शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

कान्तिप्रकाश त्यागी की कविता : अलबम

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अलब

पुलिस के सिपाही, टी० वी पर,संगीत का प्रोग्राम देख रहे थे

कार्यक्रम देखते समय, डायरी में, कुछ नाम नोट कर रहे थे

रात में ही कुलोगों के घर पर दस्तक दी

दरवाज़ा खोलते ही, हाथ में हथकड़ी डाल दी

हमारा दोष क्या है, दोष तो थाने में बतायेंगे

ज़्यादा हैंकड़ी की तो, अभी से डन्डे बरसायेंगे

थाने में एक एफ़ आई आर दर्ज़ की

दूसरे दिन उनकी अदालत में पेशी की

हूज़ूर ये लोग बहुत आतंक फैला रहे हैं

देश में तरह तरह के बना रहे हैं

इन्होंने अपना ज़ुर्म, टी०वी पर कबूल किया है

सबके सामने स्वंय बनाना मान लिया है

प्रोग्राम के समय, ये महाशय बहुत खुश हुए

जोर से ताली बजाते बजाते, कुर्सी से खड़े हुए

सार्वजनिक रूप से नए का उदघाटन किया

लोगों ने खुशी से, माला पहनाकर स्वागत किया

घोषणा की, जब मैं नया बनाऊंगा

उभरते कलाकार को इस में रखूंगा

तात्पर्य है, ये लोग बनाते रहे हैं

काफ़ी समय से आतंक फैलाते रहे हैं

प्रार्थना है,पुलिस हिरासत में रखने की इज़ातत दी जाए

हथियार और ठिकाने मालूम करने का समय दिया जाए

इनका कबूल किया ज़ुर्म,इस वीडियो में बंद है

परसों फिर पेश करेंगे, कल अदालत बंद है

संगीत निर्देशक ने हाथ जोड़ कर कहा

हूज़ूर मैंने नहीं ,अलबबनाया है

पुलिस को जब कोई नहीं मिला

तो हमें ही बेमतलब फंसाया है

हूज़ूर अलबम में तो फ़ोटो लगाते हैं

ये लोग आपको ,यूं ही उल्लू बनाते हैं

जैसे अलकायदा,एक संगठन का नाम है

वैसे ही अलबम भी एक बम का नाम है

डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

सम्पर्क:

Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP
cell number 09999351269

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चित्र – लोक-कलाकृति, साभार बनवासी सम्मेलन, भोपाल

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