कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता : ठेंगा

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ठेंगा

डा. कान्ति प्रकाश त्यागी

 

जब तक था उनको काम,पैरों का छूते थे वो अंगूठा

अब मतलब निकल गया, तो दिखा रहे हैं वो अंगूठा

अंगूठे को, आम भाषा में कहते हैं ठेंगा

नहीं मालूम, कौन किसको दिखाता ठेंगा

औरत आदमी की, पहचान बता रहा ठेंगा

किसी को बायें हाथ का लगाना पड़ता ठेंगा

किसी को दायें हाथ का लगाना पड़ता ठेंगा

अदालत में पढ़े लिखों को लगाना पड़ता ठेंगा

जो हैं बिल्कुल अंगूठा छाप

वही हैं ,आज़ के माई बाप

अगर वे पैरों का भी लगाए

तो भी उनकी ही जमेगी धाक

भूख से व्याकुल पुत्र, चूस रहा था अंगूठा

इसीलिए गुरु ने, गुरुदक्षिणा में मांगा अंगूठा

एकलव्य ने , काट पैरों में रखा अंगूठा

वन वन भटका बेचारा लिए कटा अंगूठा

गुरु ने अगर मांगा होता उसका अंगूठा

हस्तिनापुर, द्रोण को अवश्य दिखाता अंगूठा

चक्र चलाते हुआ घायल कृष्ण अंगूठा

साड़ी वस्त्र से द्रौपदी ने रक्त को रोका

अगर ऊपर उठाया ठेंगा, तो जीत समझो

अगर झुका दिया ठेंगा, तो हार समझो

पकड़नी है कोई ची़ज़, काम रहा ठेंगा

आपके के दृढ़ इरादे, बता रहा है ठेंगा

कार्यालयों में उपस्थिति दिखा रहा ठेंगा

मिलेगा नहीं वेतन,यदि नहीं दिखाया ठेंगा

विद्युत धारा समझाने में काम आता ठेंगा

दुनिया के अच्छे बुरे काम कराता ठेंगा

कहीं कोई दिखा रहा है ठेंगा

कहीं कोई लगा रहा है ठेंगा

कहीं कोई बज़ा रहा है ठेंगा

कहीं कोई कटा रहा है ठेंगा

होता अंगूठा, तो कैसे बज़ती चुटकी

चुटकी भर नमक, फिर क्यूं मांगे छुटकी

बिन अंगूठे, दुल्हन कैसे पहनाती अंगूठी

बिना अंगूठी बदले शादी, फिर होती अनूठी

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Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP

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