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September 2008
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दो लघुकथाएँ

krishnakumar ajanabi vanikopadesh

-निशा भोसले


(1)

यकीन

           आपका काम अभी तो नहीं हुआ है, दो तीन दिनों में अवश्य हो जायेगा.  उस आदमी को समझाकर  लिपिक अपने काम में लगा गया.

               वह आदमी फिर भी वहीं खड़ा रहा.  उसे वहीं खड़ा देखकर लिपिक ने कहा- अभी बताया ना कि आपका काम हो जायेगा, विश्वास करें.

           वह आदमी फिर भी वही ठिठक कर खड़ा रहा.  यह देखकर लिपिक को रहा नही गया, उसने कुछ नाराजगी से उस आदमी से कहा- आप ही बताइये मैं आपको कैसे यकीन दिलाऊं.  वह आदमी कुछ डरा हुआ थोड़ा साहस के साथ बोला- बस!आप ये लिफाफा रख लीजिये.

(2)

                                   सामान

             वह बुजुर्ग अस्वस्थ था.  उसने अपने सभी बच्चों को पास बुला लिया था.  और उनसे कहा- इस आलमारी में रखे सामानों में से तुम्हें जो चीजें पसंद आये अपने पास रख ले. 

            जो चीजें छूट गयी थी वह थी उस बुजुर्ग की डायरी, चश्मा और कुछ पुरानी तस्वीर जो उन्होंने अब तक संभाल कर रखे थे.

             सभी बच्चों को प्रसन्नचित्त देखकर उन्होंने बस इतना ही कहा- इन बचे हुए सामान को मेरे पास लाकर रख दो क्योंकि इन सामानों को मैने सबसे ज्यादा अब तक संभाल कर रखा था.  बाकी सभी सामान तो मैने पैसों से खरीदी थी इसलिए इन सामानों के खो जाने का गम नहीं होगा, गम तो मुझे इन सामानों के खो जाने से होगा.

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संपर्क:                                                 

निशा भोसले
        शुभम विहार कालोनी 
           बिलासपुर छत्तीसगढ़
              495001

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चित्र : कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति

     प्रो. टीएम उर्फ 'टंगड़ीमार प्रबंधन '

 

--अनुज खरे


सारी दुनिया में इस समय महान कैसे बनें, महानतम सफलता कैसे पाएं टाइप की किताबों की बाढ़ आई हुई है। ऐसी ही एक किताब मेरे हाथ लग गई है। उसके लेखक और उसने सादे सिद्धांतों को मैंने पढ़ा, मानवता के इतिहास में यदा-कदा ही इतना महान काम इतनी सरल भाष में हुआ होगा, ऐसा मेरा मानना है। हालांकि जब आप खुद पढ़ लेंगे तो मान लेंगे कि मैं कितना सही कह रहा हूं। महात्वाकांक्षियों के हितार्थ अलंकार रहित यह किताब इतनी सरल और लोकल भाष में लिखी गई है कि आपको लगेगा कि जैसे आप अपने आसपास के ही किसी व्यक्ति का संस्मरण सुन रहे हों। यही इस किताब के लेखक और उसके सिद्धांत की खासियत है। खैर, मैं यों पूरी कहानी सुना दूं आप ही पढ़ लें, लेखक का प्रेरणादायी जीवन और उनका कालजयी सिद्धांत की दास्तान...

नोटः यह रचना जीवन को बेहतर बनाने से संबंधित है। अतः शुरू में ही बताता चलूं कि पूरी रचना में व्यंग्य या हास्य जैसी फिजूल की चीजों को ढ़ूंंढने का अनावश्यक प्रयास कताई ना करें, प्रेरणादायी रचना को महान नजरिए से पढ़ें।
तो चलिए शुरू से शुरू करते हैं। जीवन परिचय...

वैसे उनका असली नाम टीएम मोरले है, लेकिन सारा कॉलेज उन्हें प्रो. टीएम साहब के नाम से जानता है, ठीक उसी तरह जिस तरह अजीत को सारा शहर लायन के नाम से जानता था। तेजराम मोती प्रकाश मोरले नहीं बल्कि 'टंगड़ीमार' मोरले उर्फ प्रो. टीएम साहब। उनके मैनेजमेंट कौशल के कायल, 'मेधा' से आतंकित पूरे कॉलेज के लोग, उनकी कारगुजारियों के जीवंत कैसिट, बटन दबाया किस्से शुरू, किस्से भी क्या अखंड किस्से, एक किस्से में ही तीन सहायक किस्से निकल आएं। अनंत कथाएं एक प्रो. टीएम। यूं तो उन्होंने अपना कॅरियर चपरासीनुमा किसी चीज से शुरू किया था। हालांकि वे तब भी इसे शिक्षण सहायक ही कहते थे। शिक्षण सहायक के रूप में उनके दायित्वों के अंतर्गत वे बताते थे। जी हां, यहां सब कुछ वे ही बताते थे योंकि उनके समय के बाकी सब 'वरिष्ठ' तो उनकी कारगुजरियां से असमय ही मृतप्राय हो गए। इस कारण ये दायित्व उन्हें ही निभाना पड़ता है। तो वे जब शिक्षण सहायक थे तो वरिष्ठ प्राध्यापकों, अध्यापकों को चाक, डस्टर, पानी, सुटाई का रूल, भविष्य के दृष्टिगत कुछ प्रोफेसरों के घर की राशन-पानी आदि लाकर देते थे। इसके अलावा सम्मानित कार्यों के अंतर्गत वे बताते थे कि लाइब्रेरी से किताबें लाना भी उन्हीं के दायित्व हुआ करते थे।
यहीं उस ऐतिहासिक जगह वे पुस्तकों के निकट संपर्क में आए, जहां उन्हें अपनी मेधा के बारे में 'ज्ञान' हुआ, और वे काफी पढ़ लिखकर इस जगह तक पहुंचे। इसी संदर्भ में एक मौखिक किंवदंती यह कहती है कि उन्हें प्राध्यापकों द्वारा दी गई लिस्ट की किताबों को ढूंढने के दौरान कुछ पुरानी पीएचडी धूल खाती मिल गई थी, जिन्हें उन्होंने हस्तगत करके घर पहुंच लिया था। तत्पश्चात कॉलेज के ट्रस्टी महोदय के यहां दी गई अपनी 'निस्वार्थ' सेवाओं के प्रतिफल के रूप में उन्हें इसी कॉलेज में अध्यापकी प्राप्त हो गई थी। एक अन्य (यहां भी मौखिक किंवदंती) का विवरण कुछ दूसरी तरफ का है, जिसके अंतर्गत बताया जाता है कि ट्रस्टी महोदय के बूढ़े बाप जो रिटायर प्रोफेसर थे, कि टीएम साहब ने इतनी सेवा की थी कि मरते समय वे अपनी पीएचडी उन्हें सौंप गए थे जिसे टीएम साहब जिल्द खोलकर दोबारा पेशकर पीएचडी प्राप्त कर ली थी, जिस विषयक उनका कथन था कि उन्होंने ''गुरुप्रसाद अमर कर दिया है'' वो गुरु के खासे भक्त थे और जब तब लास में बताते रहते थे कि कैसे उनके गुरु ने केवल उनकी लगन और जिज्ञासा देखकर खांसते-खांसते ही उन्हें 'प्रबंधन' की शिक्षा दी थी। हालांकि यह बात अलग है कि इस दौरान गिरने वाले थूक का वे प्रबंधन उचित ढंग से नहीं कर पाए थे, जिस संबंध में भी उनकी अमर सूति थी कि ''गुरु का थूक भी शिष्य के लिए मोती बन जाता है।'' अर्थात वे शिक्षण पर इसी थोकोत्सर्जित पद्धति के अंतर्गत शिक्षित-दीक्षित हुए थे, जिस कारण थूककर चाटने, दूसरों के चरित्र पर थूकने आदि-आदि कार्यों को अत्यंत ही निष्णात एवं समर्पित भाव से करते थे।
ये तो था उनके प्रोफेसर बनने की दिशा में एक छोटा सा फ्लैश बैक।

अब उस बात पर आते हैं जिसके चलते वे फेमस हैं। उनकी अथाह 'ख्याति' है। वह है प्रबंधन का उनका बिलकुल मौलिक टीएम उर्फ टंगड़ीमार सिद्धांत या मॉडल। ढेरों छात्र इसकी सहायता से उच्च शिखरों पर पहुंच चुके हैं। छात्रों के जीवन में प्रेरणा भरने वाला यह मोस्ट फेमस मॉडल है, आप भी इससे प्रेरणा ले सकें, इसलिए इस सिद्धांत का लाइव डेमो दिया जा रहा है, ताकि आप इसे सीखें, गुनें और पद-हैसियत और अंततः जीवन 'बेहतर' बना सकें।(नोटः यह भी उस किताब में ही बताया गया है।)
फिलहाल वे लास में पढ़ा रहे हैं...

छात्र तन्मयता से उनसे 'प्रबंधन' की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। टीएम साहब कह रहे थे ''देखो बच्चों प्रबंधन क्या है? क्षुद्र दृष्टि से देखो तो व्यक्ति, संस्था, वस्तुओं का उचित नियोजन ही प्रबंधन है। लेकिन जब आप इसे 'व्यापक' नजरिए से देखते है तो प्रबंधन है व्यक्ति, संस्था, वस्तुओं की अपने अनुकूल कर, ठीक ढंग से अपनी व्यवस्था बैठा लेना, अर्थात विनम्रता से टंगड़ी मारते हुए कम से कम समय में अधिकतम दूरी प्राप्त कर लेना। श्रम-बुद्धि-कौशल के वांछित घालमेल से, तीक्ष्णता से चीजें मैनेज करते हुए मैनेजर हो जाना। ये व्यावहारिक प्रबंधन है।'' आगे उन्होंने जोड़ा आधुनिक काल में से ही 'टंगडीमार मैनेजमेंट' कहते हैं। यह प्रबंधन का एकदम नया और 'स्पेसिलाइज्ड एरिया' है। स्पेसिलाइज्ड इसलिए है कि कोई आम छात्र इसे कर ही नहीं सकता। इसके लिए तो 'काइयांपंती' की धूर्तता में पगे हुए खास बैकग्राउंड की आवश्यकता पड़ती है, यूं ही नहीं हर कोई इसे प्राप्त कर सकता है। इसमें सबसे खास बात है उचित टाइमिंग की यानि योग्य अवसर पर तत्क्षण ही कलाकारी दिखा दी जाए, अन्यथा तो 'लूजर्स' कैटेगिरी में गिने जाने के लिए तैयार रहना पड़ता है। टीएम साहब अपनी बात कह भी नहीं पाए थे कि पूर्व में ही एक छात्र बोल पड़ा। ''सर जरा टाइमिंग की बात डिटेल में समझाइए ना...''

''बिलकुल'' उन्होंने कहा-''जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण व्याख्यान के बीच तुम्हारी से पिन-पिनाती, जिज्ञासायुत आवाज बैड टाइमिंग का क्लासिकल उदाहरण है। बगुले की तरह घात लगाकर साधी जाती है टाइमिंग जरा सा चूके और पूरी मेहनत का सफाया'' जैसे किसी ऑफिस में प्रमोशन एक का होना हो और तीन दावेदार हो तो यहां टाइमिंग का क्या महत्व है, एक उदाहरण के माध्यम से समझो-'अ' ने इसके लिए सालभर दिखाए अपने काम कर्मठता को ही पर्याप्त आधार मानते हुए। आधार पर खुद को प्रमोशन का सबसे बड़ा दावेदार माना लिया। वहीं 'ब' ने काम और कर्मठता के साथ-साथ बॉस को सामने अपनी निरंतर हाजिरी को प्रमोशन का आधार पाना। वहीं इसी दौरान 'स' ने काम-कर्मठता-कर्तव्य के स्थान पर बॉस के प्रति कर्तव्य को प्राथमिकता देते हुए जेस्चर-पोश्चर में भी विनम्रता की अतिरिक्त 'डोज' मिलाना शुरू कर दी। ऑफिस और बंगले पर ड्यूटी की पंक्चुअलटी बढ़ा दी, यानि फल पकने का मौसम आने पर हर तरह की निष्क्रियता को त्याग कर 'प्रबंधन' में जुट गया। ''हां तो बच्चो बताओ फिर किसे मिला होगा प्रोमोशन'' टीएम साहब ने कहा। 'स' को ही मिला होगा, सर। कई आवाजें एक साथ आई। 'वैरी गुड अब समझ रहे हो 'टंगड़ीमार प्रबंधन' जहां 'अ' और 'ब' कर्तव्य और मेहनत में कम नहीं थे लेकिन जब अतिरिक्त मेहनत की जरूरत थी तो वे चूक गए, वहीं 'स' ने इस अतिरिक्त मेहनत अर्थात फल पकने के मौसम में 'माली' के समान नजरें रखीं, पेड़ के आसपास फल के चंहुओर 'झोली' फैलाकर उसके गिरने पर लपकने के लिए तैयार हो गया। तब कही जाकर हाथ आता है फल। ये क्या कि बीज तो डाल दिए और निश्चिंतता में बैठ गए, कोंपले भी नहीं निकलने पाएंगी कि ढ़ोर-डंगर खेल कर देंगे। मचान बंधना पड़ता है, फसल की रक्षा करनी पड़ती है निराई-गुढ़ाई भी समय-समय पर की जाती है, तब प्रमोशन की फसल पक कर खलिहान में आती है। जैसी 'स' के खलिहान में आई।

''पूरी कहानी से क्या शिक्षा मिलती है'' टीएम साहब बोले। फिर खुद ही आगे शुरू हो गए, शिक्षा ही नहीं ये कहानी तो अपने आप में पूरी 'पासबुक' ही है, जो कहती है उचित समय किया गया कोई भी अतिरिक्त प्रयास फल की प्राप्ति करवाता है। मैनेजमेंट की भाषा में 'सही टाइमिंग में सही एट' जबकि 'टंगडीमार मैनेजमेंट' में इसे कहते है 'कारगुजारी विद टाइमिंग' क्योंकि अगर आज तुम्हारे पास यह कला नहीं है तो आगे बढ़ने के अवसर भी नहीं ह,ै कारण ये है कि आज तो िसफारिश तक योग्य लोगों की लगाई जाती है, अयोग्य की तो कोई सिफारिश तक नहीं लगाना तो ऐसे परिदृश्य में टंगडी मारते हुए ही आगे बढ़ना पड़ता है।''
''फिर तो टंगड़ीमारने' का मतलब दूसरों का अन्यायपूर्ण ढंग से मौका छीनना हुआ सर'' फिर लास के कहीं कोने से आवाज आई।
''बिलकुल'' टीएम साहब ने कहा ''तुम काबिलियत नहीं दिखाओगे तो कोई दूसरा दिखा जाएगा, क्योंकि मार्ड्न मैनेजमेंट में काबिलियत और कारगुजारी लगभग पर्याय ही बन चुके हैं।''
ये तो तुम्हारी इच्छा है कि तुम्हें अगुआ बनाना है या कार्यकर्ता। हालांकि कार्यकर्तापना मैंटेन करना भी हरेक के बस की बात नहीं है'' क्योंकि कार्यकर्तापने में भीड़ बनना पड़ता है, भीड़ लगाना पड़ती है, भीड़ जैसा मुंह बनना पड़ता है, कई बार तो सारी व्यवस्था जेब से ही करना पड़ती है, फिर सैकड़ों कार्यकर्ता होते हैं नेता के चहुंओर खड़े होने को। कारगुजारी की कला नहीं आती हो तो दो-तीन पीढ़ियों तक भीड़ ही बने रहना पड़ता है। नेता के दरवाजे पर ही मंडराते रहना पड़ता है, पांवों में पड़े रहना पड़ता है, जूते-मोजे तक बन जाना पड़ता है, टिकट की मशकत करनी पड़ती है। ऐसे न जाने कितने 'पड़ता है' करने पड़ते है तब कही जाकर एकाध इच्छा पूरी हो पाती है। अब तुम्हीं बताओ हैं ना सौ मुश्किलें, इसलिए मैनेजर बनो वत्स्‌, मैनेजर, एजीयूटिव बने रहने में कार्यकर्तापने का दम चाहिए, इसलिए कारगुजारी दिखानी ही पड़ती है'' फिर मेरे अलावा पूरे देश में तुम्हें इतना उच्चस्तरीय प्रबंधन मॉडल कोई नहीं पढ़ा पाएगा, समझा पाएगा। इसलिए मेरे इन सीखों को आज ही गांठ बांध लो अन्यथा फिर टापते ही रह जाओगे। टीएम साहब प्रबंधन में गहन दर्शन मिस करके रोज ही इसी तरह का अथाह ज्ञान छात्रों को प्रदान करते ही रहते हैं।
अब एक प्रेरणादायी प्रसंग स्टाफरूम का भी हो ही जाए।

वहां भी टीएम साहब की ओजमयी वाणी गूंज रही है। ''अपना प्रिंसीपल नंबरी है नंबरी, स्टूडेंटों से पॉलिटिस करके अपना हित साधता रहता है। कल ही छात्रों को बरगला रहा था कि अगर कोई प्रोफेसर पढ़ाए नहीं तो उसे शिकायत की जाए, बताओ तो अब स्टूडेंट बताएंगे हम या-कैसे पढ़ा रहे हैं, २५ साल से तो पढ़ा रहे हैं आज तक समझे क्या जो अब बताएंगे, वैसे समझ जाते तो 'हम' न हो जाते, ठरकी दिखता है प्रिंसीपल क्या कहते हो, टेका मरते हुए बाकियों से हामी भरवाएंगे फिर स्टाफरूम से निकलकर प्रिंसीपल के कमरे में भी पहुंचेंगे ताकि वहां भी... वहां प्रिंसीपल को बताएंगे कि इन बूढ़े-खूंसट प्रोफेसरों के पास कोई काम तो होता नहीं है, दिनभर बैठकर कॉलेज की बुराई करते रहेंगे, फिर ऐसा नहीं हो रहा, वैसा नहीं हो रहा कि तान छेड़े रहेंगे,सर जरा टाइट तो करो इनको। इतने 'प्रबंधन' से निवृत होकर वे एक चकर स्टूडेंट लीडरों के पास लगाएंगे जिन्हें वे बताएंगे कि राजनीति कैसे चलाएं, कौन से प्रोफेसर छात्रों के विरोधी है, फंड कितना है आदि-आदि। इतना करने के बाद वे मोटरसाइकिल लेकर पहुंचेंगे प्रेस, जहां सब एडिटरों के पास बैठकर उन्हें बताएंगे कि भाई कॉलेज में क्या घपले-घोटाले चल रहे हैं, नाम मत देना लेकिन देख लो कैसा दुर्दशा कर दी कॉलेज की, शिक्षा की दुकानें बना के छोड़ दिया है। तुम ही कुछ करो नहीं तो सब रसातल में जाएगा। मेरा नाम नहीं छापना आदि दो-तीन बार दोहराकर वे अपनी प्राइवेट कोचिंग में पहुंचेंगे ताकि में बाहरी छात्रों को भी व्यावहारिक प्रबंधन में दीक्षित किया जा सके।

