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March, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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भूपेन हजारिका की जीवनी : दिल हूम हूम करे (3)

भूपेन हजारिका

दिल हूम-हूम करे
-दिनकर कुमार(पिछले अंक से जारी....)(साथ में सुनिये रेडियोवाणी पर भूपेन दा के गीत यहाँ पर)
सात
स्वतंत्रता के बाद गोपीनाथ बरदलै असम के प्रथम प्रधानमंत्री (उस समय असम में मुख्यमंत्री नहीं प्रधानमंत्री होते थे) बने थे। उनके प्रयास से भूपेन को अमेरिका जाने के लिए छात्रवृत्ति मिली थी। सितम्बर 1949 में भूपेन की यात्रा शुरू हुई। गुवाहाटी से डेकोटा जहाज में सवार होकर भूपेन कलकत्ता पहुंचे। फिर समुद्र के मार्ग से तेरह दिन की यात्रा कर मार्स बन्दरगाह तक पहुंचे। जहां से रेलगाड़ी में सवार होकर पेरिस पहुंचे। पेरिस दर्शन करते हुए भूपेन कोलम्बिया विश्वविद्यालय पहुंच गये।कोलम्बिया विश्वविद्यालय में भी भूपेन ने संगीत के जरिए सहपाठियों का दिल जीत लिया। भारतीय विद्यार्थियों के बीच भूपेन काफी लोकप्रिय हो गये। भूपेन ने देखा कि अधिकांश भारतीय विद्यार्थी अमीर परिवारों से ताल्लुक रखते थे। अमेरिका के मुक्त जीवन के साथ भूपेन का परिचय हुआ।
भूपेन के युवा जीवन में एक लड़की आयी थी, जो शिलांग में रहती थी। अमेरिका में भी भूपेन को उस लड़की की याद आती थी। अपने साथ भूपेन उसके खत लेकर गये थे। बीच-…

भूपेन हजारिका की जीवनी : दिल हूम हूम करे (2)

भूपेन हजारिका

दिल हूम-हूम करे
-दिनकर कुमार(पिछले अंक से जारी....)
तीन
एम. ई. स्कूल के शिक्षक नीलकान्त हजारिका बाद में सरकारी अधिकारी बन गये थे और उनका तबादला असम के कई शहरों में होता रहा था। बचपन के शुरुआती कुछ साल भूपेन हजारिका ने गुवाहाटी में अपने ननिहाल में गुजारे थे। गुवाहाटी के भरलुमुख इलाके में नाना का घर था। विभिन्न भाषा-भाषी लोग रहते थे। बंगाली लोगों का कीर्तन कार्यक्रम देखने भूपेन जाते। वहीं थाने में बिहारी सिपाही रहते थे, जो भोजपुरी में गाया करते थे। उनके गीतों को भी भूपेन मन लगाकर सुना करते थे। मां के साथ ‘ओजापाली' (महापुरुष शंकरदेव द्वारा प्रारम्भ की गयी नृत्यनाटिका की परम्परा) देखने जाते थे।
नाना के घर के पास से छोटी नदी ‘भरलू' बहती थी, जो ब्रह्मपुत्र में मिलती थी। सबको तैरते हुए देख भूपेन का जी चाहता कि वह भी तैरें, मगर तैरना नहीं आता था। एक दिन भूपेन ने देखा कि एक छोटी लड़की नदी में नहा रही है। किनारे पर खड़े किसी आदमी ने कहा कि वह डूब जाएगी। भूपेन फौरन नदी में कूद गये। बच्ची ने उन्हें जकड़ लिया। दोनों डूबने लगे। तभी एक बिहारी पुलिसवाले ने उन्हें पानी से बाहर निकाला।…

