गुरुवार, 2 अक्तूबर 2008

कृष्ण कुमार यादव का आलेख : समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी

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समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी

कृष्ण कुमार यादव

Vaaho_001 विश्व पटल पर महात्मा गाँधी सिर्फ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है। महात्मा गाँधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की अवधारणा फलित थी, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह एवं शान्ति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुये अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि -‘‘हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इन्सान धरती पर कभी आया था।’’ संयुक्त रा’ट्र संघ ने वर्ष 2007 से गाँधी जयन्ती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा करके शान्ति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता को एक बार पुनः सिद्ध कर दिया है।

2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबन्दर में जन्मे मोहनदास करमचंद गाँधी ने 1891 में इंग्लैंण्ड से बैरिस्टरी पास की और पहले राजकोट व फिर बम्बई में वकालत करने लगे। 1893 में अब्दुल्ला सेठ नामक एक व्यापारी के मुकदमे में वे दक्षिण अफ्रीका गये और वहाँ पहली बार उन्हें अंग्रेजों की भारतीयों व अफ्रीकियों के प्रति रंगभेद नीति का कटु अनुभव हुआ। एक तरफ उन्हें प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद रेलवे के डिब्बे से बाहर निकाल दिया गया तो दूसरी तरफ भारतीय होने के कारण तीन पौण्ड की लाइसेंस फीस देने को कहा गया। यही नहीं उनकी वेश-भूषा का भी मजाक उड़ाया गया। ऐसे में गाँधी जी ने इस रंगभेद नीति का विरोध किया और 1903 में ‘इण्डियन ओपिनियन’ अखबार की शुरुआत की। 11 सितम्बर 1906 को युवा बैरिस्टर गाँधी जी ने भारतीय मूल के लगभग 3000 लोगों को दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग के एंपायर थियेटर में इकट्ठा किया और एशियाटिक अध्यादेश के खिलाफ, जिसके तहत एशियाई लोगों को अपनी अंगुलियों के निशान रजिस्टर कराने व अपने साथ सदैव पहचान पत्र रखना अनिवार्य बना दिया गया था, के विरूद्ध यह प्रस्ताव पास किया कि- ‘‘वे अपना दमन करने वाले श्वेत औपनिवेशिक अत्याचारों का प्रतिरोध उन पर हाथ उठाए बिना करेंगे और उनके किसी भी जुल्म के सामने सिर नहीं झुकाएंगे।’’ यहीं पर गाँधी जी ने लोगों को सम्बोधित करते हुये प्रथम बार ‘सत्याग्रह’ विचारधारा का सूत्रपात किया। विरोध के इस नए हथियार को दक्षिण अफ्रीका की अंग्रेज सरकार सहन न कर सकी और गाँधी जी सहित 27 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया और उन्हें देश छोड़ने का आदेश दिया। परन्तु गाँधी जी ने उस आदेश का भी उल्लंघन किया और उन्हें जेल भेज दिया गया। इस प्रतिरोध के चलते दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने अन्ततः झुकते हुये 1914 में भारतीयों के विरुद्ध अधिकतर विभेदकारी कानून खत्म कर दिया। यह गाँधी जी की एक बड़ी जीत थी और इसी के साथ 18 जुलाई 1914 को इंग्लैण्ड होते हुये वे भारत रवाना हो गये तथा 1915 में भारत पहुँचे। इस बीच 4 अगस्त 1914 को प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ हो चुका था और गाँधी जी ब्रिटिश सरकार के बिना शर्त के सहयोगी रूप में सामने आये। वस्तुतः उन्हें लगा कि अंग्रेज इस विश्व युद्ध में उच्च सिद्धान्तों की रक्षार्थ लड़ रहे हैं और युद्ध पश्चात भारत की स्वाधीनता की दिशा में काम करेंगे। अंग्रेजी हुकूमत ने इसके बदले में गाँधी जी को ‘केसर-ए-हिन्द’ उपाधि से नवाजा। परन्तु गाँधी जी की सोच अन्ततः स्वप्नभंग ही साबित हुई और असहयोग आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी नीतियों के विरोध में उन्होंने यह उपाधि लौटा दी।