वैसे उनका मानना है कि उनके टीएम प्रबंधन मॉडल के सिद्धांत बेहद सरल एवं भारतीय लाइमेट के सर्वथा अनुकूल हैं, क्योंकि पश्चिम प्रंबध की किताबों में 'व्यावहारिक प्रबंधन' वहीं के नजरिए से लिखा गया है, जिसे स्थानीय जरुरतों के हिसाब से परिवर्धित-परिमार्जित करने का प्रयास आज तक किसी ने किया ही नहीं, चूंकि इस प्रबंधन को उन्होंने पूर्वरूपेण प्रैटिकल तौर पर आजमाकर भी देखा है, प्रीटेस्टिंग के अनुकूल परिणाम प्राप्त होने पर ही बहुसंख्यक छात्र वर्ग के व्यापक हितों को दृष्टिगत रखते हुए वे इसे एक सिद्धांत के रूप में विकसित कर उसके दूरगामी शिक्षण-प्रशिक्षण में लगे हैं। उनका तो मानना यहां तक है कि किसी भी सफलता को आप जान नहीं पा रहे हो तो उनके मौलिक सिद्धांतों की रोशनी में इस सिद्धांत का विश्लेष्ण कर लें, कहीं न कहीं उसके जीवन में इनका अनुशीलन मिल ही जाएगा। प्रतिदिन लगभग ये बात किसी न किसी लास बताते ही हैं फिर छात्र कल्याण के महान सिद्धांत के जन्मदाता के तौर पर उसकी खुमारी में ही घर की ओर लौटते हैं। यही संतुष्टि ही उनके जीवन की कमाई है, थाती है...। वे प्रसन्न हैं, जीवन की उत्कृष्टता इसी प्रसन्नता में छुपी है। खुशी किसी भी रास्ते से जीवन में आनी चाहिए...महान साध्य की राह में तुच्छ साधनों की ओर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके सिद्धांतों के अनुशीलन से सर्वत्र खुशी फैले इसी कामना के साथ.....

इति।
यहां तक की कहानी तो उनकी बेहद व्यावहारिक किताब में बताई गई है। चूंकि इसके आगे क्या हुआ, यह जानने की घोर जिज्ञासा में मैंने इसके आगे की कहानी की भयंकरतम रिसर्च की तो जो पता चला वो अपने मुंह से आपको बता नहीं पाऊंगा... आगे खुद ही पढ़ लें।
यह कहानी ऊपर के उस पैराग्राफ से आगे शुरू होती है.... वे महान सिद्धांत के जनक की खुमारी में डूबे घर की ओर लौटते हैं।

अब आगे...
घर पहुंचते ही उनका व्यावहारिक सिद्धांत, घरेलू सिद्धांत के आगे हो जाता है फेल। जहां वो महान प्रोफेसर बन जाता है सिर्फ मोती। थोड़ा बहुत सम्मानित हुआ तो उनकी पत्नी मोती प्रकाश बोल देंगी। आज तक वे यहां अपना व्यापक प्रबंधन नहीं चला पाए हैं, पूरी दुनिया को टंगड़ीमार प्रबंधन की कला में निष्णात कर रहे हैं, यहां एक टांग पर खड़े हाउस प्रबंधन में कार्यकर्तापने की भूमिका निभा रहे हैं, बरसों से... आगे भी कोई राह नहीं... मैनेजर नहीं बन पा रहे हैं... टंगड़ीमार प्रबंधन का कोई मॉडल श्रीमतीजी पर नहीं चला पा रहे हैं...घर की खिड़की से वे हर आनेजाने वाले को आशाभरी निगाहों से देखते हैं, कुछ आप ही बता दीजिए...जी हां उनका आशय आप से ही है... कुछ व्यावहारिक ज्ञान दीजिए ना प्लीज, कोई घरेलू- सिद्धांत कोई मॉडल...हो सके तो बताइए....भाई साब... ओ भाई साब....।
हर महान खोज के पीछे का दारुण...विवशता.... काश कि मैंने यह खोजबीन न की होती...। खैर, अब आप महान सिद्धांतों को देने वालों के बैकग्राउंड की खोज में न जुट जाना... याद रखिए, दारुण-विवशता...।

इडियट

-डॉ. के. पी. त्यागी

 

सुप्रीम कोर्ट में, मर्डर केस पर बहस चल रही थी
वादी, प्रतिवादी में,बात बात पर झड़प चल रही थी
प्रतिवादी पक्ष का कहना था, खू़न हरीराम ने किया है
वादी पक्ष ने कबूल किया, खू़न हरीराम ने ही किया है

ताज़ीरात हिन्द दफ़ा 302 के तहत,
मुज़रिम को मौत की सज़ा दी जाए
स्वर्गीय पन्ना लाल की आत्मा को
अदालत से इंसाफ़ दिया जाये

श्रीमान ! ,माना खू़न हरीराम ने किया है
ख़ून उसने होश हवास में नहीं किया है
वह इडियट है, उसे कुछ भी नहीं मालूम
यह भी नहीं मालूम, कि उसे नही मालूम

वह इडियट है या नहीं, अदालत बतायेगी
उसके बाद ही, अदालत फ़ैसला सुनायेगी
योर ऑनर, हम सब की है जिज्ञासा
आप ही बतायें, इडियट की परिभाषा

सुनिए, इडियट वह मनुष्य है,
जो बीस तक गिनती नहीं गिन सकता
अपने माँ बाप का नाम नहीं बता सकता
जिसे यह भी पता नहीं, वह है या नही
जो मानसिक रूप से अस्वस्थ है
जो शारीरिक रूप से अस्त-व्यस्त है

इस देश में हज़ारों लोग मौज़ूद हैं
जिन्हें, दस तक गिनती नहीं आती
जिन्हें माँ बाप का नाम  नहीं मालूम
माँ बाप को बच्चों नाम नहीं मालूम
कितने बच्चे हैं, यह तक नहीं मालूम
क्या वे लोग, डबल इडियट कहलायेंगे
तथा ज़ुर्म करके, सज़ा से बच जायेंगे

दूसरी बात, अगर इज़ाज़त हो
तो हूज़ूर, अर्ज़ करुं; इज़ाज़त है
टी वी को इडियट बाक्स कहते हैं
टी० वी० बनाने वालों,देखने वालॊं
पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाए
आफ़िस में, किसी को भी
अदालत के बिना इज़ाज़त,
इडियट कहने को, ज़ुर्म माना जाए

आज से लगभग पचास साल पूर्व जब मैंने कोर्स की पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ पढ़ना शुरू किया था तब मेरी समझ में यह नहीं आता था की व्यंग्य क्या है और व्यंग्य कार कौन है ,यह बात आज भी मेरी समझ में नहीं आती है , इतना जरूर समझ में आता है मैंने व्यंग्य पढ़े नहीं , व्यंग्य समझता नहीं और व्यंग्य लिखने की कोशिश करता हूँ यही व्यंग्य है /

लेख में व्यक्तिगत आक्षेप ,द्विअर्थी बात या चुटकुले लेख को व्यंग्य बना देते हैं /चुटकुले और व्यंग्य का अन्तर भी मैं नही समझ पाता, क्या जिस चुटकुले को सुनकर हंसी आ जाये वह चुटकुला और जिसे सुन कर हंसी न आए वह व्यंग्य / किसी किसी को चुटकुले देर में समझ में आते है तो क्या जब तक समझ में न आवे तब तक व्यंग्य और समझ में आते ही चुटकुला हो जाता है /

चेनल की बातें हास्य हैं ,व्यंग्य है , हकीकत है , फ़साना है क्या है मसलन ''''कहीं भी मत जाइयेगा , दिल थाम कर बैठिएगा ,आपके दिल दहल जायेंगे, आप देखेंगे एक ऐसी कातिल पिस्टल जो आपने अभी तक नहीं देखी होगी -केवल हम ही पहली बार आपको दिखा रहे हैं -और आप भी पहली बार इसे देखेंगे ,एक ऐसी पिस्तोल जो देखने में तो आम पिस्तोल जैसी है मगर है बहुत मारक, घातक एक ऐसी पिस्तोल जिससे ऐसी गोली निकलती है जो न डाकू को पहिचानती है न संत को , बालक को पहिचानती है न ब्रद्ध को, न दोस्त को पहचानती है न दुश्मन को, ऐसी गोली निकलने वाली पिस्तोल आप देखेंगे थोड़े अन्तराल के बाद, कहीं भी मत जाइएगा ,बाथरूम भी नहीं "" और आधा घंटा बाद , डकेती की योजना बनते व्यक्ति से पुलिस द्वारा जप्त पिस्तोल दिखा देंगे, वह भी लाल गोल घेरे में /

"" आप देखेंगे मोबाईल में यमराज ,नाग का पुनर्जन्म , दुनिया नष्ट हो जायेगी ,सब कुछ मिट जाएगा केवल हम बचे रहेंगे आपको बताने के लिए की दुनिया नष्ट हो चुकी है और सब कुछ मिट चुका है ""

वर्तमान समय में में आदमी इतना निराश्रित हो चुका है या यह कहें कि सरकार प्रशासन पर इतना आश्रित हो चुका है कि कुछ मत पूछो ,मिलजुल कर एक दूसरे की मदद करने की वजाय मिलजुल कर सरकार को कोसेंगे / कहीं बरसात में या केले के छिलके से फिसल कर कोई गिर पड़े , तो, वह इस उम्मीद में पड़ा रहेगा कि सरकार उठाने आए / और चेनल "" एक व्यक्ति यहाँ फिसला पड़ा और प्रशासन सोया हुआ है ' पुलिस भी अभी तक मौके पर नहीं आई है ,भीड़ बड़ती चली जारही है और आप देख रहे है लाइव टेलीकास्ट / ग्रतक ( गिरे हुए ) से हमारा संबाददाता बात कर रहा है ग्रतक का कहना है कि मंत्री जी ख़ुद आकर उठाएंगे तो उठूंगा मगर मंत्री जी है कि उन्हें सुरक्षा व्यवस्था की मीटिंग से ही फुर्सत नहीं मिल पा रही है, इन्हे इस ग्रतक की बिल्कुल परवाह नहीं है / राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ से भी अभी तक कोई नहीं आया है /जिलाधीश चुनाव की तैयारी और सेना बाढ़ पीडितों की मदद करने में ही लगी हुई है , ग्रतक पर कोई भी बड़ी विपत्ति आ सकती है कोई इसकी चेन छीन सकता है कोई ट्रक इसे कुचल सकता है /

आप देख रहे है लाईव टेलीकास्ट भीड़ बड़ चुकी है बच्चे तालियां बजा रहे हैं ,महिलायें मुह छुपा कर हंस रही है मगर प्रशासन सोया हुआ है न अभी तक केले के छिलके फेंकने वाले को पुलिस पकड़ पाई है न ही केले बेचने वाले को ,सुना है स्केच बनवाया जा रहा है / अब हम भीड़ में खड़े लोगों से पूछते हैं कि उनके क्या विचार है , हाँ आपका नाम .....क्या करना चाहिए "" क्या करना चाहिए इसे उठ कर घर चले जाना चाहिए "" अच्छा अब दूसरे से पूछते हैं ,आपकी राय में क्या करना चाहिए "" देखिये कलेक्टर को आकर इसे मुआवजा देना चाहिए , पुलिस द्वारा छिलके वाले को गिरफ्तार करना चाहिए और किसी मिनिस्टर को आकर इसे उठाना चाहिए ,देखिये पचास प्रतिशत लोगों की राय ये है ..... और पचास प्रतिशत के राय ...... है , आप भी अपनी राय हमें एस एम् एस कर सकने हैं ""

पुराना साहित्य क्या व्यंग्य था या हकीकत थी मसलन रीति काल - भवरे कमल समझ कर चेहरे पर मंडराया करते थे , अब या तो मुख कमल थे या भवरे वेबकूफ थे / राज कुमार नगर से जारहे हैं ऊपर झरोके में बैठी हुई को देखते हैं और बेहोश होकर गिर पड़ते हैं / आज के आयटम सोंग युग में वे होते तो तो न जाने कितनी बार मरते " सौ बार जनम लेंगे ,सौ बार फ़ना होंगे ऐ जाने वफ़ा फ़िर भी हम आयटम सोंग देखेंगे "

व्यंग्य मेरी समझ में बिल्कुल ही न आते हों ऐसी बात भी नहीं है / मैं मुंशी प्रेमचंद जी की कहानी पढ़ रहा था उसमें एक जगह महात्मा के वारे में पढ़ा "" तेजस्वी मूर्ति थी पीताम्बर गले में , जटा सर पर , पीतल का कमंडल हाथ में ,खडाऊ पैर में ,ऐनक आंखों पर , सम्पूर्ण वेष उन महात्माओं का सा था जो रईसों के प्रासादों में तपस्या , हवा गाड़ियों में देव स्थानों की परिक्रमा और योग सिद्धि प्राप्त करने के लिए रूचिकर भोजन करते हैं ""

यह भी मेरी समझ में आया कि सीता हरण में कंचन मृग एक कारण था और जब सीता को खोजते राम बन में जाते है और उनसे डर कर हिरन भागने लगते है तो हिरनियाँ हिरनों से कहती है ""तुम आनंद करहु मृग जाए , कंचन मृग खोजन ये आए ""

मैं तो केवल यह नहीं समझ पाता हूँ कि पूरी रचना या लेख में केवल एक लाइन का व्यंग्य पूरी रचना को व्यंग्य बना देता है या कि जो लेखक व्यंग्य लेखक के रूप में ख्याति अर्जित कर चुका है उसकी कही गई या लिखी गई हर बात व्यंग्य हो जाती है कुछ लोंगों का विचार है कि राजनीति और राजनेताओं के बगैर व्यंग्य लिखा ही नहीं जा सकता इन्हे केन्द्र में रखना ही पड़ता है, तो फ़िर टीका टिप्पणी ,आलोचना ,आक्षेप , उन्हें हास्य का केन्द्र बिन्दु बनाना क्या व्यंग्य हो जाता है /

व्यंग्य हमेशा से लिखा जाता रहा है और लिखा जाता रहेगा दुनिया बनी यानी सेवफल खाने इत्यादि से लेकर लाल गेहूं खाने तक , बस इतना चाहता हूँ के मेरी समझ में आता रहे / या तो व्यंग्य इतना बड़ा होता है कि मेरे छोटे दिमाग में घुसता नहीं है या फ़िर दिमाग इतना बड़ा और खोखला है कि "" वदन पैठ पुनि बाहेर आवा, माँगा विदा ताहि सर नावा ""/ व्यंग्य हो तो ऐसा हो जैसे हम बचपन में आतिशी शीशा लेकर सूर्य की किरणों से अपने या अपने मित्र के शरीर पर जलन पैदा किया करते थे /

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संपर्क:

ब्रिज मोहन श्रीवास्तव

१२१ बोहरा बगीचा गुना –मध्यप्रदेश

gazal

ग़ज़ल १

दरिया से तालाब हुआ हूँ
अब मैं बहना भूल गया हूँ.
तूफ़ाँ से कुछ दूर खड़ा हूँ
साहिल पर कुछ देर बचा हूँ
नज़्में ग़ज़लें सपने लेकर
बिकने मैं बाजा़र चला हूँ
हाथों से जो दी थी गाँठें
दाँतों से वो खोल रहा हूँ
यह कह — कह कर याद किया है
अब मैं तुझको भूल गया हूँ
याद ख़्याल आया वो बचपन
दूर जिसे मैं छोड़ आया हूँ.

 

ग़ज़ल २

मैं शायर हूँ ज़बाँ मेरी कभी उर्दू कभी हिंदी
कि मैंने शौक़ से बोली कभी उर्दू कभी हिंदी
न अपनों ने कभी चाहा यही तकलीफ़ दोनों की
हैं बेबस एक ही जैसी कभी उर्दू कभी हिंदी
अदब को तो अदब रखते ज़बानों पर सियासत क्यों
सियासत ने मगर बाँटी कभी उर्दू कभी हिंदी
न लफ़्जों का वतन कोई न है मज़हब कोई इनका
ये कहते हैं फ़कत दिल की कभी उर्दू कभी हिंदी
महब्बत है वतन उसका , ज़बाँ उसकी महब्बत है
ख़्याल उसने ग़ज़ल कह दी कभी उर्दू कभी हिंदी.

