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महेंद्र भटनागर का कविता संग्रह : आहत युग

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आहत युग

-महेंद्र भटनागर (इस कविता संग्रह का ई-बुक यहाँ से डाउनलोड करें)
*
(१) संग्राम; और
जिस स्वप्न को
साकार करने के लिए-
सम्पूर्ण पीढ़ी ने किया
संघर्ष
अनवरत संघर्ष,
सर्वस्व जीवन-त्याग;
वह
हुआ आगत !
*
कर गया अंकित
हर अधर पर हर्ष,
चमके शिखर-उत्कर्ष !
प्रोज्ज्वल हुई
हर व्यक्ति के अंतःकरण में
आग,
अभिनव स्फूर्ति भरती आग !
संज्ञा-शून्य आहत देश
नूतन चेतना से भर
हुआ जाग्रत,
सघन नैराश्य-तिमिराच्छन्न कलुषित वेश
बदला दिशाओं ने,
हुआ गतिमान जन-जन
स्पन्दन-युक्त कण-कण !
*
आततायी निर्दयी
साम्राज्यवादी शक्ति को
लाचार करने के लिए-
नव-विश्वास से ज्योतित
उतारा था समय-पट पर
जिस स्वप्न का आकार
वह,
हाँ, वह हुआ साकार*!
*
लेकिन तभी....
अप्रत्याशित-अचानक
तीव्रगामी / धड़धड़ाते / सर्वग्राही,
स्वार्थ-लिप्सा से भरे
भूकम्प ने
कर दिए खंडित-
श्रम-विनिर्मित
गगन-चुम्बी भवन,
युग-युग सताये आदमी के
शान्ति के, सुख के सपन !
*
इसलिए; फिर
दृढ़ संकल्प करना है,
वचन को पूर्ण करना है,
विकृत और धुँधले स्वप्न में
नव रंग भरना है,
कमर कस…

तरूण शर्मा की ग़ज़ल : सुबह का ख्वाब दिखा गया कोई...

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ग़ज़ल
-तरूण शर्मामेरी मजार पे एक चिराग जला गया कोई
बुझती उम्मीदों को एक आस दिखा गया कोई

आज की रात बहुत बेचैन है कटती ही नही
सुबह का एक ख्वाब इसे दिखा गया कोई

एक तेरे दर्द के बीमार थे हम, मर भी गए
उसकी दवा सारे शहर को पिला गया कोई

अपना चेहरा पहचानता तो था मैं लेकिन
एक आईना कल रात मुझे दिखा गया कोई

मैं एक कागज़ को लिए सोचता ही रहा तुझको
तेरी एक तस्वीर फलक पे बना गया कोई
----संपर्क:
-तरुण शर्मा
फ़ोस्टर सिटी, सीए, यूएसए

विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में भारत भवन लन्दन द्वारा हिन्दी विद्वानों का सम्मान

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यह सभी उपस्थित जनों के लिये एक विशेष अनुभव रहा होगा क्यों कि भारतीय उच्चायोग लंदन, यू.के. में कार्यरत हिन्दी विद्वानों का सम्मान कर रहा था। यह अपने आप में एक अनूठा कदम है। इन सम्मानों की घोषणा विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में की गई थी जो कि 10 जनवरी को विश्व भर में मनाया जाता है। इन सम्मानों की शुऱूआत वर्ष 2006 से की गई थी। इस योजना के अंतर्गत मानपत्र एवं शॉल पहनाने का काम मंत्री-समन्वय श्री रजत बागची ने स्वयं किया।हिन्दी के जाने माने कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा को इस कार्यक्रम में डा. हरिवंश राय बच्चन सम्मान प्रदान किया गया। पिछले वर्ष तेजेन्द्र शर्मा का कहानी संकलन बेघर आंखे, कविता संग्रह ये घर तुम्हारा है एवं अंग्रेज़ी की पुस्तक ब्लैक एण्ड व्हाइट का प्रकाशन हुआ था। इस के साथ साथ तेजेन्द्र शर्मा के तीन अनुवादित संकलन उर्दू, नेपाली एवं पंजाबी भाषाओं में प्रकाशित हुए। उन्हें भारत में संकल्प सम्मान एवं तितली पत्रिका सम्मानों से भी नवाज़ा गया। तेजेन्द्र शर्मा कथा यू.के. एवं फ़िल संस्था के महासचिव भी हैं। इसी कार्यक्रम में हि‍न्‍दी के शि‍क्षक श्री वेद मि‍त्र मोहला को जॉन गि‍लक्रि‍स्‍ट …

