गुरुवार, 20 नवंबर 2008

बलराम अग्रवाल का आलेख : पं. श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की लघुकथाएं

पं. श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की लघुकथाएं

बलराम अग्रवाल

साहित्य की धारा कुछ-कुछ पृथ्वी की गति जैसी होती है, जो अपनी धुरी पर भी घूमती है और आगे भी बढ़ती है; अर्थात इसमें आलोड़न और उद्वेलन साथ-साथ चलते हैं। इसलिए कालान्तर में, पीछे छूट गई या आगे निकल आई विस्मृत मान ली गई साहित्य-धाराओं से भी जा-आ मिलती है। तात्पर्य यह कि आवश्यक नहीं कि किसी साहित्य की प्रवृत्ति को उसके रचनाकाल के दौरान ही जान और समझ लिया जाए। चेखव की रचनाओं का उचित मूल्यांकन उनकी मृत्यु के उपरांत ही हो सका। वस्तुत: लेखक जिस मन्तव्य के साथ सर्जन करता है, उस मन्तव्य को अलग रखकर उसकी रचनाओं का उचित आकलन असंभव है।

आकलन की उपेक्षा के ऐसे दौर को हिंदी लघुकथा ने भी सहा है। अव्वल तो पूर्व-कथाकारों द्वारा स्वतन्त्र कथा-प्रकार के रूप में लघुकथा-सर्जना कम ही हुई; परन्तु जितनी भी हुई, अवांछनीय बिखराव के साथ। विचाराभिव्यक्ति या कथाभिव्यक्ति के समय शाब्दिक-सघनता पर ध्यान केन्द्रित करने की स्थिति में उस काल का साहित्य संभवत: नहीं था। हिंदी साहित्योत्थान का वह शैशव जैसा ही काल था। कथा के सन्दर्भ में तो यह धारणा शब्दश: सही प्रतीत होती है। हिंदी का प्रारम्भिक कथा-साहित्य वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक ही अधिक है। आज की दृष्टि से देखें तो उसमें विरलता भी है। वस्तुत: आकारगत लघुता उस काल में प्रचलन से परे की चीज थी। अत: वैसी कथा-रचनाओं को आकलन योग्य भी नहीं माना गया और शायद इसीलिए तत्कालीन लेखकों ने लघ्वाकारीय रचना-कर्म से स्वयं को यथासंभव दूर रखना ही बेहतर समझा। लघ्वाकारीय रचना-कर्म से दुराव की यह मानसिकता कुछेक मौकों को छोड़कर पिछ्ली सदी में सातवें दशक के उत्तरार्द्ध तक बनी रही। लघ्वाकारीय हिंदी कथा-रचनाओं के बारे में पहली टिप्पणी संभवत: प्रेमचंद के द्वारा कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की लघु कथा-रचनाओं के बारे में सामने आई, परन्तु इससे स्थिति में कोई रचनात्मक परिवर्तन नहीं आया। मिश्र जी स्वयं तो जरूर लगे रहे, अपने समय के अन्य कथाकारों को इस ओर प्रवृत्त होने की प्रेरणा न तो दे सके और न ही बन सके। हालाँकि लगभग सभी महत्वपूर्ण कथा-लेखकों ने लघ्वाकारीय कथा-सर्जना की है—भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सुदर्शन, माखनलाल चतुर्वेदी आदि सभी ने; परन्तु इनमें से किसी के भी इस कार्य का अलग से कभी आकलन नहीं हुआ। ‘परिहासिनी’(1875-76) में प्रकाशित भारतेन्दु हरिचन्द्र की हासात्मक व गंभीर लघ्वाकारीय रचनाओं पर भी हमारी दृष्टि ‘भारतेन्दु समग्र’ के प्रकाशनोपरांत 1985 में ही पड़ पाई यानी मूल पुस्तक के प्रकाशन के लगभग 110 वर्ष बाद। वह भी इसलिए कि एक स्वतंत्र कथा-विधा के रूप में लघुकथा तब तक अपनी अस्मिता सिद्ध कर चुकी थी।

भारतेन्दु के उपरांत गुलेरी जी एक और महत्वपूर्ण कथाकार हैं जिनकी पर्याप्त( 17 या 18) लघ्वाकारीय कथा-रचनाएँ खोज ली गई हैं।गुलेरी साहित्य के खोजी डा. मनोहर लाल के अनुसार—उन्होंने अपने निबन्धों, लेखों, और पत्रों में यत्र-तत्र पुराणों, धर्मग्रन्थों तथा संस्कृत-साहित्य के दृष्टान्तों के रूप में कुछ लघुकथाएं उद्धृत की हैं। गुलेरी जी की लघुकथाओं के संबंन्ध में यह कथन विशेष महत्व रखता है क्योंकि कथित रूप से उनके द्वारा लिखी लघुकथाओं में से अधिकांश जैन आचार्य सोमप्रभसूरि द्वारा संवत 1241 में रचित संस्कृत-ग्रंथ कुमारपालप्रतिबोध तथा आचार्य मेरुतुंग द्वारा संवत 1361 में रचित संस्कृत-ग्रंथ प्रबंधचिन्तामणि के श्लोकों की व्याख्या हेतु संदर्भ-कथा के रूप में प्रयुक्त हुई हैं।

