से सवाल पूछता हूँ।

‘‘ पहले रामराज्य तो लाओ तब पोटा की जरूरत ही नहीं पड़ेगी वे हमेशा की तरह उल्टा जबाब देते हैं।

मैं रात में सपना देखता हूँ कि पोटा कानून बन गया और हर घर में एक एक पोटा रखा हुआ है। सुबह पति आफिस को जाता है तो पत्नी को प्यार से देखते हुये हिदायत दे जाता है कि देखो वो पोटा रखा है कोई आतंकवादी आये तो उठा कर पोटा मार देना साले को। पत्नी वीरता से कहती है कि यहाँ कौन आयेगा पर तुम्हें रास्ते में बस आटो वगैरह में जाना है इसलिए साथ में लेते जाओ सारी आतंकवादी घटनाएं वहीं होती हैं। पति कहता है तुम रखो और पत्नी कहती है नहीं तुम ले जाओ। इसी में पति घन्टे भर लेट हो जाता है। आफिस में अफसर कहता है कि इन बाबुओं पर तो पोटा लगाये बिना काम ही नहीं चलेगा। बाबू कहते हैं- सर, पर जब पोटा था तब भी तो संसद भवन पर हमला हुआ था, अक्षरधाम में हमला हुआ था, रघुनाथ मंदिर में हमला हुआ था..........।

‘‘ हाँ हाँ हुआ था पर पोटा के डर से सब वहीं गोलियों के सामने आ गये थे और मारे गये थे

‘‘ पर जो मरने के डर से मुक्त हो चुके हैं और अपने शरीर पर विस्फोटक बांध कर खुद को ही उड़ा देते हैं उनके लिए पोटा क्या करेगा

‘‘वे भी पोटा से डरने लगेंगे

‘‘ एक महिला कर्मचारी पूछती है कि क्या बच्चे भी पोटा से डरने लगेंगे जो आजकल बहुत शैतान होते जा रहे हैं

‘‘हाँ हाँ सब डरेंगे

‘‘और बच्चों के पापा जो आजकल रात में बहुत देर से दारू पीकर लौटते हैं

‘‘हाँ हाँ सब डरेंगे पोटा आने दो फिर तो दैहिक दैविक भैतिक तापा पोटा राज्य नहिं काहुई व्यापा अफसर ऐसे कहते हैं जैसे कि यह रामवाण औषधि हो।

आतंकवादी भी आपस में बात करते हैं कि ‘‘सुना है पोटा को बुलाया जा रहा है

‘‘ये क्या कोई नया अफसर है?

‘‘अफसर ही समझो, नया कानून है

आतंकी हॅंसने लगता है। कहता है ‘‘कानून तो वह बिजूका होता है जिस पर आजकल पशु पक्षी बैठ कर बीट करने लगे हैं। अरे कानून लागू तो ये ही लोग करेंगे जो.................

‘‘ जो क्या............................?

‘‘ जो पुलिस और अफसरी की नौकरी पाकर या किसी सदन में पहुंच कर यह सोचते हैं कि अब कानून ना लागू करने के बदले अच्छे पैसे मिलेंगे। सो अपुन तो इन्हीं को लूट कर इन्हीं को रिश्वत दे देंगे

अब दोनों हॅंस रहे थे। पीछे से वाल्तेयर की फोटो से आवाज आ रही थी- सारे कानून बेकार हैं क्योंकि अच्छे लोगों को किसी कानून की जरूरत नहीं होती और बुरे लोग किसी कानून को मानते नहीं।

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संपर्क:

वीरेन्द्र जैन

2-1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.

फोन 9425674629  

परतन्त्र या स्व्तन्त्र

 

-डॉ० कान्ति प्रकाश त्यागी

 

पहले तो हम परतन्त्र थे

हम आज भी पर-तन्त्र हैं

पहले विदेशियों के अधीन थे

अब अपनों के अधीन हैं

पहले एक शासक था,

अब अनेक शासक हैं

पहले पुलिस रक्षक थी

अब पुलिस भक्षक है

 

पहले विधवा निडर थी

बच्चे एवं वृद्ध निडर थे

सामान्य आदमी चैन से था

क्योंकि सिर्फ़ कानून था

अब सभी सहमे सहमे हैं

किसी सदमे में डूबे हैं

घर से बाहर निकलने में

पूरी तरह डरते हैं

 

पता नही कब और कौन

उनको छुरा भोंक दे

उनकी ज़ेब काट ले

उनकी इज़्ज़त लूट ले

उन पर तेज़ाब फेंक दे

उनका सामान छीन ले

अकारण जेल में डाल दे

आज यह पता नहीं, क्या

वे घर लौट पायेंगे सुरक्षित

बाहर तो बाहर, वे तो

घर में भी नहीं हैं सुरक्षित

 

जब जनता असुरक्षित है

आम आदमी असुरक्षित है

तो फिर कौन है सुरक्षित

देश के नेता हैं सुरक्षित

इनके लिए अनेकों बाडीगार्ड हैं

यदि सौभाग्य से जेल में

तो जेलर ही बाडीगार्ड है

जेल में सब सुविधायें उपलब्ध हैं

टी. वी, फ़ोन एवं ए.सी सभी प्राप्त है

 

इनकी सुरक्षा के लिए, बड़ी फ़ौज चलती है

जो आधुनिक हथियारों से लैस रहती है

यह बात अलग है कि ये

इन सिपाहियों का इस्तेमाल कैसे करें

बाज़ार से सब्ज़ी मंगाएं, बच्चों के स्कूल भेजें

अथवा बीबी के साथ, रॊब हेतु

उसकी किटी पार्टी भेजें

 

आज सस्ता है खून और महंगा पानी

सस्ते हैं घटिया टी वी मनोरंजन

महंगी है, दादी-नानी की कहानी

जब वे सुनाती थी, परियों की कहानी

जब वे खटिया से कहती थी

बच्चों बताओ, राजा था या रानी

अब दादी- नानी को रखने वाला है कोई

अब साथ में, टी वी देखती घर की बाई

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संपर्क:

Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP

tumhari yaad

तुम्हारी याद


वह इक हाथ फिराना बालों में
वह नाम काढ़ना रुमालों में
कुछ बातें कहना मध्यम से उजालों में
याद आता है आज भी
वह शख्स ख्यालों में
जो छोड़ गया है मुझको
अनसुलझे से सवालों में

--

संपर्क:

शामिख फराज    
कमल्ले चैराहा
पीलीभीत.262001
उत्तर प्रदेश

 
 

घटाएँ

 

छा गये सारे गगन पर

नव घने घन मिल मनोहर,

दे रहे हैं त्रस्त भू को आज तो शत-शत दुआएँ!

देख लो, कितनी अँधेरी हैं घटाएँ!

कर रहा है व्योम गर्जन,

मंद्र ध्वनि से, वाद्य-सा बन,

चाहता देना सुना जो आज सारी स्वर-कलाएँ!

देख लो, ये व्योम-चेरी हैं घटाएँ!

अरुक बरसो बिन्दु जल के

तीव्र गति से, ना कि हलके,

विश्व भर में वृष्टि कर दो, दूर हों सारी बलाएँ!

देख लो, कितनी घनेरी हैं घटाएँ!

********

आज़ादी का त्यौहार

लज्जा ढकने को
मेरी खरगोश सरीखी भोली पत्नी के पास
नहीं हैं वस्त्र,
कि जिसका रोना सुनता हूँ सर्वत्र !
घर में, बाहर,
सोते-जगते
मेरी आँखों के आगे
फिर-फिर जाते हैं
वे दो गंगाजल जैसे निर्मल आँसू
जो उस दिन तुमने
मैले आँचल से पोंछ लिए थे !

मेरे दोनों छोटे
मूक खिलौनों-से दुर्बल बच्चे
जिनके तन पर गोश्त नहीं है,
जिनके मुख पर रक्त नहीं है,
अभी-अभी लड़कर सोये हैं,
रोटी के टुकड़े पर,
यदि विश्वास नहीं हो तो
अब भी
तुम उनकी लम्बी सिसकी सुन सकते हो
जो वे सोते में
रह-रह कर भर लेते हैं !
जिनको वर्षा की ठंडी रातों में
मैं उर से चिपका लेता हूँ,
तूफ़ानों के अंधड़ में
बाहों में दुबका लेता हूँ !

क्योंकि, नये युग के सपनों की ये तस्वीरें हैं !
बंजर धरती पर
अंकुर उगते धीरे-धीरे हैं !

इनकी रक्षा को
आज़ादी का त्योहार मनाता हूँ !
अपने गिरते घर के टूटे छज्जे पर
कर्ज़ा लेकर
आज़ादी के दीप जलाता हूँ !
अपने सूखे अधरों से
आज़ादी के गाने गाता हूँ !
क्योंकि, मुझे आज़ादी बेहद प्यारी है !
मैंने अपने हाथों से
इसकी सींची फुलवारी है !

पर, सावधान ! लोभी गिद्धो !
यदि तुमने इसके फल-फूलों पर
अपनी दृष्टि गड़ाई,
तो फिर
करनी होगी आज़ादी की
फिर से और लड़ाई !

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संपर्क:

 

डॉ. महेंद्र भटनागर
Dr. Mahendra Bhatnagar,
110 Balwant Nagar, Gandhi Road, GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA
[Phone : 0751 - 4092908]

व्यंग्य

नवगति-अद्योगति-दुर्गति...

-- अनुज खरे

 

वे छह छंदमुक्त कविताएं सुना लेने के पश्चात् सातवीं के लिए ‘स्टार्ट’ ले रहे थे। जीभ लपलपा रहे थे। पिछली टांगों... माफ कीजिए पैर से पैर खुजा रहे थे। ज्ञान की खूंखार चमक चेहरे पर थी। छह सुना लेने की प्रचंड संतुष्टि से आप्लावित दिखाई दे रहे थे। उनका घर इन क्षणों में अस्थायी तौर पर खाली हो चुका था। माताजी दांयी और की अम्माजी का भेजा खाने निकल गई थी। पिताजी जो खांसते-खांसते बलगम थूकने गए तो नाले के पास चबूतरे पर ही आसनाधीन हो गए। उनकी पत्नी ‘सदियों’ तक उनके इस ‘कृत्य’ को सहन करने के पश्चात् विद्रोह कर सुनने-सुनाने की इस व्यवस्था से बाहर निकल चुकी थी। बच्चे उनके पक्ष में बाहरी दरवाजे पर इसलिए तैनात हो गए थे ताकि इस समय किसी भी बाहरी ‘आक्रांता’ के बैठक में जाने से रोका जा सके, जहां मैं टॉर्चर किया जा रहा था। घर भांय-भांय कर रहा था, हवां सांय-सांय कर रही थी, मेरी आत्मा हांय-हांय कर रही थी। पूरा माहौल गहन अनुभूति से भरा ‘वैराग्यमयी’ टच दे रहा था। पूरी स्थिति पुलिस की भाषा में ‘कंट्रोल’ में है, वाली ही थी। टीन-टप्परों से खंगालकर, तकिया हटाकर, सोफे के नीचे हाथ डालकर वे अपनी कविताओं के सहमे से पन्ने खींच रहे थे, आंखों के सामने लाकर टारगेट सैट करते, फिर लाइनों पर लाइनें दागे जा रहे थे।

- ‘ये लीजिए जनाब, एक और’, शीर्षक है-लेटर बॉक्स... उनकी आवाज सुनकर ऐसा लगा जैसे पानी फेंककर होश में लाया रहा हूं। फिर शुरू हो गए...।

लेटरबॉक्स, तुम और मैं...।

लालिमा भरा गहन क्षितिज,

आत्मा की लाल सरगोशियां,

जिंदगी के कुछ पत्र-पोस्टकार्ड,

रिश्तों के शब्द-अर्थ-शब्द

भावनाओं की स्याही, लाल-लाल

उसकी साड़ी-दुपट्टे का रंग लाल-लाल,

अच्छाई का रास्ता संकरा-संकरा,

अंदर लेटरबॉक्स जैसा विशाल संसार...

इतना सुनाकर एक बार हांफे, दोबार खांसे, तीन बार घड़ी देखी, चार बिस्कुट उठाकर मुंह में रखे, पांचवीं बार में मेरी ओर निहारा। उनकी इस प्रक्रिया के दौरान मैंने भी छह-सात बार अपनी रुकी हुई सांसें लीं, बिस्कुटों पर हाथ लगाया, घड़ी देखी, उठने को उद्यत हुआ ही था कि वे फिर शुरू हो गए...

बुराई के ढेर के बीच, अच्छाई का अंतरदेशी,

सदेच्छाओं का ‘पता’, मोक्ष का टिकट लगा,

पहला पन्ना, भले कर्मों का खाता-बही,

दूसरा पन्ना, संसार के भंवर में नैय्या फंसी

तीसरा पन्ना, पास बुलाता दुष्कर्मों का कोहरा,

चौथा पन्ना, लिप्सा-लालसाओं का जाल घना,

पांचवां पन्ना,...

इसके पहले वे कुछ बोलते मैंने निवेदन किया,

‘अंतरदेशीय में तो चार ही पन्ने...!’

‘कविता की आत्मा में ‘तर्क’ मत बैठाओ’ वे बोले।’

‘कितने पन्ने अभी और बाकी है...’ मैंने कहा।

वे पन्ने गिनने लगे।

मैंने कहा-‘अंतरदेशीय में’

‘ओ... हो... हो...!’ मैं समझा मेरी कविताओं के उन्होंने कहा।

‘यार...! ये जीवन का सार टाइप की कुछ कविता है, आसानी से किसी के भेजे में नहीं घुसती’।

‘तो उन्हें सुनाओ जो समझ लें, मैंने फिर उन्हें आवेदन प्रस्तुत किया’।

‘बस...! मनुष्यों में यही तो खामी है ‘ज्ञान’ की जरा सी’ भी बात हुई नहीं कि वो संसार से पलायन करने लगता है’ वाणी में खराश और सघनता का पुट देते हुए उन्होंने यह बात कही।

‘सभी लोभ-लालच-लिप्सा में लिथड़े पड़े हैं, फिर भी सच्चाई से आंखें मूंदे’ अब की बार उन्होंने खराश की मात्रा घटाते हुए सघनता की मात्रा ज्यादा कर दी, फिर वांछित प्रभाव जानने के लिए मेरी ओर देखा।

मैंने समझ लिया बहस करुंगा तो ‘यातना का कालखंड’ ज्यादा बढ जाएगा। बोलने को ही था कि वे फिर बोल पड़े।

‘‘इसी कविता को लो लेटरबॉक्स जैसे क्षुद्र प्रतीक में भी जीवन की सच्चाई व्यक्त करने की ताकत है, हम एक दूसरे के इतने छिद्रान्वेषण में लगे रहते हैं कि संसार की मामूली से मामूली चीजों तक से शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते, इसी से तो मानव की इसे अद्योगति हो रही है।’’

‘फिलहाल तो मेरी दुर्गति हो रही है’-मैंने बोला ही था कि उन्होंने बिस्कुट मेरी तरफ बढा दिए, फिर कहा-दुर्गति तो जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त हो रही है। इसी पीड़ा को मैंने चार लाइनों में व्यक्त करने का प्रयास किया है।’ सहमति-असहमति आदि-आदि बातों से वे कब का ऊपर उठ चुके थे। मेरे जवाब की प्रतीक्षा किए बिना ही शुरू हो गए।

‘नवगति-अद्योगति-दुर्गति’

मनुष्य की लाइफ स्टाइल की चेंजिंग पर है, सरलीकृत करते हुए उन्होंने बताया।

तो, ‘नवगति-अद्योगति-दुर्गति’

‘दर्द-दुख-दारुण्यआंसू’

इसी क्रम से ये वेदनाएं बढती हैं, उन्होंने इस बार दार्शनिक व्याख्या की।

हां, तो दर्द-दुख-दारुण्यआंसू

प्रीत-पैसा...ब्’

इस बार दार्शनिक व्याख्या की।

‘प्याज...! तो नहीं, मैंने कहा, ‘आंसू तो प्याज से ही आते हैं।’

‘प्याज की चला जाएगा, यह भी तो सुख-दुख की पर्तों के बीच छुपे आंसुओं को ही बताता है। फिर कविता भी तो छंदमुक्त है। मेरी बात समझने के ‘सम स्तर’ पर आने का प्रयास कर रहे हो’ इस बार उन्होंने वाणी में खराश और सघनता के बीच कुछ ‘पॉज’ डाले।

