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अरविंद कुमार का आलेख : शब्द और भाषा

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(कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के रचयिता अरविंद कुमार का आत्मकथ्य उन्हीं की जुबानी – “मैं मे...

(कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के रचयिता अरविंद कुमार का आत्मकथ्य उन्हीं की जुबानी – “मैं मेरठ शहर के म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ा. दिल्ली से मैट्रिक किया—सन 45 में. मैट्रिक का इम्तहान देते ही मुझे कनाट सरकस में दिल्ली प्रैस में छापेख़ाने का काम सीखने बालश्रमिक के रूप में जाना पड़ा. पंदरह साल का किशोर जो बोर्ड के दसवीं के परिणाम आने पर चार विषयों में—हिंदी, संस्कृत, गणित और अँगरेजी में—डिस्टिंक्शन पाने वाला था, जिस का दिल दिमाग़ जहाँ से जो कुछ मिले ग्रहण करने को तैयार रहता था, जो हर बहती धारा में बहने से कतराता नहीं था, शब्दों के, भाषा के, पत्रकारिता के कारख़ाने में पहुँच गया. पहुँचा तो बड़े बेमन से था, लेकिन जल्दी ही रम गया और काम सीखने में लग गया.” …  )

-अरविंद कुमार

samantarkosh एट gmail.com

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हमारी ही तरह हमारे लंदनवासी पत्रकार मित्र राकेश माधुर प्रकृति प्रेमी हैं. लंदन के पार्क में राकेश द्वारा खींचा गया हमारा एक चित्र....

कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी

शब्द और भाषा...

कहते हैं कि बृहस्पति जैसा गुरु पा कर भी देवराज इंद्र हज़ारों वर्ष तक शब्द की थाह नहीं पा सके. फिर कहाँ देवों के गुरु बृहस्पति और कहाँ में. निपट अज्ञानी. मुझ जैसे लोगों के ज्ञान को संस्कृत में चंचु प्रवेश कहा जाता है. इधर उधर चोंच घुसा कर जो पाया, उसी को ज्ञान समझ लेना. जो कुछ भी मैं ने पिछले साठ बरसों में शब्दों के संसार में प्रवेश करने के बाद इधर उधर चोंच मार कर, पढ़ कर, काम कर के सीखा है, वही अपने शब्दों में लिखने की आधी अधूरी कोशिश कर रहा हूँ...

शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कड़ी है. हमारे संदर्भ में शब्द का केवल एक अर्थ है... एकल, स्वतंत्र, सार्थक ध्वनि. वह ध्वनि जो एक से दूसरे तक मनोभाव पहुँचाती है. संसार की सभी संस्कृतियों में इस सार्थक ध्वनि को भारी महत्व दिया गया है. संस्कृत ने शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया था. शब्द जो स्वयं ईश्वर के बराबर है, जो फैलता है, विश्व को व्याप लेता है. ग्रीक और लैटिन सभ्यताओं में शब्द की, लोगोस logos की, महिमा का गुणगान विस्तार से है. ईसाइयत में शब्द या लोगोस को कारयित्री प्रतिभा (क्रीएटिव जीनियस creative genius) माना गया है. कहा गया है कि यह ईसा मसीह में परिलक्षित ईश्वर की रचनात्मकता ही है.

कारण यह कि भाषा आज के मानव, हम मनु मानवों या होमो सैपिएंस, के मन मस्तिष्क का, यहाँ तक कि अस्तित्व का, अंतरंग अंग है—भाषा सीखने की क्षमता, भाषा के द्वारा कुछ कहने की शक्ति. इस शक्ति के उदय ने ही मानव को संगठन की सहज सुलभ क्षमता प्रदान की और आदमी को प्रकृति पर राज्य कर पाने में सक्षम बनाया. इसी के दम पर सारा ज्ञान और विज्ञान पनपा है. शब्दों और वाक्यों से बनी भाषा के बिना समाज का व्यापार नहीं चल सकता. आदमी अनपढ़ हो, विद्वान हो, वक्ता हो, लेखक हो, बच्चा हो, बूढ़ा हो... कुछ कहना है तो उसे शब्द चाहिए, भाषा चाहिए. वह बड़बड़ाता भी है तो शब्दों में, भाषा में. गूँगे लोग अपंग माने जाते हैं. धरती के बाहर अगर कभी कोई बुद्धियुक्त जीव जाति पाई गई, तो मुझे पूरा विश्वास है कि उस में संप्रेषण का रूप कोई भी हो, उस के मूल में किसी न किसी प्रकार की व्याकृता भाषा ज़रूर होगी और शब्द ज़रूर होगा.

शब्द के बिना भाषा की कल्पना करना निरर्थक है. शब्द हमारे मन के किसी अमूर्त्त भाव, इच्छा, आदेश, कल्पना का वाचिक प्रतीक, ध्वन्यात्मक प्रतीक है. शब्द जब मौखिक था, तो मात्र हवा था. उस का अस्तित्व क्षणिक था. वह क्षणभंगुर था.

शब्द को लंबा जीवन देने के लिए कंठस्थ कर के, याद कर के, वेदों को अमर रखने की कोशिश की गई थी. वेदों को कंठस्थ करने वाले वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी ब्राह्मणों की पूरी जातियाँ बन गईं जो अपना अपना वेद पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखती थीं. इसी प्रकार क़ुरान को याद रखने वाले हाफ़िज कहलाते थे.

शब्द को याददाश्त की सीमाओं से बाहर निकाल कर सर्वव्यापक करने के लिए, लंबा जीवन देने के लिए, लिपियाँ बनीं. लिपियों में अंकित हो कर शब्द साकार चित्र या मूर्ति बन गया. वह ताड़पत्रों पर, पत्थरों पर, अंकित किया जाने लगा. काग़ज़ आया तो शब्द लिखना और भी आसान, सस्ता हो कर और भी टिकाऊ हो गया. लिपि ने शब्द को स्थायित्व दिया. काल और देश की सीमाओं से बाहर निकल कर वह व्यापक हो गया. अब वह एक से दूसरे देश और एक से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से जा सकता था. मुद्रण कला के आविष्कार से मानव के ज्ञान में विस्तार के महाद्वार खुल गए. और अब इंटरनैट सूचना का महापथ और ज्ञान विज्ञान का अप्रतिम भंडार बन गया है. बिजली की गति से हम अपनी बात सात समंदर पार तत्काल पहुँचाते हैं.

हमारा संबंध केवल वाचिक और लिखित शब्द मात्र से है—लिपि कोई भी हो, भाषा कोई भी हो, हिंदी हो, अँगरेजी हो, या चीनी... एक लिपि में कई भाषाएँ लिखी जा सकती हैं, जैसे देवनागरी में हिंदी और मराठी, और नेपाली... हिंदी के लिए मुंडी जैसी पुरानी कई लिपियाँ थीं... हिंदी के कई काव्य ग्रंथ उर्दू लिपि में लिखे गए. आज उर्दू कविताएँ देवनागरी में छपती और ख़ूब बिकती हैं. रोमन लिपि में यूरोप की अधिकांश भाषाएँ लिखी जाती हैं. रोमन में हिंदी भी लिखी जाती है. ब्रिटिश काल में सैनिकों को रोमन हिंदी सिखाई जाती थी. आज इंटरनैट पर कई लोग हिंदी पत्रव्यवहार रोमन लिपि में ही करते हैं. रोमन में आजकल संसार की कई अन्य भाषाएँ लिखने के कई विकल्प मिलते हैं...

चीनी जापानी या प्राचीन मिस्री भाषाएँ चित्रों में लिखी जाती हैं. चित्रों में लिखी लिपि का आधुनिकतम रूप शार्टहैंड कहा जा सकता है. चित्र लिपियो में अक्षरों का होना आवश्यक नहीं है. हाँ, जो बात सब भाषाओं और लिपियों में कामन है, एक सी है, समान है, वह है शब्द. हर भाषा शब्दों में बात करती है. शब्द लिखती. सुनती और पढ़ती है.