यद्यपि जिस तरह से ‘परिहासिनी’ की रचनाओं को लघुकथा मानने न मानने जैसी मत-भिन्नता है, वैसी ही गुलेरी जी की लघुकथाओं के बारे में भी हो सकती है, तथापि ऐसी मत-भिन्नता का मुख्यत: एक ही कारण होता है—आलोचक का दृष्टि-संकोच। वह ‘आज’ की दृष्टि से इन रचनाओं की भाषा, शैली, शिल्प, कथानक और उसके विस्तार को परखता है। जिस काल में लिखी गई रचना को उसने आकलन के लिए उठाया है, उस काल की रचनाशील प्रवृत्तियों, क्षमताओं और विवशताओं को उनकी सम्पूर्ण व्यापकता और गहनता के साथ महसूस करने के लिए अपने ज्ञान और संवेदन-तन्तुओं को उस काल से जोड़ने की क्षमता जब तक वह अपने भीतर पल्लवित नहीं करेगा, रचना का उचित एवं न्यायपूर्ण विवेचन नहीं कर पाएगा। किसी भी रचना के उचित एवं न्यायपूर्ण आकलन के लिए आलोचक का न सिर्फ रचना और उसके काल से बल्कि रचनाकार और उसकी प्रवृत्तियों से भी जुड़ाव आवश्यक है। अफ्रीकी-गुरिल्लाओं के आचरण, चरित्र, स्वभाव और प्रवृत्तियों पर शोध कर रही जर्मन जीवविज्ञानी जंगल में गुरिल्ला-समूह का पीछा करते हुए मनुष्य-जैसा व्यवहार करने की बजाय गुरिल्ला-जैसा पशुवत-व्यवहार ही करती है। मस्तिष्क से वह मनुष्य होती है और व्यवहार से पशु। गुरिल्ला-समूह में घुल-मिल जाने के लिए, निकट से उनके हर पक्ष का अध्ययन करने के लिए उसकी गुरिल्लावत चेष्टाएँ ही उसको सफल बना सकती हैं। गुरिल्लाओं के बीच भी उसे अगर मानव के रूप में अपने विकसित और सभ्य हो जाने का रौब गाँठे रखना है तो उन्हें उनके हाल पर छोड़कर उसे अपनी विकसित और सभ्य दुनिया में लौट जाना चाहिए।

