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December, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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अनुज नरवाल रोहतकी की नववर्ष कविता सौगात

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नए साल पर दे रहा है ‘ अनुज ' कविता की सौगातखुशियां झूमे आंगन तेरे, गा उठे हर जज़्बातहर वक्‍त मिले, तुझे ही मिले, फूलों का बिछौनामहरूम न रहे खुशियों से, तेरे मन का कोई कोनाफूल-कलियों पर ही लेटकर गुजरे पूनम की हर रातनए साल पर दे रहा है ‘ अनुज ' कविता की सौगातखुशियां झूमे आंगन तेरे, ․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․पास के भी न गुजरे तू गम-ओ-उदासियों सेमहफूज रखे तुमको खुदा इन जालिम मायूसियों से हर वक्‍त हो, तुमसे ही हो , खुशियों की मुलाकातनए साल पर दे रहा है ‘ अनुज ' कविता की सौगातखुशियां झूमे आंगन तेरे, ․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․तेरी पसंद के सदा आते रहें अंजाम हर लम्‍हों मेंइज़ाफा इकतार होता रहे, तेरी खुशी के लम्‍हों मेंन समा सके तेरे दिल की अंगनाई में , मिले ख़ुशी इफरातनए साल पर दे रहा है ‘ अनुज ' कविता की सौगातखुशियां झूमे आंगन तेरे, ․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․डॉ․अनुज नरवाल रोहतकी

साबिर अली घायल की ग़ज़ल

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जो भी होता है वो पहले से लिखा होता है
हर एक राज़ लकीरों में छुपा होता है
लिखने वाला ही लिख पाता है नसीब अपना
हर किसी में कहाँ ये होसला होता है
कुछ तो बतलाओ किस बात पे बिगड़ते हो
कोई अपनों से भला यूँ भी खफा होता है
मैने की हो खता तो इसका मुझे होश नहीं
इश्क़ तो इश्क़ है और इश्क़ नशा होता है
बात कुछ तो नज़र आई है तुझ में "घायल"
वरना यूँ कौन भला किस पे फिदा होता है
=साबिर "घायल"
बुंदेला नगर
दातिया

अखिलेश शुक्ल की रचनाएँ

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दो कविताएँप्रश्‍न चिन्‍हकचरे के ढेर सेपन्‍नी बीनती हुई लड़कियाँ,कंधे परअपनी ऊँचाई सदृश्‍य,लटकाए हुए थैला।मैले-कुचैले फटे वस्‍त्र,बिखरे हुए बाल,रिसती हुई नाक,पीले-से दांत।अपने बेकार बाप,आलसी माँऔरआवारा भाईयों कापेट भरने के लिए,ढोती हैं गृहस्‍थी का बोझ।स्‍कूल जाने की उम्र में,पन्‍नी बीनते हुएलगाती हैं प्रश्‍न चिन्‍हसर्व शिक्षा अभियान पर।--------------डॉटवह छोटी-सी लड़कीबघारते हुए दाल।डालती हैटी.व्‍ही. में दिखाए गएसभी मसाले।फिर भीखाती है डॉट।पिता सेभाई सेमाँ सेबड़ी बहन से।क्‍योंकिवह पैदा हुई हैइसीलिए।------------लघुकथास्‍थापनावे नगर सेठ हैं, कई मिलों के मालिक, कारखाने चल रहे हैं, आढत है। उनका नगर में रूतबा है। स्‍थानीय संस्‍थाओं, पुलिस तथा प्रशासन में तूती बोलती है। किसी की भी क्‍या मजाल कि चूं चपड़ कर सके।उस रविवार स्‍थानीय समाचार पत्र में नगरपालिका का टेण्‍डर छपा था। उनके घर के सामने से बहने वाले अधूरे नाले के निर्माण कार्य पूर्ण करने की छोटी सी निविदा थी वह।वह निविदा स्‍वीकृत हुई, निर्माण कार्य की तैयारी भी प्रारंभ हुई। लेकिन नाले का निर्माण शुरू नहीं हो सका।वजह! सेठ जी ने नाले के किन…