जब गाँधी जी भारत लौटे तो वे इंग्लैड से बैरिस्टरी पास कर लौटे ऐसे ऐसे धनी व्यक्ति थे, जिसकी सालाना आय करीब 5,000 पाउण्ड थी। भारत की धरती पर प्रवेश करते ही उन्हें लगा कि अंग्रेजों के दमन का शिकार भारतीयों को काला कोट पहने फर्राटे से कोर्ट में अंग्रेजी बोलने वाले मोहनदास करमचंद गाँधी की नहीं वरन् एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो उन्हीं के पहनावे में, उन्हीं की बोली में, उन्हीं के बीच रहकर, उनके लिए संघर्ष कर सके। ऐसे में गाँधी जी ने अपनी पहली उपस्थिति अप्रैल 1917 में चम्पारन, बिहार में नील के खेतों में काम करने वाले किसानों हेतु सत्याग्रह करके दर्ज करायी पर अखिल भारतीय स्तर पर उनका उद्भव 1919 के खिलाफत आन्दोलन व फिर असहयोग आन्दोलन से हुआ। 1919 से आरम्भ इस दौर को भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन में ‘गाँधी युग’ के नाम से जाना जाता है। गाँधी जी ने न केवल उस समय चल रही उदार व उग्र विचारधाराओं के उत्तम भागों का समन्वय किया बल्कि दोनों को एक अधिक गतिशील और व्यावहारिक मोड़ दिया। 5 फरवरी 1922 को चौरीचौरा काण्ड के बाद बीच में ही असहयोग आन्दोलन वापस लेकर गाँधी जी ने यह जता दिया कि वे हिंसा की बजाय अहिंसक तरीकों से भारत की आजादी चाहते हैं। असहयोग आन्दोलन से जहाँ जनमानस में अंग्रेजी हुकूमत का खौफ खत्म हो गया वहीं जनसमूह गाँधी जी के पीछे उमड़ पड़ा। इसके बाद तो सिलसिला चल निकल पड़ा, आगे-आगे गाँधी जी और उनके पीछे पूरा कारवां। जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र से परे इस कारवां में पुरुष व महिलायें एक स्वर से जुड़ते गये। 1920-22 के असहयोग आन्दोलन, 1930-34 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन, 1940-41 के व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आन्दोलन और 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन द्वारा गाँधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत को जता दिया कि भारत की स्वतंत्रता न्यायपूर्ण है और भारत में अंग्रेजी राज्य की समाप्ति आवश्यक है। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन ने तो अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दीं। उस दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल से वार्ता पश्चात सम्राट जार्ज षष्ठम् ने अपनी डायरी में दर्ज किया था कि-‘‘ विन्स्टन चर्चिल ने मुझे यह कहकर आश्चर्यचकित कर दिया है कि उनके सभी सहयोगी और संसद के तीनों दल युद्ध के पश्चात् भारत को भारतीयों के हाथों में छोड़ने को उद्यत हैं। क्रिप्स, समाचार पत्र और अमरीकी लोकमत- सभी ने उनके मन में यह भावना भर दी है कि हमारा भारत पर राज्य करना गलत है और सदैव से भारत के लिए भी गलत रहा है।’’ इस प्रकार 15 अगस्त 1947 को आजादी प्राप्त कर गाँधी जी ने समूचे विश्व को दिखा दिया कि हिंसा जो सभ्य समाज के अस्तित्व को न’ट करने का खतरा उत्पन्न करती है, का विकल्प ढूँढ़ने के लिए स्वयं की पड़ताल करने का भी एक प्रयास होना चाहिए।