भूपेन हजारिका की जीवनी : दिल हूम हूम करे

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भूपेन हजारिका

दिल हूम-हूम करे
-दिनकर कुमाररचनाकार परिचय:
दिनकर कुमार
जन्म : 5 अक्तूबर 1967, ग्राम ब्रह्मपुरा, जिला दरभंगा (बिहार)
एक कविता संग्रह ‘आत्म निर्वासन (1993), एक उपन्यास ‘निहारिका' (1995) प्रकाशित ।
असमिया से चालीस कृतियों का हिन्दी अनुवाद ।
अनुवाद के लिए 1998 का सोमदत्त सम्मान ।
कविताओं का असमिया, अंग्रेजी, नेपाली आदि भाषाओं में अनुवाद ।
100 से अधिक टीवी धारावाहिकों की पटकथाओं का लेखन ।
पत्रकारिता, रंगमंच एवं टीवी के क्षेत्र में योगदान ।
संप्रति : गुवाहाटी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘सेंटिनल' का संपादन ।
संपर्क : रोहिणी भवन, श्रीनगर, बाईलेन नं. - 2, दिसपुर, गुवाहाटी-781 005 (असम)
प्रकाशक (प्रिंट मीडिया, उषा पब्लिकेशन) का वक्तव्य
बचपन से ही मुझे साहित्य कला, सिनेमा आदि में व्यापक रूचि रही है शायद इसी के परिणाम स्वरूप दिनकर जी के सहयोग से कालेज में ‘‘अपवाद'' नामक एक पृष्ठीय पत्रिका का पदार्पण हुआ। भविष्य में इस आशा के साथ की अपवाद एक अपवाद नहीं रहेगा, हमने साहित्य के सफर में एक अंग्रेजी पत्रिका ‘‘क्रानिस इन्टरनेशनल'' को भी प्रकाशित किया। यद्यपि साहित्य की इस अनोखी और …

कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता - जूता महिमा

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जूता चलता हैडॉ० कान्ति प्रकाश त्यागी
आओ दोस्तों,तुम्हें सुनाएं जूते की महिमा
जिसका चल रहा, उसकी ही होती गरिमा
रूस के थे ख्रुश्चेव निकेता
यू०एन०ओ० में रखा जूता
मन चलों को करना पड़े हैंडिल
उन्हें दिखाओ, सिर्फ़ एक सैंडिल
गली मोहल्ले में करे, कोई उल्टा काम
उसको तो न बचा सकते जय श्रीराम
अर्ध बाल मुंडन,काला मुंह, गर्धभ सवारी
गली गली में देखें तमाशा, नर और नारी
कभी कभी ऐसा भी होता
बगैर गलती के पड़ता जूता
जिसका जूता, उसी का सर
भाई झूठ नहीं है रत्ती भर
खोला होगा, आगरे में मानसिक दवाखाना
फिर खोलना पड़ा होगा, जूतों का कारखाना
यदि मरीज काबू न आएं
जूते दिखाकर अन्दर लाएं
पड़ते जिसे, मिरगी के दौरे
जूता सूंघा कर होते थोरे
कुछ निपुण हैं, करने में तेल मालिश
कुछ बन गए बड़े, करके बूट पालिश
एक दूकान पर लगी जूतों के सेल
घुसने को हो रही जनता, पेलम पेल
आप एक जोड़ी खरीदेंगे
तो एक जोड़ी फ़्री पड़ेंगे
छोटा पहनिए, काटेगा जूता
बड़ा पहनो, तो बांधो फ़ीता
ग्राम सभाएं, जन सभाएं
राज सभाएं, लोक सभाएं
विधान सभाएं, चुनाव सभाएं
बताओ, कुछ ऐसी सभाएं,
जहां चले न हो जूते
बात, बेबात पर न
कितनों के सर फूटे
कहीं लूट पाट, कहीं धमाका,कहीं हड़कम
कही मारपीट, कहीं धरना, कहीं जूत पत्…

रचना श्रीवास्तव की कविता : होली के हुड़दंग में हो गई जरा सी भूल...