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और भी ग़ज़लें आप पढ़ सकते हैं सतपाल ख्याल के ब्लॉग http://aajkeeghazal.blogspot.com पर

 

लघुकथाएँ

-नन्दलाल भारती

।। कुत्ता।। लघु कथा

आचार्य-लाल साहेब आपने खबर सुनी क्या।

लाल साहेब-कौन सी खबर आचार्य जी।

आचार्य-नेहरू नगर में एक कुत्ता पच्चास लोगों को काट लिया।

लाल साहेब-आचार्य जी बस पच्चास।

आचार्य जी-लाल साहेब कैसी बात कर रहे हो। एक कुत्ता पच्चास को काट लिया। आप खुशी मना रहे हो।

आचार्य जी-मैं बहुत दुखी हूं। मैं कोई हनुमान नहीं हूं कि छाती फाड़कर दिखा दूं। आपको मालूम है वह कुत्ता पागल था। एक बात और आपको बता दूं कुत्ता के काटने का इलाज है। आज का आदमी जो होशो हवास में हजारों आदमियों को काट रहा है उसका कोई इलाज है।

आचार्य जी-नहीं। सचमुच बहुत जहरीला हो गया है आदमी आज का।

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।। एडस।। लघु कथा

भ्रष्टाचारी, ठग बेइमान, दगाबाज किस्म के लोग कामयाबी पर जश्न मनाने में लगे रहते हैं। कर्मठ,परिश्रमी नेक लोग आंसू से रोटी गीली करते रहते हैं। जबकि जगजाहिर है कि दंगाबाजी से खडी की गयी दौलत की मीनार ज्वालामुखी हैं। मेहनत सच्चाई से कमाई गये चन्द सिक्के भी चांद की शीतलता देते हैं। सकून की नींद देते हैं। कहते हुए बाबा शनिदेव धम्म से टूटी काठ की कुर्सी में समा गये।

जगदेव-बाबा दगाबाज लोग पूरी कायनात के लिये अपशकुन हो गये हैं। बाबा ये दगाबाज बेईमान मुखौटाधारी आदमियत के विरोधी लोग समाज और देश की तरक्की की राह में एड्स हो गये हैं।

शनिदेव-बेटा वक्त गवाह है दगाबाज खुद की जिन्दा लाश ढो ढो कर थका है। खुद के आंसू की दरिया में डूब मरा है। जमाना दगाबाजों के मुंह पर थूका है ओर थूकेगा भी। ========

।। उपदेश।। लघु कथा

बकसर बाबू ठगी बेइमानी अमानुषता का पर्याय बन चुका है। उपदेश तो ऐसे देता है जैसे कोई सदाचारी। क्या लोग हो गये हैं। मन में राम बगल में छुरी कहते हुए कुमार बाबू माथा पकड़ कर बैठ गये।

अवतार बाबू-आजकल तो ऐसे लोगों का ही जमाना हैं। बकसर बाबू जब किसी बड़े आदमी की चौखट पर माथा टेक कर आता है तो और भी अधिक चटखारे लेकर उपदेश देता है जैसे सामने वाला नासमझ हो। सब जानते हैं बकसर बाबू की काली करतूत को। वह अमानुष नेक बनने का ढोंग करता है। जनता सब जानती है।

कुमार बाबू-काश बकसर बाबू जैसे ठग ढोंगी अमानुष किस्म के लोगों की शिनाख्त कर जनता बहिष्कार कर देती। इसी में समाज संस्था और देश का हित है। ========

।। गुमान।। लघु कथा

गुलामदीन बीड़ी का कश खींचते हुए केशव बाबू से बोला बाबू हम गरीब हाड़फोड़ कर मुशिकल से चूल्हा गरम कर पा रहे हैं। दूसरी ओर कुछ लोग धन के पहाड़ जोड़ते जा रहे हैं। क्या हम भय भूख और जाति धर्म की लकीरों पर तड़पते मरते रहेंगे। ये कैसी आजादी है।

केशव बाबू-हमारा देश अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हो गया है। तुम भी तरक्की करोगे।

गुलामदीन-कब केशव बाबू। भ्रष्टाचारियों की ना कभी भूख मिटेगी ना हमारी तरक्की होगी। काश हम भी सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक्की कर पाते आजाद देश में।

केशव बाबू-गुलामदीन तुमको नहीं लगता कि तुम आजाद हो।

गुलामदीन-बाबू जिस दिन हम दीन दुखियों की गली से तरक्की होकर गुजरेगी तब हम असली आजादी महसूस करेंगे। बाबू देश की आजादी पर गुमान हैं। तभी तो भय भूख जातिधर्मवाद से पीड़ित तरक्की से दूर होकर भी आजाद देश की आजाद हवा पीकर अभिमान के साथ बसर कर रहा हूं।

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परदेसी@लघु कथा

सफेद की कालिख तो जगजाहिर हो चुकी है। अब ये कालिख रिश्तों की जडों तक पहुंचने लगी है। नतीजन परिवार टूटने लगे हैं। विश्वास कमजोर होने लगा है के मुददे पर चिन्ता जाहिर करते हुए कालीचरण बाबू जर्जर सोफे में धंस गये। कालीचरण बाबू की हां में हां मिलाते हुए ध्यानचरण बाबू बोले लाख टके की बात कह रहे हो बाबू। मुझे ही देखो उम्मीद के आक्सीजन पर ही तो जी रहा हूं। नन्हीं सी नौकरी घर परिवार की बड़ी बड़ी ख्वाहिशें, महंगाई की त्रासदी,बच्चों की पढाई खान खर्च का भारी भरकम बोझ इन सबके बावजूद पेट काटकर घर परिवार को देखने के बाद भी गांव घर परिवार को अविश्वास का भूत पकड़े ही रहता है। वे सोचते हैं शहर जाकर स्वार्थी हो गया हैं। बेचारा परदेसी शहर में अकेला मुश्किलों से जूझता है। बड़ी मेहनत के बाद तनख्वाह मिलती हैं और पन्द्रह दिन के बाद उधारी पर काम चलने लगता है। क्या बाल बच्चों को भूखे रखकर हर महीने मनीआर्डर करना ही अपनापन है।

कालीचरण बाबू-परदेसी की पीड़ा को गांव घर परिवार वाले कहां समझते हैं। उनकी रोज रोज की माँगों की पूर्ति करते रहो पेट में भूख लेकर तब श्रवणकुमार हो वरना नालायक।

ध्यानचरण-गांव घरपरिवार वालों को परदेसी के दर्द को समझना होगा। तभी रिश्ते का सोंधापन बरकरार रह पायेगा। गांव से हजारों किमी दूर परदेसी वनवासी का जीवन जीता है। इसके बाद भी परदेसी के दर्द को लोग नहीं समझते बस रूपया रूपया रूपया........।

कालीचरण-कुटुम्ब के लिये त्याग करना तपस्या है भइया।

ध्यानचरण- कुटुम्ब के लोग परदेसी के दर्द को समझे ,विश्वास करे तब ना।

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राखी@लघु कथा

मम्मी चाचा का गांव से फोन है कहते हुए रागिनी फोन अपनी मम्मी शोभा के हाथ में थमी दी।

शोभा-प्रेम बाबू रोशनी बिटिया की राखी नहीं भेजे क्या। उसके तीनों बड़े भाई जान खा रहे हैं। कह रहे हैं रोशनी की राखी नहीं आयी।

प्रेमबाबू-भेजी तो है पन्द्रह दिन पहले। भौजी रोशनी की मां से बात करो।

रोशनी की मां सुधा -दीदी क्यों नाराज हो रही हो। बड़ी दीदी तो बोल रही थी कि भाई साहेब का पता ठिकाना उनके पास नहीं है। कैसे राखी भेजती। रोशनी ने तो भेज दी है।

शोभा-क्या जब जरूरत पड़ती हैं तो पता मिल जाता है। राखी भेजने के लिये पता नहीं है। वाह रे ननद लोग। भाई बहन का तो यही एक उत्सव होता है जिससे भाई बहन के स्नेह की डोर और मजबूत होती है। इस पवित्र त्यौहार की याद ना आयी। जिन भाइयों की बहने नहीं वे रो रहे हैं। जिन बहनों के भाई है उन बहनों को याद ही नहीं।

सुधा-दीदी राखी का शौक तुमको भी चढ़ गया।

शोभा-होश में तो हैं सुधा। भाई बहन के इस पवित्र त्यौहार को शौक कह रही है। तुम अपने भाइयों को राखी नहीं बांधती क्या कहते हुए फोन रख दिया।

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।। रूपइया।। लघु कथा

सम्भवतःपुत्र मोह से बड़ा प्राण मोह हो गया है। बाप द्वारा बेटा के लिये प्राण आहुति इतिहास हो चुका है। इस वाकया को चरितार्थ किया दीदारचन्द्र ने। गांव के नीम हकीमों ना दीदारचन्द्र को डायबिटीज का पेशेण्ट बता दिया। वे घबराकर मरणासन्न स्थिति में आ गये। अब मरे या तब की स्थिति में उन्हे शहर लाया गया। शहर में कुशलचन्द्र ने उनका इलाज करवाया अच्छे डाक्टर से। इलाज के बाद वे बिल्कुल ठीक हो गये परन्तु उन्हे डायबिटीज थी ही नहीं। जबकि कुशलचन्द्र डायबिटीज की बीमारी का आतंक कई बरसो से झेल कर नन्ही सी तनख्वाह से ‘शहर से गांव तक देख रहा था। आर्थिक तंगी एवं ‘बीमारी से जूझते हुए बेटे की हाल पूछने की फुर्सत दीदारचन्द को कभी ना मिली। हां दीदारचन्द बेटे को तब जरूर कोसते जब उन्हें रूपये की जरूरत पड़ती। सच रूपइया हर रिश्ते का आका हो गया है बाजारवाद के युग में।

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।। घमण्ड।। लघु कथा

मैडम रोहिनी कुत्ते को सम्भालते हुए आदिवासी महिला से पूछ बैठी क्यों बाई आज छुटटी कर ली क्या।

बई-हां मैडम जी आज भगवान का जन्मदिन है। आज तो छुटटी कर ली पूजा पाठ के लिये। रोज रोज तो हाड़फोड़ती ही रहती हूं परिवार के साथ। मेहनत मजदूरी से रोटी तो मिल ही जाती है। रोज काम तो करना ही है आज के दिन भगवान के लिये छुटटी ले ली है।

मैडम रोहिनी-आज की मजदूरी तो गयी।

बाई- मैडमजी गयी तो जाने दो। मैं तो सन्तोष के धन में खुश रहती हूं। अधिक रूपया से घमण्ड आता है कहते हुए बाई अपनी झोपड़ी में चली गयी। मैडम रोहिनी माथे पर भारी शिकन लिये हुए कुत्ते के साथ आगे बढ़ गयी।

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ये इण्डिया है।। लघु कथा

जीवित बूढ़ी लाश परिजनों के लिये बेकार की चीज होने लगी है। वही परिजन जो कभी आश्रित थे मेहनत मजदूरी खून पसीने की कमाई का सुखभोग कर रहे थे कहते हुए महेश दादा रोने लगे।

सुबोध-क्यों आंसू बहा रहे हो दादा क्या हो गया।

महेश दादा-सुबोध की तरफ अखबार सरकाते हुए बोले ये खबर पढ़ो बेटा।

सुबोध-दादा सचमुच चिन्ता की बात है। बेचारे बूढे अमेरिका के राबिंसन माइकल फाब्र्स लेह में आकर मर गये। भला हो भारतीय सैनिकों का जिन्होने अमेरिकी दूतावास के जरिये मरने की खबर भिजवायी और लाश को सम्मान के साथ रखे। राबिंसन माइकल फाब्र्स के परिजनों ने लाश लेने को मना कर दिया यह कह कर कि लाश का हम क्या करेंगे।

महेश दादा-बेटा राबिंसन माइकल फाब्र्स के साथ जो हुआ हैं हम सरीखे बूढ़ों के साथ हो गया तो।

सुबोध-दादा बाजारवाद ने रिश्ते को तहस नहस करना तो शुरू कर दिया है। दादा भारतीय रिश्ते की डोर इतनी कमजोर नहीं है। यहां तो माता पिता धरती के भगवान सरीखे पूजे जाते हैं। वो अमेरिका है ये इण्डिया है। दादा इण्डिया की नींव सदभावना, आस्था एवं नैतिक मूल्यों पर टिकी है।

महेश दादा-अरे वाह बेटा तुमने तो मेरी चिन्ता का बोझ उतार दिया कहते हुए मंद मंद मुस्कराने लगे।

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।। मां का दूध।। लघु कथा

दिव्यानी-हे भगवान हिटलर के बम का जहर अभी तक नहीं पचा। धीरे धीरे यह जहर दुनिया में फैल रहा है। प्रकृति का विनाश हो रहा है। वन सम्पदा का नाश हो रहा है। ईंट पत्थरों के जंगल खड़े हो रहे हैं। हवा पानी में जहर रोज रोज घुल रहा है अब तो मां भी अछूता नहीं रहा।

लाजवन्ती- क्या कह रही हो दिव्यानी बहन।

दिव्यानी-मां के दूध में जहर मिलने लगा है।

लाजवन्ती-अरे बाप रे ये कैसे हो गया।

दिव्यानी-दुनिया के हर कोने में पवित्र माना जाने वाला मां का दूध प्रदूषण की भेंट चढ़ रहा है।

लाजवन्ती-प्रदूपण की वजह से अब दूध का धुला नहीं रहा मां का दूध दिव्यानी बहन।

दिव्यानी-दुनिया भर की औरतों को मां के दूध की रक्षा के लिये पर्यावरण विनाश रोकने के लिये संघर्प करना होगा तभी बचेगी मां कि अस्मिता और दूध की पवित्रता।

लाजवन्ती-सच कह रही हो दिव्यानी बहन यदि पर्यावरण विनाश नहीं रूका। मां के पवित्र दूध में जहर मिलता रहा तो कल का आदमी कैसा होगा घ्

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।। परिभाषा।। लघुकथा

दिनेश -अंकल बधाई हो। अंकल किसी को ढूंढ रहे हो ना।

मणि बाबू- नहीं बेटा।

दिनेश-अंकल ढूंढ तो रहे हो पर वे दोंनो ब्योम और तंगेश नहीं आये हैं इस जलसे में।

मणि बाबू-किसी जरूरी में फंस गये होंगे।

दिनेश-इस भव्य समारोह से बड़ा काम होगा उनके पास। नहीं अंकल रविवार हैं ना टीवी सेट से चिपके होगे। अंकल आप तो अपने किरायेदार के दूर दूर के रिश्तेदारों के जलसे में ‘शामिल होते हैं। पैसा और समय भी खर्च करते हैं बढ़ चढ़कर। देखो आपके जीवन के सुनहरे पल में वो हैवान हाजिर नहीं हुआ। तंगेश का देखो विगत महीने की ही तो बात है उसके बाप की मौत हुई थी हजारों की कालोनी का कोई भी आदमी नहीं झांका आपके सिवाय। इतना ही नहीं उसके बाप की मौत हुई है कानूनी तौर पर कोई गवाही तक नहीं दिया। आपने स्टाम्प पर लिखकर दिया कि उसके बाप की मौत हार्ट अटैक से हुई थी वह भी उन हैवानों के कहने पर। अंकल आप हर किसी के दुख में भागते रहते हो क्या मिलता है आपको?

मणिबाबू-सकून। बेटा नेकी करो बिसार दो। आदमी से उम्मीद ना रखो। प्रभु पर विश्वास रखो। यही जीवन का उद्देश्य होना चाहिये। कौन क्या कर रहा है नजर-अंदाज कर परमार्थ की राह बढते रहो। इससे बड़ा कोई सुख नहीं है। भले ही दीये की बाती की तरह तिल तिल जलना पड़े।

दिनेश-समय का पुत्र कहते हैं साहित्यकार को आज परिभाषा जान पाया हूं। बहुत बहुत बधाई हो अंकल.............

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।। झूठ।। लघु कथा

अपने साहेब तो कम्पनी के भले का बहुत सोचते हैं यार मैं बहुत देर में समझ पाया हूं। इसीलिये खूब तरक्की किये हैं रघुवीर अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया कि तपाक से सतवीर बोला सब झूठ है। साहेब को तो बस अपने भले का ख्याल रहता है बाकी किसी का नहीं चाहे कम्पनी हो या कर्मचारी। साहेब को तरक्की काम और पढ़ाई लिखाई को देखकर नहीं मिल रही है। साहेब से बहुत पढे लिखे और कम्पनी के हित में काम करने वाले लोग है। बेचारे सड़ रहे हैं। अपने साहेब को तो चमचागिरी में महारथ हासिल है। यही योग्यता तरक्की पर तरक्की दिलवाये जा रही है।

रघुवीर यार सतवीर क्यों साहेब पर झूठमूठ का बलेम लगा रहा है। मैंने कुछ सामान पार्सल करवाने के लिये साहेब को कार से भेजवाने का बोला तो साहेब बोले क्यों कार से भेज रहे हो जितने का सामान नहीं है उतने का पेट्रोल खर्च हो जायेगा। चपरासी से भेजवा दो आटो रिक्शे का किराया दे देना।

सतवीर-तुम नहीं समझे बाबू रघुवीर साहेब के बच्चे को टयूशन जाना था। मैडम को बाजार जाना था सब्जी भांजी खरीदने।। इतने जरूरी काम छोड़कर क्या साहेब दफ्तर के काम के लिये कार भेज सकते हैं। ये कार जो है साहेब के निजी काम के लिये हैं अरे बाबू रघुवीर साहेब के बारे में मैं जितना जानता हूं कोई नहीं जानता चालक और बाई ही साहेब लोगों के अन्दर तक की खबर रखते हैं। अपने साहेब जैसे लोग कम्पनी को खोखला करने के लिये होते हैं। तुम कह रहे हो साहेब कम्पनी के भले की सोचते हैं। साहेब अपने भले के बारे में सोचते हैं यही सच्चाई है बाकी सब झूठ। अगर साहेब लोग संस्था के बारे में सोचते तो कम्पनियां बन्द ना होतीं।

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।। सिपाही।। लघु कथा

चैपट साहेब की बदतमीजी से तिलमिलाकर राधेश्याम बाबू घनश्याम बाबू से बोले बाबू ये चैपट साहेब निम्नश्रेणी के कर्मचारी थे। आज बड़ा अफसर बन गये हैं सिर्फ चमचागीरी की उच्चयोग्यता के बलबूते। चैपट साहेब से ज्यादा पढे लिखे तो बेचारे चपरासीगीरी कर रहे हैं। घनश्याम बाबू ना जाने क्यों ये चैपट साहेब तुमसे खार खाये रहते हैं। तुमसे बहुत बदतमीजी करते हैं। तुम चैपट साहेब से ज्यादा पढ़े लिखे और ख्याति प्राप्त हो शायद इसीलिये।