गुलेरी जी की लघु कथा-रचनाओं का काल सन 1904 से 1922 तक बताया जाता है। भारतीय स्वातन्त्र्यान्दोलन के ये महत्वपूर्ण वर्ष हैं। 1915 में गांधीजी का भारत में पदार्पण हो चुका था। पूरा देश राष्ट्रप्रेम की भावना और उनके आह्वानों से इस कदर आन्दोलित था कि 1920 में उनके असहयोग-आन्दोलन से प्रेरित होकर प्रेमचन्द तक ने सरकारी-सेवा को सलाम कह दिया था, ऐसा हम पढते हैं। विश्व-परिदृश्य को लें तो प्रथम विश्वयुद्ध, रूसी-क्रान्ति और वहाँ पर ज़ारसाही का खात्मा आदि अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ उसी काल में घटित मिलती हैं। ऐसे उद्वेलनकारी काल में गुलेरी जी ने जिन कथानकों को उठाया—ऊपरी तौर पर बेशक वे कालानुरूप तेवर प्रस्तुत नहीं करते, परन्तु यह बात ध्यान देने योग्य है कि गुलेरी जी का अपना व्यक्तित्व क्या है? रचना के किसी भी स्तर पर क्या वे हमें अधीर होते नजर आते है? उनकी कालजयी कृति ‘उसने कहा था’ को ही लें—किशोरावस्था के प्रेम को लहनासिंह अंत तक अपने हृदय में पाले रखता है, लेकिन शरतचन्द्र के देवदास की शैली में नहीं। बचपन की उस घटना और उस लड़की को वह जैसे भूल ही चुका था, अगर सूबेदारनी होरां खुद ही अपने-आप को उसके आगे प्रकट न कर देती और अपने पति और पुत्र की रक्षा का अनुरोध न कर बैठती। बचपन की घटना के पच्चीस साल बाद हुई यह अचानक भेंट और अनुनय उसे पुन: जज्बे के उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं जिस पर अपनी जान की परवाह न करते हुए एक दिन उसने ताँगे के नीचे आती लड़की की जान बचाई थी। पच्चीस साल पहले फूटा प्रेम का अंकुर हरहरा उठता है और शेष जीवन का वह जैसे उद्देश्य ही निश्चित कर लेता है। सूबेदार हजारासिंह से मृत्यु के निकट पहुँच चुके लहनासिंह के वे शब्द—सुनिए तो, सूबेदारनी होरां को चिट्ठी लिखो तो मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उन्होंने कहा था, मैंने वही किया—हमें गुलेरी जी के सरल व्यक्तित्व के दर्शन तो कराते ही हैं, उन्हें सकारात्मक दिशा का कथाकार भी सिद्ध करते हैं। युद्ध और उसके क्षेत्र की समस्त विभीषिकाओं के बीच, यहाँ तक कि मृत्यु-मुख में पड़े होने की स्थिति में भी वह प्रेम और आदर्शों की रक्षा हेतु प्राणाहुति में विश्वास करते हैं। शरतचन्द्र का देवदास भी वचन का पालन करता है। उसका तो प्राणांत भी पारो की ससुराल में ही होता है, परन्तु वह नकारात्मक दिशा का नायक है। दोनों कथाकारों की प्रवृत्तियाँ भिन्न हैं इसलिए ‘उसने कहा था’ का नायक देवदास नहीं है, लहनासिंह है। ‘उसने कहा था’ शाब्दिक चमत्कार, लहनासिंह के भौतिक या आदर्श प्रेम या फिर प्रेमिका के साथ वचनबद्धता के निर्वाह मात्र की कहानी नहीं है। वह एक ऐसे व्यक्तित्व का चित्रांकन है, जो अपनी धीरता और निष्ठा-परायणता में हर दृष्टि से सकारात्मक और पूर्ण है। वह न युद्ध-क्षेत्र की विभीषिका से हिलता है और न लम्बे समयोपरांत प्रेमिका से अचानक भेंट हो जाने की असीम प्रफुल्ल्ता से। वह सागर-तल-सा धीर और सहज है। यही कारण है कि गुलेरी जी घोर राजनीतिक उथल-पुथल के काल में भी सहज लेखन करते हैं। वह न उच्छृंखल और नकारात्मक प्रेम के गीत गाते हैं और न हिंसक-अहिंसक मारा-मारी के। वह सहज रहते हैं, लेकिन एक तेवर के साथ। उनका तेवर ‘महर्षि’ के ‘अर्शी तमुक’ का तेवर है जो 1904 में भी, जबकि साधु-संयासियों के प्रति आमजन की अंधश्रद्धा आज की तुलना में कहीं अधिक रही होगी, चरणों में गेरुआ बूट, देह में रेशमी कंबल और मुँह पर चिकनी दाढ़ीधारी ‘महर्षि अमुकानन्द सरस्वती’ पर तुरन्त कटाक्ष करने से नहीं चूकता। ‘महर्षि’ में अर्शी तमुक के माध्यम से महर्षि अमुकानन्द सरस्वती पर ही नहीं—‘बरक्कत’ में वेश्या के माध्यम से राजा भोज पर भी वह वैसा ही कटाक्ष करते हैं। ‘बरक्कत’ और ‘राजा की नीयत’ पात्रों के बदलाव के साथ एक ही कथानक की दो रचनाएँ प्रतीत होती हैं।

