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अनुज खरे का व्यंग्य : जब कोई श्वान महानता की एप्रोच करता है, तब...

जब कोई श्वान महानता की एप्रोच करता है, तब...

-अनुज खरे

भूरेलाल और कालूमल अर्थात भूरे और कालू दोनों मोहल्ले के सीनियर और सीजंड कुत्ते। कर्नल साहब के पुराने वफादार। उन्होंने अपने दोनों नमकहराम नौकरों के नाम पर उनके नाम रखे थे। हालांकि नौकरों के पीछे बाद में वे दोनों भी निकले-निकाले के बीच में कुछ घटित होने पर सड़क पर आ गए थे। मोहल्ले से जुडी पुरानी यादों के आधार पर दोनों ने तय किया कि कहीं नहीं जाएंगे यही रहेंगे। इस तरह वे यहीं यानी अपने पुराने मोहल्ले में ही रहने लगे थे। अब जब न तो पुराने दिन रहे और न ही पुराने जमाने टाइप कुत्ते, वे भी बदलते जमाने के हिसाब से फ्लैक्सीबल एप्रोच अपनाकर एडजस्ट करने की कोशिश में लगे थे। हालांकि इस मामले में एक बार भूरे ने हड्डी भक्षण करते समय मार्के की बात भी कह दी थी कि ‘‘गुरु पुराने दिनों को याद करने से कोई फायदा नहीं बदल जाओ, देखो आसपास सब तो बदल गए हैं, आदर्शों-सिद्धांतों की तो नौटंकी करते हैं, अंदर तो सब खोखला है। कालू ने जब प्रतिवादनुमा स्वर में कहा कि ‘‘हम तो कुत्ते हैं, कैसे छोडे दें सदियों पुरानी परंपरा’’ तब भूरे ने फिर कहा ‘‘देखो बड्डे, बदलने का तो ऐसा है कि हमारे पास तो बदलाव की शाश्वत रिप्रजेंटेटिव पूंछ है, जो लगातार याद दिलाती है कि समय-समय पर बदलो, जो दाना डाले उसके लिए पूंछ हिला, फिर दूसरों की तरफ तो देखो वे तो बिना इस तंतु के ही ऐसा करने में जुटे हैं, हम तो जन्मजात ही इस व्यवस्था से युक्त हैं, फिर काहै का रोना-बिसूरना’’

हालांकि इस बात के बाद कालू के दिल में भूरे के लिए खासी इज्जत बढ़ गई थी अन्यथा तो वे पहले भूरे को एवरेजकुत्ता ही मानते थे, इस घटना के बाद उन्हें पहली बार अहसास हुआ था कि भूरे में उनकी तुलना में व्यावहारिकता ज्यादा है। मन में हर्षित भी हुए थे कि जमाने से संघर्ष के दिनों में ऐसा व्यवहारवादी एप्रोच वाला साथी मिला है, अन्यथा तो वे स्वयं को पुराने आदर्शवादी व्यवस्था के बुद्धिजीवी प्रतिनिधि के तौर पर देखते समझते थे, यह भी मानते थे कि आदर्श आदि दिखाने नहीं व्यवहार में उतारने वाली बाते हैं, जिन्हें कथनी-करनी के माध्यम से नई ऊंचाइयां देनी चाहिए। यह वो बात अलग थी कि उन दिनों कुछ ही दिनों के संघर्ष के बाद उनकी सोच में बड़ा परिवर्तन आने लगा था। अन्यथा तो वे पहले सड़क का संघर्ष भी कर्नल साब के घर के जैसा ही सैट पैटर्न में करने का प्रयास करते रहे थे। वो तो भूरे था, जिसने उन्हें संभाल लिया था। अहा!, उन्हें किस्मत ने कैसा डिफरेंट एप्रोच वाला दोस्त दे दिया है।