घनश्याम बाबू--जलने दो। खुद जलकर राख हो जायेंगे।

राधेश्याम-दुर्जनता सज्जनता को लतिया रही है। तुम मौन हो।

घनश्याम बाबू-राधेश्याम कलम का सिपाही मौन नहीं रहता। जमाना जरूर थूकेगा चैपट साहेब के मुंह पर। हिटलर भी तो इसी धरती पर पैदा हुआ था। आत्महत्या कर गया।

राधेश्याम-कलम के सिपाही इतना सब्र कैसे रख लेते हैं।

घनश्याम बाबू-कलम की घाव हरी रहती है।

राधेश्याम- बाबू कुछ भी कहो पर चैपट साहब बांस कम डॉन ज्यादा लगते हैं।

घनश्याम बाबू-समय है बित जायेगा। सब्र सदा मुस्कराता रहा है और मुस्कराता रहेगा।

राधेश्याम-बाबू तुम तो वो हस्ती हो जिसे देखकर चैपट साहेब जैसे बदमिजाज भोंकने लगते हैं और तुम बेखबर सद्मार्ग पर बढते रहते हो। कलम के सिपाहियों को हर युग ने सलाम किया है। मैं भी तुम्हें सलाम करता हूं बाबू.... ========

।। फल।। लघु कथा

ज्वाला साहेब बधाई हो प्रमोशन पर प्रमोशन साल में दो दो भी। अब तो साठ साल के बाद भी आपकी बड़े पद की नौकरी पक्की रहेगी। संस्था का मालिक बने रहेंगे मायूस स्वर में हीराबाबू बोले।

ज्वाला साहेब-आप लोगों की शुभकामनाओं का फल है।

हीरा बाबू -नहीं साहेब वंचितो को लतियाने और अपने लोगों को खुश रखने की कला का फल है।

ज्वाला साहेब-हीरा क्यों मजाक कर रहा है।

हीरा बाबू-साहेब आपने प्रतिभा के दमन की प्रतिज्ञा को पूरी किया इसके लिये और बधाई कबूले।

ज्वाला साहेब-प्रतिभा विरोधी प्रतिज्ञा।

हीरा बाबू- हां साहेब। वंचित प्रतिभावान के भविष्य का आपने खून कर दिया। उसे आगे न बढ़ने देने की आपने कसम खा ली ।

ज्वाला साहेब-हीरा तू विद्याधर वंचित की बात कर रहा है। अरे छोटे लोगों को प्रमोट करना खतरे से खाली नहीं है। छोटे लोग बराबरी करने लगेंगे। ऐसे लोगों को दबा कर ही रखना चाहिये। आगे बढ़ने का मौका दिया तो सिर पर चढ़कर मूतने लगेंगे।

हीराबाबू -अरे वाह रे योग्यता और आदमियत के दुश्मन तुमने सत्ता स्थापित करने के लिये उच्च शिक्षित शोषित पीड़ित वंचित विद्याधर के भविष्य का खून कर दिया। उच्च श्रेणी के व्यक्ति को निम्न श्रेणी का बनाकर शोषण किया। अरे तुममें‘शर्म नहीं बची है तो क्या भगवान से डरते। गरीब की आंसू पर जाम टकराते रहे। तुम्हें कीड़े अवश्य पड़ेंगे वंचितों के विरोधी। ज्वाला साहेब भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती। तुम्हारे गुनाहों का फल तुम्हें मिल रहा है पर तुम्हारी आंख नहीं खुली। शोषित पीड़ित वंचित विद्याधर ने तो अपना ही नहीं अपने खानदान का नाम रोशन कर दिया है अपनी उच्च योग्यता के बल पर। ========

विश्वास। लघुकथा।

रघु-अरे भइया रंधवा क्यों उदास हो अब तो जेल से फुर्सत से छूट गये। कोर्ट कचहरी का झंझट भी नहीं रहेगा जो होना था हो गया। इस अनहोनी को किस्मत का लिखा मान कर सब्र करो भइया।

रंधवा-भइया किस्मत की वजह से नहीं पुलिस वाले की वजह से जेल गया था। सालों कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाया सिर्फ इसलिये की वो वर्दीवाला रोटी के लिये बिक गया था। नहीं तो होटल के बैरे से सिर्फ कहां सुनी ही तो हुई थी मियां भाई की। मियां भाई के साथ होने की वजह से मुझे भी जेल में ठुस दिया गया 307 और 302 का मुलजिम बनाकर। वो बड़े बड़े बाल बड़ी दाढ़ी बड़ी मूंछ वाला लम्बा तगड़ा रोबीला पड़ाव थाना प्रभारी चार हजार रूपये लेकर तो जमानत होने दिया था। इतने बरसों तक बिना अपराध के मानसिक,आत्मिक,शारीरिक और आर्थिक रूप से जो दुख पाया उसकी भरपाई कौन कर सकता है।

रघु-कोई नहीं भइया। ये वर्दी वाले अपने फायदे के लिये जिसे चाहे उसे जेल में ठुस सकते हैं जन सेवा राष्ट्र सेवा की कसम को भूलकर तभी तो पुलिस बदनाम है। अंधेरपुर नगरी कनवा राजा की कहावत चरितार्थ हो रही है।

रंधवा-ठीक कह रहे हो भइया मेरा भी विश्वास उठ गया है।

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डयूटी@लघु कथा

लो डाक साहब डाकिया पसीना पोंछते हुए बोला।

डाकिया को परेशान देखकर रघु बाबू बोल पोस्टमैन साहब बैठिये पानी पी कर जाइये।

साहब मरने को फुर्सत नहीं हैं। साधारण डाक रजिस्ट्री और मनीआर्डर सब हमें ही तो बांटना पड रहा है। नई भर्ती बन्द हैं कहने को। दैनिक वेतन और संविदा पर साहेब लोग रखते तो हैं वह भी अपने ही आदमी। वे काम करेंगे कि चमचागीरी। दफ्तर में आते हैं तो साहेब की रौब दिखाते हैं। डर के मारे कौन बोले। मुंह खोलो तो आचरणहीनता का केस बन जाता है। बहुत छिछालेदर हो जाती है साहेब।

रघु बाबू यहीं देखो बड़े साहब बाहर हैं तो दैनिक वेतनभोगी चपरासी भी नहीं आया है। जब जब बड़े साहब दफ्तर नहीं आते चपरासी भी नहीं आता। पूछताछ एकाध बार किया तो मालूम हैं बड़े साहेब क्या बोले।

यही ना तुम लोगों को बात करने नहीं आती है। अपनी ड्यूटी तो ठीक से करते नहीं दूसरों के मामलों टांग अड़ाते हो। अपनी ड्यूटी से मतलब रखो कौन क्या करता है यह देखना तुम्हारा काम नहीं है। आने जाने वालो से बुरा बर्ताव करते हो। तुम लोगों की शिकायत आने लगी है। अपने व्यवहार में सुधार करो। पोस्टमैन एक झटके में बोला। रघु बाबू के हाथ से गिलास का पानी लेकर पेट में जल्दी जल्दी उतारकर चल पड़ा अपनी ड्यूटी बजाने की हड़बड़ाहट में।

रघु-सच कह रहे हो,निजी स्वार्थ, भाई-भतीजवाद, जातिवाद ही तो इस देश की नींव खोद रहे हैं।

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दुर्व्यवहार@लघु कथा

धौंसचन्द साहेब अपने अधीनस्थ प्रतिष्ठित कमल बाबू को डपटते हुए बोले कमल तुम्हारा आचरण ठीक नहीं हैं दफ्तर में आने जाने वालों से दुर्व्यवहार करते हैं। कमल बाबू को काटो तो खून नहीं। कमल बाबू खुद की समीक्षा करने में जुट गये। आखिरकार कमल बाबू को वजह यह मिली की वे कल ठगेन्द्र, चपरासी को काम करने के लिये बोले थे यह जानकर भी कि चपरासी साहब का आदमी है यही कमल बाबू का दुर्व्यवहार साबित हो गया धौंसचन्द साहेब की निगाहों में।

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@@ हिटलर @@लघु कथा

अल्प शिक्षित,निम्न पद चमचागीरी के शिखर से उच्चपद हासिल करने वाला बढिया काम करने वाले कर्मचारियों को प्रताडित करें तो क्या इसे हिटलरगीरी नहीं कहेंगे राजू आंख मसलते हुए धीरज बाबू बोले।

राजू-बाबू यही लोग तो सत्ता का सुख भोग रहे हैं नीचे से उपर तक। गरीब कोल्हू के बैल सा खट रहा है। चाहे दफ्तर हो या जमींदारों का खेत। सच कहा है किसी ने कमायें धोती वाले बेचारे खायें टोपी वाले।

धीरज बाबू -राजू तुम्हारे साहेब भी तो ऐसे ही हिटलर है।

राजू-हां बाबू तभी तो आंसू पीकर काम करना पड रहा है पारिवारिक दायित्व निभाने के लिये। ऐसे हिटलर के साथ दिन दुखते सालों की तरह बीतता है।

धीरज बाबू-राजू ये ऊंची पहुंच वाले सबल लोग गरीबों की तकदीर पर कुण्डली मारे बैठे हैं सदियों से। इन हिटलरों के आतंक से निपटने के लिये हिटलर ही बनना होगा।

राजू-हां बाबू ठीक कह रहे हो तभी गरीबों का उद्धार होगा।

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@@भारत निर्माण @@लघु कथा

मां चामुण्डा की नगरी, पांच दिवसीय सरकारी भारत निर्माण अभियान के जलसे के भव्य समापन समारोह के मौके पर मोती बाबू आपकी आंखों में बाढ। वजह जान सकता हूं।

मोती - भूख .......... दर्शन बाबू।

दर्शन -क्या भूख। सुना है पहले शाइनिंग इंडिया और आकी -बाकी भारत निर्माण अभियान ने पछाड़ दिया है। देश में करोड़पतियों की संख्या दिन-रात बढ़ रही है। आप भूख की चिंता पर सुलग रहे हो।

मोती -दर्शनबाबू प्रदर्शन के अलावा ये सब कुछ नहीं हैं वो देखो भूख का नंगा खेल।

दर्शन - कहां।

मोती -कचरे के ढेर पर जहां खाकर फेंके हुए डिब्बे कुत्तों के साथ भूखे नंगे आदमी के बच्चे भी चाट रहे हैं।

दर्शन -सच कह रहे हो भूख और दरिद्रता के रहते शाइनिंग इंडिया हो चाहे भारत निर्माण अभियान दीन दुखियों के आंसू नहीं पोंछ सकते।

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@@ कल्याण@@लघु कथा

दशरथ-भइया धर्मानन्द गरीबों का कल्याण कभी होगा क्या।

धर्मानन्द-ऐसा तुमको क्यों लगता है।

दशरथ-सामाजिक आर्थिक विषमता ,स्वार्थ की अंधी दौड़, गरीबों का अवनति और बाहुबलियों की तरक्की देखकर।

धर्मानन्द-बात तो लाख टके सही कह रहे हो भइया दशरथ इनके रहते तो नहीं पर असम्भव भी नहीं है।

दशरथ-वो कैसे भइया।

धर्मानन्द-अपने अस्तित्व का जोरदार प्रर्दशन।

दशरथ-बहिष्कार और बुराइयों का विरोध।

धर्मानन्द-हां पर अहिंसात्मक ढंग से तभी गरीबों का कल्याण सम्भव है।

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अतिक्रमण

। लघुकथा।

अरे वाह तुम तो सूट पहनकर आये हो दफ्तर अधिकारी बेगानचन्द ने अपने से कई गुना अधिक पढ़े लिखे और छोटे पद पर काम करने वाले कर्मचारी दीवानचन्द पर व्यंगबाण का तरकस छोड़ा।

दीवानचन्द-सहज भाव से बोला ना जाने क्यों तथाकथित श्रेष्ठ लोग अपनी योग्यता को नहीं देखते। गिरगिट की खाल ओढ़ लेते हैं।

बेगानचन्द-खिसियाकर बोले काग हंस तो नहीं बन सकते।

दीवानचन्द-पद दौलत के नशे में चूर लोगों को अपने मद के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता सावन के भैंसे की तरह।

छोटे लोगों के मुंह मैं नहीं लगता कहते हुए बेगानचन्द अपनी कुर्सी की ओर बढ़ने लगे। दीवानचन्द ने भी नहले पर दहला मारा सुनो साहेब आप और आप जैस ना जाने कितने लोग हमारे जैसे लोगों की तकदीर नाग की तरह अतिक्रमण कर बैठे है।

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गिफ्ट

। लघुकथा।

दफ्तर में विज्ञापन कम्पनियों सहित कम्पनी के उत्पाद बेचने वालो का आना जाना लगा रहता था। ये सभी मानचन्द बाबू से अपने काम के बारे में चर्चा भी करते। मानचन्द बाबू इन लोगों का काम कर गर्व महसूस करते। दीवाली और नये साल के आते ही लोग मानचन्द बाबू को देखना भी पसन्द ना करते। नये साल अथवा दीवाली के महीना भर बाद ज्यों की त्यों स्थिति हो जाती। एक दिन कम्पनी के प्रतिनिधि आये मानचन्द से बड़े आत्मीय ढंग से बात करने लगे। मानचन्द ने भी उनसे ज्यादा आत्मीयता प्रगट किये और काम भी किये। इसके बाद प्रतिनिधि से कहे एक बात पूछूं महोदय।

प्रतिनिधि-हां क्यों नहीं साहब के पहले तो आप हमारे साहब है।

मानचन्द-मैं साहब तो नहीं हूं पर अपना फर्ज है अच्छी निभाना जानता हूं। मैं तोहफा के लिये काम नहीं करता। अपनी हालात पर खुश रहना भी जानता हूं लेकिन मुझे एक बात खटकती है।

प्रतिनिधि-वह क्या।

मानचन्द-दीवाली या नये साल के आते ही कम्पनी के मालिक अथवा प्रतिनिधि लोग अनजान क्यों बनने का नाटक करते हैं।

प्रतिनिधि-गिफ्ट बांटने की व्यस्तता रहती हैंसाहब। बाकी समय तो काम करवाने के लिये आते ही हैं।

मानचन्द-क्या आपको नहीं लगता कि गिफ्ट देना भ्रष्टाचार को न्यौता है?

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बिल। लघुकथा।

रामबाबू दुकानदार को आधा किलो नमकीन का आर्डर दिये। दुकानदार दामू नमकीन रामबाबू के सामने रखते हुए बोला और क्या सेवा करूं बाबू जी आपकी।

रामबाबू बोले और तो कुछ नहीं चाहिये बिल दे दो।

दामू-रामबाबू को बिल थमाते हुए बोला बाबू छोटे दुकानदारों से बिल लेना जागरूक लोग अपना चातुर्य समझते। क्या वही जागरूक लोग कचहरी से खरीदे गये स्टाम्प पेपर एवं दिये गये भारी भरकम शुल्क के भी बिल लेते हैं

दुकानदार का यह प्रश्न सुनकर रामबाबू के तालू चिपक गये।

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पुरस्कार

लघुकथा

काका ये तस्वीरें तुम्हारी दीवाल पर मैं तब से देख रहा हूं जबसे मेरी आंख खुली है। इस कलेक्शन में कोई तस्वीर नहीं जुड़ी क्यों ?

दीनानाथ -बेटा दयाल इन तस्वीरों के अलावा मेरे जीते जी शायद ही कोई तस्वीर टंगे।

दयाल-ऐसा क्यों काका घ् नेता तो अपने देश में बहुत हो गये हैं। देश समाज की सेवा के बदले बड़े से बड़ा पुरस्कार अपने नाम करना चाह रहे हैं।

दीनानाथ-पहले के नेता देश समाज की सेवा करते थे अब के नेता अपना खजाना भरते हैं। क्या ऐसे नेताओं की तस्वीरें लगाकर ईमानदारी और सेवाभाव को गाली देना है ? पुरस्कार को आपस में मिल बांट लेना सम्मान का अपमान है बेटा।

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डाका

। लघुकथा।

बिपिन-बिहारी बाबू मेरी कमीज बताओ कितनी की होगी।

बिहारी-सौ रूपये की होनी चाहिये।

बिपिन-अरे यार ब्राण्डेड है। 500 रू की है तुम सौ रूपये आंक रहे हो।

बिहारी-होगी पचास दिन चल जाये तो मान लेना। ब्राण्ड के नाम पर ठगी हो रही है आजकल।

बिपिन-क्या।

बिहारी-हां कल की ही तो बात हैं। मैं बेटे के लिये ब्राण्डेड कम्पनी का जूता रू0 499.90 बिल क्रमांक 8242 दिनांक 22 जनवरी 2008 को वेंचर शो रूम से लिया। घर आकर पता चला कि जूता पुराना है और एक जूते मे फीता भी नहीं है। दुकान शिकायत लेकर गया तो दुकानदार उल्टे मेरे उपर इल्जाम लगाने लगा कि जूता पहनकर लाये हैं। न जूते बदला ना ही पैसे वापस किये। मैं ठगा सा वापस आ गया।

बिपिन-यह तो धोखाधड़ी है। मुनाफाखोर दुकानदार ग्राहकों के पाकेट पर डाका डालने लगे है।

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उस्तरा

लघुकथा

न्यूनतम् योग्यता उच्च श्रेष्ठता की बदौलत परसाद बाबू ब्रांच हेड का पद हथिया बैठे। परसाद बाबू वैसे तो सभी को आतंकित करके रखते थे परन्तु छोटे और अपने से अधिक योग्य लोगों से तो छत्तीस का आंकड़ा रखते थे। गणतन्त्र दिवस के चौथे दिन परसाद बाबू दोपहर के एक बजे आये । आते ही काल बेल पर जैसे बैठ गये। कुछ ही देर मे अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए बड़े बाबू को बुलाने लगे अरे ओ दयावान इधर आ। साले दिन भर बैठकर चाय पीते है कोई काम नहीं करते। इसी बीच दयावान हाजिर हो गया।

ब्रांचहेड - आग बबुला होकर बोले हमारी टेबुल कुर्सी और आफिस की सफाई क्यों नहीं हो रही है।

दयावान-सर ओ चरेन्द्र आजकल नहीं आ रहा है ना। यह बात परसाद बाबू अच्छी तरह से जानते थे क्योंकि चरेन्द्र उनका चहेता था। आफिस का काम कम और उनका अधिक करता था।

इतना सुनना था कि ब्रांचहेड परसाद बाबू की आंखों में खून उतर आया। तमतमा कर बोले चरेन्द्र नहीं आ रहा है तो तुम करो।

दयावान-मैं क्यों ?