हर भाषा का अपना एक कोड होता है. इसी लिए संस्कृत में भाषा को व्याकृता वाणी कहा गया है, नियमों से बनी और नियमों से बँधी सुव्यवस्थित क्रमबद्ध बोली. शुरू में यह कोड लिखा नहीं गया था. सब मन ही मन यह कोड जानते थे. पढ़ें या नहीं फिर भी हम यह कोड जानते हैं. यह कोड किसी भी समाज के सदस्यों के बीच एक तरह का अलिखित अनुबंध है. लिखना पढ़ना सीखने से पहले बच्चा यह कोड समझ चुका होता है.

भाषा और कोड निरंतर नवीकरण की प्रक्रिया में रहते हैं...

पहले आम आदमी भाषा बनाता है, बाद में विद्वान मग़ज़ खपा कर उस के कोड बनाते हैं. फिर आम आदमी उन कोडों को तोड़ता हुआ नए शब्द बनाता रहता है, शब्दों का रूप और अर्थ बदलता रहता है. कोडों की सीमाएँ लाँघती, बाढ़ में आई नदी की तरह किनारे तोड़ती भाषाएँ नई धाराएँ बना लेती हैं. पहले विद्वान माथा पीटते हैं, इस प्रवृत्ति को उच्छृंखलता कहते हैं, भाषा का पतन कहते हैं, फिर बाद में नए कोड बनाने में जुट जाते हैं...

इसी तरह भाषाएँ एक से कई बन जाती हैं, और कालांतर में अपने को फिर से बनाती रहती हैं. जैसे संस्कृत से अपभ्रंश, अपभ्रंशों से उत्तर भारत की आधुनिक भाषाएँ. भाषाओं को विकारों से बचाने के लिए विद्वान व्याकरण बनाते हैं, शब्दकोश बनाते हैं. जानसन और वैब्स्टर जैसे कोशकारों ने लिखा है कि उन का उद्देश्य था इंग्लिश और अमरीकन इंग्लिश को स्थायी रूप देना, उसे बिगड़ने से बचाना. उन के कोश आधुनिक संसार के मानक कोश बने. लेकिन हुआ क्या? उन के देखते देखते भाषा बदल गई, नए शब्द आ गए. फिर कोशों के नए संस्करण बनने लगे. आजकल अँगरेजी के कोशों में हर साल हज़ारों नए शब्द डाले जाते हैं.

यही तो जीवित भाषाओं का गुण है...

बहुत देर तक सैद्धांतकि बातों में न उलझ मैं सीधे सादे शब्दों में मैं अपनी रामकहानी सुनाता हूँ. कैसे मैं पत्रकारिता में, लेखन में आया, कैसे मैं थिसारसकार बन बैठा. इस कहानी में कोई बँधाबँधाया प्लाट नहीं है. नदी की धारा की तरह यह छोटे से सोते से शुरू होती है, इधर उधर भटकती बहती अपनी नियति की ओर बढ़ती रहती है.

मैं मेरठ शहर के म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ा. दिल्ली से मैट्रिक किया—सन 45 में. मैट्रिक का इम्तहान देते ही मुझे कनाट सरकस में दिल्ली प्रैस में छापेख़ाने का काम सीखने बालश्रमिक के रूप में जाना पड़ा. पंदरह साल का किशोर जो बोर्ड के दसवीं के परिणाम आने पर चार विषयों में—हिंदी, संस्कृत, गणित और अँगरेजी में—डिस्टिंक्शन पाने वाला था, जिस का दिल दिमाग़ जहाँ से जो कुछ मिले ग्रहण करने को तैयार रहता था, जो हर बहती धारा में बहने से कतराता नहीं था, शब्दों के, भाषा के, पत्रकारिता के कारख़ाने में पहुँच गया. पहुँचा तो बड़े बेमन से था, लेकिन जल्दी ही रम गया और काम सीखने में लग गया.

सच कहें तो मेरे भावी समांतर कोश और अभी हाल ही में प्रकाशित द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी की दिमाग़ी नीवँ वहीं पड़ी. मैं ने वहाँ देखा और सीखा (उस ज़माने की तकनीक में) एक एक अक्षर या उस का टाइप कैसे ख़ानों में रखा होता है, जुड़ जुड़ कर छपता है, छप जाने के बाद फिर उन्हीं ख़ानों में वापस रख दिया जाता है. मैं ने सीखा कैसे हम अपनी आवश्यकता के अनुसार ये टाइप रखने के ख़ाने और ख़ानोंदार केस कम ज़्यादा कर सकते हैं. टाइपों का वर्गीकरण कर सकते हैं, रैकों में रख सकते हैं, मुद्रण में काम आने वाली अन्य सामग्री रखने के लिए डिब्बे बना सकते हैं. फिर जब कंपोज़िंग करने लगा, तो मैं ने सीखा कैसे एक एक अक्षर जोड़ा जाता है, कैसे एक के बाद एक शब्द रख कर पंक्तियाँ बनती हैं, कैसे ये पंक्तियाँ पैरा बनती हैं, गेली बनती हैं, पेज बनते हैं, और बनते हैं पूरा लेख, किताब, पत्रिका, अख़बार... आज यह काम कंप्यूटर पर देख मैं मुग्ध हो जाता हूँ. कहां वह ज़माना था, और कहाँ यह सुपर फ़ास्ट युग...

छापेख़ाने में कई काम किए. कई काम सीखे. कंपोज़िंग, मशीन मैनी, बुक बाइंडिंग, ख़ज़ाँचीगीरी, अँगरेजी हिंदी टाइपिंग... साथ साथ शाम के समय मैट्रिक से आगे की पढ़ाई. ऐफ़ए, बीए, और अँगरेजी साहित्य में ऐमए.

इस बीच मैं छापेख़ाने में प्रूफ़ रीडर बना. मेरे लिए नए दरवाज़े खुलने लगे. धीरे धीरे सरिता कैरेवान पत्रिकाओं के संस्थापक संपादक विश्वनाथ जी मुझे बढ़ावा देने लगे. पहले सरिता में उपसंपादक बनाया. अब लेखकों की रचनाएँ पढ़ने लगा, उन पर कमैंट देने लगा... रचना, अच्छी हो या बुरी, पढ़नी पड़ती थी. अच्छे बुरे का विवेक जागने लगा. स्वीकृत रचनाओं का संपदान करने लगा. अँगरेजी से हिंदी में अनुवाद.

जब विश्वनाथ जी आश्वस्त हो गए कि मैं अच्छी ख़ासी हिंदी लिख लेता हूँ और अँगरेजी की समझ मुझ में पनपने लगी है, जब उन्हों ने देखा कि मैं ने शाम को बी.ए. में दाख़िला ले लिया है और मेरी रुचि अँगरेजी के साथ साथ विश्व साहित्य और आधुनिक ज्ञान विज्ञान में हो गई है, तो उन्हों ने मुझे हिंदी से अँगरेजी में धकेल दिया. पहले मैं सरिता में था, अब मैं अँगरेजी की कैरेवान पत्रिका में उप संपादक बन गया.

अब आई कसाले की बात...

मेरे बहुत से कामों में एक था हिंदी से अँगरेजी में अनुवाद. मुझे नानी याद आने लगी. हिंदी से अँगरेजी कोश बहुत अच्छे नहीं थे. अब भी कुल एक दो कोश हैं जो कामचलाऊ कहे जा सकते हैं. उन में मुझे संतोषप्रद अँगरेजी शब्द न मिलते थे. मात्र इतना संतोष था कि मुझे यह पता चलने लगा था कि कौन सा शब्द मेरे संदर्भ में उपयुक्त नहीं है. इस के माने थे कि मैं अब अच्छा अँगरेजी उपसंपादक बनने की राह पर था.

