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December 2008
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नए साल पर दे रहा है ‘ अनुज ' कविता की सौगात

 

खुशियां झूमे आंगन तेरे, गा उठे हर जज़्बात

हर वक्‍त मिले, तुझे ही मिले, फूलों का बिछौना

महरूम न रहे खुशियों से, तेरे मन का कोई कोना

फूल-कलियों पर ही लेटकर गुजरे पूनम की हर रात

नए साल पर दे रहा है ‘ अनुज ' कविता की सौगात

खुशियां झूमे आंगन तेरे, ․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․

 

पास के भी न गुजरे तू गम-ओ-उदासियों से

महफूज रखे तुमको खुदा इन जालिम मायूसियों से

हर वक्‍त हो, तुमसे ही हो , खुशियों की मुलाकात

नए साल पर दे रहा है ‘ अनुज ' कविता की सौगात

खुशियां झूमे आंगन तेरे, ․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․

 

तेरी पसंद के सदा आते रहें अंजाम हर लम्‍हों में

इज़ाफा इकतार होता रहे, तेरी खुशी के लम्‍हों में

न समा सके तेरे दिल की अंगनाई में , मिले ख़ुशी इफरात

नए साल पर दे रहा है ‘ अनुज ' कविता की सौगात

खुशियां झूमे आंगन तेरे, ․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․

 

डॉ․अनुज नरवाल रोहतकी

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जो भी होता है वो पहले से लिखा होता है
हर एक राज़ लकीरों में छुपा होता है


लिखने वाला ही लिख पाता है नसीब अपना
हर किसी में कहाँ ये होसला होता है


कुछ तो बतलाओ किस बात पे बिगड़ते हो
कोई अपनों से भला यूँ भी खफा होता है


मैने की हो खता तो इसका मुझे होश नहीं
इश्क़ तो इश्क़ है और इश्क़ नशा होता है


बात कुछ तो नज़र आई है तुझ में "घायल"
वरना यूँ कौन भला किस पे फिदा होता है


=साबिर "घायल"
बुंदेला नगर
दातिया

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दो कविताएँ

प्रश्‍न चिन्‍ह

कचरे के ढेर से

पन्‍नी बीनती हुई लड़कियाँ,

कंधे पर

अपनी ऊँचाई सदृश्‍य,

लटकाए हुए थैला।

मैले-कुचैले फटे वस्‍त्र,

बिखरे हुए बाल,

रिसती हुई नाक,

पीले-से दांत।

अपने बेकार बाप,

आलसी माँ

और

आवारा भाईयों का

पेट भरने के लिए,

ढोती हैं गृहस्‍थी का बोझ।

स्‍कूल जाने की उम्र में,

पन्‍नी बीनते हुए

लगाती हैं प्रश्‍न चिन्‍ह

सर्व शिक्षा अभियान पर।

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डॉट

वह छोटी-सी लड़की

बघारते हुए दाल।

डालती है

टी.व्‍ही. में दिखाए गए

सभी मसाले।

फिर भी

खाती है डॉट।

पिता से

भाई से

माँ से

बड़ी बहन से।

क्‍योंकि

वह पैदा हुई है

इसीलिए।

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लघुकथा

स्‍थापना

वे नगर सेठ हैं, कई मिलों के मालिक, कारखाने चल रहे हैं, आढत है। उनका नगर में रूतबा है। स्‍थानीय संस्‍थाओं, पुलिस तथा प्रशासन में तूती बोलती है। किसी की भी क्‍या मजाल कि चूं चपड़ कर सके।

उस रविवार स्‍थानीय समाचार पत्र में नगरपालिका का टेण्‍डर छपा था। उनके घर के सामने से बहने वाले अधूरे नाले के निर्माण कार्य पूर्ण करने की छोटी सी निविदा थी वह।

वह निविदा स्‍वीकृत हुई, निर्माण कार्य की तैयारी भी प्रारंभ हुई। लेकिन नाले का निर्माण शुरू नहीं हो सका।

वजह! सेठ जी ने नाले के किनारे, अपने विशाल भवन की चहारदीवारी के पास हनुमान जी की मूर्ति की स्‍थापना जो कर रखी थी।

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अखिलेश शुक्‍ल

संपादक ‘कथा चक्र'

63, तिरूपति नगर,

इटारसी 461111 (म.प्र.)

फो. (07572)240900

मो. 09229532367

रपट-

पंत-शैलेश के बहाने साहित्‍यिक विमर्श

अपनी समग्रता में उत्त्‍ाराखण्‍ड को पहली बार महाकवि सुमित्रानंदन पंत और कथाशिल्‍पी शैलेश मटियानी की रचनाओं के द्वारा जाना गया। यहाँ की प्रकृति को पंत ने उजागर किया तो मटियानी ने यहाँ के आम आदमी को। मटियानी से पहले इस क्षेत्र को लोग एक खूबसूरत प्राकृतिक और आध्‍यात्‍मिक स्‍थान के रूप में जानते थे, जहाँ देवता निवास करते हैं। इस सुंदर ‘देवभूमि' के अंदर हाड.मांस के मामूली लोग भी रहते हैं, यह बात लोगों को मालूम नहीं थी। यह ठीक है कि पंत और मटियानी अलग-अलग विधाओं के लेखक हैं, मगर इन दोनों को एक साथ रखे बगैर इस क्षेत्र का पूरा बिंब सम्‍भव नहीं है। इस रूप में ये दोनों लेखक एक-दूसरे के पूरक हैं। इन्‍हीं बातों को ध्‍यान में रखते हुए पिछले दिनों (14 से 16 नवम्‍बर, 2008) महादेवी वर्मा सृजन पीठ, कुमाऊँ विश्‍वविद्यालय द्वारा संस्‍कृति विभाग, उत्त्‍ाराखण्‍ड शासन के सहयोग से पंत की जन्‍मस्‍थली कौसानी में ‘पंत-शैलेश स्‍मृति' शीर्षक से विमर्श और कविता-पाठ का एक वृहद्‌ कार्यक्रम आयोजित किया गया।

हिन्‍दी आज एक ओर अपने अस्‍तित्‍व के अनेकमुखी संकटों से गुजर रही है तो दूसरी ओर उसकी लोकभाषाएँ उससे भी गम्‍भीर संकट की शिकार हैं। साहित्‍य तो दूर, बोलचाल की भाषा में तक लोकभाषाओं का प्रयोग गायब होता जा रहा है। अपनी जड़ों की भाषा की इसी स्‍थिति पर विचार करते हुए लगा कि अपने कवियों-लेखकों के साथ समाज का सीधा संवाद स्‍थापित करके ही शायद कुछ बात बन सकती है। समाज का सबसे संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण साहित्‍य ही आखिरी आदमी की खबर लेता है। इसलिए तेजी से बदलते हुए अपने इस दौर में हम अपनी पूर्ववर्ती दो पीढ़ियों के युगप्रवर्तक रचनाकारों-सुमित्रानंदन पंत और शैलेश मटियानी का स्‍मरण करते हुए दिशा पा सकते हैं।

सम्‍मेलन का उद्‌घाटन उत्त्‍ाराखण्‍ड के राज्‍यपाल श्री बी․ एल․ जोशी ने किया। उन्‍होंने कवि सुमित्रानंदन पंत तथा कथाकार शैलेश मटियानी का भावपूर्ण स्‍मरण करते हुए कहा कि उत्त्‍ाराखण्‍ड की धरती के ये दोनों रचनाकार अपनी-अपनी विधा के महारथी रहे हैं। पंत साहित्‍य में उन्‍होंने अरविन्‍द दर्शन के प्रभाव को रेखांकित किया तो दूसरी और मटियानी साहित्‍य में उत्त्‍ाराखण्‍ड के आम आदमी के संघर्ष की पीड़ा को। संगोष्‍ठी के विशिष्‍ट अतिथि उत्त्‍ाराखण्‍ड के संस्‍कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री प्रकाश पंत ने प्रतिभागियों का आहवान किया कि वे उत्त्‍ाराखण्‍ड और हिन्‍दी साहित्‍य तथा यहाँ कि स्‍थानीय भाषाओं को राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय मानचित्र पर लाने में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायेंगे।

कुमाऊँ विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो․ सी․ पी․ बर्थवाल ने भारत के विभिन्‍न कोनों से आये हिन्‍दी, हिन्‍दीतर भाषाओं तथा कुमाउंनी, गढ़वाली, जौनसारी एवं भोटिया भाषा के विद्वानों का स्‍वागत करते हुए तीन दिन तक चलने वाले इस विचार-विमर्श एवं कविता पाठ को लेकर आशा व्‍यक्‍त की कि इससे उत्त्‍ाराखण्‍ड में मुख्‍य धारा की साहित्‍यिक संस्‍कृति का परिचय प्राप्‍त होगा। उद्‌घाटन सत्र में मद्रास विश्‍वविद्यालय के पूर्व हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष प्रो․ एम․ शेषन ने दक्षिण भारतीय भाषाओं में हिन्‍दी साहित्‍यकारों विशेष रूप से सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, इलाचन्‍द्र जोशी तथा शैलेश मटियानी के महत्‍व को रेखांकित किया।

महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो․ बटरोही ने संगोष्‍ठी के उद्देश्‍य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिन्‍दीतर भारतीय भाषाओं में उत्त्‍ाराखण्‍ड तथा हिन्‍दी भाषा व साहित्‍य की स्‍थिति का पता लगाने के लिए इस त्रि-दिवसीय संगोष्‍ठी में आठ भाषाओं - तमिल, तेलुगु, कन्‍नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, बांग्‍ला तथा ओडिया के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया। उन्‍होंने उत्त्‍ाराखण्‍ड में साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी के तत्‍काल निर्माण की आवश्‍यकता पर जोर दिया और कहा कि किसी भी राज्‍य की भावात्‍मक एकता और स्‍थिरता के क्षेत्र में वहाँ के साहित्‍यकार एवं संस्‍कृतिकर्मी कवच का काम करते हैं। राज्‍य की स्‍थिरता उसके विकास कार्यो से तो निर्धारित होती ही है, उन कार्यों का वहाँ के नागरिकों में सकारात्‍मक एवं स्‍थायी प्रभाव साहित्‍य-संस्‍कृति से जुड़ी संस्‍थाओं का ही पड़ता है।

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वरिष्‍ठ कवि लीलाधर जगूडी ने अपने आधार व्‍याख्‍यान ‘उत्त्‍ाराखण्‍ड के रचनाकारों के संघर्ष और सौंदर्य की दुनिया' में हिन्‍दी एवं उसकी लोकभाषाओं में सृजनरत्‌ रचनाकारों के सामने आने वाली चुनौतियों एवं संघर्षों का विस्‍तार से जिक्र किया। हिन्‍दी कविता को एक नई तथा रचनात्‍मक भाषा प्रदान करने के

संदर्भ में उन्‍होंने सुमित्रानंदन पंत, चंद्रकुँवर बर्त्‍वाल तथा मंगलेश डबराल का विशेष रूप से उल्‍लेख किया। इन कवियों में उनके अनेक समकालीन भी शामिल हैं जिनमें न केवल नई कलात्‍मक भाषा का बल्‍कि अत्‍यन्‍त प्रभावशाली बिम्‍बों, प्रतीकों का ऐसा प्रयोग दिखाई देता है जिसने हिन्‍दी कविता को नए आयाम प्रदान किये।

संगोष्‍ठी के प्रथम सत्र का विषय था ‘हिन्‍दीतर प्रान्‍तों में हिन्‍दी साहित्‍य और उत्त्‍ाराखण्‍ड'। इस सत्र की अध्‍यक्षता उस्‍मानिया विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद की पूर्व हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष प्रो․ पी․ माणिक्‍याम्‍बा ने की। आन्‍ध्र विश्‍वविद्यालय, विशाखापट्‌नम की प्रो․ के․ लीलावती ने आन्‍ध्र प्रदेश एवं तेलुगु भाषा में हिन्‍दी साहित्‍य के पठन-पाठन का उल्‍लेख करते हुए बताया कि आन्‍ध्र में विश्‍वविद्यालय के पाठ्‌यक्रम में हिन्‍दी केे पुराने लेखक तो शामिल हैं लेकिन नये लेखकों से अभी उनका परिचय नहीं है। उदाहरण के लिए पंत को तो लोग जानते हैं लेकिन शैलेश मटियानी को नहीं।

कर्नाटक विश्‍वविद्यालय, धारवाड. की हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष प्रो․ सुमंगला एस․ मुम्‍मिगट्टी ने कर्नाटक में हिन्‍दी साहित्‍य एवं उत्त्‍ाराखण्‍ड के रचनाकारों का विस्‍तार से परिचय दिया। उन्‍होंने भी यही बात कही कि छायावादी काल तक के कवियों, लेखकों को तो वहाँ के हिन्‍दी पाठ्‌यक्रम में शामिल किया है लेकिन नये साहित्‍यकारों को नहीं। प्रो․ मुम्‍मिगट्टी ने हिन्‍दी की बोलियों तथा उपभाषाओं से जुड़े साहित्‍य विशेष रूप से अवधि, ब्रज आदि को लेकर अध्‍यापन में आने वाली कठिनाईयों का उल्‍लेख किया।

मद्रास विश्‍वविद्यालय, चेन्‍नई के प्रो․ एम․ शेषन ने तमिलनाडु में हिन्‍दी शिक्षण तथा हिन्‍दी साहित्‍य की स्‍थिति पर आलेख प्रस्‍तुत किया। इस संदर्भ में उन्‍होंने विशेष रूप से महादेवी वर्मा के वैचारिक गद्य का उल्‍लेख करते हुए कहा कि महादेवी की तरह का वैचारिक साहित्‍य किसी भी भारतीय भाषा में नहीं है। उन्‍होंने महादेवी की गद्य रचनाओं के सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद पर विशेष बल दिया।

पुरी (उड़ीसा) से आयी हुई ओडिया की प्रसिद्ध कवयित्री शैलबाला महापात्र ने उड़ीसा में हिन्‍दी साहित्‍य की स्‍थिति को रेखांकित किया और बताया कि आधुनिक ओडिया साहित्‍य में भी लगभग उसी प्रकार के काव्‍य आंदोलन मिलते हैं जैसे कि हिन्‍दी साहित्‍य में। उन्‍होंने ओडिया और हिन्‍दी के समकालीन साहित्‍य पर आलेख प्रस्‍तुत किया। गंजम (उड़ीसा) से आये हुए राजनैतिक शास्‍त्र के प्राध्‍यापक एवं अनुवादक डॉ दासरथी भुइयाँ ने समकालीन ओडिसा साहित्‍य का परिचय देते हुए हिन्‍दी के महत्‍वपूर्ण कवियों के ओडिया में अनुदित साहित्‍य का उल्‍लेख किया।

गुजरात विश्‍वविद्यालय, अहमदाबाद की हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष प्रो․ रंजना अरगडे ने विस्‍तार से गुजरात में हिन्‍दी साहित्‍य के विभिन्‍न रचना आंदोलनों एवं शोध कार्यों का उल्‍लेख किया। साथ ही समकालीन हिन्‍दी साहित्‍य के गुजराती में हुए अनुवाद का विस्‍तृत परिचय दिया। अहमदाबाद की ही हिन्‍दी प्राध्‍यापिका डॉ․ नयना डेलीवाला ने शैलेश मटियानी के साहित्‍य पर हो रहे शोधकार्यों का विशेष रूप से उल्‍लेख करते हुए उन्‍हें दलित चेतना का एक ऐसा प्रखर रचनाकार बताया जिस पर और अधिक विस्‍तार से काम किये जाने की आवश्‍यकता है।

अध्‍यक्ष पद से बोलते हुए प्रो․ पी․ माणिक्‍याम्‍बा ने आन्‍ध्र प्रदेश में हिन्‍दी साहित्‍य की वर्तमान स्‍थिति का परिचय दिया तथा विशेष रूप से सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, प्रेमचंद, अज्ञेय तथा नये कवियों लीलाधर जगूडी, मंगलेश डबराल के साहित्‍यिक अनुवाद को लेकर प्रकाशित साहित्‍य का उल्‍लेख किया।

‘पंत-शैलेश स्‍मरण' सत्र में सुमित्रानंदन पंत तथा शैलेश मटियानी के संपर्क में आये वरिष्‍ठ तथा नये रचनाकारों ने अपने भावपूर्ण संस्‍मरण सुनाये। सत्र की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ कथाकार प्रदीप पंत ने की। उपन्‍यासकार पंकज बिष्‍ट ने मटियानी को लेकर अनेक प्रसंगों का उल्‍लेख किया और कहा कि अगर किसी साहित्‍यकार का लेखन सही-गलत का विवेक प्रस्‍तुत नहीं करता और पाठक में सही के पक्ष में खड़े होने का सामर्थ्‍य पैदा नहीं करता तो उसकी कोई उपादेयता नहीं है। उन्‍होंने शैलेश मटियानी के साहित्‍य को इस प्रकार के विवेक से युक्‍त बताया। पत्रकार एवं उपन्‍यासकार नवीन जोशी ने सुमित्रानंदन पंत तथा मटियानी को लेकर आत्‍मीय प्रसंगों का उल्‍लेख किया और कहा कि उनके व्‍यक्तित्‍व ने ही उन्‍हें लेखन की प्रेरणा दी। कथाकार क्षितिज शर्मा ने कहा कि शैलेश मटियानी के व्‍यक्तित्‍व में साधारण लोगों के प्रति जो

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आत्‍मीयता थी, वह आज दुर्लभ है। वे अपने लेखन और व्‍यक्तित्‍व में एक समान थे। सत्र के संचालक डॉ․ ओम प्रकाश गंगोला ने कहा कि शैलेश के साहित्‍य में कहीं भी हताशा नहीं है। वे हमेशा दूसरों को ऐसी प्रेरणा देते रहे जिससे कि उनका व्‍यक्तित्‍व खिल सके। शैलेश की बेटी शुभा मटियानी ने अपने बाबूजी के