हां, तो नवगति-अद्योगति-दुर्गति

दर्द-दुख-दारुण्यआंसू

प्रीत-पैसा-पतंग

‘पतंग...!! मैंने कहा।’

हां, रे हां, पतंगी कागज जैसी नश्वर देह, कुछ दिन माया-मोह की सांसारिक हवा पर ऊंचे-नीचे गोते खाती है, कुछ ‘लोगों’ की काट कर अपने फिरकी पर अभिमान करती है, फिर सच्चाई के खंभे से उलझकर वास्तविकता की जमीन पर धड़ाम से गिर जाती है।

‘मंझा तेज हो तो’-मैंने दार्शनिक चर्चा में बितंडावाद की जगह निकालने की कोशिश की।

- ‘हाथ भी कटेगा- गिरेगी जरूर’, भले ही घडा भरने में कुछ समय लग जाए’-अब वाणी में उन्होंने ऊपरी वस्तुओं के साथ मिठास की अतिरिक्त मात्रा मिलाई।

फिर कहा- ‘नवगति-अद्योगति-दुर्गति’

‘दर्द-दुख-दारुण्यआंसू’

‘प्रीत-पैसा-पतंग’

‘जालिमलोशन-जालिमलोशन-जालिमलोशन’

‘छीःछीः...! कविता में अति आधुनिकतावादी घुसपैठ’- उन्होंने कहा।

‘नहीं जी, ये तो व्यवहारवादी अतिक्रमण की व्यवस्था है। प्रेक्टकल एप्रोच’ मैंने सफाई दी।

‘इसी व्यवहारवादी सोच के कारण ही तो पतन हो रहा है’, नैतिकता का लोप हो रहा है, जो कही जरा सा भी फटा पायजामा देखता है अपनी टांग घुसेड़ने लगता है, फिर भाइयों के पैर। अंततः भतीजों के पांव डालकर पायंचे को पूरी तरह फाड़ देता है। इस तरह यह व्यवहारवादी सोच व्यवस्था को जालिम, मजलूम को असहाय, बली को बाहुबली-धनबली बनाने की दिशा में परिवर्तित हो जाती हैब्’ अबकी बार उन्होंने दार्शनिकतावाद में सर्वहारावाद को मिक्स कर व्यवहारवाद की उत्कृष्ट व्याख्या कर डाली। फिर दोबारा ‘मेन लाइन’ में गाडी डालते हुए बोले- ‘मुद्दे से ध्यान मत भटकाओ बंधुवर, पहले चार लाइनें पूरी करने दो।’ फिर कुछ तेज आवाज में स्टार्ट हो गए, ताकि मैं फिर किसी ‘वाद’ को बीच में ना ला दूं।

‘नवगति-अद्योगति-दुर्गति’

‘दर्द-दुख-दारुण्यआंसू’

‘प्रीत-पैसा-पतंग’

‘चिदंबरम-चिदंबरम-चिदंबरम’

हें...! मैं गिरते-गिरते बचा। ‘ये कैसी कविता है’, मैंने कुछ प्रतिवादनुमा सा स्वर निकाला।

‘छंदमुक्त-बंधमुक्त-गंधमुक्त’ जीवन में महक फैलाने वाली’-उन्होंने फिर रहस्यात्मक दार्शनिक व्याख्या की।

‘ये कैसी कविता है, जो जीवन की दार्शनिकता-सांसारिकता की विवेचना करते-करते वित्तमंत्री चिदंबरम पर खत्म होती है’- अपने प्रतिवाद को मैंने विस्तार दिया।

- ‘जानो-समझो-परखो,’ ‘ये कोई मामूली कविता नहीं हैं, इसमें सार छुपा हुआ है-जीवन सार’ उन्होंने फिर कुछ रहस्यात्मक आवाज में बताया।

-‘‘जीवनसार’’...ब्

-‘‘हां, जीवनसार’’... ‘पहली लाइन में बात है लाइफ स्टाइल चेंजिंग’ को लेकर, दूसरी लाइन बात करती है वेदनाओं के बढते चले जाने की फिर तीसरी लाइन में संसार की निस्सारता के बारे में गूढ बात की गई है। चौथी लाइन में जीवन की वास्तविकता की बात कही गई है।

-वे फुसफुसाए।

-‘क्या वास्तविकता!! मैंने उनसे सरल भाषा में विवरण की मांग रख दी।’

-देखो, शेयर मार्केट में पैसा लगाओगे, फिर महंगाई बढ़ेगी। शेयर गिरेंगे, पैसा डूब जाएगा, लाइफ स्टाइल चेंज हो जाएगी, दुख पर दुख मिलने लगेंगे यानि क्रम से वेदनाएं बढेंगी तो संसार तो नश्वर लगेगा ही, बोलो सच है कि नहीं’ उन्होंने और सरलीकृत ढंग से समझाया।

- ‘फिर इनके पीछे जिम्मेदार कौन हैं चिदंबरम, वित्तमंत्रीजी-बोलो है कि नहीं’

- ‘हां, है तो... फिरब्’

- ‘फिर क्या मानव को वैराग्य की दिशा में ले जाए-मोक्ष के बारे में सोचने पर विवश करे। उस महान आत्मा से ज्यादा और किसके नाम से आमजन की इस पहली वास्तविक कविता का समापन किया जा सकता है’-उन्होंने ‘विस्तारवादी’ तरीके से बात समेटी।

- ‘लेकिन गुरु, इतनी महान वास्तविक रचना का आइडिया आफ पास आया कहां से’- मैंने उठते-उठते जानना चाहा।

- ‘‘शेयर मार्केट में 5 लाख गंवाने के बाद’’-कहकर वे उठे और बच्चों को दरवाजा छोड़कर बाहर खेलने के आदेश देने में व्यस्त हो गए।

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संपर्क:

अनुज खरे

सी- 175 मॉडल टाउन

जयपुर

मो. 9829288739.

कविता

krishna kumar ajanabi - akele

अकेले

 

-अनिता सनाढ्य

 

यह कविता बिछुड़े प्रियजनों के बीच की भावनाएं हैं। वह प्रेमी-प्रेमिका हो सकती है या बिछुड़े हुए पति-पत्नी के बीच की घटनाएं। लंबे विरह के बाद नायिका नायक से क्या चाहती है और किस तरह असली प्रेम को प्रदर्शित करती है, उन्हें यहां शब्दों के अलंकारों में पिरोया गया है।

 

हम हैं अकेले कोसों दूर

तुम भी हम से दूर अकेले

ये मीलों का है रास्ता

किस तरह हो कम यह फासला

 

हम हैं अकेले

तुम हो दूर अकेले

अब हैं दूर, हालत है ऐसी

ना मिले सोना, ना मिले चांदी

बैठी हुई हूं ऐसे,

जंग लग गया हो लौहखंड को जैसे

तुम हो ऐसे कि हमें मिलने भी नहीं आते

हम हैं अकेले, तुम हो दूर अकेले

 

उम्मीद थी गले मिलने की

तुम हो कि ख्वाबों में भी मिलने नहीं आते

अब तो नहीं मिलता बाजार में सोना-चांदी

सोना हो गया महंगा, चांदी भी नहीं मिलती

मजबूर हुए हम इतने

जब जब तुम मिलने आना

लाना सोने के गहने, ना पहनूंगी चांदी

पहनूंगी सोना ही, चढ़ा ले चाहे सोने का पानी

 

भले हो पीतल के गहने

पहनूंगी, मैं सोना,

ना पहनूंगी चांदी

नहीं मिलता बाजार में सोना

और गुल हो गई चांदी

तू इतना करना मेरे यार

असली गहना है प्यार

लग जा गले मेरे, यहीं है सोना, असली चांदी।

krishna kumar ajanabi - ye kahan aa gayen hum

कैसे जहां में आ गए हम

---- अनुज खरे

 

किलकारियां भी डराती हों

हंसी भी बिखेरती हो मायूसी,

गर्मजोशी से गायब जैसे गर्माहट,

आंसुओं पर भी होता शुबा,

प्यार पर शक का आलम,

खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।

 

भावनाएं लगे डराने

रिश्ते करें परेशान,

दुख करें हंसी पैदा,

निश्छलता पर लगा हो पहरा,

करुणा का हो निर्वासन

खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।

 

मिले कोई अपना तो फासले ना घटें

तेरे-मेरे की दिखें दरारें,

मिलन में आए बिरह की सदा,

सहयोग पर पाबंदी का कोहरा,

नफरत ने लिया आदर का स्थान,

खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।

 

उम्मीदों में दिखती हो आशंका,

एहसास कराते हों कांटें पैदा,

दोस्ती में दिखे दर्द का सबब,

बात अब हों कुछ बेमतलब,

झूठ ने पैदा किए सारे भरम,

खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।

 

मिट्टी की गंध बिखेरती हो दुर्गंध,

सावन की झड़ी नहीं लगती पावन,

सर्दी की धूप भी नहीं देती कोमल एहसास,

तपती दोपहरी नहीं नींद की आस,

सारे मौसम करने लगे जीना हराम,

खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।

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(चित्र – कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति)

कविताएं

sannipat

- सनत कुमार जैन

 

आश्वासन

अगर मैं यह चुनाव जाता हूँ जीत

दल का नेता बन जाउँ उनके बीच

प्रधानमंत्री की कुर्सी से चिपक जाऊंगा

चाहे को हल्लबोल, इरादे से बदल नहीं पाऊंगा

अधिकारों का दुरुपयोग कर दूसरों को अधिकार दिलाऊंगा

पहला काम होगा मेरा

पूल के नीचे उसके ठेकेदारों का मकान बनवाऊंगा

ठेके में बनी हर इमारत में

उसके बनाने वालों को मुफ्त फ्लैट दिलवाऊंगा

बांध के बहते जल के बाजू

सिचाई कर्मियों की बस्ती बसवाऊंगा

काम दूसरा होगा मेरा

एक सरकारी स्कूल के अध्यापक के बच्चों को

दूसरी सरकारी स्कूल में पढ़वाऊंगा

आरक्षण समर्थक नेता, जनता का इलाज

उन्हीं आरक्षण प्राप्त डाक्टरों से करवाऊंगा

आरक्षण प्राप्त इंजीनियरों से

उनके मकान का निर्माण करवाऊंगा

आरक्षण प्राप्त ड्रायवरों से उनकी गाड़िया चलवाऊंगा

काम तीसरा होगा मेरा

पुलिस की भर्ती के लिए

पहले उम्मीदवार को पुलिसिया मार खिलवाऊंगा

जो जनता अनपढ़ नेता चुने

वहां के सारे स्कूल कॉलेज बंद करवाऊंगा

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सन्निपात

दोस्तों ये प्रजातंत्र है

प्रजा तो ठीक है पर तंत्र में सन्निपात है

खुद उतारती है कपड़े कन्याएं

इतराती है सार्वजनिक करती है दिल की कामनाएं

मन यदि लड़के का ललचाता है

जरा उसके पास जाता है

सेडिंल की बरसात है

दोस्तों ये प्रजातंत्र है

प्रजा तो ठीक है पर तंत्र में सन्निपात है

प्रेमिका प्रेमी को पार्क में बुलाती है

पास उसे बैठाती है

प्रेमी उसका चुबंन चाहता है

प्रेमिका की इच्छाओं को लतियाता है

कहती है प्रेमिका मर्द कायर जात है

दोस्तों ये प्रजातंत्र है

प्रजा तो ठीक है पर तंत्र में सन्निपात है

खाने में जली दाल और गीला भात है

दोस्तों ये प्रजातंत्र है

प्रजा तो ठीक है पर तंत्र में सन्निपात है

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संक्षिप्त जीवन परिचय

नाम- सनत कुमार जैन

पिता- श्री अशोक कुमार जैन

 

पता- सन्मति इलेक्ट्रिीकल

सन्मति गली

दुर्गा चैक के पास

जगदलपुर (छ.ग.)

494001

फोन नं.- 9425507942

 

शिक्षा- बी.ई. इलेक्ट्रिकल

व्यवसाय- इलेक्ट्रिकल कान्ट्रेक्टर

रचना की विधा- कहानी एवं कविता

उपलब्धि- आकाशवाणी में प्रसारण एवं

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन

व्यंग्य

 

आलोचकों के श्री चरणों में सादर...

-- अनुज खरे

 

आलोचकों के सम्मुख एक नवागत व्यंग्यकार का विनम्र-दीन-हीन-आदर भरा विनय निवेदन मय एफिडेविट प्रस्तुत है। इस आशा में कि मामला जमा तो खताएं माफ होंगी। बंदा दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह व्यंग्याकाश में मंडराता फिरेगा। बात के सपोर्ट में विनम्रता की पर्याप्त मात्रा चली जाए इसी पुख्ता बंदोबस्त के तहत एफिडेविट की व्यवस्था की गई है, कि जो कहा जा रहा है वह सच है और साहित्य की अदालत में लीगल तौर पर सच। अतः एक नजर डाल लें।

मैं नवागत व्यंग्यकार, फादर ऑफ... फादर क्या इस क्षेत्र में तो मैं गॉडफादर की तलाश में जुटा हूं, सो, नाम मिलते ही सूचित करूंगा। स्थायी निवासी- स्थायी निवास को लेकर भी ठीक-ठीक नहीं लिख पाऊंगा। जहां भी रहा मोहल्लेवासियों ने लेखन जैसी ‘आदतों’ के कारण स्थायी होने ही नहीं दिया। खैर, मैं अपने पूरे होशोहवास में शपथपूर्वक बयान करता हूं...

-- कि मैं व्यंग्य क्षेत्र का महान लेखक हूं, ऐसी मुझे कोई गलतफहमी नहीं है। मेरी पूरी रचनाएं मौलिक हैं, ऐसा भी मेरा कोई दावा नहीं है। मेरा दिमाग इतना तेज चलता है कि आइडिए के लिए मुझे कहीं से प्रेरणा लेने की जरूरत नहीं पड़ती, ऐसा भी मैंने नहीं कहा। मेरी रचनाएं अत्यंत उच्चकोटि की हैं, कि इस बारे में मेरे मौलिक विचार हैं कि ये अधकचरी रचनाएं यहां-वहां से कच्चा माल उड़ाकर लिखी गई हैं। इसी तरह शब्द भंडार- भाषा सामर्थ्य में भी ऑक्सफोर्ड या ‘बाहरी’ संप्रदाय का जेन-एक्स ‘फेलो’ हूं। इस तरह की हिमाकत करने की ताकत भी नहीं रखता हूं। मेरे साथियों को भी मेरी मेधा पर भारी गर्व है। वे मुझे अत्यंत रचनात्मक व्यक्त के रूप में देखते हैं। इस बारे में मेरा स्पष्टीकरण है कि चाय-समोसे और इसी तरह के भांति-भांति के खाद्य-अखाद्य पदार्थों के रहते अघोरियों तक की छिपी रचनात्मकता पुष्पित-पल्लवित होती रही है, रहेगी। मेरी तो बिसात ही क्या है। इसी प्रकार व्यंग्य क्षेत्र में मेरी आमद एक धुव्र तारे के उदित होने सरीखी है। हालांकि इस बात को लेकर खुश होने से पहले जान लें कि मैं उसे शिद्दत से तलाश रहा हूं, जिसने मुझे इस क्षेत्र में धकेला था।

इस तरह ले-देकर, मिला-जुलाकर, कुल मिलाकर खाकसार की एंट्री इस क्षेत्र में उस समय हुई है, जब खपत ज्यादा है और सप्लाई कम। ऐसे बडे बोल बोलने की भी मेरी क्या मजाल। (नोटः अभी तक के एफिडेविट में आप ‘विनम्रता’ का इतना भारी पुट तो देख ही रहे होंगे। इसे निरंतर नोट करते रहें पूरा पढ लेने के पश्चात् मेरे सह्दय व्यक्तित्व निर्माण में सहायता रहेगी।)