गुलेरी जी की लघु कथा-रचनाओं में अधिकांशत: तो प्रचलित लोककथाओं और किंवदन्तियों पर ही आधारित हैं। यह कहते हुए हमें यह भी ध्यान रखना है कि इन रचनाओं पर हम इनके रचनाकाल के 100 साल से भी अधिक समय बाद अपनी टिप्पणी दे रहे हैं, अर्थात इतने वर्ष बाद जबकि कोई रचना जनमानस में रच-बस कर स्वयं किंवदन्ती बन जाती है। कई को हम बालकथा के रूप में रेखांकित कर सकते हैं तो एकाध को चुटीले हास्य के रूप में। उनकी इन रचनाओं के आधार पर हमारे सामने उनका विनोदी, संस्कारप्रिय, शालीन, कटाक्षप्रिय और मुँहफट-रसिक व्यक्तित्व उभरकर आता है। एक ऐसा व्यक्तित्व जो न स्त्रियों से चुहल(शक्कर का चूर्ण) के मौके हाथ से जाने देता है और न शिक्षक-समुदाय पर कटाक्ष(भूगोल) करने के। उनकी लघु कथा-रचनाओं में एकरूपता या स्तरीय विविधता जैसी कुछ चीज नजर आने की बजाय हमें अगर बिखराव और बचकाना प्रयास जैसा कुछ नजर आता है तो उसका एक कारण तो हम ऊपर लिख ही आए हैं—आलोचक का दृष्टि-संकोच। दूसरा यह कि इन कथाओं की प्रस्तुति के काल में(अर्थात 1904 से 1922 के दौरान) आज की तरह का बारीक विभाजन साहित्य की विधाओं के बीच नहीं था; तथा तीसरा यह कि इन रचनाओं को उन्होंने अपने लेखों, टिप्पणियों और निबंधों में संदर्भ के रूप में उद्धृत किया गया है, स्वतंत्रत: नहीं लिखा। उस काल का रचनाकार स्वयं को यथाक्षमता हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में संलग्न रखना ही पर्याप्त समझता था और वैसा ही वह करता भी था। साहित्य के वर्गीकरण का या सोद्देश्य वर्गीकृत-साहित्य की रचना का विचार-मात्र भी उस काल के लेखक के मस्तिष्क में संभवत: न आता हो। वर्गीकृत साहित्य-सृजन का विचार रहा होता तो भारतेंदु हरिश्चन्द्र (परिहासिनी:1875-76) से लेकर प्रेमचन्द के निधन(1936) तक अनगिनत लघुकथाएँ और लघुकथा-संग्रह आज हमें उपलब्ध होते।

आज हम अनावश्यक शब्दप्रयोग और शाब्दिक-लफ़्फ़ाजी से लघुकथा को बचाए रखने की बात करते हैं। न सिर्फ़ बात करते हैं, बल्कि उसे कार्यरूप में परिणत भी करते हैं। इस प्रयास में कुछ लेखक स्वयं को आधे-अधूरे वाक्य प्रस्तुत करने की हद तक स्वतंत्र मान लेते हैं, तो कुछ शब्द-प्रयोग में संकुचित होते-होते कथा के अंत:प्रभाव तक को नष्ट कर डालते हैं। अतिरिक्त शब्दों और वृत्तांत-वर्णन पर अंकुश रखते हुए अनावश्यक रूप से लम्बी हो जाने की आशंकापूर्ण कहानी को लघ्वाकारीय समापन देने की अवधारणा को परोक्षत: प्रस्तुत करने वाले गुलेरी जी संभवत: पहले कथाकार हैं। इस दिशा में ‘कुमारी प्रियंकरी’ उनकी महत्वपूर्ण कथा-रचना है तथा इस विचार की पहली लघुकथा भी। इस रचना का समापन-वाक्य—‘ऐसा ही एक मिल गया और कहानी कहानियों की तरह चली’ उस काल की लेखकीय चेतना के हिसाब से अद्भुत ही कहा जाएगा। इस वाक्य को पढ़ते ही पाठक-मन आगे की समस्त कहानी से एकात्म होना प्रारम्भ हो जाता है। कोई भी लघुकथा, जो पुस्तक के पृष्ठ पर समाप्त होकर पाठक के मनोमस्तिष्क में प्रारम्भ हो जाए, सही अर्थों में लघुकथा है। गुलेरी जी अगर आगे की रचना भी लिख डालते तो वह एक सामान्य रचना होती, जैसी कि उस काल में और आज भी, अनेक प्रचलित हैं। परन्तु इस समापन को पाकर यह पाठक की संवेदनाओं को दूर तक झंकृत करती है। अपनी वृत्ति और कल्पनाशीलता के अनुरूप वह जिस स्तर और सीमा तक चाहे, इस कथा का विस्तार महसूस करे और आनन्दित या उदास होता रहे।

विलासी और अकर्मण्य लोग। हजरत मूसा तक के गम्भीर सिद्धांतों और धर्मोपदेशों को मुँह चिढ़ाते लोग। तेषां न विद्या न तपो न दानं—ऐसे लोगों के बारे में कहा गया है कि—ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगा:चरन्ति। ‘बन्दर’ के माध्यम से गुलेरी जी का भी यही प्रतिपाद्य है—‘वे सब मनुष्य बन्दर हो गये। अब वे जगत की ओर मजे से मुँह चिढ़ाते हैं और चिढ़ाते रहेंगे।’

‘कर्ण का क्रोध’ महाभारत की कथा है और ‘साँप का वरदान’ एक किंवदन्ती। किंवदन्तियों का लोक-साहित्य में विशेष स्थान है। वे अनेक सूत्रों, उक्तियों और मुहावरों की वाहक होती हैं। ‘राजा धीरजसिंह’ नामोच्चारण मात्र से मार्ग में अचानक मिल गया साँप मनुष्य पर आक्रमण नहीं करता—इस लोकधारणा को ‘साँप का वरदान’ में कथारूप दिया गया है।

