शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

वीरेन्द्र जैन का आलेख : त्यागी राजऋषि – विश्वनाथ प्रताप सिंह

श्रद्धांजलि विश्वनाथ प्रताप सिंह

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एक कवि कलाकार राजनीतिज्ञ त्‍यागी राजऋषि

-वीरेन्‍द्र जैन

विश्वनाथ प्रतापसिंह को भले ही पूरा देश उनके राजनीतिक कद और पद के कारण जानता रहा हो पर वे मूलतः एक कवि चित्रकार और गहरी मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत व्‍यक्‍ति थे । उन्‍होंने राजनीतिक पद की कभी परवाह नहीं की तथा वे अपने मूल्‍यों से समझौता करके कभी भी पद पर बने नहीं रहना चाहते थे इसीलिए उन्‍होंने उन पदों को त्‍याग करने में एक क्षण का भी विलंब नहीं किया जिन पर जाने के लिए लोगों ने न केवल अपने कार्यक्रम और सिद्धांत ही दबा दिये अपितु ऐसे लोगों से दब कर समझौता किया जो जीवन भर उनके विरोधी रहे। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उत्‍तरप्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद से स्‍तीफा दिया तो केन्‍द्र के वित्तमंत्री पद से स्‍तीफा देने में देर नहीं की। अगर वे समझौता करना चाहते तो भाजपा से समझौता करके प्रधानमंत्री पद पर बने रह सकते थे पर उन्‍होंने भाजपा से समझौता करने की जगह अपनी सरकार को गिरवा देना मंजूर किया तथा कांग्रेस व भाजपा को उनके खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्‍ताव पर एक साथ वोटिंग करने के लिए विवश कर दिया।

विश्वनाथ प्रतापसिंह की सरकार ही ऐसी सरकार रही है जिसने अपने ग्‍यारह महीने के कार्यकाल में ही अपने अधिकतर चुनावी वादे निभाने में पूरे मन से प्रयास किये तथा सत्‍तर प्रतिशत से अधिक कामों का शुभारंभ कर दिया। ऐसा दूसरा कोई उदाहरण देखने में नहीं आता। यदि उनकी सरकार कुछ दिन और चल जाती तो देश के नौजवानों को रोजगार का अधिकार मिल गया होता। बिडंबना यह रही कि उनकी सरकार को नौकरियों में आरक्षण देने के सवाल का बहाना बना कर ही गिरा दिया गया जबकि रोजगार का अधिकार मिल जाने पर यह कारण स्‍वतः ही निर्मूल हो गया होता। मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करके उन्‍होंने जिस राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया उसकी काट करने के लिए उनके विरोधियों ने आत्‍मदाह की अतिरंजित कथाओं के प्रचार का सहारा लिया। बाद में प्रसिद्ध पत्रकार मणिमाला ने इन कथाओं की पुनरीक्षण स्‍टोरी कर के सच को सब के सामने ला दिया था पर पक्षपाती प्रेस ने उसे उचित स्‍थान नहीं दिया था। बाद में जब संयुक्‍त मोर्चा सरकार का गठन हुआ तो उनसे प्रधानमंत्री पद स्‍वीकार करने का अनुरोध किया गया था किंतु अपने स्‍वार्थ के कारण उन्‍होंने विनम्रता पूर्वक इस प्रस्‍ताव को अस्‍वीकार कर दिया। ब्‍लड कैंसर जैसे रोग से लड़ते हुये वे गत सत्‍तरह वर्ष से अपना शेष जीवन चित्रकला और साहित्‍य को समर्पित किये हुये थे पर इस बीमारी की अवस्‍था में भी वे झुग्‍गी झोपड़ी वालों के अधिकारों की रक्षा और दादरी के किसानों की जमीन उद्योगों के लिए छीने जाने के विरूद्ध आगे आकर गिरफ्‌तारी देने से भी नहीं हिचकते थे।

आज जो पिछड़ी जातियां अपने को सत्‍ता में भागीदार पा रही हैं उसका श्रेय विश्वनाथ प्रताप सिंह को ही जाता है। राम जन्‍म भूमि मंदिर के नाम पर भाजपा ने जो घातक राजनीति की थी वह देश में भयानक साम्‍प्रदायिक हिंसा तो प्रारंभ करा ही चुकी थी तथा देश को एक और विभाजन की ओर धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी, उस समय मंडल कमीशन रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा करके उन्‍होंने एक बड़ी विभाजन की संभावना को रोक दिया था। इसे सही समय पर सही कदम माना गया था। बनारस के पंडितों ने उन्‍हें राजऋषि की उपाधि दी थी।

बाजारवाद के इस जमाने में उनकी ही एक कविता से उन्‍हें सच्‍ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है

तुम

मुझे क्‍या खरीदोगे

मैं तो मुफ्‌त हूँ

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संपर्क:

वीरेन्‍द्र जैन

2/1 शालीमार स्‍टर्लिंग रायसेन रोड

अप्‍सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.

1 blogger-facebook:

  1. इस वक्त में आप ने विश्वनाथ को विस्मृत न कर उन के प्रति अपने दायित्व को निभाया है। यही है युद्ध के वक्त ड्यूटी पर रहना।

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