विद्या देवदास नायर की कविता : आखिरी झलक

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कविताआखिरी झलक-विद्या देवदास नायरपहले मैं भी सोचा करता था,जब कोई अपना हमसे दूर चला जाता,तो किसी से ये दर्द क्यों नहीं सहा जाता?
इस सवाल का जवाब आज मुझे मेरे नसीब ने दे दी,क्यों कि आज मेरे जीवन की सबसे अजीज की मौत हो गई,
आज एक सूने मरघट पर सब के होते हुए भी, तन्हा हूँ मैं खड़ा,सामने मेरा प्यार गहरी नींद सो रहा है , काट के टुकड़ों में पड़ा।
तुम्हें देख कर मैं आज बिलकुल चुप हो गया हूँ,आज के बाद जिन्दगी में शायद ही किसी से खुल कर मैं अब बोल पाऊँ,याद कर रहा हूँ मैं, उस हसीन पल को,जब पहली बार मैंने देखा था तुमको,
प्यार भरी नजरों का वह इशारा,उस पहले प्यार की पहली झलक,तुम ही तो लाई थी मेरी जिन्दगी में रौनक,
उस वक्त भी मैं चुप था,मगर तब मैं तुम्हारी खूबसूरती से मुग्ध था,
पर आज मेरी खामोशी का कारण कुछ और है,क्यों कि, आज तूने छोडा मेरा दामन है,
पानी से भरे मटके के साथ ले रहा हूँ मैं तुम्हारे फेरे,याद आ रहें हैं मुझे जब हमने ली थी अग्नि के समक्ष वो सात फेरे,
ली थी हमने सात जन्मों तक संग रहने की कसम,लेकिन आज तुम्हारे बिन बहक रहें हैं मेरे कदम,
फेरे के बाद अब मैंने मटकी तोड़ दी,मगर उस दिल का क्या जो आज टुकड…

अनिल पाण्डेय का आलेख : आंसू की सार्थकता

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आलेखआंसू की सार्थकता-अनिल पाण्डेयआंसू जो कभी कभार बहा करते हैं। बेवजह और अनायास। तब जब हम किसी को विदा करते हैं या किसी के घर से विदा होते हैं। अथवा कोई अचानक आ जाता है और हम दौड़ पड़ते हैं इस आंसू को लेकर। उनका स्वागत करने के लिए, अगवानी करने के लिए। ये तो हुए प्रेम की आंसू जिसके कोई न कोई वारिस होते हैं। यह अनाथ नहीं होती, दूसरों की उसमें कम से कम कुछ न कुछ अभिव्यक्ति होती ही है। जो चूकर गिरने से पहले ही थाम ली जाती है। पर क्या हम इस आंसू को वास्तविक आंसू कह सकते हैं? यह कैसी आंसू है जो कभी कभार बहा करती है और दूसरों की दिलासायें पाकर अपने आपको तिलान्जित कर लेती है?
आंसू तो शायद वो होते हैं जो अनवरत बहा करते हैं ,जो लावारिस होते हैं । जिसमें दूसरों की अभिव्यक्ति होती है तो शोषण के लिए। दिलासायें होती हैं तो विकास को विनाश में परिवर्तित करने के लिए जिसमें यदि स्वार्थता होती है तो दो रोटी के लिए और यदि निस्वार्थता होती है तो अपने आपको समर्पण करने के लिए। इसके सिवाय वो कर ही क्या सकते हैं? ना तो विद्रोह और ना ही तो विरोध। पर यदि विद्रोह और विरोध करें भी तो किस आधार पर सब कुछ राजनीतिकों क…

मेराज अहमद की कहानी : सही

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कहानीसही- मेराज अहमदगाँव के लोग काहिल होते हैं।‘‘ बेटे की मां ने उसके पेपर में आये सवाल को दुहराते हुए कहा, ’’बताओ सही कि गलत?‘‘बेटे को जवाब मालूम था इसलिए वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया। मुझे लगा कि वह अभी कहेगा गलत। मगर उसने जवाब नहीं दिया। वह मुस्कुराये ही जा रहा था। न जाने क्यों लगा कि वह मेरा मजाक उड़ा रहा है। हालांकि इसके लिए अभी उसकी उम्र नहीं हुई थी, फिर भी मुझे गुस्सा आने लगा। मैं सुबह ही गाँव से लौटा था। वैसे तो ट्रेन का सही समय दो बजे के आस-पास का था, मगर ट्रेन लेट हो गयी। यदि ट्रेन सही समय पर आयी होती तो मैं नींद पूरी करके ताजादम हो जाता और सुबह आठ बजे तक उठने के बाद काम पर आसानी से पहुँच जाता। सोना इसलिए जरूरी था कि काम ही कुछ ऐसा था कि दिनभर की भागदौड़ थी इस साइट से उस साइट भागना पड़ता था। कम्पनी में पैसे तो इतने अच्छे मिलते थे कि हर कोई इस कम्पनी में आना चाहता है, मगर ड्यूटी? बाप रे! ऊपर से सख्ती से वक्त की पाबन्दी! थके और कमजोर आदमी के लिए तो काम करना लगभग नामुमकिन-सा था।आकर बिस्तर पर लेटने के बाद जैसे ही नींद आनी शुरू हुई बीवी ने खटर-पटर शुरू कर दी। बेटे की परीक्षाएँ चल…