मोहन सिंह रावत की रपट – पंत-शैलेश के बहाने साहित्यिक विमर्श

रपट-पंत-शैलेश के बहाने साहित्‍यिक विमर्शअपनी समग्रता में उत्त्‍ाराखण्‍ड को पहली बार महाकवि सुमित्रानंदन पंत और कथाशिल्‍पी शैलेश मटियानी की रचनाओं के द्वारा जाना गया। यहाँ की प्रकृति को पंत ने उजागर किया तो मटियानी ने यहाँ के आम आदमी को। मटियानी से पहले इस क्षेत्र को लोग एक खूबसूरत प्राकृतिक और आध्‍यात्‍मिक स्‍थान के रूप में जानते थे, जहाँ देवता निवास करते हैं। इस सुंदर ‘देवभूमि' के अंदर हाड.मांस के मामूली लोग भी रहते हैं, यह बात लोगों को मालूम नहीं थी। यह ठीक है कि पंत और मटियानी अलग-अलग विधाओं के लेखक हैं, मगर इन दोनों को एक साथ रखे बगैर इस क्षेत्र का पूरा बिंब सम्‍भव नहीं है। इस रूप में ये दोनों लेखक एक-दूसरे के पूरक हैं। इन्‍हीं बातों को ध्‍यान में रखते हुए पिछले दिनों (14 से 16 नवम्‍बर, 2008) महादेवी वर्मा सृजन पीठ, कुमाऊँ विश्‍वविद्यालय द्वारा संस्‍कृति विभाग, उत्त्‍ाराखण्‍ड शासन के सहयोग से पंत की जन्‍मस्‍थली कौसानी में ‘पंत-शैलेश स्‍मृति' शीर्षक से विमर्श और कविता-पाठ का एक वृहद्‌ कार्यक्रम आयोजित किया गया। हिन्‍दी आज एक ओर अपने अस्‍तित्‍व के अनेकमुखी संकटों से गुजर रही…

गणेश लाल मीणा का रिपोर्ताज : आदिवासी विद्रोह और साहित्य विषयक संगोष्ठी

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आदिवासी विद्रोह और साहित्‍य' विषयक संगोष्‍ठीउदयपुर। श्रम, समूह और सहकारिता पर आधारित आदिवासी जीवन का विघटन व्‍यक्‍तिगत संपत्‍ति के उदय से जुड़ा और तभी आदिवासी और गैर आदिवासी समाज में विभाजन भी हुआ। सुप्रसिद्ध मराठी साहित्‍यकार और अखिल भारतीय आदिवासी साहित्‍यकार समिति के राष्‍ट्रीय महासचिव वाहरू सोनवणे ने उक्‍त विचार ‘आदिवासी विद्रोह और साहित्‍य' विषयक संगोष्‍ठी में व्‍यक्‍त किए। मानगढ़ में आयोजित इस संगोष्‍ठी में हरिराम मीणा के उपन्‍यास ‘धूणी तपे तीर' पर चर्चा की गई। सोनवणे ने कहा कि मानगढ़ का नरसंहार भारतीय स्‍वतंत्रता आंदोलन का गौरव चिन्‍ह है लेकिन इसका इतिहास में न होना इस बात का परिचायक है कि इतिहासकार भी पूर्वाग्रह से मुक्‍त नहीं होते।साहित्‍य संस्‍कृति की विशिष्‍ट पत्रिका ‘बनास' द्वारा आयोजित इस संगोष्‍ठी में राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय, जयपुर के प्रो. रवि श्रीवास्‍तव ने ‘धूणी तपे तीर' को हिन्‍दी प्रदेश की संघर्षशील जनता की कर्मठता का दस्‍तावेज बताया। उन्‍होंने कहा कि आंचलिकता के विपरित नॉन रोमैंटिक मिजाज पूरे उपन्‍यास में आदिवासी समाज की प्रवंचनाओं के प्रति एक …