बाद में बदलाव उन्होंने इतनी तेजी से एडॉप्ट किया था कि कई बार भूरे तक उन्हें जीभ लपलपाना छोड़कर एकटक देखता रह जाता था जिस पर वे ही उसे याद दिलाते थे कि ‘‘अबे सांस तो ले ले’’ तब भूरे हें... हें... करके पिछले पंजे से अग्रभाग खुजाने जैसी खिसियाहट भरी हरकत करता था। जिस पर वे खुश होते थे कि पुरानी गंभीरता-गरिमा वैचारिता का यही तो फायदा होता है कि बुद्धिजीवियों में एडॉप्टेशन की दर ओछेकी तुलना में ज्यादा होती है, ओछेपने को भी बुद्धिजीवी कितनी गरिमा और करीने से पेश करते हैं कि उसमें भी नई ऊंचाइयां आ जाती हैं। कल ही कि बात है, उन्हें याद आया, जब उन्होंने भूरे से कहा था कि ‘‘अबसे भौंकने आदि का काम मोहल्लेवासियों पर ही करना है, बाहर वालों पर भौंकने का क्या मायना जब कोई देखने वाला ही न हो, इसी तरह दिए जाने वाले खाने की गुणवत्ता के आधार पर मकान मालिक या किराएदार में से भौंक को ग्रहण करने वाले पात्र को तय करना है, ताकि गुणवत्ताकी निरंतरता कायम रखा जा सके। इसी तरह उन्होंने भौंक की साउंड क्वालिटी के बारे में भी भूरे को स्पष्ट कर दिया था कि इसकी मात्रा, वाहन-वस्त्र-चेहरे को देखकर तय की जाएगी। गरीब या कामगार किस्म के आदमी पर तो इतना भौंकना है कि गला दुख जाए’’ थोडे से ही संघर्ष से बढ़ती कालू की कमीनता पर विचार करते हुए भूरे के क्यों? पर उन्होंने गंभीर स्वर में समझाया था कि ताकि संबंधित मालिक के ईगो को सेटिस्फाई किया जा सके। सदियों से कुत्ते यही तो कर रहे हैं, मालिक को मालिक होने का एहसास दिला रहे हैं, इससे उनके दिल में अपने प्रति सॉफ्टकार्नर पैदा होगा जो विशेष मौकों पर मीट-मटनकी व्यवस्था में सहायक रहेगा, आफ्टरऑल ऐसे कठिन दिनों में भी गाहै-बगाहे टेस्ट चैंज की जुगाड़ भी तो रखनी है। भूरे के विश्लेषण की कैफियत में जाने पर उन्होंने दबी जुबान से समझाया था कि आज कल के हालात में व्यवस्थानुरूप गलाफाडने वाले चुप्पोंकी अपेक्षा ज्यादा लाभ की स्थिति में रहते हैं, उनके ऐसा समझाने पर जब भूरे ने उनकी चरण धूलि लेनी चाही थी तो उन्होंने नीचे रखा हड्डी और भीतर खिसका ली थी, और भूरे को भी निचले तबके पर भौंकने वाली साउंड क्वालिटी का हल्का-फुल्का डिमोंस्ट्रेशन दे दिया था। भूरे ने जब बात स्पष्ट की थी तो उसे पुचकारते हुए उन्होंने बताया कि हड्डी तो उन्होंने बुरे दिनों के लिए सुरक्षित रखी है, फिर भूरे उन्हें यह बताने का साहस नहीं कर पाए थे कि किसी कुत्तेके लिए कौन से अच्छे दिन। हालांकि उन्होंने यह बात भांपते हुए मन ही मन सोचा भी था कि बेटा, तू क्या जाने आजकल तो कुत्तों के ही दिन अच्छे चल रहे हैं, लेकिन ये अच्छे दिनों वाले कुत्ते वे ही हैं जिनमें कुत्तेपने की मात्रा बाकियों की तुलना में जरा ज्यादा होती है अन्यथा जो छोटा-मोटा कुत्तापना सब में ही पाया जाता है, इससे अब मात्र खाने की ही जुगाड़ हो सकती है। उन्हें कुत्ता प्रजाति के ऐसे मासूम कुत्तों पर एकाएक भारी दया भी आ गई थी, कि वैचारिक आधार पर इनमें कितना पिछड़ापन भरा है, कब ये केवल खाने की व्यवस्था से ऊपर उठकर कुत्तेपने की बारीकियां सीखेंगे। होगा एक दिन ये भी होगा, सोचते हुए उन्होंने हड्डी को ज्यादा मजबूती से क?जे में कर लिया था।

फिर भूरे को वाहन आदि वाली बात भी स्पष्ट की भी कि किसी वाहन आदि के पीछे भौंकते हुए भागने जैसी हरकत से कुछ नहीं हासिल होने का उल्टे कुचले जाने का खतरा अलग शामिल है, यहां वाहन की साइज के आधार पर उतरने वाले व्यक्त के सामने पूंछ हिलाने से एक्स्ट्रागैनकिया जा सकता है, क्योंकि बड़ी गाड़ी वाले पूंछ हिलाने वालों का विशेष ख्याल रखते हैं, ऐसा उनका निजी अनुभव है’’ भूरे ने इस बार उन्हें कहने का साहस जुटा ही लिया था कि लातखाने की संभावना भी इस प्रकरण में निहित हो सकती है, जबकि भूरे के ऐसे विचार पर उन्होंने सोचा भी था कि ‘‘रहेगा तू दो कौड़ी का ही, लेकिन कहा केवल इतना ही था कि पुरातन कालीन सोच से बाहर निकलो, चितंन के स्तर पर प्रखरता लाओ मित्र, अन्यथा आउटडेटेड होकर साइड लाइन हो जाओगे।’’