कविता

फ़िर गलती हो गई

- रचना श्रीवास्तव
---------------------------

होली के हुडदंग मे
हो गई भूल हमसे भारी
बीवी समझ रंग लगा जिसको
वो निकली पड़ोसन हमारी
मारा सर पे हाथ कहा-
बहनजी गलती हो गई

खेलते खेलते देखा
भीग गई थी बुरी तरह ,
श्रीमती जी हमारी
फगवा की थी उमंग
प्रेम की उठी तरंग
हाथ पकड़ के बोला
जा के कपड़े बदल लो प्यारी
हाथ छोड़ डैमफूल
मै हूँ शरमा जी की नारी
मारा सर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई

लगी थी मेज पे
गुझियों की क्यारी
एक खाया दो खाया
खाता गया
औए खा ली ढेर सारी
थोडी देर मै सिर घूमा ,
हो गया भारी
किसी ने कहा
भाई साहब ये है भाँग की बीमारी
मारा सिर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई

भाँग का गहरा होता गया रंग
हम होते गए मगन
बेखयाली मे बोल गए
मीना मीना मै हूँ तुम्हारे संग
श्रीमती जी गरज के बोली
है ये मीना कौन ,चढा जिस के प्रेम का रंग
लो मै चली मैके
संभालो आपने छगन मगन
मेरी अब क्या जरूरत
उडाओं उसी के संग आपनी पतंग
मारा सर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई
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रचना श्रीवास्तव
डलास, अमेरिका

योगेन्द्र कृष्णा की कविताएं हिंदी काव्य-परंपरा में नया अध्याय जोड़ती हैं : अरुण कमल

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योगेन्द्र कृष्णा के काव्य संकलन 'बीत चुके शहर में' का लोकार्पणपिछले दिनों प्रलेस के तत्वावधान में माध्यमिक शिक्षक संघ सभागार, पटना में संवाद प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित योगेन्द्र कृष्णा के काव्य-संकलन बीत चुके शहर में का लोकार्पण चर्चित वरिष्ठ कवि अरुण कमल के द्वारा किया गया. समारोह की अध्यक्षता समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने की. उनकी प्रतिनिधि कविताओं पर समालोचनात्मक टिप्पणी करते हुए अरुण कमल ने अपने वक्तव्य में कहा कि योगेन्द्र कृष्णा की कविताएं संपूर्ण हिंदी काव्य-परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ती हैं. उन्होंने कहा कि बीत चुके शहर में की कविताओं में आज का हिंसक होता सामाजिक परिदृश्य एक नए मुहावरे में उजागर हुआ है.आयोजन की शुरुआत करते हुए कवि शहंशाह आलम ने कहा कि योगेन्द्र कृष्णा के इस रचनात्मक साहस को वे सलाम करते हैं.इस अवसर पर समीक्षक ओम निश्चल ने पुस्तक की अंतर्वस्तु पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आठवें दशक से ही बिहार का काव्य-परिदृश्य काफी समृद्ध हुआ है. पुस्तक में संकलित कविताओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इनकी कई कविताएं मूल्यों के टूटने का दर्द …

डॉ. शरद काळे की दो कविताएं

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दो कविताएं- डॉ. शरद काळेओ मेरी अनुभूतियोंओ मेरी अनुभूतियों, समय से पहले ही प्रकाशितहो जाने वाली पत्रिकाओं की तरहयूँ असमय न फूटोरहना है तो रहोगर्भाशय में गर्भ की तरह मंद स्पंदसड़ना है तो सड़ोनौकरी में हुनर की तरह — अदुर्गंधधुले हुए सूखते वस्त्रों मेंजनानी अंगिया के स्पर्श मात्र से सिहरने वालेकिशोर की तरह यूँ शब्द स्पर्श से न सिहरोसीमा पर सजग प्रहरी की तरहकरो आदेश का इंतजारकंधों पर अपने रखे शब्द हथियार निर्विकार-----कविता लिखते होकविता लिखते हो, लिखो, निभा पाओगे क्यासविता रखते हो, प्रभा सह पाओगे क्य़ादर्द कर्ज लेना पड़ता है कविता लिखना खेल नही, लटका ' एयर बैग ' सफर पर निकलें ये वो रेल नहीयह ठीक, पास है टिकट, पहुँच पाओगे क्याकई चाबियों के गुच्छे हैं, ताले फिर भी खुल न सकेडाली खेंची कई, उमर कट गई, मगर ये कट न सकेइस तरह भेद हैं कई समझ पाओगे क्याशब्द-शब्द को लिखने में तो रक्त जलाना पड़ता हैहाड़ मांस सब जलता है तब थोड़ा अर्थ उजलता हैतुम पहले से कंकाल यज्ञ में डालोगे क्यालोग यहाँ सब के सब कविता लिखने की तैयारी मेंसमय निकल जाता है उनसे बीज़ न डलता क्यारी मेंछिन जाता है आखिर खेत, गँवा यू…

