शनिवार, 8 नवंबर 2008

राम शिव मूर्ति यादव का आलेख : जातिसूचक शब्दों की यथार्थता

जातिसूचक शब्‍दों की यथार्थता

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राम शिव मूर्ति यादव

पुराने समय की बात है। एक बार धरती पर रहने वाले सभी प्राणियों ने मेल-जोल बढ़ाने के लिए एक आम सभा का आयोजन किया। इसमें हर प्राणी वर्ग के एक-एक प्रतिनिधि शामिल हुए पर मानव-वर्ग से कोई नहीं शामिल हुआ। बाद में पता चला कि मानव वर्ग किसी एक सर्वमान्‍य प्रतिनिधि को भेजने पर सहमत नहीं हो सका वरन उसकी माँग थी कि हर जाति और धर्म से कम से कम एक प्रतिनिधि इस सभा में शामिल होगा। नतीजन, मानव वर्ग से कोई भी प्रतिनिधि उक्‍त सभा में शामिल न हो सका और आज भी समाज में मानव अपना सर्वमान्‍य प्रतिनिधि न चुनकर जाति और धर्म के आधार पर ही प्रतिनिधि चुनता आ रहा है। यद्यपि लोकतंत्र सभी को समान अवसरों की गारण्‍टी देता है पर निहित तत्‍व अपने-अपने स्‍वार्थों के मद्‌देनजर विभिन्‍न औपचारिक एवं अनौपचारिक गुटों में बंटे नजर आते हैं।

जहाँ तक भारतीय समाज का सवाल है, यह विभिन्‍न जातियों, धर्मों, त्‍यौहारों, बोलियों, भाषाओं, पहनावों इत्‍यादि का देश है पर भारतीय समाज का आधार जाति व्‍यवस्‍था है। उत्‍तर वैदिक काल में विकसित वर्णाश्रम व्‍यवस्‍था भले ही कर्म आधारित रही हो पर कालान्‍तर में कर्म पर जन्‍म हावी हो गया और फिर जातियों व उपजातियों की एक अनन्‍त श्रृंखला बनती गई। चाहे रामायण काल में राम द्वारा शंबूक-वध का प्रकरण हो कि एक शूद्र को यज्ञ का अधिकार नहीं दिया जा सकता अथवा महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्‍य को शूद्र होने के कारण शिक्षा देने से मना कर देना हो और कालान्‍तर में उसके हाथ का अंगूठा गुरुदक्षिणा के बहाने माँग लेना हो। दोनों घटनायें सिद्ध करती हैं कि उस समय तक वर्ण का आधार कर्म नहीं जन्‍म हो गया था। स्‍वयं गोस्‍वामी तुलसीदास ने रामायण काल के बारे में लिखा कि-‘‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी॥'' ये पंक्‍तियाँ दर्शाती हैं कि समाज में जातिगत भेदभाव बढ़ गए थे अन्‍यथा शूद्रों हेतु ऐसी भाषा का इस्‍तेमाल तुलसीदास नहीं करते। वस्‍तुतः जाति भारतीय समाज के भीतर एक उत्‍पीड़नकारी व्‍यवस्‍था के रूप में उभरी और समय-समय पर ब्राह्मणवादी सत्‍ता जाति व्‍यवस्‍था को धर्म और पुराण के आधार पर न्‍यायोचित ठहराने का प्रयास करती रही और आवश्‍यकतानुसार जाति व्‍यवस्‍था को दार्शनिक आधार भी प्रदान करने की कोशिश की गयी।