योगेन्द्र सिंह राठौर की कहानी : प्रतिबिम्ब

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वक्‍त किसी और के लिए ठहरा हो या न ठहरा हो, उसके लिए लगभग ठहर सा गया है। अब क्‍या बदल सकता है उसकी जिन्‍दगी में, जब तक कि वह अपने विचारों को न बदले । बडे भाई चाहते हैं कि ,वह घर पर रहे। उनके बच्‍चें को पढाएँ, स्‍कूल छोड़ने जाए, लेकर आए, कमरा तो उस पर है ही, खाना माँ दे देती है और क्‍या चाहिए खेती बाड़ी देखे और असाधारण बनने के चक्‍कर में न पड़कर आम आदमी की तरह सलीके से रहे तो वे कहीं ना कहीं उसका विवाह भी करा ही देंगे ।आज भी गणतंत्र दिवस पर वह भाषण दे रहा था। उस समय मंत्री जी ने उसके विचारों की प्रशंसा करनी चाही ,पर वह भाषण देकर सीधा मंच से उतरा और अपने दोस्‍तों में चला गया । वह जानता है कि मंत्री जी कलेक्‍टर से उसका नाम, उसकी शैक्षणिक योग्‍यताएँ पूछेंगे तथा कलेक्‍टर प्रिसिंपल ,विभागाध्‍यक्ष, समवेत स्‍वर में उसकी प्रशंसा करेंगें । मंत्री जी उसका नाम नोट करेंगें,आश्‍वासन देंगे और सर्किट हाउस में जाकर एक नए अध्‍याय का आरम्‍भ करेंगें । इसलिए इन आश्‍वासानों को अब वह नहीं ,उसके प्रिसिंपल, उसके पिता, उसके स्‍टूडेन्‍टस्‌ सुनते रहते हैं । वह दोस्‍तों से मिलने को कह अपनी बहन के घर चला गया जहाँ व…

नरेन्द्र निर्मल की कुछ कविताएँ

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कविताएँनरेन्द्र निर्मलगीत दोस्‍तों के लिए1.हर दिन एक दिनबनेंगे दोस्‍त, नए वो लोगकुछ होंगे पल के लिएकुछ याद आएंगे रोजहर दिन एक दिन.....2यादों का ऐसा सफर होगाअपना ये सारा शहर होगायादों का ऐसा....2बालिग सब होंगे उमर यहांझूम के नाचे हर कमर यहांन होंगे दिन न होगी रातअब तो होगा हर रोज मुलाकातहर दिन एक दिन...............आएंगे रोजकुछ खट्‌टी कुछ मीठीसारी यादें रस भरीपल में रूठना, पल में मनानाहोगी रंगत मस्‍ती भरीहोंगे सपने पूरे जो अपनेबनेगा अपना एक कारवांहर दिन एक दिनबनेंगे दोस्‍त, नए वो लोगकुछ होंगे पल के लिएकुछ याद आएंगे रोज'मेरी'' कल्‍पना और मेरा प्‍यार'' 'लिखूं एक ख्‍वाब कलम से,जिसमें एक पतंग आएगी।जिसे उड़ाएगा कोई औरपर कटकर मेरी ही पास आएगी।उड़ेगी चाहे कितनी भी,बदन लहरा-लहरा करपर अंत में उसे,हमारी ही याद आएगी॥चाँद सा शीतल मन होगा,दूध्‍ सा निर्मल तन होगा।रूप रंग का हर कण होगा,जिस कण में मेरी ही खुशबू आएगी॥आँखों में नशे का काजल,ज़ुल्फ़ों में घन-घोर सा बादल।पैरों में पायल की छम-छम,कानों में कुण्‍डल का झन-झन॥जिसमें एक शोर सी आएगी,जिसे सुन बादल इस ओर ही आएगी।पंक्षियाँ भी …