एक कथाकार के रूप में गुलेरी जी एक सजग और आडंबरहीन सामाजिक का दायित्व निर्वाह करते हैं। अंध-मतावलम्बियों की तरह गैर-मतावलम्बियों पर आक्षेप न करते रहकर धर्माडम्बरों के खिलाफ़ वह कबीरपंथी रवैया अपनाते हैं। एक सौ से भी कम शब्दों की कथा-रचना ‘पोपदेव’ को उन्होंने एक दृष्टांत के माध्यम से प्रस्तुत किया है। यद्यपि यह भी एक संदर्भ-कथा ही है; फिर भी, इस तरह का कथा-प्रयोग आज का लघुकथा-लेखक भी अभी तक शायद न कर पाया हो। मात्र दस पंक्तियों को तीन पैराग्राफ में विभाजित करके लिखी गई इस कथा-रचना (रचनाकाल:1904) में पहले दो पैराग्राफ में तीसरे पैराग्राफ को पुष्ट करने हेतु एक दृष्टांत प्रस्तुत किया गया है। कथा का ऐसा प्रस्तुतिकरण सिर्फ तभी संभव है जब उसका लेखक आम जीवन में भी इतना ही मुँहफट हो। ‘पोपदेव’ का उल्लेखनीय पक्ष यह है कि दृष्टांत जितना स्पष्ट है, नैरेटिंग उतनी ही सांकेतिक, सारगर्भित और तीखी। गुलेरी जी के इस कौशल और…इस सादगी पे कौन न मर जाए ए खुदा, करते हैं क़त्ल हाथ में तलवार भी नहीं। पोप यानी ईसाई धर्माचार्य का दृष्टांत देकर हिंदू-धर्मावलंबी धूर्त की कलुषता को जाहिर करना उन्हें लघुकथा को गौरवशाली परम्परा प्रदान करने वाला लेखक बनाता है। लघुकथा लेखन में ऐसा कौशल आज भी वांछित है।

‘पाठशाला’ बाल-मनोविज्ञान की जैसी यथार्थ कथा है, वैसी सरल और सहज कथाएँ हिन्दी-साहित्य में बहुत नहीं हैं। बालक को उसके बचपन से काटकर एक अलग इकाई के रूप में नहीं देखा जा सकता। प्रधान अध्यापक का एकमात्र पुत्र वस्तुत: ऐसा ही बालक है, जिसे धार्मिक, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, सामाजिक आदि सभी विषयों के प्रमुख सूत्र, प्रश्न और उनके उत्तर रटा दिये गये हैं। पिता की दृष्टि में वह घर का चिराग अपूर्व गौरवानुभूति देनेवाला है और अध्यापकों तथा दर्शकों की दृष्टि में विलक्षण बुद्धिवाला। ऐसे में, वृद्ध महाशय उसे उसकी यथार्थ-अवस्था का ज्ञान कराते हैं—“कहा कि तू जो ईनाम माँगे, वही दें।” बालक के मुख पर रंग परिवर्तन होता है। हृदय में कृत्रिम और स्वाभाविक भावों की लड़ाई की झलक आँखों में दिखाई देती है। पिता और अध्यापक सोचते हैं कि पढ़ाई का वह पुतला(न कि सहज और स्वाभाविक बचपन की सरलता से परिपूर्ण बालक) कोई पुस्तक माँगेगा। और बालक है कि विस्मित है। कुछ माँगने जैसा प्रस्ताव तो उसके सामने आज तक कभी रखा ही नहीं गया था! सिवा इसके कि यह करो, वह करो; यह रटो, वह रटो—कुछ और तो पिता, अभिभावक या किसी अध्यापक के मुख से उसने सुना हि नहीं। कुछ माँगने का प्रस्ताव सुनकर उसका बचपन लौट आता है और ‘कुछ खाँसकर’ गला साफ कर नकली परदे के हट जाने से स्वयं विस्मित होकर बालक धीरे-से कहता है, “लड्डू”। लेखक का मन प्रसन्नता से खिल उठता है कि बालक से छीन लिया गया उसका बचपन लौट आया। उसकी भावनाओं को नैरेटर इस तरह व्यक्त करता है—“इतने समय तक श्वास घुट रहा था। अब मैंने सुख की साँस ली…। बालक बच गया…क्योंकि वह ‘लड्डू’ की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था…।” मुल्कराज आनन्द की बहुचर्चित कहानी ‘द लोस्ट चाइल्ड’ भी इस लघुकथा के समक्ष संभवत: हल्की पड़े।