राष्‍ट्रीय अनुसूचित आयोग के अध्‍यक्ष रूप में सूरजभान जी ने कहा था कि -‘‘लोगों को जातिसूचक शब्‍दों का इस्‍तेमाल अपने नाम के साथ नहीं करना चाहिए।'' जातिसूचक शब्‍दों को हटाने के लिए यह कवायद नयी नहीं थी॥ महात्‍मा गांधी ने भी दलितों को ‘हरिजन' अर्थात ‘ईश्‍वर के जन' कहकर उनकी प्रतिष्‍ठा लौटानी चाही थी पर कालान्‍तर में हरिजन शब्‍द स्‍वयं जातिसूचक बन गया। तमिलनाडु में भी इस प्रकार के प्रयास हो चुके हैं। यहाँ तक कि जयप्रकाश नारायण व राममनोहर लोहिया ने भी जाति तोड़ो एवं जातिसूचक शब्‍दों के बहिष्‍कार के द्वारा जातिविहीन समाज का आह्‌वान किया था। उस दौर में तमाम लोगों ने जिनमें बिहार के मुख्‍यमंत्री द्वय जगन्‍नाथ प्रसाद मिश्र और लालू प्रसाद यादव भी शामिल थे, ने अपने नाम के साथ जाति का उपयोग बन्‍द कर दिया था पर कालान्‍तर में उन्‍होंने पुनः इसका उपयोग आरम्‍भ कर दिया। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि ऐसे प्रतीकात्‍मक कदमों की व्‍यवहारिकता क्‍या है? महात्‍मा गाँधी और डॉ0 अम्‍बेडकर दोनों ने ही जाति-व्‍यवस्‍था की कुरीतियों को समाप्‍त करने की बात कही। जहाँ डॉ0 अम्‍बेडकर का मानना था कि-‘‘अछूत या अस्‍पृश्‍यता की भावना जाति व्‍यवस्‍था की उपज है। अतः जाति व्‍यवस्‍था को समाप्‍त करके ही अछूतों का उद्धार किया जा सकता है।'' वहीं महात्‍मा गाँधी के मत में-‘‘अस्‍पृश्‍यता और इसकी बुराईयों को समाप्‍त करने के लिए जाति व्‍यवस्‍था को नष्‍ट कर देना उचित नही होगा। यह उतना ही गलत है, जितना शरीर पर किसी फोड़े-फुन्‍सी के उठ आने पर पूरे शरीर को नष्‍ट कर देना या घास-पात के कारण फसल को नष्‍ट कर देना। जाति व्‍यवस्‍था को समाप्‍त करने की बजाय उसकी बुराईयों मात्र का विनाश करना उचित होगा।'' यही कारण था कि डॉ0 अम्‍बेडकर ने अन्‍ततः हिन्‍दू धर्म को छोड़ अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा-‘‘मैं हिन्‍दू धर्म में पैदा न होऊँ यह मेरे वश में नहीं था पर मैं एक हिन्‍दू के रूप में मृत्‍यु का वरण नहीं करना चाहता यह मेरे वश की बात है।'' अमेरिका जैसे विकसित समाज ने भी काले लोगों के साथ किये गये रंगभेद की सामाजिक भर्त्‍सना करके, अमानुषिक अत्‍याचार के लिये माफी माँगी और उनके उत्‍थान के लिये विश्‍ोषाधिकार भी प्रदान किये, वहीं भारतीय समाज ऐसा नहीं कर पाया। वस्‍तुतः भारतीय समाज में मानवीय मानसिकता, लोकाचार, संस्‍कृति, भाषा, साहित्‍य सभी जगह जाति ने अपनी गहरी पैठ बना रखी है।