शुरू हुआ मेरा शब्द संपदा से खेल

सन 52-53 में मुझे एक अनोखी पुस्तक के बारे में पता चला. पुस्तक का पूरा नाम था रोजट्स थिसारस आफ़ इंग्लिश वर्ड्स ऐंड फ़्रेज़ेज़. संक्षेप में उसे रोजट्स थिसारस ही कहते थे और हैं. मैं ने यह छोटी सी किताब तुरंत ख़रीद ली. फ़्राँसीसी मूल के कला-नाटक समीक्षक, इंजीनियर, वैज्ञानिक पीटर मार्क रोजट ने इस किताब के शब्दों का संकलन एक बिल्कुल नए क्रम से किया था. रोजट की हालत भी मेरे जैसे ही हुआ करती थी. उसे शब्द चाहिए होते थे, मिलते नहीं थे. उस ने अपने निजी काम के लिए जो सूची बनाई, वही बाद में महान पुस्तक बन गई. 1852 में छपते ही यह पुस्तक लोकप्रिय हो गई थी. इस के छपने के 101 साल बाद दिल्ली में मैं ने इस का जो संस्करण ख़रीदा वह लगभग इसी आउटडेट संस्करण का पुनर्मुद्रण था.

यह था मेरे जीवन का सब से बढ़िया ख़ज़ाना जो मुझे मिला. मानो किसी ने मुझ अली बाबा को शब्दों के रत्न भंडार में घुसने का सिम सिम खुल जा मंत्र बता दिया हो. दिन में कैरेवान के संपादन विभाग में काम करता था, रात में बी.ए. में पढ़ रहा था. सारी पढ़ाई अँगेरजी में होती थी. हिंदी से अँगरेजी में अनुवाद करना होता था. दूसरों के अंगरेजी में लिखे को जहाँ तक हो सके सुधारना होता था. नए नए शब्दों की ज़रूरत होती. लेखक के किसी एक शब्द के लिए मैं दूसरा कौन सा शब्द डालूँ, इस में कोशों से सहायता मिलती ही नहीं थी. अब रोजट में मुझे अधिकाधिक शब्द मिलने लगे.

पहले तो मैं रोजट की किताब केवल शब्द खोजने के लिए खोलता था. कोई भी पन्ना खोलता और ठगा सा रह जाता. फिर तो जब चाहे किताब खोलना, पढ़ना, पढ़ते रहना मेरे लिए लाभप्रद मनोरंजन बन गया.

तभी मैं ने चाहा था कि हिंदी में भी कोई ऐसी किताब हो.

हाँ, यह ज़रूर है कि तब मैं ने यह कभी नहीं सोचा था कि कभी पैंतालीस साल बाद एक दिन सन 1996 के दिसंबर में मैं और कुसुम भारत के पहले आधुनिक बृहद थिसारस समांतर कोश की पहली प्रति राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को भेंट करेंगे. यह सुखद घटना भी मुझे मिले इस ख़ज़ाने का तब अकल्पित अप्रत्याशित परिणाम थी.

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दिसंबर 1996 में तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर शंकर दयाल शर्मा को समांतर कोश की प्रतियाँ भेंट करते सहरचेता अरविंद कुमार और श्रीमती कुसुम कुमार...

रोजट को ही ले कर एक और बात यहीं कह दूँ. विषयांतर तो होगा पर ठीक रहेगा. पश्चिमी देश हमेशा दावा करते हैं कि कोशकारिता का आरंभ वहाँ हुआ था. वहाँ कोशों के किसी इतिहास में भारत का ज़िक्र नहीं होता. स्वयं रोजट इस भ्रम या सुखभ्रांति में थे कि उन का थिसारस संसार का पहला थिसारस है. पुस्तक छपते छपते उन्हों ने सुना कि संस्कृत में किसी अमर सिंह ने यह काम छठी सातवीं सदी में ही कर लिया था. कहीं से अमर कोश का कोई अँगरेजी अनुवाद उन्हों ने मँगाया, इधर उधर पन्ने पलट कर देखा और भूमिका में फ़ुटनोट में टिप्पणी कर दी कि 'मैं ने अभी अभी अमर कोश देखा, बड़ी आरंभिक क़िस्म की बेतरतीब बेसिरपैर की लचर सी कृति है.'

काश, वह यह बात समझ पाए होते कि हर कोश की तरह अमर कोश भी अपने समसामयिक समाज के लिए बनाया गया था.

शब्द संकलन

शब्दों के संकलन और कोश निर्माण की बात करें तो—

सभ्यता और संस्कृति के उदय से ही आदमी जान गया था कि भाव के सही संप्रेषण के लिए सही अभिव्यक्ति आवश्यक है. सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द का चयन आवश्यक है. सही शब्द के चयन के लिए शब्दों के संकलन आवश्यक हैं. शब्दों और भाषा के मानकीकरण की आवश्यकता समझ कर आरंभिक लिपियों के उदय से बहुत पहले ही आदमी ने शब्दों का लेखाजोखा रखना शुरू कर दिया था. इस के लिए उस ने कोश बनाना शुरू किया. कोश में शब्दों को इकट्ठा किया जाता है.

सब से पहले शब्द संकलन भारत में ही बने. हमारी यह शानदार परंपरा वेदों जितनी—कम से कम पाँच हज़ार साल—पुरानी है. प्रजापति कश्यप का निघंटु संसार का प्राचीनतम शब्द संकलन है. इस में 18 सौ वैदिक शब्दों को इकट्ठा किया गया है. निघंटु पर महर्षि यास्क की व्याख्या निरुक्त संसार का पहला शब्दार्थ कोश और विश्वकोश यानी ऐनसाइक्लोपीडिया है! इस महान शृंखला की सशक्त कड़ी है छठी या सातवीं सदी में लिखा अमर सिंह कृत नामलिंगानुशासन या त्रिकांड जिसे सारा संसार अमर कोश के नाम से जानता है.

भारत के बाहर संसार में शब्द संकलन का एक प्राचीन प्रयास अक्कादियाई संस्कृति की शब्द सूची है. यह शायद ईसा पूर्व सातवीं सदी की रचना है. ईसा से तीसरी सदी पहले की चीनी भाषा का कोश है ईर्या.

आधुनिक कोशों की नीवँ डाली इंग्लैंड में 1755 में सैमुएल जानसन ने. उन की डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज (Samuel Johnson's Dictionary of the English Language) ने कोशकारिता को नए आयाम दिए. इस में परिभाषाएँ भी दी गई थीं.

असली आधुनिक कोश आया इक्यावन साल बाद 1806. अमरीका में नोहा वैब्स्टर की ए कंपैंडियस डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज (Noah Webster's A Compendious Dictionary of the English Language) प्रकाशित हुई. इस ने जो स्तर स्थापित किया वह पहले कभी नहीं हुआ था. साहित्यिक शब्दावली के साथ साथ कला और विज्ञान क्षेत्रों को स्थान दिया गया था. कोश को सफल होना ही था, हुआ. वैब्स्टर के बाद अँगरेजी कोशों के रिवीज़न और नए कोशों के प्रकाशन का व्यवसाय तेज़ी से बढ़ने लगा. आज छोटे बड़े हर शहर में, विदेशों में तो हर गाँव में, किताबों की दुकानें हैं. हर दुकान पर कई कोश मिलते हैं. हर साल कोशों में नए शब्द शामिल किए जाते हैं.

अपने कोशों के लिए वैब्स्टर ने 20 भाषाएँ सीखीं ताकि वह अँगरेजी शब्दों के उद्गम तक जा सके. आप को जान कर आश्चर्य होगा और प्रसन्नता भी कि उन भाषाओं में एक संस्कृत भी थी. तभी उस कोश में अनेक अँगरेजी शब्दों का संस्कृत उद्गम तक वर्णित है. मैं पिछले तीस सालों से वैब्स्टर कोश का न्यू कालिजिएट संस्करण काम में ला रहा हूँ. मुझे इस में मेरे काम की हर ज़रूरी सामग्री मिल जाती है. यहाँ तक कि भारोपीय मूल वाले अँगरेजी शब्दों के संस्कृत स्रोत भी. समांतर कोश के द्विभाषी संस्करण द पेंगुइन इग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी पर काम करते करते कई बार तो अनपेक्षित जगहों पर भी शब्दों के संस्कृत मूल मिल गए. पता चला कि ईक्विवैले, बाईवैलेंट जैसे शब्दों के मूल में है संस्कृत का वलयन. एअर यानी हवा का मूल संस्कृत में है, सोनिक के मूल में हैं संस्कृत के स्वन और स्वानिक. कई बार मैं सोचता था--काश, डाक्टर रघुवीर की टीम ने और बाद में तकनीकी शब्दावली बनाने वाले सरकारी संस्थानों ने ये संस्कृत मूल जानने की कोशिश की होती! उन के बनाए शब्दों को एक भारतीय आधार मिल जाता और लोकप्रियता सहज हो जाती. ख़ैर, उन लोगों ने जो किया वह भी भागीरथ प्रयास था...