-- कि इसी तरह मेरे पूरे लेखन में पुराने विषयों, लेखकों और उदाहरणों की बहुतायत आपको मिलेगी ही नहीं। अपितु इस संबंध में मेरा निवेदन है कि ऐसा यदि कहीं हुआ भी होगा तो बहुत अनायास ही होगा, अन्यथा मैं तो पूरी की पूरी रचनाएं उडाने का हिमायती रहा हूं, प्रकरण में पत्रकारिता के सिद्धांतों का घोर अनुरागी हूं, जिसके कारण सावधानी इस बात की बरतता हूं कि माल के स्रोत की गोपनीयता उजागर न होने पाए। इस मामले में पूरी प्रेरणा बॉलीवुड के म्युजिक डायरेक्टरों से लेता हूं। बल्कि मुझे तो म्यूजिक डायरेक्टरों की जोड़ी ज्यादा पसंद है। कारण ये कि दो लोग ज्यादा आराम से सावधानी बरतते हुए कई देशों की ‘कला’ का अध्ययन करते हुए ‘इंस्पायर’ हो सकते हैं और माल को घोंटकर देसी तड़का लगा सकते हैं। यानी थोड़ा सा परिवहन कौशल लगाकर माल की स्थानीय सप्लाई दी जा सकती है।

--कि मेरी रचनाओं में सतही लेखन, सपाटता, दोहराव-उलझाव आदि की भारी कमी है। इस मामले में भी मेरा निवेदन है कि यहां भी ठीक ऊपर वाला अवतरण बात को स्पष्ट करने में बेहद सहायक होगा, क्योंकि अगर मेरी रचनाओं में कहीं ये बात आ भी रही है तो मुझसे इसका ज्यादा सरोकार नहीं है। ये उन लेखकों की ‘अक्षम्य भूलें’ हैं, जिन्होंने अपने लेखन में ऐसी आधारभूत बातों की घोर उपेक्षा की है। मेरा तो यहां इतना कसूर अवश्य है कि नकल करते समय या कच्चे माल को घोंटते समय काम के दबाव में इन्हें एक रचना की शक्ल देते समय लापरवाही कर गया हूंगा, अन्यथा तो इस अत्यंत महत्वपूर्ण लेखकीय हिस्से में अतिरिक्त सावधानी बरतता हूं। आपको भी उस मास्टर की तरह मेरी इन भूलों को इग्नोर करना चाहिए, जो बच्चे के होमवर्क में उसके पिता द्वारा की गई गलतियों के लिए उसे थपाडे नहीं लगाते हैं।

--कि मैंने हास्य-व्यंग्य की जबर्दस्त रचनाएं की हैं, बल्कि यहां भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि जिन महानुभावों ने कहीं से ढूंढ-ढांढकर यदि कहीं मेरे ‘नुकीले व्यंग्यों’ को पढ़ा भी है तो उसी दिन से वह बदले में घर पर रखे हुए पुराने-पुराने हथियार लेकर मुझे खोज रहे होंगे, ताकि जंग लगे अस्त्र घोंपकर मुझे ‘टिटनेस’ से तड़पा-तड़पाकर मार सके या फिर कतिपय महानुभाव संवेदनशील होंगे तो ऐसी ‘दर्दभरी’ रचना लिखने पर अपना धन्यवाद ज्ञापन पत्र भेजने के लिए मेरा पता ढूंढ ना पाने के कारण दिन-रात लेटर-बॉक्स या खंभे से सिर फोड रहे होंगे। उनकी ऐसी क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरूप आगरा या ग्वालियर जो भी जगह उनके मूल निवास स्थान से (किराए की गाड़ी के आधार पर तय करें ) दूरी में कम होगी, ले जाकर ‘डिपॉजिट’ करवाए जा चुके होंगे।

-- कि मेरी रचनाएं समाज में एक नया आदर्श स्थापित कर रही हैं, बल्कि मेरी रचनाओं के पात्रों के बीच संवाद इतने ‘उच्चस्तरीय’ हैं कि माता-पिता बच्चों से इन रचनाओं को दूर ही रखने का प्रयास करते हैं। कई स्थानों पर तो पुलिस ट्रेनिंग के पाठ्यक्रमों में इनको लिए जाने की संस्तुति कई ‘विषय विशेषज्ञ’ लगातार कर रहे हैं। रचनाओं में गालियों के प्रयोग में तो कई स्थानों पर इतनी मौलिकता है कि भाषा विज्ञानी तक इनकी उत्पत्ति के स्रोत तक पहुंच पाने में सफल नहीं हो पाए हैं। इस कारण अनायास ही इन श?दों को ‘क्लासिकल’ का दर्जा भी प्रदान किया जाने वाला है। (भाषा विज्ञानियों का इस विषयक कच्चा प्रमाण-पत्र संलग्न है।) इसी तरह बॉलीवुड के कुछ स्थायी विलेनों को इन रचनाओं के निरंतर पठन-पाठन करते भी कई पत्रकारों ने पाया है। विशेष रूप से अड्डे वालों सीनों या लड़की को छेड़ने वाले शॉट्स में तो ‘स्पेशल इफेक्ट्स’ पैदा करने के लिए कई विलेन इसी ‘क्लासिकल’ शब्दावली की बारीक नकल के चुटके यूनिट की नजर बचाकर पढ़ते भी देखे गए हैं। अतः इस संबंध में भी रचनाओं की तीक्ष्णता-मारकता आदि-आदि के ‘आदर्श’ स्वतः ही स्पष्ट है।

-- कि मेरी रचनाओं में व्यंग्य की गहराई तथा हास्य की ऊंचाई शिद्दत से दिखाई देती है। इन दोनों मुद्दों पर भी मेरे कुछ आत्म निवेदन हैं। मैंने इस संबंध में एक व्यक्त से उपरोक्त तथ्यों का उल्लेख किया था, जिस पर उसने मेरी पहली व्यंग्य रचना पढ़ते ही कुएं में छलांग लगा दी थी, ताकि रचना में छिपी व्यंग्य की गहराई ‘समझ’ सके। वो तो खैर समझा या नहीं, यह मैं इसलिए नहीं समझ पाया क्योंकि इस ‘कृत्य’ के फलस्वरूप मोहल्ले से कंधों पर जाने से बचने के लिए मैं वहां से तभी खिसक लिया था। हास्य की ऊंचाई वाले प्रकरण में कुछ यूं रहा कि जब मैं अपनी रचना का सस्वर पाठ (जी हां व्यंग्य रचना का भी सस्वर पाठ होता है) कर रहा था तो पहली मंजिल पर खड़े एक व्यक्ति ने हंसते-हंसते मुझे बालकनी के पास बुलाया था। रचना में हास्य की ऊंचाई वाला मेरा भ्रम तभी टूटा, जब दो घंटे बाद मैंने खुद को जमीन पर और चारों ओर लोगों को खड़े पाया। प्रकरणानुसार जानकारी दी गई कि बालकनी में खड़े हुए महानुभाव अद्पगले पागल थे और मेरी रचना के श्रवण से उनके पागलपन के दौरे और बढ़ गए थे। इसी दौरान उन्होंने मुझे पास बुलाकर बख्शीश के तौर पर ऊपर से ही दो गमले प्रदान कर दिए थे, जिन्हें मैं अपनी रचना प्रतिसाद के रूप में लपक नहीं पाया था। तदुपरान्त खोपड़े में दो जगह स्थापित हुए टॉवरों से यह प्रकरण लंबे समय तक स्थानीय स्तर पर वॉइस मोड्यूलेशन के साथ प्रसारित होता रहा। अतः उक्त अनुभव भी ‘दर्दीला हास्य-व्यंग्य’ बनकर रह गया।

-- कि मेरी रचनाओं में कहीं उबाऊ या रसहीन विस्तार नहीं है। बल्कि केवल प्रेमिका शृंगार, नायक-नायिका संवाद, नायिका की ‘चिंता’ में चिंतातुर माता-पिता के अवतरण, विरहिणी नायिका के प्रेमपत्रों आदि-आदि के महत्वपूर्ण विवरणों को छोड़कर कहीं भी इस तरह के आक्षेप नहीं लगाए जा सकते। हालांकि यहां भी कुछ स्पष्टीकरण आवश्यक हैं। क्योंकि ‘रस’ यहां हर जगह मौजूद है। अधिकांश जगह नायक-नायिका जूस की दुकान पर ही मिलते हैं, जहां नायिका अपने बीमार पिता के लिए जूस पैक करवाने के लिए आई हुई होती है। इसी तरह प्रेमपत्रों का मामला भी रसमय है क्योंकि इन पत्रों का ‘कबूतर’ जूस सेंटर का नौकर रामू ही है। हां, कहीं कहानी को आगे बढ़ाने के लिए गढ़े गए पेड़ का फल से, फूल का पत्तियों से संवाद जैसी सहायक बातों में ही यह आक्षेप किसी सीमा तक स्वीकार हो सकते हैं। हालांकि यहां उबाऊपन वाली बात पर मुझे खुद को आश्चर्य है क्योंकि यह सारे शाश्वत दृश्य तो मैंने निजी हाथों से ऐसी कालजयी रचनाओं से उड़ाए हैं, जिन्हें बेस्ट सैलर का दर्जा हासिल है। अतः यहां खोट जड़ों में काफी पहले से मौजूद रहा होगा, वाली बात ज्यादा मौजूं लगती है।

-- कि मैं कहना तो ना जाने क्या-क्या, कितना-कितना, कुछ-कुछ, बहुत कुछ चाह रहा था। लेकिन आलोचना की फैक्ट्री में आपकी व्यस्तताओं के कारण जानता हूं कि आफ पास समय की अत्यंत कमी है। कहां आप भाषा-रचना-शिल्प विधान-रचना सौष्ठव-कथ्य-कथन-तथ्य-प्रेरणा आदि के समूल उच्छेदन के लिए ‘तर्क’ के नुकीले औजार निर्माण के महान ध्येय में व्यस्त हैं। कहां मैं कितनी ‘विराट सी अपेक्षा’ में आपका अमूल्य सहयोग-समय पाने की अभिलाषा में प्रत्यनशील हूं। क्योंकि मैं जानता हूं कि आपकी एक ‘दिव्यदृष्टि’ पड़ते ही बडे से बडे रचनाकार भी ‘खोट-विक्षत’ होकर साहित्यिक रणभूमि में खेत रहते हैं, मेरी हस्ती ही क्या है। अतः इतना ही कहूंगा कि औजारों का प्रयोग मेरी तुच्छ रचनाओं पर करने की बजाय हो सके तो उन पर मानवीय दृष्टिकोण से, हो सके तो संवेदनशील होकर, हो सके तो अपनी ही रचनाएं मानते हुए समीक्षित करने का कष्ट करें।

अंततः पूरे प्रकरण में जजरूपी आलोचक चाहे जो निर्णय लें, खाकसार की ओर से विनम्रता-बड़प्पन-आदर-अनुनय-नीर-क्षीर-विवेक आदि-आदि विनय के सभी सूचकों के माध्यम से अपना निवेदन आलोचकों के श्री चरणों में प्रस्तुत कर दिया गया है। बाकी व्यवस्थाएं भी ‘फिट’ करने के लिए अतिरिक्त रूप से प्रयासरत हूं ही। अतः श्रीमान से घोर सदेच्छाओं के प्रवाह की अपेक्षा रखता हूं। पूरी आशा है कि अनुकूल परिणाम तो आएंगे ही, बंदा भी ‘व्यंग्य-गैलेक्सी उर्फ आकाशगंगा अपार्टमेंट’ में एकाध ‘फ्लैट’ पाने में निश्चय ही सफल हो जाएगा, अन्यथा... ? अन्यथा तो पूरे मामले में आलोचकों पर की गई रिसर्च के दौरान कुछ ‘अपने किस्म के’ आलोचकों से भरपूर समर्थन और सहयोग की जुगाड़ तो बिठा ही ली है। आप भी लेखक-साहित्यकार आदि-आदि कुछ हैं तो निजी रूप से संपर्क करके मेरे अनुभव से लाभान्वित हो सकते हैं।

पहला गवाह- कोई तैयार नहीं हो रहा।

दूसरा गवाह- तैयार है, दस्तखत नहीं कर रहा।

हस्ताक्षर

(नोट: मेरे व्यंग्याकाश पर छा जाने के डर से कोई साला दस्तखत नहीं कर रहा है। अतः मामला कुछ पेंडिंग सा है। जल्दी ही ‘अपने’ गवाहों की भी व्यवस्था बिठा लूंगा। फिर वहां... हां...! हां...! वहीं व्यंग्य गैलेक्सी में ‘फ्लैट’ कर जाने से कोई नहीं रोक सकता। अतः एक उदीयमान व्यंग्यकार के ‘प्रकटीकरण’ का कुछ दिन और इंतजार कर लीजिए, प्लीज।)

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संपर्क:

अनुज खरे

सी-- 175 मॉडल टाउन

जयपुर

मो. 9829288739

रक्त दान महा दान

नेत्र दान दानों में दान

शरीर दान सर्वस्व दान

 

मनुष्य योनि ईश्वर की महान् कृति है और हम मनुष्यों ने कई बार ये चरितार्थ भी किया है कि वास्तव में हम सर्वश्रेष्ठ हैं । हम सभी पैदा होने से लेकर मृत्यु शैया तक सारा जीवन अपने लिए ही कुछ न कुछ करते रहते हैं । हालांकि इस शाश्वत सत्य से हम सभी परिचित भी हैं कि जीवन क्षणभंगुर है । एक बार ऋषि दधीचि ने अपने सम्पूर्ण शरीर को गैया से इसीलिए चटवाया था कि उनकी हड्डियों से बने वज्र से देवता विजयी हों अर्थात् धर्म का पालन हो सके । तो आओ क्यों न हम अपने जीवन को आने वाली पीढियों के नाम कर दें।

वर्तमान समय में रक्त दान, नेत्र दान और उससे भी आगे बढकर अपने शरीर को मृत्यु के बाद मेडिकल साइंस के लिए दान देना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है । हम बहुत समय से पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित रहते हैं । वहां भी कई महान् व्यक्तियों ने अपने शरीर को मेडिकल साइंस के लिए दान देकर चिकित्सा विज्ञान में अपना वो योगदान दिया जिसे भुलाया ना जा सकेगा और हम सभी इसके लिए उनके ऋणी रहेंगे ।

मृत्यु के पश्चात् शरीर को मेडिकल साइंस को दान देकर हम ऐसी कई लाइलाज बीमारियों के इलाज ढूढंने में सहायक सिद्घ होंगे जिनके कारण से आज हमारे आस पास कई लोग परेशान है या काल का ग्रास बन चुके हैं ।

 

दुनिया में आओ तो यूं आओ

दुनिया से जाओ तो यूं जाओ

आओ तो ले आना

जाओ तो दे जाना

कविता

trend

-अनिता सनाढ्य

यूनिक ट्रेंड...