अनेक अंतरंग संस्‍मरणों तथा कवि महेन्‍द्र मटियानी ने एक भाई के रूप में शैलेश की आत्‍मीयता को याद किया। सत्र के अध्‍यक्ष प्रदीप पंत ने कहा- शैलेश का साहित्‍य पूरे पहाड़. की पीड़ा है। उन्‍होंने अपने साहित्‍य में पहली बार पहाड़ी जीवन के अंतर्विरोधों को प्रस्‍तुत किया तथा हिन्‍दी साहित्‍य में उत्त्‍ाराखण्‍ड की वर्तमान पीढ़ी एक प्रकार से उन्‍हीं के साहित्‍य का विस्‍तार है।

‘उत्त्‍ाराखण्‍ड में हिन्‍दी कविता' शीर्षक से आयोजित सत्र में चर्चित एवं युवा हिन्‍दी कवियों- लीलाधर जगूडी, वीरेन डंगवाल, सुन्‍दर चन्‍द ठाकुर, जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव, हेमन्‍त कुकरेती, अशोक पाण्‍डे, शैलेय, राजेन्‍द्र कैडा, स्‍वाति मेलकानी तथा सिद्धेश्‍वर सिंह ने अपने कविताओं का पाठ किया तथा उन रचनात्‍मक दबावों का उल्‍लेख किया जिन्‍होंने उन्‍हें कवि बनने के लिए प्रेरित किया।

गढ़वाली और जौनसारी कविता पाठ की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ गढ़वाली कवि नरेन्‍द्र सिंह नेगी ने की तथा संचालन युवा रचनाकार नंद किशोर हटवाल ने किया। गढ़वाली के चर्चित कवियों में मदन मोहन डुकलाण, गिरीश सुंदरियाल, वीरेन्‍द्र पंवार, नीता कुकरेती, कुसुम भट्ट, मधुसूदन थपलियाल, निरंजन सुयाल, हेमवती नंदन भट्ट तथा गणेश खुगशाल ‘गणी' ने अपनी ताजा कविताओं का पाठ किया और अपने सृजनात्‍मक लेखन के प्रेरणा स्रोतों के बारे में विस्‍तार से बातें की। कवियों ने अपनी कविताओं का हिन्‍दी अनुवाद भी प्रस्‍तुत किया जिससे कि हिन्‍दीतर भाषाओं में उनकी चुनी हुई कविता का अनुवाद किया जा सके। इस सत्र में गढ़वाल के जौनसार-भाबर क्षेत्र की लोकभाषा जौनसारी की कविता का रतन सिंह जौनसारी के द्वारा पाठ किया गया। इसके साथ ही जौनसारी के ही समकक्ष लोकभाषा जौनपुरी के कविता साहित्‍य के बारे में सुरेन्‍द्र पुण्‍डीर ने ध्‍यान आकर्षित किया।

‘कुमाउंनी एवं शौका कविता पाठ' सत्र में कुमाउंनी के वरिष्‍ठ एवं युवा कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। सत्र का संचालन युवा कवि हेमन्‍त बिष्‍ट ने किया। गोष्‍ठी में शेरदा ‘अनपढ़', मथुरादत्त्‍ा मठपाल, महेन्‍द्र मटियानी, शेर सिंह बिष्‍ट, जगदीश जोशी, रतन सिंह किरमोलिया, देवकी महरा, मोहन कुमाउंनी, दीपक कार्की आदि ने कविता-पाठ किया। इन कविताओं में आज के उत्त्‍ाराखण्‍ड की सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक विसंगतियों को मुख्‍य रूप से रेखांकित किया गया। भोटिया भाषा के विशेषज्ञ डॉ․ शेर सिंह पांगती ने भोटिया (शौका) कविता का पाठ किया।

समापन सत्र में गढ़वाली, कुमाउंनी, जौनसारी और शौका कविताओं को लेकर विशेषज्ञों ने आलेख पढ़े तथा इन भाषाओं के वर्तमान साहित्‍यिक परिदृश्‍य पर विस्‍तार से चर्चा की। श्री मदन मोहन डुकलाण ने समकालीन गढ़वाली कविता, रतन सिंह जौनसारी ने जौनसारी कविता, डॉ․ कैलाश चन्‍द्र लोहनी ने कुमाउंनी कविता तथा डॉ․ शेर सिंह पांगती ने शौका कविता की परम्‍परा पर अपने आलेख पढ़े। इस सत्र के चर्चाकारों में अचलानंद जखमोला, कमल जोशी, जगमोहन रौतेला, दीपक पोखरियाल, गीता गैरोला, ओम प्रकाश सेमवाल, शिवराज सिंह रावत ‘निसंग', योगम्‍बर सिंह बर्त्‍वाल, नवीन चन्‍द्र शर्मा, प्रीति आर्या, मन्‍नू ढौंडियाल आदि शामिल थे।

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प्रस्‍तुति-

मोहन सिंह रावत

सम्‍पर्क-

ई-6, स्‍टोनले कम्‍पाउण्‍ड

तल्‍लीताल, नैनीताल-263 002

(उत्त्‍ाराखण्‍ड)

sangosthi (WinCE)

आदिवासी विद्रोह और साहित्‍य' विषयक संगोष्‍ठी

उदयपुर। श्रम, समूह और सहकारिता पर आधारित आदिवासी जीवन का विघटन व्‍यक्‍तिगत संपत्‍ति के उदय से जुड़ा और तभी आदिवासी और गैर आदिवासी समाज में विभाजन भी हुआ। सुप्रसिद्ध मराठी साहित्‍यकार और अखिल भारतीय आदिवासी साहित्‍यकार समिति के राष्‍ट्रीय महासचिव वाहरू सोनवणे ने उक्‍त विचार ‘आदिवासी विद्रोह और साहित्‍य' विषयक संगोष्‍ठी में व्‍यक्‍त किए। मानगढ़ में आयोजित इस संगोष्‍ठी में हरिराम मीणा के उपन्‍यास ‘धूणी तपे तीर' पर चर्चा की गई। सोनवणे ने कहा कि मानगढ़ का नरसंहार भारतीय स्‍वतंत्रता आंदोलन का गौरव चिन्‍ह है लेकिन इसका इतिहास में न होना इस बात का परिचायक है कि इतिहासकार भी पूर्वाग्रह से मुक्‍त नहीं होते।

साहित्‍य संस्‍कृति की विशिष्‍ट पत्रिका ‘बनास' द्वारा आयोजित इस संगोष्‍ठी में राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय, जयपुर के प्रो. रवि श्रीवास्‍तव ने ‘धूणी तपे तीर' को हिन्‍दी प्रदेश की संघर्षशील जनता की कर्मठता का दस्‍तावेज बताया। उन्‍होंने कहा कि आंचलिकता के विपरित नॉन रोमैंटिक मिजाज पूरे उपन्‍यास में आदिवासी समाज की प्रवंचनाओं के प्रति एक आलोचनात्‍मक दृष्‍टि भी रखता है। प्रो. श्रीवास्‍तव ने इसे औपनिवेशिक व्‍यवस्‍था के परिणामस्‍वरूप अपनी जड़ों से विस्‍थापित होते आदिवासी जनजीवन के बदलावों और प्रतिरोध की संस्‍कृति की महागाथा बताया। सुखाड़िया विश्‍वविद्यालय, उदयपुर के डॉ. आशुतोष मोहन ने कहा कि पहला गिरमिटिया और जंगल के दावेदार के बीच यह उपन्‍यास एक नयी श्रेणी की उद्‌भावना करता है जो इतिहास और साहित्‍य के बारीक संतुलन को साधने वाली है। गुजरात से आये प्रो. कानजी भाई पटेल ने कहा कि लिखित समाज आदिवासी जीवन और संस्‍कृति पर मौन रहा है इसी कारण वाचिक परंपराओं में ही इस जीवन के वास्‍तविक चित्र मिलते हैं। उन्‍होंने ‘धूणी तपे तीर' को इस परंपरा में एक नई शुरुआत बताते हुए कहा कि इतिहास को चुनौती देने के कारण यह उपन्‍यास सचमुच में महागाथा का रूप ग्रहण कर पाया है। आकाशवाणी उदयपुर के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्‍मण व्‍यास ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि टंट्‌या भील, चोट्टी मुण्‍डा जैसे आदिवासी नायकों के साथ गोविन्‍द गुरु का भी महत्‍वपूर्ण योगदान है लेकिन हिन्‍दी समाज इस नायक से अपरिचित ही था। उपन्‍यास के लेखक हरिराम मीणा ने अपनी रचना प्रक्रिया बताते हुए कहा कि मनुष्‍य के हक की लड़ाई के इतिहास को मनुष्‍य विरोधी शोषक-शासकों ने दबाया है और उनके आश्रय में पलने वाले इतिहासकारों ने उनका साथ दिया है।

अध्‍यक्षीय उद्‌बोधन में वरिष्‍ठ समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने कहा कि मुख्‍यधारा के इतिहास और अनलिखे इतिहास में भेद है। वर्चस्‍वशाली प्रभुवर्ग ने हाशिए के लोगों की पीड़ा को वह स्‍थान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। उन्‍होंने ‘धूणी तपे तीर' को इस संदर्भ में उल्‍लेखनीय कृति बताते हुए कहा कि यथार्थ चित्रण के साथ यह उपन्‍यास समानान्‍तर इतिहास लेखन भी करता है। इससे पहले जागरूक युवा संगठन, खेरवाड़ा के सदस्‍यों द्वारा गोविन्‍द गुरु के क्रान्‍ति गीत ‘नी मानु रे भुरेटिया' की प्रस्‍तुति से संगोष्‍ठी का शुभारम्‍भ हुआ। आयोजन में अर्जुन सिंह पारगी की पुस्‍तक ‘स्‍वामी गोविन्‍द गुरु ः जीवन अने कार्य' का विमोचन भी किया गया। संचालन कर रहे ‘बनास' के सम्‍पादक डॉ. पल्‍लव ने अतिथियों का परिचय दिया। आयोजन में मानगढ़ विकास समिति के नाथुरामजी, लखारा आदिवासी सृजन के सम्‍पादक जितेन्‍द्र वसावा, जागरूक युवा संगठन के संयोजक डी.एस. पालीवाल, पत्रकार श्‍याम अश्‍याम ने भी चर्चा में भागीदारी की। माल्‍यार्पण और स्‍मृति चिन्‍ह ‘बनास' के सहयोगी गणेश लाल मीणा ने भेंट की।

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- गणेश लाल मीणा

152, टैगोर नगर, से. 4, हिरण मगरी, उदयपुर.-313002

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वक्‍त किसी और के लिए ठहरा हो या न ठहरा हो, उसके लिए लगभग ठहर सा गया है। अब क्‍या बदल सकता है उसकी जिन्‍दगी में, जब तक कि वह अपने विचारों को न बदले । बडे भाई चाहते हैं कि ,वह घर पर रहे। उनके बच्‍चें को पढाएँ, स्‍कूल छोड़ने जाए, लेकर आए, कमरा तो उस पर है ही, खाना माँ दे देती है और क्‍या चाहिए खेती बाड़ी देखे और असाधारण बनने के चक्‍कर में न पड़कर आम आदमी की तरह सलीके से रहे तो वे कहीं ना कहीं उसका विवाह भी करा ही देंगे ।

आज भी गणतंत्र दिवस पर वह भाषण दे रहा था। उस समय मंत्री जी ने उसके विचारों की प्रशंसा करनी चाही ,पर वह भाषण देकर सीधा मंच से उतरा और अपने दोस्‍तों में चला गया । वह जानता है कि मंत्री जी कलेक्‍टर से उसका नाम, उसकी शैक्षणिक योग्‍यताएँ पूछेंगे तथा कलेक्‍टर प्रिसिंपल ,विभागाध्‍यक्ष, समवेत स्‍वर में उसकी प्रशंसा करेंगें । मंत्री जी उसका नाम नोट करेंगें,आश्‍वासन देंगे और सर्किट हाउस में जाकर एक नए अध्‍याय का आरम्‍भ करेंगें । इसलिए इन आश्‍वासानों को अब वह नहीं ,उसके प्रिसिंपल, उसके पिता, उसके स्‍टूडेन्‍टस्‌ सुनते रहते हैं । वह दोस्‍तों से मिलने को कह अपनी बहन के घर चला गया जहाँ वह सिर्फ अपनी भाँजी के साथ खेलने आता था । अक्‍सर वह उन दिनों को पहचानने के साथ-साथ जीने की कोशिश करता था। जब उसकी बहन इतनी सी थी ,जितनी उसकी भाँजी है ।

बहन के घर से निकल कर जब 12 बजे के लगभग वह अपने घर में घुसा तब पिता जी घर में नहीं थे । भाभी उसे देखकर अपने कमरे में चली गयी । चिन्‍टू ने उससे उसका पेन माँगा और माँ ने उसके लिए खाना परोसना आरम्‍भ किया । उसने बाथरूम में जाकर हाथ-मुँह धोकर कुल्‍ला किया और गुटके की बची हुई तम्‍बाकू वहीं थूक दी । इसके बाद ही वह खाना खाने बैठ गया ।

उसने एक ही रोटी खाई थी ,जब पिता जी की चीख उसके कानों में पड़ी ।

‘‘जब कमाओगे तब पता चलेगा । अभी तो पिता की कमाई पर ऐश कर लो।''- दरअसल पिता जी ने आते ही जब हाथ मुँह धोना चाहा ,तब उन्‍हें बाथ रूम में पड़ी तम्‍बाकू दिखाई दे गयी ।

यही वक्‍त था जब भाभी और चिन्‍टू भी कमरे से बाहर आ गये थे । उसे इस बात का दुःख था कि, उसके पिताजी खुद तम्‍बाकू खाते थे, पर उसे ऐसा करने से रोकते थे । उसने तम्‍बाकू खाना सीखा भी पिता जी की डिबिया से । पिताजी उसे आज पहली बार नहीं डाँट रहे थे, पर पहले उनके शब्‍द कठोर होते थे, शब्‍दों की संख्‍या अधिक होती थी पर चेहरे के भाव कठोर नहीं होते थे, बल्‍कि कई बार उनकी डॉट का अन्‍त मुस्‍कराहट से होता था । अब वह बात नहीं थी ।

उसकी ओर से माँ ने जवाब दिया-‘‘ खाना तो खा लेने दो। ''

‘‘तुम्‍हीं ने बिगाड़ा है इसे ''- कहते हुए पिताजी फिर चिल्‍लाने लगे। ‘‘इतना बड़ा हो गया पर पता नहीं कब अक्‍ल आएगी ऊपर से खुद को होशियार समझता है ।''

‘‘चिन्‍टू आज से चाचा के साथ घूमने मत जाना-‘‘भाभी चिन्‍टू को कमरे में अन्‍दर खींचते हुए ले गयी थी ।

वह खाना अधूरा छोड़कर बीच में ही उठ गया । माँ उसे मनाती रह गयी। पिताजी के ठीक पास में खड़े होकर उसने हाथ मुँह धोया और शर्ट पहन कर लापरवाही से स्‍लीपर पैरों में डालकर घर के बाहर निकल पडा । गली के अंतिम छोर पर उसने शर्ट की बटन लगाई ।

वह सीधे कॉलेज की लायब्रेरी में चला गया और वहाँ से चार बजे निकल कर नदी किनारे बने गणेश मंदिर के चबूतरे पर बैठ गया । यही उसे सारे मित्र प्रोफेसर मिलते हैं। मंदिर का चबूतरा शाम को नालन्‍दा बन जाता है, और बिना किसी औपचारिकता के छात्रों को हर विषय पर विशेषज्ञों की राय प्राप्‍त करने का अवसर मिलता था ।

उसके वहाँ पहुँचने के थोड़ी देर बाद ही राजेन्‍द्र वहाँ आया और बोला-‘‘आज क्‍या बात हो गई । माँ चिन्‍ता कर रही थी। मैं आपके ही घर से आ रहा हूँ ।''

वह मुस्‍कराया-‘‘ कुछ नहीं यूँ ही आज बॉस थोड़ा गरम हैं।‘‘

मुझे भी आज डॉट पड़ी। बिजनेस अपने से हो नही सकता । वेकेन्‍सी निकल नहीं रही । अब रातों - रात क्‍या जादू कर दूँ ? आज टाईगर दहाड़ रहा था। मेरा तो दिमाग खराब हो रहा था । मुश्‍किल से अपने आप को कन्‍ट्रोल किया वरना मेरे मुँह से उल्‍टा सीधा निकलने ही वाला था ।

बेवकूफ, कभी भी अपने पिता जी को जवाब नहीं देना चाहिए । हम जीवन के सीधे सीधे दो भाग कर सकते है। एक पूर्वार्ध दूसरा उत्‍तरार्ध । पूर्वार्द्ध में जीवन के प्रारम्‍भ से ही हम सिर्फ कर्ज की जिन्‍दगी जीते हैं । हम अपने माता पिता दादा-दादी, भाई बहन, पड़ोसी साथी से पैसा ,सुख - सुविधाएँ, सिद्धान्त एवं विचार, परम्‍पराएँ सब कर्ज की तरह उधार लेते हैं । जीवन के उत्तरार्ध में हमें अपने माता- पिता को वह सब लौटाना चाहिए जो हमने उनसे लिया था, लेकिन हम में से कितने लोग अपने माता- पिता को बचपन में हमें दिये गये प्रेम को और बेहतर स्‍वरूप में लौटाते हैं। हकीकत में हम माता पिता को अपनी सुविधाओं इच्‍छाओं के पीछे प्रेम नहीं, विकृत प्रेम या घृणा लौटाते है - वह तमतमा गया था ।

पर हम माता पिता को क्‍या दे सकते है। उन पर सब कुछ तो है ?