ब्रांचहेड परसाद बाबू-बदतमीजी से बोले तुमको करना पड़ेगा।

दफतर के सभी लोग खामोश थे अधिकतम योग्य दयावान के अपमान के गवाह भी। उनकी जबानें खामोश थी परन्तु जबान पर यह सवाल तैर रहा था कि संस्था ने बन्दर के हाथ में उस्तरा क्यों थमा दिया?

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घाव

लघुकथा

साहेब की कोठी का काम निपटा कर सावित्री बाई आंसू पोंछते जाते हुए देखकर ड्राइवर मोती चुपके से कोठी की आड में खड़ा हो गया और इशारे से बाई को अपनी ओर बुलाया।

सावित्री बाई-बाबूजी क्यों बुला रहे हो। मैं ऐसी वैसी नहीं हूं। ऊंची जाति की हूं। मजबूरी में झाडू पोंछा और कपड़े धोने का काम कर रही हूं। पति की कमाई से घर नहीं चल पाता है। बच्चों को अच्छा कल मिले इसी उम्मीद में तो गुलामी कर रही हूं साहब लोगों की।

मोती-बाई मुझे गलत ना समझो। तुम आंसू क्यों बहा रही हो।

सावित्री बाई-बाबूजी गरीबों का आंसू कौन पोंछता है। सब आंसू देते हैं।

मोती-बाई क्या कह रही हो। दुनिया में सभी एक जैसे नहीं होते। भलमानुस लोग भी है। दूसरों के दर्द को अपना समझते हैं।

सावित्री-बाबूजी सही कह रही हूं। ये आपके साहेब कोई भलामानुष है क्या ?

मोती-क्यों नहीं भलामानुष है बाई। इतने बड़े साहब हैं। हां कम पढ़े लिखे है पर श्रेष्ठ हैं।

सावित्री-साहब है। इसका मतलब ये तो नहीं कि देवता है। राक्षस है राक्षस ..............। ये आंसू उनके दिये हुए शोषण के घाव की वजह से बह रहे हैं। मोती-क्या हुआ बाई।

सावित्री-बेटवा को नौकरी पर लगा देंगे इसी उम्मीद में पांच साल से एकदम कम पैसे में कोठी का पूरा काम और खाना भी बना रही इतना ही नहीं टट्टी घर फोकट में साफ करवा रहे हैं। बेटवा गजेन्द्र से भी सुबह शाम गुलामी करवा रहे हैं। छुट्टियों के दिन तो सुबह साहब के बंगले आ जाता है और रात में घर वापस आता है भूखे प्यासे। ये लहूलुहान हाथ देखो बाबूजी तेजाब से फर्श साफ करने में हुआ है। यही हाल मेरे बेटे का भी है। क्या अमानुष लोग हैं।

मोती-बाई द्वारपाल साहेब तुम्हारे बेटवा को कभी भी नौकरी नहीं दे सकते। गलतफहमी मत पालो। ये गरीबों के खून चूसने वाले शोषण के घाव के अलावा और कुछ नहीं दे सकते।

सावित्रीबाई-धोखा कर रहे हैं क्या............................................. ?

मोती-हां। आसूं न बहाओ। बात रखने की हिम्मत जुटाओ।

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।। बीमारी।।

लघुकथा

साहब बड़े साहब को क्या हो गया है लल्लू दुखी मन से पूछा।

विजय-क्या हुआ लल्लू साहब को।

लल्लू-बाबू चर्चाओं का बाजार गरम है। आपको कुछ पता नहीं। अच्छा आप तो पी.ए.साहब है। जानकर भी अनजान रहेंगे ना।

विजय-सच लल्लू मुझे कुछ पता नहीं। बाजार गरम क्यों है तुम्हीं बता दो ।

लल्लू-घूंसखोरी और अत्याचार की वजह से। आजकल बात बात पर गाली देने लगते हैं। आपके साथ भी तो कल बहुत बदतमीजी कर रहे थे। सुना है कई एजेन्सियों से कई लाख डकार गये हैं। कईयों से ऐंठने का प्लान है। दुआल साहेब तो बड़े शातिर निकले। चेहरे से तो बहुत शरीफ लगते हैं। मन से बहुत काले है।

विजय-लल्लू दुआल साहेब अपने फर्ज को भूल गये हैं जानते हो क्यों।

लल्लू -क्यों साहेब।

विजय-साहेब साहब बनने लायक है।

लल्लू-नहीं।

विजय-बिल्कुल सही। पद और दौलत उम्मीद से बहुत ज्यादा मिल गया हैं। इसी अभिमान में दुआल साहेब मानसिक बीमारी के शिकार है।

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अस्पृश्यता। लघुकथा।

रघुवर-अरे भाई सेवक जलसे में नहीं गये थे क्या।

सेवक-किस जलसे की बात करे रहे हो।

रघुवर-अरे जिसे जिले की ये सुर्खियां है।

सेवक-कम्पनी के जलसे की। ये तुमको कहां मिल गया।

रघुवर-भाई तुम्हारे विभाग के जलसे की खबर है। इसलिये अखबार की कतरन साथ लेते आया ये देखो तुम्हारे दफ्तर के सभी लोग फोटो में हैं बस तुमको छोड़कर। अच्छा बताओ तुम ‘शामिल क्यों नहीं हुए।

सेवक-मै छोटा कर्मचारी अस्पृश्यता का शिकार हो गया हूं।

रघुवर-क्या कह रहे हो। तुम जैसे कद वाले सिर्फ पद के कारण अस्पृश्यता के शिकार........

सेवक-हां रघुवर।

रघुवर-धैर्य खोना नहीं। जमाना तुम्हारी जयजयकार करेगा एक दिन सेवक....। ========

।। प्रेसिडेण्ट।।। लघुकथा।

संस्था के उपकार्यालय के कर्मचारी यूनियन प्रेसिडेण्ट के आगमन की खबर से काफी उत्सुक थे। उधर दूसरा वर्ग कलह और झंझावतों से जूझ रहा था। प्रेसिडेण्ट दौर पर आये और सीधे कार्यालय प्रमुख के ए.सी.रूम में प्रविष्ट हुए फिर बाहर नहीं झांके। घण्टे दो घण्टे की गपशप और चाय नाश्ते के बाद वे ए.सी.रूम से झटके से निकले और ए.सी कार में बैठ गये। बेचारे कर्मचारी प्रसिडेण्ट की झलक तक नहीं पा सके। एक कर्मचारी दूसरे कर्मचारी से बोला यार अपना वोट तो व्यर्थ हो गया।

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चाय। लघुकथा।

अधिकारी-टीचू ये क्या है।

टीचू-सर चाय है।

अधिकारी- कैसी चाय है। वह भी सरकारी।

टीचू-दूध में तनिक पानी डाल दिया हूं।

अधिकारी-क्यूं। खालिस दूध की क्यों नहीं।

टीचू शिकायती लहजे में बोला-इंचार्ज बाबू मना करते हैं।

अधिकारी-बाबू की इतनी हिम्मत। हमें तो खालिस दूध की ही चलेगी।

टीचू-बावन बीघा की पुदीना की खेती वाले हैं, मन ही मन बुदबुदाया।

अधिकारी-कुछ बोले टीचू।

टीचू-नहीं सर।

अधिकारी-अब तो सरकारी चाय दे दे।

टीचू-सर दूध में चाय पत्ती और शकर डलेगी ।

अधिकारी- हां क्यों नहीं पर पानी नहीं। जा की बहस ही करता रहेगा। मूड खराब हो गया चाय देखकर।

टीचू-दूध में चाय पत्ती और शकर डालकर गरम करने में जुट गया।

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पासवर्ड। लघुकथा।

गोपाल प्रसाद अधिकारी के रूतबे में मदमस्त चरवाहे की भांति चिल्लाने लगे.....अरे वो दीपक तू जरा इधर आ.....

दीपक-क्या हो गया प्रसाद जी।

गोपाल प्रसाद- बैंक स्टेटमेण्ट की ई मेल आयी है ,प्रिण्ट लेने नहीं आ रहा है।

दीपक-ईमेल एड्रेस बताइये निकाल देता हूं। उधर का प्रिण्टर खराब है।

गोपालप्रसाद आशंकित मन से ईमेल एड्रेस बताये।

दीपक-की बोर्ड सरकाते हुए बोला लीजिये पासवर्ड डाल दीजिये।

गोपालप्रसाद बड़ी बारीकी से पासवर्ड डाले। दीपक उनकी तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखा पर गोपाल प्रसाद को पासवर्ड चोरी होने की शंका हो गयी।

दीपक-लो प्रसादजी प्रिण्ट आ गया।

गोपालप्रसाद बैक स्टेटमेण्ट लेकर दफ्तर के दूसरे कक्ष में गये। एक तरफ कोने में बैठकर बैक स्टेटमेण्ट का मुआयना किये। बीस मिनट के बाद आये और बोले दीपक तू बता पासवर्ड कैसे बदलते हैं।

दीपक-पासवर्ड चोरी हो गया क्या प्रसाद जी।

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कमरा।। लघुकथा।

आण्टी आपके यहां कमरा खाली है ना। गुप्ता आण्टी ने भेजा है ,कला मिसेज कण्ठवास से पूछी।

मिसेज कण्ठवास-हां है तो। तुमको चाहिये या किसी और को.....

कला-मेरे भइया को।

मिसेज कण्ठवास-देख लो।

कला-कमरा तो बहुत छोटा है। आण्टी किराया कितना मांग रही है।

मिसेज कण्ठवास-बारह सौ ........

कला-आण्टी गुप्ता आण्टी तो एक हजार बताई थी।

मिसेज कण्ठवास- एक हजार लगेगा अब तो ...

कला-ठीक है आण्टी चलेगा।

मिसेज कण्ठवास-उनसे बात कर लो।

तौली बनियाइन में मिस्टर कण्ठवाल कमरे में उपस्थित हुए और बोले कमरा ठीक है।

कला-कमरा तो छोटा है अंकल किराया भी ज्यादा है पर चलेगा हमारे घर के पास है। भइया अकेले रहकर पढ़ाई के साथ काम करेंगे। सोना खाना तो घर पर ही होगा।

मिस्टर कण्ठवास- भइया तुम्हारे सगे नहीं है।

कला- सगे से बड़े है राखी के भाई है।

मिस्टर कण्ठवास-तुम्हारा भाई करता क्या है।

कला-अंकल आर्टिस्ट है।

मिस्टर कण्ठवास-पेण्टर को नहीं देना है। बाहर जाओ कहते हुए दरवाजा भडाम से बन्द कर लिये।

कला-अंकल मैं बी.एफ.ए. फाइनल की परीक्षा दे चुकी हूं। मेरा राखी का भाई बी.एफ.ए.पास बड़ा चित्रकार है। अंकल आप जैसे मानसिक रोगी चित्रकार के वजूद को क्या जानेगें .... नहीं चाहिये आप जैसे पढ़े लिखे असभ्य गाड़ी बंगले के घमण्ड में डूबे हुए का कमरा कहते हुए कला बैरंग लौट गयी।

मिस्टर कण्ठवास के व्यवहार और कला के ‘शालीन तेवर को देखकर मिसेज कण्ठवास के तो होश ही उड़ गये।

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उपभोग। लघु कथा।

अधिकारी अधीनस्थ कर्मचारी जयेश को हिदायत देकर लोकल दौरे पर चले गये। रात के साढे आठ बजे जयेश ने अधिकारी महोदय को मोबाईल पर काल किया। काफी देर के बाद अधिकारी ने फोन अटैण्ड किया और छूटते ही बोले जयेश कहां से बोल रहे हो।

जयेश-सर आफिस से .........

अधिकारी-इतनी देर तक आफिस में क्या कर रहे हो।

जयेश- सर आपकी हिदायत थी ना बैग से भरे बोरे रखवाने की ....

अधिकारी-ओ आई सी......

जयेश-सर बैग की डिलीवरी अभी हुई है बार बार के फोन करने के बाद....

अधिकारी-बहुत अच्छा काम तुमने किया कल कम्पनी के प्रोग्राम में ये बैग बंटने है। सप्लायर ने इतना डिले कर दिया। अगर तुम ना रूकते तो कल बड़ी फजीहत हो जाती। सुनो मुझे अरली मार्निंग कल निकलना होगा। तुम दफ्तर सम्भाल लेना।

जयेश-ठीक है सर देख लूंगा।

अधिकारी-एक काम करो...

जयेश-क्या करूं सर...........

अधिकारी-एक बोरा खोलकर एक बैग ले लो .........

जयेश-सर बाद में आपके हाथों से ले लूंगा।

अधिकारी-ठीक है अब तुम घर जाओ बहुत लेट हो गये हो.............

प्रोग्राम निपटाकर साहब आये। चपरासी के बुलाये। कार से बोरे में भरा बैग निकलवाये। चपरासी से गिनवा कर बैग आलमारी में रखवाये। कुछ बैग कार में रखवाये। जयेश इन्तजार करता रहा कि साहब अब बैग देंगे तब देंगे पर साहब ने नहीं दिया। जयेश हिम्मत करके बोला सर आप बैग देने वाले थे मुझे। दे देते तो काम आ जाता। मेरी बेटी कल बाहर जा रही है।

अधिकारी-सब बैग तो बंट गये जबकि सुबह ही तो ढेर सारे बैग आलमारी में और कुछ कार मे रखे गये थे व्यक्तिगत उपभोग के लिये...................

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स्वर्ग का सुख

। लघुकथा।

हीराचन्द चश्मा साफ कर आंख पर रखते हुए उठे और कई दिनों से पड़े कपड़े प्रेस करने लगे। सुहानी से नहीं देखा गया बूढे ससुर को कपड़ा प्रेस करते हुए ,वह दर्द को भूलकर बिस्तर से उठी और बोली बाबूजी रहने दो मैं कर देती हूं। बुखार आज थोड़ा कम है। आपने जिन्दगी भर काम ही तो किया है,अब आराम करो। हम किस दिन रात के लिये हैं।

हीरसचन्द बोले तू बीमार है। आराम की तुमको अधिक जरूरत है न कि मुझको।

सुहानी-बाबूजी रहने भी दो ना कहते हुए हीराचन्द के हाथ से प्रेस लेकर खुद करने लगी।

बहू के सेवा से हीराचन्द को जैसे स्वर्ग का सुख नसीब हो गया।

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भगवान

। लघुकथा।

प्रातः दिव्यानी मुन्ना के रोने को अनसुना कर किचन में कुछ बनाने में व्यस्त थी,जिसकी सुगन्ध सेवकबाबू की नाक तक बेधड़क पहुंच रही थी। दिव्यानी किचन से ही मुन्ना चुप हो जा मैं आयी कहकर चुप कराने की कोशिश कर रही थी।

सेवकबाबू बहू मुन्ना को चुप कराओ कब से रो रहा है। भूख लगी होगी। अरे मेरा चश्मा किधर चला गया,मै ही चुप कराता तुमको फुर्सत नहीं है तो। बच्चे का ख्याल रख करो बहू।

दिव्यानी बाबूजी-ये रहा आपका चश्मा और ये आपका चाय नाश्ता।

सेवकबाबू-बेटी पहले मुन्ना को देखना जरूरी है न कि मुझको।

दिव्यानी-बाबूजी भगवान को भी तो नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सेवकबाबू कभी नीले आकाश की ओर तो कभी देवी समान बहू दिव्यानी की ओर देख रहे थे।

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बेटी का सुख

। लघुकथा।

क्या औलाद हो गयी है आज के स्वार्थी जमाने की, बताओ तीन तीन हट्टे कट्टे बेटे, अच्छी खासी सरकारी नौकरी और बहुओं की भी सरकारी नौकरी पर तोता काका को समय पर पानी देने वाला नहीं। देखो बेचारे अस्सी साल की उम्र में घर छोड़कर जा रहे थे।

खेलावन काका की बात सुनकर देवकली काकी बोली देखो एक बेटी अपनी भी है चार चार बच्चों का पाल रही है। दफ्तर जाती है। बीटिया जरा भी तकलीफ नहीं पडने देती। सारी सुख सुविधा का ख्याल रखती है। एक वो है, तोताजी, बेटा बहू नाती पोता,भरा पूरा परिवार,अपार धन सम्पदा के बाद भी दाना- पानी को तरस रहे हैं। एक बेटी के मां बाप हम है।

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।। एहसान।। लघुकथा

ओमप्रकाश शर्मा एक कम्पनी में कार्यरत थे उनकी पत्नी किरन बिलकुल कम पढ़ी लिखी तो थी पर स्कूल की टीचर हो गयी थी। इनके दोनों बच्चे भोलू और गोलू बहुत छोटे छोटे थे। ये दोनों बच्चों हम पति-पत्नी की गोद में खाये पले बढ़े। मेरे बच्चों ने भी बहन भाई का प्यार दिया, ओमप्रकाश और किरन को बच्चों ने सगे चाचा चाची का।

आठ साल के बाद मेरा घर खाली कर रहे थे। हमारे घर का माहौल गमगीन हो गया था। बच्चे भी घर खाली करने में मदद कर रहे थे। घर खाली कर ओमप्रकाश शर्मा सपरिवार चले गये बिना बिजली का बिल पानी का बिल तो कभी लिये ही नहीं। नाममात्र का किराया ले रहे थे परिवार के सदस्य मानकर। दूसरे दो दो हजार देने को तैयार थे पर नहीं दिये।

ओमप्रकाश और उनके परिवार के जाने के दो दिन बाद घर का ताला खुला। घर अन्दर से दो समुदाय के दंगे में लहूलुहान आदमी की तरह अपना हाल बयां कर रहा था। रसोईघर के जल निकासी का पाईप, लैर्टिन की दीवार और फर्श पर लगी टाईलें कूंच दी गयी थी। बिजली सप्लाई लाईनें तोड़ दी गयी थीं। वाशबेसिन तहस नहस था। दस खर्चा का खर्चा खड़े खड़े मुंह चिढ़ा रहा था। मैं घर का हाल देखकर अवाक् था। श्रीमती पल्लू में आंख छिपाये हुए बोली क्या सिला दिया रे मतलबी मेरे एहसान का....................

