मंगलवार, 4 नवंबर 2008

कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता : ठेंगा

ठेंगा

डा. कान्ति प्रकाश त्यागी

 

जब तक था उनको काम,पैरों का छूते थे वो अंगूठा

अब मतलब निकल गया, तो दिखा रहे हैं वो अंगूठा

अंगूठे को, आम भाषा में कहते हैं ठेंगा

नहीं मालूम, कौन किसको दिखाता ठेंगा

औरत आदमी की, पहचान बता रहा ठेंगा

किसी को बायें हाथ का लगाना पड़ता ठेंगा

किसी को दायें हाथ का लगाना पड़ता ठेंगा

अदालत में पढ़े लिखों को लगाना पड़ता ठेंगा

जो हैं बिल्कुल अंगूठा छाप

वही हैं ,आज़ के माई बाप

अगर वे पैरों का भी लगाए

तो भी उनकी ही जमेगी धाक

भूख से व्याकुल पुत्र, चूस रहा था अंगूठा

इसीलिए गुरु ने, गुरुदक्षिणा में मांगा अंगूठा

एकलव्य ने , काट पैरों में रखा अंगूठा

वन वन भटका बेचारा लिए कटा अंगूठा

गुरु ने अगर मांगा होता उसका अंगूठा

हस्तिनापुर, द्रोण को अवश्य दिखाता अंगूठा

चक्र चलाते हुआ घायल कृष्ण अंगूठा

साड़ी वस्त्र से द्रौपदी ने रक्त को रोका

अगर ऊपर उठाया ठेंगा, तो जीत समझो

अगर झुका दिया ठेंगा, तो हार समझो

पकड़नी है कोई ची़ज़, काम रहा ठेंगा

आपके के दृढ़ इरादे, बता रहा है ठेंगा

कार्यालयों में उपस्थिति दिखा रहा ठेंगा

मिलेगा नहीं वेतन,यदि नहीं दिखाया ठेंगा

विद्युत धारा समझाने में काम आता ठेंगा

दुनिया के अच्छे बुरे काम कराता ठेंगा

कहीं कोई दिखा रहा है ठेंगा

कहीं कोई लगा रहा है ठेंगा

कहीं कोई बज़ा रहा है ठेंगा

कहीं कोई कटा रहा है ठेंगा

होता अंगूठा, तो कैसे बज़ती चुटकी

चुटकी भर नमक, फिर क्यूं मांगे छुटकी

बिन अंगूठे, दुल्हन कैसे पहनाती अंगूठी

बिना अंगूठी बदले शादी, फिर होती अनूठी

----

Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------