रविवार, 16 नवंबर 2008

देवी नागरानी की पुस्तक समीक्षा : हर लम्हा और

हर लम्हा और

''हर ग़म ज़दा में अपना अक्स देखता हूँ''

आइने से बात करता हुआ एक दूसरा मैं जों खुद से रूबरू हुआ है । अछूते अहसास सदा से मन को छू लेने में कामयाब रहे है और कथ्य के साथ अगर शिल्प भी सहकार दे तो फिर तो भव्य भवन का निर्माण होना लाज़मी है । अपने आपको जानना, पहचानना और अपने अंदर की समस्त कमज़ोरियों एवं ताकत से वाकिफ़ होना बहुत अच्छी बात है, पर उन्हें स्वीकारना उससे भी बेहतर बात है । शायद यह मुशकिल काम आसानी से कर पाने वाले बशर बेहतर होते हैं ।

जी हाँ ये है श्री राज़दान राज जो श्री इब्राहीम 'अश्क' के अनुसार 'मिट्टी की ख़ुशबू से जुड़े़ हुए एक ऐसे इन्सान है जिनका दिल मुहब्बत से धड़कता भी है और दर्द में आँसू बनकर छलकता भी है ।'

हाँ यह दर्द ही तो है जो मानव मन की पीड़ा का मंथन करता है और फिर मंथन का फल तो हम सभी को चखना पड़ता है । कौन है जो बच पाया है? कौन है जो वंचित रह गया है इस अनुभूति के जायके से ? और जब दर्द अंगडाई लेता है तब एक लेखक, कलाकार एवं शाइर अपने अंदर छुपे उन अनजानी प्रकटनीय अनुभूतियों से परीचित होता है ।

प्रसव पीड़ा-सी अंगड़ाई

दर्द मिरा ये लेता क्यों है?

आँखों में अंसुवन की धारा

लेकर दर्द सिसकता क्यों है?

कलम का प्रवाह जब तक ज़ारी रहेगा रचनाकार की कोई मार नहीं सकता । अपने वजूद की गहराइयों में डूबकर, टटोलकर कुछ अनमोल खज़ाने जो उसे हासिल होत है उन्हें शिल्पकार की तरह तराश कर मूर्तिस्वरूप शब्दों में ढालकर पेश करता है देखिये इस शेर में एक दर्द की नई तस्वीरः

दर्द होगा तो क्या बुरा होगा

इश्क का कर्ज़ कुछ अदा होगा

अपनी अपनी है सब की मजबूरी

दिल किसी का बुरा नहीं होता

सोच का परिंदा कभी याद की किसी शाख़ से उड़ता हुआ किसी और शाख़ पर जा बैठता है, और वहां यादों का सिलसिला काफी है जहाँ एक कवि का मन अपने अंदर के विस्तार से अपने बाहर के अनुभव जोड़ कर एक नई सृष्टि का निर्माण करता है जो उसकी अपनी पूंजी है । एक गहरी बात ईमानदारी के साथ कम से कम शब्दों में प्रस्तुत करने की सफल कोशिश की है राज़दान साहब ने। ग़ज़ल के अनुशासन को हर दृष्टिकोण से ग़ज़ल की विधा में शामिल करके इसे अनगिनत होठों की थरथराहट बनाने के लिये अपने भावों, उद्गारों, अनुभूतियों और उस दर्द के उमड़ते हुए सैलाब को पेश किया है, जो काबिले तारीफ है । हर एहसास नम-सा लगता है । शबनमी अंदाज ओढ़े हुए सप्तरंगी यह ग़ज़ल-संसार अपनी सारी अनुभूतियों की लपेट में दिल की व्यथा, अपने वतन की खुशबू, ख़्वाहिशों को लहू पिलाकर अपनी भावनाओं से पिरोकर जो हकीकत बयां करके तस्वीर हमारे सामने उस बेदर्द ज़माने ने खींची है, वो उन अपनों की ही होगी जो अपने होकर भी अपने नहीं है । अब अपनेपन की नज़दीकियों में फासले बढ़ रहे है, जवानियाँ शोखियों की दहलीज़ पर खिलखिला रही है और सफर बढ़ता ही जा रहा आगे और आगे उस नये क्षितिज की ओर जहाँ एक रचनाकार की तन्हाइयों का साथी होता है एक मात्र जरिया 'कलम' । किसी ने खूब कहा - उसे यूँ न मारो फकत कलम छीन लो, वो मर जाएगा । कलम तो अद्भुत हथियार है । एक ताकत, एक हौसला, एक जीवन संचार का माध्यम जिसकी उपज इन शब्दों में बोई गई हैः

दर्द क्या होता है कोई पूछता था बार बार

दर्द जिसके दिल में था वो कुछ बता पाया नहीं

तेरे ही नूर की किरणें है हम ज़माने में

बता तो आज उजालों को फिर हुआ क्या है

जिसको दुनिया जुनून कहती है

मेरा होशो हवास होता है

सदियां सुना रही हैं मेरी दास्तां मुझे

जन्नत से कौन खेंच कर लाया यहाँ मुझे

दर्द की इन्तेहा भी देखें इस जीवन के सफर में जहाँ सुबह की पहली किरण से शाम की आखिर किरण के अस्त होने का फासला है ज़िन्दगी. उसमें कैसे आदम हर नये मोड़ पर एक मौत मरता है, अपने ही वज़ूद के बिखराव को जब भी वह झेलता है, तो जुबाँ अश्क की हो चाहे कलम की पारदर्शी बिंब को उकेरने में सफल हो जाती है. सुनिए उन्हीं की ख़ामोश ज़ुबाँ की आहट को.....

भर चुका हूँ मैं,

गले से न लगाये कोई

अब तो जीने का न एहसास दिलाये कोई

ज़िन्दगी दर्द है,

मैं दर्द का अफसाना हूँ

जो हुआ खत्म बस अब शमआ बुझाये कोई

चलते रहे तो मौत बचाती रही नज़र

जब थक गये तो लुट गई हमको राहज़न

यह एक ऐसा कोहरा है जो दिल को ता-उम्र घेरे रहता है पर ज़िन्दगी की तस्वीर उसमें से गुज़रकर और भी साफ दिखाई देती है । पढ़ने वालों को यह दर्द सांझा जरूर लगता होगा । शायद नहीं! यकीनन ये दर्द के रिश्ते ज़ियादा अपने है उन गैरत भरे इन्सानी रिश्तों से, जो साथ निभाते जाते है, रुलाकर, फिर हंसा देते है. मेरी शुभकामनाएँ इस अनुपम कृति के लिये जो हर दिल की दर्द से घुलमिल कर एक सैलाब बन कर बह रही है‌‍..एक दर्द का सैलाब!!!

-------

समीक्षक

: देवी नागरानी, ९ कार्नर व्यू सोसाइटी, बाँद्रा, मुंबई ४००५०, फोन ९९८६७८५५७५१

नामे किताबः हर लम्हा और,

शायरः राज़दान राज़, पन्नेः १६०, मूल्यः १००/- मात्र, नाशिरः अदबी सुरताल संगम,

नागदेवी स्ट्रीट, मुंबई - ३

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------