उन पर नहीं होती है इज्‍जत, वह हम ही उन्‍हें दे सकते हैं। सारी दुनिया सिर आंखों पर बिठाए, पर अपनी ही सन्‍तान इज्‍जत न करें , तो जिन्‍दगी जुएँ में हारी प्रतीत होती है । घर महाभारत में वर्णित उस सभा सा लगता है । जहां द्रौपदी का चीर पांडव खींच रहे होते हैं । लौटाने की बात भी कई तरह से आती है । एक तो यह कि हमें 25 वर्ष तक माता पिता ने आर्थिक, सामाजिक ,मानसिक पहलुओं पर सुखी रखा । अतः हम उनके जीवन के किन्‍हीं 25 वर्षो को इन्‍हीं पहलुओं पर सुखी रखे पर यह भी सिर्फ लौटाना होगा ।

पर वे लोग भी उल्‍टी बात करते हैं, कुछ सुनना ही नहीं चाहते अपने आगे । हमारी भी तो जिन्‍दगी है-राजेन्‍द्र अब तर्क के मूड में था।

तुम पहले मेरी बात सुन लो। हम 18-20 वर्ष के होते ही उस छत को तोड़ने लगते हैं, जिन पर उनके विचारों की बेले सजी होती है अनुभवों और सम्‍बन्‍धों की चित्रकारी होती है । तात्‍कालिक सूझ- बूझ एवं आर्थिक मानसिक सामाजिक वस्‍तुओं, स्‍थितियों के प्रतिफल से घर सजा होता है। जिस घर में हमें जीवन मिला होता है । जिन्‍होंने हमें सुन्‍दर शरीर उत्‍कृष्‍ट वैचारिक धरातल बनाने में मदद की होती है । तब हम चाहते है कि वे अपनी वर्षो की सोच, मानसिकता को छोड़ हमारी 4-5 वर्षीय अबोध मासूम मानसिकता को गले लगा लें । कैसी बचकानी हरकत होती है । हमारी मानसिकता सिर्फ कल्‍पना में पली-बढ़ी होती है या हम उम्रों के मध्‍य । लेकिन यदि हम तलाश करें कि हमारी उम्र में हमारे जैसा ही सोचने वाले हमारे पिता की उम्र में पहुँचकर कैसा सोच रखते हैं । तब आश्चर्यजनक ढंग से हम यह पाते हैं कि उनकी सोच एवं हमारी पिता की मानसिकता में कोई अन्‍तर नहीं रह जाता था । हमारे पिता की कल्‍पना, विचार, सिद्धान्त, समाज के बीच अच्‍छे बुरे परिणामों का स्‍वाद चख चुकी होती है । एक तरह से उनके अपने सीमित दायरे समाज की कसौटी पर कसी जा चुकी होती है। लेकिन हम तो अपनी कल्‍पनाओं को मानसिकता का रूप देकर बिना किसी कसौटी पर कसे उन्‍हें प्रत्‍येक समाज एवं परिस्‍थितियों के लिए सर्वोत्‍तम करार दे देते हैं, बल्‍कि कई बार तो हम यह भी दावा करते हैं कि इन्‍हीं कल्‍पनाओं से सर्वोत्‍तम समाज का निर्माण सम्‍भव है। तब तक हम ठीक से यह भी नहीं जानते कि, कल्‍पना और मानसिकता में क्‍या अन्‍तर होता हैं‘‘- वह बिना रूके इतना कुछ कह गया ।

पर आज आपका झगड़ा क्‍यों हो गया बाबूजी से-अब बारी राजेन्‍द्र की थी ।

वे गलत नहीं थे। वे भी तम्‍बाकू खाते है , और सुबह वह अस्‍पताल भी गये थे । उनके मुँह में तम्‍बाखू रखने के स्‍थान पर टाँका हो गया है । कड़वा सच तो यह है कि, कैंसर की फर्स्‍ट स्‍टेज पर है ।जो रिपोर्ट डॉक्‍टर ने उन्‍हें आज सुबह बताई उसे मैं कल शाम को ही देख चुका था। इसलिए पिताजी नहीं चाहते कि मैं भी तम्‍बाकू खाता रहूँ।‘‘- वह स्‍पष्‍टीकरण दे रहा था।

-परसों क्‍या बात हो गई थी, तब भी पिता जी नाराज थे ।

-परसों मैने शादी के लिए मना कर दिया था ।

‘‘अपनी मर्जी से कर लो शादी । आज मैडम से मुलाकात हुई थी ना लायब्रेरी में।''- और राजेन्‍द्र चला गया।

तभी सामने नदी में केवट नाव ले आता दिखाई दिया । किनारे आकर केवट नाव से उतर कर उसे नाव तक जबरदस्‍ती ले गया । कुछ देर बाद ही शाम के झुरमुटे में वह नदी की सैर कर रहा था । दोनों ने मिल कर भाँग खाई। उसने केवट से कहा- डूबा तो नहीं दोगे ?

केवट ने कहा-‘‘ न डूबने का दावा टाईटैनिक करता है । हमारी नाव में पानी की बूँदें आती है, लहरें नहीं ।''

उसे यकीन ही नहीं हो रहा था जो कुछ उसने जो लायब्रेरी में सुना था उस पर ।

-‘‘मैंने तुम्‍हें चाहा ही नहीं, तुम अपनी ओर से कहते गये, मै सुनती गयी । तुम अपनी इच्‍छा से मेरी जिन्‍दगी में आए थे । मैने तुम्‍हें अतिथि की तरह स्‍वागत कर ड्राईंग रूम में बिठाया, तुमसे कुछ बातें की, कुछ पल उत्‍तम गुजारे, अपने वर्तमान और समकालीनों से, तुम्‍हारे साथ के कारण घ्‍पर पर भी उठी । लेकिन इन सबके बदले में मैं तुम्‍हें थैक्‍यू कह सकती हूँ बस।‘‘

-‘‘मैंने तुमसे थैक्‍यू भी नहीं चाहा, कहा क्‍या कभी ?''

-‘‘पर तुम्‍हारी आंखे कितना कुछ कह जाती है'' - वे बोली,

-‘‘तुम्‍हें इन आंखों में आँसू अच्‍छे लगते हैं।'' हाँ ,यदि कारण मैं न रहूँ ।

-‘‘ तुम्‍हारी उदासी में बहुत कशिश है ।

वह यह सुनकर लायब्रेरी की दीवाल पर लगी सोहनी महिवाल की तस्‍वीर देखने लगा । उसे लगा कि उसका मन घट सोहनी के कच्‍चे घड़े की तरह है, और महिवाल उसके आसुँओं के दरिया में डूबने वाला है ।

नदी के तट पर पानी की सतह पर बहुत से प्रतिबिम्‍ब बन रहे थे । केवट भाँग के नशे में उसे देखकर खिलखिला रहा था ।

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योगेन्‍द्र सिंह राठौर,

ललिता-कुन्‍ज,

अशोका होटल के पीछे,

नया बसस्‍टेन्‍ड रोड. जगदलपुर बस्‍तर

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कविताएँ

नरेन्द्र निर्मल

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गीत दोस्‍तों के लिए

1.

हर दिन एक दिन

बनेंगे दोस्‍त, नए वो लोग

कुछ होंगे पल के लिए

कुछ याद आएंगे रोज

हर दिन एक दिन.....2

यादों का ऐसा सफर होगा

अपना ये सारा शहर होगा

यादों का ऐसा....2

बालिग सब होंगे उमर यहां

झूम के नाचे हर कमर यहां

न होंगे दिन न होगी रात

अब तो होगा हर रोज मुलाकात

हर दिन एक दिन

...............आएंगे रोज

कुछ खट्‌टी कुछ मीठी

सारी यादें रस भरी

पल में रूठना, पल में मनाना

होगी रंगत मस्‍ती भरी

होंगे सपने पूरे जो अपने

बनेगा अपना एक कारवां

हर दिन एक दिन

बनेंगे दोस्‍त, नए वो लोग

कुछ होंगे पल के लिए

कुछ याद आएंगे रोज

 

 

'मेरी'' कल्‍पना और मेरा प्‍यार'

' '

लिखूं एक ख्‍वाब कलम से,

जिसमें एक पतंग आएगी।

जिसे उड़ाएगा कोई और

पर कटकर मेरी ही पास आएगी।

उड़ेगी चाहे कितनी भी,

बदन लहरा-लहरा कर

पर अंत में उसे,

हमारी ही याद आएगी॥

चाँद सा शीतल मन होगा,

दूध्‍ सा निर्मल तन होगा।

रूप रंग का हर कण होगा,

जिस कण में मेरी ही खुशबू आएगी॥

आँखों में नशे का काजल,

ज़ुल्फ़ों में घन-घोर सा बादल।

पैरों में पायल की छम-छम,

कानों में कुण्‍डल का झन-झन॥

जिसमें एक शोर सी आएगी,

जिसे सुन बादल इस ओर ही आएगी।

पंक्षियाँ भी देखकर चहकेंगे उसे,

फूल भी देखकर महकेंगे उसे।

नया सा वातावरण वादियों में फैल जाएगी,

जब भी वो आकर मेरे बाहों में सिमट आएगी॥

 

 

' पीढ़ियाँ बचपन की'

बदल दिया इस जमाने ने,

बचपन का मतलब।

मिटा दिया इनका जहां,

तब भी न बुझी तलब॥

न गिल्‍ली न डंडा,

न गोटी न लुका छिपी,

न झूलन न तितलियाँ पकड़ना,

न लट्‌टू न पतंग,

न दादा न दादी, न नाना न नानी,

न कोई लोरी न कोई कहानी।

इस कम्‍प्‍यूटर की दुनियां ने,

मिटा दिया बचपन का हर एक सच।

मनोरंजन मिलता कहां,

हर वक्‍त गुजरता, टीवी व कम्‍प्‍यूटर पे।

गेम खेला जाता, मार धड़ हिंसा वाली।

टीवी/फिल्में दिखाते वो सारे चल चित्र

जिन्‍हें देखकर बच्‍चे भी हो जाते विचित्र।

कल तक जो निर्मल सच्‍चे मन के थे।

आज/अब वो भी पापी कहलाते हैं।

गेम की लत से खून बहाते, और

फिल्मी समझ से बलात्‍कारी हो जाते हैं।

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'नरेन्‍द्र'' निर्मल'''

'के- 10, द्वितीय तल, शकरपुर, दिल्‍ली'

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बाल कविता

नव वर्ष

 

कृष्‍ण कुमार यादव

नव वर्ष की बेला आई

खुशियों की सौगातें लाई

नया कर गुजरने का मौका

सद्‌भावों की नौका लाई

नया वर्ष है, नया तराना

झूमो-नाचो, गाओ गाना

इस वर्ष संकल्‍प है अपना

नहीं किसी को है सताना

बदला साल, कैलेण्‍डर बदला

बदला है इस तरह जमाना

भेजो सबको स्‍नेह निमंत्रण

गाओ नव वर्ष का तराना।

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कृष्‍ण कुमार यादव

भारतीय डाक सेवा

वरिष्‍ठ डाक अधीक्षक

कानपुर मण्‍डल, कानपुर-208001

kkyadav.y@rediffmail.com

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चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हम

 

नवल किशोर कुमार

क्षुधाग्‍नि के लपटों में जल जायें हम,

चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हम।

दिन बीते या बीत जाये पूरा साल,

हम निरीहों का हरदम रहता हाल बेहाल,

भले दिवास्‍वप्‍न देखा करें हम महलों का,

हमारी लाश पर बनता महल अमीरों का।

बेजान कंधों पर असंख्‍य जिम्‍मेवारियां उठायें हम,

चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हम।

किसने लूटा किसने छीना हमारा कौर,

अमीरों की दुनिया में कहां बचा हमारा ठौर,

हम मरते हैं भूख से तो मरते रहें,

उनका काम है लूठना जी भर हमें लूटते रहें।

लूटपाट के दौर में सर्वस्‍व खोने का जश्‍न मनायें हम,

चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हम।

मेहनत हमारा हो और फल उन्‍हें मिलता रहे,

उपर वाले तेरी दुनिया यूं ही चलती रहे,

हैं आजाद हिंद के गुलाम हिन्‍दुस्‍तानी हम,

नेताओं की चक्‍की में सदा पीसते रहे हम,

भ्रष्‍ट शासकों के आत्‍माविहीन गण बन जायें हम,

चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हम।

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नवल किशोर कुमार

ब्रहम्‍पुर, फुलवारीशरीफ, पटना-801505

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गीत

दीवारों पर बस कलैंडर बदला बदला है

वीरेन्‍द्र जैन

 

शाम वही थी सुबह वही है नया नया क्‍या है

दीवारों पर बस कलैंडर बदला बदला है

उजड़ी गली , उबलती नाली ,कच्‍चे कच्‍चे घर

कितना हुआ विकास लिखा है सिर्फ पोस्‍टर पर

पोखर नायक के चरित्र सा गंदला गंदला है

दीवारों पर बस कलैंडर बदला बदला है

दुनिया वही,वही दुनिया की है दुनियादारी

सुखदुख वही,वही जीवन की,है मारामारी

लूटपाट,चोरी मक्‍कारी धोखा घपला है

दीवारों पर बस कलैंडर बदला बदला है

शाम खुशी लाया खरीदकर ओढ़ ओढ़ कर जी

किंतु सुबह ने शबनम सी चादर समेट रख दी

सजा प्‍लास्‍टिक के फूलों से हर इक गमला है

दीवारों पर बस कलैंडर बदला बदला है

....................................................

वीरेन्‍द्र जैन

2/1 शालीमार स्‍टर्लिंग रायसेन रोड

अप्‍सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.

 

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नन्‍दलाल भारती

1-श्रमवीर ॥

अपनी ही जहां में घाव डंस रही पुरानी

शोषित संग दुत्‍कार भरपूर हुई मनमानी

लपटों की नही रूकी है शैतानी

शोषित भी खूंटा गाड़. खड़ा हो जायेगा ।

ढह जायगी दीवारें रूक जायेगी मनमानी

तिलतिल जलता जैसे तवा पर पानी

अंगारों मे जलता,कंचन हो गया है राख

हाड़. फोड़. नित नित पेट की बुझाता आग

रोटी और जरूरतें नहीं वह चाहे सम्‍मान

जीवन में झरता पतझर निरन्‍तर उसके

बूढे अम्‍बर को ताकता कहता बश्‍खो पानी

मेरे अंगना अब कब बसन्‍त आएगा ।

शोषित जग को गति देता

वंचित की गति को विषमतावादी करता बाधित

खेत खलिहान या कोई हो निर्माण का काम

पसीने के गारे पर थमता शोषित के

द्वार दहाड़ता मातमी गीत हरदम

भूख,अशिक्षा,भेदभाव की बीमारी बेरोजगारी और भूमिहीनता

ढकेलती रहती दलदल में सदा

मुसीबतों का बोझ ढोता,तथाकथित श्रेष्‍ठ समाज को खुशी देता

ना चिन्‍ता उसकी ना कोई सुधि है लेता

श्रेष्‍ठता का दम भरने वालों हाथ बढाओ

शोषित की चौखट सावन आ जायेगा ।

ऋतुओं की तकदीर संवारता,खुद जीता वीरानों में

दिल पर वंचित के घाव होता नित हरा

नई घाव से नहीं घबराता

क्‍योंकि चट्‌टान उसके सीने को कहते हैं

थाम लिया समता की मशाल डंटकर तो शोषक घबरा जायेगा ।

शोषित दलित श्रमवीर उसके कंधे पर दुनिया का भार

तकदीर में लिख दिया आदमी अंधियारे का आतंक

थम गये हाथ अगर तो होंठ पर नाचेगी स्‍याह

समानता के द्वार खोलो,ना दो शोषित श्रमवीर को कराह

मिटा दो लकीरें वरना वक्‍त धिक्‍कारता जायेगा ।

 

2- मशाल ॥

समता का पथ ना हो वीरान कभी

मानव है सच्‍चे समता की राह चल सभी

विषमता की कब्र पर समता के पांव बढ़े निरन्‍तर

ना रूके कभी इसलिये कि मसीहा थक गये कई

जहां वे रूके वहीं से तुम चलो․․․․․․․․․․․

दिल पर चोट है शीश पर आसमान

जातिभेद की राह में समता की छांव

चल रहा रातदिन जातिभेद का षड्यन्‍त्र

मौन धरती पर समता का रंग पोत दो

कराह रहे दर्द से जो उन्‍हे साथ ले लो․․․․․․․․

ना ताको पीछे, वहां भयावह निशान है

समता की राह नित जा चलता

कब मिलेगी बराबरी नहीं थाह

आखिरी सांस तक चलते रहें

थमती है सांस तो थमने दो,

विषमता की गोद ना मन बहलाओ

मुस्‍कराओगे मौन धरती पर एक दिन

क्‍योंकि समता की राह थे चले

जीवन पुष्‍प झरे उससे पहले और पुष्‍प खिलने का अवसर दो

तुमने जो जहर पीया आने वाले तक मत पहुंचने दो

कर्मवीर श्रमवीर, शूरवीर समता की राह बढे चलो․․․․․․․․․․․․

ना किया समता स्‍वर ऊंचा तो

रह जायेगी कराहती शोषितों की बस्‍ती

समता का पुष्‍प नही खिला तो

विषमता क झलकता रहेगा जाम

संविधान से सम्‍भावना है

समता की राह सच्‍ची सद्‌भावना है

भेद का पिशाच अधिकारों को न डंसे

थामकर हक की लाठी निकल पड़ो

आदमी हो आदमी का हक तो मांग लो․․․․․․․․․․․․

समता का नही मिला मान तो

वंचित का जीवन रह जाएगा श्‍मशान

मरकर जीना आदमियत का है अपमान

स्‍वाभिमान से जीना है ,दिन बीते या बरस ढले

समता की राह पर बढ़े चलो․․․․․․․․․․

छल कर किसी युग आदमी अंधियारा दिया

संघर्षरत्‌ जल रहा जीवन का दीया

कांटों की नोंक पग पग पर जला

इंसानियत का दुश्‍मन पल पल छला

वंचित का रो रोकर ही जहर पीया

ना पीओ भेद का जहर ना पीने दो

हे समता के पथिक बढ़े चलो․․․․․․․․․․

जाग चुका है जज्‍बा स्‍वाभिमान से जीने का

अंधियारे के आगे उजियारा हारेगा नही

आंधी कोई सद्‌भावना को रौंद नही पायेगी

समता का पथिक धुव्रतारा की तरह चमकेगा

चले थे बुद्ध समता की राह तुम भी चलो

जले थे अम्‍बेडकर दीये की तरह

मानवता का ऊंचा रहे भाल तुम भी जलो

समता की राह न हो वीरान

वक्‍त है पुकारता, तुम भी चलो․․․․․․․․․․․

भेद की तूफान नित कर रहा अत्‍याचार

तड़प रहा आदमी समता की प्‍यास से

जातिपांति का बवण्‍डर थम जाये

जुल्‍म झेल रहा आदमी विहस जाये

समता की जंग को मत रूकने दो

जलती रहे समता की मशाल

लगे थका थम रहा कोई सिपाही,

समता की मशाल थाम बढ़े चलो․․․

 