गाँधी जी सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, स्वराज्य व रचनात्मक कार्यक्रमों के कायल थे। इन सभी सिद्धान्तों को उन्होंने न सिर्फ वैचारिक धरातल पर उतारा बल्कि उनमें अन्तर्सम्बन्ध भी स्थापित किया। गाँधी जी को ‘महात्मा’ की उपाधि से सर्वप्रथम विभूषित करने वाले रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि- ‘‘गाँधी जी एक राजनीतिज्ञ, संगठनकर्ता, जनमानस के नेता और नैतिक सुधारक के रूप में महान हैं, परन्तु वह मनु’य के रूप में उससे भी अधिक महान हैं। यद्यपि वह असाध्य रूप से आदर्शवादी थे और अपने निश्चित मापदण्डों द्वारा प्रत्येक कार्य को मापते थे, फिर भी वह मानव प्रेमी हैं न कि खोखले विचारों के प्रेमी।’’ गाँधी जी सत्य के बहुत बड़े प्रणेता थे और इसके लिये अहिंसा के तरीकों के पक्षपाती थे। सत्याग्रह उनके लिए मात्र नीति नहीं, सिद्धान्त था। वस्तुतः सत्याग्रह के माध्यम से गाँधीजी ने महात्मा बुद्ध, महावीर व तमाम महापुरूषों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धान्त को सामाजिक व राष्ट्रीय शक्ति में तब्दील कर दिया। पाश्चात्य विचारक थोरो की व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा की अवधारणा को सामाजिक शक्ति में बदलकर ऐसा बेमिसाल जनजागरण पैदा किया जो दीर्घकाल तक अवश्य चलता है, पर असफल नहीं होता। स्वयं गाँधी जी का मानना था कि- ‘‘सत्याग्रह एक ऐसा आध्यात्मिक सिद्धान्त है जो मानव मात्र के प्रेम पर आधारित है। इसमें विरोधियों के प्रति घृणा की भावना नहीं है।’’ अहिंसा गाँधी जी का प्रमुख सत्याग्रही हथियार था। गाँधी जी के लिये अहिंसा, हिंसा का निषेध मात्र नहीं थी बल्कि एक जीवन पद्धति थी। वे अक्सर कहा करते थे कि आज की दुनिया में जितने लोग जीवित हैं, वे बताते हैं कि दुनिया का आधार हथियार बल नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि दुनिया इतने हंगामों के बाद भी टिकी हुई है। गाँधी जी की अहिंसा कायरता का प्रतीक नहीं बल्कि अन्तश्चेतना व आत्मा में विश्वास करने वाली वीरता का परिचायक है। उन्होंने इसे व्याख्यायित करते हुये लिखा कि -‘‘यद्यपि अहिंसा का अर्थ क्रियात्मक रूप से जानबूझकर क’ट उठाना है, तथापि यह सिद्धान्त दुराचारियों के सामने हथियार डालने का समर्थन नहीं करता। इसके विपरीत यह दुराचारी का पूर्ण आत्मबल से सामना करने की प्रेरणा देता है। इस सिद्धान्त को मानने वाला व्यक्ति अपनी इज्जत, धर्म और आत्मा की रक्षा के लिए एक अन्यायपूर्ण साम्राज्य सहित समस्त शक्तियों को भी चुनौती दे सकता है और अपने पराक्रम द्वारा उसके पतन के बीज भी बो सकता है।’’ बताते हैं कि जब इटली के तानाशाह मुसोलिनी के आग्रह पर गाँधी जी उससे मिलने गये, तो कईयों ने उन्हें समझाया कि एक अहिंसक व्यक्ति का हिंसक व्यक्ति से मिलना उचित नहीं। पर गाँधी जी ने जवाब दिया कि हिंसक व्यक्ति से हिंसा ज्यादा खतरनाक है और हमारा उद्देश्य सत्य व अहिंसा के माध्यम से अहिंसा को खत्म करना है। गाँधी जी तीन लोगों के साथ मुसोलिनी से मिलने गये, जब कि वहाँ कुर्सियाँ सिर्फ दो थीं। जब मुसोलिनी ने गाँधी जी से बैठने का आग्रह किया तो गाँधी जी ने अपने साथ आये तीनों लोगों को कुर्सी की तरफ इशारा करते हुये बैठने को कहा। मुसोलिनी का सोचना था कि कुर्सी पर सिर्फ गाँधी जी और वो बैठेगा, पर गाँधी जी अपने साथ के तीन अन्य मेहमानों की खातिर कुर्सी पर बैठने को राजी नहीं हुये और अन्ततः मुसोलिनी को तीन अन्य कुर्सियाँ मँगवानी पड़ी। वाकई यह रोचक घटनाक्रम दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह और एक अहिंसक सत्याग्रही के बीच घटा था, जिसने तानाशाह को एक सत्याग्रही की बात मानने पर मजबूर कर दिया।