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18.07.2008

।। दौलत।।

बाबूजी आप तो कहते हो कि आदमी बड़ा बनता है तो फलदार पेड़ की तरह झुक जाता है।

हां बेटा रामू मैंने तो गलत नहीं कहा है। बात तो सही है रघुदादा बेटे से बोले।

रामू-बाबूजी बात पुरानी हो गयी है।

रघुदादा-बेटा ये अमृत-वचन है कभी भी अपने महत्व को नहीं खोते।

रामू-बाबूजी मैं बांस से ज्यादा पढ़ा लिखा हूं। दफ्तर के बाहर मान सम्मान भी बहुत है। इसके बाद भी अपमान........ किसी से बात करते देखते या सुनते ही कालबेल पर बैठ जाते हैं।

रघुदादा-ये दुर्जनों के लक्षण है। इन्हें अधिकार जताने आते हैं। ये बबूल के पेड़ सरीखे होते हैं बेटा।

रामू-बाबूजी क्या करूं ?

रघुदादा-कुछ नहीं। अमानुषों के मुंह नहीं लगाना उत्तम होता है। कर्म पर विश्वास रखो बस...

रामू-बाबूजी रोज रोज अपमान का जहर............

रघुदादा-बेटा हर अच्छे काम में बाधायें आती है। घबराओ नहीं। नेककर्म की राह पर चलते रहो। भले ही ऊंचा पद और दौलत का पहाड़ तुम्हारे पास नहीं है परन्तु तुम्हारे पास कद की ईंची दौलत तो है। कद से आदमी महान बनता है। पद और दौलत से नहीं.........

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30.07.08

।। ट्रेनिंग।।

तुम्हारी तीन दिवसीय ट्रेनिंग होने जा रही है देवी प्रसाद कनक साहब पूछे।

देवी प्रसाद-हां साहब,कुछ देर पहले फैक्स से सूचना आयी है।

कनक साहब-बधाई हो भाई तुम्हारी ट्रेनिंग हमारी तो हुई नहीं तुम्हारी हो रहा है कहते हुए कनक साहब अपने माथे पर चिन्ता के काले बादल लिये अपनी केबिन में चले गये।

बब्बन-देवीप्रसाद कनकसाहब बधाई दे रहे थे कि विरोध कर रहे थे।

देवीप्रसाद-कनक साहब बड़े अफसर है। उनका अभिमान बोल रहा था। छोटे कर्मचारियों की ट्रेनिंग कनक साहब जैसे अफसर फिजूलखर्ची मानते हैं। कम्पनी के लिये घाटे का सौदा मानते हैं। हां खुद के फायदे के लिये जोड़ तोड़ करते नहीं थकते। छोटे कर्मचारी का तनिक सा फायदा छाती में शूल की तरह ग़डता है।

बब्बन-जैसे तुम्हारी ट्रेनिंग ..........

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।। जीवन परिचय ।।

नन्दलाल भारती

कवि/कहानीकार/उपन्यासकार

शिक्षा - एम.ए. । समाजशास्त्र । एल.एल.बी. । आनर्स ।

पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ह्यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट

जन्म तिथि - ०१.०१.१९६३

जन्म स्थान- - ग्र्राम चकी। खैरा। तह.लालगंज जिला-आजमगढ ।उ.प्र।

स्थायी पता- आजाद दीप, १५-एम-वीणानगर ,इंदौर ।म.प्र.!

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nandlalram@yahoo.com /nl_bharti@bsnl.in

प्रकाशित पुस्तकें

उपन्यास-अमानत ,निमाड की माटी मालवा की छाव।प्रतिनिधि काव्य संग्रह।

प्रतिनिधि लघुकथा संग्रह- काली मांटी एवं अन्य कविता, लघु कथा एवं कहानी संग्रह ।

अप्रकाशित पुस्तके

उपन्यास-दमन,चांदी की हंसुली एवं अभिशाप, कहानी संग्रह- २

काव्य संग्रह-२ लघुकथा संग्रह-१ एवं अन्य

सम्मान

भारती पुष्प मानद उपाधि,इलाहाबाद,

भाषा रत्न, पानीपत ।

डां.अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान,दिल्ली

काव्य साधना,भुसावल, महाराष्ट्र,

ज्योतिबा फुले शिक्षाविद्,इंदौर ।म.प्र.।

डां.बाबा साहेब अम्बेडकर विशेष समाज सेवा,इंदौर

कलम कलाधर मानद उपाधि ,उदयपुर ।राज.।

साहित्यकला रत्न ।मानद उपाधि। कुशीनगर ।उ.प्र.।

साहित्य प्रतिभा,इंदौर।म.प्र.।

सूफी सन्त महाकवि जायसी,रायबरेली ।उ.प्र.।

विद्यावाचस्पति,परियावां।उ.प्र.। एवं अन्य

आकाशवाणी से काव्यपाठ का प्रसारण ।कहानी, लघु कहानी,कविता

और आलेखों का देश के समाचार पत्रो/पत्रिकओं में

एवं www.swargvibha.tk swatanraawaz.com एवं अन्य बेवसाइटस् पर प्रकाशन ।

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krishna kumar ajnabi rastriya pashu

राष्ट्रीय स्तर का पशु

 

० शरद तैलंग

 

जिस प्रकार उत्तर भारत के निवासी दक्षिण भारत के निवासियों को चाहे वो तमिलनाडु के हो या केरल के कर्नाटक के हो या आन्ध्र प्रदेश के सभी को मद्रासी कहकर सम्बोधित करते हैं उसी प्रकार चाहे वह चीता हो तेन्दुआ हो बाध हो या शेर हो सभी शेर कहे जाते हैं. इनमें से ही कोई एक हमारा राष्ट्रीय पशु है. इस बात से चाहे शेर को एतराज हो सकता है लेकिन हम भारतवासियों को कोई आपत्ति नहीं है. अब वह यदि अपना यह सम्मान लौटाना भी चाहे तो भी उसे किसी न किसी के कहने स अपना लौटाया हुआ सम्मान वापस लेना ही पड़ेगा .हम भारतवासियों को आपत्ति इसलिए भी नहीं है क्योंकि उसके दर्शन ही दुर्लभ हैं. राष्ट्रीय ओहदा पाने वालों के दर्शन अक्सर दुर्लभ हो जाते है. उनके दर्शन पाने के लिए एक लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है . कभी कभी तो कई कई सालों तक. वैसे यदि राष्ट्रीय पशु के दर्शन न हों यही सबके लिए लाभदायक स्थिति है. उसके दर्शन होने के बाद फिर हम कुछ नहीं कर सकते जो करता है वो ही करता है. इसलिए हम लोग राष्ट्रीय पक्षी को देख कर ही काम चला लेते है. राष्ट्रीय पुष्प में तो आजकल कीचड़ की बदबू ज्यादा आने लगी है.

राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिलने के साथ साथ शेर को पशुओं का राजा भी समझा जाता है . राजा होने के कारण अपनी प्रजा की भलाई उसका मुख्य ध्येय होना चाहिए किन्तु अनेक राजा महाराजों की तरह जो राष्ट्रीय दर्जा पा जाते है वह भी अपनी प्रजा पर अत्याचार करने लगता है . एक बार राजा घोषित हो जाने के बाद पुनः इस पद हेतु दोबारा राय शुमारी न करवाना भी राष्ट्रीय स्तर के ओहदे वालों के स्वभाव का एक अंग है. हर व्यक्ति यह जानता है कि शेर राष्ट्रीय पशु तथा जंगल का राजा है. संभवतः शेर तथा अन्य पशु ही शायद न जानते हों. एक व्यक्ति एक पद का नियम जंगल राज में कायम नहीं होता . सुना था कि उसको यह सम्मान प्रदान करने के लिए पूर्व में एक शिष्ट मंडल जंगल गया था और शेर के राज्य की शासन व्यवस्था से प्रभावित हो कर वह शिष्ट मंडल उस के राज्य में ही बस गया आज तक वापस नहीं लौटा.

हमारे देश का बच्चा बच्चा शेर के विषय में जानकारी रखता है क्योंकि बच्चों को बचपन में ही शेर और खरगोश की एक कथा सुना दी जाती है जिसके अनुसार जहाँ एक और खरगोश को कमजोर तथा छोटा होते हुए भी बुद्धिमान बताया गया है वहीं शेर को बलशाली होते हुए भी परले दर्जे का मूर्ख बताया गया है जो अपने प्रतिद्वन्दी को देखते ही दहाड़ने लगता है. इस हिसाब से खरगोश को राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिलना चाहिए था न कि शेर को. हमारे देश में राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान की अपेक्षा बलशाली अथवा मूर्ख होने से भी काम चल जाता है जो अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखते ही दहाड़ने लगे.

शेर के बारे में लोगों के मन में अनेकों भ्रांतियाँ है जैसे कि वह चारा नहीं खाता है. राष्ट्र स्तर के जन प्रतिनिधियों के वारे में ऐसा कहने में संशय है. इस बात का इतना बढ़ा चढ़ा कर प्रचार किया गया कि शेर यदि मुंह का जायका बदलने के लिए कभी शाकाहारी चीजें खाना भी चाहे तो इस डर से नहीं खा पाता है कि कहीं न कहीं कोई न कोई देशी या विदेशी अपना कैमरा फोकस किए इस ताक में जरूर बैठा होगा कि वह कुछ उल्टा सुल्टा खाए और उस दृश्य को झट कैमरे में कैद करके किसी न्यूज चैनल पर प्रसारित करवा दे. राष्ट्रीय स्तर के लोगों के मन में भी इसी बात का डर लगा रहता है.हॉ एक और बात दोनों में समान रूप से पाई जाती है. दोनों को फांसने के लिए बकरे का लालच दिया जाता है .सम्मानित प्राणियों के जीवन के सुचारूपूर्वक यापन के लिए किसी बकरे की या छोटे मोटे प्राणियों को अपने प्राणों की बलि देनी ही होती है.

राष्ट्रीय स्तर के लोगों को राष्ट्रीय पशु से बहुत प्यार होता है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण यहीं है कि ऐसे अनेक लोगों के ड्राइंग रूम में राष्ट्रीय पशु का हडि्डयों तथा मांस हीन शरीर पूरे सम्मान के साथ विद्यमान रहता है. हडि्डयों की उपस्थिति व्यर्थ के विवाद का प्रश्न बन जाती है . हडि्डयों तथा मांस की अपेक्षा चमड़ी में आकर्षण अधिक होता है. अब शेर को उसकी जीवित अवस्था में ड्राइंग रूम में सजाना तथा प्यार करना तो जरा मुश्किल काम है न अतः उसे मार कर उसकी खाल से ही मुहब्बत कर लेते है.

राष्ट्रीय पशु को रहने के लिए दो स्थान नियत हैं. एक राष्ट्रीय अभ्यारण्य और एक जेल रूपी चिडयाघर. हमारे राष्ट्रीय पशु को पिंजरे में देखने का एक अलग ही आनन्द है .हम उसको बाहर खड़े होकर पत्थर मार सकते है. उस पर कीचड़ उछाल सकते हैं. शेर पिंजरे में भी नॉनवेज खाना ही पसन्द करता है.

शेर सर्कस भी बहुत अच्छा करते हैं. वे अपने रिंग मास्टर या रिंग मास्टरनी के आदेश पर कुर्सी पर बैठ जाते है या कुर्सी से उतर जाते हैं. उनको सलाम करते हैं. कभी कभी दिखाने के लिए उनसे गुस्सा भी हो जाते है फिर उनके सामने अपनी दुम भी हिलाने लग जाते हैं तथा उनके साथ साथ अनेक स्थानों की सैर भी करते हैं.

इस प्रकार शेर का राष्ट्रीय पशु होना हमारे लिए सौभाग्य है या दुर्भाग्य यह सोचना तभी संभव है जब मुझे भी कोई राष्ट्रीय ओहदा प्राप्त हो जायेगा. आप सब लोग दुआ करें कि मुझे यह अवसर शीघ्र प्राप्त हो जिससे राष्ट्रीय स्तर के लोगों के बारे में अपनी राय व्यक्त कर सकूं.

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संपर्क:

 

० शरद तैलंग

२४० माला रोड हाट स्थल

कोटा जं ३२४००२ राजस्थान

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चित्र : कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति

गाडी के कार्बोरेटर, तुझे हुआ क्या है,

आखिर इस धकाधक धुएं की वजह क्या है।

व्यंग्य

शीशी भरी गुलाब की...

-अनुज खरे

 

मैं आजकल कुछ भयंकर सी खोजबीन में लगा हूं। हालांकि मेरी खोजबीन का ताल्लुक अदीबो-अदब, शेरो-शायरी की दुनिया से है। आपको भी कुछ अजीब सा लग रहा होगा कि शेरो-शायरी में क्या भयंकर खोजा जा रहा है। हुजूर, मेरी खोजबीन बहुत गहराई लिए हुए है। मैं पता करने के प्रयास में जुटा हूं कि ट्रकों-टैंपुओं, रिक्शे के पीछे युगांतरकारी शेर लिखने वाले ये अज्ञात लोग कौन हैं, उनकी शिक्षा-दीक्षा, पठन-पाठन का लेवल क्या है, उनकी आर्थिक-सामाजिक हैसियत क्या रही होगी, वे अपनी विरासत में कैसी परंपरा को प्राप्त किए होंगे, वगैरहा-वगैरहा। मैंने अत्यंत ही सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषण करने के पश्चात् पाया है कि ये शेर अत्यंत ही गहन जीवन दर्शन से ओतप्रोत, मारकता से भरपूर, ताडकता से अविछिन्न, भाषिकता से लदे-फदे शायरी की अदबी दुनिया में गुलशन नंदाई हैसियत से अभिहित होते हैं। कई शेरो की तीक्ष्णता तो कमाल-ए-दाद है, मुलाहिजा फरमाएं...

बुरी नजर वाले, तेरा मुंह काला

दिल है तेरा काला और जां भी है काली

प्राचीनकाल में पहली-पहली बार जब ये शेर ट्रकों पर नमूदार हुए थे तो कई एक्सीडेंट केवल इसी कारण से हो गए कि ट्रक के पीछे चलने वाली गाड़ी के ड्राइवर ने अपने बारे में इतना सच्चा पढकर जब बैक मिरर में अपना चेहरा देखना चाहा तो गाड़ी ने इसी दौरान किसी अन्य गाड़ी से चर्चाका वक्त निकाल लिया था। आप ही बताइए है ना गहरी मारकता। दो लाइनें लिखीं, कमाल की लिखीं, अमर हो गए। ढूंढना न होगा उसे, नाम न प्रकाश में लाना होगा। इसी तरह इस शेर में दर्शनके दर्शन कीजिए,

‘3 में ना 13 में

तू कौन खामाखां

अर्थात् लोग तीन से तेरह करने के चक्कर में लगे हैं, फिर भी कहीं वजूद नहीं है। हर मुद्दे पर टांग अडाएंगे, बिना ये जाने कि हे, हाड़-मांस के मानव, तू क्या? तेरा वजूद क्या? माटी की देह, माटी हो जाएगी, क्यों फिजूल की बातों में तन गला रहा है, मन मैला कर रहा है, खुद भी अशांत है, दूसरों को चिंतित कर रहा है, किसलिए बावरे, यू हीं खामखां। कैसा होगा ये शायर, पनघट पर लिखा होगा उसने ये शेर या विरह में या नश्वरता की गहन अनुभूति से भरे क्षणों में या यूं ही मुर्गों की लड़ाई देखते हुए प्रस्फुटित हो गया होगा। आप मत मानिए देश, काल का रचना पर प्रभाव जानने का महान साहित्यिक प्रश्न भी है ये, इसीलिए तलाश में जुटा हूं। हालांकि अभी तो सिर्फ बिखरे सूत्र ही हाथ लग रहे हैं। कड़ियों से कड़ियां जुड़ने के आसार ही नहीं दिखाई दे रहे हैं। खैर, एक और कालजयी शेर याद आ रहा है, विस्मृत हो रहा है कि टैंपू के पीछे देखा या ऑटो के पीछे या शायद बस के अंदर ही पढ़ा हो, क्या करें ये क्लासिकलसामग्री यत्र-तत्र बिखरी हुई है ना, फिर देखिए है भी तो कितनी प्रचुर मात्रा में, चलिए स्रोत के विवरण में ना जाकर शेर का लुत्फ उठाते हैं। अर्ज किया है-

शीशी भरी गुलाब की पत्थर से तोड़ लूं

तू ना आया जालिम, तेरी याद में माथा ही फोड़ लूं

‘‘आपने इरशाद कह तो दिया था ना, अच्छा भूल गए थे।’’ खैर, इस शेर के भावार्थ में जाइए कितना सुंदर कहा है शायर ने- कि अत्यंत मेहनत से पहले गुलाबों को तोड़कर शीशी में घुसाकर भरा जाएगा, तत्पश्चात् कहीं जोरदार पत्थर देखकर तोड़ा जाएगा, तत्पश्चात् आहें भरी जाएंगी, तत्पश्चात् माथा फोड़ने की उत्कंठा में भी उनका इंतजार रहेगा, ताकि प्रेमी के सामने ही माथा फोड़कर उसका क्रेडिट लिया जाए, अकेले में फोड़ने से क्या फायदा, जब कोई देखने वाला ही न हो। चूंकि इस पूरी प्रक्रिया में कोई व्यक्त उसे ये बताने वाला नहीं होगा कि- अरे बावली जब तू शीशी में गुलाब भर रही थी तभी वोआकर तुझे ना पाकर चला गया था। बैठी रह शीशी और गुलाब लेकर।