कोश कई तरह के होते हैं. किसी भाषा के एकल कोश, जैसे ऊपर लिखे अँगरेजी कोश या हिंदी से हिंदी के कोश. इन में एक भाषा के शब्दों के अर्थ उसी भाषा में समझाए जाते हैं. कोश द्विभाषी भी होते हैं. जैसे संस्कृत से अँगरेजी के कोश. सन 1872 में छपी सर मोनिअर मोनिअर-विलियम्स की (बारीक़ टाइप में 8.5"x11.75" आकार के तीन कालम वाले एक हज़ार तीन सौ तैंतीस पृष्ठों की अद्वितीय संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी इस का अनुपम उदाहरण है. या आजकल बाज़ार में मिलने वाले ढेर सारे अँगेरेजी-हिंदी कोश और हिंदी-अँगरेजी कोश. इन का उद्देश्य होता है एक भाषा जानने वाले को दूसरी भाषा के शब्दों का ज्ञान देना. जिस को जिस भाषा में पारंगत होना होता है या उस के शब्दों को समझने की ज़रूरत होती है, वह उसी भाषा के कोशों का उपयोग करता है.

कोशों के पीछे सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य भी होते हैं.

मोनिअर-विलियम्स के ज़माने में अँगरेज भारत पर राज करने के लिए हमारी संस्कृति और भाषाओं को पूरी तरह समझना चाहते थे, इस लिए उन्हों ने ऐसे कई कोश बनवाए. आज हम अँगरेजी सीख कर सारे संसार का ज्ञान पाना चाहते हैं तो हम अँगरेजी से हिंदी के कोश बना रहे हैं. हमारे समांतर कोश और उस के बाद के हमारे ही अन्य कोश भी हमारे दैश की इसी इच्छा आकांक्षा के प्रतीक हैं, प्रयास हैं.

शब्दकोश और थिसारस में अंतर

अच्छा कोश हमें शब्द का मर्म समझाता है. एक से अधिक अर्थ देता है, और कभी एक से ज़्यादा समानार्थी शब्द भी. लेकिन ये एकाधिक शब्द कोई बहुत ज़्यादा नहीं होते. बड़े कोश भाषा समझने के लिए शब्दों की व्युत्पत्ति भी बताते हैं. कुछ कोश प्रिस्क्रिपटिव या निदानात्मक निदेशात्मक कहलाते हैं. वे यह भी बताते हैं कि अमुक शब्द आंचलिक है, सभ्य है या अशिष्ट. वे शब्द के उपयोग की विधि भी बताते हैं. ऐसे आधिकारिक कोश मैं ने हिंदी में नहीं देखे हैं.

कोशकारिता पूरी तरह सामाजिक प्रक्रिया है. हर कोश अपने समसामयिक संदर्भ में रचा जाता है. कोशकार को ध्यान रखना पड़ता है कि उस का उपयोग करने वाले लोगों की ज़रूरतें क्या हैं, वह कोश को किस संदर्भ में देखेगा, उस से लाभ उठाएगा. जो कोश बच्चों के लिए लिखा गया है वह ऐम.ए. के छात्र के लिए नाकाफ़ी है. वनस्पति शास्त्र या भौतिकी के विद्यार्थी को जो कोश चाहिए उस में किसी भी फल, पेड़, वस्तु के बारे में वैज्ञानिक जानकारी होनी चाहिए. बच्चों के कोश में किसी शब्द के मोटे मोटे अर्थ लिखे जा सकते हैं. उच्च स्तर के कोश में परिभाषाएँ भी होनी चाहिएँ. प्रसंगवश यहाँ मैं बस इतना ही संकेत करूँगा कि अभी तक हिंदी के किसी कोश में परिभाषाओं का स्तर संतोषजनक नहीं है... न हिंदी के किसी एकल कोश में, न किसी अँगरेजी-हिंदी कोश में...

मैं ने अपने संपादन काल में अनुभव किया कि शब्दकोश से हमें लेखन में, संपादन में बहुत सहायता नहीं मिलती. अनुवाद में भी जो सहायता मिलती है वह आधी अधूरी होती है. संक्षेप में मैं यही कह सकता हूँ कि शब्दार्थ कोश लेखक के लिए नहीं होता. वह उस के काम आता है जो किसी अज्ञात शब्द का अर्थ जानना चाहता है या वह विद्यार्थियों के काम की चीज़ है.

लेखन में, अनुवाद में, संपादन में काम आते हैं थिसारस.

19वीं सदी के बीच में अँगरेजी थिसारसों की परंपरा बनाई रोजट ने संसार के पहले आधुनिक थिसारस की रचना कर के. 20वी सदी के अंतिम छोर पर हिंदी में इस तरह का पहला और बृहद काम था हमारा समांतर कोश - हिंदी थिसारस. और अब 21वीं सदी के सातवें वर्ष में हम ने इस में एक नई कड़ी जोड़ी है द्विभाषी थिसारस बना कर है. वह है द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी.

कोश और थिसारस के क्षेत्र अलग अलग हैं. दोनों में बहुत अंतर होता है.

एक सूत्र वाक्य में कहें तो शब्दकोश शब्द को अर्थ देता है, थिसारस अर्थ को, विचार को, शब्द देता है.

मुझे रात के लिए अँगरेजी शब्द चाहिए तो मैं हिंदी-अँगरजी कोश खोलूँगा. यदि नाइट की हिंदी चाहिए तो इंग्लिश-हिंदी डिक्शनरी काम में लाऊँगा. लेकिन मुझे रात का पर्यायवाची चाहिए, या दिन का, या राम का, या रावण का... या मुझे समय बताने वाले किसी उपकरण का नाम चाहिए, तो क्या वह कोश में मिल सकता है? मैं जानता हूँ, और आप भी जानते हैं, कि इस दिशा में कोई कोश हमारी कैसी भी मदद नहीं करता. यहाँ काम आता है थिसारस.

थिसारसकार यह मान कर चलता है कि उसे काम में लाने वाले किसी लेखक, अनुवादक, विज्ञापन लेखक, या आप को और मुझे--भाषा आती है. लेकिन हमें किसी ख़ास शब्द की तलाश है. वही रात वाला उदाहरण आगे बढ़ाता हूँ. मुझे रात नहीं तो रात का कोई और शब्द आता होगा, जैसे रजनी. नहीं तो मुझे शाम याद होगी, सुबह याद होगी. या दिन याद होगा. अब मुझे क्या करना है? बस थिसारस के अनुक्रम खंड में इन में से कोई एक शब्द खोज कर उस का पता नोट करना है. हमारे थिसारसों में क्यों कि थिसारस खंड और अनुक्रम अलग अलग जिल्दों में हैं, तो बस वह पेज खोल कर अपने सामने रखना है जहाँ वह शब्द है और उस का पता लिखा है. उस पते पर थिसारस में ढेर सारे शब्द मिल ही जाएँगे. रजनी से ता हम सीधे रात तक पहुँचेंगे, शाम, सुबह या दिन तो भी मैं एक दो पन्ने आगे पीछे पलट कर वहीं पहुँचेंगे जहाँ रात के सारे शब्द लिखे हैं. ये सभी उदाहरण मैं ने अपने समांतर कोश से लिए हैं. शीघ्र ही यह बात और स्पष्ट हो जाएगी.