गाँधी जी स्वदेशी के प्रबल समर्थक थे। वे जानते थे कि असली भारत गाँवों में बसता है, जिसके आर्थिक स्वावलम्बन की रीढ़ कुटीर व लघु उद्योगों पर टिकी हुयी है। गाँधी जी का चरखा कातना प्रतीकात्मक रूप में स्वदेशी व स्वावलम्बन का ही प्रतीक था। स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए ही वे विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान करते थे। गाँधी जी सिर्फ राजनैतिक व्यक्ति नहीं बल्कि एक रचनात्मक समाज सुधारक भी थे। अस्पृश्यता, नारी सुधार, हिन्दू-मुस्लिम एकता इत्यादि के लिए उन्होंने बहुत कार्य किये। अस्पृश्यता को मानवता पर कलंक बताते हुये उन्होंने इसके उन्मूलन पर जोर दिया व तद्नुसार अछूतों को सम्मानजनक ‘हरिजन’ नाम देने, हरिजन सेवक संघ की स्थापना, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अस्पृश्यता के विरुद्ध लिखना एवं देशव्यापी भ्रमणों के दौरान अछूतों की बस्तियों में जाकर उनको गले लगाकर अस्पृश्यता को अवैज्ञानिक व अमानवीय सिद्ध करने जैसे अप्रतिम कदम उठाये। गाँधी जी के मन में नारी के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। वे नारी को पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह व बहु-विवाह जैसी मान्यताओं से बाहर निकालना चाहते थे और उनके आह्वान पर न सिर्फ तमाम नारियों ने पर्दा-प्रथा से बाहर निकल कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया बल्कि औरों को भी जागृत किया। नारी उत्थान हेतु गाँधी जी ने शिक्षा, अन्तर्जातीय विवाह व विधवा विवाह पर जोर दिया। उनका मानना था कि जब तक नारी अपने अधिकारों हेतु स्वयं आगे नहीं आयेगी, तब तक उसकी स्थित में परिवर्तन नहीं होगा।

गाँधी जी धर्म व सम्प्रदाय में भेद करते थे। धर्म उनके लिये कर्मकाण्डों से नहीं अपितु मानवीय व नैतिक गुणों से निर्मित था। वे राजनीति व धर्म के सहअस्तित्व को स्वीकार करते हुये दोनों के लिए सत्य, अहिंसा, त्याग, विश्वबन्धुत्व, आत्मविश्वास व नैतिकता को जरूरी मानते थे। साधन और साध्य दोनों की पवित्रता पर जोर देते हुये वे किसी भी प्रकार के छल कपट या अनुचित तरीकों को पसन्द नहीं करते थे। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के विपरीत गाँधी जी हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। 1919 में खिलाफत आन्दोलन के दौरान उन्होंने इसे हिन्दुओं व मुसलमानों के मध्य एकता स्थापित करने का ऐसा सुअवसर बताया जो कि आगे सौ वर्षों तक नहीं मिलेगा। हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रति गाँधी जी का आग्रह इसी से समझा जा सकता है कि जब 15 अगस्त 1947 को सारा देश आजादी के जश्न में डूबा था तो गाँधी जी साम्प्रदायिक दंगों को खत्म करने के लिए नोआखली में पद यात्रा कर रहे थे। वस्तुतः गाँधी जी के लिए स्वतंत्रता का स्वरूप सिर्फ राजनैतिक नहीं था, अपितु यह लोगों की सामाजिक, आर्थिक व आत्मिक उन्नति भी थी, जिसे वे ‘राम-राज्य’ कहा करते थे।