आप इसे छोड़कर केवल शेर की गहराई देखिए- कैसे दो लाइनों में उस समय को जीवंत कर दिया शायर ने। ऐतिहासिक तथ्यों से भी अवगत करा दिया कि कैसे किसी कालखंड में शीशी में गुलाब भरने जैसे विरह के अजीब से टाइमपास संसाधन मौजूद थे। इन्हीं सूत्रों को पकड़कर तो अपन शायर के रचना समय-कालखंड का अनुमान लगाने में लगे हैं कि आखिर शायर ने कहां से देखा होगा ये दृश्य, पहाड़ से या वृक्ष की ओट से या शायद जिस पत्थर पर शीशी के फोड़ने का जिक्र है, वह प्रतीक के रूप में हो, इंतजार से क्षुब्ध होकर यह शीशी शायर के खोपड़े से ही मारकर फोड़ी गई हो, जिसे कालांतर में पत्थर में परिवर्तित कर दिया गया हो। देखा आपने एक-दो लाइनों का शेर कैसे शिल्प विधान के प्रतिमानों को समझा रहा है। साहित्य के विकास को बता रहा है। पता ना लगाना होगा शायर के कद्दावर व्यक्तत्व का, जो रचना कौशल के लिए अपना ललाट तक फुड़वा रहा है। अच्छा इस शायर के बारे में एक बात तो कन्फर्म है, शारीरिक रूप से निश्चित ही बलिष्ठ रहा होगा, तभी माथा खुलवा कर भी शेर पूरा करने का साहस कर सका।

अहा! कैसी उत्कृष्ट भावना है, कैसी उदात्त परंपरा है। अब पता चला न क्यों ढूंढ रहा हूं। एक शेर और नजर कर रहा हूं। ये शेर मुझे जातीय तौर पर भी पसंद है-

‘13 मेरा 7,

9 दो 11,

हम हैं राही प्यार के,

आती क्या खंडाला

ये शेर ज्योतिष और प्यार का अत्यंत गूढ़ रहस्य है। पहली लाइन 13 और 7 मिलाकर 2, दूसरी लाइन के 9 और 11 मिलाकर भी 2॰ हो रहे हैं। यानी अंकशास्त्र के मुताबिक योग 2+॰=2 यानी दो अर्थात् हम दोनों, दो जो प्यार के पथ पर खंडाला नामक स्थल पर बसने की इच्छा रखते हैं, फिर इस शेर में शायर की वृत्ति और स्थिति का भी विशद विवरण छुपा है, जिस तरह से अंकों का प्रयोग किया गया है, शायर निश्चित तौर पर शासकीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल का गणित का अध्यापक रहा होगा, जो आमिर खान का फैन एवं फिल्मों का प्रेमी है। इसके अलावा उसकी पोस्टिंग गांव में है, जिसके कारण ही वह कक्षाओं के दौरान अपने शौक के लिए समय निकाल पा रहा है। स्कूल की ही किसी टीचर से नैन लड़ जाने के कारण वो खंडाला आदि स्थल पर चलकर बातचीत करने आदि का संकेत दे रहा है। कुल मिलाकर सरकारी तनख्वाह पर साहित्य की सेवा में रत है। अब बताइए चार लाइनें, मात्र चार लाइनें दे सकती हैं इतनी जानकारी। अरबी-फारसी के वजनी श?दों से अटे पडे शेरों में है इतना माद्दा। तो आपका मानना है कि मैं ठीक ही पसीना बहा रहा हूं। ऐसे साहित्य को बाहैसियत रचियता प्रकाश में लाना ही चाहिए। चलिए, हौसला अफजाई का शुक्रिया चूंकि इस पूरे साहित्य में यही तो खासियत है इसमें विविध रंग है। ... आपने हिम्मत बढ़ाई ही है तो एक और शेर पेशे खिदमत है... इस शेर को ही लें, इसमें आलसियों-काहिलों के लिए विशेष रूप से कहा गया है-

वक्त से पहले, किस्मत से ज्यादा

किसी को मिला है न किसी को मिलेगा।

यानी सरल शब्दों में चुभती सी बात कि काहिल भाईजान पड़े रहो, काम से क्या होता है, समय पर खुद ही सब मिल जाएगा, काहै हाथ-पांच हिलाकर हड्डियों को कष्ट दे रहे हो। फिर शायर की मनोस्थिति के बारे में जानकारी भी शेर के पैकेज में शामिल, अर्थात् भारी ट्राई करने पर न मुशायरा मिला, न एक अदद गजल या गाना बिका, थक-हार कर बैठै थे तो किसी टटपुंजिया मुशायरे में जाना पडा, जहां किसी घटिया म्युजिक डायरेक्टर ने सुना, बाद में बात बैठ गई और शेर-तुकबंदीनुमा गाने की शक्ल में किसी प्राइवेट एलबम में चल निकला, ट्रकों पर छा गया तो टैंपों रंग गए, लो जी साहब, वक्त आने पर किस्मत के सिकंदर बन गए, अदीब की दुनिया में आवाम के शायरटाइप की पतली गली से दाखिला पा गए। एक भाग्यवादी देश में शेर राष्ट्रीय पंचलाइनबन गया। दो मजदूर गलियों-चौबारों में बीडी सुलगाते हुए इसी शेर के सहारे अच्छे दिनों के ख्वाब देखने लगे। तो ये होती है दो लाइनों की ताकत। दिमाग में क्रांति ला दे, अराजकता के हालातों को नियतिवाद में तब्दील कर दे। अब इतने महान शायद को ढूंढना न होगा, क्या कहते हैं। कितनी श्रमसाध्य खोज है मेरी, शायर की खोज, उसके अवदान का विवरण और परिस्थितियों की बारीकी में जाना ही है। अब जैसे इस शेर को ही लें...

गाडी के कार्बोरेटर, तुझे हुआ क्या है,

आखिर इस धकाधक धुएं की वजह क्या है।

भई शायरी के बेहद मकबूल रहे मूल शेर पर बनाए गए इस शेर का देसी शायर गजल के लबो-लहजे से अत्यंत निकट का वास्ता रखने वाला जान पडता है। ऐसा इसलिए भी कर पा रहा हूं क्योंकि उसने जिस खूबसूरती से अलिफके काफिए (अंतिम दो शब्दों की तुकबंदी) बैठाई है, वैसा कोई साधारण शायर कर ही नहीं सकता। बस के बोनट पर बैठकर यात्रा करते समय ड्राइवर की पीडा देखकर ट्रक-बसों की दुनिया की कालजयी लाइनें फूट पड़ी होंगी। ऐसी परंपरा से जानकारी मिलती है। फिर ये लाइनें खासो-आम की श्रुति परंपरा के जरिए कालांतर में ट्रकों के पीछे, बसों के भीतर अपना यथायोग्य स्थान ले विराजित हो गई होंगी। व्यवस्था की विद्रूपता के खिलाफ भी ऐसा ही मैंने एक शेर एक कच्ची रोड पर जाते समय एक बस के पीछे लिखा देखा था-

खलिहान में नहीं धान, हाड़ में नहीं जान

पत्थरों की जाजम, धूप का पैराहन,

क्या सूबा, क्या निजाम, कैसा ईमान,

कल्लू दे ढाबे पर सबको राम-राम।

इस शेर का जायका देखिए, भदेस आंचलिकता के साथ, गजलगोई की बारीकी, गांव की दुर्दशा के बारे में बताते हुए शायर कल्लू के ढाबे की तारीफ करता है कि वहां सबको बराबरी का अधिकार है, आइए-खाइए, सर्वहारावाद का मजा उठाइए। इस शायर के बारे में मेरा मानना है कि यह प्राइवेट बस का कंडक्टर रहा होगा, जो किसी खास ढाबे पर ही गाड़ी रुकवाकर कमीशन भी लेता होगा और बस के पीछे शेर लिखवाकर उसके विज्ञापन का पैसा भी वसूलता होगा। अब देखिए इतना प्रचुर साहित्य, इतने विविध रंग, किसी को तो संजोने की, व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी लेनी थी, सो मैंने ले ली। आपको मेरी मदद करनी होगी, जब कोई ऐसा शेर कहीं लिखा देखें तो मुझे भेजें, इस उसमें गहन विश्लेषण, बैकग्राउंड का अध्ययन, विवरण शामिल होना चाहिए, ताकि दोनों मिलकर ऐसे साहित्य की अतुलनीय सेवा कर सकें। तो फिर एक शेर पेशे खिदमत है। इसका शायर विषय की तरन्नुम की पिनक में जमाने के स्वार्थी यारी के दस्तूर की क्या खूबसूरत से धज्जियां उड़ा रहा है...

नशेड़ी यार किसके,

ट्रक तुम्हारा, पेट्रोल तुम्हारा,

उनने तो दम लगाया और खिसके

क्या भाई साहब, कुछ बोल नहीं रहे हैं। ये क्या फुसफुसा रहे हैं।

अच्छा! आप साहित्य एसोसिएशन की ओर से ट्रक किराए पर लेने जा रहे हैं, ताकि शेर लिखे ट्रक से ही मेरा तिया-पांचा कर सकें।

राम...राम... एक जिज्ञासु-अन्वेषक के साथ ऐसा व्यवहार।

एक्सक्यूजमी भाई सा... आपकी प्रवृत्ति-पृष्ठभूमि तो इस अंतिम शेर में बताए गए यारों के समान लग रही है। क्या सुन ही नहीं रहे भाईजान, कहानी सुन ली और खिसक लिए....।

 

clip_image002उत्तर प्रदेश में एक सरकारी अधिकारी ने शराब के नशे में धुत अपनी बेटी की सहेली से बद्सलूकी करने का प्रयास किया और बेटी द्वारा इसका विरोध करने पर उसे जमकर मारा-पीटा और सारी हदों को तोड़ते हुए अपने बेटी के साथ ही बलात्कार कर डाला। बेटी द्वारा इसकी शिकायत करने पर आला अफसरों ने घटना की जाँच का जिम्मा आरोपित अधिकारी को ही सौंप दिया। शिकायत किये जाने से बौखलाये अधिकारी पिता ने उसके बाद अपनी बेटी के साथ कई बार बलात्कार किया। अंततः प्रताड़नाओं से त्रस्त आकर बेटी ने एक दूर के रिश्तेदार के संग शादी कर ली। मर्जी के खिलाफ शादी करने पर अधिकारी पिता ने उसकी ससुराल में जमकर तोड़फोड़ की और भाड़े के लोगों द्वारा उसको ससुराल से जबरन उठवा कर अपनी अनैतिक करतूतों के गवाह बने गर्भ का गर्भपात करवा दिया। वर्ष 2001 में घटित इस घटना की रिपोर्ट राज्य महिला आयोग व अन्य संगठनों के हस्तक्षेप के बाद वर्ष 2006 में ही जाकर लिखी गयी। इसी प्रकार एक अन्य घटनाक्रम में जब एक गरीब छात्रा ने हाई स्कूल परीक्षा अच्छे अंकोंे से पास करने के बाद इण्टर में दाखिला लेना चाहा तो उसके परिजनों ने उसे डपट दिया और अंततः पढ़ाई जारी रखने से मना करने पर नाराज छात्रा ने ट्रेन के सामने कूदकर अपनी जान दे दी।

ऐसे न जाने कितने वाकये समाज में रोज घटित होते हैं और लोग उसे घरेलू विवाद मानकर प्रकरण को वहीं समाप्त कर देना चाहते हैं। घरेलू हिंसा का तात्कालिक असर भले ही सिर्फ उत्पीडि़तों पर दिखे पर इसका दूरगामी असर वैयक्तिक सम्बन्धों के साथ-साथ पूरे परिवार, समाज व अन्ततः राष्ट्र पर पड़ता है। परम्पराओं के नाम पर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में किसी भी प्रकार की हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अंततः आजादी के 59 वर्षों बाद सरकार को घरेलू महिलाओं की याद आयी और 26 अक्टूबर 2006 को ‘घरेलू हिंसा निषेध कानून-2005’ लागू हो गया। भारतीय संस्कृति में एक ओर जहाँ नारी को पूजनीय माना गया है वहीं घरेलू हिंसा समेत बहुत सारे अन्याय वह अपनी किस्मत मानकर सहती रही हैं। यह अनायास ही नहीं है कि लड़कियों के साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ और बलात्कार उनके पारिवारिक सदस्यों और निकट रिश्तेदारों द्वारा ही होते रहे हैं। यही नहीं भारत में साल भर में 2,90,000 बेटियाँ कोख में ही मार दी जाती हैं और इसके लिए बाकायदा लगभग 450 करोड़ रूपये का भ्रूण हत्या का कारोबार चल रहा है। पर अब पुरूष अहम् से वशीभूत होकर बात-बात पर महिलाओं और बच्चों पर अपना गुस्सा उतारने वालों की खैर नहीं है। मैं मैके चली जाऊँगी तुम देखते रहियो, अब पुरानी बात हो जाएगी क्योंकि महिलायें पतियों से तंग आकर अपने माता-पिता के पास नहीं वरन् नजदीकी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराती नजर आयेंगी। इस कानून के तहत महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को व्यापक अर्थों में लेते हुए यौन सम्बन्धी, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, भावनात्मक के साथ-साथ मौखिक प्रताड़ना को भी शामिल किया गया है और घरेलू हिंसा को पाँच वर्गों में बाँटकर उसे और भी स्पष्ट कर दिया गया है-

शारीरिक हिंसा- मारपीट, थप्पड़, ठोकर मारना, दाँत काटना, लात मारना, मुक्का मारना, धक्का देना, धकेलना, किसी और तरीके से शारीरिक तकलीफ देना।

लैंगिक हिंसा - जबरदस्ती यौन सम्बन्ध बनाना, अश्लील साहित्य या कोई अन्य अश्लील तस्वीरें या सामग्री को देखने के लिए मजबूर करना, किसी दूसरे का मन बहलाने के लिए मजबूर करना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना या नीचा दिखाने के लिए लैंगिक प्रकृति का कोई दूसरा कर्म जो महिलाओं के सम्मान को किसी न किसी रूप में चोट पहुँचाता हो, बालकों के साथ यौनिक दुर्व्यवहार।

मौखिक और भावनात्मक हिंसा - मजाक उड़ाना, गालियाँ देना, चरित्र और आचरण पर दोषारोपण, लड़का न होने के लिए बेइज्जत करना, बच्चा न होने पर ताना देना, दहेज के सवाल पर अपमानित करना, स्कूल, कालेज या किसी अन्य शैक्षणिक संस्थान में जाने से रोकना, नौकरी करने से रोकना, नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर करना, महिला या उसके साथ रहने वाले किसी बच्चे@बच्ची को घर से जाने से रोकना, किसी व्यक्ति विशेष से मिलने से रोकना, इच्छा के खिलाफ शादी करने पर मजबूर करना, पसंद के व्यक्ति से शादी करने से रोकना, आत्महत्या करने की धमकी देना, कोई और मौखिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार।

अहिंसक हिंसा - महिला या महिला की संतानों को भरण-पोषण के लिए पैसा नहीं देना, महिला या उसकी संतानों को खाना, कपड़ा और दवाइयाँ जैसी चीजें मुहैया न कराना, जिस घर में महिला रह रही है उससे निकलने पर मजबूर करना, घर के किसी हिस्से में जाने या किसी हिस्से के इस्तेमाल से रोकना, रोजगार करने से रोकना, किसी रोजगार को अपनाने में बाधा पहुँचाना, महिला के वेतन या पारिश्रमिक को जबरदस्ती हड़प लेना, कपड़े या दूसरी रोजमर्रा के घरेलू इस्तेमाल की चीजों के प्रयोग से रोकना, अगर किराए के मकान में रह रही हो तो किराये न देना, बिना महिला की सूचना और सहमति के बगैर स्त्रीधन या अन्य मूल्यवान वस्तुओं को बेच देना या बंधक रखना, स्त्रीधन को खर्च कर देना, बिजली आदि जैसे अन्य बिलों का भुगतान न करना।

दहेज से जुड़ा उत्पीड़न - दहेज के लिए किसी भी प्रकार की माँग, दहेज से जुड़े किसी अन्य उत्पीड़न में शामिल रहना।

इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हर उस महिला पर लागू होगा, जो किसी घर के दायरे में रहती है, भले ही वह किसी भी धर्म की हो। यही नहीं बिना विवाह के साथ रहने वाली महिला, विधवा और बहनों को भी इस कानून के दायरे में लिया गया है। नियम- कायदों के उल्लंघन को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध माना जायेगा एवं दोषी पाये जाने पर एक साल की सजा या 20 हजार रूपये जुर्माना या फिर दोनों सजायें हो सकती हैं। पत्नी और बच्चों को जीवन निर्वाह के लिये धन न देने की स्थिति में अधिनियम की धारा-18 के तहत पत्नी अपने स्त्री धन, गहने -जेवर और कपड़ों को कब्जे में ले सकेगी। साथ ही ऐसी स्थिति में बिना कोर्ट की इजाजत के संयुक्त बैंक खातों और बैंक लॉकर का भी उपयोग नहीं किया जा सकेगा। अधिनियम की धारा-19 के तहत महिलाओं और बच्चों को घर में रहने से रोका नहीं जा सकता और न ही ऐसे घरों को बेचा जा सकता है। किराये का मकान होने पर उसी तरह की सुविधाओं से युक्त दूसरा मकान दिलाना भी बाध्यकारी होगा। इस कानून के उचित क्रियान्वयन के लिये जिलों में महिला संरक्षण अधिकारी की नियुक्ति भी की जायेगी।

यद्यपि हर कानून के दुरूपयोग की संभावनायें रहतीं हैं पर अंततः उसका परिणाम उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करता है। निश्चिततः इस कानून के लागू होने के बाद महिलाओं और बच्चों की स्थिति में सुधार आयेगा और एक लोकतांत्रिक व सभ्य समाज की भांति महिलाओं को घरों के अंदर भी वैधानिक तौर पर कुछ अधिकार मिल सकेंगे। यह सही है कि जिस समाज में नारी पूजनीय रही है वहाँ कानून का भय दिखाना उचित नहीं कहा जा सकता पर हम इस तथ्य की अवहेलना भी नहीं कर सकते कि समाज में एक ऐसा वर्ग भी है जो घरेलू महिलाओं व बच्चों को अपनी जागीर समझ परम्पराओं का हवाला देते हुए उनका शोषण करता है और इस संबंध में कोई कानून न होने पर वह अपनी हदें पार भी कर जाता है। यह सही है कि घरेलू पारिवारिक झगड़ों को सुलझाने के लिए मेल-जोल और सद्भाव को आधार बनाया जाना चाहिये पर अंततः हिंसा, भले ही वह पिता या पति द्वारा हो एक सभ्य समाज की निशानी नहीं कहा सकता और घरेलू हिंसा निषेध कानून इस सम्बन्ध में मील का पत्थर साबित होगा।