चाहे हो जाए सब टेंश
ऐसा आया ट्रेंड
बनाए हैं बहुत फ्रेंड्स
चाहे हो जाए खुद का एण्ड
ऐसे बनाने हैं बहुत फ्रेंड्स
चाहे हो जाए खुद का एण्ड
ऐसा आया ट्रेंड

करना है हर क्षण फैशन
चाहे रह जाए स्कूल लैशन
होती रहे टेंशन
ऐसा आया ट्रेंड

देना है सबको चैलेंज
चाहे ऐसा आया ट्रेंड

देना है सबको चैलेंज
चाहे चैलेंज
चाहे सिर्फ लेजी

गलती करते फिरते
ना छोडेंगे कोई ऐसा निशान
क्योंकि सबको होगी पहचान

अपनों को दे रहे हैं गम
खुद भी हो चुके हैं डंप
नहीं होने ये राइट
इन्हें करना होगा इनसाइड
ऐसा आया ट्रेंड

सब हो जाए साइलेंट
सैट करते खुद के बाल
चाहे फैल हो जाए इस साल
ऐसा आया ट्रेंड

करेंगे स्कूल बंक
फिर मारेंगे बातों से डंक
देखेंगे बिन्दास मूवी
बताएंगे अपनी खूबी
चाहे हो जाए सबसे दूरी
ऐसा आया ट्रेंड

करना नहीं है इन्हें रिविजन
चाहे पीछे रह जाए डिविजन
एक्जाम होता जब नीयर
तब कॉपी करते फेयर
ऐसा आया ट्रेंड

चाहिए सबको अपना सैल
करनी है फ्रेंड को बैल
ना जाने करते किसको कॉल
देते फिरते मिस्ड कॉल

नहीं चूका कोई ऐसा मौका
दे रहे सभी को धोखा
करते फिरते इश्क
चाहे हो जाए कैसा भी रिस्क

देते है सबको बैट
ना करेंगे किसी को नैग्लेक्ट
करना है दो-चार को सलेक्ट

जाने-अनजाने में देते सफाई
चाहे हो जाए किसी से भी क्राइम
इन सब काम में हैं क्रेजी

यह कविता आजकल के बच्चों में आए ट्रेंड को लेकर हैं, अनायास ऐसी हरकत कर देते हैं जो उनके ही लिए ही नहीं बल्कि परिवार के लिए भी घातक हो सकती है। यह कविता किशोरवय उम्र के बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि उनके अभिभावकों को सचेत करने की एक कोशिश मात्र है। इससे प्रेरणा लेकर वे अपने बच्चों का बेहतर ख्याल रखने की कोशिश करेंगे।

अनिता सनाढ्य, जयपुर

कविताएँ

 

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 

दस नम्बरी दोहे

 

नेता ऐसा चाहिए, डाकू तक घबराय ।

धुआँधार भाषण करे ,ले सबको बहकाय ॥

 

कुर्सी मधु से सौ गुनी,मादकता अधिकाय ।

वा पीकर बौराय जग ,या पाकर बौराय ॥

 

कुर्सी जननी ,ज़िन्दगी,सबकी इस तक दौर ।

इसके बिन संसार में ,और कहाँ पर ठौर ॥

 

बधिक आज नेता बने ,भरे हज़ारों खोट ।

जिस वोट से विजय मिली ,देते उसको चोट ॥

 

काले ब्रजबिहारी को पूज रहा संसार ।

काले धन को जोड़कर क्यों घबराते यार ॥

 

नेता खड़ा बज़ार में,जोड़े दोनों हाथ ।

जेब हमारी जो भरे ,चले हमारे साथ॥

 

जन-सेवा के नाम की झोंकी ऐसी धूल ।

जनता झाँसे में फँसी, गई सभी कुछ भूल ।

 

जीवन कच्चा काँच है ,कर लो पक्का काम।

रिश्वत लेकर घर भरो,जपो हरि का नाम ॥

 

मिली छूट माँ –बाप से ,लूट मची दिन-रात ,

गाली देकर और को,खाओ खुद भी लात ॥

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कलियुगी एकलव्य

कलियुग में बोले द्रोणाचार्य एकलव्य से-

‘प्रसन्न हूँ तुम्हारी भक्ति से

जो चाहते सो माँगो ।’

एकलव्य बोला –‘गुरुदेव ,

यदि प्रसन्न हैं मुझसे

तो एक काम कीजिए-

द्वापर में आपने

कटवाया था अँगूठा

यह कलियुग है

अपना दायाँ हाथ

काटकर दे दीजिए ।

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फूल कनेर के

 

किसने रोके पाँव अचानक

धीरे-धीरे टेर के ।

उजले –पीले भर आए-

आँगन में फूल कनेर के । ।

दिन भर गुमसुम सोई माधवी

तनिक नहीं आभास रहा ;

घिरा अँधेरा खूब नहाई

सुगन्ध- सरोवर पास रहा ।

पलक बिछाए बिछे धरा पर

प्यारे फूल कनेर के ।

यह मन बौराया चैन न पाए

व्याकुल झुकती डाल –सा ;

पीपल के पत्ते-सा थिरकता

हिलता किसी रूमाल-सा ।

चोर पुजारी तोड़ भोर में ,

ले गया फूल कनेर के ।

बाल कहानियाँ

-सीमा सचदेव

1.शेर और कुत्ता
आओ बच्चो सुनो कहानी
न बादल न इसमें पानी

इक कुत्ता जंगल में रहता
और स्वयं को राजा कहता
मैं सबकी रक्षा करता हूँ
और न किसी से मैं डरता हूँ
बिन मेरे जंगल है अधूरा
असुरक्षित पूरा का पूरा
मुझ पर पूरा बोझ पड़ा है
मेरे कारण हर कोई खड़ा है
मै न रहूँ , न रहेगा जंगल
मुझसे ही जंगल में मंगल
सारे उसकी बातें सुनते
पर सुन कर भी चुप ही रहते
समझे स्वयं को सबसे स्याना
था अन्धों में राजा काना
-------------------------------------
पर यह अहम भी कब तक रहता
कब तक कोई यह बातें सुनता
इक दिन टूट गया अहँकार
जंगल में आ गई सरकार
बना शेर जंगल का राजा
खाता-पीता मोटा-ताजा
शेर ने कुत्ते को बुलवाया
और प्यार से यह समझाया
छोड़ दो तुम झूठा अहँकार
और आ जाओ मेरे द्वार
बिन तेरे नहीं जंगल सूना
यह तो फलेगा फिर भी दूना
पर कुत्ते को समझ न आई
उसने अपनी पूँछ हिलाई
----------------------------------------
मैं यहाँ पहले से ही रहता
हर कोई मुझको राजा कहता
कौन हो तुम यहाँ नए नवेले
अच्छा यही, वापिस राह ले ले
----------------------------------------
ले लिया उसने शेर से पंगा
मच गया अब जंगल में दंगा
भागे यहाँ-वहाँ बौखलाया
खुद को भी कुछ समझ न आया
जो अन्धो में राजा काना
समझता था बस खुद को स्याना
अब तो वही बना नादान
शेर के हाथ में उसकी जान
---------------------------------------
छुप कर गया शेर के पास
बोला मैं जानवर हूँ खास
न बदनाम करो अब मुझको
राजा मैं मानूँगा तुझको
बख़्श दो मुझको मेरी जान
नहीं करूँगा मैं अभिमान
----------------------------------------
शेर ने कुत्ते को माफ कर दिया
और अपना मन साफ कर दिया
तोड़ा कुत्ते का अभिमान
और बख़्श दी उसको जान

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2

चिंटू-मिंटू
चिंटू-मिंटू जुड़वाँ भाई
एक ही सूरत दोनों ने पाई
करते बच्चों संग लड़ाई
जिससे उनकी माँ तंग आई
पापा उनको बहुत रोकते
पर दोनों ही अकल के मोटे
टीचर भी उनको समझाती
पर दोनों को समझ न आती
किसी न किसी को रोज़ पीटते
और कक्षा में हल्ला करते
सारे उनसे नफ़रत करते
उनकी मार से सारे डरते
बीमार पड़ा था इक दिन चिंटू
गया स्कूल अकेला मिंटू
बच्चों ने तरकीब लगाई
और मिंटू को सबक सिखाई
कोई भी उससे नहीं बोलेगा
बैठेगा वो आज अकेला
न कोई उस संग लंच करेगा
न उसके संग कोई खेलेगा
मिंटू ने थोड़ा समय बिताया
और फिर जब बच्चों को बुलाया
सभी ने उससे मुँह था फेरा
देखता रह गया वो बेचारा
किसी तरह से दिन बिताया
और फिर जब घर वापिस आया
बैठ गया था घर के कोने
लगा था ज़ोर-ज़ोर से रोने
चिंटू बोला क्या हुआ भाई?
किसी ने तुझसे की लड़ाई?
जल्दी से तू कह दे मुझसे
बदला लूँगा अभी मैं उससे
मिंटू बोला न मेरे भाई
बंद करो अब सारी लड़ाई
अब हम नहीं लड़ेंगे किसी से
मिलजुल कर ही रहेंगे सबसे
मिंटू ने सारी बात बताई
चिंटू को भी समझ में आई
दोनों बन गये अच्छे बच्चे
सारे बन गये दोस्त सच्चे
..........................................................................................
बच्चो तुम भी मिलकर रहना
कभी न किसी से झगड़ा करना

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3.

महलो की रानी

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एक कहानी बड़ी पुरानी

आज सुनो सब मेरी जुबानी

विशाल सिन्धु का पानी गहरा

टापू एक वहाँ पर ठहरा

छोटा सा टापू था प्यारा

कुदरत का अद्बुत सा नज़ारा

स्वर्ग से सुन्दर उस टापू पर

मछलियाँ आ कर बैठती अक्सर

धूप मे अपनी देह गर्माने

टापू पे बैठती इसी बहाने

उसपर इक जादू का महल था

जिसका किसी को नही पता था

चाँद की चाँदनी मे बाहरआता

और सुबह होते छुप जाता

उसको कोई भी देख न पाता

न ही किसी का उससे नाता

एक दिन इक भूली हुई मछली

रात को जादू की राह पे चल दी

सोचा रात वही पे बिताए

और सुबह होते घर जाये

देखा उसने अजब नज़ारा

चमक रहा था टापू सारा

सुंदर सा इक महल था उस पर

फूल सा चाँद भी खिला था जिस पर

देख के उसको हुई हैरानी

पर मछली थी बडी सयानी

जाकर खडी हुई वह बाहर

पूछा ! बोलो कौन है अन्दर

क्यो तुम दिन मे छिप जाते हो?

नज़र किसी को नही आते हो?

अन्दर से आई आवाज़

खोला उसने महल का राज

रानी के बिन सूना ये महल

इसलिए रक्षा करता है जल

ढक लेता इसे दिन के उजाले

क्योकि दुनिया के दिल काले

....................................

मछली रानी बडी सयानी

समझ गई वो सारी कहानी

चली गई वो महल के अन्दर

अब न रहेगा महल भी खँडहर

...........................................

मछली बन गई महल की रानी

अब न रक्षा करेगा पानी

महल को मिल गई उसकी रानी

खत्म हो गई मेरी कहानी

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4.

कौआ और कबूतर


एक कबूतर एक था कौआ
रहते थे उपवन में भैया
पास-पास थे दोनों के घर
बातें करते दोनों अकसर
दोनों ही की अलग थी जाति
पर सुख-दुख के अच्छे साथी
कबूतर बड़ा ही सुस्त था भैया
बैठा रहता पेड़ की छैया
पर उतना ही चतुर था कौआ
न देखे वह धूप न छैया
कौआ सुबह-सुबह ही जाता
जो भी मिलता घर ले आता
दोनों मिलकर खाना खाते
गाना गाते और सो जाते
कभी-कभी कहता था कौआ
तुम भी चलो साथ मेरे भैया
बड़ा आलसी था वो कबूतर
बोलता मैं बैठूँगा घर पर
एक बार गर्मी का मौसम
सूख गया था सारा उपवन
ख़त्म हो गया पानी वहाँ पर
रहते थे वे दोनों जहाँ पर
गला सूखता था हर पल ही
पर कबूतर तो था आलसी
प्यास से वह बेहाल हो गया
और देखते ही निढाल हो गया
कौए ने जब देखा उसको
नहीं रहा था होश भी उसको
उड़ गया कौआ पानी लाने
लग गया उसकी जान बचाने
दूर गाँव वह उड़ कर आया
चोंच में भर कर पानी लाया
पानी जो कबूतर को पिलाया
तो वह थोड़ा होश में आया
कौए की मेहनत रंग लाई
और कबूतर को सोझी आई
वह भी अगर आलस न करता
तो इतनी तकलीफ़ न जरता
आज अगर कौआ न होता
तो वह बस प्यासा ही मरता
ठान लिया अब तो कबूतर ने
नहीं बैठेगा वो भी घर में
वह भी कौए संग जाएगा
अपना खाना खुद लाएगा
अब वो दोनों मिलकर जाते
जो भी मिलता घर ले आते
दोनों ही मिलजुल कर खाते
गाना गाते और सो जाते
...............................................
बच्चो तुमने सुनी कहानी
तुम न करना यह नादानी
कभी भी तुम न करना आलस
बढ़ते रहना आगे हरदम

************************************************

5.

रामू-शामू


रामू-शामू दो थे बंदर
रहते थे इक घर के अंदर
मालिक उनका था मदारी
उन्हें नचाता बारी-बारी
सारा दिन वे नाचते रहते
फिर भी खाली पेट थे रहते
नहीं मिलता था पूरा खाना
देता मदारी थोड़ा सा दाना
तंग थे दोनों ही मलिक से
भागना चाहते थे वे वहाँ से
इक दिन उनको मिल गया मौका
और मलिक को दे दिया धोखा
इक दिन जब वो सो ही रहा था
सपनों में बस खो ही गया था
रामू-शामू को वह भूला
छोड़ दिया था उनको खुला
भागे दोनों मौका पाकर
छिपे वो इक जंगल में जाकर
पर दोनों ही बहुत थे भूखे
वहाँ पे थे बस पत्ते सूखे
निकल पड़े वो खाना लाने
कुछ फल, रोटी या मखाने
मिली थी उनको एक ही रोटी
हो गई दोनों की नियत खोटी
रामू बोला मैं खाऊँगा
शामू बोला मैं खाऊँगा
तू-तू, मैं-मैं करते-करते
बिल्ली ने उन्हें देखा झगड़ते
चुपके से वह बिल्ली आई
आँख बचा के रोटी उठाई
रोटी उसने मज़े से खाई
और वहाँ से ली विदाई
देख रहा था सब कुछ तोता
जो था इक टहनी पर बैठा
तोते ने दोनों को बुलाया
और बिल्ली का किस्सा सुनाया
फिर दोनों को सोझी आई
जब रोटी वहाँ से गायब पाई
इक दूजे को दोषी कहने
लगे वो फिर आपस में झगड़ने
बस करो अब तोता बोला
और उसने अपना मुँह खोला
जो तुम दोनों प्यार से रहते
रोटी आधी-आधी करते
आधा-आधा पेट तो भरते
यूँ न तुम भूखे ही रहते
छोड़ो अब यह लड़ना-झगड़ना
सीखो दोनों प्यार से रहना
जो भी मिले बाँट कर खाना
दोषी किसी को नही बनाना
अब तो उनकी समझ में आई
झगड़े में रोटी भी गँवाई
अब न लड़ेंगे कभी भी दोनों
रहेंगे साथ-साथ में दोनों

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6.मम्मी और मुन्ना
इक दिन माँ से मुन्ना बोला
छोटा सा पर बड़ा मुँह खोला
आओ माँ टी.वी पे देखो
वैसा घोला(घोड़ा)मुझे भी ले दो
मै भी घोले पे बैठूँगा
फिर न कभी भी मै रोऊँगा
मुन्ने ने ऐसी जिद्द मारी
चाहिए अभी घोड़े की सवारी
माँ ने मुन्ने को समझाया
तरह तरह से भी ललचाया
ले लो चाहे कोई खिलौना
पर घोड़े के लिए न रोना
घोड़ा जो लातों से मारे
तो दिख जाएँ दिन मे तारे
तुम घोड़े को कहाँ बाँधोगे ?
भूखा होगा तो क्या करोगे ?
पर नन्हा सा मुन्ना प्यारा
दिखाया गुस्सा सारा का सारा
जब तक घोला नहीं मिलेगा
तब तक कुछ भी न खाऊँगा
न तो किसी से बात कलूँगा(करूँगा)
न ही खिलौनो संग खेलूँगा
करती क्या अब माँ बेचारी ?
घोड़े की तो कीमत भारी
कैसे मुन्ने को समझाए ?
और घोड़े की जिद्द हटाए
आया माँ को एक ख्याल
चली समझदारी की चाल
ले गई एक खिलौना घर
जहाँ पे बच्चे खेलते अकसर
भरा खिलौनों से वो घर
एक से बढ़कर एक थे सुन्दर
वहाँ पे था लकड़ी का घोड़ा
चलता था जो थोड़ा-थोड़ा
उस पर मुन्ने को बिठाया
और फिर घोड़े को घुमाया
पकड़ लिया मुन्ने ने घोड़ा
घोड़ा दुम दबा के दौड़ा
इतने मे मुन्ना खुश हो गया
मम्मी का मसला हल हो गया
माँ बेटा दोनो खुश हो गए
हँसते-हँसते वो घर को

[14072007081.jpg]

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7

चीनू-मीनू

चीनू-मीनू दो सहेली
नहीं रहती थीं कभी अकेली
दोनों ही थीं बड़ी स्यानी
आओ सुनाऊं उनकी कहानी
दोनों पास-पास ही रहती
एक ही कक्षा में थी पढ़ती
चीनू को मिलता एक रुपैया
मीनू को भी एक रुपैया
दोनों ने सोचा कुछ मिलकर
पैसे जोड़ें सबसे छुपकर
दोनों ने इक-इक डिब्बा ढूँढ़ा
सबसे उसे छिपाकर रखा
आठ-आठ आना दोनों बचा के
रख देतीं वो सबसे छुपा के
दोनों ने जोड़े कुछ पैसे
बचा-बचा के जैसे-तैसे
स्कूल में कुछ बच्चे थे ऐसे
जिनके पास नहीं थे पैसे
न कॉपी, पेन्सिल न बसते
घर का काम वे कैसे करते?
टीचर उनको रोज पीटते
पर बच्चे थे, वे क्या करते?
चीनू-मीनू ने घर पे बताया
और पैसों का डिब्बा दिखाया
दोनों बच्चियाँ भोली-भोली
पैसे दे कर ये थी बोली
बच्चों के पास नहीं हैं पैसे
क्यों न उनको ले कर दे दें
कुछ कॉपी, पेन्सिल और बसते
ताकि पढें वो हँसते-हँसते
सबको उनका विचार भा गया
और सारा सामान आ गया
मिल गया बच्चों को सामान
बन गई माँ-बाप की शान
सबको उन पर गर्व हुआ था
उनका ऊँचा नाम हुआ था

*****************************************************

8.