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समांतर कोश

थिसारसों में सामाजिक संदर्भ मुख्य होते हैं. थिसारस बनाने वाले का काम है कि इन संदर्भों की तलाश करे. ओर अपनी किताब में इन का संकलन करे. उसे अपने समाज की मानसिकता के आधार पर काम करना होता है. एक चीज़ के लिए बहुत सारे लिंक बनाने होते हैं, ताकि किताब का उपयोग करने वाला किसी भी जगह से, कोण से, मनवांछित शब्द तक पहुँच सके. कई बार ये लिंक फ़ालतू से, जाने पहचाने से अनावश्यक लग सकते हैं. पर यही थिसारस की जान होते हैं.

अमर कोश पर अपनी कुख्यात टिप्पणी देते समय रोजट इसी तथ्य को नज़रअंदाज़ कर गए थे. मुझे शक़ है कि जीवन भर वह थिसारस के इस मर्म को समझ पाए या नहीं. अमर कोश का गठन प्राचीन भारत में वर्णों पर आधारित समाज में हुआ था. उस से सामाजिक सरोकार के एक दो उदाहरण देता हूँ. अमर कोश में संगीत नैसर्गिक गतिविधि है, वह हमें स्वर्ग वर्ग में मिलता है. लेकिन संगीतकार की गिनती शूद्र वर्ग में की गई है. गाय की गिनती जानवरों में नहीं है वैश्य वर्ग में है क्यों कि तब वैश्यों का कर्म था. इसी प्रकार हाथी राजाओं की सवारी होने के कारण क्षत्रिय वर्ग में है. यह उचित ही था. उस ज़माने के भारतीय हर चीज़ को वर्णों के आधार पर याद रखते थे. पर ये संदर्भ 21वीं सदी में हमें एक से दूसरे भाव तक नहीं ले जाते.

हम ने समांतर कोश को बनाया मानव मात्र के मन में रहने वाले सहज परस्पर संबंधों के आधार पर. जैसे: कुछ शीर्षक इस क्रम से सामने आते हैं--

ब्रहमांड, आकाश, आकाश पिंड...सौर मंडल, सूर्य चंद्रमा...पृथ्वी, भूगोल, मैदान मरुथल...

जब हम काल संबंधी शब्द कोटियों के पस पहुँचते हैं तो कुछ शीर्षक हैं...

काल, शाश्वतता, अशाश्वतता... युग... पंचाग... दिन, रात

अपनी बात और स्पष्ट करने के लिए अब मैं पेश करता हूँ, दिन और रात शीर्षकों में मिलने वाले सभी शब्दों की सूची--

दिन

53.11. दिन सं अहोरात्र सूर्याभिमुख काल, उजाला, दिनमान, दिवस, द्यौ, सूर्यकाल, सूर्योदय-सूर्यास्त काल, lअपराह्न, lपूर्वाह्न, lप्रातःकाल, lमध्याह्न, lसायंकाल, lदिवस, lधूप, lप्रकाश, tरात.

53.22. त्रिसंध्या सं त्रिकाल, त्रैकाल्य, दिन तीन भाग, संध्या.

53.33. त्रिसंध्या (सूची) सं प्रातःकाल, मध्याह्न काल, सायंकाल.

53.44. तड़का सं कुकड़ू कूँ, झुटपुटा, दिनमुख, दिनागम, निशावसान, पौ, प्रभात, प्रभात काल, बिहान, भिनसार, भुरहटा, भुरहरा, सफ़ेदा, सहर, सुबह, सूर्योदय काल, lप्रातःकाल, lब्राह्म मुहूर्त, lसूर्योदय.

53.55. प्रातःकाल सं अरुण काल, उषाकाल, कलेवा काल, दिनारंभ, पहला पहर, प्रभात, प्रातः, भोर, विहान, सकाल, सबेरा, सवेरा (विकल्प), सुबह, lपूर्वाह्न, lसूर्योदय, lझुटपुटा, lतड़का, lब्रेकफ़ास्ट, lमध्याह्न, tसायंकाल, tसूर्यास्त.

53.66. वाराणसी प्रातःकाल सं वाराणसी पूजाकाल, सुबहे बनारस, tअवध सायंकाल, tमालवा रात.

53.77. मध्यरात्रि के बाद के कुछ घंटे सं मध्यरात्रि उपरांत काल, lब्राह्म मुहूर्त.

53.88. ब्राह्म मुहूर्त सं ब्रह्ममुहूर्त, ब्रह्मरात्र, रात के पिछले पहर के अंतिम दो दंड, lतड़का, lमध्यरात्रि के बाद के कुछ घंटे.

53.99. पूर्वाह्न सं दुपहर, दोपहर, पूर्वाह्न काल, प्रातर्दिन, बारह बजे से पहले, मध्याह्न पूर्वकाल, lमध्याह्न, tअपराह्न.

53.1010. संगव बेला सं गाय चरने जाना समय, दोहन काल, संगव, संगव मुहूर्त, lग्वाला, tगोधूलि बेला.

53.1111. मध्याह्न सं जून, दिन के बारह बजे, दिनार्ध, दुपहर, दुपहरिया, दुपहरी, दोपहर, भरी दुपहर, मध्यंदिन, लंच टाइम, lपूर्वाह्न, lलंच, tअपराह्न, tमध्य रात्रि.

53.1212. अपराह्न सं अपराह्न काल, टी टाइम, तिजहरी, तिपहर, तिपहरी, तीसरा पहर, पराह्न, मध्याह्न उपरांत काल, lसायंकाल, tपूर्वाह्न.

53.1313. गोधूलि बेला सं आरंभिक सायंकाल, गाय चर कर लौटना समय, गो आगमन समय, गोधूलि, बाल संध्या, सायं संध्या, tसंगव बेला.

53.1414. सायंकाल सं अस्तकाल, दिन अंत, दिनांत, दिनास्त, दिवसांत, दिवसावसान, निशादि, प्रदोष काल, विभावरी मुख, शाम, संझा, संध्या, संध्याकाल, साँझ, सांध्यकाल, सायं, lअपराह्न, lझुटपुटा, lरात, lसूर्यास्त, tप्रातःकाल, tसूर्योदय.

53.1515. अवध सायंकाल सं लखनवी शाम, शामे अवध, lमालवा रात, tवाराणसी प्रातःकाल.

53.1616. झुटपुटा सं दिन रात संधिकाल, संगम काल, संधिकाल, संध्या, lप्रातःकाल, lरात, lसायंकाल.

53.1717. प्रातःकाल होना क्रि अँधेरा छँटना, चाँदना होना, दिन निकलना, पौ फटना, प्रभात होना, रात बीतना, lउदित होना.

53.1818. सायंकाल होना क्रि अंधकार छाना, अँधेरा छाना, दिन डूबना, दिन ढलना, दिन बीतना, रात पड़ना, lअस्त होना.

53.1919. दिवसकालीन वि उजाले का, दिन का, दिनीय, दिवसीय, सूर्यकालीन, tरात्रिकालीन.

53.2020. दिन भर चलने वाला वि दिन भर का, पूरे दिन चलने वाला, lएक दिवसीय, lपूर्ण दिवसीय, tपूर्णरात्रीय.

53.2121. दिनचर वि दिवाचर, दिवाटन, tरात्रिचर.

53.2222. प्रातःकालीन वि आरंभिक, उदयकालीन, उषाकालीन, पूर्वाह्निक, प्रभातकालीन, प्रभातीय, प्रातःकालिक, प्रातःकालीय, प्राभातिक, मार्निंग, सहरी, सूर्योदयकालीन, lमध्याह्नीय, tसायंकालीन.

53.2323. मध्याह्नीय वि उद्दिनीय, दिनार्धीय, दिवामध्यीय, दोपहरी का, मध्यंदिन, lप्रातःकालीन, lसायंकालीन.

53.2424. सायंकालीन वि अस्तकालीन, वैकालिक, शाम का, सँझवाती, सँझैया, संध्याकालिक, संध्याकालीन, सांध्य, सायंकालिक, सायंतन, सूर्यास्तकालीन, lमध्याह्नीय, tप्रातःकालीन.

