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आकांक्षा यादव का आलेख : खबरदार! जो अब महिलाओं व बच्चों का दिल दुखाया

 

clip_image002उत्तर प्रदेश में एक सरकारी अधिकारी ने शराब के नशे में धुत अपनी बेटी की सहेली से बद्सलूकी करने का प्रयास किया और बेटी द्वारा इसका विरोध करने पर उसे जमकर मारा-पीटा और सारी हदों को तोड़ते हुए अपने बेटी के साथ ही बलात्कार कर डाला। बेटी द्वारा इसकी शिकायत करने पर आला अफसरों ने घटना की जाँच का जिम्मा आरोपित अधिकारी को ही सौंप दिया। शिकायत किये जाने से बौखलाये अधिकारी पिता ने उसके बाद अपनी बेटी के साथ कई बार बलात्कार किया। अंततः प्रताड़नाओं से त्रस्त आकर बेटी ने एक दूर के रिश्तेदार के संग शादी कर ली। मर्जी के खिलाफ शादी करने पर अधिकारी पिता ने उसकी ससुराल में जमकर तोड़फोड़ की और भाड़े के लोगों द्वारा उसको ससुराल से जबरन उठवा कर अपनी अनैतिक करतूतों के गवाह बने गर्भ का गर्भपात करवा दिया। वर्ष 2001 में घटित इस घटना की रिपोर्ट राज्य महिला आयोग व अन्य संगठनों के हस्तक्षेप के बाद वर्ष 2006 में ही जाकर लिखी गयी। इसी प्रकार एक अन्य घटनाक्रम में जब एक गरीब छात्रा ने हाई स्कूल परीक्षा अच्छे अंकोंे से पास करने के बाद इण्टर में दाखिला लेना चाहा तो उसके परिजनों ने उसे डपट दिया और अंततः पढ़ाई जारी रखने से मना करने पर नाराज छात्रा ने ट्रेन के सामने कूदकर अपनी जान दे दी।

ऐसे न जाने कितने वाकये समाज में रोज घटित होते हैं और लोग उसे घरेलू विवाद मानकर प्रकरण को वहीं समाप्त कर देना चाहते हैं। घरेलू हिंसा का तात्कालिक असर भले ही सिर्फ उत्पीडि़तों पर दिखे पर इसका दूरगामी असर वैयक्तिक सम्बन्धों के साथ-साथ पूरे परिवार, समाज व अन्ततः राष्ट्र पर पड़ता है। परम्पराओं के नाम पर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में किसी भी प्रकार की हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अंततः आजादी के 59 वर्षों बाद सरकार को घरेलू महिलाओं की याद आयी और 26 अक्टूबर 2006 को ‘घरेलू हिंसा निषेध कानून-2005’ लागू हो गया। भारतीय संस्कृति में एक ओर जहाँ नारी को पूजनीय माना गया है वहीं घरेलू हिंसा समेत बहुत सारे अन्याय वह अपनी किस्मत मानकर सहती रही हैं। यह अनायास ही नहीं है कि लड़कियों के साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ और बलात्कार उनके पारिवारिक सदस्यों और निकट रिश्तेदारों द्वारा ही होते रहे हैं। यही नहीं भारत में साल भर में 2,90,000 बेटियाँ कोख में ही मार दी जाती हैं और इसके लिए बाकायदा लगभग 450 करोड़ रूपये का भ्रूण हत्या का कारोबार चल रहा है। पर अब पुरूष अहम् से वशीभूत होकर बात-बात पर महिलाओं और बच्चों पर अपना गुस्सा उतारने वालों की खैर नहीं है। मैं मैके चली जाऊँगी तुम देखते रहियो, अब पुरानी बात हो जाएगी क्योंकि महिलायें पतियों से तंग आकर अपने माता-पिता के पास नहीं वरन् नजदीकी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराती नजर आयेंगी। इस कानून के तहत महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को व्यापक अर्थों में लेते हुए यौन सम्बन्धी, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, भावनात्मक के साथ-साथ मौखिक प्रताड़ना को भी शामिल किया गया है और घरेलू हिंसा को पाँच वर्गों में बाँटकर उसे और भी स्पष्ट कर दिया गया है-

