मंगलवार, 18 नवंबर 2008

महावीर शर्मा का संस्मरण : यादों की वादियों में

 

यादों की वादियों में... संस्मरण                   

महावीर शर्मा

कभी कभी एकांत में बैठे हुए जब मस्तिष्क यादों की वादी में विचरने लगता है तो अतीत की राहों पर चलते चलते दूसरा छोर दिखाई ही नहीं पड़ता। कभी यादों के चमन के सुंदर फूलों की ख़ुश्बू में या फिर कभी कांटेदार झाड़ियों जैसे दुखद क्षणों की यादों में  समय विलीन हो जाता है। 

इस पराए देश को स्वदेश बनाने में 43 वर्ष बीत गए हैं। यहां की अनिश्चित फ़िज़ा में कितने ही दौर गुज़र गए- अच्छे और बुरे, दोनों ही। बुरे दिन भी एक नियामत हैं क्योंकि बुरे दिनों से ही अच्छे दिनों का वजूद है। एक मित्रने कहा था, “सच यह है कि हम सब अपने अपने सच को जी रहे हैं।” हां, मैं भी अपने ही सच को जी रहा हूं, अपने ही सच में जी रहा हूं! सब के सामने बातें करते हुए होंटों पर मुस्कान होती है, किंतु उस मुस्कान के पीछे अचेतन मन से निकल कर अवचेतन की राह से गुज़रती हुई जानी पहचानी यादें इस मुस्कान को जकड़ने की, पकड़ने की निष्फल चेष्टा करती है। आज तक यह नहीं समझ पाया हूं कि यह मुस्कान कृत्रिम है या फिर सच्चाई का प्रमाणिक रूप है या फिर पुरानी यादों और विदेशी-जीवन में एक समझौते की अभिव्यक्ति है।

“गुड ओल्ड डेज़” यहां एक आम सी बात है। विश्व महायुद्ध से बच कर समय की एक लंबी टेढ़ी मेढ़ी यात्रा तय करके जो लोग आज भी जीवित हैं, वे ‘गुड ओल्ड डेज़’ की दुहाई देते रहते हैं। मैं भी, उनकी भावनाओं को ठेस ना लगे, अवहेलना ना कर, उन्हीं के सुर में बेसुरा राग अलापने लगता हूं। एकांत में स्वयं से पूछने लगता हूं कि क्या वास्तव में उन ‘गुड ओल्ड डेज़’ के टाइम ज़ोन में वापस लौटना पसंद करोगे - सच तो यह है कि उत्तर नाकारात्मक ही होगा। दिल्ली से लंदन आया लेकिन क्यों? - इस सवाल के आते ही छलावे के रूप में ‘अहम्’ दूसरी ओर ध्यान बटा देता है।

स्वदेश लौट जाएं या यहीं सारी उम्र गुज़ार दें; जब भी इन दोनों को दो पलड़ों में तोलता हूं तो देखता हूं कि विदेश के पलड़े में कुछ भारी से बाट रखे हैं। लेकिन कभी कभी रात की तारीकी में अचानक से अतीत की यादों का एक बहुत भारी बट्टा “स्वदेश लौटने” के पलड़े में गिर कर तराज़ू की डण्डी को डगमगा देता है। सुबह की किरणों के साथ साथ यह भारी बाट अवचेतन मन की कोठरी में छिप कर मन को हल्का कर देता है और फिर वही दिनचर्या!

