शिवराज गूजर की लघुकथा : नजरिया

नजरिया

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‘‘देखो तो कैसे ठूंस-ठूंस कर भर रखी है सवारियां। कोई मरे तो मरे इनका क्या? इन्हें तो बस सवारियों से मतलब है।’’ आती-जाती बसों की स्थिति पर बगल में खड़े शर्माजी कंडक्टरों और बस मालिकों को कोस रहे थे। इसी दौरान उनकी बस आ गई। उसकी हालत औरों से खराब थी। शर्माजी बस की ओर लफ। मैंने कहा, ‘‘शर्माजी बहुत भीड़ है, पीछे वाली में चले जाना।’’

‘‘पीछे वाली कौन सी खाली आएगी। उसका भी यही हाल होगा। ऐसे इंतजार करता रहा तो जा लिया दफ्तर।’’ बात पूरी होने तक शर्मा जी बस पर लटक चुके थे एक पैर पर।

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संपर्क:

शिवराज गूजर

१५, हिम्मतनगर, जयपुर

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चित्र : कलाकृति – साभार वनवासी सम्मेलन, भोपाल

1 टिप्पणी "शिवराज गूजर की लघुकथा : नजरिया"

  1. बहुत ही अच्‍छी सीख देती कहानी। खाने का बैगन कुछ और होता है बताने का कुछ और।

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