स्‍पष्‍ट है कि जाति व्‍यवस्‍था भारतीय समाज की एक मजबूत कड़ी है, जिसे तोड़ना इतना आसान नहीं। बहुजन समाज पार्टी ने दलितों को सत्‍ता में भागीदारी दिलाने के लिए ‘‘तिलक, तराजू और तलवार,-इनको मारो जूते चार'' के साथ अपनी राजनीति आरम्‍भ की और आज वही बसपा ब्राह्मण महासम्‍मेलन कराके तथा ‘‘हाथी नहीं गणेश है-ब्रह्म, विष्‍णु, महेश है'' जैसे नारों के साथ सत्‍ता में आकर सामाजिक समरसता का जाप जप रही है। विभिन्‍न चुनावों में जातियाँ वोट बैंक का काम करती हैं, यही कारण है कि विभिन्‍न राजनैतिक दल प्रत्‍याशियों के निर्धारण के समय जाति-तत्‍व का विश्‍ोष ध्‍यान रखते हैं। यहाँ तक कि मंत्रिमण्‍डल गठन के समय भी प्रमुख जातियों के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रयास किया जाता है। अगर हम भारतीय राजनीति के पन्‍ने पलटें तो 1990 का दौर जातियों के हिसाब से काफी महत्‍वपूर्ण माना जाता है, जब तत्‍कालीन प्रधानमंत्री वी0 पी0 सिंह ने मण्‍डल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की और तत्‍पश्‍चात 1992 में पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देकर निम्‍न पायदानों पर भी आरक्षण की व्‍यवस्‍था की गई। रातोंरात सामाजिक और राजनैतिक धरातल पर इतने बड़े परिवर्तन हुए कि व्‍यवस्‍था का ढाँचा ही बदल गया। आरक्षण ने जहाँ एक ओर प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में लोगों की भागीदारी तय की वहीं राजनैतिक तौर पर जाति विश्‍ोष के समीकरणों पर आधारित तमाम राजनैतिक दलों की सक्रियता बढ़ी। दक्षिण भारत में यह परिवर्तन बहुत पहले हो चुका था, पर उत्‍तर भारत में यह निश्‍चिततः नया अनुभव था। जाति आधारित इस क्षेत्रीय राजनीति का असर केन्‍द्रीय राजनीति पर भी पड़ा और केन्‍द्र सरकार राज्‍यों के क्षत्रपों पर नियंत्रण कसने की बजाय खुद क्षेत्रीय क्षत्रपों द्वारा निर्देशित होने लगी। इसका सबसे बड़ा फायदा संघात्‍मक राज्‍य की वास्‍तविक अवधारणा के रूप में सामने आया। इसी दौर में आज की तमाम प्रमुख राजनैतिक हस्‍तियों का अभ्‍युदय हुआ। यहाँ तक कि विभिन्‍न जातियों ने अपनी जाति के महापुरुषों को भी महिमामंडित करना आरम्‍भ कर दिया, जिससे इतिहास के गर्भ में छिपे तमाम जाने-अनजाने महापुरुष उभरकर सामने आए। आरक्षण व्‍यवस्‍था ने जहाँ समाज के पिछड़े वर्गों को विभिन्‍न क्षेत्रों में नेतृत्‍व का अवसर दिया और सामाजिक न्‍याय की अवधारणा को मजबूत किया, वहीं इसके चलते अगड़ों-पिछड़ों के बीच खाई भी बढ़ती गई। इस अंतर्द्वन्‍द ने निश्‍चिततः विभिन्‍न जातियों को अपने अस्‍तित्‍व के प्रति सोचने हेतु मजबूर कर दिया और फिर जन्‍म हुआ जाति आधारित सेनाओं का। बिहार में रणवीर सेना (1994) और लोरिक सेना (1995) इसी दौर की उपज थे। इसके अलावा जाति आधारित कुंवर सेना, ब्रह्मर्षि सेना, श्री राम सेना व लिबरेशन आर्मी भी सक्रिय थे। किसी जाति विश्‍ोष पर आधारित दल कुछेक समय तक तो सत्‍ता में रह सकते हैं पर एक लम्‍बे समय तक सत्‍ता में टिकने हेतु अन्‍य जातियों को भी अपनी ओर जोड़ना जरुरी होता है, नतीजन जाति आधारित रैलियों और सम्‍मेलनों का जन्‍म हुआ। यही वह दौर था जब यह कहना बहुत मुश्‍किल हो गया था कि जातियों का राजनीतिकरण हो रहा है या राजनीति का जातीयकरण हो रहा है। पर जातियों की इस संक्रमणकालीन राजनीति ने कुछ नए गुल सिखाए और विभिन्‍न दलों के शीर्ष नेतृत्‍व में टकराहट बढ़ गई। नतीजन समाजवादी पार्टी में बेनी प्रसाद वर्मा, राष्‍ट्रीय जनता दल में प्रो0 रंजन कुमार तो बसपा में आर0के0चौधरी जैसे कद्‌दावर नेता पीछे धकिया दिए गए। यहीं से राजनीति में अपने परिवार को उभारने के प्रयास, फिल्‍म जगत, उद्योग जगत और मीडिया से जुड़े लोगों को अपने दलों में शामिल करने की होड़ सी आरम्‍भ हो गई, जो विषम परिस्‍थितियों में संकटमोचक बनकर उभरे। संक्षिप्‍त में कहा जाये तो जिन लोगों ने इन राजनैतिक दलों को खड़ा करने में एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, वे पीछे की कतार में या बाहर खड़े थे और ग्‍लैमर तथा चाटुकारिता की राजनीति करने वाले शीर्ष पायदानों के करीब खड़े थे।