सीमा सचदेव की कहानी : मुखौटा

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कहानीमुखौटा-सीमा सचदेवमेट्रिक पास , उम्र लगभग सोलह साल ,बातों में इतनी कुशल कि बड़े-बड़ों मात दे जाए , साँवला रंग , दरमियान कद , दुबली-पतली,तेज़ आँखें , चुस्त - दुरुस्त, व्यक्तित्व ऐसा कि क्या डॉक्टर, क्या इन्जीनियर , क्या करोड़पति महिलाएं उसके इशारे पर नाचने को मजबूर हो जाती है | बड़ी ही चालाकी से वह दूसरों के बाल काट देती है , केवल बाल ही नहीं काटती मुँह पर थपेड़े भी मारती है और किसी को बुरा भी नहीं लगता बल्कि इसके लिए मिलती है उसको अच्छी खासी मोटी रकम भी |(जो वह किसी और के लिए होती है) कोई खुशी से देती है तो कोई मजबूरी में लेकिन देती सब है,जिसको वह अपनी उंगलियों पे नचाती है | जिस तेज़ी के साथ चेहरे पर उसके हाथ चलते है उसी आत्म-विश्वास के साथ चलती है बालों में कैंची | कभी वह अपनी गोदी में पैर रख कर बिना किसी भेद-भाव और नफरत के करती है दूसरों के पैरो और नाख़ुनों की सफाई और कभी उतनी ही ईमानदारी से करती है मालिश और साथ - साथ में चलती रहती है उसकी मीठी जुबान भी | अपने हाथों और जुबान में तालमेल बैठाना वह बखूबी जानती है | जी हाँ ! मैं जानती हूँ एक ऐसी लड़की को जो एक लेडिज़ ब्यूटी पार्लर में …

प्रेम कुमार की कहानी : तिब्बत बाजार

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कहानीतिब्बत बाजार-प्रेम कुमारफुब्बू,तुम्हारे अलीगढ़ से जाने के बाद भी एक पत्र लिखा था। उसका क्या हुआ, मालूम नहीं। जब तुम्हारा ठौर-ठिकाना ही नहीं मालूम तो पता तो कुछ इसका भी नहीं है, पर फिर भी लिख रहा हूँ। देखो तो बीस वर्ष बीत चले हैं बिना तुम्हें देखे। पर तुम्हारे साथ के हिस्से में का न कुछ रीता हुआ है, न धुँधला। तुम्हारे देश की बात पर या तुम्हारे हम वतनों को देखते ही हमेशा तुम जैसे शरीर मेरे सामने आ खड़ी होती हो-उन खूबसूरत आँखों में न अट पा री अपनी सागर जितनी उस व्यथा के साथ। मन के अंदर की आग से दीपते-दमकते अपने उस खूबसूरत चेहरे के साथ। समझ नहीं आता कि इतनी अधिक उम्र और ताकत कहाँ से पाती रहती हैं ये यादें ! कभी आग, कभी पानी तो कभी तूफान बनकर अचानक आ धमकने का जादू इन्हें कौन सिखा जाता है फुब्बू? उम्र के असर से बेअसर ये यादें क्या अधिक पुरानी और ज्यादा तीखी, धारदार हो जाती हैं? किसी उम्मीद, इंतजार या भुला सकने के लिहाज से बीस वर्षों जितनी लम्बाई कुछ कम तो नहीं होती न ? इतने इन वर्षों में कितना कुछ नहीं हो गुजरा है इस देश और दुनिया में। बदलावों की ऐसी आँधियाँ आईं कि आदमी तो आदमी देशों त…

दिव्य प्रकाश दुबे का सस्वर, जीवंत कविता पाठ : आज अचानक फिर से वो टकरा गए

हम सभी कभी न कभी डायरी लिखते हैं या कोशिश करते हैं कुछ यादों को ,कुछ पन्नों में समेटने की ये कविता उसी कोशिश का एक हिस्सा भर है(कविता का सस्वर पाठ देखने-सुनने के लिए प्ले बटन पर क्लिक करें)आज अचानक फिर से वो टकरा गए...-दिव्य प्रकाश दुबेआज अचानक फिर से वो डायरी में यूँ टकरा गये
हो पहली-पहली बार सब कुछ ऐसा किस्सा सुना गये
कोशिश तो की मैंने मगर पन्ना नहीं पलटा गया
ली वक्त ने करवट मगर हमसे नहीं पलटा गया
धुँधले हुये शब्दों ने फिर एक साफ मूरत जोड़ ली
सूखे हुये गुलाब ने एक पल में खुशबू मोड़ ली
लिखे हुये वादे सभी एक पल में जैसे खिल गये
छूटे हुये अरमान सब ख्वाबों से आके मिल गये
सब छोड़ के तुम पास थे
बाहों के अब विश्वास थे
आँखों ने फिर से सींच के तुमसे कही बातें वही
तुमने भी शरमा के फिर धीरे से है हामी भरी
अब वक्त जैसे है नहीं और बस तुम्हारा साथ है
अब स्वर्ग को जाना नहीं जो हाथ तेरा साथ है
फिर हाथ तेरा थामकर
खिड़की से बाहर झाँककर
हमने नयी दुनिया गढ़ी
जिसमें न कोई अंत था
पल-पल में जब वसन्त था
इतने में एक झोंका आया
मुझे एक पल को भरमाया
मैंने रो…

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रचनाकार

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101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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