रविवार, 19 अक्तूबर 2008

सुरेन्द्र अभिन्न की कविताएँ

art1

मिल जाए अगर खुदा करूं ये ही सवाल

बता हिंदू है क्या, मुसलमान है क्या?

वो चला आएगा

चीर कर व्योम को...
प्रकाश पुंज
आलोकित करने
जीवन मेरा ,
चला आएगा
पथ को दर्शाने हेतु
वो पथप्रदर्शक बन
संग मेरे
चला आएगा
ईश्वर सम रूप है
जो जीवन पर
आधिपात्य कर
मुझे आलोकित करने,

चला आएगा............

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इस भीड़ मे कोई इंसान है क्या?
मुझसे बात करसके ऎसी जुबान है क्या ?

मिल जाए अगर खुदा करूं ये ही सवाल
बता हिंदू है क्या, मुसलमान है क्या?

नज़र आते है हर तरफ़ मज़हब ग़जीदा लोग़
कोई बताये इंसान की पहचान है क्या ?

क्या कहा इस राह पे चल सकोगे आप?
सच की डगर इतनी आसान है क्या?

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पूरे होश मे आकर देख-
मुझको पास बुलाकर देख-


दिल मे तेरे मै धड़का हूँ,
गर्दन जरा झुका कर देख-


वो भी हिस्सा तेरे घर का,
दिवार जरा गिरा कर देख-


महसूस करेगा बुलंदियों को,
किसी गिरे को उठाकर देख-


संदल जैसी धूल वतन की,
माथे पर इसे लगा कर देख-

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जीवन का सर्वोच्च क्षण

जीवन का सर्वोच्च क्षण
एक मौन संध्या का आगमन
मेरा स्वयं से साक्षात्कार
था जीवन में पहली बार
हृदय में उठता प्रश्न विशेष प्रशांत
देखा जब से जीवन साक्षात्
मेरा इससे कुछ है सम्बन्ध
स्पष्ट दीखता है मेरा प्रतिबिम्ब
मै,वो और एक तीसरा क्षण
और हम पर वो सांध्य अर्पण
मुझको जो लगा वो कहना था
मुझे भी जीवित रहना था
मै बिता क्षण तू शेष है
तेरा महत्व अभी विशेष है
इन साँसों को चलते रहने दो
मेरी जीवनधारा बहने दो
मै भूत भविष्य तू मेरा,
मै काव्य विषय तू मेरा
साक्षी क्षण ये तृतीय , विधान है
दोनों के मध्य ये कड़ी वर्तमान है
तीन काल एकत्र हो सारे
और ऐसे सम्बन्ध के बारे
भूत भविष्य दोनों मौन है
फिर रोने वाले तू कौन है?
प्रश्न अतीत ने उठाया ऐसे
उत्तर वर्तमान ने समझाया ऐसे
ध्रुव,धाराएँ चाहे मिलते रहें
ये मिलन असंभव है मेरा मन कहे

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"उन्मुक्त पंछी"

अगर मैं उन्मुक्त पंछी होता

करता विचरण ....

बेरोक टोक आता जाता

उड़ता फिरता यंहा वंहा ......

क्यूँ बना दिया मुझको

"इंसान" ...

तड़प रहा हूँ

बन्धनों में जकडा हुआ

एक साँस भी अपनी

इच्छा की नही ले पाते हम

या फिर अगर बनाना ही था

"इंसान"

क्यों न मुझे बच्चा ही रहने दिया

छीन ली क्यूँ मेरी मासूमियत

क्यूँ दे दी मुझे ये

ज़माने भर की

बददुआ...

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3 blogger-facebook:

  1. सुरेन्द्र जी /दीवाली की शुभ कामनाएं /आप यहाँ है /मई उन्मुक्त पंछी की तरह कहाँ कहाँ ढूंढता फिरा /यदि आपको बच्चा ही रहने दिया गया होता तो इतनी अच्छी रचनाएं हमें कहाँ मिलती /""जीवन का सर्वोच्च क्षण ""में तो आपने पूरा दर्शन भर दिया है /गर्दन झुका कर देखने की बात बहुत प्यारी लगी ""दिल में रहती है सदा तस्वीरे यार /जब जरा गर्दन झुकाई देख ली ""/सच की डगर को आप कठिन बता रहे हैं डगर तो झूंठ की कठिन है -एक बार बोल दिए तो सौ बार बोलना पड़ता है /सच हमेशा ही सच है ,झूंठ की तो इन्तहा ही नहीं /खैर अगली रचना का इंतज़ार /

    उत्तर देंहटाएं
  2. bahut dhanyavaad mahendra ji aur srivastva ji,aapke sujhavon ka sadaiv swagat

    उत्तर देंहटाएं

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