शारीरिक हिंसा- मारपीट, थप्पड़, ठोकर मारना, दाँत काटना, लात मारना, मुक्का मारना, धक्का देना, धकेलना, किसी और तरीके से शारीरिक तकलीफ देना।

लैंगिक हिंसा - जबरदस्ती यौन सम्बन्ध बनाना, अश्लील साहित्य या कोई अन्य अश्लील तस्वीरें या सामग्री को देखने के लिए मजबूर करना, किसी दूसरे का मन बहलाने के लिए मजबूर करना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना या नीचा दिखाने के लिए लैंगिक प्रकृति का कोई दूसरा कर्म जो महिलाओं के सम्मान को किसी न किसी रूप में चोट पहुँचाता हो, बालकों के साथ यौनिक दुर्व्यवहार।

मौखिक और भावनात्मक हिंसा - मजाक उड़ाना, गालियाँ देना, चरित्र और आचरण पर दोषारोपण, लड़का न होने के लिए बेइज्जत करना, बच्चा न होने पर ताना देना, दहेज के सवाल पर अपमानित करना, स्कूल, कालेज या किसी अन्य शैक्षणिक संस्थान में जाने से रोकना, नौकरी करने से रोकना, नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर करना, महिला या उसके साथ रहने वाले किसी बच्चे@बच्ची को घर से जाने से रोकना, किसी व्यक्ति विशेष से मिलने से रोकना, इच्छा के खिलाफ शादी करने पर मजबूर करना, पसंद के व्यक्ति से शादी करने से रोकना, आत्महत्या करने की धमकी देना, कोई और मौखिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार।

अहिंसक हिंसा - महिला या महिला की संतानों को भरण-पोषण के लिए पैसा नहीं देना, महिला या उसकी संतानों को खाना, कपड़ा और दवाइयाँ जैसी चीजें मुहैया न कराना, जिस घर में महिला रह रही है उससे निकलने पर मजबूर करना, घर के किसी हिस्से में जाने या किसी हिस्से के इस्तेमाल से रोकना, रोजगार करने से रोकना, किसी रोजगार को अपनाने में बाधा पहुँचाना, महिला के वेतन या पारिश्रमिक को जबरदस्ती हड़प लेना, कपड़े या दूसरी रोजमर्रा के घरेलू इस्तेमाल की चीजों के प्रयोग से रोकना, अगर किराए के मकान में रह रही हो तो किराये न देना, बिना महिला की सूचना और सहमति के बगैर स्त्रीधन या अन्य मूल्यवान वस्तुओं को बेच देना या बंधक रखना, स्त्रीधन को खर्च कर देना, बिजली आदि जैसे अन्य बिलों का भुगतान न करना।

दहेज से जुड़ा उत्पीड़न - दहेज के लिए किसी भी प्रकार की माँग, दहेज से जुड़े किसी अन्य उत्पीड़न में शामिल रहना।

इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हर उस महिला पर लागू होगा, जो किसी घर के दायरे में रहती है, भले ही वह किसी भी धर्म की हो। यही नहीं बिना विवाह के साथ रहने वाली महिला, विधवा और बहनों को भी इस कानून के दायरे में लिया गया है। नियम- कायदों के उल्लंघन को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध माना जायेगा एवं दोषी पाये जाने पर एक साल की सजा या 20 हजार रूपये जुर्माना या फिर दोनों सजायें हो सकती हैं। पत्नी और बच्चों को जीवन निर्वाह के लिये धन न देने की स्थिति में अधिनियम की धारा-18 के तहत पत्नी अपने स्त्री धन, गहने -जेवर और कपड़ों को कब्जे में ले सकेगी। साथ ही ऐसी स्थिति में बिना कोर्ट की इजाजत के संयुक्त बैंक खातों और बैंक लॉकर का भी उपयोग नहीं किया जा सकेगा। अधिनियम की धारा-19 के तहत महिलाओं और बच्चों को घर में रहने से रोका नहीं जा सकता और न ही ऐसे घरों को बेचा जा सकता है। किराये का मकान होने पर उसी तरह की सुविधाओं से युक्त दूसरा मकान दिलाना भी बाध्यकारी होगा। इस कानून के उचित क्रियान्वयन के लिये जिलों में महिला संरक्षण अधिकारी की नियुक्ति भी की जायेगी।