‘भूगोल’ और ‘शक्कर का चूर्ण’ गुलेरी जी की विनोदप्रिय और शालीन प्रकृति को उजागर करती रचनाएँ हैं। जन्मतिथि के हिसाब से ‘भूगोल’ लेखन के समय(1914 में) वह इकतीस वर्ष के रहे होंगे और ‘शक्कर का चूर्ण’ लिखने के समय(1921 में) अड़तीस वर्ष के। इस उम्र में पहुँचकर भी ऐसे विनोदपूर्ण क्षणों को अपने हाथ से खिसकने नहीं देते। आज हम शब्दों की शालीनता और उनके सांकेतिक प्रभाव को भूलकर साहित्य में यह नहीं, वह नहीं लिखने की बहस चलाते हैं; और गुलेरी जी 1921 में भी सहज लेखन करते हैं। सच यह है कि उनके पास ओढे हुए क्षण नहीं हैं। मामूली और सामाजिक-पारिवारिक दृष्टि से असंस्कारी नजर आते विनोदपूर्ण क्षण, जो किसी कच्चे लेखक की लेखनी पाकर अश्लील या सतही प्रस्तुति के रूप में सामने आते, गुलेरी जी की लेखनी से उद्भूत होकर ‘शक्कर का चूर्ण’ जैसी गुदगुदी रचना बन जाते हैं। गुलेरी जी वस्तुत: लेखक होने का छ्द्म पालकर रचना-कर्म में संलग्न नहीं होते।

‘शक्कर का चूर्ण’ के साथ ‘स्त्री का विश्वास’ को पढ़ने से लगता है जैसे किसी लम्बी कहानी को लिखने की योजना बनाते-बनाते गुलेरी जी ने उसके दो बिन्दुओं को नोट्स के रूप में अलग-अलग लिख लिया हो। बहरहाल, उनके न रहने पर इन्हें अब दो अलग-अलग रचनाएँ ही कहा जाएगा। ‘स्त्री का विश्वास’ वस्तुत: स्त्री(मृणालवती) द्वारा विश्वासघात की कथा न होकर भयातुर और प्रेम-प्रदर्शन में कायर स्त्री के चरित्र की कथा है। मुंज बंदी बनाया गया और उसे गली-गली भीख माँगने का कष्ट उठाना पड़ा तो मृणालवती के कायर चरित्र के कारण नहीं, उसको पाने की अपनी कामना के कारण। मृणालवती का चरित्र यहाँ पर ‘आकाशदीप’(जयशंकर प्रसाद) की मधूलिका के चरित्र से यद्यपि एकदम भिन्न प्रकृति का है। मधूलिका राष्ट्र के प्रति कर्तव्य-बोध से पूरित एक ऐसी युवती है जो राजा के सामने ही अपने प्रेमी का हाथ थाम लेने का साहस रखती है, जबकि मृणालवती न तो राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य-बोध से पूरित है—‘भागते समय मुंज ने मृणालवती से कहा कि मेरे साथ चलो…उसने कहा कि गहनों का डिब्बा ले आती हूँ।’(स्त्री का विश्वास) और न ही प्रेम-प्रदर्शन में परिपक्व—‘…और अपनी अधेड़ उमर के विचार से उसके चेहरे पर म्लानता आ गयी।’(शक्कर का चूर्ण)। कुल मिलाकर ‘स्त्री का विश्वास’ का शीर्षक इस कथा की अन्त:भावना के अनुरूप नहीं है।

आज के युग में धन-प्राप्ति ही मनुष्य के लिए स्वर्ग-प्राप्ति जैसी महत्वपूर्ण कामना है। उसके लिए वह परहित तालाब आदि खुदवाने का पाखण्ड करता है,(छाया और फल वाले) पेड़ लगवाने का ढोंग रचता है और यज्ञबलि के नाम पर निरीह पशुओं की हत्या करता है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं—जो जस करहि सो तस फल चाखा। ‘बकरे का स्वर्ग’ में यही बात गुलेरी जी कहते हैं—‘वही(बकरा मारने का यज्ञ चलानेवाला) रुद्र शर्मा पाँच बार बकरे की योनि में जन्म लेकर अपने पुत्र से मारा जा चुका है। यह छ्ठा भव(जनम) है।’ अर्थात जन्म, मृत्यु और कर्मफलानुसार पुनर्जन्म—यह एक निरन्तर प्रक्रिया है जो चलती ही रहती है।