नव वर्ष की कविताएँ

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बाल कवितानव वर्षकृष्‍ण कुमार यादवनव वर्ष की बेला आईखुशियों की सौगातें लाईनया कर गुजरने का मौकासद्‌भावों की नौका लाई नया वर्ष है, नया तराना झूमो-नाचो, गाओ गानाइस वर्ष संकल्‍प है अपनानहीं किसी को है सतानाबदला साल, कैलेण्‍डर बदलाबदला है इस तरह जमानाभेजो सबको स्‍नेह निमंत्रणगाओ नव वर्ष का तराना।------कृष्‍ण कुमार यादवभारतीय डाक सेवा वरिष्‍ठ डाक अधीक्षककानपुर मण्‍डल, कानपुर-208001kkyadav.y@rediffmail.com==============================चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हमनवल किशोर कुमारक्षुधाग्‍नि के लपटों में जल जायें हम,चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हम।दिन बीते या बीत जाये पूरा साल,हम निरीहों का हरदम रहता हाल बेहाल,भले दिवास्‍वप्‍न देखा करें हम महलों का,हमारी लाश पर बनता महल अमीरों का।बेजान कंधों पर असंख्‍य जिम्‍मेवारियां उठायें हम,चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हम।किसने लूटा किसने छीना हमारा कौर,अमीरों की दुनिया में कहां बचा हमारा ठौर,हम मरते हैं भूख से तो मरते रहें,उनका काम है लूठना जी भर हमें लूटते रहें।लूटपाट के दौर में सर्वस्‍व खोने का जश्‍न मनायें हम,चलो गरीबों नव वर्ष पर्व मनायें हम।मे…

नन्दलाल भारती की तीन कविताएँ

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नन्‍दलाल भारती1-श्रमवीर ॥अपनी ही जहां में घाव डंस रही पुरानीशोषित संग दुत्‍कार भरपूर हुई मनमानीलपटों की नही रूकी है शैतानीशोषित भी खूंटा गाड़. खड़ा हो जायेगा । ढह जायगी दीवारें रूक जायेगी मनमानीतिलतिल जलता जैसे तवा पर पानीअंगारों मे जलता,कंचन हो गया है राखहाड़. फोड़. नित नित पेट की बुझाता आगरोटी और जरूरतें नहीं वह चाहे सम्‍मानजीवन में झरता पतझर निरन्‍तर उसकेबूढे अम्‍बर को ताकता कहता बश्‍खो पानीमेरे अंगना अब कब बसन्‍त आएगा ।शोषित जग को गति देतावंचित की गति को विषमतावादी करता बाधितखेत खलिहान या कोई हो निर्माण का कामपसीने के गारे पर थमता शोषित केद्वार दहाड़ता मातमी गीत हरदमभूख,अशिक्षा,भेदभाव की बीमारी बेरोजगारी और भूमिहीनता ढकेलती रहती दलदल में सदामुसीबतों का बोझ ढोता,तथाकथित श्रेष्‍ठ समाज को खुशी देताना चिन्‍ता उसकी ना कोई सुधि है लेताश्रेष्‍ठता का दम भरने वालों हाथ बढाओशोषित की चौखट सावन आ जायेगा ।ऋतुओं की तकदीर संवारता,खुद जीता वीरानों मेंदिल पर वंचित के घाव होता नित हरानई घाव से नहीं घबराताक्‍योंकि चट्‌टान उसके सीने को कहते हैंथाम लिया समता की मशाल डंटकर तो शोषक घबरा जायेगा ।शोषित दल…

उमेश गुप्ता का व्यंग्य : बिचौलिये

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बिचौलिये जिन्‍हें हिन्‍दी में मध्‍यस्‍थ , उर्दू में दलाल, अंगे्रजी में आरबिटे्रटर कहते हैं, बहुत काम के आदमी रहते हैं जो काम इस दुनिया में हम स्‍वयं नहीं कर सकते हैं, उन्हें यह बड़ी आसानी से कर देते हैं जिस काम के बीच में बिचौलिये आ जाते हैं, उसके निपटने में ज्‍यादा समय नहीं लगता है। इनके शब्‍दकोष में नेपोलियन और नेताओं की तरह ‘असंभव‘ शब्‍द नहीं होता है, इनके लिए सभी काम संभव है। ये कहीं ना कहीं से काई तिकड़म भिड़ाकर लोगों का काम कर देते है।बिचौलिये के पास हकीम लुकमान की तरह हर ला - इलाज मर्ज का इलाज रहता है, ये आपको सात समुन्‍दर पार खाड़ी के देशों में नौकरी दिलवा सकते हैं, घर बैठे बी.ए. पास करवा सकते हैं, मैट्रिक की जाली अंक सूची लाकर कालेज में प्रवेश दिलवा सकते हैं, किसी भ्रष्‍टाचारी से मिलकर आपके नालायक इंटर फेल आवारा बेटे की अच्‍छी सरकारी नौकरी लगवा सकते हैं, बिचौलिये इस पृथ्‍वी पर हर वह काम कर सकते हैं, जिसके लिए भगवान को विभिन्‍न रूपों में इस संसार में बार-बार अवतार लेना पड़ता था।बिचौलियों के लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं रहता है। ये आपके पुत्र पुत्रियों की शादी से लेकर उनके सुक…

