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सीताराम गुप्ता का आलेख : उत्‍साह एवं कर्मण्‍यता का पुनर्जन्‍म ही तो है सेवानिवृत्ति

sitaram gupta

लोग प्रायः कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद सक्रिय जीवन का अवसान हो जाता है मगर मैं पूछता हूँ कि किसी महीने की अंतिम तारीख तक तो आप एकदम सक्रिय रहे लेकिन अगले महीने की पहली ही तारीख को प्रातः उठते ही आप कैसे निष्‍क्रिय हो गए? ये वास्‍तव में हमारी सोच का दोष है। हमारी इसके लिए कंडीशनिंग हो चुकी है। इस स्‍थिति से उबरना ज़रूरी है। रिटायर हम नहीं होते रिटायर होता है हमारा कमज़ोर मन और उसमें उत्‍पन्‍न विकार जो हमें रिटायर कर देते हैं।

सेवानिवृत्ति एक महत्‍वपूर्ण परिवर्तन है। एक नए जीवन की शुरूआत ही नहीं बल्‍कि पुनर्जन्‍म है सेवानिवृत्ति। ये हमारी ही मान्‍यता है कि साठ वर्ष के उपरांत व्‍यक्‍ति की कार्यक्षमता कम हो जाती है अतः सेवानिवृत्ति हो जानी चाहिए। रिटायरमेंट किसी अवस्‍था विशेष की स्‍थिति नहीं है बल्‍कि रिटायरमेंट तो हर क्षण घटित होने वाली स्‍थिति है। जब भी मौक़ा मिले रिटायर हो जाइए लेकिन अपने कमज़ोर मनोभावों तथा विकारों से। रिटायरमेंट एक नई शुरूआत है, एक बेहतर और नए जीवन जीवन की शुरूआत।

सेवानिवृत्ति स्‍वयं को जानने तथा उत्तरदायित्‍वों के पुनः आबंटन का ही अवसर है। नए जीवन की नए ढंग से जोरदार शुरूआत कीजिए। जीवन की इस अंतिम पारी को अभूतपूर्व आनंद और उत्‍साह के साथ पूरा कीजिए। सक्रिय जीवन से रिटायरमेंट न लेने वाला कभी रिटायर या वृद्ध नहीं होता। रिटायरमेंट के बाद या वृद्धावस्‍था में अत्‍यंत सक्रिय जीवन व्‍यतीत कीजिए इससे पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ रह सकेंगे।

एक कहानी याद आ रही है। एक राजा को सुंदर-सुंदर इमारतें बनवाने का बेहद शौक था। राजा शिल्‍पियों का आदर भी करता था और उन्‍हें उचित पारिश्रमिक के अलावा पुरस्‍कार भी देता था। इन्‍हीं शिल्‍पियों में एक अत्‍यंत अनुभवी शिल्‍पी भी था जो अब वृद्ध हो गया था। उसने वर्षों तक राज्‍य की सेवा करते हुए अनेक उत्‍कृष्‍ट भवनों का निर्माण किया था। राजा उसे बहुत मानते थे। शिल्‍पी ने एक दिन राजा से कहा, ‘‘महाराज मैंने जीवन भर राज्‍य की सेवा की है लेकिन अब में वृद्ध हो गया हूँ इसलिए मुझे राज्‍य की सेवा से मुक्‍त करने की कृपा करें।''

राजा ने शिल्‍पी की बात बड़े ध्‍यानपूर्वक सुनी और उससे कहा, ‘‘शिल्‍पीश्रेष्‍ठ आपकी सेवाओं के लिए मैं ही नहीं पूरा राज्‍य तुम्‍हारा ऋणी है। आपको सेवानिवृत्त होने का पूरा अधिकार है लेकिन मेरी ख्‍़वाहिश है कि सेवानिवृत्ति से पहले आप मेरे लिए एक भवन और बनाएँ जो आज तक बने सभी भवनों से श्रेष्‍ठ व उत्‍कृष्‍ट हो।'' शिल्‍पी भवन बनाने के काम में जुट गया लेकिन बेमन से। उसने उस श्रेष्‍ठता व उत्‍कृष्‍टता का परिचय नहीं दिया जिसकी उससे अपेक्षा थी। बस किसी तरह भवन पूरा कर दिया और एक दिन फिर राजा के सामने जा खड़ा हुआ और राजा से प्रार्थना की, ‘‘महाराज मैंने आपकी आज्ञा के अनुसार नया भवन भी तैयार कर दिया है इसलिए अब मुझे राज्‍य की सेवा से शीघ्र मुक्‍त करने की कृपा करें।''

हाँ आज से आप राज्‍य की सेवा से मुक्‍त हुए। मैं आपकी कला से अत्‍यंत प्रभावित हूँ और आपको विशेष रूप से पुरस्‍कृत करना चाहता हूँ और इसीलिए मैंने आपसे इस उत्‍कृष्‍ट भवन का विश्‍ोष रूप से निर्माण करवाया है ताकि आपको पुरस्‍कार स्‍वरूप ये भवन दे सकूँ। शिल्‍पी प्रसन्‍न तो हुआ लेकिन उसे इस बात का बेहद अफ़सोस भी हुआ कि उसने इस भवन का निर्माण पूरे मन से नहीं किया और उसमें अनेक कमियाँ रह गईं।

हमारी सेवानिवृत्ति के बाद की अवस्‍था भी प्रायः कुछ ऐसी ही होती है जहाँ हम अपनी श्रेष्‍ठता को नज़रअंदाज़ कर अनमने से होकर कार्य करते लगते हैं जबकि इस दौरान किया जाने वाला कार्य ही हमारा वास्‍तविक पुरस्‍कार होता है। अकर्मण्‍यता अथवा अनुत्‍साह के कारण हम स्‍वयं अपना पुरस्‍कार खो देते हैं। हममें अदम्‍य उत्‍साह और ऊर्जा है। ज़रूरत है तो सिर्फ उसको जानने की और उसका उपयोग करने की। दुष्‍यंत कुमार के शब्‍दों में:

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता?

एक पत्‍थर तो तबीयत से उछालो यारों।

साभार ः ‘‘द स्‍पीकिंग ट्री'' नवभारत टाइम्‍स, नई दिल्‍ली, दिनांक ः 08ः11ः2008

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सीताराम गुप्‍ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्‍ली-110034

srgupta54@yahoo.co.in

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