आऊँ दिखाऊँ तुम्हें....... एक भयानक सपना

एक सपना
रात को सोते हुए अचानक
देखा सपना एक भयानक
आओ मैं तुम सबको बताऊँ
सत्य से परिचय करवाऊँ
सूखी धरा प्यासे लोग
सभी को कोई न कोई रोग
चलते मुँह पर रखके रुमाल
सूखे पानी के सब ताल
नहीं था खाने को शुद्ध खाना
न पक्षियों के लिए ही दाना
ऑक्सीजन के भरे सिलेण्डर
रखे हुए थे सब कंधों पर
सारे दिखे कुली के जैसे
चलते-फिरते मरीज़ों जैसे
बडा भयानक था वो मंजर
देख के मैं तो गई थी डर
फिर एक किरण की सुनी पुकार
बोली मन में करो विचार
मानव की गलती का ही फल
जो नहीं मिलता है शुद्ध जल
काटता रहता मानव पेड़
करता प्रकृति से छेड़
तभी तो शुद्ध नहीं है वायु
कम हो गई मानव की आयु
न तो शुद्ध मिलता है खाना
न पक्षियों के लिए ही दाना
पर जो थोड़ा करो विचार
हो सकता है इनमें सुधार
इक-इक वृक्ष जो सभी लगाएँ
तो यह वातावरण बच जाए
वायु तो शुद्ध हो जाएगी
धरा पे हरियाली आएगी
खाने को होंगे मीठे फल
बादल बरसाएगा स्वच्छ जल
होंगे नहीं भयानक रोग
खुश रहेंगे सारे लोग
.....................................
आओ हम सब वृक्ष लगाएँ
अपना पर्यावरण बचाएँ
ऐसे दे हम सब सहयोग
मिटाएँ प्रदूषण का रोग

*************************************************

9.पर्यावरण बचाओ अभियान (कथा-काव्य)
पक्षियों ने इक सभा बुलाई
सबने अपनी बात बताई
सुन रहा था बूढ़ा तोता
जो ऊँची डाली पर बैठा
सबकी समस्या लाया कौआ
हम सब है मुश्किल में भैया
न तो मिलता हमें स्वच्छ जल
और दिखते हैं बहुत कम जंगल
न तो हमें मिलते मीठे फल
न ही शुद्ध वायु की हलचल
न दिखती है शीतल छाया
जाने कैसा समय है आया
दूर देश उड़ कर जाते हैं
तब जाकर भोजन पाते हैं
थोड़ा चोच में भर लाते हैं
उड़ते-उड़ते थक जाते हैं
मानव काटता है सब पेड़
करता प्रकृति से छेड़
वायु भी अब दूषित हो गई
गन्दगी सुन्दर धरा पे भर गई
किया न गर अब इस पे विचार
तो न जिएँगे दिन भी चार
फैला है हर जगह प्रदूषण
हो गया मैला स्वच्छ वातावरण
लुप्त हो रही पक्षी जाति
नहीं है कोई इन सबका साथी
.......................................
सुन कर यह सब तोता बोला
धीरे से अपना मुँह खोला
यह सब समस्याएँ गम्भीर
पर रखो तुम थोड़ा धीर
क्यों न हम मिलकर सुलझाएँ
हम अपने कुछ नियम बनाएँ
उन नियमों का पालन करेंगे
हरा-भरा वसुधा को करेंगे
हम सब जो भी फल चखेंगे
उसके बीज नहीं फैकेंगे
रखेंगे उनको सड़को किनारे
सोचो जरा सारे के सारे
हम सब मिलकर करेंग यह सब
कितने पौधे फूटेंगे तब
देंगे हम ऐसे सहयोग
होंगे सुखी सारे ही लोग
हरी-भरी वसुधा फिर होगी
जिससे वायु भी शुद्ध होगी
मिलेंगे फिर हमको मीठे फल
बादल बरसाएगा स्वच्छ जल
नहीं रहेगा फिर प्रदूषण
शुद्ध होगा सारा वातावरण
चलो आज से ही अपनाएँ
हम सब सुन्दर वृक्ष लगाएँ
इसको जीवन में अपनाएँ
हरा-भरा वसुधा को बनाएँ
.............................................
बच्चो तुम भी समझो बात
कुदरत की उत्तम सौगात
वृक्ष लगाओ सारे मिलकर
गन्दगी न फैलाओ धरा पर
आओ धरा को सुन्दर बनाएँ
हम सब इक-इक वृक्ष लगाएँ
**********************************
अपील:- प्रकृति अनमोल है। धरा की सुन्दरता, पर्यावरण को सम्हालना हमारी

नैतिक जिम्मेदारी है शुद्ध वातावरण में जीने का हम सब का अधिकार है इस को स्वच्छ बनाने में सहयोग दें...... सीमा सचदेव

10.

पानी है अनमोल
आज मैं लेकर आई कहानी
इक मेंढक की है नादानी
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एक बाग में था तालाब
सुन्दर सा नहीं कोई जवाब
तरह-तरह के खिले थे फूल
छोटे से तालाब के कूल
वहाँ पे कुछ मेंढक रहते थे
जल में जलक्रीड़ा करते थे
कभी अन्दर कभी बाहर जाते
सब तालाब में खूब नहाते
वहाँ पे पूरी मस्ती करते
नहीं वो कभी किसी से डरते
सारे ही वहाँ खुश रहते
उसे स्वर्ग सा सुन्दर कहते
मेंढक इक उनमें शैतान
बुद्धि में सबसे नादान
करता वो ऐसी शैतानी
जिससे गन्दा हो जाए पानी
पानी में कचरा वो फेंकता
और फिर सबका तमाशा देखता
पत्तों में जाकर छुप जाता
और उन सबको बड़ा सताता
सारे मेंढक दुखी थे उससे
क्या करे समझे वो जिससे
प्यार से उसको सब समझाते
और पानी का मूल्य बताते
न बर्बाद करो तुम पानी
पानी से मिलती जिंदगानी
जो तुम इसको गंदा करोगे
तो फिर जाकर कहाँ रहोगे
जो गंदा पानी पियोगे
तो बीमारी से मरोगे
साफ स्वच्छ होगा जो यह जल
तभी होगा अपना मन निर्मल
पर मेंढक ना समझे बात
सबने मिल सोचा इक रात
नया कोई ढूँढ़ेगे ठिकाना
इस मेंढक को नहीं बताना
चुपके से यहाँ से निकलेंगे
नई जगह पे जाके रहेंगे
निकले छुप-छुपा के सारे
अब वो मेंढक मन में विचारे
अब तो मैं हो गया आज़ाद
करूँगा मैं पानी बर्बाद
नहीं कोई अब उसको रोकेगा
और वो मर्ज़ी से रहेगा
किया तालाब का गंदा पानी
खुश था करके वो शैतानी
पीता था वही गंदा पानी
नहीं थी बात किसी की मानी
इक दिन वो पड़ गया बीमार
चलने फिरने से लाचार
नहीं था वहाँ पे कोई स्वच्छ जल
जिससे हो जाता वह निर्मल
अब मेंढक को समझ में आया
सोच-सोच के बड़ा पछताया
जो मैं सबकी बात समझता
और पानी न गंदा करता
तो मैं यूँ बीमार न होता
पड़ा अकेला कभी न रोता
पर न अब कुछ हो सकता था
वो तो बस अब रो सकता था
अपने किए पे पछता रहा था
भूल पे आँसू बहा रहा था
पर ना कोई था उसके पास
बैठ गया वो हो के उदास
नहीं करूँगा अब शैतानी
और न करूँगा गंदा पानी
पानी तो अमृत का घोल
हर बूँद इसकी अनमोल
.....................................
बच्चों तुमको समझ में आई
कभी न करना कोई बुराई
कभी न गन्दा करना पानी
यह तो देता है जिंदगानी
अपील-पानी अनमोल है , इसकी हर बूँद कीमती है |पानी की बचत हमारा धर्म है |
पानी जीवन है , इसकी स्वच्छ्ता और सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है|

उत्खनन सदगुणों के जीवाश्म का

 

--अनुज खरे

 

भारत के एक प्रसिद्ध नगर के बाजू म खुदाई चल रही है। विदेशों से आयातित बड़ी मशीनें काम पर लगी हैं। तुच्छ किस्म की कुछ छोटी-मंझोली मशीनें भी काम्प्लेक्स फील करते हुए बड़ी को टक्कर देने में जुटी हैं।

चल क्या रहा है बॉस?

भाईजान, खुदाई चल रही है।

काहै कि?

अरे भाई, जमीन की खुदाई चल रही है। अच्छा हां, क्यों चल रही है। सरकार के आदेश से।

..... फिर क्यों? अरे भाई हाल ही में एक कमीशन ने रिपोर्ट समिट की है नैतिकता-सदाचार के पूर्ण लोप की। सो, इस बाबत खुदाई करके देखा जाएगा कि कहां लुप्त हुई है। सदाचार नैतिकतायुक्त जीवों की अंतिम कड़ी। कहीं इनके जीवाश्म यहां मिल जाएं तो उनके डीएनए परीक्षण से पता लगाया जाएगा कि कैसे, कब ये महत्वपूर्ण प्रजाति इन गुणों सहित धरा से विलुप्त हुई थी। अन्यथा तो इसे पृथ्वी से पूर्णरूप से लुप्तप्रायः ही मान लिया जाएगा। फिर बुराई को लेकर कोई परंपरागत दुख नहीं रहेगा। इस कारण पूरे आयोजन का संयोजन बिठाया गया है।

होरिजेंटल, वर्टिकल में कई ‘ट्रेंचे’ लगी पड़ी हैं। कई स्तरों पर उत्खनन का प्रयास किया जा रहा है। फिलहाल प्रथम स्तर पर एक हड्डी मिली है। वैज्ञानिक इसकी नापजोख में जुटे हैं। प्रारंभिक निष्कर्षों के आधार पर किसी सदाचार से परिपूर्ण जीव की ही रीढ़ की हड्डी लग रही है।

इतना गजब, कैसे पता चला?

वैज्ञानिकों का नापजोख पढें वे बता रहे हैं कि हड्डी ठोस है?

यानि ...?

अब रीढ़ की हड्डी ठोस होती तो मनुष्य मनुष्य की बात में वजन होगा, कथनी करनी में सदाचारी तो होगा ही।

खोखली रीढ़ हो तो... यानि दिखता है आप समझ गए। जय हो! ऐसे ही ज्ञानी मनुष्य पाठकों के रूप में लेखकों के स्तुत्य होते हैं। लेखक लिखता कुछ है, वे समझ ज्यादा लेते हैं। ऐसे ही पाठकों के दम पर बडे-बडे ‘नाम’ पैदा हुए हैं।

अरे-अरे वो देखिए फिर बुढ़ऊ किस्म का वैज्ञानिक चीत्कारें मार रहा है। लगता है फिर इसे कुछ मिला है। अब इन वैज्ञानिकों की यही तो समस्या है समझ ही नहीं आता कुछ मिला नहीं कि इन्हें खुशियों के झंझावात आने लगते हैं। एक पुराने तो आपको याद होंगे ही यूरेका... यूरेका वाले आर्कमिडिज। इधर सफलता मिली नहीं कि वे उधर आदिम हालत में रोड पर निकल पड़े थे। चलिए देखते हैं इस वैज्ञानिक को क्या मिला?

क्या कपड़े का टुकड़ा? कॉलर है, सफेद कड़क कॉलर। मनुष्य में स्वाभिमान का गुण था। एक कड़क कॉलर से इतनी जानकारी। अब सीधी गर्दन पर ही तो कड़क कॉलर लगा होगा। बुढ़ऊ वैज्ञानिक ने जानकारी दी। क्या कहा आपने बुढ़ऊ? सरजी आफ इन धृष्ट विचारों का ही प्रतिफल है ये खुदाई, ढूंढना पड़ रहा है सद्गुणों को जीवाश्म में।

अब क्या मिला? गालों की दुबली-पतली हड्डी।

यानि?

मनुष्य मेहनती रहा होगा।

कैसे?

अब दुबले-पतले मरियल गाल तो किसी मेहनतकश भुखमरे के ही होंगे।

क्या सोचा आपने? कैसे पता चल जाता है इतना कुछ।

यही तो उत्खनन है प्यारे। मरने वाला भी अपने बारे में जितना नहीं जानता, उतना जीवाश्म निकालने के बाद विशेषज्ञ बता देते हैं। ऐसे ही नहीं धूल-गर्दा खाते हुए पागलों की भांति जंगलों में लगे पड़े हैं। कुछ तो होगा ही... और ये आप क्या बार-बार शक कर रहे हैं। दिखता है आफ विश्वास की सुई हमेशा एंड पर ही लपलपाती रहती है। यहां जानकारी पर जानकारी दिए जा रहे हैं। आफ नखरे ही नहीं संभलते, शक ही खत्म नहीं होता आपका। भरोसा नहीं तो खुद ही क्यों नहीं आंख खोल कर देख लेते। खैर आप गुस्सा मत होइए। कहानी फिर से शुरू करते हैं।

आगे सुनें।

अब वो धूप में कब्र में पडा खुद जीवाश्म बना जा रहा वैज्ञानिक क्या बता रहा है? और देखिए बाकियों की धूर्तता। वो चिल्ला-चिल्लाकर उन तक आवाजें पहुंचा रहा है और वे कब्र के ऊपर खड़े अनसुना करने का ढोंग कर रहे हैं।

बेचारे वो चिल्ला रहे हैं और ये क्यों नहीं सुन रहे हैं।

सरजी आप भी ज्यादा हमदर्दी मत दिखाओ कब नीचे वाला वैज्ञानिक आपको भी कब्र में खींच लेगा। फिर कल को आप भी जीवाश्म बनकर बाहर निकलोगे।

अब वैज्ञानिक क्या कह रहा है ये तो बताइए।

क्या?

एक हाथ का कंकाल हाथ उसका कोट खींच रहा है। हां, भई हां, आप ऐसा समझ लें। कंकाल में कोट फंस गया है। कैसे फंस गया? अरे भई, वैज्ञानिक ने उसे देखते ही चिल्लाना इसलिए शुरू किया कि मरने वाला कई बेटियों का सदाचारी बाप था, जिसने जरूर आत्महत्या की होगी।

कैसे पता?

फिर कैसे, भाईसाहब वैज्ञानिक खत यानि चेहरा देखते ही बता देते हैं। कैसी दीनता टपक रही है। लाचारी का कैसा तेज है? पूरे कंकाल पर, दोनों विशिष्ट गुणों का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण तो लाचार बाप की पैदायशी पहचान होती है, लेकिन ये तो कंकाल...। चेहरा कहां है, कि उतना कुछ दिख रहा है। भाई फिर वही शक की सुई... एंड पर लपलपाने लगी। भले ही चेहरा नहीं हो, कंकाल हो...। इन्होंने तो लाखों जीवाश्म उर्फ कंकाल निकाले हैं। विवरण दिया है। फिर यह तो ‘पहुंचेला’ वैज्ञानिक है। इतनी देर आप उसकी उत्कृष्ट कोटि के विवरण के प्रसारण को रिसीव भी तो कर रहे हैं। सद्गुणों का लाइव प्रस्तुतिकरण देख रहे हैं। फिर भी कुछ देर के लिए ये शक वाला निजी सद्गुण तक पैर नहीं रख सकते आप। इसी के कारण तो यह खुदाई जरूरी हुई है। सरकार तक को ढुंढवाना पड़ रहा है सदगुणों का जीवाश्व।

अरे! अब देखो ये क्या मिला है? इतने में दूसरे ट्रेंच से एक और वैज्ञानिक की धीर-गंभीर कर्कश वाणी सुनाई दी।

क्या है! क्या है! कंकालों को परे झटकते, मिट्टी के टीले से बने वैज्ञानिक उस ट्रेंच की ओर लुढके।

अरे ये तो रद्दी का ढेर है। तू इसके लिए चीख रहा था, मुहाने पर पहुंच कई वैज्ञानिकों ने एक साथ निष्कर्ष प्रदान कर दिया।

रद्दी का ढेर नहीं, बॉस किसी कमीशन की रिपोर्ट है। बीच वाला वैज्ञानिक गर्दा झाडते हुए बोला।,

इसके ऊपर वाली फाइल पर लिखा है...? लिखा है...?