पुरु मालव की ग़ज़ल - मुश्‍किलें आती रही हादिसे बढते गए

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मुश्‍किलें आती रही हादिसे बढते गएमंजि़लों की राह में क़ाफि़ले बढ़ते गएदरमियां थी दूरियां दिल मगर नज़दीक़ थेपास ज्‍यूं-ज्‍यूं आए हम फ़ासले बढ़ते गएरहरवों का होंसला टूटता देखा नहींग़रचे दौराने-सफ़र हादिसे बढ़ते गएसाथ रहकर भर बहम हो न पाई ग़ुफ़तग़ूख़ामोशी के दम ब दम सिलसिले बढ़ते गएहम थे मंजि़ल के क़रीब और सफ़र आसान थायक ब यक तूफ़ां उठा वस्‍वसे बढ़ते गएकि़स्‍सा-ए-ग़म से मेरे कुछ न आंच आई कभीमेरे दुःख और उनके पुरु क़हक़हे बढ़ते गए․․․․․․․․․․․․पुरु मालवमूल नाम-पुरुषोत्‍तम प्रसाद ढोडरियाशिक्षा-एम,बीएड.,सम्‍प्रति-शिक्षा विभाग राजस्‍थान में कार्यरतपता-ग्राम व पोस्‍ट- दीगोद खालसातहछीपाबडौद, जिला- बारां पिन-325221 ;राजस्‍थान;मोबाईल-9928426490purumalav@ gmail.com

नरेन्द्र निर्मल की कविता : कलम की धार में जंग

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मुझे उन रास्तों पर चलना नहीं आता,जिस पर सच की चादर न चढ़ी हों।सिर्फ झूठ का ओला पसरा हो।मुझे झूठ बोलना भी नहीं आता,जब बोलता हूँ, पकड़ा मैं जाता।वो रास्ता था कलम की,तलवार चलाने वाला पत्रकार का।जो रास्ता दिखाता उन,दबे-कुचले लोगों के लिए।जिनका कानून पर पूरा अधिकार था।जिस कानून को चंद निजी हाथों में,बेच दिया था, कुछ लाभ के लिए।हमने सोचा क्यों न उन हाथों से छीनलाऊं, उन मज़लूमों के लिए।सहारा था तो बस मेरे उस यार का,जिसका नाम सत्यवादी हरिश्चंद्र अखबार थापर जब आया तो पता चला,मेरे यार की रंगत ही बदल गई है।इसकी भी डोर कानून की तरह,निजी हाथों में चल गई है।------नरेन्द्र निर्मलशकरपुर, दिल्ली9868033851, ई.मेल- nirmalkumar2k5@gmail.com--चित्र – कलाकृति - साभार, बनवासी सम्मेलन, भोपाल