प्रेम जनमेजय का व्यंग्य "कौन कुटिल खल कामी" लोकार्पित

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प्रेम जनमेजय जैसे ‘खतरनाक’ रचनाकारों से सावधान रहना चाहिए क्योंकि इनकी दृष्टि बहुत पैनी है । - कन्हैयालाल नंदन
‘कौन कुटिल खल कामी’ का लोकार्पण -प्रवीण शुक्ल
कार्यक्रम संयोजक ‘अक्षरम्’

‘‘ व्यंग्य लेखन एक बहुत कठिन कर्म है जिसमें अपने को छिपाने की चतुराई नहीं चलती है । व्यंग्य लेखन और आत्मकथा लेखन में चतुराई नहीं चलती है । आप व्यंग्य के माध्यम से ऐसी मार करते हैं जो मार हो और लगे भी नहीं । प्रेम जनमेजय अपने लेखन के द्वारा ऐसा ही कठिन कर्म कर रहे हैं ।’ ये उद्गार प्रसिद्ध आलोचिका निर्मला जैन ने प्रेम जनमेजय के, ‘अक्षरम्’ द्वारा हिंदी भवन दिल्ली में आयोजित, ‘ग्रंथ अकादमी’ द्वारा सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संकलन ‘कौन कुटिल खल कामी’ का लोकार्पण करते हुए व्यक्त किए । उन्होंने सबसे पहले लेखक को बधाई दी कि वह रचना के अकाल से बाहर निकल आया है । उन्होंने लेखक की इस बात की भी प्रशंसा की कि उसमें ईमानदारी जिंदा है और इसी ईमानदारी के तहत उसने भूमिका में अपने रचना-अकाल से संघर्ष करने में रवींद्र कलिया और ज्ञान चतुर्वेदी के सहयोग को रेखांकित किया है । प्रेम जनमेजय के व्यंग्य अपने प्रहार में निष्ठु…

जीवन के तीन रंग

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जीवन के तीन रंग-डॉ. ओम प्रकाश एरन(1)धर्मराज ने राशन की दुकान पर पूछा-उत्तर मिला “घासलेट अभी नहीं आया”कुछ दिनों बाद पूछा उत्तर मिला-“बीस तारीख तक आएगा”बीस तारीख को गए तो कहा-“कब से समाप्त हो गया, आप इतने दिन कहां थे?”इसके बाद धर्मराज परिवार सहितहिमालय की ओर चले गए-----.(2)कालू रोज स्कूल आता हैकाश टीचर भी रोज आतेकालू को रोज मिलता है चपरासीवह उसी से बात करता रहता हैनियमित स्कूल आने का फायदा हुआवह बीड़ी पीना सीख गयाएक दिन टीचर आएकालू को बुलायाबोले, “तू पास हैला, एक बीड़ी मुझे भी पिलातेरी बीड़ी कुछ खास है.”------.(3)नेताजी खिड़की के पास बैठकरसुस्ता रहे थेएक कव्वा कहीं से आयाअपना परम्परागत गाना गायाफिर नेताजी से पूछा-“मजा आया?”नेताजी कव्वे को भगाते हुए बोले-“न सुर, न ताल, न अक्लहमारे सामने हमारी ही नकल?”----.संपर्क:शास्त्री नगर, रतलाम, मप्र. 457001(साभार, साप्ताहिक उपग्रह, रतलाम. चित्र – कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति)

महेंद्र भटनागर का होली फाग

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फाग

-महेंद्र भटनागर


फागुन का महीना है, मचा है फाग
होली छाक छाई है; सरस रँग-राग !