बोल न क्या लिखा है? ऊपर वाले अकबकाए से जा रहे थे।

लिखा है सद्गुणों के जीवाश्मों के उत्खनन से प्राप्त निष्कर्ष रिपोर्ट।

यानि हमसे पहले ही सद्गुणों को जीवाश्मों का उत्खनन भी हो गया। रिपोर्ट भी सबमिट कर दी गई और हम यहां धूल-मिट्टी हुए जा रहे हैं।

लेकिन क्यों?

सद्गुणों की खोज के सारे प्रयास हमेशा ही बहुत गहरे दफनाए जाते हैं, ताकि वे जीवाश्म बन जाएं।

कम से कम जीवित पीढ़ी को तो परेशान न कर पाएं। कुछ आकाशवाणीनुमा स्वर सा उभरा।

कौन बोला, कौन बोला? वैज्ञानिक समवेत स्वर में चिंघाडे।

हें, हें, हें...

अस्तु।

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संपर्क:

अनुज खरे

सी- 175 मॉडल टाउन

जयपुर

मो. 9829288739.

गंगा को भी अब मोक्ष चाहिए

-शिवा अग्रवाल

गंगा जो समस्त चराचर के प्राणियों को जीवन व मोक्ष प्रदान करती है आज मानव द्वारा उसकी कैसी दुर्गति की जा रही है कि स्वयं गंगा आज अपने मोक्ष के लिए छटपटाती दिखायी दे रही है। कारण मात्र एक ही है गंगा में गिरने वाले गंदे नाले। गंगा में विभिन्न अन्य कारणों से बढ़ता प्रदूषण। इन पर लाख कोशिशों के बावजूद भी रोक लगा पाना संभव नहीं दिख रहा है।

आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ तथा स्वार्थ सिद्धि के चलते मानव ने प्रकृति का हमेशा से दोहन किया परन्तु इसी दोहन की पराकाष्ठा सृष्टि के विनाश का कारण बनती है। आज मनुष्य अपने क्रियाकलापों से अपने जमींदोज होने का साजो समान तैयार कर रहा है। प्रदूषण की समस्या विकराल होकर जनमानस के सामने है। परन्तु फिर भी हम मूकदर्शक बने बैठे हैं। गंगा की अस्मिता के साथ खिलवाड़ भी इसका एक हिस्सा है। कहते हैं गंगा के दर्श, पर्श और जल के पान से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है किन्तु गंगा का जल आज मनुष्य द्वारा अपवित्र कर दिया गया है। जो केवल दर्श मात्र तक ही सिमटकर रह गया है। स्नान और पीने के पानी योग्य गंगा का जल आज मानव ने नहीं छोड़ा। गौमुख से पूर्व मीलों लम्बे हिमालय का सीना चीर कल-कल निनाद करती गंगा की स्वच्छ धारा आज अपने उद्गम स्थान के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं पड़ती। यूं तो गौमुख से लेकर ऋषिकेश तक पहाड़ों के सैकड़ों मील लंबे संकरे रास्ते से गुजरती हुई गंगा नदी न जाने कितने नदी नालों को अपने अंदर समाहित किये हुए कुंभ नगरी में अपने रूप में विस्तार करती है। वैसे तो ऋषिकेश से ही गंगा की दुर्दशा की कहानी प्रारम्भ हो जाती है। जहां न जाने कितने गंदे नाले इसमें प्रवाहित किये जाते हैं किन्तु हरिद्वार तक आते-आते मात्र कुछ ही किलोमीटर के सफर में गंगा का जल और भी अधिक विकृत हो जाता है। जहां न जाने कितने गंदे नाले और अन्य तरह के पदार्थ गंगा में प्रवाहित होते हैं। गंगा के प्रति आस्था रखने वाले प्रत्येक जन का मन गंगा की इस दुर्दशा को देख द्रवित हुए बिना नहीं रहता और अन्तः करण से एक ही चीत्कार निकलती है कि मनुष्य का कल्याण करने वाली हे गंगा आज मानव द्वारा तेरे साथ क्या किया जा रहा है।

गंगा गंदे नालों का जल डाले जाने से जहां मैली होती जा रही है वहीं हरिद्वार में सबसे अधिक गंगा को प्रदूषित करने का कार्य मृत व्यक्तियों के शवों की राख भी है जो प्रतिदिन स्थानीय स्तर व बाहर से आकर भी गंगा में प्रवाहित की जाती है। यूं तो पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने गंगा मुक्ति के लिए अभियान चलाकर एक नई दिशा दी थी। परन्तु अरबों रूपये गंगा मुक्ति के नाम पर बहाये जा रहे हैं और परिणाम शून्य है। कहा जात है कि कानपुर से निकलते ही गंगा गंदे नाले का रूप ले लेती है। क्या हरिद्वार में बह रही गंगा की और किसी ने ध्यान दिया।

यूं तो शासन-प्रशासन द्वारा गंगा में गंदे नाले न डाले जाने का फरमान जारी हुआ परन्तु यह केवल कागजों तक सिमटकर रह गया। विचारणीय यह है कि उस पर अमल कितना हो रहा है यह देखने वाला कोई नहीं। यदि तीर्थनगरी में गिरने वाले नालों की बात करें तो दर्जनों ऐसे नाले हैं जिस पर शासन-प्रशासन का आज तक कोई ध्यान नहीं गया और न ही उसे रोकने की कोशिश की गई। साथ ही सबसे अधिक गंगाजल का प्रदूषण गंगातट पर बसे होटलों,

भवनों तथा संन्यासियों के आश्रमों से हो रहा है। गंदे नालों के पानी को डालने से मात्र गंगा का जल ही अपवित्र नहीं होता इसके साथ न जाने कितनी वनस्पतियां व जीव प्रभावित होते हैं इस पर कोई विचार नहीं करता। शासन द्वारा गंदे नालों के ट्रीटमेंट के लिए प्लांट भी लगाये गये किन्तु या तो उनकी क्षमता कम है या वे ठीक प्रकार काम नहीं करते हैं। सोचिए! जब वर्तमान में जल की विकराल समस्या सम्पूर्ण विश्व के समक्ष मुंह बाये खड़ी है और कहा भी जा रहा है भविष्य में यदि युद्ध होगा तो वह पानी के लिए होगा। बावजूद इसके हम इस और कोई ध्यान न देकर इस समस्या का उपहास ही कर रहे हैं। गौमुख से गंगासागर तक हजारों मील का सफर तय कर इसके तट पर बसे करोड़ों लोगों को धन-धान्य से परिपूर्ण करने वाली मां भागीरथी का ऐसा हश्र क्या हम पर लानत नहीं है। एक तरफ हम गंगा को भारत का प्राण कहते हैं दूसरी औ र उसी मां गंगा को नष्ट करने पर तुले हैं। हरिद्वार वह जगह है जहां गंगा सर्वप्रथम मैदान में प्रवेश करती है। इस पर गंगा का यहां यह हाल वास्तव में हैरान करने वाला है। हाल ही में संतों ने एक बार फिर से गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का संकल्प लिया। परन्तु देखना दिलचस्प होगा कि यह कितना कारगर साबित होता है। हरिद्वार में सप्तसरोवर, भूपतवाला, हरिपुर, खड़खड़ी, भीमगोडा और कनखल में सन्यास रोड़ और दक्ष रोड ऐसे आश्रम बहुल्य क्षेत्र हैं जहां प्रतिदिन निजी वाहनों में लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का आवागमन होता है। यात्रियों को आश्रमों में ठहराकर प्रायः सभी वाहनों के चालक अपने वाहन गंगा तटों पर धोते हैं जो भी प्रदूषण का कारक है। गंगा को यूं तो कई बरसाती नाले भी प्रदूषित करते हैं परन्तु वाहनों की धुलाई गंगा प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। हास्यास्पद यह है कि सरकारी बसों के चालक भी अपनी बसें गंगा में धोते देखे जा सकते हैं।

यही नहीं गंगा के घाटों को साफ कर तमाम कूड़ा-करकट गंगा में बहा दिया जाता है। इस घाटों पर लंगरों की जूठन भी पड़ी रहती है। इसके साथ ही पुराने मंदिरों से निकले फूलों को भी गंगा में उंड़ेल दिया जाता है। कुशावर्त घाट यूं तो पौराणिक घाट माना जाता है परन्तु यहां से गोबर सीधे गंगा में बहा दिया जाता है। नगरीय प्रदूषण ने गंगा को भारी क्षति पहुंचाई है। इस क्षेत्र में जितने निर्माण होते हैं, उनका मलबा रात के समय गंगा में बहाया जाता है। कई गंदे नालों से प्रदूषित हो रही गंगा नगरीय प्रदूषण को झेलते-झेलते कुछ और मैली हो चली है। देखा जाए तो गंगा अपने भक्तों के आचरण से दुःखी है। किसी को उसकी परवाह नहीं है। उसके आंचल को लगातार मैला किया जा रहा है। अब तो गंगा चाहती है कि उसे खुद को मोक्ष मिल जाए। हरकीपैड़ी से जुड़े करीब एक किमी क्षेत्र के अंदर ही नजर दौड़ाई जाए तो गंगा की हालत का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। भूपतवाला के सर्वानंद घाट से चंडी चौक तक के करीब एक किमी के दायरे के अंदर आरक्षित मेला भूमि पंतद्वीप, लालजीवाला, चमगादड़ टापू और रोड़ी बेलवाला में राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों और की मेला भूमि पर गंगा किनारे झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ रही है। सिंचाई विभाग की ही मानें तो उसने 300 झोपड़ियों को चिह्नित किया है। इनमें रहने वाले लोगों की संख्या हजारों में है और वे मोक्षदायिनी कही जाने वाली गंगा के किनारे ही रोजाना मलमूत्र त्यागते हैं। पथरी में बसाए गये वन गुर्जरों अपने परिवारों और सैकड़ों भैसों के साथ गंगा किनारे डेरा डाल दिया है। उनकी भैंसे गंगा में गोबर व मल-मूत्र कर प्रदूषण बढ़ा रही हैं। इस क्षेत्र में गंगा घाटों पर खनन चुगान पर अवैध खनन ने भी मुश्किलें बढ़ाई हैं। घोड़ों, खच्चरों और गधों के जरिए गंगा से खनन का कार्य होता है। सौ से ज्यादा ऐसे जानवर हैं। इसके साथ ही हरकी पैड़ी के आसपास के क्षेत्र में अवस्थित ढाबों की भंयकर गंदगी भी गंगा में बहाई जाती है। जिस पर कोई कुछ कार्यवाही नहीं करता। वहीं प्रदूषण के वैज्ञानिक प्रभावों पर चर्चा करें तो स्पष्ट होगा कि सीवर युक्त जल जीवों व वनस्पतियों के लिए जल में ऑक्सीजन की कमी ला देता है जिससे उनके श्वसन व विभिन्न जैविक क्रियाओं पर प्रतिकूल असर पड़ता है। पानी के विषैला होने से उसमें पाये जाने वाले शैवाल मर जाते हैं वहीं एक निश्चित स्तर से ऑक्सीजन कम हो जाए जो मछलियां व अन्य जलीय प्राणी मरने लगते हैं। कई तरह के जीवाणु विषाणु व अन्य रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु इस तरह के पानी में घर करने लगते हैं।

ऐसी मान्यता है कि गंगा का जल लंबे समय तक रखने से भी खराब नहीं होता है। इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि गंगा के जल में फॉज नाम का एक जीवाणु पाया जाता है जो जल को खराब नहीं होने देता। परन्तु ताजा शोधों ने यह सिद्ध किया है कि अत्यधिक प्रदूषण से फॉज जीवाणु नष्ट होने लगे हैं जिससे गंगा जल को अधिक दिनों तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकेगा। जरा इस बात की कल्पना करें यदि गंगा विलुप्त हो गई या इसका अस्तित्व नहीं रहा तो क्या होगा। ऐसी दशा में इसके तट पर बसे लोग जो गंगा के कारण ही अपनी आजीविका चला रहे हैं कहां जाएंगे। अभी भी वक्त है हमें इस बात पर विचार करना होगा कि आखिर गंगा को कैसे बचाया जाए।

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संपर्क:

शिवा अग्रवाल,

पत्रकार, होली मोहल्ला कनखल हरिद्वार

हास्य व्यंग्य

bahu

आधुनिक बहू का आधुनिक जवाब

-शिवेश श्रीवास्तव

 

सास ने दुखी मन से

अपनी आधुनिक

और कम कपड़े पहनी बहू को समझाया

घर की मान मर्यादा के बारे में

बतलाया

कहा कि नारी की लाज उसके ढंके-छुपे

तन में होती है

तो बहू ने हंसते हुए जवाब दिया, मां जी तन में नहीं

मन में होती है

सास ने फिर कहा बेटी

बड़ों की सीख को इस तरह मजाक में

नहीं उड़ाना चाहिए

बहू ने कहा मां जी मेरा दिमाग खराब न करें

आप चुपचाप जाकर

मंदिर में भजन गाइए

बहू ने क्रोधित होकर फिर से कहा

मेरे खूबसूरत कपड़ों पर इस तरह शोर न मचाइए

शादी के वक्त आपने और आपके बेटे ही ने

तो मेरे मम्मी पापा से कहा था

हमें तो बस दो कपड़ों में आपकी बेटी चाहिए

मैं तो आप लोगों के कहे अनुसार ही जिंदगी जीती

जा रही हूं

फिक्र मत करिए बाजार से एक और

टॉप और स्कर्ट लेने जा रही हूं।

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संपर्क:

शिवेश श्रीवास्तव

9893586229

Shivesh786@gmail.com

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चित्र - शिवेश

व्यंग्य

take loan

टेकं लोनं, घृतं पिवेतः ....