आज गाँधी जी सिर्फ भारत की भूमि तक ही सीमित नहीं बल्कि समग्र विश्व-धारा में व्याप्त हैं। उनके दिखाये गये रास्ते पर चलकर न जाने कितने रा’ट्रों ने अपनी स्वाधीनता पायी है। यह अनायास ही नहीं है कि गाँधी जी को पाँच बार 1937, 1938, 1939, 1947 व 1948 में नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिये नामित किया गया। यह एक अलग बहस का विषय है कि किन कारणों से उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया पर कालान्तर में गाँधी जी के सिद्धान्तों पर चलकर उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानने वाले कई लोगों को नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1989 में नोबेल शान्ति सम्मान के लिए दलाई लामा के नाम की घोषणा करते हुये नोबेल कमेटी के सदस्यों ने गाँधी जी को नोबेल सम्मान नहीं देने पर अफसोस जताया और कमेटी के अध्यक्ष ने कहा कि दलाई लामा को यह सम्मान दिया जाना गाँधी जी की स्मृति को श्रद्धांजलि देने का प्रयास है। इसी प्रकार 1984 व 1993 में क्रमशः डेसमण्ड टूटू व नेल्सन मण्डेला को नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिन्होंने गाँधी जी को प्रेरणास्रोत मानते हुये दक्षिण अफ्रीका में वर्णभेद व रंगभेद की खिलाफत की थी।

आज गाँधी जी के विचार पूरे विश्व में सर्वग्राह्य हैं। कभी आर्नल्ड टायनबी ने कहा था - ‘‘मैं जिस पीढ़ी में पैदा हुआ, वह पीढ़ी पश्चिम में केवल हिटलर अथवा स्तालिन की ही पीढ़ी नहीं थी अपितु भारत में गाँधी जी की भी पीढ़ी थी। हम निश्चयपूर्वक यह भविष्यवाणी कर सकते हैं कि मानव इतिहास पर गाँधी जी का प्रभाव हिटलर और स्तालिन के प्रभाव से अधिक होगा।’’ आज की नयी पीढ़ी गाँधी जी को एक नए रूप में देखना चाहती है। वह उन्हें एक सन्त के रूप में नहीं वरन् व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है। ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ जैसी फिल्मों की सफलता कहीं-न-कहीं युवाओं का उनसे लगाव प्रतिबिम्बित करती है। आज भी दुनिया भर के सर्वेक्षणों में गाँधी जी को शीर्ष पुरूष घोषित किया जाता है। हाल ही में हिन्दू-सी0 एन0 एन0- आई0 वी0 एन0 द्वारा 30 वर्ष से कम आयु के भारतीय युवाओं के बीच कराए गए एक सर्वेक्षण में 76 प्रतिशत लोगों ने गाँधी जी को अपना सर्वोच्च रोल मॉडल बताया। बी0बी0सी0 द्वारा भारत की स्वतंत्रता के 60 वर्ष पूरे होने पर किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक आज भी पाश्चात्य देशों में भारत की एक प्रमुख पहचान गाँधी जी हैं। यही नहीं तमाम पाश्चात्य देशों में गाँधीवाद पर विस्तृत अध्ययन हो रहे हैं, तो भारत में सुन्दरलाल बहुगुणा, मेघा पाटेकर, अरूणा राय से लेकर संदीप पाण्डे तक तमाम ऐसे समाजसेवियों की प्रतिष्ठा कायम है, जिन्होंने गाँधीवादी मूल्यों द्वारा सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने की कोशिशेंं कीं। आँकड़े गवाह हैं कि विश्व भर में हर साल गाँधी जी व उनके विचारों पर आधारित लगभग दो हजार पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है एवम् हाल के वर्षों में गाँधी जी की कृतियों का अधिकार हासिल करने के लिये प्रकाशकों व लेखकों के आवेदनों की संख्या दो गुनी हो गई है। वस्तुतः आज जरूरत गाँधीवाद को समझने की है न कि उसे आदर्श मानकर पिटारे में बन्द कर देने की। स्वयं गाँधी जी का मानना था कि आदर्श एक ऐसी स्थिति है जिसे कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता बल्कि उसके लिए मात्र प्रयासरत रहा जा सकता है।

