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शामिख फ़राज़ की कविताएँ

Faraz copy (WinCE) 

 

ग़ज़ल
मैं नहीं जानता कि तुझमें कहाँ मैं हूं
फिर भी जिसमें तू है जिंदा वह मैं हूं

मज़हब के कंटीले तारों ने मिलने न दिया
हमें क्‍योंकि हिंदू है तू और मुसल्‍मां मैं हूँ

कहने को तो हमारा साथ एक साल का था
एक ही साल में जी चुका कई ज़िंदगियाँ मैं हूं

तेरे आने से जो सुनहरी हुई थी ज़िदगी
तेरे जाने से बिखरा हुआ जहां तहां मैं हूं

मेरी हर नज़्‍मों गज़ल में तेरी याद बसती है
कुछ यूँ साथ लिए यादों का कारवां मैं हूँ


       तुम
दिल के कमरे में प्‍यार का स्‍वेटर बुनते हुए
जब तुम्‍हारी तस्‍वीर उभर आती है
कुछ यूं अतीत के आसमान से गिर
तुम्‍हारी यादों की फुहार मुझे भिगो जाती है
अब तो तुम सिर्फ ख्‍यालों ही में हो मेरे पास
वरना हकीकत तो कुछ इन लव्‍जों जैसी है
कि कहीं तुम मजबूर थीं रस्‍मों रिवाज से
तो कहीं मैं मजबूर था इस समाज से
यह सच है कि मैं और तुम
हम नहीं बन पाये
लेकिन यह भी सच है
कि अब मैंने भी एक दुनिया बसा ली है
कि अब तूने भी एक दुनिया बसा ली है
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इतना ही कहता हूँ

रात के तारों को चुनकर मैं
तेरी पायल नही बना सकता
दिन के उजालों को बुनकर मैं
तेरा श्रृंगार नहीं सजा सकता
बारिश की बूंदों को पिरोकर मैं
तेरा हार नहीं बना सकता
हवाएं, फिजायें, घटायें
ज़मीनों आसमान दोनों जहान
तेरे क़दमों में ला के रख दूँगा
यह नहीं कह सकता
क्योंकि मैं औरों कि तरह
झूठे वादे  नहीं करता
झूठे वादों से बहुत दूर
दूर अलग थलग परे
मेरी ये कविता
जिसमें
तुमसे इतना ही कहता हूँ
मैं तुमसे इतना प्यार करता हूँ
कि तुमसे जितना भी प्यार कर सकता हूँ
हाँ तुमसे जितना भी प्यार कर सकता हूँ.
मैं तुमसे जितना भी प्यार कर सकता हूँ
तुम्हें पाना तो ऐसा है
दिन जब अपने घर को चला जाता है
तो काली साड़ी में लिपटी रात आती है
और मुझे तुम्हारे होने का
बैराग सा हो जाता है
लेकिन तुम्हें पाना तो
कुछ ऐसा है जैसे
आसमान के तारों को
उँगलियों के खानों में
गिनने की मेरी  कोशिश

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संपर्क:

शामिख फ़राज़
कॉस्मिक डिजिटल
कमल्ले चौराहा
पीलीभीत- 262001  
उत्तर प्रदेश

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