3-दिल से बाहर करके तो देखा․․․․․․․․․․․․․․․․

जातीय नफरत का बारूद ना सुलगाओ

समता का गंगाजल अब द्वार-द्वार पहुंचाओ

जातिभेद शीतयुद्ध है,इस युद्ध को अब बन्‍द करो

जातिभेद तोड़ो मानवता को स्‍वच्छन्‍द करो ।

ना डंसे भेद समभाव की बयार बह जाने दो

नफरत नही स्‍नेह का स्‍पर्श दे दो

भारतभूमि ना बने जातिभेद की मरघट अब

तोड़ बंधन सारे समता का दीया जला दो ।

धरती सद्‌भाव से होगी पावन

शान्‍ति भेद से नहीं एकता में बरसता है

आदमी जाति से नही कर्म से श्रेष्‍ठ बनता हैं

ऊंचनीच से नही सद्‌भाव से सद् प्यार फैलता है ।

जाति के नाम पर ना अत्‍याचार करो अब

आगे बढ शोषित वंचित को गले लगाओ

पतवार समता की बन बुद्ध की राह हो जाओ

दंश ढो रहे जो उन्‍हे समता का अमृत चखाओ ।

जिसके हृदय में मानवता बसी है

वही जातीय भेदभाव को धिक्‍कारता है

जिसके सीने में दर्द है वंचित के प्रति

तोड़ बाधायें सारी वंचित से हाथ मिलाता है ।

घाव है शोषित के हृदय पर विकराल

वह समानता की छांव में हर दर्द भूल सकता है

कर्म और फर्ज पर मिटने वाला उत्‍पीड़न झेल रहा

रिसते जख्‍मों का एहसास उद्धार का सकता है ।

जातिपांति का किला मजबूत अब तोड़ना होगा

विषमता जब समता का रूप धर लेगा

जातीयभेद का अंधियारा खत्‍म हो जायेगा

भारतभूमि पर समता का दीप जल जायेगा ।

हाथ जोड़कर बार बार कहता हूं

जहां गरजे भेद वहां स्‍नेह लुटाओ

जब जब हो भेद का वार तुम पर फूल चढाओ

बोये भेद के बीज जो सद्‌भाव सीखाओ ।

नफरत से सुखशान्‍ति नही आ सकती धरा पर

जातिभेद का सच्‍चे मन से त्‍याग करके देखो

आदमी हुए देव कई बहुजन हिताय की राह चलकर

सच मानो विषमता हारेगी विजय होगी तुम्‍हारी

जातिपांति को दिल से बाहर करके तो देखो।

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नन्‍दलाल भारती

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बिचौलिये जिन्‍हें हिन्‍दी में मध्‍यस्‍थ , उर्दू में दलाल, अंगे्रजी में आरबिटे्रटर कहते हैं, बहुत काम के आदमी रहते हैं जो काम इस दुनिया में हम स्‍वयं नहीं कर सकते हैं, उन्हें यह बड़ी आसानी से कर देते हैं जिस काम के बीच में बिचौलिये आ जाते हैं, उसके निपटने में ज्‍यादा समय नहीं लगता है। इनके शब्‍दकोष में नेपोलियन और नेताओं की तरह ‘असंभव‘ शब्‍द नहीं होता है, इनके लिए सभी काम संभव है। ये कहीं ना कहीं से काई तिकड़म भिड़ाकर लोगों का काम कर देते है।

बिचौलिये के पास हकीम लुकमान की तरह हर ला - इलाज मर्ज का इलाज रहता है, ये आपको सात समुन्‍दर पार खाड़ी के देशों में नौकरी दिलवा सकते हैं, घर बैठे बी.ए. पास करवा सकते हैं, मैट्रिक की जाली अंक सूची लाकर कालेज में प्रवेश दिलवा सकते हैं, किसी भ्रष्‍टाचारी से मिलकर आपके नालायक इंटर फेल आवारा बेटे की अच्‍छी सरकारी नौकरी लगवा सकते हैं, बिचौलिये इस पृथ्‍वी पर हर वह काम कर सकते हैं, जिसके लिए भगवान को विभिन्‍न रूपों में इस संसार में बार-बार अवतार लेना पड़ता था।

बिचौलियों के लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं रहता है। ये आपके पुत्र पुत्रियों की शादी से लेकर उनके सुकुमार तक का नर्सरी में प्रवेश आसानी से करा सकते हैं, ये छोटी सी खरीद से लेकर देश के सामरिक महत्‍व के सौदे तक में अपना दखल रखते है, इनकी खोजबीन करना कठिन काम है, ये ऊपर से दिखने में अदृष्‍यमान, सिर्फ अनुभव करने वाले जीव होते हैं, इनका हमें आभास हो सकता है, परिचय नहीं ।इनकी खोजबीन के लिए रॉ.सी.आई.ए.के.जी.बी.स्‍कॉटलैंड यार्ड जैसी प्रसिद्ध जासूसी संस्‍थाएं लगानी पड़ती हैं । बोफोर्स तोप सौदे को ही देखिए, अभी तक बिचौलिये का पता नहीं चल पाया है और प्रतिभूतिकांड में बीच वाले इतना खा गये हैं कि सही घोटाला राशि का आंकलन नहीं हो पाया है।

बिचौलिये का काम प्रायः सभी लोग करते हैं, डाक्‍टर , इंजीनियर, आदि सभी इसमें सम्‍मिलित हैं। छोटा डाक्‍टर कमीशन पर बडे डॉक्‍टर के पास ऑपरेशन केस भेजता है, वकील भी हर मुकदमे में मध्‍यस्‍थता करता है, बिचौलिए का काम आदमी ही नहीं बल्‍कि उसके द्वारा संचालित पत्र-पत्रिकाएं , रेडियो, टेलीविजन आदि सभी जनसंचार के सभी माध्‍यम भी करते हैं। पत्र-पत्रिकाएं घर बैठे ही आपका काम करती है।, ये आपके लिए वर-वधू, नौकर-नौकरी, घोड़ा-गाड़ी, आदि की व्‍यवस्‍था जुटाती है, ये बिना किसी परेशानी के हमारे लिए सुन्‍दर सुशील, गृहकार्य में दक्ष, गौर वर्ण कन्‍या और चार अंकों की आय वाला सुशिक्षित , अमीर खान की तरह सुन्‍दर वर दिलवाने में सहायक होते है। बिचौलिये जीवन की तीन मूलभूत आवश्‍यकताओं रोटी, कपड़ा, और मकान के लिए बहुत जरूरी हो गये हैं। आज के जमाने में इनकी उपेक्षा करना रावण के दरबार में मेघनाथ की उपेक्षा के समान है। जिस तरह सरकारी दफ्‍तरों में बिना मेवा चढ़ाये आपका काम नहीं हो सकता है, उसी तरह बिना बिचौलियों के भी कोई काम नहीं हो सकता है।

बिचौलिये मुफ्‍त में काम नहीं करते हैं, मुफ्‍त में काम करना इनके उसूलों के खिलाफ है, ये जनसेवा में नहीं बल्‍कि ‘मुफ्‍त नियरे राखिए‘ में विश्‍वास रखते हैं। ये हम काम का ‘सत्‍य मेव जयते‘ वाले देशभक्‍तों की तरह अग्रिम वसूल कर लेते हैं, इनमें हनुमान की तरह स्‍वामिभक्‍ति , राम की तरह पितृभक्‍ति का अभाव रहता है। अगर हम यह सोचें कि ‘‘थैक्‍यू सर्विस‘‘ से काम चल जाएगा तो हमारा ऐसा सोचना व्‍यर्थ है। ‘‘ थैंक्‍यू सर्विस‘‘ का इन पर कोई असर नहीं पड़ता है। बिचौलियों से मुफ्‍त में काम कराना आज के जमाने में हनुमानजी की तरह उड़कर समुद्र पार करने जैसे असंभव कार्य से भी बढ़कर दुष्‍कर कार्य है।

बिचौलिए जहां लाभदायक हैं, वहीं गुलाब में कांटे की तरह हानिकारक भी है। ये मौका मिलने पर पंचतंत्र की नायिका ‘बंदरिया‘ की तरह दो लोगों की लड़ाई में उनका हिस्‍सा हथियाने से नहीं चूकते हैं। इसलिए उनसे काम निकल जाने के बाद लोग उसी तरह पछताते हैं, जिस तरह पांच साल के लिए नेता चुनने के बाद।

बिचौलियों से काम निकलवाने के लिए लोगों को आधुनिक लैलाओं की तरह सावधानी बरतना चाहिए। आधुनिक लैलाएं जो नित्‍य अपना काम निकलवाने नये-नये मजनुओं को जनम इस सावधानी के साथ देती है कि काम निकल जाये और वह उनके गले में घंटी भी ना बांध पाये अर्थात समाज में हल्‍ला भी मचने ना पाये और मजनूं शादी की बात सोचे बिना उनके आगे पीछे कुत्‍ते की तरह मंडराता रहे। यदि यह सावधानी बिचौलिए से काम निकलवाते समय अपनायी जावे तो सुनिश्‍चित ही चित भी हमारी होगी और पट भी।

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मुश्‍किलें आती रही हादिसे बढते गए

मंजि़लों की राह में क़ाफि़ले बढ़ते गए

 

दरमियां थी दूरियां दिल मगर नज़दीक़ थे

पास ज्‍यूं-ज्‍यूं आए हम फ़ासले बढ़ते गए

 

रहरवों का होंसला टूटता देखा नहीं

ग़रचे दौराने-सफ़र हादिसे बढ़ते गए

 

साथ रहकर भर बहम हो न पाई ग़ुफ़तग़ू

ख़ामोशी के दम ब दम सिलसिले बढ़ते गए

 

हम थे मंजि़ल के क़रीब और सफ़र आसान था

यक ब यक तूफ़ां उठा वस्‍वसे बढ़ते गए

 

कि़स्‍सा-ए-ग़म से मेरे कुछ न आंच आई कभी

मेरे दुःख और उनके पुरु क़हक़हे बढ़ते गए

․․․․․․․․․․․․

पुरु मालव

मूल नाम-पुरुषोत्‍तम प्रसाद ढोडरिया

शिक्षा-एम,बीएड.,

सम्‍प्रति-शिक्षा विभाग राजस्‍थान में कार्यरत

पता-ग्राम व पोस्‍ट- दीगोद खालसा

तह छीपाबडौद, जिला- बारां

पिन-325221 ;राजस्‍थान;

मोबाईल-9928426490

purumalav@ gmail.com

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मुझे उन रास्तों पर चलना नहीं आता,

जिस पर सच की चादर न चढ़ी हों।

सिर्फ झूठ का ओला पसरा हो।

मुझे झूठ बोलना भी नहीं आता,

जब बोलता हूँ, पकड़ा मैं जाता।

वो रास्ता था कलम की,

तलवार चलाने वाला पत्रकार का।

जो रास्ता दिखाता उन,

दबे-कुचले लोगों के लिए।

जिनका कानून पर पूरा अधिकार था।

जिस कानून को चंद निजी हाथों में,

बेच दिया था, कुछ लाभ के लिए।

हमने सोचा क्यों न उन हाथों से छीन

लाऊं, उन मज़लूमों के लिए।

सहारा था तो बस मेरे उस यार का,

जिसका नाम सत्यवादी हरिश्चंद्र अखबार था

पर जब आया तो पता चला,

मेरे यार की रंगत ही बदल गई है।

इसकी भी डोर कानून की तरह,

निजी हाथों में चल गई है।

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नरेन्द्र निर्मल

शकरपुर, दिल्ली

9868033851, ई.मेल- nirmalkumar2k5@gmail.com

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चित्र – कलाकृति - साभार, बनवासी सम्मेलन, भोपाल

मीडिया एक ऐसा माध्यम है जिसके भूत, वर्तमान और भविष्य की चर्चा करे तो इसे दुनिया का सबसे सफल, साहसिक और कर्तव्यपरक क्षेत्र कहा जा सकता है। क्योंकि इस क्षेत्र में काम करने वाला एक प्रहरी के समान है, जो समाज में व्याप्त तमाम सामाजिक समस्या, कुरीतियां एवं व्यवस्था में घर कर चुकी भ्रष्टाचार को जनता और सरकार के सामने लाती है। साथ ही सरकार द्वारा इसे हल न किए जाने पर इसके लिए जवाब तलब भी करना होता है। जिसे वह लिखित, दृश्य-श्रव्य अथवा श्रव्य माध्यम द्वारा जनता के आगे लाती है। कालान्तर से यह परम्परा चली आ रही हैं। भारत में खासतौर पर इसकी महत्ता आजादी से पूर्व रही। आजादी से पूर्व मीडिया अर्थात पत्रकारिता का उद्देश्य केवल मात्र परतंत्र भारत को स्वतंत्र बनाना था। जिसका प्रयत्न करते हुए पत्रकारों द्वारा लिखित माध्यम से लोगों को संगठित किया जाता था। शिथिल पड़ते स्वतंत्रता सेनानियों के मन में जोश भरा जाता था। अंग्रेजों द्वारा फूट डालों और राज करों जैसी मंसूबों को आईने के रूप में जनता के बीच लाकर वास्तविकता का बोध कराया जाता था, जिससे की साम्प्रदायिक उन्माद पर अंकुश लगाया जा सके। जिसके कारण कई बार पत्रकारों को जेल की यात्रा करनी पड़ी। उन्हें यातनाएं दी गई। उनके छापाखानों पर छापामारी कर बंद कराने व जलाने का प्रयास होता रहा। बावजूद उसके पत्रकारों में किसी प्रकार की उल्लास और जोश में कमी नहीं आई। उनकी पहचान तन पर लिपटा कुर्ता-पैजामा, आँखों में चश्मा, पैरों में चप्पल और हो सके तो टूटी-फूटी साइकल हुआ करती थी।

लेकिन युग बदला, पत्रकारिता बदली, पत्रकार बदले साथ ही उनके उद्देश्य क्योंकि भारत आजाद हो चुका था। अब पत्रकारिता और पत्रकार का शत्रु पराया देश का नहीं रहा बल्कि अपने देश के चन्द जयचन्द रहे, साथ ही समाज में व्याप्त सदियों से चली आ रही कुरीतियां रही। सत्तर के दशक में यह क्षेत्र फिर उफान में दिखा जिसने शोषण युक्त शासन व्यवस्था को नेस्तनाबूद करने में अहम भूमिका निभाई। फिर क्या था सिलसिला चलता रहा। अखबार और पत्रकार नेताओं और लोकतंत्र के इर्द गिर्द सिमटते चले गए। इसी बीच भारत में टीवी के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रारम्भ हुआ। परन्तु उसे सरकारी दायरे में बंधकर कार्य करना पड़ा, वजह केवल मात्र थी, इसकी मंहगी पहुंच।

नब्बे के दशक के दौरान भारत में जैसे ही इलेक्ट्रानिक मीडिया में गैर सरकारी खबरी चैनलों का प्रवेश हुआ वैसे ही मीडिया के क्षेत्र में विशाल परिवर्तन आना प्रारम्भ हो गया। दिन व दिन इसमें लोगों की लोकप्रियता बढ़ती गई। 1998 के बाद गैर सरकारी मीडिया को ज्यादा स्वायत्तता दी गई। उनपर सरकारी दबाव कम हुआ। फिर क्या था इसके पंख आसमान में झूमने लगे। इसी दौरान स्टिंग ऑपरेशन के चलन और उससे पर्दाफाश होते भ्रष्टाचारियों ने इसे लोकप्रियता के चरम पर ला खड़ा किया। देखते ही देखते इस क्षेत्र में नाम शोहरत, ताकत के साथ-साथ पैसे की खनक सुनाई पड़ने लगी जो लोगों को इस क्षेत्र में आने को विवश कर दिया। दिन प्रतिदिन बढ़ते ग्लैमर ने इसने युवाओं को विशेष रूप से आकृष्ट किया। मजबूरन प्रतिस्पर्धा बढ़ी। कल तक जो केवल लेखन शैली को जानने मात्र से चयन पद्धति की जाती थी। भीड़ को देखते हुए छटाई के लिए परीक्षा और प्रोफेशनल कोर्स का परिचालन किया गया। नए-नए प्रोफेशनल कोर्स के लिए अनेक संस्थान खुले, जिसने कई प्रतिभाएं नए विचारों एवं जोश के साथ इस क्षेत्र से जुड़ने लगे। उनमें कम्युनिकेशन स्किल एवं विश्वास लगातार बढ़ता गया।