ऐसा नहीं कि जातिगत राजनीति का प्रभाव सामाजिक व्‍यवस्‍था पर नहीं पड़ा वरन्‌ इसने समाज का आर्थिक ढांचा भी बदला। सकारात्‍मक रूप से जहाँ दलितों और पिछड़ों ने प्रशासनिक व अन्‍य सेवाओं में प्रवेश पाकर निर्णयों में अपनी प्रभावी भागीदारी सुनिश्‍चित की और पिछड़ों में भी एक क्रीमीलेयर का जन्‍म हुआ वहीं दूसरी ओर इसकी प्रतिक्रिया स्‍वरूप भी कई घटनायें घटीं। मसलन पंचायतें जातिगत राजनीति का अखाड़ा बन गयीं, दलित सरपंचों को कई क्षेत्रों में अधिकारों के प्रयोग से रोका गया और उन्‍हें अपमानित किया गया। यहाँ तक कि बिहार से मुसहर जाति की एक सांसद को टी0टी0 ने ट्रेन के वातानुकूलित कोच से मात्र इसलिए बाहर निकाल दिया कि वह वेशभूषा से न तो सांसद लगती थीं और न ही वातानुकूलित कोच में बैठने लायक। भंवरी देवी बलात्‍कार काण्‍ड और तत्‍पश्‍चात न्‍यायालय के निर्णय कि ब्राह्मण बलात्‍कार नहीं कर सकते, जैसी तमाम घटनाओं ने समाज में उथल-पुथल मचायी। आज भी तमिलनाडु के कई क्षेत्रों में चाय की दुकानों में दलितों हेतु अलग कप की व्‍यवस्‍था है, मध्‍य प्रदेश के छतरपुर में दलितों को बालों की कटिंग कराने से मना कर दिया जाता है, दलित दूल्‍हे को सवर्णों के घर के सामने से घोड़ी पर चढ़कर जाने हेतु मारा-पीटा जाता है, देश की राजधानी दिल्‍ली से सटे हरियाणा के गोहाना कस्‍बे में दिनदहाड़े दलित बस्‍ती को आग के हवाले कर दिया जाता है, फरीदाबाद के एक गाँव में मन्‍दिर में पूजा कर लेने के कारण दलित व्‍यक्‍ति की मूँछें काट दी जाती हैं.........ऐसे न जाने कितने उदाहरण आज भी समाज में देखने को मिल जाते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि समाज में अस्‍पृश्‍यता और विषमता की भावना आज भी विद्यमान है।

उपरोक्‍त परिस्‍थितियों में यह सवाल तर्कसंगत हो जाता है कि क्‍या जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल पर पाबंदी अथवा कानूनी रोक से समाज में समरसता बढ़ जाएगी? भारत में जाति राजनैतिक और सामाजिक सुरक्षा का परिचायक है। कुछ लोग इसे अपने पूर्वजों की विरासत और संस्‍कृति से जोड़कर देखते हैं तो कुछ हेतु निम्‍न जाति में जन्‍म पूर्वजन्‍मों के कर्मों का संचित फल है। यदि हम आंकड़ों में देखें तो 1991 की जनसंख्‍या के अनुसार देश की कुल जनसंख्‍या में अनुसूचित जातियों और जनजातियों का प्रतिशत क्रमशः 16.54 व 8.08 था। 1 जनवरी 2002 को केन्‍द्र सरकार की सेवाओं में अनुसूचित जाति और जनजातियों का सम्‍मिलित प्रतिनिधित्‍व मात्र 6.12 प्रतिशत था। अनुसूचित जातियों में जहाँ 542, वहीं जनजातियों में करीब 550 जनजातियाँ शामिल हैं। समाज में व्‍याप्‍त विषमता के मद्‌देनजर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्‍य पिछड़े वर्गों को क्रमशः 15, 7.5 व 27.5 प्रतिशत आरक्षण संविधान द्वारा प्रदत्‍त किया गया है ताकि वे भी प्रशासनिक निर्णयों में भागीदार बन अपना जीवन स्‍तर सुधार सकें। इसी प्रकार अनुसूचित जाति और जनजाति हेतु लोकसभा व विधानसभा में सीटें आरक्षित की गई हैं तथा इनके कल्‍याणार्थ विभिन्‍न आयोग बनाए गए हैं। जातिसूचक शब्‍दों का इस्‍तेमाल समाप्‍त करने के मायने सभी जातियों को एक ही धरातल पर खड़ा करना होगा। क्‍या आज के दौर में आरक्षण प्राप्‍त जातियाँ अपने इस अधिकार को खोकर जातिविहीन समाज की तरफ अग्रसर होंगी या जाति के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने वाले सभी राजनैतिक दल इसका समर्थन करेंगे? एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि क्‍या जाति व्‍यवस्‍था के उन्‍मूलन पश्‍चात हम पुनः कर्म आधारित वर्णाश्रम व्‍यवस्‍था की ओर लौट रहे हैं, जहाँ जन्‍मना व्‍यवस्‍था की बजाय कर्म आधारित व्‍यवस्‍था होगी? गाँधी जी का यह सपना कि सभी लोग शारीरिक श्रम करेंगे वाकई फलीभूत होने जा रहा है? क्‍या ब्राह्मण जूता पालिश करना पसन्‍द करेंगे और दलित पुरोहिती करेंगे? निश्‍चिततः जाति व्‍यवस्‍था के उन्‍मूलन से पहले इन सवालों का जवाब ढूँढ़ना होगा।