-अनुज खरे

आधुनिक युग में इंडिया के आकाश के ऊपर से तीव्र गति से चार्वाक ऋषि की आत्मा गुजर रही है। साथ में कुछ हल्के मंझोले शिष्य भी इस अनंत मात्र में उन पर बोझ बने चिमटे हुए हैं। ऋषि भौतिकवाद का आनंद नहीं ले पा रहे हैं। शिष्य सिद्धांत समझने के नाम पर उन्हें खसोटते से रहते हैं। शिष्यों में एक परवर्तीकाल में उनके सिद्धांतों के अनुसरण द्वारा ‘मोक्ष’ को प्राप्त हुआ कुछ ज्यादा ही वाचाल प्राणी है। अपनी मातृभाषा आंग्ल का प्रचंड प्रेमी भी है। अतः ऋषि को इससे बराबर ‘डर’ बना रहता है। बाकियों के सामने आंग्ल में ना जाने क्या गिटपिट करता रहता है। वो तो उनका अनुभव है, जिससे वे ‘सिचुएशन हैंडिल’ कर लेते हैं, अन्यथा तो बाकी शिष्यों के किसी और ज्ञानी संप्रदाय की ओर खिसकने का खतरा भी तैयार रहता है। फिलहाल वे मुंबई के ‘स्काई जोन’ में कुछ ठिठक गए हैं, नीचे मायानगरी असंख्य लाइटों की आगोश में भौतिकवाद-ऐश्वर्य के शीर्ष पर दमक रही है। शिष्यों की ओर नजर डालते ही समझ गए ‘ज्ञान’ देने का अद्भुत अवसर। मूढ़ शिष्यों को ज्ञान वर्षा से सराबोर कर ‘स्नातक’ ही बना देना चाहिए।

- शिष्यों ! कुछ ऋषिमय पोज में उन्होंने समूह को संबोधित किया।

-आज्ञा, शिष्यवृंद मिमियाती सी आवाज में बोला।

-देखो, हमारे सिद्धांतों का भौतिक सत्यापन, इस नगरी की ओर देखो, विलास में डूबी नगरी की ओर चक्षु ले जाओ। बोलने को तो उन्होंने बोल दिया। भीतर ही भीतर कांप गए। भौतिक सत्यापन ऐसा जटिल, शब्द इस आंग्लभाषी कपटी शिष्य के सामने। अभी मुंह चौडा करके ‘ट्रांसलेशन’ की मांग न कर बैठे।

- फिर मुनिवर ने शिष्यवृंद को घनघोर निगाहों से देखा-देखो तो कैसे दीदे फाड़कर देख रहे हैं। पाखंडी कहीं के, जैसे जीवन में सुख भोगे ही न हों, फिर गुरु गंभीर हुए, बोले- नैना बंद कर लो शिष्यों, कहीं नेत्र कोटर लोलुपता में जमीन पर ही न गिर जाएं। फिर कहा- यहां रहते हैं हमारे संप्रदाय के धरा पर सर्वश्रेष्ठ निवासी, नाम ही इसका मायानगरी है। सुख-भोग्य ही इनका परम ध्येय है शिष्यों।

-सूखा-भोगया, मीन्स गुरुजी आई डोंट अंडरस्टैंड, आंग्लभाषी कहीं नजरें गड़ाए-गड़ाए एकाएक बोला।

- हो गया न बंटाधार, ये फफूंद भी ना जाने कहां से पैदा हो गई गुरुजी मन ही मीन खीझे। ऊपर आंखों में विद्वत की चमक भरी, लेकिन ह्रदय के झंझावातों के दौर में उतनी अनुकूल चमक पैदा नहीं हो पाई, इतने से ही काम चला लेंगे, उन्होंने सोचा। इसका क्या करूं। सुख-भोग्य यानी मेरा वो प्राचीन सर्वकालिक सिद्धांतः यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत।

भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।। के अनुगामी। संस्कृतमय हिंदी में उन्होंने कुछ डिप्लोमेटिक रास्ता निकाला।

नो ! नो ! गुरुजी प्लीज एलोबरेट दिस। शिष्य ने फिर जिज्ञासा प्रकट की।

-- हाय कैसी विपदा आन पड़ी, प्रभु! यह आत्मा न होती तो इसे कब का सिर के बल समंदर में फैंक देता। कुछ लोग मरने के बाद भी अपनी आसुरी प्रवृत्ति के अंतर्गत दूसरों को कष्ट देना नहीं छोडते। वे धीरे से बुदबुदाए। फिर संयत होकर बोले- सुन, टेकं लोनं, परचेज कारं एंड गो फॉर लांग ड्राइवः, फॉरगेट लोनं। फिर अपनी ही इस मेधा पर गिरते-गिरते बचे। यू नो चमत्कारी टाइप के तो वे हैं ही उन्हें याद आया।

- बट गुरुजी, दिस हैपंड लांग बैक इन माई कंट्री, बट नो बडी गोइंग टू मोक्षा। शिष्य जिज्ञासु हुआ-हुआ जा रहा था।

- अबे पगलेट, अब गुरुजी का धैर्य मर्यादा की सीमाओं से बाहर जाने लगा था। जीवन में सुख ही तो सच्चा मोक्ष है। देख नहीं रहा कैसे हम मरने के बाद भी यहां-वहां डोल रहे हैं।

-- बट गुरुजी, आई कांट पे इंस्टलमेंट, दे सेंड मी हेयर ओनली।

-- हें, संप्रदाय में ऐसे कच्चे खिलाडी का प्रवेश। गुरुजी चौंके, इस फफूं द की जडें कितनी गहरी हैं। किसकी सिफारिश से संप्रदाय में प्रवेश पा गया। कहीं बाकी शिष्यों को भी बरगला न दे। शिष्यों को इस धूर्त के चंगुल से दूर रखना ही भला। अन्यथा तो दुष्ट दुकान ही बैठा देगा।

-- ओके, ओके- वी विल डिस्कसं इट ऑफ्टर सम अदर अवसराः। गुरुवर ने उससे पिंड छुड़ाने के लिए अपनी बची खुची मिक्स अंग्रेजी उस पर दे मारी। जिसे उन्होंने इस आधुनिक काल की यात्रा के दौरान जगह-जगह से बटोरकर अपनी स्मृति कोश में भर लिया था।

-- फिर तिरछी निगाहों से शिष्यों की ओर घूरा। सभी कहीं और घूरने में जुटे थे। देखो तो दुष्टों को पलकें तक नहीं झपका रहे। कैसी माया है, कैसी लिप्सा है, शिष्यों का ऐसा निर्लज्ज आचरण देख वे लगे हाथों किसी दार्शनिक संप्रदाय की ओर मुड़ाने ही वाले थे कि एकाएक सारा ऋषित्व, मुनित्व, गुरुत्व याद हो आया।

-- शिष्यों उन्होंने फिर पुकारा। एक दो बार अनसुनी करके शिष्यों ने भी जवाब दिया,कहो गुरुजी। हालांकि अपने नेत्र अन्वेषण के दौरान आई इस कर्कश आवाज पर उनकी इच्छा तो कहने की हो रही थी बको गरुजी। खैर गुरुजी ने कहा- देखो सिद्धांंतों को आगे भी जानो यानि ऋण लेकर किया क्या जाना है।

-- ऋण लेकर और क्या किया क्या जाना है, समवेत स्वर में शिष्यों ने फिर विलाप किया।

-- नरक में ही सडेंगे साले। मन ही मन गुरुजी ने सोचा, फिर गुरुतर दायित्वों के अंतर्गत फिर ज्ञान देने का उपक्रम शुरू कर दिया।

-- देखो शिष्यों, ऋण लो, तत्काल ही उसे सुख-सुविधाओं में लगा दो। मकान लो,सुख-सुविधाएं का सामान जुटाओ,शादी करो फिर सुख से जीओ। ऋण को भूल जाओ।

-- और गुरुजी डिस्कोथेक, नाइट क्लब, आउटिंग- डेटिंग। इनका बारे में क्या? शिष्यवृंद प्रतिवाद पर उतर आया।

-- बस उतर आए न अपनी औकात पर मुनिवर का ह्रदय कांपा। जरूरत के अनुरूप ही ज्ञान देना होगा अन्यथा बिदकने का खतरा। मुनिवर ने मन ही मन गणित बिठाया। फिर एकाएक चौंके, डिस्कोथे, नाइट क्लब, डेटिंग। ये क्या बला है। हमारे जमाने में तो ये पाया नहीं जाता था। फिर बोले- प्रिय शिष्यों, जिन भौतिक उपादनों का अभी तुमने जिक्र किया था तनिक विस्तार से उनके बारे में बतलाओ।

-- गुरुजी ये आधुनिक युग के नए ऐश्वर्य- विलासिता के स्वर्ग हैं। मनुष्य यहां पूंजी उड़ाकर हमारे संप्रदाय के सर्वश्रेष्ठ कर्त्तव्य निर्वाहन में जुटा है। कैसिनो जैसे धूत गृह में तो तत्काल ऋण की सुविधा तक उपलब्ध है। शिष्यों ने लगे हाथों अतिरिक्त अपडेट जानकारियां भी गुरुवर को सौंपनी शुरू कर दीं।

मनुष्य ने भौतिकवाद के इतने आधुनिक सिद्वांत-साधन गढ़ लिए हैं। इतना आगे जा चुका है मानव। गुरुवर ने सोचा । कहा- पर इनमें हमारे संप्रदाय के नियम पद्वतियों का भी ध्यान रखा जाता है कि नहीं?

-- नहीं गुरुवर आधुनिक युग में सिद्वांतों-नियमों -कायदों को पालने से परे मानकर पुस्तकों में ही रखकर आदर दिया जा रहा है।

-- घोर उच्श्रृंख्लता... लगामहीन भौतिकवाद... बिना पावन नियमों के विलासिता भी कष्ट में बदल जाती है। गुरुवर ने मन ही मन सोचा... हमारे सिद्धांतों का इतना अव्यवस्थित विकास। ऐसी तो उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। ये मनुष्य कर्त्तव्य पथ से इतना च्युत, विलासिता का इतना अनुगामी... घोर कलयुग ही होगा। उन्होंने त्रिकाल दृष्टि की मुद्रा में जाकर इस बाबत फाइलें टटोलीं।

-- खैर, शिष्यों को संभालूं... मनुष्य की विलासवृति के आगे पुराने युग के ये बिचारे विलासी तो नादान बालक सादृश्य दिख रहे हैं। उन्हें शिष्यवृंद पर दया-नेह एक साथ आ गया।

-- फिर नीचे देखकर एकाएक बोले- वो देखो, वो देखो, वो दस गाड़ियों,15 मंजिला घर, 25 चमचों से युक्त कौन महानुभाव दिख रहे हैं?

-- वो एसआरके हैं गुरुवर, शिष्यों ने जानकारी उछाली।

-- कौन? एसआरके...

--गुरुवर आप शाहरूख खान को नहीं जानते ? शिष्यों में पुनः जेनरेशन गैप जैसी फीलिंग उभरने लगी। उन्हें अपने आउटडेटेड गुरुवर पर कुछ खुटका सा होने लगा।

-- ये कौन बला है? गुरुवर ने चिंतन-मनन की आड में सोचने का उपक्रम किया , बोले-- ये महानुभाव तो ऐश्वर्ययुक्त दिखते हैं? इन्होंने तो हमारे सिद्धांतों को किसी सिद्ध की भांति अपनाया हुआ जान पड़ता है?

-- अपनाया क्या गुरुवर? इनके पास तो इतना धन है कि ये उसका उपभोग तक नहीं कर पा रहे हैं।

-- हें, धन है उपभोग तक नहीं कर पा रहे हैं? सिद्धांत उलटा तो नहीं ही पड सकता है। गुरुवर चिंतित हुए। ये कैसी जमाना है जहां पैसा पास में है उपभोग के तरीके नहीं सूझ रहे हैं। हमार जमाने में तत्काल शादी-ब्याह, मदिरा-दावतें,पर्यटन आदि में झोंका जा सकता था और घी पीना तो सरप्लस था ही।

-- गुरुजी वो जमाने गए। शिष्यों ने जैसे उनके मन की बात भांप ली हो कहा- ये तो जिस तरफ देखें नोटों के ढेर लग जाते हैं। बस ये उपभोग करने के समय का जुगाड़ नहीं बैठा पा रहे हैं।

-- हाय राम गुरुजी निढाल से हो कर दूसरी ओर झांकने लगे। अब ये दूसरे महानुभाव कौन हैं जो आकाश चूमती अट्टालिका पर खडे़ होकर शायद कुल्ला-मंजन कर रहे हैं। ये तो बडे तेजोमय दिखाई दे रहे हैं। इतना बड़ा घर, असंख्य गाड़ियों का काफिला। ये तो निश्चय ही हमारे संप्रदाय के गादीपति सादृश्य दिखाई दे रहे हैं। गुरुजी कहते-कहते हांफने से लगे।

-- नहीं गुरुवर , ये अंबानी ब्रदर्स में से बड़े भ्राता हैं। धरा पर सबसे अमीर आदमी। इनके तो एक-एक सेकंड की कमाई लाखों में है।

-- वाह, वाह इतना कुछ है तब तो निश्चित ही विलास में समय देते होंगे। गुरुजी ने फिर बचा-खुचा ज्ञान बांटना चाहा।

-- नहीं गुरुवर, ये तो दिनरात कारोबार बढ़ाने में निमग्न रहते हैं। इन्हें विलास का समय ही कहां है।

-- अरे जै कौन लोग हैं? यहां क्या कर रहे हैं? अब गुरुजी चौंकने के साथ-साथ कुछ दिगभ्रमित से भी दिखाई दिए। भोग के ऐसे सर्वश्रेष्ठ सर्वकालिक सिद्धांत क्या असमय ही काल कवलित हो जाएंगे। मन ही मन उन्होंने फिर सोचा। ओ.. हो ... हो लगता है ये सारा ऐश्वर्य अगली पीढ़ी के लिए संजोना चाहते हैं? जैसे उन्हें फार्मूला हाथ लगा। बोले- सिद्धांत का इतना विकास हो चुका है शिष्यों की व्यक्ति अगली पीढ़ी तक के लिए घी की व्यवस्था बिठा के जाना चाहता है। कैसे सुरुचिपूर्ण जमाना है। खुशी से लटपटाते हुए गुरुवर बोले।

-- नहीं गुरुवर शिष्यों ने फिर प्रतिवाद किया। ये अगली तो क्या सात पुश्तों तक का इंतजाम कर चुके हैं, फिर भी लगे हैं।

-- हें, गुरुवर ने आश्चर्य से इतना मुंह खोला कि शिष्यों को उन्हें उनके पद का स्मरण कराना पडा।

-- अब ये गोल-गोल सी गुम्बद-नुमा कौन सी इमारत है शिष्यों,मनुष्य यहां पागलों की भांति चीख-चिल्ला क्यों रहा है?

-- ये शेयर मार्केट है गुरुवर,शिष्यों ने दलाल स्ट्रीट का भौगोलिक-ऐतिहासिक संदर्भ बताना शुरू कर दिया। यहां मनुष्य एक पल में इतना प्राप्त कर लेता है कि उसे ऋण जैसी तुच्छ वस्तु की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। लेकिन शिष्यों को गुरुवर कहीं एकटक दृष्टि घोंपे हुए मिले। शिष्य कुछ कह पाते इससे पूर्व ही गुरुवर बोले- वो दृश्य देखो-नीचे मरीन ड्राइव के पास वो लंबी सी गाड़ी में बैठा मनष्य खिड़की से सिर निकाले एक मैले-कुचैले से व्यक्ति से क्या याचना सी कर रहा है। कुछ विचित्र सा प्रतीत नहीं हो रहा है शिष्यों?

-- नहीं मुनिवर, ये तो रूटीन है। वो गाड़ी में बैठा व्यक्ति एक प्राइवेट बैंक का एक्जीक्यूटिव है। जो ऋण अर्थात् लोन देने के लिए भिखारी से व्यक्ति के आगे गिड़गिड़ा रहा है। अभी तो हां करवाने के लिए ये उसके पीछे भागेगा भी। शिष्यों ने आधुनिक युग की आर्थिकी गुरुवर को बयान की ।

-- क्या? मनिवर मूर्छित होते-होते बचे। ऋण देने के लिए पीछा कर रहा है। गिड़गिड़ा रहा है। इधर हम ऋण लो घी पीओ जैसी मासूम बात सदियों से दोहरा रहे हैं। गुरुवर कुछ लज्जित सी वाणी में बोले। फिर एकाएक कहा--तो फिर हम यहां क्या कर रहे हैं शिष्यों, निकल लो यहां से किस जमाने में अपने सिद्धांतों का अन्वेषण कर रहे हैं। किसी और पावन सी स्थली की ओर गमन करते हैं। फिर देखा तो शिष्य टस से मस हुए बिना एक बंगले की ओर झांकते से मिले। गुरुवर ने भी आंखों का रास्ता फालो करते हुए निगाहें दौड़ाईं तो उस बंगले में एक कामिनी- काया और असंख्य लोगों की भीड़ नजर आई । जो उचक-उचक कर उसे देख रही थी। भृकुटियां ऊंची करके शिष्यों पर गरमाए- शिष्यों सावधान, मरने के बाद भी ऐसा अशोभनीय आचरण एक आत्मा को शोभा नहीं देता। भौतिकवाद का घोर उपभोग करो परन्तु माया में ऐसे अकंठ डूबना, छी.. छी...।

-- गुरुवर ये माया नहीं मल्लिका हैं..... कहकर शिष्यों ने उस कामिनी-माया की ओर आंखों के सैटेलाइट फिर घुमा दिए।

-- हे ईश्वर, गुरुवर ने भी ऐसे भौतिकवादी जमाने से बचाने के लिए अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठा दिए।

इति।

====

संपर्क:

 

अनुज खरे

सी - 175 मॉडल टाउन

जयपुर

मो. 9829288739

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(चित्र का कुछ हिस्सा – साभार आईसीआईसीआई बैंक)

sharad kale ki kavta 


ग़ज़लें


-अमर ज्योति ‘नदीम’




(1)
राजा लिख
राजा लिख और रानी लिख।
फिर से वही कहानी लिख॥

बैठ किनांरे लहरें गिन।
दरिया को तूफ़ानी लिख॥

गोलीबारी में रस घोल।
रिमझिम बरसा पानी लिख॥

राम-राज के गीत सुना।
हिटलर की क़ुरबानी लिख॥

राजा को नंगा मत बोल।
परजा ही बौरानी लिख॥

फ़िरदौसी के रस्ते चल।
मत कबीर की बानी लिख॥


(2)
जिस्म और जान
जिस्म और जान बिक चुके होंगे।
दीन ओ ईमान बिक चुके होंगे।

इन दिनों मण्डियों में रौनक है;
खेत खलिहान बिक चुके होंगे।

मन्दिरों मस्जिदों के सौदे में
राम ओ रहमान बिक चुके होंगे।

कँस बेख़ौफ़ घूमता है अब ,
क्रष्ण भगवान बिक चुके होंगे।

ताजिरों का निज़ाम है; इसमें
सारे इन्सान बिक चुके होंगे।


(3)
दूर का मसला
दूर का मसला घरों तक आ रहा है
बाढ़ का पानी सरों तक आ रहा है।

आग माना दूर है, लेकिन धुआं तो,
इन सुहाने मंज़रों तक आ रहा है।

लद चुके दिन चूड़ियों के,मेंहदियों के;
फावड़ा कोमल करों तक आ रहा है।

मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस का
जीविका के अवसरों तक आ रहा है।

इसने कुछ इतिहास से सीखा नहीं है;
एक प्यासा सागरों तक आ रहा है।


(4)
उसने कभी भी
उसने कभी भी पीर पराई सुनी नहीं .
कितना भला किया कि बुराई सुनी नहीं.

