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बलराम अग्रवाल की तीन लघुकथाएँ

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कंधे पर बेताल

 

गारा-मजदूरी करके थोड़ी-बहुत कमाई के बाद शाम को रूपलाल घर की ओर लौट रहा था। अपनी ही धुन में मस्त। बीड़ी सुट्याता हुआ।

रास्ते में, एक झाड़ी के पीछे से कूदकर एक लुटेरा अचानक उसके सामने आ खड़ा हुआ। रूपलाल अचकचा गया। लुटेरे ने उसको सँभलने का मौका नहीं दिया। छुरा चमकाकर गुर्राया_“जान प्यारी है तो जो कुछ पास में है, निकालकर जमीन पर रख दे, चुपचाप।”

चेतावनी सुनकर रूपलाल ने एक नजर लुटेरे के चेहरे पर डाली, दूसरी उसके छुरे पर और अण्टी से निकालकर उस दिन की सारी कमाई जमीन पर रख दी।

“अब भाग यहाँ से,” लुटेरा दहाड़ा,“पीछे मुड़कर देखा तो जान से मार डालूँगा।”

रूपलाल पीछे पलटा और दौड़ पड़ा।

“विक्रम!” यह कहानी सुनाने के बाद उसके कंधे पर लदे बेताल ने उससे पूछा, “सवाल यह है कि एक मेहनतकश होते हुए भी रूपलाल ने इतनी आसानी से अपनी कमाई को क्यों लुट जाने दिया? संघर्ष क्यों नहीं किया? डरकर भाग क्यों गया?”

“बेताल!” विक्रम ने बोलना शुरू किया, “रूपलाल का लुटेरे के चेहरे और छुरे पर नजर डालना उसकी निडरता और बुद्धिमत्त्ता दोनों की ओर इशारा करता है। ऐसा करके वह कई बातें एक साथ सोच जाता है। पहली यह कि हर हाथापाई को संघर्ष नहीं कहा जा सकता। जोश के जुनून में ग़ैर-हथियार आदमी का किसी हथियारबंद आदमी से उलझ जाना उसकी मूर्खता भी सिद्ध हो सकता है। दूसरी यह कि भाग जाना हमेशा ही पलायन नहीं कहलाता। संघर्ष में बने रहने के लिए कभी-कभी आदमी का जिंदा रहना ज्यादा जरूरी होता है।”

“बिल्कुल ठीक।” बेताल बोला, “उचित और अनुचित का विवेक ही मजदूर की असली ताकत होता है।...अब, अगली समस्या-कथा सुनो_”

“अब बस करो यार! मेरा मौन टूट गया...” विक्रम बोला, “...अब कंधे पर से खिसको और अपने पेड़ पर उलटे जा लटको, जाओ।”

“किस जमाने की बात कर रहे हो विक्रम।” बेताल बोला, “तुम अब आम आदमी हो गये हो, राजा नहीं रहे। इस जमाने में समस्याओं का बेताल तुम्हारे कंधे से कभी उतरेगा नहीं, लदा रहेगा हमेशा। तो सुनो_”

“उफ!” विक्रम के मुँह से निकला और कंधे पर लदे बेताल समेत थका-हारा-सा वह वहीं बैठ गया।

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गिरावट

 

राज-मिस्त्री ठीक आठ बजे पहुँच गया था। मजदूर, एक वह खुद था और दूसरी उसकी बीवी। शाम तक दो तरफ की दीवारें करीब आधी-आधी खड़ी हो चुकी थीं। तभी, एक ट्रक उसके प्लॉट के आगे आ रुका। उसमें से, गरदन में रामनामी दुपट्टा डाले पच्चीस-तीस नौजवान धड़ाधड़ नीचे आ कूदे।

“किसका कमरा बन रहा है ये?” उनमें से एक ने आगे आकर पूछा।

“मेरा है।“ शरीर पर जगह-जगह गारा लगे रामाधार ने उसके सामने पहुँचकर कहा।

“ये शिलाएँ तुमको कहाँ से मिलीं?” उसने वहाँ पड़ी ईंटों की ओर इशारा करके पूछा।

“रघुनाथ मंदिर के पुजारी से...।” रामाधार ने कड़क आवाज में उत्तर दिया, “खरीदकर लाया हूँ, नगद।”