शहरी क्षेत्र विशेषकर महानगरों में दिल्ली एवं मुम्बई मीडिया का केन्द्र माना जाता है। यही वजह है की ज्यादातर छात्र-छात्राएं इसके कोर्स को पूरा करते ही भविष्य को सुनहरा बनाने के लिए दिल्ली एवं मुम्बई में रहना पसंद करने लगे है। इसलिए प्रतिस्पर्द्धा इस कदर बढ़ गई है की नवीनतम पत्रकारों का शोषण भी होने लगा है। उसे शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद नौकरी के लिए भाग-दौड़ करनी पड़ती है। जैक और गॉडफादर

जैसे शब्द कल तक जो केवल फिल्मी दुनिया में सुनी जाती थी, कुछ ऐसा ही इसमें भी सुनाई पड़ने लगा है। क्योंकि इनके अभाव में आज छात्र-छात्राओं को मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है। उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है।

इन्टर्न के बहाने छोटे-मोटे अखबारों द्वारा उनका शोषण किया जाता है। क्योंकि बड़े-बड़े अखबारों और चैनलों में भी इंटर्न बिना जैक और गॉडफादर के प्राप्त नहीं होते। मजबूरन अपने माता-पिता की नजरों में नालायक कहलाने से बचने के लिए उन्हें मुफ्त में शोषित होना पड़ता है। क्योंकि अभिभावक भला पत्रकारिता में आए बदलाव से अब तक कहा परिचित है। उन्हें तो बस यह दुनिया चकाचौंध और ग्लैमर भरी दिखाई देती है, जिसमें वे सपना देखते है कि उनका बेटा या बेटी जब टीवी पर आएगा तो समाज में उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। पर उन्हें क्या मालूम की इस चकाचौंध के पीछे कितना घनघोर काला धुंध छिपा है, जिसके स्पर्श मात्र से ही इंसान की रुह भी काली पड़ जाती है, भला इंसान की तन की क्या मजाल।

कई नवीनतम पत्रकार जैक और सोर्स के अभाव में अवसाद के शिकार हो जाते हैं या फिर अपना रास्ता ही बदल लेते हैं। चंद एक-दो छात्र अपनी जिद में जल कर भी हारना या हटना पसंद नही करते वे अंततः वक्त बेवक्त मंजिल पा लेते हैं और सबसे अधिक सफल होते हैं। ऐसे छात्रों के लिए कहे तो, ‘‘मेहनत करो आगे बढ़ो, आगे ही तुम्हें बढ़ना है, मिले नहीं तलवार अगर तो, कलम से ही तुम्हें लड़ना है, जीतना है तुमको हर बाजी, बाजीगर तुम्हें बनना है, मर जाना लड़ते हुए तुम तो, पर पीछे पांव न रखना है’’। लेकिन वे छात्र जो भले ही कक्षा में पढ़ाई के दौरान केवल मौज मस्ती की हो, कलम से कलम भी न लिखी हो, उन्हें शायद यह भी पता न होगा की ‘‘कलम एक तलवार है, जिसकी धार तलवार से भी धारधार है’’। बावजूद उनकी पहुंच कानून की पहुंच से भी लम्बी होती है। महज पाश्चात्य संस्कृति, शैली और हाव-भाव दिखाकर इस क्षेत्र में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। उन्हें न तो ज्यादा कुछ खबर का ज्ञान होता है ना ही उसे समझने की। यही वजह है कि मीडिया में आज उल-जुलूल खबरें ज्यादा प्रस्तुत की जाने लगी है। हर छोटी-बड़ी बेहूदी खबरें जिसका सामाजिक तानाबाना और समस्याओं से परे होता है। बावजूद उसे ब्रेकिंग न्यूज से संज्ञान दी जाती है। चंद दो तीन चैनलों को छोड़ जिनका टीआरपी से ज्यादा महत्व सामाजिक दायित्वों से होता है। ऊटपटांग खबरें दिखाकर कुछ पल के लिए तो वे लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेते है, परन्तु जब लोगों को कड़वी हकीकत का अंदाजा होता है तो वह उससे दूर भागने लगते हैं।

यही वजह है कि आज ज्यादातर परिवारों में पारिवारिक चैनलों को तरजीह दी जाती है। पुरुष जो कलतक न्यूज सुनने में ज्यादा वक्त बिताया करते थे। अब वे भी पारिवारिक चैनलों में रूचि लेने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा सच सबके सामने है। सुबह से रात के दौरान अगर खबरी चैनलों को देखा जाए तो खबर कम इंटरटेनमेंट ज्यादा दिखाई देगा। चंद दो चार खबरें ही टीवी स्क्रीन पर छाई रहती है। इन एक सालों में प्रसारित खबरों ने तो, मानों मीडिया और जनता में इस कदर दूरियां बढ़ा दी है कि अब मीडिया पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं और कोड ऑफ कंडक्ट लगाए जाने की सुगबुगाहट शुरु हो गई है। जी हां इन दस-बारह महीनों में चंद 8-10 खबरें महत्वपूर्ण रही जिनमें गुर्जर आंदोलन, राज ठाकरे की बयान बाजी, आईपीएल, आतंकवादी हमला, आरूषी-हेमराज, मालेगांव;प्रज्ञा ठाकुर-कर्नल पुरोहित आदि। मुम्बई पर आतंकवादी हमला। जिस पर नेताओं की वोट और सीट की राजनीति, वहीं मीडिया द्वारा टीआरपी की राजनीति खेलती दिखाई दे रही है। एक बच्ची के चरित्र के ऊपर भी बिना जांच और छानबीन के आक्षेप पर आक्षेप किया जाने लगा। नतीजतन मीडिया की लोकप्रियता का ग्राफ का नीचे आना शुरु हुआ। जो एनडीटीवी के पोल में भी दिखा। इसके साथ-साथ मुम्बई पर आतंकी हमले के लाईव कवरेज से होने वाली परेशानियों पर सवाल खड़े किए गए।

चैनलों पर दिखाई जा रही चंद खबरों के बाद, राजू के हंसगुल्ले जो मजाकिया तो होते हैं पर भद्दी बातों की तरह। लेकिन शायद इंसान को नॉनवेज ज्यादा पसंद है, फिर चाहे खाने की हो सुनने के। उसके साथ ही बाबाओं द्वारा दी जाने वाली राशिफल का ज्ञान जो शायद कुछ हद तक ठीक है। एक चीज इसमे अवश्य देखने को मिलती है कि किसी का भविष्य उज्जवल हो या न हो उन ज्योतिषियों का भविष्य बेहद उज्जवल है। इन सबके अलावा विशेष कार्यक्रम खूंखार क्राईम धारावाहिक जिसमें प्रस्तुत करता इतने बनावटी तरीके से पेश करते हैं कि स्वयं अपराधी से दिखने लगते है। यह देखकर अपराधी भी उनपर जोक करते होंगे कि ‘‘यार बीडू़ ये तो अपनी ही बिरादरी का है।’’

भला ऐसा क्यो हो रहा है? क्या पूरे भारत में खबरें खत्म हो गई, तमाम राज्य एवं प्रदेश विकास के रास्तें पर चल पड़े हैं, सभी गरीब अमीर बन चुके हैं, सभी अपराधियों को सजा मिल चुकी है, भ्रष्टाचार खत्म हो गया है, उग्रवाद और आतंकवाद का सफाया हो चुका है। भारत में कोई अच्छा इंसान नहीं बचा है, जो अच्छा काम कर रहा हो, जिसे दुनिया के आगे लाया जा सके। ताकि लोग भी उससे प्रेरित हो सके। यह भी समझ में नही आता कि आरूषि-हेमराज मर्डर मिस्ट्री भारत की सबसे बड़ी क्राईम कैसे हो गई? इतना बड़ा फैसला उन्होंने अकेले कैसे ले लिया? क्या केवल टीआरपी के लिए? क्या भ्रष्टाचार, कत्ल, बलात्कार, जनसंख्या विस्फोट, प्रदूषण और बेरोजगारी जिससे हजारों समस्याएं पनपती है, हजारों लोग मारे जाते हैं, क्या वह इस मर्डर मिस्ट्री से प्रमुख नहीं है।

झारखण्ड जैसे पिछड़े और हाल में अलग हुआ राज्य अभी बैसाखी पर चलना सीख ही रहा था। उस पर ऐसा निर्बुद्धि मुख्यमंत्री जबरदस्ती थोप दिया गया जो धीरे-धीरे कई लोगों को जीते जी मार रहा है पर शायद मीडिया का ध्यान उस पर कम हो चुका है। जब तक झारखण्ड फिर से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री वाला अति पिछड़ा राज्य नहीं बन जाता मीडिया का उस ओर ध्यान नहीं जा रहा है। क्योंकि पत्थर से ठोकरें खाकर हंसने और गिरने वाले सब लोग होते हैं पर हटाने वाला कोई एक ही होता है। इन तमाम खामियों को ऐसा नहीं है कि सुधारा नहीं जा सकता। लेकिन इसके लिए लाभ से ऊपर उठकर समाजहित में सोचने की आवश्यकता है। उसे सिर्फ पैसे के पीछे भागना नही चाहिए वरना वह हार्ट अटैक का कारण बन सकता है।

मीडिया संस्थानों को यह जानना जरुरी है कि इंसान भूख से भी मरता है और ज्यादा खाने के बाद उसके मोटापे से भी। लेकिन इसका अर्थ कदापि नहीं कि मीडिया पुरानी पद्धति में लौट जाए अर्थात आ अब लौट चले। बल्कि कुछ बदलाव की जरुरत है। ताकि अंतर्राष्ट्रीय चैनलों में चंद दिल्ली, मुम्बई की हाई प्रोफाइल हस्तियों की खबरों तक ही सीमित न रहे। यह भी उन्हें सोचना छोड़ना होगा कि अगर हाई प्रोफाईल लोगों के साथ पुलिस प्रशासन ऐसा बुरा व्यवहार करती है या न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी होती है तो आम लोगों के साथ कैसा होता होगा? वजह नीतिश कटारा केस को ज्यादा तरजीह दी जाने से भले ही इंसाफ मिलता हो लेकिन लम्बी कानूनी दांवपेचों के कारण वक्त भी लम्बा खिंच जाता है। पत्रकारों को भी चाहिए की एक खबर के पीछे भागने के बजाय आसपास की छोटी बड़ी अच्छी आकर्षक खबरों को भी समाज के बीच लाने का प्रयास करे जिससे की स्वच्छ समाज का निर्माण हो और फिर से मीडिया में लोगों के विश्वास और रूची को पटरी पर लाया जा सके।

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नरेन्द्र निर्मल

शकरपुर, दिल्ली

9868033851, ई.मेल- nirmalkumar2k5@gmail.com

 

आतंकवाद दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है, जिससे अबतक कोई भी देश अछूता नहीं रहा है। फिर चाहे शक्तिशाली अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेंटर का गिराना हो या भारतीय संसद में हुआ हमला। हर देश हर प्रांत आज इसकी चपेट में है। आतंकवाद का शिकार आज हर इंसान है। फिर चाहे इसे शह देने वाला पाकिस्तान ही क्यों न हो। आखिरकार बेनजीर भुट्टों जैसी शख्सियत जो पूर्व प्रधानमंत्री रहने के साथ-साथ पाकिस्तान में बीते चुनाव की प्रधानमंत्री की प्रमुख दावेदार थी, इसकी शिकार बनी।

भारत आतंकवाद से कई सालों से इस आग में झुलस रहा है। प्रतिवर्ष आतंकवाद के इशारों पर आतंकियों द्वारा भारत में छिपे कुछ गद्दारों से मिलकर अक्सर देश के विभिन्न प्रांतों में हमला करते रहते हैं। खासकर वे हमले ऐसे मौके पर करते हैं जिससे हमारे धर्मनिर्पेक्ष तानेबाने को तोड़ा जा सके। फिर चाहे राजस्थान, गुजरात का संकट मोचन मंदिर पर हमला करना हो या अजमेर शरीफ और हैदराबाद की मस्जिद पर बम विस्फोट। दरअसल आतंकवाद का उद्देश्य केवल मात्र दो धर्मों के बीच बने हुए प्रेम और भाईचारे को समाप्त करना होता है। उनका ना तो मजहब होता है ना ही कोई धर्म। वे इस जद्दोजहद में हर बार हमले करते रहते हैं और हमारी एकता से हमेशा उन्हें मुंह की खानी पड़ती है।

भारत के लिए आतंकवाद ही केवल मात्र शत्रु नहीं है। बल्कि उग्रवाद और माओवाद जैसी समस्या भी भारत में इस कदर बढ़ चुकी है कि ये भीतर ही भीतर देश को खोखला बनाने का काम कर रही है। आज भारत के चालीस फीसद प्रांत ऐसे है जो पूरी तरह इस उग्रवाद की चपेट में आ चुके है। और इनके एक नहीं कई रूप है। बोडो, उल्फा, माऊवाद, पिपुल्सवाद ग्रुप जैसे कई संगठन है जो भारत में तेज गति से अपना जाल फैला रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में नागालैण्ड, मिजोरम, मणिपुर या असम जहां बोडो और उल्फा संगठन ने राज्य और केन्द्र सरकार की नाक में दम कर रखा है वहीं बिहार, उड़ीसा, बंगाल और झारखंड माऊवादियों के निशानें पर है। इन संगठनों अधिकतर अपने देशवासी है। अब तो इन तमाम संगठनों की फंडिंग भी बाहरी देशों से होने लगा है जो कि एक चिंता का विषय है।

आखिरकार उग्रवादी किस प्रकार के होते है? उनका आकार हमारे से भिन्न तो नहीं, क्या उनकी मजबूरी रही होगी उग्रवादी बनने के पीछे? या फिर इंसान के रूप में भेड़िये हैं जिसे खून की लत लग चुकी है आतंकवादियों की तरह। क्या उन लोगों के मन में भगवान का डर समाप्त हो चुका है? या फिर उनका जन्म ही पेशेवर मुजरिम बनने के लिए हुआ था। इस तरह के कई सवाल मेरे मन में उठते रहते थे। अपनी मन की इस जिज्ञासा को जानने और समझने के लिए हमने बिहार और झारखण्ड के कुछ उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। मुझे अपनी जान जाने का डर था। लेकिन इच्छा तो इच्छा होती है, जिसे जितना दबाया जाए वह और बढ़ता चला जाता है। इसी क्रम में हमने जब कुछ ग्रामीण उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों का भ्रमण किया और लोगों से उनकी राय जाननी चाही तो, लोगों ने बताया कि ये उग्रवादी नहीं है। हमारे मसीहा है। हमारी समस्याओं और झगड़ों को पल में हल कर देते हैं। जबकि थाने जाने पर पुलिसवालों की यातनाएं सहनी पड़ती है। और हमसे पैसे मांगे जाते है। बावजूद नहीं देने की स्थिति में हमे न्याय नहीं मिलता। ये लोग हमे फौरन न्याय देते है। कानून की तरह नहीं जो कहती तो है उनके हाथ बहुत लम्बे होते हैं। पर अपराधियों तक कभी नहीं पहुंचते। और भूल से पहुंच भी जाए तो न्यायपालिका की लचीली व्यवस्था से वे आसानी से छूट जाते हैं।

मेरे मन में किसी उग्रवादी से मिलने की बेहद इच्छा जगी मुझे मालूम चला की उसी पास के गांव में उस उग्रवादी संगठन का एरिया कमांडर आया हुआ है। मैने गांव वाले के सहयोग से उससे मिलने गया। मेरे मन में थोड़ा डर का पसीना भी माथे से टपक रहा था पर रह-रहकर मिलने और सवाल पूछने की कोलाहल ने मेरे मन को मजबूत कर दिया था। मैं उससे मिला, बेहद आम इंसान सा लग रहा था। रंग श्यामल, कद लगभग 5 फीट 7 इंच का नौजवान। बस फर्क मुझसे थोड़ा था। मेरे हाथ में डायरी और कलम थी और उसके हाथ में बंदूक और मैगजीन।

मेरे मन को रहा न गया, मैने तुरंत उससे पूछा, आपका नाम क्या है? और आप इस क्षेत्र में कैसे आए? कही कलम के अभाव ने तो आपके हाथों में बंदूक थमा दिया। इतना कहना था कि वो भावुक हो उठा।

उसने अपनी सारी कथा सुनाई जिसे सुनते ही मानो मेरा दिल ही फट गया। दरअसल वह व्यक्ति कोई अनपढ़ या नासमझ नहीं था जिसे चंद रोटी का टुकड़ा देकर बंदूक उठाने पर विवश किया गया। बल्कि उसकी लाचारी और कानून व्यवस्था के कुछ दागदार सिपहसालारों ने उसे इस दल-दल में भेजने का काम किया।

उसका नाम रामजीराम (बदला हुआ नाम) जो जहानाबाद जिला का रहने वाला है। वह गया कालेज गया से स्नातक कर चुका है। वह अपने गांव और परिवार के बेहद होनहार लड़का था। जाति के हरिजन होने के बावजूद पढ़ने में बहुत तेज था। उसके पिता ने उसे पढ़ाने का भरसक प्रयास किया। वह भी अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए हमेशा मेहनत किया करता। उसकी इच्छा सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा में हाथ बंटाने की थी। उसके बढ़ते कदमों को देख गांव के चंद भूमिहार उसके परिवार से खिन्न रहने लगे। क्योंकि गांव में भूमिहारों का ही बोलबाला था। उसके दो भाई, दो बहन और माता पिता थे। इतना बड़ा परिवार होने के बावजूद उसके पिता ने रामजीराम की पढ़ाई में आंच नहीं आने दिया। इसी बीच उसकी छोटी बहन बीमार पड़ गई। सरकारी अस्पताल की खस्ता हालत को देख उसके पिता ने अपनी बेटी को गैर सरकारी हस्पताल में इलाज कराने के लिए गांव के एक भूमिहार से 1000 रू लिया। उस भूमिहार ने पिता के अनपढ़ होने का फायदा उठाते हुए 10000 रू पर अंगूठा लगवा दिया, बीस फीसद व्याज के साथ।