अपनी लघुकथाओं में गुलेरी जी ने जीवन के लगभग हर पक्ष को छुआ है—इतिहास, दर्शन, परम्परा, शासकीय कूटनीतिपरक आदेश, चाटुकारिता, धूर्तता, अकर्मण्यता, लालसा, कामना, भोग, विलासिता और मूर्खता आदि सब पर। ‘जन्मान्तर कथा’ में वह व्यवसाय और उसके द्वारा धन संचय की कामनाओं तथा प्रयासों के साथ धर्म का जुड़ाव भी आवश्यक मानते हैं। भारतीय-दर्शन जीवन के चार पद, जिन्हें पुरुषार्थ कहा गया है, स्वीकार करता है—अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। अर्थात धर्मप्राणहीन व्यक्ति अर्थ-संचय करके भी दरिद्र है। कहिल कबाड़ी की पत्नी सिंहला उससे कहती है—‘देवाधिदेव युगादिदेव की पूजा करो, जिससे जन्मान्तर में दारिद्र्य दुख न पायें।’ पति धर्म-प्राण से हीन अधीर अर्थ-संचयी है। वह पत्नी को धर्म-गहली कहता है। वह वैसे ही व्यवहारवाली है भी। इसीलिए वह मानसिक सन्तोष के साथ जीती है। और जन्मान्तर में सुख-सुविधापूर्ण जीवन व्यतीत करनेवाली राजकुमारी बनती है। पति दरिद्र ही रहता है। वस्तुत: ‘जब आवै सन्तोष-धन, सब धन धूरि समान’। धन के प्रति संतोष और असंतोष की स्थिति ही जन्मान्तर(कथा) है।

कोई भी विद्या बुद्धि के सान्निध्य और उपयोग के बिना अधूरी है। ‘विद्या से दु:ख’ में पशु-पक्षियों की भाषा की जानकार बहू का यही कष्ट है। वह विद्या की जानकार तो है, बुद्धिमती नहीं। श्रगाल के कहने पर आधी रात को नदी में बहते मुर्दे के गहने ले आने का लोभ-संवरण वह नहीं कर पाती और श्वसुर द्वारा देख लिए जाने पर कुलटा(अ-सती) सिद्ध होकर परित्यक्त होने की स्थिति तक जा पहुँचती है—‘वह(श्वसुर) उसे पीहर पहुँचाने ले चला।’ अपनी बुद्धिहीनता और निर्णय को कार्यरूप देने के लिए सही समय का चुनाव न कर पाने की अक्षमता के परिणामस्वरूप ही अगली बार वह विद्या से प्राप्त जानकारी का लाभ प्राप्त करने की बजाय हताश ही अधिक होती है।