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परिचय

नाम- आकांक्षा यादव

जन्म - ३० जुलाई १९८२, सैदपुर, गाजीपुर (उ० प्र०)

शिक्षा- एम० ए० (संस्कृत)

विधा- मूलतः कविता और कभी-कभी लेख।

प्रकाशन- साहित्य अमृत, कादम्बिनी, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला, दैनिक आज, अहा जिन्दगी, गोलकण्डा दर्पण, युगतेवर, प्रगतिषील आकल्प, षोध दिषा, इण्डिया न्यूज, रायसिना, साहित्य क्रांति, साहित्य परिवार, साहित्य परिक्रमा, साहित्य जनमंच, सामान्यजन संदेश, राष्ट्रधर्म, समकालीन अभिव्यक्ति, सरस्वती सुमन, शब्द, लोक गंगा, रचना कर्म, नवोदित स्वर, आकंठ, प्रयास, नागरिक उत्तर प्रदेश, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा, मेरी संगिनी, वुमेन ऑन टॉप, वात्सल्य जगत, प्रज्ञा, पंखुडी, लोकयज्ञ, कथाचक्र, नारायणीयम्, मयूराक्षी, चांस, गुफ्तगू, मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद पत्रिका, हिन्दी प्रचार वाणी, गुर्जर राष्ट्रवीणा, युद्धरत आम आदमी, अरावली उद्घोश, मूक वक्ता, सबके दावेदार, कुरूक्षेत्र संदेश, सेवा चेतना, बाल साहित्य समीक्षा, कल्पान्त, इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। विभिन्न प्रतिष्ठित काव्य संकलनों एवं वेब पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन।

सम्मान- साहित्य गौरव, काव्य मर्मज्ञ, साहित्य श्री, साहित्य मनीषी, शब्द माधुरी, भारत गौरव, साहित्य सेवा सम्मान,

देवभूमि साहित्य रत्न ब्रज-शिरोमणि इत्यादि सम्मानों से अलंकृत। राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा

‘‘भारती ज्योति‘‘ एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ’’वीरांगना सावित्रीबाई फुले फ़ेलोशिप सम्मान’’।

दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका वुमेन ऑन टॉप’ द्वारा देश की शीर्षस्थ १३ महिला प्रतिभाओं में स्थान।

रुचियाँ- रचनात्मक अध्ययन व लेखन। नारी विमर्श, बाल विमर्श व सामाजिक समस्याओं सम्बन्धी विषय में विशेष रूचि।

सम्प्रति- प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज, नरवल, कानपुर (उ० प्र०)- २०९४०१

सम्पर्क- आकांक्षा यादव द्वारा श्री कृष्ण कुमार यादव, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर (उ०प्र०)

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दो ग़ज़लें

sharad tailang

शरद तैलंग

(1)

अपनी बातों में असर पैदा कर
तू समन्दर सा जिगर पैदा कर|

बात इक तरफ़ा न बनती है कभी
जो इधर है वो उधर पैदा कर|

कुछ भरोसा नहीं है सूरज का
तू नई रोज सहर पैदा कर|

बात जो है कबीर रहिमन में
शायरी में वो हुनर पैदा कर|

गंध माटी की बसे गांवों सी
एक ऐसा तू शहर पैदा कर|

अपनी पहचान हो न मजहब से
मुल्क में ऐसी लहर पैदा कर|

ज़ीस्त का लुत्फ जो लेना हो ‘शरद’
एक बच्चे सी नजर पैदा कर|

(2)

पत्थरों का ये बड़ा एहसान है
हर कदम पर अब यहां भगवान है |

वो बुझा पाई न नन्हे दीप को
ये हवाओं का भी तो अपमान है |

फिर खिलौनों की दुकानें सज गई
मुश्किलों में बाप की अब जान है |

दफ़न है सीने में  मेरी आरजू
बन गया दिल जैसे कब्रिस्तान है |

शब्द बेचारा रहा बस देखता ही
अर्थ को मिलता रहा सम्मान है |

जब कोई प्यारा सा बच्चा हंस दिया
यूं लगे सरगम भरी इक तान है |

आप सब के ख्वाब हों पूरे सभी
बस ‘शरद’ के दिल में यह अरमान है |

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शरद तैलंग की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग http://www.sharadkritya.blogspot.com/ पर

संपर्क:

0 शरद तैलंग
   240 माला रोड हाट स्थल
   कोटा जंक्शन 324002
   राजस्थान

art 428 (WinCE)

क्या बताऊँ, बताने को क्या रह गया ।
जितना पानी था आँखों में सब बह गया ॥
०००००

फ़िर भरोसा न करना कभी आस पर,
दिल न दे बैठना ऐसे विश्वास पर,
ज़िंदगी को पड़े जब गला घोंटने ,
और लग जाएं प्रतिबन्ध हर साँस पर।
मौत भी गुदगुदाने लगे कांख में ,
तो सिवा साथ हँसने के क्या रह गया॥
क्या बताऊँ, बताने को क्या रह गया ।।
०००००

जो ये कहते थे दुनिया न उनके बगैर,
श्मशानों में लेटे हैं फैलाये पैर,
कब्र है भी कि सारे निशान मिट गए ,
लेने वाला नहीं कोई उनकी है खैर।
अर्थ अपने शलभ हैं लगे पूछने ,
ऐसे शब्दों का बस कारवां रह गया।।
क्या बताऊँ, बताने को क्या रह गया ।।

---

image

सत्येन्द्र शलभ की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग http://satyendrashalabh.blogspot.com/ पर

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(चित्र – रेखा की कलाकृति)

कहानी

smriti2

 

स्मृति

-राजेश कुमार पाटिल

लीला, कुछ खास नहीं बदला है पिछले बीस वर्षों में हमारी तहसील के इकलौते सरकारी कॉलेज में, वही बिल्डिंग है, वही कक्षाएं हैं, हाँ अपनी क्लास की खिड़की से लगे हुए बगीचे के किनारे-किनारे पंक्ति से लगे अशोक के पेड़ अब काफी बड़े हो गए हैं । जहाँ पहले तार की फेंसिंग हुआ करती थी अब पक्की बाउंड्री बन गई है । कितना सुखद होता है जिस कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की उसी में अध्यापन का अवसर मिल जाना । कॉलेज प्रांगण में कदम पड़ते ही अतीत जैसे फिर जीवंत होकर वर्तमान के धरातल पर दौड़ने लगता है । मुझे याद है, कॉलेज में तुम्हारा नया-नया एडमीशन हुआ था । उस दिन फीस जमा करने की अंतिम तिथि थी । एक ही कैश काउंटर होने के कारण काउंटर पर अत्यधिक भीड़ थी छात्र-छात्रायें यद्यपि अलग अलग लाइनों में लगे हुए थे, किंतु धक्कामुक्की इतनी अधिक थी कि समझ नहीं आ रहा था कि छात्र-छात्राओं की लाईनें अलग-अलग कैसी बनी है, हर कोई जितनी जल्दी हो सके फीस जमा कर, भीड़ और धक्कामुक्की से मुक्त होना चाह रहा था । तुम भी उसी भीड में फीस जमा करने के प्रयास में लगी हुई थी कि अचानक तुम जोर-जोर से चिल्लाने लगी ’बद्तमीज !’ ’तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे दुपट्टे को हाथ लगाने की !’ ’मैं अभी शिकायत करती हूं प्रिंसीपल से . . . तेरी मां-बहन नहीं है क्या ?’ . ’गंवार . . बेशरम . . नालायक और न जाने क्या - क्या ।’ तुम मुझे लगातार डाँटे जा रही थी । मुझे तुरंत तो कुछ समझ ही नहीं आया कि तुम मुझे क्यों डाँट रही हो, किंतु बाद में पता चला कि लाईन में धक्कामुक्की के कारण किसी लड़की की हेयरपिन में फंसकर तुम्हारा दुपट्टा खिंच गया था और इत्तेफाक से तुम्हारे बिल्कुल बाजू से मैं खड़ा था बस, और तुम्हें लगा जैसे मैंने ही जानबूझकर तुम्हारा दुपट्टा खींचा हो । बस, तुमने बिना कुछ सोचे समझे मुझ पर गालियों की बौछार कर दी । यद्यपि बाद में तुमने हृदय से मुझसे माफी मांगी थी । ऐसे हुआ था हमारा पहला परिचय ।

तुम्हारे सौन्दर्य और चंचल व्यवहार को देखकर क्लास और कॉलेज के कितने ही लड़के तुमसे दोस्ती करने के लिए लालायित रहते थे कि कब तुमसे बात करने का मौका मिल जाए । पर पता नहीं तुमने मुझ जैसे सदैव गंभीर और शांत रहनेवाले लड़के में ऐसा क्या देखा था कि क्लास के आधुनिक रहन सहन वाले लड़कों को छोड़ तुम मुझसे बातें करने के मौके तलाशती रहती । क्लास की प्रथम पंक्ति के बाएं तरफ खिड़की के किनारेवाली बैंच पर तुम कुछ इस तरह बैठती थी कि देखनेवाले को लगता था कि तुम ब्लेकबोर्ड की तरफ देख रही हो पर वास्तव में तुम्हारी नजर क्लास के दायी तरफ पहली बैंच पर होती थी जहाँ मैं बैठा करता था । तुम मुझसे बातचीत करने का कोई भी अवसर खाली नहीं जाने देती थी बल्कि अपनी शरारतों से रोज-रोज नये अवसर बना लिया करती थी और मैं इससे बचने की कोशिश करता रहता था, इसलिये नहीं कि मैं तुम्हें पसंद नहीं करता था बल्कि सच बात तो यह थी कि मैं तुम्हें उसी दिन से चाहने लगा था जिस दिन तुमने रौद्र रूप धारण करते हुए मुझे डाँट लगाई थी और सच्चाई का पता चलने पर उतनी ही विनम्रता से मुझसे बार-बार सॉरी प्लीज, सॉरी प्लीज कहा था । तुम्हारे लिए कॉलेज पढ़ना, सुयोग्य वर की तलाश पूरी होने तक मात्र समय व्यतीत करना था । तुम्हारा उद्दे’य बस इतना ही था कि तुम्हारे नाम के साथ एम.ए. की डिग्री जुड़ जाए । पूरे कॉलेज समय में तुम्हारा ध्यान पढाई की तरफ कम और शरारतें करने में ज्यादा लगा रहता था । कॉलेज की सांस्कृतिक गतिविधियाँ, पिकनिक, एन.एस.एस. के कैम्प, तुम कॉलेज जीवन के हर पल को भरपूर जी लेना चाहती थी । कॉलेज का अर्थ तुम्हारे लिए सिर्फ मौज था, किंतु मेरे लिए कॉलेज पढ़ने का मतलब था अपने माता-पिता की आशाओं को पूरा करना, उनके सपनों को पूरा करना . . . और यही वजह थी की तुमको चाहते हुए भी मैं शुरू-शुरू में तुमसे दूरी बनाये रखता था, किंतु को प्रेम तो प्रेम होता है वह तो बस हो जाता है । तुम्हें कदाचित यकीन न हो पर तुम्हारा लिखा दस पेज का पहला पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित रखा है । एम.ए.होते ही हमारा मिलना जुलना लगभग बंद ही हो गया था, क्योंकि कॉलेज में ही हम मिल सकते थे । इसी बीच तुम्हारे पिता का स्थानांतर किसी दूरस्थ जिले में हो गया और फिर तुम जो गई तो कभी वापस नहीं लौट सकी । सिर्फ तुम्हारे विवाह की खबर ही मिली थी ।

लीला, मैं तुम्हें दोष नहीं दे रहा हूँ कि तुमने मेरी प्रतीक्षा क्यों नहीं की, यथार्थ प्रेम में इसकी कोई जगह नही है । हम स्वजातीय थे हमारी शादी में कोई रूकावट नहीं आनी चाहिए थी, किंतु स्वजातीय मात्र होना ही प्रेम के परिणय बंधन में परिवर्तित होने का कोई ठोस आधार नहीं है, क्योंकि मुझे लगता है बेरोजगारी और प्रेम का प्रायः सामंजस्य नहीं होता है, अपने प्रेम को पाने के लिए रोजगार एक अनिवार्य तत्व है । और मेरे पास था ही क्या ? बी.ए.एम.ए. की प्रथम श्रेणी की डिग्रियाँ, विश्वविद्यालय के गोल्ड मेडल, और पृष्ठभूमि में एक दूरस्थ गांव के गरीब किसान माता-पिता की अनगिनत आशायें और उम्मीदें . . . । विद्यार्थी जीवन में हमारा पहला उद्दे’य अपने लक्ष्य की प्राप्ति होना चाहिए न कि प्रेम के दिवास्वप्न, क्योंकि जीवन का यह अमूल्य समय एक बार हमारे हाथ से निकल जाने के बाद न तो हमें प्रेम ही मिल पाता है और न ही अपना लक्ष्य । शेष बचता है सिर्फ पश्चाताप ।

हाँ, हममें समानतायें तो बहुत थीं, हम एक ही कॉलेज में पढ़ते थे, एक ही क्लास में पढ़ते थे, हमउम्र थे और एक दूसरे के गुणों, अवगुणों को जानते समझते हुए एक दूसरे को पसंद करते थे, किंतु ये समानतायें एक बेटी के पिता के लिए बिल्कुल पर्याप्त नहीं थीं मैं कहां गांव का रहनेवाला किसान का बेटा और तुम शहर में पली बढ़ी तहसीलदार साहब की इकलौती, सुन्दर सुशील बेटी । मेरा तुम्हारा कैसे मेल हो पाता क्योंकि लीला, हर इंसान सुख सुविधा चाहता है, तुम, तुम्हारे माता पिता और, और . .शायद प्रेम भी । हिंदी साहित्य से एम.ए. के बाद मैंने शीघ्र ही पीएचडी. के लिए पंजीयन करा लिया था और साथ ही नौकरी के लिए भी हरसंभव प्रयास करता रहा, किंतु जहां चारों तरफ अंग्रेजी का बोलबाला हो, पश्चिमी संस्कृति की आंधी चल रही हो वहां निराला, पंत की कविताओं और प्रेमचंद के उपन्यासों की भूमि से रोटी उपजाना आसान नहीं था । हाँ इसके लिए कहीं उर्वर भूमि मिली भी तो भ्रष्टाचार के कीटाणुओं ने उसके अंकुरण पर विराम लगा दिया । तुम सच कहती थी ’प्रेम हृदय की अतल गहराइयों में आविर्भित होता है, किंतु उसके जीवित रहने के लिये दो वक्त की रोटी और सिर पर छत होना नितांत आव’यक है ।’ ’अनुराग तुम जल्दी करो यदि तुम्हें जल्दी ही नौकरी नहीं मिली तो मैं फिर तुम्हें कभी नहीं मिल पाउंगी ।’ हाँ, तुमने एक रास्ता और सुझाया था कि सामाजिक मर्यादाओं को तोड़कर हम घर से भागकर मंदिर में शादी कर लेते हैं किंतु बहुत सोच विचार करने के बाद मेरा मन ऐसे रास्ते पर चलने पर सहमत नहीं हुआ था, जो हमारे माता-पिता की प्रतिष्ठा और उनके मान सम्मान पर कालिख लगा देता और प्रेम तो गौरवान्वित करता है अपमानित नहीं । मैं नौकरी की निरंतर तलाश करता रहा और उधर तुम मुझसे धीरे-धीरे दूर होती गई और अपनी बेटी के लिए डिप्टी कलेक्टर जैसा दामाद मिल रहा हो तो कौन पिता नहीं चाहेगा कि उसकी बेटी का विवाह जल्दी न हो । दुख और सुख ने आगे-पीछे ही मेरे दरवाजे पर दस्तक दिए थे, जिस वर्ष तुम्हारी शादी हुई उसके एक वर्ष बाद ही मुझे पीएचडी अवार्ड हुआ था । और नौकरी के रास्ते भी खुल गये थे, पर तब तक तो बहुत देर हो चुकी थी, तुम किसी और की दुनिया में सदा के लिए चली गई थी। तब मुझे बहुत दुख हुआ था । किंतु मैं कुछ कर नहीं पाया, क्योंकि तुम वैवाहिक जीवन की ऐसी सीमाओं में बंध गई थी, जिसमें पूर्व प्रेम का प्रवेश दाम्पत्य जीवन की खुशियों को खत्म कर विनाश और बर्बादी को जन्म देता है और मैंने यह कभी भी नहीं चाहा कि मैं या मेरा प्रेम तुम्हारे सुखी वैवाहिक जीवन में दरार पड़ने का कारण बने । मैंने तो ईश्वर से सदैव यही प्रार्थना की कि तुम जहाँ भी रहो सदा स्वस्थ व प्रसन्न रहो । परंतु कहते हैं न धरती गोल है कहीं से भी चलना प्रारंभ करो घूम फिरकर हम वहीं आ जाते हैं, जहाँ से चलना शुरू किया था । 20 साल बाद मैं आज वहीं लौट आया हूँ हमारे उसी कॉलेज में जहाँ हमारे मध्य प्रेमबीज का अंकुरण हुआ था । वहीं तुम्हारी स्मृतियों के बीच जहाँ से मेरा मन कभी बाहर नहीं निकल सका ।

आज तुम न जाने कहाँ हो ? कैसी हो, पिछले बीस सालों में तुमने मुझे कभी याद किया हो या न किया हो किंतु मैं तुम्हें कभी भुला नहीं पाया । प्रेम की धरा पर उपजे तुम्हारी स्मृतियों के फूल अभी मुरझाये नहीं है प्रथम प्रणय की खुशबू लिये वे अब भी सुरभित करते हैं, मुझे, मेरे मन को, मेरी आत्मा को, ऐसे, जैसे अभी खिले हों ।

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संपर्क:

राजेश कुमार पाटिल

मकान नं. डी.के. 1@2

(दानिशकुंज गेट के बगल में)

कोलार रोड, भोपाल

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चित्र : साभार, बनवासी उत्सव 08, भोपाल

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