बालों में गुछे दाने, सुनहरे खेत
चारों ओर झर-झर झूमते समवेत !

पुरवा प्यार बरसा कर, रही है डोल
सरसों रूप सरसा कर, खड़ी मुख खोल !

रे, हर गाँव बजते डफ़ मँजीरे ढोल
देते साथ मादक नव सुरीले बोल !

चाँदी की पहन पायल सखी री नाच
आया मन पिया चंचंल सखी री नाच !

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होली


नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली,
उन्मत्त उमंगों को फिर भर लायी होली !

आयी दिन में सोना बरसाती फिर होली,
छायी निशि भर चाँदी सरसाती फिर होली !

रुनझुन-रुनझुन घुँघरू कब बाँध गयी होली,
अंगों में थिरकन भर, स्वर साध गयी होली !

उर में बरबस आसव री ढाल गयी होली,
देखो, अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली !

स्वागत में ढम-ढम ढोल बजाते हैं होली,
हो कर मदहोश गुलाल उड़ाते हैं होली !

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समता का गान [परिप्रेक्ष्य होली]



मानव समता के रंगों में
आज नहा लो !

सबके तन पर, मन पर है जिन चमकीले रंगों की आभा,
उन रंगों में आज मिला दो अपनी मंद प्रकाशित द्वाभा,
युग-युग संचित गोपन कल्मष
आज बहा दो !

भूलो जग के भेद-भाव सब — वर्ण-जाति के, धन-पद-वय के,
गूँजे दिशि-दिशि में स्वर केवल मानव महिमा गरिमा जय के,
मिथ्या मर्…

ऋषि कुमार शर्मा का आलेख : कान्हा बरसाने में आइ जइयों, बुलाइ गई राधा प्यारी

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होली पर्व पर विशेषकान्हा बरसाने में आइ जइयों, बुलाइ गई राधा प्यारी ।-ऋषि कुमार शर्मावृषभान लली राधा और देवकी नंदन कृष्ण की प्रेम भरी पिचकारियों से लबालब ब्रज की होली विश्व–विख्यात हैं । आज भी बड़ी धूमधाम से संपूर्ण ब्रज में होली मनाई जाती है । बदली हुई परिस्थितियों और समय – चक्र की गतिशीलता ने हो सकता है होली के रंग कुछ फीके कर दिए हों ;किन्तु आज भी ब्रज के रसिया, ब्रज की होली में उसी प्रेम और प्रीति के दर्शन करते हैं जो कि रति किशोरी श्री राधिका और नंदलला श्री कृष्ण के हृदय में व्याप्त थी ।ब्रज की होली में नन्दगॉव और बरसाने की लठामार होली विश्वविख्यात है ।इस होली की अपनी अनूठी विशेषता हैं जो अन्य स्थानों की होली परम्पराओं से भिन्न हैं । नंदगॉव और बरसाने की होली में भी, बरसाने की होली अधिक रंग–रंगीली होती हैं। बरसाना वृषभानु नन्दिनी राधा का गॉव, नन्दगॉव कृष्ण कन्हैयॉ का गॉव हैं। संभवत: यही एकमात्र कारण हैं कि नन्दगॉव का प्रत्येक व्यक्ति बरसाना को अपनी ससुराल समझाता है और बरसानें के पुरूष अपने में सखी भाव की मान्यता रखते है।फाल्गुन शुक्ला नवमी को बरसाने मे लट्ठमार होली खेली जाती हैं। ज…