नरेन्द्र निर्मल का आलेख : मीडिया बनाम मीडिया पर टीआरपी का हमला

मीडिया एक ऐसा माध्यम है जिसके भूत, वर्तमान और भविष्य की चर्चा करे तो इसे दुनिया का सबसे सफल, साहसिक और कर्तव्यपरक क्षेत्र कहा जा सकता है। क्योंकि इस क्षेत्र में काम करने वाला एक प्रहरी के समान है, जो समाज में व्याप्त तमाम सामाजिक समस्या, कुरीतियां एवं व्यवस्था में घर कर चुकी भ्रष्टाचार को जनता और सरकार के सामने लाती है। साथ ही सरकार द्वारा इसे हल न किए जाने पर इसके लिए जवाब तलब भी करना होता है। जिसे वह लिखित, दृश्य-श्रव्य अथवा श्रव्य माध्यम द्वारा जनता के आगे लाती है। कालान्तर से यह परम्परा चली आ रही हैं। भारत में खासतौर पर इसकी महत्ता आजादी से पूर्व रही। आजादी से पूर्व मीडिया अर्थात पत्रकारिता का उद्देश्य केवल मात्र परतंत्र भारत को स्वतंत्र बनाना था। जिसका प्रयत्न करते हुए पत्रकारों द्वारा लिखित माध्यम से लोगों को संगठित किया जाता था। शिथिल पड़ते स्वतंत्रता सेनानियों के मन में जोश भरा जाता था। अंग्रेजों द्वारा फूट डालों और राज करों जैसी मंसूबों को आईने के रूप में जनता के बीच लाकर वास्तविकता का बोध कराया जाता था, जिससे की साम्प्रदायिक उन्माद पर अंकुश लगाया जा सके। जिसके कारण कई बार पत्…

नरेन्द्र निर्मल का आलेख : उग्रवाद हथियार से नहीं, बदलाव से खत्म किया जा सकता है

आतंकवाद दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है, जिससे अबतक कोई भी देश अछूता नहीं रहा है। फिर चाहे शक्तिशाली अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेंटर का गिराना हो या भारतीय संसद में हुआ हमला। हर देश हर प्रांत आज इसकी चपेट में है। आतंकवाद का शिकार आज हर इंसान है। फिर चाहे इसे शह देने वाला पाकिस्तान ही क्यों न हो। आखिरकार बेनजीर भुट्टों जैसी शख्सियत जो पूर्व प्रधानमंत्री रहने के साथ-साथ पाकिस्तान में बीते चुनाव की प्रधानमंत्री की प्रमुख दावेदार थी, इसकी शिकार बनी।भारत आतंकवाद से कई सालों से इस आग में झुलस रहा है। प्रतिवर्ष आतंकवाद के इशारों पर आतंकियों द्वारा भारत में छिपे कुछ गद्दारों से मिलकर अक्सर देश के विभिन्न प्रांतों में हमला करते रहते हैं। खासकर वे हमले ऐसे मौके पर करते हैं जिससे हमारे धर्मनिर्पेक्ष तानेबाने को तोड़ा जा सके। फिर चाहे राजस्थान, गुजरात का संकट मोचन मंदिर पर हमला करना हो या अजमेर शरीफ और हैदराबाद की मस्जिद पर बम विस्फोट। दरअसल आतंकवाद का उद्देश्य केवल मात्र दो धर्मों के बीच बने हुए प्रेम और भाईचारे को समाप्त करना होता है। उनका ना तो मजहब होता है ना ही कोई धर्म। वे इस जद्दोजहद में हर बार…

नरेन्द्र निर्मल की कहानी : तारे जमीन पर का बेचारा पप्पू

कहानीतारे जमीन पर का बेचारा पप्पू- नरेन्द्र निर्मलबचपन से ही शर्मीला किस्म का इंसान। लड़कियां तो दूर लड़कियों के शब्द से भी सिरहन सी होने लगती। दोस्त कई सारे हुए मगर सभी समान लिंग वाले। इसका कदापि मतलब नहीं की उसमें ‘दोस्ताना’ वाले लक्षण शामिल थे, बल्कि वह अभी नाबालिग था। दसवीं तक यहीं दौर चला। पढ़ाई में भी कुछ खास न था। अव्वल आता परन्तु पीछे की तालिका से। घरवाले भी काफी परेशान रहते। खेल खेलना भी पसंद नहीं करता। अगर मन में कभी खेल भावना हिचकोले भी मारती तो घरवाले ताना देते। हर वक्त खेल, इसलिए तो पढ़ाई में अव्वल आते हो वह भी पीछे की दिशा से। तुम्हारा तो अब भगवान ही मालिक है। ताने सुनता रहा तुलना औरों से होती रही। देखो उस समीर को फर्स्ट लाया है अपने बाप का नाम रौशन किया है। दर्द असहनीय होता गया। मन में क्षोभ जन्म लेने लगे। बेचारा था... पप्पू ही रहा। दसवीं के परिणाम ने एक बार फिर से निराशा के अंधेरे में ढकेल दिया। लेकिन घर में एक मां थी जिसने हर वक्त पुचकारा, गलतियों पर पर्दा डालती रही। जानती थी, वह भी उसकी कोख से जन्मा उसके कलेजे का टुकड़ा रहा। उस बेचारे की तरफदारी में कभी-कभार आक्षेप के दंश…