एक साल बाद जब भूमिहार ने तकादा के रूप में हिसाब निकालकर उसके पिता से 50 हजार की मांग की तो सारे सन्न रह गए। उसके परिवार वालों ने जब उसका विरोध किया तो उस भूमिहार ने अपने कुछ साथी से मिलकर रामजीराम के घर पर हमला कर दिया। उसकी दोनो मासूम बहनों की इज्जत लूट ली और छोटे भाई के साथ माता-पिता की जान ले ली। रामजीराम उस वक्त गया में था, जब उसे इस वाक्या का पता चला तो वह आग बबूला हो गया। उसने थाने जाकर रपट लिखानी चाही। तो जहानाबाद पुलिस ने मोटी रकम की आड़ में उसे डांटकर भगा दिया। वह अपने दुश्मन से बदला लेना चाहता था। इसी क्रम में उसने उग्रवादियों के एरिया कमांडर निर्भय सिंह से मुलाकात की, और उसने बंदूक उठा लिया। उसने अपने कलेजे की आग को ठंडा करने के लिए गांव के 27 भूमिहारों को काट दिया। उसके बाद वह दरोगा जो शेरघाटी थाने का इंचार्ज बन चुका था, वहां धावा बोलकर दरोगा को पेड़ में बांधकर जिंदा ही जला दिया। फिर तो उसका मकसद केवल संगठन बन चुका था। जहानाबाद जेल ब्रेक कांड, बेलाचाकंद नरसंहार कांड उसके मुख्य कांड है। उसके मन में आज भी पुलिस के प्रति घृणा बनी हुई है। वह झारखण्ड, बिहार जैसे प्रदेशों के हिट लिस्ट में आता है।

सुत्रों के अनुसार रामजीराम इस वक्त संगठन छोड़ चुका है। बिहार सरकार की उपलब्धियों से आए कानून में बदलाव से आशान्वित होकर उसने इस राह को छोड़ने का फैसला तो किया परन्तु माओवादी संगठन को यह नागवार गुजरा। संगठन ने उसे मारने के आदेश दे दिए। वह पुलिस और माओंवादियों के डर से नेपाल में कही जाकर छुप गया। क्योंकि एक तरफ कानून और दूसरी तरफ माऊवादी दोनों सरगरमी से उसकी तलाश कर रहे थे। अचानक मैने न्यूज में सुना रामजीराम (बदला हुआ नाम) पर नेपाल में हमला हुआ है और वो अस्पताल में है। उसने अपने साक्षात्कार के वक्त संगठन का नेपाल से जुड़ाव की बात तो स्वीकारी थी परन्तु उसने खुलकर कहने से इंकार कर दिया था।

इन तमाम पहलुओं पर नजर डाले एक बात अवश्य दिखाई देती है कि आज भी सभी उग्रवाद प्रभावित इलाके दुरूस्त हो सकते है। उसके लिए केन्द्र की तरफ से सही प्रयास और दिशानिर्देश की जरूरत है। ना कि राज्य सरकारों को केवल धन मुहैया कराने की जैसा कि शिवराज पाटील ने झारखण्ड दौरे के दौरान किया। इस धन का राज्य सरकार लगातार बेजा इस्तेमाल कर रही है। साथ ही पुलिस वालों को भी चाहिए की वह अपने चरित्र में बदलाव लाए। अपनी भ्रष्टाचार वाली छवि को बदले। वर्दी के अर्थ को पहचाने। वर्दी वाले यह तय करे की उन्हें मान-सम्मान कमाना है या सिर्फ पैसा। अगर पैसा ही कमाना उनका उद्देश्य है तो वह आई टी और मीडिया जैसी संस्थानों से जुड़कर अपनी इच्छा पुरा कर सकते है। या फिर तमाम इच्छाओं को मारते हुए देश, प्रदेश और क्षेत्र में शांति लाने में सहयोग करें।

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नरेन्द्र निर्मल

शकरपुर, दिल्ली

9868033851, ई.मेल- nirmalkumar2k5@gmail.com

 

कहानी

तारे जमीन पर का बेचारा पप्पू

 

- नरेन्द्र निर्मल

 

बचपन से ही शर्मीला किस्म का इंसान। लड़कियां तो दूर लड़कियों के शब्द से भी सिरहन सी होने लगती। दोस्त कई सारे हुए मगर सभी समान लिंग वाले। इसका कदापि मतलब नहीं की उसमें ‘दोस्ताना’ वाले लक्षण शामिल थे, बल्कि वह अभी नाबालिग था। दसवीं तक यहीं दौर चला। पढ़ाई में भी कुछ खास न था। अव्वल आता परन्तु पीछे की तालिका से। घरवाले भी काफी परेशान रहते। खेल खेलना भी पसंद नहीं करता। अगर मन में कभी खेल भावना हिचकोले भी मारती तो घरवाले ताना देते। हर वक्त खेल, इसलिए तो पढ़ाई में अव्वल आते हो वह भी पीछे की दिशा से। तुम्हारा तो अब भगवान ही मालिक है। ताने सुनता रहा तुलना औरों से होती रही। देखो उस समीर को फर्स्ट लाया है अपने बाप का नाम रौशन किया है। दर्द असहनीय होता गया। मन में क्षोभ जन्म लेने लगे। बेचारा था... पप्पू ही रहा। दसवीं के परिणाम ने एक बार फिर से निराशा के अंधेरे में ढकेल दिया। लेकिन घर में एक मां थी जिसने हर वक्त पुचकारा, गलतियों पर पर्दा डालती रही। जानती थी, वह भी उसकी कोख से जन्मा उसके कलेजे का टुकड़ा रहा। उस बेचारे की तरफदारी में कभी-कभार आक्षेप के दंश को भी हंसकर सहन करने से न कतराती। मां जो ठहरी, विशाल हृदय होना तो लाजमी ही था। बाप की तरह पत्थर दिल की संस्कृति हमारे भारतीय सभ्यता में नहीं देखी गई है। और अपनी ही छवि को धूमिल होता देख कहा चुप रह पाती।

दसवीं के बाद किसी प्रकार उसे मॉडर्न स्कूल में डाल दिया गया। ताकि संकुचित मस्तिष्क में पड़ी धूल छट सके। इस दौरान उसे प्रेम का मतलब पता चला। आकर्षण किसे कहते है, बोध होने लगा। एक लड़की से मन ही मन प्यार करने लगा। बेचारा शर्मीला जो ठहरा। कहने की हिम्मत कहा थी। लेकिन एक बात तो उसमें थी कि वह अपने सभी बातों को बेधड़क दोस्तों को कह देता। उसे शहर की हवा भी नहीं लग पाई थी। क्योंकि जहां वह रहता था उसे गांव कहा जाता। गांव की संस्कृति में पला-बढा जहां हर पड़ोसी में रिश्ते-नाते तलाश लेता। किसी को चाचा-चाची, मामा-मामी, दीदी-भैया और बहन बना लेता। और एक बार जो मन में बिठा लेता, दूर-दूर तक उस पर कुदृष्टि नहीं डालता। लेकिन जहां वो पढ़ने के लिए मॉडर्न स्कूल जाता था। आस-पास का वातावरण शहर के माहौल में पूरी तरह ढल चुका था। सामने खुलने वाले दरवाजों के बीच रिश्ते तो दूर की बात, एक-दूसरे को जानते तक नहीं। अनजाने मुसाफिर को घर तलाशने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ती थी।

घर से निकलता स्कूल बस पर और संध्या को सीधा उसी गांव के वातावरण में। उसने प्यार तो सीख लिया पर प्यार के अलावा कुछ नहीं सीखा, जो आज के महानगरों के बच्चे कक्षा सातवीं से ही जान चुके होते है। न तो लड़कियां रिझाने के तौर-तरीके से ही वाकिफ था, उसके बाद की परिकल्पना की तो बात ही छोड़ दें।

इसी क्रम में बेचारे की दो साल भी घीसा-पीटा बीत गया। और होना क्या था, बारहवीं का परिणाम सामने। परिवार वालों का शोर कानों में लाउडस्पीकर की तरह एक बार फिर बजने लगा। इसका कदापि तात्पर्य नहीं कि वह फेल हो गया था। बल्कि प्रथम से दो अंक पीछे रहकर द्वितीय श्रेणी का खिताब तो अवश्य ही पा लिया था। सब ने कहां अब क्या करोगे? उसने कहां तैयारी मेडिकल की करूंगा, शायद डाक्टर बन जाऊं। कॉनफिडेंस लूज जो ठहरा। मेडिकल की तैयारी के लिए कोचिंग में दाखिला लिया पर उसकी अजीबो-गरीब सी पढ़ाई ने उसे और असमंजस में डाल दिया। यह भी एक साल यू ही जाता रहा। एक बात अवश्य रही इस बार उसे प्रेम का मोह मन में नहीं पनप पाया।

निराश लौट आया घर को खुद को कोसते हुए। परिवार वालों ने कोसा, वो अलग। पढ़ाई से मानो अब मन ही उचट गया था। बिजनस में जाने का मन बना लिया। घर वालों ने भी प्रोत्साहन देने के बजाय एक बार फिर से पढ़ाई की दल-दल में झोक दिया। कहां अभी पढ़ो बिजनस करने की उम्र अभी बहुत बची है। पास के कालेज में दाखिला लिया ताकि स्नातक की खानापूर्ति हो सके। इसी बीच बेचारे को दिल्ली घूमने का मौका मिला। वहां की दौड़ती भागती जिंदगी से काफी प्रभावित हुआ। रोज नए-नए हुस्न के दर्शन और उससे पनपते आकर्षण ने दिल्ली में रहने की ललक जगा दी। दिल्ली में रहना कोई आसान नहीं था। महंगा शहर था। वो दक्षता भी नहीं थी जिससे की वह खुशहाल जिंदगी अपनी बना सके। लेकिन अचानक उसके जेहन में कई सारे रंगीन सपनों ने जगह बनाना शुरू कर दिया। मन से एक आगाज उठने लगा, कहने लगाः-

‘‘देश के लिए कुछ करूं या तो नाम कमाऊं

राजनीति मे नहीं तो टीवी पर तो आऊं

वो भी न कर सका तो मैं मिट्टी में मिल जाऊं’’

जिंदगी में आगे चलकर उसे क्या करना है। कुछ नहीं जानता बस इतना जानता ‘जो मन में ठानी है, उसे हर कीमत पर पाना है’। ऐसे में रोजगार परक कोर्स के विचार मंथन चलने लगा। साथ ही मन की आवाज को भी पूरा करना था। पत्रकारिता एक मात्र रस्ता दिखा जिसके माध्यम से इन तमाम रास्तों से गुजरा जा सकता है। लेकिन कुछ कमियां उसमें जिससे इस रास्ते पर आना आसान नहीं दिख रहा था। लेकिन कहते है न जो किस्मत में लिखा है वहीं होता है। अचानक उसके हाथों में लिखने की क्षमता जागृत होने लगी। शुरुआत बेचारे ने कविताओं से की। इसी बीच एक लड़की के पुलकित चेहरे ने उसकी आखों में दस्तक दी। फिर क्या था प्रेरणा उबाल मारने लगा। कलम की, धार धारदार होती चली गई। रफ्तार भी तेज होती गई लिखने की। शब्दों और वाक्यों से खेलने की कला में भी निखार आने लगा। हां एक कमी थी उसमें साहित्यिक शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर पाता। वजह एक मात्र थी, वो गांव, जहां हिन्दी भी शुद्ध नहीं बोली जाती थी। क्योंकि प्रादेशिक भाषा का बोल-बाला था।

उसने तय कर लिया पत्रकार ही बनेगा। चाहे कितनी भी परेशानियों का सामना करना पड़े। लड़ेगा वो थकेगा नहीं। स्नातक पास कर लिया वह भी पप्पू की तरह लटक-झटक कर। लेकिन पत्रकारिता के स्नातकोत्तर में दाखिला लेने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। दाखिला लेने के बाद उसने तय किया कि वह अब अपने शर्म को अपने दिल के कोने में बने संदूक में डाल देगा। ऐसा ही कुछ किया। फिर क्या था दोस्तों की कतार बढ़ने लगी। इस बार लड़कियां भी उस कतार में शामिल होने लगीं।

अपनी कक्षा में अव्वल रहने व बनने की जि़द में उसने लेखन में कई कार्य किये। अपना कलात्मक सोच में भी तीक्ष्णता लाता गया। कालेज में होने वाले कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगा। लड़कियों के साथ भी खिल-खिलाकर हंसने की कला सीख ली थी उसने। इस बीच अपने ही कालेज से प्रकाशित होने वाली पुस्तक का सम्पादन किया। कई सारे लेख और कविताएं उनमें डाले। इसी बीच सहपाठी कन्या का दिल में दस्तक देना आरम्भ हुआ। दोनो में फौरन अच्छी दोस्ती भी हो गई। लेकिन बेचार फिर पप्पू बन गया क्योंकि लड़की शर्मीली थी। और थोड़ी कसर उसने भी पूरी कर दी। न उधर से इस प्यार के आग को हवा दी गई और न ही उसमें इतनी हिम्मत थी कि आग में घी डाल सके। हां बातों-बातों में मुहावरों से जरूर समझाने का प्रयास किया परन्तु विफल रहा। एक दिन हिम्मत कर उसने सब कुछ कहना चाहा तो उससे पहले ही पता चला उसे कोई और प्यार करता था। इतना ही नहीं उस शख्स ने धमकी दे रखी थी, अगर तुने बेवफाई की तो आत्महत्या कर लूंगा। वो बेचारा सोच में पड़ गया। किसी की जान से ज्यादा उसका प्यार कीमती नहीं हो सकता। उसने फौरन उसे दिल से निकाल दिया। दोस्ती रखी पर वो एहसास खत्म कर दिये, जिसने उसके दिल को विचलित कर रखा था। फिर क्या था दिल खाली कहां रहता है वह भी उम्र के ऐसे पड़ाव में। तलाश तो सबको रहती है अपने लिए एक साथी की।

इन एक सालों में वह दिल्ली की संस्कृति से पूरी तरह अवगत हो चुका था। कि यहां सच्चे प्यार की कोई कद्र नहीं है। सब पैसे के भूखे है। हर जिस्म की कीमत होती है यहां। लेकिन उसे जिस्म से ज्यादा एक साथी की तलाश थी। ताकि उसके कमी के एहसास को भर सके। लेकिन नाकामयाब रह गया। तब तक साल भी बीत चुके थे। वह रेगिस्तान में तड़पते प्यासे की तरह प्यार के लिए प्यासा ही रह गया। आज वो नौकरी की जुगत में इधर-उधर भटक रहा है। जिस पत्रकारिता के दम पर उसने समाज में फैली बुराईयों को मिटाने का बीड़ा उठा रखा था। आज उसी पत्रकारिता के बदले स्वरूप जिसमें जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद और बाजारवाद के बढ़ते चलन ने काफी निराशा पहुंचा है। वह समझ चुका है कि पत्रकारिता अपनी पुरानी धारा खो चुकी है। जिसके उफान मात्र से ही बड़े से बड़े चट्टान धूल में परिणत हो जाते थे। बल्कि वैश्वीकरण के इस युग में यह भी एक खूबसूरत रंगीन लिफाफे की तरह दिखता है। समय के तकाजे को भांपते हुए अब उसने भी खुद को बदलने का फैसला कर लिया है क्योंकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। इस बदली हुई परिस्थिति में नई सोच के साथ खुद के लिए मुकम्मल स्थान पाने का प्रयास उसका जारी है। देखना होगा आने वाले दिनों में वह कितना सफल हो पाता है।

इस बीच उसे मालूम चला की उसका पहला सच्चा प्यार, जिसे किसी के आत्महत्या की धमकी ने उसके एहसास तक मिटाने के लिए विवश कर दिया था। उसकी मांग अब सजने वाली है। हाथों में मेंहदी रचाने जा रही है पर वह भी किसी और से। लेकिन एक बड़ी आश्चर्य करने वाली बात सामने आई कि वह उस पप्पू से प्यार करती थी, लेकिन उसे कभी कहने की हिम्मत नहीं हुई थी। ऐसे में एक बात अवश्य सामने आती है कि बेचारे लड़के को पप्पू की संज्ञा दी जाती है। लेकिन उन लड़कियों का क्या नाम दिया जाए जो पप्पू वाली हरकतें करती रहती है। विचार करे!

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नरेन्द्र निर्मल

के- 10, द्वितीय तल, शकरपुर, दिल्ली

मो.- 9868033851

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क्षितिज के उस पार

हाँ वो शिला ही थी!! कैसे भूल कर सकती थी मैं पहचान ने में उसे, जिसे बरसों देखा, साथ गुजारा, पल पल उसके बारे में सोचा.

शिला थी ही ऐसी, जैसे किसी शिल्पकार की तराशी हुई एक सजीव आत्मा जो तन को ओढ़कर इस सँसार की सैर को निकली हो. जिस राह से वो गुजरती, गुजरने वाले थम जाते थे, जैसे जम से जाते थे. उनकी आँखे पत्थरा जाती, जैसे किसी नूर को सामने पाया हो. हाँ वही हूर शिला मेरी प्रिय सहेली आज मेरे सामने से गुजर रही है, खुद से होकर बेखबर.

बारह वर्ष कोई इतना लंबा अरसा तो नहीं होता, जहाँ इन्सान इस कदर बदल जाये, न फ़कत रँग रूप में, पर जिसके पूरे अस्तित्व की काया पलट हो जाए. वो कालेज के जमाने भी खूब हुआ करते थे, जब मैं और शिला साथ साथ रहा करते थे, एक कमरे में, एक ही क्लास में और लगभग पूरा वक्त साथ खाना, साथ पढ़ना, साथ समय बिताना. क्या ओढ़ना, क्या बिछाना ऐसी हर सोच से परे, आजाद पँछियों की तरह चहकते हुए, हर पल का लुत्फ लेते हुए, हर साल कालेज में टाप करते हुए अब हम दोनों फाइनल साल में पहुँचीं. चार साल का अरसा कोई कम तो नहीं होता, किसी को जानने के लिये, पहचानने के लिये.