53.2525. प्रातःकाल में क्रिवि अँधेरे मुँह, अलस्सुबह, गजर दम, जल्दी, तड़के, दिन निकलते निकलते, दिन निकले, निन्ने मुँह, पौ फटते, पौ फटे, प्रभात में, प्रातःकाल, भिनसारे, भुरहरे, मुँह अँधेरे, सकारे, सबेरे, सवेरे (विकल्प), सहरदम, सिदौसी, सुबह, सुबह दम, सुबह सबेरे, सुबह सुबह, lपूर्वाह्न में, tदेर रात में, tसायंकाल में.

53.2626. पूर्वाह्न में क्रिवि एऐम, दोपहर से पहले, मध्याह्न से पहले, सुबह, lप्रातःकाल में, tअपराह्न में.

53.2727. अपराह्न में क्रिवि पीऐम, शाम को, सायंकाल, lसायंकाल में, tपूर्वाह्न में.

53.2828. सायंकाल में क्रिवि अँधेरा होने पर, चिराग़ जले, दिन ढले, दिया जले, पीऐम, रात पड़े, शाम, शाम को, सँझोखैं, सरे शाम, सायं, सायंकाल, lअपराह्न में, lजल्दी रात में, lदेर रात में, lरात में, tप्रातःकाल में.

रात

54.11. रात सं अंधकार, अँधेरा, अमा, अहोरात्र सूर्यविमुख काल, कलापिनी, कालिमा, क्षपा, ज्योतिष्मती, ज्योत्स्ना, तमस्विनी, तमा, तमिस्रा, तमी, त्रियामा, नक्त, निशा, निशि, निशीथ, निशीथिनी, यामा, यामिनी, यामी, याम्या, रजनी, रत-, रतिया, रात्रि, रैन, रैना, रैनी, वासुरा, विभावरी, शब, शयन काल, शर्वरी, श्यामा, सूर्यास्त से सूर्योदय तक काल, lअमावस रात, lपूर्णिमा रात, lमध्य रात्रि, lअंधकार, lचाँदनी, lनिद्रा, lसूर्यास्त, tदिन, tप्रकाश.

54.22. अमावस रात सं अँधेरी रात, अचंद्रा, अमावस, अमावस्या, कालनिशा, चंद्रमाहीन रात, श्यामा, lदीवाली, lरात, tचाँदनी, tपूर्णिमा रात.

54.33. पूर्णिमा रात सं चौदहवीं की रात, पूनम, पूनों, पूनौं, पून्यो, पूरा चाँद रात, पूर्णिमा, राका, lशरद पूर्णिमा, lहोली, lचाँदनी, tअमावस रात.

54.44. मालवा रात सं शबे मालवा, lअवध सायंकाल, tवाराणसी प्रातःकाल.

54.55. मध्यरात्रि सं अधरात, अर्धनिशा, अर्धरात्रि, आधी रात, निशीथ, निशीथिनी, महानिशा, महारात्र, रात के बारह बजे, lरात, tमध्याह्न.

54.66. रात्रिकालीन वि तमीय, नक्तीय, निशीथीय, यामिनीय, रजनीय, रत-, रात्र, रात्रीय, tदिवसकालीन.

54.77. पूर्णरात्रीय वि पूरी रात चलने वाला, रत-, रात भर चलने वाला, रात्रीय, tदिन भर चलने वाला.

54.88. रात्रिचर वि तमचर, नक्तंचर, निशाचर, निशाटन, निशाद, निशिचर, यामिनीचर, tदिनचर.

54.99. रात्रिभक्षी वि निशाद, रात्रिभोजी, lराक्षस.

54.1010. रात में क्रिवि अँधेरे में, रात, lदेर रात में, lसायंकाल में.

54.1111. जल्दी रात में क्रिवि दिन ढले, शाम, lसायंकाल में.

54.1212. देर रात में क्रिवि गई रात, गए वक़्त, देर में, देर रात, देरी से, रात बिरात, lसायंकाल में, tप्रातःकाल में.

ये उदाहरण मैं ने समांतर कोश का संकलन क्रम दरशाने के लिए पहले तो शीर्षक सूची से और बाद में संदर्भ खंड से लिए हैं. अंतिम उद्धरण कोश के डाटा की विशदता दिखाने के लिए ही लिखा है. इतना विशद न हो तो थिसारस आज के भारत के आधुनिक हिंदी भाषी की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता.

ऊपर के उद्धरण में आप ने देखा कि एक रात शब्द हमें किस तरह अमावस, पूर्णिमा, शरद ऋतु और मालवा की रातों के नए भाव देता है और काल रात्रि जैसी अप्रत्याशित सूचना भी देता है. कभी लोग सोचते थे कि उम्र के सत्ततरवें साल के सातवें महीने की रात काल की रात होती है. वह कट जाए तो आदमी अभी और जिएगा!

थिसारसकार हमेशा अपने सामाजिक परिदृश्य में काम करता है, और उस हर वर्ग और समाज के, शहर के और गाँव के सभी तरह के उपयोक्ताओं की माँग को पूरा करने के ख्याल से शब्द संकलित करने होते हैं.

समांतर कोश का उपयोग हिंदी शब्दावली को समृद्ध करने के लिए छात्र काम में लाते रहे हैं. लेखन में और अनुवाद में भी यह सहायक सिद्ध हुआ है.

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द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी

लेकिन लोगों का कहना था कि उन हिंदी भाषियों के लिए जो आज के समाज की इच्छाओं के अनुरूप अँगरेजी ज्ञान बढ़ाना चाहते हैं, और उन अहिंदी भाषियों के लिए जो हिंदी सीख रहे हैं समांतर कोश से आगे कुछ और होना चाहिए. जैसे कोई द्विभाषी इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस और डिक्शनरी होती तो अच्छा रहता. ऐसा कोई कोश हो तो अनुवादकों की और अधिक सहायता मिल जाएगी. वह न केवल अँगरेजी से हिंदी में अनुवाद करने में और भी ज्यादा मददगार साबित होगा, बल्कि हिंदी से अँगरेजी अनुवाद में भी काम आएगा.

मित्रो, अनुवाद को ले कर बहुत से चुटकुले बनाए गए हैं, चतुर उक्तियाँ कही गई हैं. मूल के प्रति किसी अनुवाद के सच्चा और निष्ठापूर्ण होने को ले कर सतरहवीं सदी के फ़्राँसीसी अनुवादक निकोलस पैरो दा'ब्लाँकोर (Nicolas Perrot d'Ablancourt) की पुरुषवादी उक्ति कुछ अधिक ही प्रसिद्ध है--

"les belles infidèles," to suggest that translations, like women, could be either faithful or beautiful, but not both at the same time.

इस निबंध को लिखते समय मैं ने इस उक्ति का पहला अनुवाद किया, "अनुवाद किसी स्त्री की तरह या तो निष्ठापूर्ण हो सकता है या सुंदर! एक साथ दोनों नहीं." मैं इसे सुधारना चाहता था. मुझे निष्ठापूर्ण शब्द इस जगह कुछ मैं कुछ जँचना नहीं रहा था, कुछ और रखना चाहता था.

मैं अपने नवप्रकाशित द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी की शरण में गया. मैं जाँचना चाहता था कि यह कोश अनुवाद में कितना सहायक है, किसी एक भाव के लिए मुझे कितने विकल्प, कितने शब्द, कैसे शब्द देता है!

तो मैं ने दूसरा खंड इंग्लिश-हिंदी डिक्शनरी ऐंड इंडैक्स खोला. उस में faithful फ़ेथफ़ुल के 23 विकल्प दिए थे.

मैं इन में से किसी पर भी जा सकता था. लेकिन मैं ने loyal (निष्ठावान) 759.11 चुना, क्योंकि निष्ठावान मेरे लिखे निष्ठापूर्ण के सब से निकट था. कोश के पहले खंड इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस के 759वें शीर्षक में 11वें उपशीर्षक से शुरू हो रहा था नीचे लिखे शब्दों और विकल्पों का ख़ज़ाना...