देवी नागरानी की कहानी : क्षितिज के उस पार

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क्षितिजकेउसपारहाँ वो शिला ही थी!! कैसे भूल कर सकती थी मैं पहचान ने में उसे, जिसे बरसों देखा, साथ गुजारा, पल पल उसके बारे में सोचा. शिला थी ही ऐसी, जैसे किसी शिल्पकार की तराशी हुई एक सजीव आत्मा जो तन को ओढ़कर इस सँसार की सैर को निकली हो. जिस राह से वो गुजरती, गुजरने वाले थम जाते थे, जैसे जम से जाते थे. उनकी आँखे पत्थरा जाती, जैसे किसी नूर को सामने पाया हो. हाँ वही हूर शिला मेरी प्रिय सहेली आज मेरे सामने से गुजर रही है, खुद से होकर बेखबर.बारह वर्ष कोई इतना लंबा अरसा तो नहीं होता, जहाँ इन्सान इस कदर बदल जाये, न फ़कत रँग रूप में, पर जिसके पूरे अस्तित्व की काया पलट हो जाए. वो कालेज के जमाने भी खूब हुआ करते थे, जब मैं और शिला साथ साथ रहा करते थे, एक कमरे में, एक ही क्लास में और लगभग पूरा वक्त साथ खाना, साथ पढ़ना, साथ समय बिताना. क्या ओढ़ना, क्या बिछाना ऐसी हर सोच से परे, आजाद पँछियों की तरह चहकते हुए, हर पल का लुत्फ लेते हुए, हर साल कालेज में टाप करते हुए अब हम दोनों फाइनल साल में पहुँचीं. चार साल का अरसा कोई कम तो नहीं होता, किसी को जानने के लिये, पहचानने के लिये."अरे शिला!" मैंन…

अखिलेश शुक्ल की 3 लघुकथाएँ

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जरूरत”चलो पीछे करों भाई इन सबको, दरवाजे पर भीड़ क्‍यों इकट्ठा कर रखी है।“ मरीजों को देखते हुए डॉ. प्रशांत ने अपने कम्‍पाउंडर से कहा। उसने डॉ. का इशारा पाते ही मरीजों को सरकारी डिस्‍पेंसरी के दरवाजे से बाहर धकेल दिया। उनमें से एक मरीज को डॉ. प्रशांत के पास लाते हुए वह बोला, ”सर, इसका इलाज तत्‍काल करना पड़ेगा। यह बहुत ही सीरियस है। यदि कहीं यह इलाज के बिना मर गया तो गांव की राजनीति को एक नया मुद्‌दा मिल जायेगा साथ ही आपकी बड़ी फजीहत होगी। अतः इसे जरूर देख लें।“ ”ठीक है, बुलाओ उसे। मैं देख लेता हूँ।“ कम्‍पाउंडर ने मरीज को डिस्‍पेंसरी के अंदर ठेल दिया। ”क्‍या नाम है तुम्‍हारा?“”जी रामू , रामू बल्‍द घिस्‍सू।“ ”हूं , क्‍या तकलीफ है ?“”डागदर साब, कब्‍ज बनी रहवे है।“ ”अच्‍छा, कल शाम को क्‍या खाया था?“”जी , कुछ नहीं।“ ”कल सुबह?“ ”जी कुछ नहीं।“ ”परसों दोनो टाईम?“”जी कुछ नहीं।“डॉ. प्रशांत ने गर्मी और भारी उमस में पसीना पौछते हुए कहा, ”क्‍या करते हो?“”जी कुछ नहीं।“डॉ. ने आश्‍चर्य से प्रतिप्रश्‍न किया, ”गुजारा कैसे होता है?“ ”साब, बहुत गरीब आदमी हूँ। जब से फसल कटाई के लिए मशीनें आई हैं, भूखे मरने …