सीताराम गुप्ता का आलेख : होली की प्रासंगिकता

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होली की प्रासंगिकताःघातक मनोभावों से मुक्ति का पर्व है रंगोत्सव-सीताराम गुप्ता होली एक ओर तो बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है तो दूसरी ओर रंगों तथा हास्य के पर्व के रूप में भी। कुछ लोगों को इस पर्व के फूहड़पन या अमर्यादित हुड़दंग पर आपत्ति है तो कुछ इसे अश्लील पर्व की संज्ञा भी देते हैं क्योंकि इस पर्व में कई बार सामान्य शिष्टाचार की सीमाओं का अतिक्रमण भी हो जाता है। इस प्रकार होली विशेषरूप से फाग या रंगोत्सव, जो होलिका दहन की रात्रि के पश्चात् अगले दिन मनाया जाता है, मनाने या खेलने की विधि को लेकर विभिन्न विचारधाराएँ देखने-सुनने में आती हैं। लेकिन क्या वास्तव में रंगों से खेलने का ये त्यौहार अश्लील या असभ्य कहा जा सकता है? यदि ध्यानपूर्वक अवलोकन करें जो जीवन में ऐसे क्षणों की भी आवश्यकता है जब हम अपने मन में समाए घातक मनोभावों अथवा विकारों से मुक्त हो सकें। होली का हुड़दंग हमें ये अवसर उपलब्ध कराता है। इस अवसर पर हमारे अवचेतन मन में एकत्र विकृत भाव या विकार किसी भी रूप में बाहर निकल कर हमें तनावमुक्त कर प्रफुल्लित बना देते हैं।रंगों का हमारे मनोभावों पर और हमारे …

देवी नागरानी की पुस्तक समीक्षा : प्रवासिनी के बोल

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"प्रवासिनीकेबोल"संपादकःडॉ॰अंजनासंधीर
प्रिय अंजना,
महिलाओं का तू चितवन है
सुंदर और सलोना मधुबन है
तेरी सोच व शीरीं सी बातें
कितना उनमें अपनापन है
तेरे स्नेह स्वरूप ये "बोल" मिले
तेरे श्रम का ही ये दरपन है.
-देवीनागरानी
डॉ॰ अंजना संधीर ने एक अनोखी विचार धारा को इस संग्रह के रूप में साकार करके अनूप और अनोखा स्वरूप दिया है और एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया है, लग रहा है जैसे नारी जाति के सन्मान में एक नया मयूर पंख लगा है. उनका दृढ़ संकल्प ही इस काव्य संग्रह "प्रवासिनी के बोल" के रूप में प्रकाशित हो पाया है.
"ख़्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बन के मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूं, परदेस में हूं, खुश भी हूं
मगर ख़्याल तो हर दम वतन में रहता है." अंजना
अंजना जी के इस कथन में एक निचोड़ है, एक अनबुझी प्यास का अहसास जो सीने में कहीं न कहीं पनपता तो रहता है पर खिल नहीं पाता, खिलता है तो महक नहीं पाता, उस अनजान तड़प को उन्होंने शब्द दिये है "प्रवासिनी के बोल". भरी आंखों और तड़पती हृदय वेदना परदेस में रह…

अश्विनी केशरवानी का होली पर आलेख

होली का त्योहार मनायें, ले लेकर अबीर झोली मेंप्रो. अश्विनी केशरवानी
होली केवल हिन्दुओं का ही नहीं वरन् समूचे हिन्दुस्तान का त्योहार है। इस त्योहार को सभी जाति और सम्प्रदाय के लोग मिल जुलकर मनाते हैं। इसमें जात-पात कभी आड़े नहीं आती। सारी कटुता को भूलकर सब इसे मनाते हैं। इसे एकता, समन्वय और सद्भावना का राष्ट्रीय पर्व भी कहा जाता है। होली के आते ही धरती प्राणवान हो उठती है, प्रकृति खिल उठती है और कवियों का नाजुक भावुक मन न जाने कितने रंग बिखेर देता है अपनी गीतों में, देखिए एक बानगी ः-होली का त्योहार मनायें
ले लेकर अबीर झोली में
निकले मिल जुलकर टोली में
बीती बातों को बिसराकर
सब गले मिलें होली में
पिचकारी भर भरकर मारें
सबको हंसकर तिलक लगायें
आओ मिलकर होली मनायें।

