मंगलवार, 30 सितंबर 2008

निशा भोसले की लघुकथाएं

  दो लघुकथाएँ -निशा भोसले (1) यकीन            आपका काम अभी तो नहीं हुआ है, दो तीन दिनों में अवश्य हो जायेगा.  उस आदमी को समझ...

अनुज खरे का व्यंग्य : टंगड़ीमार प्रबंधन

     प्रो. टीएम उर्फ 'टंगड़ीमार प्रबंधन '   --अनुज खरे सारी दुनिया में इस समय महान कैसे बनें, महानतम सफलता कैसे पाएं टाइप की...

सोमवार, 29 सितंबर 2008

के. पी. त्यागी की हास्य कविता : इडियट

इडियट -डॉ. के. पी. त्यागी   सुप्रीम कोर्ट में, मर्डर केस पर बहस चल रही थी वादी, प्रतिवादी में,बात बात पर झड़प चल रही थी प्रतिवा...

बृजमोहन श्रीवास्तव का व्यंग्य : व्यंग्य हमारी समझ न आवे

आज से लगभग पचास साल पूर्व जब मैंने कोर्स की पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ पढ़ना शुरू किया था तब मेरी समझ में यह नहीं आता था की व्यंग्य क्या है और ...

रविवार, 28 सितंबर 2008

सतपाल खयाल की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल १ दरिया से तालाब हुआ हूँ अब मैं बहना भूल गया हूँ. तूफ़ाँ से कुछ दूर खड़ा हूँ साहिल पर कुछ देर बचा हूँ नज़्में ग़ज़लें सपन...

नन्दलाल भारती की लघुकथाएं

  लघुकथाएँ -नन्दलाल भारती ।। कुत्ता।। लघु कथा आचार्य-लाल साहेब आपने खबर सुनी क्या। लाल साहेब-कौन सी खबर आचार्य जी। आचार्य-नेहरू ...

शनिवार, 27 सितंबर 2008

शरद तैलंग का व्यंग्य : राष्ट्रीय स्तर का पशु

राष्ट्रीय स्तर का पशु   ० शरद तैलंग   जिस प्रकार उत्तर भारत के निवासी दक्षिण भारत के निवासियों को चाहे वो तमिलनाडु के हो या केर...

अनुज खरे का व्यंग्य : शीशी भरी गुलाब की...

‘ गाडी के कार्बोरेटर , तुझे हुआ क्या है , आखिर इस धकाधक धुएं की वजह क्या है। ’ व्यंग्य शीशी भरी गुलाब की... - अनुज खरे   मैं...

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

आकांक्षा यादव का आलेख : खबरदार! जो अब महिलाओं व बच्चों का दिल दुखाया

  उत्तर प्रदेश में एक सरकारी अधिकारी ने शराब के नशे में धुत अपनी बेटी की सहेली से बद्सलूकी करने का प्रयास किया और बेटी द्वारा इसका विरोध क...

गुरुवार, 25 सितंबर 2008

शरद तैलंग की दो ग़ज़लें

दो ग़ज़लें शरद तैलंग (1) अपनी बातों में असर पैदा कर तू समन्दर सा जिगर पैदा कर| बात इक तरफ़ा न बनती है कभी जो इधर है वो उधर पै...

सत्येन्द्र शलभ की कविताएँ

क्या बताऊँ, बताने को क्या रह गया । जितना पानी था आँखों में सब बह गया ॥ ००००० फ़िर भरोसा न करना कभी आस पर, दिल न दे बैठना ऐसे व...

राजेश कुमार पाटिल की कहानी : स्मृति

कहानी   स्मृति -राजेश कुमार पाटिल लीला, कुछ खास नहीं बदला है पिछले बीस वर्षों में हमारी तहसील के इकलौते सरकारी कॉलेज में, वही बिल...

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------