रात को तो अतीत के घरौंदे में ही सोता हूं। वही भाई, बहन, भाभी, भतीजे, यार-दोस्त, अन्य विशेष साथी - सभी से स्वप्न-लोक में मिलता रहता हूं। जागने पर अहसास होता है कि इन में से कुछ तो ऐसे होते हैं जो केवल यादों में घर बनाए हुए हैं, दुनिया से अब उनका कोई वास्ता नहीं है।

इस ठण्डे देश में जिंदगी एक सहरा की तरह तपती रहती है। फिर भी इतना ना शुक्रगुज़ार नहीं हूं। इस देश का आभार प्रकट करने में झिझकूंगा नहीं! कितने ही बड़े  और छोटे आप्रेशन हुए जिनका भान तक नहीं हुआ कि इन पर कितना खर्च आया होगा। इन को गिनना शुरू करूं तो दिल्ली में रहते हुए ना जाने क्या होता! एक ढाई सौ रुपये का वेतन लेने वाले स्कूल अध्यापक को बड़े बड़े ऑप्रेशनों  द्वारा चिकित्सा के अभाव के सामने जीवन को हार माननी ही पड़ती। पता भी ना लगा कि इस उपचार में कितना खर्च हुआ है। कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें भुलाने पर भी भूलना असंभव होता है।

सन् 1992 में जब मैं 59 वर्ष का था, रविवार का दिन था। बस सोफ़े पर बैठे बैठे ही छाती और बाएं हाथ में दर्द हुआ तो घबराहट के कारण किसी को यह नहीं सूझा कि एम्बुलैंस बुला ली जाए। बेटा मुझे कार में बैठा कर अस्पताल ले गया। वहां बहुत ही जल्दी डॉक्टर ने अपना काम शुरू कर दिया लेकिन बेटे से सब से पहले पूछा कि यदि रास्ते में कुछ हो जाता तो जानते हो क्या हो सकता था। तुम घबरा जाते, गाड़ी चलाने में संतुलन बिगड़ सकता था, और दुर्घटना में दूसरे लोग भी लपेट में आ सकते थे। क्या एम्बुलैंस नहीं बुलवा सकते थे? उनके पास चिकित्सा के साधन होते हैं। वह बात आज भी लड़के के मस्तिष्क में जमी हुई है।

खैर, जब पता लगा कि मुझे हार्ट अटैक हुआ है तो बहुत घबराहट हुई। ओपन हार्ट सर्जरी का नाम सुनते ही आंखों के सामने ऐसा लग रहा था जैसे यमदूत अपने पंजे से मेरे वक्ष में से दिल को निकाल रहा हो। तीन दिन हो गए मैं ऑप्रेशन के लिए तैयार नहीं हुआ। डाकटर ने समझाने की व्यर्थ चेष्टा की। तीसरे दिन उन्होंने एक साइकोलॉजिस्ट को बुलाया जो लगभग एक घंटा बात करता रहा और मेरा भय, मेरी गलत धारणाएं लुप्त हो गईं। बस, सर्जरी से चार कॉरोनरी बाईपास आराम से ठीक ठाक हो गईं।  उसके बाद भी मेरे अपने डॉक्टर देख रेख करते रहे। सब से बड़ी बात थी कि उसके बाद दस साल तक मुझे चैक करने के लिए बुलाते रहे। इस दौरान में सब होते हुए भी दो बार एन्जियोप्लास्टी आदि करनी ही पड़ी, कुछ दूसरे ऑप्रेशन भी होते रहे। यहां यह कहना अनुचित नहीं होगा कि यह सारी चिकित्सा पर मेरी एक पैनी भी खर्च नहीं हुई। मेरी जगह यदि कोई गरीब, बेकार, एक मामूली सा मज़दूर होता तो उसके साथ भी उसी तरह से व्यवहार होता।

आज भी ईश्वर से प्रार्थना करता रहता हूं कि हमारे देश में भी वह दिन आए कि सड़क पर यदि एक झल्ली वाला, कोई गरीब मज़दूर या कोई बेकार हृदय-घात से तड़प कर गिर पड़े तो कुछ ही क्षणों में एम्बुलैंस की गाड़ी उसे लेजाए। इतने बड़े ऑप्रेशन के बाद जब वह देखे तो उसके साथ के बैड पर जो रोगी है वह एक बड़ा अफ़सर है।