नरेन्द्र निर्मल की कविताएं – साहित्यकारों में राजनीति एक गंभीर समस्या व अन्य

साहित्यकारों में राजनीति एक गंभीर समस्या    
राजनीतिज्ञों की राजनीति देखी
धर्म, सम्प्रदाय में राजनीति दिखी
जाति, भाषा से बंटे लोग देखे
देखा भाई-भतीजावाद का हर वो चेहरा
पर साहित्यकारों में भी राजनीति होगी
इसकी कभी परिकल्पना नहीं कि थी मैंने
सब दिखा हंस और पाखी के प्रतिवाद में
उस पु्रस्कार से
जिसे समृद्ध ज्ञानत्व वाले लोगो को दिया जाता है
आलोचक रचनाकारों के तेवरों ने भी
दिखाया राजनीति का चेहरा
दिखाया कैसे एक साहित्यकार
साहित्य के क्षेत्र में एक छत्र
राज करने को लालायित रहता है
अपनी ही पत्रिका और लेखनी को
सर्वोच्च ठहराने की जुगत करता है
इस क्रम में एक-दूसरे पर आक्षेप
करने से भी नहीं चूकता
आदतें उन तमाम राजनीतिज्ञों की तरह
जो अपने ही दल को देश का प्रहरी मानता है
और दूसरे को देश का दुश्मन
उन धर्मनिर्पेक्ष और साम्प्रदायिक ठेकेदारों की तरह
जिन्हें न तो देश से लगाव है न ही देशवासियों से
ज्ञान बांटने वाले ये लोग
अज्ञानता की राजनीति से गुजरते देखे जायेंगे
नवीन कवियों और लेखको के लिए
यह बेह…

महेन्द्र भटनागर का कविता पाठ

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महेन्द्र भटनागर की कविताएँ व कविता संग्रह रचनाकार पर पूर्व प्रकाशित हो चुके हैं. प्रस्तुत है उनका सस्वर कविता पाठ. नीचे दिए गए डाउनलोड लिंक पर दायाँ क्लिक कर एमपी3 फ़ाइल डाउनलोड करें या फिर वहीं बाजू में दिए छोटे से प्लेयर बटन को क्लिक कर ऑनलाइन सुनें.महेन्द्र भटनागर का सस्वर कविता पाठ यहाँ से डाउनलोड कर सुनें

नन्‍दलाल भारती की कविता

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एक बरस और․․․․․․․कवितानन्‍दलाल भारतीमां की गोद पिता के कंधों गांव की माटी और टेढ़ीमेढ़ी पगडण्‍डी से होकरउतर पड़ा कर्मभूमि में सपनों की बारात लेकर ।जीवन जंग के रिसते घाव है सबूतभावनाओं पर वार घाव मिल रहे बहुतसम्‍भावनाओं के रथ पर दर्द से कराहता भर रहा उड़ान ।उम्‍मीदों को मिली ढाठी बिखरे सपनेलेकिन सम्‍भावनाओं में जीवित है पहचाननये जख्‍म से दिल बहलाता पुराने के रिस रहे निशान ।जातिवाद धर्मवाद उन्‍माद की धार,विनाश की लकीर खींच रही हैलकीरों पर चलना कठिन हो गया हैउखड़ेपाँव बंटवारे की लकीरों पर,सद्‌भावना की तस्‍वीर बना रहा हूं ।लकीरों के आक्रोश में जिन्‍दगियां हुई तबाह कईयों का आज उजड़. गया कल बर्बाद हो गयाना भभके ज्‍वाला ना बहें आंसूसम्‍भावना में सद्‌भावना के शब्‍द बो रहा हूं ।अभिशापित बंटवारे का दर्द पी रहा जातिवाद धर्मवाद की धधकती लू मेंबित रहा जीवन का दिन हर नये साल पर ,एक साल का और बूढा हो जाता हूंअंधियारे में सम्‍भावना का दीप जलायेबो रहा हूं सद्‌भावना के बीज ।सम्‍भावना है दर्द की खाद और आंसू से सींचे बीजविराट वृक्ष बनेंगे एक दिनपक्‍की सम्‍भावना है वृक्षों पर लगेंगेसमानता सदाचार सामन्‍जस्‍…

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