भूरे भी उनके सिद्धांतों की पालना में प्राण-पण से जुट गया था। समय-समय पर कालू अपने सिद्धांतों को अपड़ेट करने का भी प्रयास करते रहते थे। एक बार तो आधी रात को उन्होंने भूरे को डांट दिया था जब वो दो लोगों पर भौंक रहा था। भूरे ने कहा भी था कि बॉस वो 14 नं. वाले साहब हैं, जिस पर उन्होंने कहा था कि ‘‘काहै के साहब फैक्ट्री में वर्कर हैं इनके ऊपर ढेरों साहब हैं उन्हीं से तो दिनभर डांट खाते, रात को दारू पीकर चले आते हैं, इस पर भौंकने से क्या फायदा, न अपना होश है न किसी का, हमसे खराब स्थिति है, हम भी तो दिनभर डांट खाते रहते हैं दुत्कारे जाते हैं, कभी हम पीते हैं दारू, ये क्या कि जरा सी मुश्किलें आई लगे दारू पीने, क्यों भाई’’, भूरे ने तो उनकी बात सुनकर वहीं भू लोटनी लगा ली थी, श्रृद्धा के मारे तीन मिनट तक सिर्फ कांय..., कांय..., कांय... करता रहा। खैर, अपने सिद्धांतों और व्यवस्था के आधार पर वे मोहल्ले में अपना साम्राज्य कायम करने में सफल रहे थे, कई बार नितांत निजी क्षणों में वे मनन करते थे कि कैसे प्रजाति का एक संगठन राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा किया जा सके ताकि प्रजाति को उसकी दयनीय स्थिति से उबारा जा सके। उसके मेंबरों, स्थानीय ईकाइयों आदि तक का खांचा तक उनके मन में बनने लग था। उनकी श्वान दूर दृष्टिआगे की बातों पर गंभीरता से विचार करने लगी थी। उनका कुत्तापना अब आदमियतके स्तर पर आने लगा था। भूरे इस बारे में लगातार चेताता भी रहता था कि गुरु इतना ही पर्याप्त है कि हमे हमारे मोहल्ले में पर्याप्त सम्मानमिल रहा, लेकिन कालू हर बार उन्हें झिड़क देते थे। अब उन्हें अपनी प्रखरता पर खुशी, महत्वाकांक्षाओं पर गर्व होने लगा था, बढ़ता कद उन्हें अविश्वासी बना रहा था जिसके कारण वे हर आदमीको शंका की दृष्टि से देखने, भौंकने लगे थे। अंततः जिसका परिणाम एकदिन म्यूनिसपल की गाड़ी में पकड़कर ले जाए जाने के रूप में हुआ था, उस दिन भूरे ने ढेर आंसू बहाए थे। फिर संकल्प लिया था, कुत्ता बना रहना है, साधारण कुत्ता। कुत्तेपने की ऊंचाइयां दूसरों को ही मुबाकर हों। सो, अब वे साधारण कुत्ते बने रहकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं, खबर है कि उनके रोटी-पानी की व्यवस्था बदस्तूर जारी है, हां कई बार वे अन्जाने में ही स्वयं में कुत्तेपने की कमी से लज्जित सा महसूस करते हैं, फिर सामने वाला दो रोटी डाल जाता है कि खुशी से कांय...कांय... करते हैं, उसी क्षण महानता की इल्लियों को खुजाकर शरीर से बाहर फेंक देते हैं, महानता की दिशा में जाने के बजाए वे साधारण कुत्ता बनकर खुश हैं, भौंकने आदि कार्य को भी वे उन्मुक्त ढंग से प्राकृतिक रूप से ही कर रहे हैं, पूरे प्रकरण में उन्होंने सबक सीखा है कि कुत्तों को अपनी खाल में ही रहना चाहिए, ‘मनुष्यत्वकी दिशा में अनावश्यक प्रयास नहीं करना चाहिए, अन्यथा खाना खराब होना तय है...।

इति

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बेनामी

अनुज जी, कुत्ते इंसानियत की खाल से दूर रहें...या फिर इंसान खुद को दुम हिलाने वाला कुत्ता, दूसरों की फेंकी रोटी पर किकियाने कांय-कांय करने वाला डार्लिंग डॉगी बनने से रोके। भईया दुम दिलाने से अच्छा होगा कि हम दुलत्ती मारने वाले गधे बनें, स्वाभिमान तो जिंदा रहेगा....इंसानियत तो न जाने कब इस दुनिया से रुखसत हो चुकी है।

bhut hi badiya no words find and beware for dog union

bhut badiya, I have no words and I worried about dog society.

अनुज जी ,बहुत मजेदार व्यंग्य .शब्दों को जिस
खूबी से पिरोया है वाकई लाजबाव .बधाई.

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