759.1111. loyal adj attached, authentic, bona fide, conscientious, consistent, constant, dedicated, dependable, devoted, dutiful, ethical, fair, faithful, fast, firm, genuine, good, heart-whole, honest, infallible, intrinsic, level, moral, pledged, principled, pukka, reliable, resolute, responsible, right, righteous, right-minded, sincere, single-hearted, solid, sound, steadfast, steady, tried, tried and true, true, truehearted, trustworthy, unchanging, unfailing, unfaltering, unflinching, unshrinking, unswerving, unwavering, veracious, lhonest, lsingle-minded, ltrustworthy, tdeceitful, tdishonest, tdisloyal, tdubitable, topportunistic, ttreacherous.

759.1111. निष्ठावान वि अनवसरवादी, अपरिवर्तनशील, अविचल, ऊँचा/ऊँची, खरा/खरी, छलहीन, नमकहलाल, -निष्ठ, निष्ठापूर्ण, नेकदिल, नेकनीयत, -पर, -परायण, पाबंद, फ़रमाबरदार, बामुरौवत, बावफ़ा, भरोसेमंद, -रक्त, -राता/-राती, वफ़ादार, विश्वसनीय, विश्वस्त, सच्चा/सच्ची, सच्चे दिल का, समर्पित, स्थिर, lएकनिष्ठ, lप्रतिबद्ध, lविश्वसनीय, lसंकल्पशील, lस्वामीभक्त, tनिष्ठाहीन, tविश्वासघाती.

759.1212. loyal (to the master) adj faithful, loyal, loyal (to the crown), sincere, slavish, toady, lloyal.

759.1212. स्वामीभक्त वि टोड़ी, फ़रमाबरदार, वफ़ादार, विश्वस्त, सत्तानिष्ठ, सत्ताभक्त, स्वामीभक्तिपूर्ण, lनिष्ठावान.

759.1313. single-minded adj die-hard, dogmatic, fixed, hard and fast, loyal to a single idea, loyal to a single person, loyal to a single purpose, staunch, with one aim, with one purpose, lloyal, lresolute, tdissolute.

759.1313. एकनिष्ठ वि अटल, अडिग, अनन्य, अनन्यपरायण, एकाश्रयी, चट्टानी, दृढ़, lनिष्ठावान, lलगनशील, lसंकल्पशील, tविचलनशील.

759.1414. committed adj bent, bent on, dedicated, determined, devoted, eager, faithful, hard-line, intent, intent on, -minded, pledged, plighted, set on, sincere, single-minded, ldogmatic, lfull of striving, lhardworking, lloyal, lpersevering, lresolute, tirresponsible, tuncommitted.

759.1414. प्रतिबद्ध वि आमादा, उतारू, उद्धत, कटिबद्ध, कट्टर, कृतसंकल्प, गंभीर, जाँनिसार, तत्पर, तैयार, दृढ़, नधा/नधी, -निष्ठ, पक्का/पक्की, स्थिर, lधीर, lपरिश्रमी, lलगनशील, lसंकल्पशील, lसन्नद्ध, tअप्रतिबद्ध, tदायित्वहीन.

759.1515. deceitless adj aboveboard, all right, artless, candid, childlike, clean, cleanhanded, conscientious, correct, deceptionless, fair, fair and square, forthright, fraudless, genuine, guileless, harmless, honest, innocent, just, level, moral, on the level, open, openhearted, pretenceless, reliable, right, righteous, scrupulous, sincere, transparent, true, uncalculating, undesigning, veracious, wileless, lhonest, ljust, lrighteous, ltransparent, ltrue, ltrustworthy, tdishonest, thypocritical, ttraitorous, tunfair, twicked.

759.1515. छलहीन वि अकुटिल, अछल, ईमानदार, कपटहीन, खुला/खुली, खुले दिल वाला, छलकपटहीन, निशठ, निश्छल, निष्कपट, नेकदिल, भद्र, भला/भली, मासूम, विश्वसनीय, शुद्ध, शुद्धहृदय, शुद्धाशय, सच्चा/सच्ची, सच्चे दिल का, सरल, साँचा/साँची, साफ़, साफ़दिल, सिद्दीक़, सीधा/सीधी, सीधा सादा/सीधी सादी, हानिहीन, lपारदर्शी, lविश्वसनीय, lसत्यप्रेमी, tकुटिल, tछलपूर्ण, tपाखंडपूर्ण, tबनावटी.

759.1616. impartial adj detached, disinterested, egalitarian, equable, equidistant, equitable, evenhanded, fair, fair and square, fair-minded, honest, indiscriminative, judicious, just, level, neutral, nonpartisan, objective, on the fence, open-minded, reasonable, right, straight, unbiased, uncommitted, uninterested, uninvolved, unprejudiced, upright, legalitarian, lfair-minded, ljust, lnonaligned, tfactionalist, thaving vested interest, tinequitable, tpartial, tselfish, tunjust.

759.1616. निष्पक्ष वि अनपेक्ष, अपक्षपाती, अलगथलग, उदासीन, तटस्थ, तुल्यदर्शी, निरपेक्ष, न्यायपूर्ण, पक्षपातहीन, भेदभावहीन, समचेता, समदर्शी, lगुटहीन, lन्यायप्रिय, lभेदभावहीन, lसमव्यवहारी, tगुटबाज़, tपक्षपातपूर्ण, tस्वार्थी.

759.1717. loyally adv conscientiously, constantly, devotedly, earnestly, faithfully, from the bottom of one's heart, genuinely, sincerely, staunchly, steadfastly, steadily, unfalteringly, with allegiance, with constancy, with fidelity, lregularly, lreligiously, lresponsibly.

759.1717. निष्ठापूर्वक क्रिवि अडिगतः, अविचलतः, एकनिष्ठतः, एकभावतः, दिल से, निष्ठतः, निष्ठा से, लगातार, वफ़ादारी से, हार्दिकतः, lदायित्वपूर्वक, lधार्मिकतः, lनियमिततः.

उपशीर्षक 11 में ही मुझे बावफ़ा शब्द मिला. शायरी में वफ़ा, बेवफ़ाई आदि बहुत चलते हैं. पिछले अनुवाद को सुधार कर मैं ने अब लिखा--अनुवाद किसी स्त्री की तरह या तो बावफ़ा हो सकता है या सुंदर! एक साथ दोनों नहीं.

बावफ़ा लिख दिया तो इसे और भी सुधारने का मन किया. मैं ने उक्ति को फिर से लिखा--अनुवाद माशूक़ा की तरह या तो बावफ़ा होगा या ख़ूबसूरत... एक साथ दोनों नहीं. ब्लांकोर की छोटी सी उक्ति के पीछे जो अकथित भाव था, वह यही था कि वफ़ा और ख़ूबसूरती एक साथ देखे नहीं मिलतीं.

यह एक छोटा सा उदाहरण है इस बात का कि द्विभाषी थिसारस को कारगर होना है तो विशद और विस्तृत होने के साथ साथ उस की शब्दावली की विविधता भी उतनी ही ज़रूरी है. अगर हर तरह की शब्दावली को शामिल नहीं किया गया तो वह पूरा काम नहीं कर पाएगा. न तो वह लेखक को संबद्ध विचारों तक ले जा सकेगा, न नए से नया शब्द सुझा सकेगा. अनुवाद सुधारने में भी यह तभी समर्थ उपकरण सिद्ध होगा, जब इन शर्तों को पूरा करे.

मुझे इस कोश से कई भावी संभावनाएँ नज़र आती हैं. कुछ देर के लिए हम इसे रा मैटीरियल मान लें. और सोचें कि अब हमारे पास एक कामचलाऊ ढाँचा है, नीवँ है. इस के अँगरेजी डाटा के सहारे हम हिंदी को एक तरफ़ सभी अहिंदी भाषाओं से जैसे जापानी, फ़्राँसीसी, जरमन, रूसी से जोड़ सकते हैं, दूसरी तरफ़ हिंदी डाटा के सहारे भारत की सभी भाषाओं से जोड़ सकते हैं.