रोटी के जमा-ख़र्च में ही उम्र कट गई,
हमने कभी ग़ज़ल या रुबाई सुनी नहीं .

औरों की तरह तुमने भी इलज़ाम ही दिये;
तुमने भी मेरी कोई सफाई सुनी नहीं.

बच्चों की नर्सरी के खिलौने तो सुन लिए;
ढाबे में बर्तनों की धुलाई सुनी नहीं.

मावस की घनी रात का हर झूठ रट लिया;
सूरज की तरह साफ सचाई सुनी नहीं.


(5)
शरीक तेरे
शरीक तेरे हर इक ग़म हर इक खुशी में रहा।
मैं तुझसे दूर मगर तेरी ज़िन्दगी में रहा।

जो दर्द आंख से ढल कर रुका लबों के करीब,
तमाम उम्र वो शामिल मेरी हँसी में रहा।

समन्दरों में मेरी तशनगी को क्या मिलता?
मैं अब्र बन के पलट आया फिर नदी में रहा।

वो जिनकी नज़र-ऐ-इनायत पे लोग नाज़ां थे,
बहुत सुकून मुझे उनकी बेरुखी़ में रहा।

वो मेरा साया अंधेरों में गुम हुआ है तो हो;
यही बहुत है मेरे साथ रोशनी में रहा.


(6)
प्यार का वास्ता रहा होगा.


प्यार का वास्ता रहा होगा।
कोई अहद-ऐ-वफ़ा रहा होगा।

आबला जो पड़ा तेरे दिल पर
दोस्ती का सिला रहा होगा।

किसने राजा को कह दिया नंगा!
कौन वो सरफिरा रहा होगा!

वो ठहाके बहुत लगाता था,
दर्द दिल में छुपा रहा होगा।

हम कहाँ! और उनकी बज्म कहाँ!
वो कोई दूसरा रहा होगा.


(7)
कुछ इस अदा से
कुछ इस अदा से उम्र का सावन गुज़र गया
दलदल बचा है , बाढ़ का पानी उतर गया।

सदियाँ उजाड़ने में तो दो पल नहीं लगे;
लम्हे संवारने में ज़माना गुज़र गया।

बुलबुल तो वन को छोड़ के बागों में जा बसी;
इक जंगली गुलाब था , मुरझा के झर गया.

कमरे में आसमान के तारे समा गए ;
अच्छा हुआ के टूट के शीशा बिखर गया।

घर से सुबह तो निकला था अपनी तलाश में,
लौटा जो शाम को तो भला किसके घर गया?


(8)
गीत कुछ उल्लास के
गीत कुछ उल्लास के मन बावरा गाता तो है ;
पर उसी पल कंठ भी स्वयमेव भर आता तो है।

छोड़ कर जिस विश्व को मैं भाग आया हूँ यहाँ
आज भी उस विश्व से मेरा कोई नाता तो है ।

ये घुटन, ये उलझनें, ये वंचना, ये वेदना;
इन सभी के बीच मन निर्दोष घबराता तो है ।

क्या न जाने भेद है जो प्यास यह बुझती नहीं;
नित्य प्रति ही नीर नयनों से बरस जाता तो है।

मानता हूँ अंश हूँ मैं भी व्यवस्था का ; मगर
इस व्यवस्था से ह्रदय विद्रोह कर जाता तो है।

शब्द में अनुवाद मेरी भावना का हो, न हो;
मौन भी मेरा ह्रदय के भेद कह जाता तो है ।

जिस दिशा में लक्ष्य या गंतव्य की सीमा नहीं
उस दिशा की और यह उन्माद ले जाता तो है।

उलझनों की झाडियाँ हैं; मुश्किलों के हैं पहाड़,
फ़िर भी इनके बीच से एक रास्ता जाता तो है।

हास में, परिहास में, आनंद में , उल्लास में,
सम्मिलित हूँ, किंतु फ़िर भी प्राण अकुलाता तो है।


(9)
जब से इंसान
जब से इंसान हो गए यारो
हम परेशान हो गए यारो।

बेडी़ पावों की,तौक़ गर्दन का,
दीन-ओ-ईमान हो गए यारो।

कैस कुछ कह उठा तो अहले खि़रद,
कितने हैरान हो गए यारो।

अब अवध में नहीं कोई शम्बूक,
सारे कुर्बान हो गए यारो।

कोई सुनता नहीं किसी की पुकार,
लोग भगवान हो गए यारो।


(10)


क्या बातें करूं
जब भी चाहा तुमसे थोड़ी प्यार की बातें करूं
पास बैठूं दो घड़ी,श्रृंगार की बातें करूं।

वेदना चिरसंगिनी हठपूर्वक कहने लगी
आंसुओं की,आंसुओं की धार की बातें करूं।

देखता हूँ रुख ज़माने का तो ये कहता है मन
भूल कर आदर्श को व्यवहार की बातें करूं।

आप कहते हैं प्रगति के गीत गाओ गीतकार;
सत्य कहता है दुखी संसार की बातें करूं।

चाटुकारों के नगर में सत्य पर प्रतिबन्ध है।
किस लिए अभिव्यक्ति के अधिकार की बातें करूं।

इस किनारे प्यास है; और उस किनारे है जलन
क्यों न फिर तूफ़ान की मंझधार की बातें करूं.


(11)
क्या सफर था!
क्या सफर था! राह-ओ-मंजिल का निशाँ कोई न था
काफिला कोई न था; और कारवाँ कोई न था.

हमने ही अपने तसव्वुर से तुझे इक शक्ल दी.
हम न थे तो तू; तेरा नाम-ओ-निशाँ कोई न था.

कैसा जंगल था जहाँ वनवास पर भेजे गए
हर तरफ़ अशजार थे, साया वहाँ कोई न था.

दिल के दरवाज़े पे दस्तक बारहा होती रही
हमसे मिलने को मगर आया वहाँ कोई न था.

आईनों के शहर में हर सिम्त हम थे;सिर्फ़ हम.
हम चले आए तो हम जैसा वहाँ कोई न था.
++==++


संपर्क:


 


अमर ज्योति`नदीम`,
7-सरस्वती विहार,
रामघाट रोड,
अलीगढ़
202001

 

उज्जैन में रहने वाले श्री पीडी कुलकर्णी एक निम्न-मध्यम वर्ग के नौकरीपेशा व्यक्ति हैं। उनका एक बड़ा ऑपरेशन 2005 में सम्पन्न हुआ। उसके बाद किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या के कारण उन्हें काफ़ी दिन बिस्तर पर बिताने पड़े और पूरा परिवार उनकी सेवा में दिन-रात लगा रहा। उन दिनों उन्हें कई तरह के मेडिकल उपकरण खरीदने पड़े, जो कि उनके काम के थे, जैसे व्हील चेयर, वॉकर और फ़ोल्डिंग लेट्रिन सीट आदि। भगवान की कृपा से दो वर्ष के भीतर ही वह एकदम स्वस्थ हो गये, बीमा निगम की कृपा से उपचार में लगा कुछ प्रतिशत पैसा भी वापस मिल गया। लेकिन कुलकर्णी परिवार "पोस्ट-ऑपरेटिव केयर" पर जितना खर्च कर चुका था, उसकी आर्थिक भरपाई भी सम्भव नहीं थी, न ही इस सम्बन्ध में कोई सरकारी नियम हैं।

भारत में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तेजी से जारी है, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य सेवायें भ्रष्टाचार, लालफ़ीताशाही और राजनीति के चलते लगभग निष्प्राण अवस्था में पहुँच चुकी हैं। इन निजी स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ इनसे जुड़े दो उद्योग भी तेजी से पनपे हैं वे हैं दवा उद्योग तथा मेडिकल उपकरण उद्योग। जैसा कि सभी जानते हैं कि महंगाई के कारण धीरे-धीरे स्वास्थ्य सेवायें भी आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही हैं और किसी विशेष परिस्थिति में ऑपरेशन के बाद "पोस्ट-ऑपरेशन केयर" भी काफ़ी महंगा है।

इस स्थिति से निपटने और आम व्यक्ति को इन खर्चों से बचाने, तथा राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अनाप-शनाप मुनाफ़े को नियंत्रित करने की एक कोशिश के रूप में उज्जैन महाराष्ट्र समाज की एक शाखा "मराठी व्यावसायिक मंडल" (जो कुछ व्यवसायियों और गैर-सरकारी कर्मचारियों का एक समूह है) ने एक विशेष समाजसेवा का प्रकल्प हाथ में लिया है। इस प्रकल्प का नाम है "डॉ स्व वीडी मुंगी सेवा प्रकल्प"। हम सभी को यह मालूम है कि किसी व्यक्ति के आपात ऑपरेशन या अन्य बीमारी के बाद घर पर उसकी देखभाल के लिये भी कई बार कई तरह के उपकरण लगते हैं, जैसे कि ऑक्सीजन सिलेण्डर, जलने के मरीजों के लिये विशेष बिस्तर "वाटर बेड", सलाइन स्टैंड, स्टूल पॉट, यूरिन पॉट, चलने-फ़िरने के लिये वॉकर, छड़ी, कमर दर्द के मरीजों के लिये लेट्रिन सीट, व्हील चेयर, स्ट्रेचर आदि की आवश्यकता होती है, और यह सभी आईटम बेहद महंगे होते हैं। हो सकता है कि कई लोग आसानी से इनकी कीमत चुकाने की स्थिति में हों, लेकिन असल में इन वस्तुओं का उपयोग एक सीमित समय तक के लिये ही हो पाता है। मरीज के ठीक हो जाने की स्थिति में यह चीजें उन घरों में बेकार पड़ी रहती हैं और अन्ततः खराब होकर कबाड़ में जाती हैं।

इस समाजसेवा प्रकल्प के अनुसार मराठी व्यावसायिक मंडल के कार्यकर्ताओं ने इस प्रकार की काफ़ी सारी वस्तुएं एकत्रित की हैं, कुछ खरीद कर और कुछ परिचितों, मित्रों से दान लेकर। जब कभी किसी व्यक्ति को इस प्रकार की किसी वस्तु की आवश्यकता होती है तो मंडल के सदस्य उसे वह वस्तु प्रदान करते हैं। उस वस्तु की मूल कीमत को शुरु में "जमानत" के तौर पर जमा करवाया जाता है, यदि वस्तु 1000 रुपये से कम कीमत की है तो फ़िलहाल इसका शुल्क 20/- महीना रखा गया है, जबकि यदि वस्तु महंगी है (जैसे ऑक्सीजन सिलेण्डर आदि) तो उसका मासिक शुल्क न लेते हुए 5/- रुपये दैनिक के हिसाब से लिया जाता है, ताकि व्यक्ति आवश्यकता समाप्त होते ही तुरन्त वह वस्तु वापस कर दे और वह किसी और के काम आ सके। वस्तु वापस कर देने पर जमानत राशि वापस कर दी जाती है (मेण्टेनेंस या वस्तु में आई किसी खराबी को ठीक करवाने की जिम्मेदारी भी उसी व्यक्ति की होती है), साथ ही उस व्यक्ति से अनुरोध किया जाता है कि इस प्रकार की कोई वस्तु उसके किसी रिश्तेदार या मित्र के यहाँ फ़ालतू पड़ी हो तो उसे दान में देने को प्रोत्साहित करें। 5/-, 10/-, 20/- की मामूली रकम से जो भी रकम एकत्रित होती है, उससे एक और नई वस्तु आ जाती है, इस प्रकार वस्तुएं धीरे-धीरे बढ़ रही हैं, साथ ही इस सेवा प्रकल्प को उत्साहजनक प्रतिसाद मिल रहा है। फ़िलहाल तो यह एक छोटे स्तर पर चल रहा है, लेकिन जैसे-जैसे इसमें विभिन्न वस्तुएं बढ़ेंगी, जाहिर है कि कुछ अतिरिक्त जगह, कम से कम एक-दो व्यक्ति का स्टाफ़, स्टेशनरी आदि भी लगेगा। दीर्घकालीन योजना है कि एक एम्बुलेंस और एक शव वाहन की भी व्यवस्था की जायेगी। इस प्रकल्प को "निगेटिव ब्लड ग्रुप डोनर असोसियेशन" से भी जोड़ा गया है (सभी जानते हैं कि निगेटिव ग्रुप का खून बड़ी मुश्किल से मिलता है) और स्वयं इस समूह के अध्यक्ष श्री अभय मराठे 50 से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं।

इस योजना में अमीर-गरीब अथवा जाति-धर्म का कोई बन्धन नहीं है, यह एक समाजसेवा है और मामूली शुल्क भी इसलिये लिया जा रहा है ताकि उससे कोई अन्य नई वस्तु ली जा सके और साथ ही सेवा का उपयोग करने वाला व्यक्ति भी इस सेवा को "फ़ॉर ग्राण्टेड" न लेकर गंभीरता से ले। मैं सभी ब्लॉगरों, नेट मित्रों तथा अन्य सभी से जो यह लेख पढ़ें, यह अनुरोध करना चाहूँगा कि वे लोग भी अपने-अपने शहरों में इस प्रकार के कुछ लोगों को एकत्रित करके ऐसा प्रकल्प शुरु करें। जो परिवार किसी एक्सीडेंट या ऑपरेशन से गुजरता है, उसकी व्यथा वही जान सकता है, लेकिन यदि भारी खर्चों के बीच इस प्रकार का कोई मदद का हाथ जब मिल जाता है तो उसे काफ़ी राहत मिलती है। आशा है कि यह लेख अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचेगा और उससे काफ़ी सारे लोग अपने शहरों में यह समाजसेवा शुरु करेंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य, दोनों क्षेत्र आने वाले समय में आम आदमी को सबसे ज्यादा आर्थिक तकलीफ़ देंगे, उससे निपटने का एक ही तरीका है "आपसी सहकार"… उपयोग करने के बाद बची हुई दवाईयों का बैंक शुरु करें, या पुराने कम्प्यूटरों से किसी गैराज या अनुपयोगी कमरे में गरीब छात्रों को पढ़ायें, पुराने कपड़े बेचकर बर्तन खरीदने की बजाय यूँ ही किसी जरूरतमंद को दे दें आदि-आदि। "आपसी सहकारिता" एक तरीका है, महंगी होती जा रही स्वास्थ्य सेवाओं और दवा कम्पनियों से बचने का…

नोट : जो भी व्यक्ति उज्जैन या आसपास निवास करते हैं वे यह लेख पढ़ें तो किसी वस्तु के दान के लिये मेरे ब्लॉग अथवा ई-मेल पर सम्पर्क कर सकते हैं…(किसी प्रकार का नगद दान नहीं लिया जाता है)। इस सेवा योजना के बारे में विस्तार से अन्य लोगों को भी सूचित करें, ताकि इस प्रकार के समूह प्रत्येक शहर, गाँव में शुरु किये जायें…

सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन

http://sureshchiplunkar.blogspot.com

--
सुरेश चिपलूनकर
(Suresh Chiplunkar)
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

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