आधुनिक भारतीय सेना में भी जाति आधारित रेजिमेंट हैं- डोगरा, राजपूत, सिख, महार इत्‍यादि रेजिमेंट। सेना इसे विविधता और धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक रूप में देखती है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित राष्‍ट्रों के लिए पासपोर्ट हेतु आवेदन करने पर जाति अर्थात सरनेम वाले कॉलम को भरना अनिवार्य होता है, जातिसूचक शब्‍दों के हटाने पर क्‍या होगा? क्‍या जातिसूचक शब्‍द हटने पर अन्‍तर्जातीय विवाह सम्‍पन्‍न होंगे और गोत्रों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा? फिर हरियाणा के झज्‍जर जिले की कोई जाति-पंचायत रामपाल दहिया और सोनिया जैसे लोगों को एक गोत्र होने के कारण पति-पत्‍नी की बजाय भाई-बहन के रूप में रहने का आदेश नहीं दे सकेगी? फिर कोई दलित धर्मान्‍तरण के लिए मजबूर नहीं होगा? फिर कोई फर्जी जाति प्रमाणपत्रों के साथ सरकारी नौकरी में प्रवेश हेतु षडयंत्र नहीं रचेगा? क्‍या फिर विभिन्‍न समाचार पत्रों के वैवाहिक विज्ञापन जो कि जाति आधारित कालमों में निर्मित होते हैं, बन्‍द हो जायेंगें? क्‍या यह पाबन्‍दी हिन्‍दुओं के साथ-साथ मुस्‍लिम, सिक्‍ख, ईसाईयों इत्‍यादि पर भी लगेगी? फिर ऐसे नामों का क्‍या होगा, जो कि धर्म विश्‍ोष का होने को इंगित करते हैं, मसलन हिन्‍दुओं में राम, श्‍याम, राधा, सीता इत्‍यादि, मुस्‍लिमों में आसिफ, जावेद, महबूब इत्‍यादि एवं ईसाईयों में जोसेफ, टोनी इत्‍यादि? क्‍या सरकार समाज के निचले स्‍तर तक यह व्‍यवस्‍था कर पायेगी कि किसी के साथ दोयम व्‍यवहार न किया जाये और प्रशासन व राजनीति में भाई-भतीजावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद का कोई अर्थ नहीं रहेगा? निश्‍चिततः जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल पर रोक लगाने से पहले इन सवालों का जवाब ढूँढ़ना पड़ेगा।

