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शिवराज गूजर की लघुकथा : नजरिया

(लघु कथा)

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नजरिया

‘सीट दो की ह तो क्या, थोड़ा-सा खिसककर किसी को बैठा लेंगे तो क्या चला जाएगा? इंसानियत भी कोई चीज होती ह।’

बस में मेरी बगल में खड़े सज्जन सीटों पर बैठे लोगों को कोसते हुए बड़बड़ा रहे थे। अगले स्टॉपेज पर सामने वाली सीट से एक आदमी उठा, तो उन महाशय को भी सीट मिल गई। वे भी मेरी तरह ही दुबले-पतले थे। सीट में थोड़ी जगह दिखाई दे रही थी। इससे मुझे भी थोड़ी उम्मीद जगी।

मैंने उनसे कहा, ‘भाई साहब! थोड़ा खिसक जाओ तो मैं भी अटक जाऊं।’

इतना सुनते ही वे भड़क गए।

बोले, ‘सीट दो की है और हम दो ही बैठे ह। कहां जगह दिख रही ह तुम्हें? अपनी सहूलियत देखते ह सब, दूसरे की परेशानी नहीं समझते। ’

अब मुझे समझ आ गया था कि दो की सीट पर दो ही लोग क्यों बैठे थे।

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शिवराज गूजर

 

mail….shivraj@gmail.com

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Waah !
Steek !
lajawaab !
Is sankshipt kalewar me poori maansikta chitrit kar dee aapne..Sadhuwaad..

वक्त वक्त की बात है. इंसान वक्त के साथ चलता है तो क्या हुआ...

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