सवाल यह पैदा होता है कि ‘पाठशाला’ के स्तर की लघुकथा रचने वाले गुलेरी जी ने साधारण कथा-किस्सा लगने जैसी ‘न्याय रथ’ और ‘न्याय घंटा’ क्यों लिखीं? शायद इसलिए कि हर युग, हर काल में ये कथाएँ ज्यों की त्यों घटित होती हैं। शिकार को ठिठोली की तरह इस्तेमाल करनेवाली नूरजहाँ द्वारा तीर चलाकर धोबी की हत्या कर देना और अपने ‘न्याय’(?) की कहानियाँ लिखानेवाले शाहजहाँ द्वारा न्याय-प्राप्ति की गुहार लगानेवाली धोबिन से यह कहना कि उसने तेरे पति की हत्या की, तू उसके पति की कर दे, धूर्ततापूर्ण न्याय है। ऐसे ही धूर्ततापूर्ण न्याय की कथा है—‘न्याय रथ’। ऐसे धूर्त निर्णयों के आगे आमजन की स्थिति निरीह गाय से कम बेबस नहीं है। ‘न्याय घंटा’ को समझने के लिए उसमें गहरे पैठने की आवश्यकता है। अर्थ-गांभीर्य और उसकी व्याख्या के स्तर पर यह उतनी उथली रचना नहीं है जितनी कि प्रतीत होती है। कौए की प्रकृति है कि वह सोए हुए या जुगाली करते हुए अपेक्षाकृत बड़े शरीरवाले गाय-भैंस आदि पशुओं के शरीर पर बैठकर उन पर रेंगते छोटे-मोटे कीड़ों को खा लिया करता है या फिर उनके कान के आसपास बैठकर उनकी गूग(कान के भीतर की मैल) ही कुरेदता और खाता रहता है। उसके इस कार्य से पशुओं को वैसा ही आनन्द प्राप्त होता है जैसा कि मालिश करानेवाले या गूगिया से कान कुरेदवाने वाले मनुष्य को प्राप्त होता है। अर्थात इस कार्य-व्यवहार में कौए और पशु दोनों के अपने-अपने स्वार्थ ही निहित होते हैं। अपनी इस वृत्ति के अनुरूप अपनी चोंच के द्वारा कौआ सोए हुए सिंहों के दाँतों के बीच फँसे माँस के छोटे-छोटे कतरे भी खा लिया करता है। आम धारणा के अनुसार कौआ चतुर और धूर्त प्रकृति का प्रतीक पक्षी है। वह इतना अधिक चतुर होता है कि अन्य पक्षियों की तरह कभी भी अपने भोजन या उसके स्रोत पर तुरन्त जाकर नहीं बैठता, पहले उसके आसपास बैठकर स्थिति की अनुकूलता-प्रतिकूलता के प्रति सन्तुष्ट हो लेता है। यही हुआ। अपनी इस चेष्टा में कौआ पत्थर के सिंहों के पास बँधी घंटी पर बैठ गया। घंटी बज गई और राय अनंगपाल के कान खड़े हो गये कि चलो, कोई तो न्याय माँगने आया। राय को अपनी न्यायप्रियता का ढिंढोरा पीटने का मौका हाथ लग गया। सलाहकार से पूछा। चाटुकार सलाहकारों ने बताया कि कौआ न्याय माँग रहा है कि पत्थर के इन सिंहों के रहते अपने भोजन के लिए वह किस प्रकार उनके दाँतों के बीच फँसे माँस के कतरे चुन पायेगा? राय ने आज्ञा दी कि कई भेड़-बकरे मारे जाएँ, जिससे कौए को दिन का भोजन मिल जाए। वाह! बिहारी ने लिखा है—बाज, पराए पानि पर तू पंछिहिं न मार। अपने न्यायप्रिय होने की डींग हाँकने की खातिर, चाटुकारों और सत्ता के गलियारों में माँस के कतरे तलाशनेवालों की तुष्टि के लिए राजा क्या कुछ नहीं करता। इतिहास के पन्नों में अपना नाम टाँक देने की उसकी आकांक्षा के सामने सामान्यजन की स्थिति ऐसे भेड़-बकरे से बेहतर नहीं होती, जिसे जब जिसके लिए चाहे मारा-काटा जा सकता है। इस कथा में राय अनंगपाल शासन का और उसके सलाहकार चाटुकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा कौआ ‘कोउ नृप होय हमें का हानी’ वृत्तिवाले सत्ता के गलियारों में चकराते रहकर ही जीवनयापन करनेवाले सत्ता के दलालों का। ‘न्याय घंटा’ बाँधकर शासन सो गया है, सत्ता का दलाल न्याय की पुकार करता है। पुकार भी ऐसी कि हे राजा, तेरे ये अकर्मण्य (पत्थर के) सिंह शिकार नहीं कर रहे हैं, इसलिए मैं भूखा मर रहा हूँ। सत्ता के गलियारों का यह अटल सत्य है। एक अगर शिकार करना छोड़ दे तो दूसरा भूखों मरने लगता है। इसलिए वहाँ रह रहे व्यक्ति को अपनी नहीं तो दूसरों की भूख का ख्याल रखकर शिकार करना ही होता है। और अगर वह पत्थर हो गया हो, वैसा कर पाने की स्थिति में न रह गया हो तो! ऐसी स्थिति में न्याय की माँग करना हर भूखे प्राणी का अधिकार बनता है! भूख के मारे ऐसे लोग जब जैसे न्याय की माँग करना चाहें, कर सकते हैं, क्योंकि उनकी भूख भेड़ों-बकरों की भूख से भिन्न(?) भूख है और आमजन की तुलना में ‘न्याय घंटा’ के निकट वे ही हैं। चाटुकार सलाह देते हैं और शासन आज्ञा देता है कि जाओ, भेड़-बकरे(की तरह आमजन को) काट डालो। हर युग, हर काल में ‘न्याय घंटा’ की कथा ज्यों की त्यों दोहराई जाती है।

कुल मिलाकर यह कि गुलेरी जी जीवन के हर पक्ष को हर सम्भव कोण से देखते-परखते हैं। वह धर्माचरण के द्वारा परलोक-सुख की कल्पना न करके इहलोक के सुख-दुख की बात करते हैं। इसके लिए कथा भले ही वह ‘जन्मान्तर’ की लिखें। वह न हजरत मूसा को मुँह चिढाने वालों से सहानुभुति रखते हैं, न पोपलीला और चूहों के पैरों में घुँघरू बाँधकर देव-देव चिल्लाने वाले धूर्तों से। वह न यज्ञबलि के पक्षधर हैं और न ही बुद्धिहीन विद्या के। मामूली लगने वाले क्षणों में विनोदप्रियता और तत्काल स्पष्टवादिता उनका स्वाभाविक गुण है। यह गुण उनकी इन लगभग सभी रचनाओं में स्पष्टरूप से अंकित है और उनके व्यक्तित्व के इस गुण को उनसे अलग रखकर उनकी रचनाओं का सही मूल्यांकन संभव नहीं है।

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