"अरे शिला!" मैंने उसके करीब जाते ही अपनेपन से उसे पुकारा. अजनबी सी आँखें बिना भाव मेरी ओर उठी, उठकर फिर झुकी और वह कदम आगे बढ़ाकर चल पड़ी, ऐसे जैसे मैं कोई अजनबी थी.

"शिला, मैं तुम्हारी सहेली सवी, कैसी हो?" जैसे सुना ही न हो, या चाहकर भी सुनना न चाहती हो, कुछ ऐसा अहसास मन में उठा. ऐसा क्या हो सकता है जो इस बदलाव का कारण बने?

इठलाती, बलखाती, हर कदम पर थिरकती हुई शिला, जैसे किसी शिल्पकार की तराशी कोई छवि, दिन भर गुनगुनाती अपने आस पास एक खुशबू फैलाती, आज इतनी बेरँग, रूखी बिना अहसास क्यों? मेरी उत्सुकता बढ़ी, मैंने आगे बढ़कर उसके साथ कदम मिलाकर चलते हुए धीरे से फिर उसका हाथ थाम लिया.

" शिला, मैं तो वही सवी, सविता हूँ, पर तुम शिला होकर भी शिला नहीं हो, यह मैं नहीं मानती. कैसा है समीर?"

इस सवाल से उसके चेहरे के रंग में जो बदलाव आया वो देखने जैसा था. चेहरे पर तनाव के बादल गहरे हो गये, आँखों में उदासी के साए ज्यादा घने और तन सिमटकर छुई मुई सा, जैसे वह सिमट कर अपना अस्तित्व छुपा लेना चाहती हो. मैंने उसकी कलाई पकड़ ली. जब उसने छुड़ाने की कोशिश की तो ज्यादा पुख्त़गी से पकड़ी, और हाँ उसने भी फिर छुडाने की कोशिश नहीं की. शायद अपनेपन की गर्मी से पत्थर पिघलने लगा था. उसी प्यार की आँच में पिघलकर ही तो वह समीर के साथ चली गई, दूर बहुत दूर किसी और दुनियाँ में. पीछे छोड़ गई अपनी प्यारी सहेली सविता को, अपने अंतिम वर्ष की पढ़ाई को, अपने आने वाले उज्जल भविष्य को. शायद उस प्यार की पनाह ने उससे वह रौशनी छीन ली थी, जिस कारण उसे सिर्फ समीर, उसकी चित्रकारी, और तूलिका पर निखरे रँग आस पास दिखाई पड़ रहे थे. जाने क्या था वह, कैसे खुमार था, प्यार का जुनून ही रहा होगा, जो उसने अपना भविष्य समीर के नाम लिख दिया. और एक दिन अचानक वह उसके साथ शादी अचानक मेरे सामने आ खड़ी हुई.

" सवी, मुझे और समीर को शादी की बधाई नहीं दोगी?"

" हाँ हाँ मुबारक हो"..पर अचानक...मेरे शब्द मेरे मुँह में ही रह गए.

" हाँ अचानक ही फैसला करना पड़ा, कल समीर वापस जा रहा है अपने घर शिमला, और में भी उसके साथ जा रही हूँ." कहते हुए शिला मेरे गले लग गई.

"पर दो महीने के बाद फाइनल परीक्षा..." मैं कहना चाह रही थी पर कह ना पाई. शायद शिला जानकर अनजान बन रही थी, या वह अब किसी प्रकार की दख़ल अँदाजी नही चाहती थी, इसीलिये तो शादी का महत्व पूर्ण फैसला अकेले ही ले लिया, किसी की जरूर ही उसे महसूस नहीं हुई. हाँ एक बात साफ थी, उसके ऊपर उस प्यार का, समीर की कला का जो इँद्रधनुषी खुमार था, उस बहाव में वो बहे जा रही थी. कोई बाँध वहाँ बाँधना बेकार था, यही सोच कर मैं भी अपनी पूरी सोच के साथ अधूरे शब्दों का सहारा लेने लगी.

"सवी, तुम ज्यादा मत सोचो, मैंने सोच समझ कर यह फैसला लिया है क्योंकि मैं समीर के सिवा नहीं रह सकती और न वो मेरे सिवा. अब मैं जीवन के रँगों को ओढ़ना चाहती हूं, उनमें अपनी आशाओं को रँगना चाहती हूँ, इससे ज्यादा कुछ नहीं..हाँ चलो साथ में बैठकर आखिरी बार खाना खाएँ, कल वैसे भी सुबह की गाड़ी पकड़नी है, आओ चलें." कहते हुए उसने मेरी कलाई ठीक उसी तरह पकड़ी थी, जैसे आज मैंने उसकी पकड़ी है.

खाना खाते खाते, बातों के दौरान मैं समीर की ओर देखती रही चोरी छुपे, जैसे उसे जानने की, पहचानने की कोशिश करती रही. ऐसा क्या था उसमें जो मेरी प्रिय सहेली की जिँदगी में तूफान बनकर आया और बवंडर की तरह बहा कर ले जा रहा है. दो महीने के लिये जो आर्ट का प्रोजेक्ट उसे सौंपा गया था, उसके पूरा होने के पहले ही उसने शिला की जिंदगी पर अपना रंग चढ़ा दिया और अब साथ ले जा रहा था मेरी जान से प्यारी सहेली को, जैसे जबरदस्ती कोई मेरे तन से रूह को जुदा कर रहा था. सोचों के दाइरे से खुद को बाहर निकालते हुए मैंने समीर की ओर रुख किया.

"समीर बुरा न मानना, पर एक बात तो बताओ, क्या दो महीने शिला की खातिर और नहीं रुक सकते ताकि शिला भी अपनी पढ़ाई की जवाबदारी पूरी कर ले. जीवन भर साथ निभाने के लिये जरूरी नहीं है कि हम वक्त के साथ खिलवाड़ करें. पढ़ाई तो रौशनी का एक अंग है, उसे इस तरह अधूरा...."

"सविता जी फैसला शिला का है मेरा नहीं, और उस फैसले से मैं ज्यादा खुश तो नहीं, पर नाराज़ भी नहीं. मेरी प्रेरणा मेरा मीत बनकर मेरे साथ साये की तरह रहे, यह मेरी खुशकिस्मती है."

" पर....." इतना भी न कह पाई और शिला ने आँखों के इशारे से मूक भाषा में मुझे कुछ न कहने के लिये कहकर चुप करा दिया.

बस वह चली गई, अपनी सुनहरी दुनिया में सुँदर सपनों को लेकर और फिर सब धुँधला धुँधला सा हो गया. दिन बीते, महीने बीते, और साल भी बीतते चले गये..एक नहीं, दो नहीं, पूरे बारह बरस. सोचों का सिलसिला साथ था, पकड़ में उसकी कलाई और हमकदम हमारी चाल. आखिर एक पेड़ के नीचे खींचकर मैंने उसे बिठाया और फिर मैं भी बैठ गई उसके पास सटक कर जैसा हम अक्सर बैठा करते थे.

" अब बता शिला, तू यहाँ इस शहर में शिमला से इतनी दूर? और समीर कहां है, साथ में क्यों नहीं आया?" मैंने अनजाने में कई सवाल एक साथ पूछ लिये और उसका मुँह तकने लगी जवाब के इंतजार में !

जवाब में उसकी मृगनयनी आँखों से टपके सीप से कुछ मोती, जिन्हें चाहकर भी मैं अपने आँचल में समेट न पाई, ना ही शिला ने जतन किया उस फिसलती हुई धारा को रोकने का. बस कुछ कह न पाई और उठते हुए अपनेपन से कहा " चलो कहीं बैठकर चाय पीते है सवी."

चाय के उस दौर में उसने चाय के साथ न जाने कितने आँसुओं के साग़र पिये, अनबुझी किसी प्यास का होना जाहिर था, पर उस प्यास का रुख एक नया मोड़ ले रहा था. शिला की जुबानी उसकी आंसुओं की तरह बिखरी हुई कहानी को समेटते हुए शिला ने कहा " सवी मैं उसके लिये बस तूलिका पर बिखरे हुए रंगों का एक बिंदु थी.."

" थी..." मैंने उलझे हुए होंठों को खोलने की कोशिश की, पर शिला के मन का द्वंद्व शायद अभी बंद न हुआ था.

" हाँ थी. हूँ नहीं सवी " अपनेपन की आँच से थमा हुआ दर्द का दरिया पिघल कर आँखों से बह जाना चाह रहा था और उसी बहाव में बहते हुए शिला कहती गई, " सच मानो सवी जिस तरह उसने तूलिका पर रंग बिखेरकर मेरी तस्वीरों को सजाया, उन्हें सजीव बना दिया अपने हुनर की बारीकियों से, कई खरीदार उन पर फिदा होकर खरीदने लगे. दौलत का नशा दिन से ज्यादा समीर की रातें रंगीन करने लगा. दिन को मैं किसी पत्थर की मूर्ती की तरह उसकी प्रेरणा बनकर घंटों बैठी रहती और वह नपे तुले ढंग से मेरे हर कोण में रंग भरता रहा, बेचता रहा और खनखनाहट में खोता गया, और फिर बहाव इतना तेज़ आया उस बाढ़ में, जो वह मुझे भी बहा ले गया उसकी स्वार्थ की वेदी के उस पार जहाँ मैं तुम्हारी वह सहेली तो नहीं रही जो हर पल को तुम से बाँट लेती थी, पर हां बंटी सी, बिखरी बिखरी सी उस शिला का ज़र्रा ज़र्रा बिखरता गया. हाँ वह शिला जो अपनी आन बान के साथ जिया करती थी...वह..." और शिला फूट फूटकर रोने लगी.

बस अनकहे शब्दों ने हर खालीपन को भर दिया, आँसुओं की जुबाँ सब कह गई. मुझे यूँ लगने लगा कि शिला बिखर कर टूट चुकी है और जहां तक मेरी सोच पहुँच सकती थी, ऐसा आभास हुआ जैसे शिला मुझसे वही पुराना आश्रय माँग रही थी, उसी आँचल की नर्मी ढूँढ रही थी, वह निस्वार्थ स्पर्श माँग रही थी.

मैंने उसे आलिंगन में भरते हुए अपने साथ इस तरह जोड़ लिया जैसे वो कभी मुझ से अलग ही न हुई थी. उसका इस तरह सिमटना, बिखराव का अंत हो गया, सभी बिखरे रंग फिर से सिमट कर उस बेरंग शिला रूपी बिंदु में समाते चले गए, बूँद सागर में समा गई. आकाश के बादल छंट गए, विराटता नजर में भर गई सितारों भरा आसमान साफ दिखाई दे रहा था.

कब दुपहर से शाम, शाम से साँझ हुई पता ही नहीं पड़ा, सफर ज़ारी है, मंजिल क्षितिज के उस पार शायद......!!!

दूर ध्वनि के साथ शब्द भी भीने भीने से मन को भिगोते रहे.

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देवी नागरानी,

New Jersey, dnangrani@gmail.com,

http://charagedil.wordpress.com

100_8163 (WinCE)

जरूरत

”चलो पीछे करों भाई इन सबको, दरवाजे पर भीड़ क्‍यों इकट्ठा कर रखी है।“ मरीजों को देखते हुए डॉ. प्रशांत ने अपने कम्‍पाउंडर से कहा। उसने डॉ. का इशारा पाते ही मरीजों को सरकारी डिस्‍पेंसरी के दरवाजे से बाहर धकेल दिया। उनमें से एक मरीज को डॉ. प्रशांत के पास लाते हुए वह बोला, ”सर, इसका इलाज तत्‍काल करना पड़ेगा। यह बहुत ही सीरियस है। यदि कहीं यह इलाज के बिना मर गया तो गांव की राजनीति को एक नया मुद्‌दा मिल जायेगा साथ ही आपकी बड़ी फजीहत होगी। अतः इसे जरूर देख लें।“

”ठीक है, बुलाओ उसे। मैं देख लेता हूँ।“

कम्‍पाउंडर ने मरीज को डिस्‍पेंसरी के अंदर ठेल दिया।

”क्‍या नाम है तुम्‍हारा?“

”जी रामू , रामू बल्‍द घिस्‍सू।“

”हूं , क्‍या तकलीफ है ?“

”डागदर साब, कब्‍ज बनी रहवे है।“

”अच्‍छा, कल शाम को क्‍या खाया था?“

”जी , कुछ नहीं।“

”कल सुबह?“

”जी कुछ नहीं।“

”परसों दोनो टाईम?“

”जी कुछ नहीं।“

डॉ. प्रशांत ने गर्मी और भारी उमस में पसीना पौछते हुए कहा, ”क्‍या करते हो?“

”जी कुछ नहीं।“

डॉ. ने आश्‍चर्य से प्रतिप्रश्‍न किया, ”गुजारा कैसे होता है?“

”साब, बहुत गरीब आदमी हूँ। जब से फसल कटाई के लिए मशीनें आई हैं, भूखे मरने की नौबत आ गई है।“

डॉ. प्रशांत ने उसका मर्ज ज्ञात कर लिया था। उन्‍होंने कम्‍पाउंडर को पचास रूपये का नोट देते हुए कहा, ”इसे ले जाओ भरपेट खाना खिलाओ, इसे दवा की नहीं भोजन की जरूरत है।“

 

परिश्रम का फल

एक था कौआ। बिलकुल उस प्राचीन कथा वाले कौए के समान। जिसमें प्‍यासा कौआ पानी पीने के लिए मिट्‌टी के बर्तन में स्‍थित पानी ऊपर लाने के लिए चोंच में कंकड़ दबाकर लाता है। कंकड़ बर्तन में डालता है। अपने अथक परिश्रम के पश्‍चात पानी ऊपर आने पर पीकर उड़ जाता है।

लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। गाँव के गरीब भोले भाले एक कौये ने अपने परिश्रम के द्वारा मिट्‌टी के बर्तन को छोटे-छोटे कंकड़ो से भरा। बर्तन में पानी ऊपर आने पर एक अन्‍य राजनीति के ज्ञाता, चालाक और तिकड़मी कौये ने बल पूर्वक उसे डरा धमका कर बर्तन को अपने कब्‍जे में ले लिया। उसका पूरा जल पीकर अपनी प्‍यास बुझाई।

उड़ने से पूर्व मिट्‌टी के पात्र को तिपाई से गिराकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया।

पहले कौआ अब भी प्‍यास से तड़प रहा है।

 

स्‍थापना

वे नगर सेठ हैं, कई मिलों के मालिक, कारखाने चल रहे हैं, आढत है। उनका नगर में रूतबा है। स्‍थानीय संस्‍थाओं, पुलिस तथा प्रशासन में तूती बोलती है। किसी की भी क्‍या मजाल कि चूं चपड़ कर सके।

उस रविवार स्‍थानीय समाचार पत्र में नगरपालिका का टेण्‍डर छपा था। उनके घर के सामने से बहने वाले अधूरे नाले के निर्माण कार्य पूर्ण करने की छोटी सी निविदा थी वह।

वह निविदा स्‍वीकृत हुई, निर्माण कार्य की तैयारी भी प्रारंभ हुई। लेकिन नाले का निर्माण शुरू नहीं हो सका।

वजह! सेठ जी ने नाले के किनारे, अपने विशाल भवन की चहारदीवारी के पास हनुमान जी की मूर्ति की स्‍थापना जो कर रखी थी।

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अखिलेश शुक्‍ल, संपादक ‘कथा चक्र', 63, तिरूपति नगर, इटारसी 461111 (म.प्र.)

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चित्र – कलाकृति साभार – बनवासी सम्मेलन, भोपाल.

    साहित्यकारों में राजनीति एक गंभीर समस्या    


राजनीतिज्ञों की राजनीति देखी
धर्म, सम्प्रदाय में राजनीति दिखी
जाति, भाषा से बंटे लोग देखे
देखा भाई-भतीजावाद का हर वो चेहरा
पर साहित्यकारों में भी राजनीति होगी
इसकी कभी परिकल्पना नहीं कि थी मैंने
सब दिखा हंस और पाखी के प्रतिवाद में
उस पु्रस्कार से
जिसे समृद्ध ज्ञानत्व वाले लोगो को दिया जाता है
आलोचक रचनाकारों के तेवरों ने भी
दिखाया राजनीति का चेहरा
दिखाया कैसे एक साहित्यकार
साहित्य के क्षेत्र में एक छत्र
राज करने को लालायित रहता है
अपनी ही पत्रिका और लेखनी को
सर्वोच्च ठहराने की जुगत करता है
इस क्रम में एक-दूसरे पर आक्षेप
करने से भी नहीं चूकता
आदतें उन तमाम राजनीतिज्ञों की तरह
जो अपने ही दल को देश का प्रहरी मानता है
और दूसरे को देश का दुश्मन
उन धर्मनिर्पेक्ष और साम्प्रदायिक ठेकेदारों की तरह
जिन्हें न तो देश से लगाव है न ही देशवासियों से
ज्ञान बांटने वाले ये लोग
अज्ञानता की राजनीति से गुजरते देखे जायेंगे
नवीन कवियों और लेखको के लिए
यह बेहद चिंता का विषय है
खेमेबाजी की इस दौर में
नये उभरते लेखकों को
एक खेमा चुनने की विवशता
कहीं उनके लेखनी में जड़ता न ला दे
जिस समाज को बदलने की आश लिए
नए साहित्यकार अपना कलम चलाते हैं
कहीं उनके मन में डर न समा जाए कि
कौन सा खेमा उनसे ख़ीज खाकर
उसके पन्नों पर ही स्याही न छीड़क दे
निष्कर्ष सोचकर ही हम जैसे
रचनाकारों को डर सा लगने लगा है
कही हमारे पल्लवित होते पंख को भी
आलोचक राजनीति खेमेबाजी कर कुतर न डालें।

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हम है हममें है हमसे ये दुनिया सारी है

हम है हममें है हमसे ये दुनिया सारी है

हमसे टकराए गिर जाए हम तो भारी है

जलजला है हम, पल भर में जला देंगे

देखे दुश्मन हमको तो मिट्टी में मिला देंगे

अरे जोश है तुम मे तो आज़मा दम में

पल भर में चित करके तुमको हम दिखा देंगे

हम है हममें है हमसे ये दुनिया सारी है...