फरवरी 1965 का वो दिन जब याद आता है तो मस्तिष्क झनझनाने लगता है। दिल्ली एयरपोर्ट में सारा परिवार, दोस्त, पड़ौसी आदि की एक पूरी पलटन विदा लेने, या कहूं कि विदा देने के लिए पनीली आंखों से मेरी ओर देख रहे थे। लगभग सभी की आंखें नम थीं और मैं कह रहा था, “अरे, मैं वहां सारी ज़िंदगी के लिए थोड़े ही जा रहा हूं। देखना दो साल बाद ही यह ढीठ आकर कहेगा, “चाची, चाय से काम नहीं चलेगा, खाना खाये बिना नहीं हिलूंगा और हां, डालडे का डब्बा रसोई में से हटा देना।” चाची ने अपनी साड़ी के पल्ले को दांतों में भीच कर कहा , ” तू जल्दी से आजाइयो बेटा …..” चाची वाक्य को पूरा ना कर पाई, बस फफक कर रो पड़ी….! चाची और चाचा से कोई रिश्तेदारी ना होते हुए भी प्यार का एक ऐसा रिश्ता बन गया था कि जब वे थोड़े समय के लिए कहीं चले जाते थे तो परिवार अधूरा सा लगता था। उनका हमारे घर में बड़ा सम्मान था। वे हमारे मकान में  किरायेदार की हैसियत से आए थे और थोड़े से ही दिनों में घर के सभी के दिलों के मालिक बन गये थे। ऐसा लगता था कि हम बच्चे उनके ही बच्चे थे। बचपन से ही उनके पास खेला हूं, पला हूं, उनके थप्पड़ भी खाये हैं। 1947 के हिंदू-मुस्लिम के प्रलयकारिणी भीषण ज्वाला में भारत में ही चाचा की आहुति हो गई थी। इस दृष्य को यहीं रोके देता हूं कि कहीं चाची की तरह मेरी आंखों में से भी…..।

लंदन के हीथरो हवाई अड्डे पर जहाज़ से बाहर आकर चारों ओर शोर-शराबा, विभिन्न प्रकार के लोग-काले, गोरे, पीले, ब्राउन, पगड़ी वाले, हैट पहने वाले, अफ्रीकन टोपियों वाले, यहां तक कि तुर्की टोपी वाले भी थे। मस्ती में मृदंग थामे हुए कुछ श्याम वर्ण भगवान श्री कृष्ण के गौर वर्ण-भक्त ‘हरे कृष्ण, हरे राम’ की धुन में मस्त, लोगों का आकर्षण बने हुए थे। अंग्रेज़ों को सफ़ाई करते और कूड़ा उठाते हुए देख कर ‘अहम्’ जैसे सोते से जाग गया हो। भारत में तो ये लोग पानी का गिलास तक अपने आप उठाने में हतक समझते थे। वैसे हमारे भी कुछ लोग यही कार्य में सम्मलित थे जो उनके सहकर्मी थे।

मैं अपना सामान उठाए हुए, अपने एमप्लॉयमेंट-वाउचर को संभाले हुए कभी इधर कभी उधर देखता। बस माँ याद आ रही थी, यह उसी का प्रताप था कि बिना किसी जान-पहचान के यहां आने से पहले बिना सोचे समझे टिकट ले कर आ धमक गया। खड़े खड़े पुरानी घटना याद आरही थी। बात ऐसी थी कि मेरी माँ बड़ी साहसी थी। हम बच्चों को जीवन को अपने ही बूते पर चलाने की शिक्षा देती रहीं। जब मैं 12 वर्ष का था, एक छोटे से गांव नैना टीकर में स्वः पिता जी के मित्र के पुत्र की शादी थी। मां ने यह कहकर कि उसके पास का स्टेशन मुबारकपुर है और थोड़ी सी और जानकारी देकर, अकेले ही भेज दिया। मैं अपनी अटकल-पच्ची और कठिनाई का सहारा लेकर पहुंच तो गया लेकिन लौटते हुए दिल्ली स्टेशन पर आकर पता लगा कि हिंदु-मुस्लिम के झगड़ों के कारण कर्फियू लगा हुआ था। सोचता रहा कि घर कैसे पहुंचा जाए, कहां जाऊं?