“बात नगद और उधार की नहीं, इनके गलत इस्तेमाल की है।” रेले के नेता ने उससे भी ज्यादा कड़क आवाज में कहा, “ये ईंटें नहीं, राम-शिलाएँ हैं। इनका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ राम-मंदिर बनाने में ही हो सकता है, कहीं और नहीं, समझे।”

उसके इस अंदाज से रामाधार तो अलग, उसकी बीवी और राजमिस्त्री भी दहशत में आ गये।

“देखते क्या हो, सारी शिलाओं को डालो ट्रक में...।” नेता ने बस इतना ही कहा था कि साथ आये राम-सेवकों ने ताजा खड़ी की उन दीवारों को एक धक्के में जमीन दिखा दी। उसके बाद वे प्रशिक्षित वानरों की तरह ईंटों पर टूट पड़े।

आनन-फानन में उन्होंने सारी की सारी ईंटें उनके टुकड़ों समेत ट्रक में लाद दीं और खुद भी उस पर जा लदे।

“हिन्दू होकर ऐसा काम करते शर्म आनी चाहिए।” वापस जाते ट्रक में चढ़्ते हुए नेता ने रामाधार पर लानत भेजी, “थूकता हूँ तेरी इस हरकत पर...थू!”

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एल्बो

 

बच्ची चीजों को ठीक-से अभी समझने लायक बड़ी नहीं हुई थी। बोलने में भी तुतलाहट थी। लेकिन भाभी ने अभी से उस पर मेहनत करना शुरू कर दिया था। वे शायद जता देना चाहती थीं कि न तो वह साधारण माँ हैं और न ही रेखा साधारण बच्ची। अपने इस प्रोजेक्ट पर उन्होंने कितने दिनों तक कितने घंटे रोज़ाना उस मासूम को तपाया, नहीं मालूम। बहरहाल, एक दिन अपने ‘उत्पाद’ को उन्होंने घर आने वालों के आगे उतार दिया।

“सारे बॉडी-पार्ट्स याद हैं हमारी रेखा को।“ वह सौरभ से बोलीं।

“अच्छा!”

“अभी देख लीजिए...“ कहते हुए भाभी ने बच्ची से कहा, ”रेखा, अंकल को हैड बताओ बेटे।“

रेखा ने मासूमियत के साथ मम्मी की ओर देखा।

“हैड...हैड किधर है?” भाभी ने जोर डालकर पूछा।

रेखा ने दोनों नन्हीं हथेलियाँ अपने सिर पर टिका दीं।

“हेअर?”

उसने बालों को मुट्ठी में भर लिया और किलकिलाकर ताली बजा दी।

“नोज़ बताओ बेटे, नोज़।“

बच्ची ने नाक पर अपनी अँगुलियाँ टिका दीं।

“आप भी पूछिए न भैया!” भाभी ने सौरभ से कहा।

“आप ही पूछती रहिए।“ सौरभ मुस्कराहट के साथ बोला, “मेरे पूछने पर बता नहीं पायेगी।“

“ऐसा कहकर आप रेखा की एबिलिटी पर शक कर रहे हैं या हमारी?” उसकी बात पर भाभी ने इठलाते हुए सवाल किया।

उनके इस सवाल पर सौरभ पहले जैसा ही मुस्कुराता हुआ अपनी जगह से उठकर रेखा के पास आया और बोला, “कोहनी बताओ बेटा, कोहनी किधर है?”

सौरभ का सवाल सुनकर बच्ची ने अपनी माँ की ओर देखा, जैसेकि इस तरह का कोई शब्द उसकी मेमोरी में ट्रेस हो ही नहीं पा रहा हो।

“क्या भैया...आप भी बस...!” बच्ची की परेशानी को महसूस करके भाभी ने सौरभ को झिड़का, “हिन्दी में क्यों पूछ रहे हैं?” यह कहती हुई वह रेखा की ओर झुकीं। कहा, “अंकल एल्बो पूछ रहे हैं बेटा, एल्बो!”

परेशानहाल बच्ची ने अपनी कोहनी को खुजाना शुरू किया, और भाभी तुरन्त ही उल्लास-भरे स्वर में चीखीं, “येस, दैट्स गुड माय गुड गर्ल!”

§§∙∙§§§§§∙∙§§

चित्र – लोक-कलाकृति - साभार, बनवासी सम्मेलन, भोपाल

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sabhi kathaye achchi hain.aapko dhaynavaad

" all are nice and wonderful to read"

regards

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