यद्यपि हर कानून के दुरूपयोग की संभावनायें रहतीं हैं पर अंततः उसका परिणाम उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करता है। निश्चिततः इस कानून के लागू होने के बाद महिलाओं और बच्चों की स्थिति में सुधार आयेगा और एक लोकतांत्रिक व सभ्य समाज की भांति महिलाओं को घरों के अंदर भी वैधानिक तौर पर कुछ अधिकार मिल सकेंगे। यह सही है कि जिस समाज में नारी पूजनीय रही है वहाँ कानून का भय दिखाना उचित नहीं कहा जा सकता पर हम इस तथ्य की अवहेलना भी नहीं कर सकते कि समाज में एक ऐसा वर्ग भी है जो घरेलू महिलाओं व बच्चों को अपनी जागीर समझ परम्पराओं का हवाला देते हुए उनका शोषण करता है और इस संबंध में कोई कानून न होने पर वह अपनी हदें पार भी कर जाता है। यह सही है कि घरेलू पारिवारिक झगड़ों को सुलझाने के लिए मेल-जोल और सद्भाव को आधार बनाया जाना चाहिये पर अंततः हिंसा, भले ही वह पिता या पति द्वारा हो एक सभ्य समाज की निशानी नहीं कहा सकता और घरेलू हिंसा निषेध कानून इस सम्बन्ध में मील का पत्थर साबित होगा।

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परिचय

नाम- आकांक्षा यादव

जन्म - ३० जुलाई १९८२, सैदपुर, गाजीपुर (उ० प्र०)

शिक्षा- एम० ए० (संस्कृत)

विधा- मूलतः कविता और कभी-कभी लेख।

प्रकाशन- साहित्य अमृत, कादम्बिनी, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला, दैनिक आज, अहा जिन्दगी, गोलकण्डा दर्पण, युगतेवर, प्रगतिषील आकल्प, षोध दिषा, इण्डिया न्यूज, रायसिना, साहित्य क्रांति, साहित्य परिवार, साहित्य परिक्रमा, साहित्य जनमंच, सामान्यजन संदेश, राष्ट्रधर्म, समकालीन अभिव्यक्ति, सरस्वती सुमन, शब्द, लोक गंगा, रचना कर्म, नवोदित स्वर, आकंठ, प्रयास, नागरिक उत्तर प्रदेश, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा, मेरी संगिनी, वुमेन ऑन टॉप, वात्सल्य जगत, प्रज्ञा, पंखुडी, लोकयज्ञ, कथाचक्र, नारायणीयम्, मयूराक्षी, चांस, गुफ्तगू, मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद पत्रिका, हिन्दी प्रचार वाणी, गुर्जर राष्ट्रवीणा, युद्धरत आम आदमी, अरावली उद्घोश, मूक वक्ता, सबके दावेदार, कुरूक्षेत्र संदेश, सेवा चेतना, बाल साहित्य समीक्षा, कल्पान्त, इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। विभिन्न प्रतिष्ठित काव्य संकलनों एवं वेब पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन।

सम्मान- साहित्य गौरव, काव्य मर्मज्ञ, साहित्य श्री, साहित्य मनीषी, शब्द माधुरी, भारत गौरव, साहित्य सेवा सम्मान,

देवभूमि साहित्य रत्न ब्रज-शिरोमणि इत्यादि सम्मानों से अलंकृत। राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा

‘‘भारती ज्योति‘‘ एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ’’वीरांगना सावित्रीबाई फुले फ़ेलोशिप सम्मान’’।

दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका वुमेन ऑन टॉप’ द्वारा देश की शीर्षस्थ १३ महिला प्रतिभाओं में स्थान।

रुचियाँ- रचनात्मक अध्ययन व लेखन। नारी विमर्श, बाल विमर्श व सामाजिक समस्याओं सम्बन्धी विषय में विशेष रूचि।

सम्प्रति- प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज, नरवल, कानपुर (उ० प्र०)- २०९४०१

सम्पर्क- आकांक्षा यादव द्वारा श्री कृष्ण कुमार यादव, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर (उ०प्र०)

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