यहां लंदन एअरपोर्ट पर कुछ ऐसा ही सीन सा लगने लगा। झगड़ा तो कोई नहीं था पर सवाल यह था कि कहां जाऊं! सामने एक धौलिये अंगरेज़ ने मुस्कुराते हुए चीरती सी आवाज़ से कहा, “मानीं…”। मेरी सारी 18 वर्ष की स्कूल और विश्व विद्यालयों में सिर-धुनाई की कमाई इस के इस शब्द के आगे फ़ेल हो गई, समझ ही नहीं आया कि यह क्या कह रहा है। वहीं एक सरदार जी जो साफ सुथरे फर्श को भी चमकाए जा रहे थे, कहने लगे, ” ओए मुंडया, ए तैन्नू ‘गुड मार-निंग’ कहंदा है।” सरदार जी भांप गए थे कि मैं किसी परेशानी में था। उन्होंने पूछा कि लगता है कि तुम्हें लिवाने वाला आया नहीं है। मैं आर्द्र भाव से बोला, "आएगा कौन! मेरा यहां कोई नहीं है।" सरदार जी हंसे लेकिन उस हंसी में भी सहानुभूति के भाव स्पष्ट लक्षित हो रहे थे। सरदार जी जानते थे कि उन दिनों भारत से केवल 3 पौण्ड ले कर आ सकते थे। सरदार जी ने अपना नाम बताते हुए पांच पौंड का नोट पकड़ाते हुए कहा, "मेरा नाम मलूक सिंह है। यह नोट रख लो, काम आएगा।" मैं ने बात को टालते  हुए कहा , "इस वक्त तो 3 पौंड काफ़ी हैं, जरूरत पड़ेगी तो आपके पास फिर आ जाऊंगा।" मलूक सिंह का मेरी यादों में हमेशा एक विशेष स्थान रहेगा जिसने गुरुद्वारे में मेरे ठहरने का प्रबंध करवा कर मेरी एक बड़ी समस्या हल कर दी थी। 16 फरवरी 1965 के दिन सिन्क्लेयर रोड, डब्ल्यू 14, लन्दन के गुरुद्वारे के खुले दरवाज़े से मेरे यू.के. के जीवन की किताब का पहला पृष्ठ आरंभ हुआ था। जीवन में पहली बार गुरद्वारे में प्रवेश किया था। किसी ने कभी नहीं पूछा कि मेरी जाति क्या है या मेरा धर्म क्या है। गुरुद्वारे में 15 दिनों के सुंदर क्षणों के अनुभव जीवन भर नहीं भूल सकता। रविवार के लंगर में विभिन्न लोगों से साक्षातकार हुआ जिनमें हिंदू, सिक्ख, ईसाई और मुसलमान भी होते थे।

इंगलैण्ड की बुराईयों की तह में जाएं तो पन्नों पर पन्ने भर जाएंगे - रंग-भेद तो केवल एक छोटा सा मुद्दा है। लेकिन कुछ यादगारें मन में ऐसे बस जाती हैं जो सुखद होते हुए भी मन को झंझोड़ सी देते हैं। याद करते हुए मन क्षुब्द्ध होने लगता है कि मेरे देश में ऐसा क्यों नहीं होता !

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संपर्क:

महावीर शर्मा

7 Hall Street London N12 8DB England.

mahavirpsharma@yahoo.co.uk

ब्लॉग - http://mahavir.wordpress.com/

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  1. आदरणीय महावीर जी का लिखा हुआ बहुत बढिया रहा ये सँस्मरण --
    - आभार इसे पढवाने का
    - लावण्या

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