पीछे से करते वार, तुम करते हो हर बार

हिम्मत है तो सामने आके दिखला एक बार

हर मुंह की खाई है तुमने जो देखो हमसे

हर बाजी हारी है, तुमने अपने बचपन से

अब सोचों जिद छोड़ो, ये मान मेरा कहना

भाई हो छोटे से, हमे आपस में ही है रहना

हम है हममें है हमसे ये दुनिया सारी है...

न बहको बेमतलब बहकाने दो जमाने को

थोड़ी सी लगा अकल, उन्हें भी आजमाने को

वो दोस्त नहीं है तेरे, है दुश्मन वो मेरे

चाहते है हमसे मिट जाए हम लड़-लड़के

हममें शांति है सच्चाई है हममें,

ये देख नहीं पाते जीते वो इस गम में

हम है हममें है हमसे ये दुनिया सारी है...

वतन के नौजवान है हम

वतन के नौजवान है हम

वतन पे जा लुटा देंगे

वतन के रास्ते में जो आए

कसम से उसे हम मिटा देंगे

वतन के नौजवान है हम...

हममें एकता है इतनी

जो तोड़े टूट न पाती है

भरा है विश्वास जो हममें इतना

फौलाद भी आके बिखर जाती है

जो देखे दुश्मन हमारी तरफ

आंखों से रौशन चुरा लेते हम

वतन के नौजवान है हम...

न जाति हममें, न मजहब है

वतन के सभी रखवाले है

अमर हमारी प्रेम कहानी

जान वतन के हवाले है

न हिन्दू, मुस्लिम सिख न ईसाई हम

बस एक दूजे के भाई है हम

वतन के नौजवान है हम...

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मौत का तांडव

छिपे-छिपाए चकमा देकर,

असला बारूद भरकर

आ गये फिल्मी नगरी के भीतर

देखा इंसानी चेहरों को

मासूम भी दिखें,

उम्र दराज जिंदगियां भी थी

पर शायद दरिंदगी छुपी थी सीने में

उनके जहन में था वहसियानापन

कुछ आग पीछे सोचे बगैर

मचा दिया कोहराम

बजा दी तड़-तड़ की आवाजें

बिछा दी लाशें धरती पर

क्या बच्चें, बूढे और जवान

क्या देशी व विदेशी

चुन-चुन कर निशान बनाया

लाल स्याही से

पट गया धरती का आंगन

कुछ हौसले दिखे

दिलेरी का मंजर दिखा

जो निहत्थे थे पर जुनून था

टकरा गए राई मानो पहाड़ से

खुद की परवाह किए बगैर

शिकस्त दिया खुद भी खाई

वीरता से जान गँवाई

बचे खुचे दहशतगर्द

आग बढ़ गए

ताज को कब्जे में किया

फिर जो दिखा

दुनिया भी देखी

आतंक का चेहरा

कत्ले आम किया।

कुछ बच गए

रहमत था उनपर

जो मारे गये

किस्मत थी उनकी

फिर युद्ध चला

पराजित भी हुए

पर जांबाजो की ढेर लगी

मोमबत्तियाँ जली आंसू बहे

एकता का बिगुल बजा

नेताओं पर गाज गिरी

निकम्मों को सजा मिली

सबूत ढूंढे गए

दोषी भी मिले

सजा देना मुकम्मल नहीं

लोहा गरम है

कहीं मार दे न हथौड़ा

पानी डालने के लिए

अब कूटनीति है चली

लेकिन जनता जाग चुकी है

सवाल पूछने आगे बढ़ी है

पर शायद जवाब

किसी के पास है ही नहीं

जिन्होंने देश को तोड़ा

जाति क्षेत्र मजहब के नाम पर

आज खामोश है वे सब

मौकापरस्ती और

तुष्टिकरण की बात पर

चुनाव आनी है

दो और दो से पांच बनानी है

खामोश रहना ही मुनासिब समझा

बह कह दिया, सुरक्षा घेरा

हटा दो मेरा!

कुछ दिनों तक तनातनी का

यहीं चलेगा खेल

फिर बढती आबादी की रेलमपेल

एक बुरा सपना समझकर

फिर सब भूल जायेंगे

याद आयेंगे तब

जब अगली बार फिर से

मौत का तांडव मचायेंगे।

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मारना तो पड़ेगा ही

प्रकृति या फिर इंसान को

उसके बेटे पेड़, पौधे, जीव-जन्तु को मार गिराया है

रंग बिरंगी तितलियों का नामों निशान मिटा दिया

जो प्रकृति को खुशियां देती थी

प्रकृति के बनाए जीवन चक्र को भी

तहस नहस कर दिया है तुमने

और अगर कसूर तुम इंसानों ने किया है तो

सजा कौन भुगतेगा? प्रकृति या फिर इंसान

तभी अंतः मन के दूसरे सिरे से आवाज आई

इंसान कहता हम मजबूर है,

हमारी संख्या बढ़ी जा रही है

हमे जीना है जीवन-यापन करना है

मारना तो पड़ेगा ही।

प्रकृति ने कहा हमने कही थी इतनी आबादी बढ़ाओ

आबादी बढ़ाकर ढे़र सारी मुसीबत घर ले आओ

क्या दो बच्चों से संसार नही चलता तुम्हारा

ज्यादा बच्चे बनाने के चक्कर में

हमारे बच्चों का नुकसान क्यों पहुँचाते हो

खुद के लिए भी परेशानियां खड़े करते हो

और हमारा हरा-भरा संसार भी उजाड़ जाते हो

अब भी सुधर जाओ

हो सके तो एक में ही संभल जाओ

वरना अब की मेरे रक्षक बेटे ओज़ोन का

कुछ हुआ तो अंजाम देख लेना

पुरी दुनिया का नामों निशान

न मिटा दिया तो मेरा नाम बदल देना।

एक सुन्दर कोमल सुसज्जित,

ऐसा एहसास जो सदा रहे दिल के पास

जो कभी ठंड का एहसास कराती

तो कभी पल में गर्माहट ले आती

कभी ओस बनकर धरा में उतरकर

उमंग भरे चादर से सब को ढंक देती

हाँ कभी बूंदें भी बरसाती है

लेकिन बूंदें बिल्कुल असमान होती है

क्योंकि एक बूंदें जहां बिरहा दिलों को

मिलन की याद दिलाती है

वही दूसरी बूंदें वो तबाही का मंजर ले आती है

जिससे न चाह कर भी अपनों से विरह होने को विवश हो जाते है लोग

ये तमाम एहसास कराती कोई और नहीं

हमारी प्रकृति है जिससे एक नहीं कई रूप है

जो रूप बदल बदल कर

खुशियां और गम लोगों को देती है

फिर सवाल उठता है

आखिर खुशियां देने वाली गम क्यो देती है

तभी अंतः मन से एक आवाज आती है

कसूरवार खुद मुझको ठहराती है

कहती है तुमने ही

प्रकृति के परिवार को कष्ट दिया है

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एक मच्छर और एक आतंकवादी

दर्द का एहसास इंसानों को ही आता है

हाँ एक और समानताएं है दोनों में

दोनों छुप कर वार करने में माहिर है

सामने आकर लड़ने का कलेजा नहीं होता

एक सोते हुए व्यक्ति का जीना हराम कर देता है

तो दूसरा इतना बड़ा जख्म देता है

कि जिंदगी जीना हराम लगता है

जहां तक रही इनके सफाए की बात

तो आज तक मच्छर साफ नही हो पाए

तो भला इन कायरों को कौन साफ कर पाए

एक ही उपाय है

सही मात्रा में लगातार डीडीटी का छिड़काव

और दूसरा वोट के जरिए

ऐसे राजनीतिज्ञ पार्टियों का सफाया

जिन्होंने आतंकवाद को कौमी रंग देकर

इसका भरपूर लाभ चुनाव में उठाया

एक मच्छर और एक आतंकवादी

दोनो की बढ़ रही है आबादी

दोनो का नाता बस खून से है

एक इंसान का खून पीता है

तो दूजा खून बहाता है।

इसलिए पीने वाला मच्छर

और बहाने वाला आतंकवादी कहलाता है

दोनों में कई समानताएं और विषमताएं है

समानताएं है दोनों कौम नहीं देखते

बस खून देखने की अभिलाषा होती है

मच्छर की माने तो

स्वाद का मजा बराबर का आता है

मगर आतंकवादी कहते

जिहाद में सब जायज हो जाता है

खून जिसका भी बहे,

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है ये कहानी वीरों की कहानी

क्या कहता सुन ये मन है, क्यों सबकी आंखें नम है,

कुछ तो खोया है, सब ने रोया है

दर्द है ये दिल की है कहानी, वीरों ने दी है कुर्बानी

है ये कहानी, वीरों की कहानी-2

फख्र है हमको नाज यहीं है, अपने देश का ताज यही है,

सबकी इसने लाज बचा दी, मेरे गीतों का साज यही है

हंस हंस के ये जान लुटा दे, लुटा दे अपनी जवानी

है ये कहानी वीरों की कहानी-2

इसको तोड़ो उसको फोड़ो, नेताओं ने राग है छेड़ा

जाति क्षेत्र मजहब में तोड़ो, ताकि वोट मिले और थोड़ा

शहीदों को वे वोट में तौले, कड़वी इनकी जुबानी

है ये कहानी वीरों की कहानी-2

क्या कहता सुन ये मन है, क्यों सबकी आंखें नम है

कुछ तो खोया है, सबने रोया है

दर्द है ये दिल की है कहानी, वीरों ने दी है कुर्बानी

है ये कहानी वीरों की कहानी

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जहां जन्मा हूं आदिवासी क्षेत्र है

नाम झारखण्ड प्रदेश है

उसपर भी ऐसा गांव बालीडिह

जिसका साहित्य से नाता

दूर-दूर तक नहीं रहा

वहां तो शुद्ध हिन्दी भी बोली नहीं जाती

कुछ बोल के नमूने है,

‘‘कहा घर लागों रे नू नू,

तीन टका के नून दीहे,

सुनूम 5 टका के दे गो,’’

शुद्ध देशी संस्कृति का समावेश

उस पर भी बनिया परिवार में जन्मा

पिताजी के कारोबार में

हाथ बंटा कर बेटे का फर्ज भी

पूरा करने की जिम्मेदारी थी

वहां से भागना भी संभव नहीं था

हां मेरे मंझले भाई पर

इसका असर नहीं है,

इसलिए वो मां को

अंग्रेजियत मम्मी से पुकारते है

लेकिन मैं खांटी प्रदेश का

मां कहता या फिर

तेज आवाज में मईया गे।

ऐसे में बार-बार मुझसे कहना

साहित्य पढ़ो, बस पढ़ो

एक और बात जान ले

ये साहित्य का भूत,

कविता, लेखन, गीत लिखना

महज दो वर्षो से ही है

इससे पहले मैं अनजान था

आखिर जानूंगा कहां से भाई

मैंने बचपन से पढ़ाई ही

घाल मेल तरीके से की

हां इधर एक-दो सालों से

पढ़ने की ललक जागी है

और सबसे बड़ी बात

जो मुझे लगती है

सब ऊपर वाले का करिश्मा है

जो भ्रम के मकड़ जाल में पड़े

इस बालक को भविष्य के लिए

एक साफ सुथरा रास्ता सुझाया है

कमियां है मुझमें सीख रहा हूं

कुछ लोग कहते है मुझको,

लिखाडू हो तुम

ये अच्छी बात है

प्रेरित हो मगर

अभी प्रेरणा नहीं बन पाए हो

प्रेरणा तब बनोगे जब पढ़ोगे

पढ़ाई के साहित्यिक

सागर में डूब जाओगे

अभी बहुत सारी

कमियाँ है तुम में

मैं कहां, मानता हूं

मुझमें कमियां है

कमियां किसमें नहीं होती

कोई पूर्ण नहीं है

जो पूर्ण हो जाता है

खुद व खुद उसमें

विराम लग जाता है

और मैं अभी विराम

होना ही नहीं चाहता

एक और बात

मुझमें कमियां निकालने से पहले

कुछ जान ले मेरे बारे में

हां मैं साहित्य के मामले में

बिल्कुल कालिदास हूं

वो कालिदास ग्रंथों वाला नहीं

बल्कि वो डाली वाला कालिदास

जिसने बैठे हुए डाली को ही काट डाला

मेरा जन्म, जन्म स्थान,

परिवार और मेरी जाति

ये सभी इसके लिए दोषी है

मैं कोई इलाहाबाद, बनारस में नहीं जन्मा

जहां लोग पेट में ही अभिमन्यु की तरह

साहित्य सिख लेते है

ना ही मैं कोई पण्डित हूं

जिसे संस्कृत का रट्टा लगाकर

हिन्दी समझना जरूरी होता है

लाला भी नहीं हूं

जिसे जन्मजात ही

चित्रगुप्त की कृपा पात्र होती है

और जो कुछ भी मैं लिख रहा हूं

वो लिखने वाला मैं नहीं

मेरा तिलस्मी करिश्मा है,

जो कविता लिखना चाहता तो,

उसे लिख लेता

गीत लिखना चाहता

आसानी से लिख लेता

जबकि मुझे सुर का ज्ञान नहीं है

फिर भी गीत के साथ

उसके बोल भी बना लेता हूं

लिखना शुरू किया तो

लिखे जा रहा हूं

बिल्कुल कालिदास की तरह

जिन्होंने एक गलती के बाद

ग्रंथों की झड़ी लगा दी

उन्होंने संस्कृत में ग्रंथ लिखी

आपने साहित्य का सहारा लिया

मैं हिन्दी की सरस

भाषा में ही लिखूंगा

मैं सीखता भी रहूंगा

और लिखता भी रहूंगा

साहित्य का प्रयोग न हो

खड़ी हिन्दी में ही लिखूंगा

ये विश्वास है मुझे कि

भविष्य में मेरी कविताओं

लेखों, कहानियों और गीतों

को अवश्य सम्मान मिलेगा

बदलते समाज का युवा

मुझे जरूर सराहेगा।।

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संपर्क:


नरेन्द्र निर्मल
के- 10, द्वितीय तल, शकरपुर, दिल्ली

mahendra bhatnagar1

महेन्द्र भटनागर की कविताएँ व कविता संग्रह रचनाकार पर पूर्व प्रकाशित हो चुके हैं. प्रस्तुत है उनका सस्वर कविता पाठ. नीचे दिए गए डाउनलोड लिंक पर दायाँ क्लिक कर एमपी3 फ़ाइल डाउनलोड करें या फिर वहीं बाजू में दिए छोटे से प्लेयर बटन को क्लिक कर ऑनलाइन सुनें.

 

महेन्द्र भटनागर का सस्वर कविता पाठ यहाँ से डाउनलोड कर सुनें

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एक बरस और․․․․․․․

कविता

नन्‍दलाल भारती

मां की गोद पिता के कंधों

गांव की माटी और टेढ़ीमेढ़ी पगडण्‍डी से होकर

उतर पड़ा कर्मभूमि में सपनों की बारात लेकर ।

जीवन जंग के रिसते घाव है सबूत

भावनाओं पर वार घाव मिल रहे बहुत

सम्‍भावनाओं के रथ पर दर्द से कराहता भर रहा उड़ान ।

उम्‍मीदों को मिली ढाठी बिखरे सपने

लेकिन सम्‍भावनाओं में जीवित है पहचान

नये जख्‍म से दिल बहलाता पुराने के रिस रहे निशान ।

जातिवाद धर्मवाद उन्‍माद की धार,

विनाश की लकीर खींच रही है

लकीरों पर चलना कठिन हो गया है

उखड़ेपाँव बंटवारे की लकीरों पर,

सद्‌भावना की तस्‍वीर बना रहा हूं ।

लकीरों के आक्रोश में जिन्‍दगियां हुई तबाह

कईयों का आज उजड़. गया कल बर्बाद हो गया

ना भभके ज्‍वाला ना बहें आंसू

सम्‍भावना में सद्‌भावना के शब्‍द बो रहा हूं ।

अभिशापित बंटवारे का दर्द पी रहा

जातिवाद धर्मवाद की धधकती लू में

बित रहा जीवन का दिन हर नये साल पर ,

एक साल का और बूढा हो जाता हूं

अंधियारे में सम्‍भावना का दीप जलाये

बो रहा हूं सद्‌भावना के बीज ।

सम्‍भावना है दर्द की खाद और आंसू से सींचे बीज

विराट वृक्ष बनेंगे एक दिन

पक्‍की सम्‍भावना है वृक्षों पर लगेंगे

समानता सदाचार सामन्‍जस्‍य और आदमियत के फल

खत्‍म हो जायेगा धरा से भेद और नफरत ।

सद्‌भावना के महायज्ञ में दे रहा हूं

आहुति जीवन के पल पल का सम्‍भावना बस

सद्‌भावना होगी धरा पर जब, तब ना भेद गरजेगा

ना शोला बरसेगा और ना टूटेंगे सपने

सद्‌भावना से कुसुमित हो जाये ये धरा

सम्‍भावना बस उखड़ेपांव भर रहा उड़ान

सर्वकल्‍याण की कामना के लिये

नही निहारता पीछे छूटा भयावह वीरान ।

मां की तपस्‍या पिता का त्‍याग,धरती का गौरव रहे अमर,

विहंसते रहे सद्‌कर्मों के निशान

सम्‍भावना की उड़ान में कट जाता है

मेरी जिन्‍दगी का एक और बरस

पहली जनवरी को ․․․․․․․․․․․․․․․

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