भारत विविधताओं का देश है। यही कारण है कि यहाँ पर लोकतंत्र को शासन प्रणाली के रुप में चुना गया है और धर्मनिरपेक्ष राष्‍ट्र होने के कारण लोगों को अपने स्‍तर पर धर्मों में विश्‍वास करने व तद्‌नुसार संस्‍कार अपनाने की स्‍वतन्‍त्रता दी गई है। क्‍या लोगों को जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल से रोककर उनकी निजता और विशिष्‍ट सामाजिक पहचान में खलल नहीं डाला जाएगा? यदि इस तर्क को किनारे भी कर दें तो फिर हर व्‍यक्‍ति की पहचान का आधार क्‍या होगा और जीवन के विभिन्‍न संस्‍कारों को वह किन रीति-रिवाजों के आधार पर अपनाएगा? यह कहना कि लोग जातिसूचक शब्‍दों की बजाय अपने व्‍यवसाय और शैक्षणिक डिग्रियों को नाम के साथ लगायें, एक नजर में आकर्षक अवश्‍य लगता है पर बेरोजगारों की लम्‍बी फौज को मात्र डिग्रियों के आधार पर पहचान देना सम्‍भव नहीं। यहाँ तक कि सरकारी दफ्‍तरों से लेकर समाज के निचले पायदान तक लोग एक-दूसरे को सम्‍बोधित करने हेतु जातिसूचक शब्‍दों का ही इस्‍तेमाल करते हैं। पुलिस भी अपराधियों में अन्‍तर हेतुु इन विशिष्‍ट जातिसूचक चिन्‍हों का इस्‍तेमाल करती है। ऐसे में यह जरुरी है कि जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल पर पाबंदी से पहले उनका समर्थ विकल्‍प भी पेश किया जाए। इसमें कोई शक नहीं कि जाति एक सामाजिक बुराई है, पर क्‍या मात्र जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल पर पाबन्‍दी से इसकी बुराईयाँ खत्‍म हो जाएंगी? जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल पर रोक और जातिवाद का उन्‍मूलन दोनों दो चीजें हैं तथा जब तक इस हेतु दृढ़ राजनैतिक-सामाजिक इच्‍छाशक्‍ति नहीं हो इसे खत्‍म करना सम्‍भव नहीं। पर यदि वाकई हम इस ओर गम्‍भीर हैं, तो निम्‍न बिन्‍दुओं को आत्‍मसात्‌ करना होगा-

q समाज में अन्‍तर्जातीय विवाहों को प्रोत्‍साहित करने की आवश्‍यकता।

q सभी राजनैतिक दलों में इस विषय पर एकरुपता की आवश्‍यकता।

q जातिवाद की बुराईयों के विरुद्ध सामाजिक संवेदना पैदा करने की आवश्‍यकता।

q मानवीय व्‍यवहार और सोच में परिवर्तन की आवश्‍यकता।

q प्रभावी शैक्षणिक पाठ्‌यक्रमों के माध्‍यम से विद्यार्थियों और युवाओं को एक नया समाज बनाने की ओर अग्रसर करने की आवश्‍यकता।

q जातिवाद के साथ-साथ भाई-भतीजावाद, सम्‍प्रदायवाद, क्षेत्रवाद इत्‍यादि के समूल उन्‍मूलन की आवश्‍यकता।

q जातिवाद के उन्‍मूलन से पहले सभी दलित और पिछड़ी जातियों को समाज के अन्‍य वर्गों के समकक्ष लाने की आवश्‍यकता।

q जातिवाद के उन्‍मूलन से पूर्व सभी जातियों और धर्मों हेतु एक समान नागरिक संहिता की आवश्‍यकता।

q नगरीकरण को बढ़ावा देने की आवश्‍यकता। डॉ0 अम्‍बेडकर भी शहरीकरण को छुआछूत और जातिगत अत्‍याचार का इलाज मानते थे।

जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल पर रोक एक आदर्श और सिद्धान्‍त रूप में प्रभावी लगता है। पर क्‍या वाकई समाज में इतनी समरसता आ गई है कि इस ओर कदम उठाये जाएं। कहीं जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल पर रोक के बहाने आरक्षण को समाप्‍त करने का षडयंत्र तो नहीं रचा जा रहा है? समाज अभी भी संक्रमण अवस्‍था में है और दलित व पिछड़े वर्ग के लोग निर्णयों में अपनी भागीदारी बढ़ाने हेतु निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण की माँग कर रहे हैं। क्‍योंकि निजी क्षेत्र में सरकारी क्षेत्र की बजाय रोजगार के अवसर ज्‍यादा बढ़े हैं और विनिवेश के जरिए तमाम सरकारी उपक्रमों को पहले निगम और फिर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। शहरों में जाति व्‍यवस्‍था के कुप्रभाव भले ही कम दिखें पर ग्रामीण अंचलों में यह व्‍यवस्‍था अभी भी उतनी ही मजबूती से जड़ जमाये हुए है। समाज को डॉ0 अम्‍बेडकर से सीख लेनी चाहिए जिन्‍होंने छुआछूत और जातिवाद की बुराइयों के विरुद्ध लड़ते हुए अन्‍ततः हिन्‍दू धर्म को छोड़ बौद्ध धर्म ग्रहण करना मुनासिब समझा। डॉ0 अम्‍बेडकर इस तथ्‍य को भलीभांति जानते थे कि हिन्‍दू धर्म में जातिवाद का जो गहरा बीज बोया गया है उसे उखाड़ना इतना आसान नहीं है। इस तथ्‍य पर भी गौर करना चाहिए कि जब तक तराजू के दोनों पलड़े बराबर न हों बाहरी समता का कोई अर्थ नहीं। मात्र जातिसूचक शब्‍दों के इस्‍तेमाल पर रोक से जातिवाद की बुराइयों का उन्‍मूलन नहीं किया जा सकता। इस हेतु एक दृढ़ राजनैतिक-सामाजिक इच्‍छा शक्‍ति और एक नई जीवन श्‍ौली के इजाद की आवश्‍यकता है।

राम शिव मूर्ति यादव

स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा अधिकारी (सेवानिवृत्‍त)

तहबरपुर, पोस्‍ट- टीकापुर आजमगढ़ (उ0प्र0)-276208

rsmyadav@rediffmail.com

जीवन -वृत्‍त

नाम ः राम शिव मूर्ति यादव

जन्‍म तिथि ः 20 दिसम्‍बर 1943

जन्‍म स्‍थान ः सरांवा, जौनपुर (उ0 प्र0)

पिता ः स्‍व0 श्री सेवा राम यादव

ख्‍

शिक्षा ः एम0 ए0 (समाज शास्‍त्र), काशी विद्यापीठ, वाराणसी

लेखन ः देश की विभिन्‍न प्रतिष्‍ठित पत्र-पत्रिकाओं- अरावली उद्‌घोष, युद्धरत आम आदमी, समकालीन सोच,

आश्‍वस्‍त, अपेक्षा, बयान, अम्‍बेडकर इन इण्‍डिया, अम्‍बेडकर टुडे, दलित साहित्‍य वार्षिकी, दलित टुडे,

मूक वक्‍ता, सामर्थ्‍य, सामान्‍यजन संदेश, समाज प्रवाह, गोलकोण्‍डा दर्पण, शब्‍द, कमेरी दुनिया, जर्जर

कश्‍ती, प्रेरणा अंशु, यू0एस0एम0 पत्रिका दहलीज, दि मॉरल, इत्‍यादि में विभिन्‍न विषयों पर लेख

प्रकाशित। इण्‍टरनेट पर विभिन्‍न वेब-पत्रिकाओं में लेखों का प्रकाशन।

प्रकाशन ः सामाजिक व्‍यवस्‍था एवं आरक्षण (1990)। लेखों का एक अन्‍य संग्रह प्रेस में।

ख्‍ख्‍

सम्‍मान ः भारतीय दलित साहित्‍य अकादमी द्वारा ‘‘ज्‍योतिबा फुले फेलोशिप सम्‍मान‘‘।

राष्‍ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ''भारती ज्‍योति'' सम्‍मान।

रूचियाँ ः रचनात्‍मक लेखन एवं अध्‍ययन, बौद्धिक विमर्श, सामाजिक कार्यों में रचनात्‍मक भागीदारी।

सम्‍प्रति ः उत्‍तर प्रदेश सरकार में स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्‍ति पश्‍चात स्‍वतन्‍त्र
लेखन व अध्‍ययन एवं समाज सेवा।

ख्‍सम्‍पर्क ः श्री राम शिव मूर्ति यादव, स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा अधिकारी (सेवानिवृत्‍त), तहबरपुर, पो0-टीकापुर,

आजमगढ ़(उ0प्र0)-276208 ई-मेल ः rsmyadav@rediffmail.com

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