जब यूनिकोड ने कंप्यूटर पर जापान, चीन से ले कर सुदूर पश्चिम की हवाई लिपियों को जोड़ दिया तो सब भाषाएँ क्यों नहीं जोड़ी जा सकतीं? यह सवाल मुझे खाए जा रहा है. यह काम कोई दस बीस साल में पूरा होने वाला नहीं है. हमारे सामने डच भाषा के कोश हेत वूर्डनबीक डेर नीडरलांड्ष ताल (संक्षेप में डब्लूऐनटी) (het Woordenboek der Nederlandsche Taal (WNT)). का उदाहरण है. इस पर काम शुरू हुआ 1864 में और 134 साल बाद पूरा हुआ 1998 में. तो कहीं कोई इच्छा हो, कहीं से कई पीढ़ियों तक अच्छे आर्थिक अनुदान की संभावना हो, जैसे यूऐनओ से, तो मानव जाति यह कर दिखा सकती है. क्यों नहीं?

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संपर्क:

--अरविंद कुमार, सी-18 चंद्र नगर, गाज़ियाबाद 201011

samantarkosh एट gmail.com

परिचय:

अरविंद कुमार

जन्म: 17 जनवरी 1930. मेरठ, उत्तर प्रदेश

शिक्षा: ऐम.ए. (अँगरेजी साहित्य)

हिंदी भाषा को संस्कृत के अमर कोश और रोजट के अँगरेजी थिसारस जैसा बृहद् समांतर कोशहिंदी थिसारस और अब द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी देने वाले और आजकल हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना के अवैतनिक प्रधान संपादक अरविंद कुमार लेखक, कवि, समीक्षक, अनुवादक, पत्रकार रहे हैं.

मिडिल क्लास तक की शिक्षा मेरठ में हुई. 1943 में उन के समाज सुधारक और स्वतंत्रता सैनिक पिता श्री लक्ष्मण स्वरूप काम की तलाश में सपत्नीक दिल्ली चले आए. कुछ दिन बाद अरविंद कुमार ने दिल्ली से 1945 में मैट्रिक पास किया. चार विषयों मेंहिंदी, संस्कृत, गणित, इतिहास और अँगरेजीमें डिस्टिंक्शन प्राप्त किया. उन्हें इस बात का गर्व है कि मैट्रिक में उन के हिंदी शिक्षक थे पंजाबी के शीर्ष कवि स्वर्गीय डाक्टर हरभजन सिंह, जिन्हों ने तब करोल बाग़ के खालसा हाई स्कूल में अध्यापन आरंभ ही किया था.

अरविंद ने अपना कार्य जीवन मैट्रिक का परीक्षा फल आने से पहले ही 1 अप्रैल 1945 से पंदरह वर्ष की उमर में एक बाल श्रमिक के रूप में दिल्ली के प्रसिद्ध मुद्रणालय (दिल्ली प्रैस) में डिस्ट्रब्यूटिंग कंपोज़िंग सीखने से आरंभ किया. कुछ ही महीनों में दिल्ली प्रैस से हिंदी की पारिवारिक पत्रिका सरिता का प्रकाशन आरंभ हुआ. संपादन विभाग तक पहुँचने के लिए अरविंद ने छः साल तक कंपोज़ीटर, मशीनमैन, कैशियर, टाइपिस्ट और प्रूफ़रीडर के तौर पर काम किया. साथ साथ वे सायंकालीन संस्थानों में पढ़ भी रहे थे. सरिता में उप संपादक से सहायक संपादक और फिर दिल्ली प्रैस की ही प्रसिद्ध अँगरेजी पत्रिका कैरेवान में सहायक संपादक पद पर वे सन 1963 के मध्य तक रहे. उन की देखरेख में उर्दू सरिता और हिंदी मुक्ता का प्रकाशन भी आरंभ हुआ.

कैरेवान के बाद अरविंद मुंबई के टाइम्स आफ़ इंडिया से हिंदी की फ़िल्म पत्रिका माधुरी का संपादन आरंभ करने चले गए. समकालीन हिंदी संपादकों के संपर्क से तो बहुत कुछ सीखा ही, फ़िल्म उद्योग के गुणी निर्देशकों, कलाकारों और संगीतकारों की रचना प्रक्रिया को नज़दीक से देखा. कला फ़िल्मों के आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे. उसे समांतर सिनेमा नाम उन्हों ने ही दिया था.

1978 में समांतर कोश की रचना को पूरा समय देने के लिए वे माधुरी का संपादन त्याग कर सपरिवार दिल्ली चले गए. समांतर कोश के लिए कहीं से कोई आर्थिक अनुदान या सहायता नहीं मिल रही थी. दिल्ली की बाढ़ में फँसने के बाद घर बदल कर ग़ाज़ियाबाद चले गए. बिगड़ती आर्थिक स्थिति को सँभालने के लिए एक बार फिर 1980 से कुछ बरसों के लिए पत्रकारिता की ओर रुख़ किया. रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण सर्वोत्तम आरंभ किया. 1985 से एक बार फिर से समांतर कोश को पूरा समय देना शुरू किया.

आजकल केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, की हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना के अवैतनिक प्रधान संपादक हैं. योजना के अंतर्गत हिंदी परिवार की ब्रजभाषा, भोजपुरी, राजस्थानी, बुंदेली, अवधी, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली जैसी 48 भाषाओं के कोश बन रहे हैं. अभी पहली चार भाषाओं के लिए कोशकर्मी क्षेत्र में जा कर शब्दों का संकलन कर रहे हैं. अरविंद अपने घर चंद्रनगर ग़ाज़ियाबाद से ही काम करते हैं, और जब तब आगरा मुख्यालय जाते रहते हैं.

कोश कर्म में अरविंद को शुरू से ही अपने परिवार का पूरा समर्थन और सहयोग मिलता रहा. पहले ही दिन से पत्नी कुसुम सहकर्मी बनीं. बाद में बेटे सुमीत (ऐमबीबीऐस, ऐमऐस) ने कोश के डाटा के कंप्यूटरन का ज़िम्मा ले लिया. बेटी मीता (ऐमए, न्यूट्रीशन, और पोषण विशेषज्ञ) ने समांतर कोश के हिंदी मुख शब्दों के अँगरेजी समकक्ष लिख कर द्विभाषी थिसारस की नीवँ डाली और पुस्तक के प्रकाशन के लिए पेंगुइन इंडिया से लेखकों की ओर से संपर्ककार की भूमिका निभाई.

कुसुम कुमार

जन्म: 8 दिसंबर 1936. मेरठ, उत्तर प्रदेश

शिक्षा: बीए, ऐलटी

कुसुम ने मेरठ के रघुनाथ गर्ल्स कालिज से आगरा विश्व विद्यालय से बी.ए. और ऐल.टी. किया. दिल्ली प्रशासन के सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षक रहीं. 1964 में वे अरविंद कुमार के पास मुंबई चली गईं. समांतर कोश की परिकल्पना के समय से ही वे सभी कोश ग्रंथों से पूरी तरह जुड़ी हैं.

टिप्पणियाँ

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  1. अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण और एपयोगी लेख के लिए अन्‍तर्मन से आभार । एक सांस में इसे पढ पाना इच्छित तो है किन्‍तु सम्‍भव नहीं । इसका प्रिन्ट आउट निकाल कर पढना पडेगा ।
    हां, कुछ मित्रों को इसे फारवर्ड कर रहा हूं ।

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  2. आकार, सूचना-घनत्व एवं उपयोगिता आदि सभी दृष्टियों से महान लेख ! अरबिन्द कुमार जी की आत्मकहानी सुनकर महान वैज्ञानिक फैराडे की याद आ गयी - वह भी 'बुक बाइन्डिंग्' का काम करते-करते इतना महान काम कर गए और महोपयोगी सिद्धान्त दे गये।

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,1137,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1957,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,686,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,722,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,72,साहित्यम्,4,साहित्यिक गतिविधियाँ,193,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,73,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: अरविंद कुमार का आलेख : शब्द और भाषा
अरविंद कुमार का आलेख : शब्द और भाषा
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