संयुक्त रा’ट्र संघ ने गाँधी जयन्ती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा करके शान्ति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता को एक बार पुनः सिद्ध कर दिया है। सत्य, प्रेम व सहिष्णुता पर आधारित गाँधी जी के सत्याग्रह, अहिंसा व रचनात्मक कार्यक्रम के अचूक मार्गों पर चलकर ही विश्व में व्याप्त असमानता, शोषण, अन्याय, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, दुराचार, नक्सलवाद, पर्यावरण असन्तुलन व दिनों-ब-दिन बढ़ते सामाजिक अपराध को नियंत्रित किया जा सकता है। गाँधी जी द्वारा रचनात्मक कार्यक्रम के जरिए विकल्प का निर्माण आज पूर्वोत्तर भारत व जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों की समस्याओं, नक्सलवाद व घरेलू आतंकवाद से निपटने में जितने कारगर हो सकते हैं उतना बल-प्रयोग नहीं हो सकता। गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म-सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हैं। तभी तो भारत के अन्तिम वायसराय लार्ड माउण्टबेन ने कहा था - ‘‘गाँधी जी का जीवन खतरों से भरी इस दुनिया को हमेशा शान्ति और अहिंसा के माध्यम से अपना बचाव करने की राह दिखाता रहेगा।’’

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रचनाकार परिचय

जीवन-वृत्त

नाम ः कृष्ण कुमार यादव

जन्म ः 10 अगस्त 1977, तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0)

शिक्षा ः एम0 ए0 (राजनीति शास्त्र), इलाहाबाद वि”वविद्यालय

विधा ः कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, व्यंग्य एवं बाल कविताएं।

प्रकाशन ः देश की प्राय अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। एक दर्जन से अधिक स्तरीय काव्य संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन। इण्टरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं में रचनाओं की प्रस्तुति।

प्रसारण ः आकाशवाणी लखनऊ से कविताओं का प्रसारण।

कृतियाँ ः अभिलाषाा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट- 150 ग्लोरियस इयर्स (अंगे्रजी-2006), अनुभूतियाँ और विमर्ष (निबन्ध संग्रह-2007), क्रान्ति यज्ञ ः 1857-1947 की गााथा (2007)। बाल कविताओं व कहानियों का संकलन प्रकाशन हेतु प्रेस में।

सम्मान ः विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा सोहनलाल द्विवेदी सम्मान, कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, काव्य गौरव, राष्ट्रभाषा आचार्य, साहित्य मनीषी सम्मान, साहित्यगौरव, काव्य मर्मज्ञ, अभिव्यक्ति सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, साहित्य श्री, साहित्य विद्यावाचस्पति, देवभूमि साहित्य रत्न, ब्रज गौरव, सरस्वती पुत्र और भारती-रत्न से अलंकृत। बाल साहित्य में योगदान हेतु भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा सम्मानित।

विशेष ः व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर कृष्ण कुमार यादव‘‘ शीघ्र प्रकाश्य। सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित ‘बाल साहित्य समीक्षा’(सितम्बर 2007) एवं इलाहाबाद से प्रकाशित ‘गुफ्तगू‘ (मार्च 2008) द्वारा व्यक्तित्व-कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित।

अभिरूचियाँ ः रचनात्मक लेखन व अध्ययन, चिंतन, नेट-सर्फिंग, फिलेटली, भ्रमण।

सम्प्रति@सम्पर्क ः कृ’ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर-208001 ई-मेलः kkyadav.y@rediffmail.com www.kkyadav.blogspot.com

1 blogger-facebook:

  1. गाँधी जी पर आपका आलेख पढ़ा. आज के दौर में गाँधी जी की प्रासंगिकता को स्थापित करता यह आलेख बेहद समकालीन और करीने से प्रस्तुत किया गया है. गाँधी जी सिर्फ एक व्यक्ति का नाम नहीं हैं बल्कि एक संस्था है. इस लेख हेतु हेतु आपको बधाई!!!
    रश्मि सिंह

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