होली का लोक जीवन से जितना गहरा सम्बंध है, उतना किसी अन्य त्योहार से नहीं है। इस त्योहार पर तो जीवन खुशी से उन्मत्त हो जाता है। वास्तव में ग्राम्य जीवन का उल्लास यदि फसल कटने के बाद नहीं बहेगा तो कब बहेगा ? घर धन-धान्य से भरा है और कोठी गौओ से। साल भर के बाद होली आई है पाहुन बनकर। यदि इसके आगमन पर खुशी नहीं म…

कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता : इन्टरनेट

इन्टरनेट
डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

पड़ोसी श्याम लाल की लड़की ने दरवाज़ा खटखटाया,
अन्दर आओ, कैसी हो ! बिटिया रानी, मैंने फ़रमाया ।
शर्मिला धीरे से अन्दर आई ,
नमस्ते की ,ओर थोड़ा मुसकाई ।
फिर बोली अंकल!, क्या आपका इन्टरनेट चल रहा है ?.
हां बेटा,अंकल कल से हमारा सरवर नहीं मिल रहा है ।
अंकल आज़ मेरी शादी है ओर इन्टरनेट फैल हो गया ,
मैंने बहुत कोशिश की, पर सब कुछ बे मेल हो गया ।
पर बिटिया ! अचानक, यह सब कैसे हो गया ,
ई मेल के ज़रिये, एक लड़की से मेल हो गया ।
अंकल बहुत दिनों से, लंदन में एक लड़की से ई मेल चल रही थी ,
घर पर कभी कभी बिना सरवर के, यह ई मेल बेमेल चल रही थी ।
मालूम था, आपका सरवर जाता नही है ,
आपको इस कदर सताता नहीं है ।
ई मेल के ही ज़रिये , हैरी से मेल हुआ,
चैट से रोमांस बढ़ा, यू दिल फ़ैल हुआ ।
मेरे कोल्ड मेल से , उसके हाट मेल का मेल हो गया ,
पता ही नहीं चला, कब दो दिलों का मेल हो गया ।
न बाज़े गाज़ों का शोर शराबा , न रिश्तेदारों का ज़मघट ,
न शहनाई, न हलवाई ,न हल्दी न उबटन,न घुंघरू की थिरकन ।
क्या तुम्हारे …

महेंद भटनागर की कविता : नारी

चित्र
नारीडॉ. महेंद्र भटनागर
चिर-वंचित, दीन, दुखी बंदिनि!
तुम कूद पड़ीं समरांगण में,
भर कर सौगंध जवानी की
उतरीं जग-व्यापी क्रंदन में,
युग के तम में दृष्टि तुम्हारी
चमकी जलते अंगारों-सी,
काँपा विश्व, जगा नवयुग, हृत-
पीड़ित जन-जन के जीवन में!
अब तक केवल बाल बिखेरे
कीचड़ और धुएँ की संगिनि
बन, आँखों में आँसू भर कर
काटे घोर विपद के हैं दिन,
सदा उपेक्षित, ठोकर-स्पर्शित
पशु-सा समझा तुमको जग ने,
आज भभक कर सविता-सी तुम
निकली हो बन कर अभिशापिन!
बलिदानों की आहुति से तुम
भीषण हड़कम्प मचा दोगी,
संघर्ष तुम्हारा नहीं रुकेगा
त्रिभुवन को आज हिला दोगी,
देना होगा मूल्य तुम्हारा
पिछले जीवन का ऋण भारी,
वरना यह महल नये युग का
मिट्‌टी में आज मिला दोगी!
समता का, आज़ादी का नव-
इतिहास बनाने को आयीं,
शोषण की रखी चिता पर तुम
तो आग लगाने को आयीं,
है साथी जग का नव-यौवन,
बदलो सब प्राचीन व्यवस्था,
वर्ग-भेद के बंधन सारे
तुम आज मिटाने को आयीं!
--------------------------------------(चित्र - कलाकृति : रेखा)

राजेन्द्र अविरल की होली पर दो कविताएं

कविता-राजेन्द्र अविरलहोली मन की उमंगहोली के संग
लो मची है हु़ड़दंग
पी के चले अब भंग
छाई मृदुल तरंग
सब रंग ही रंग
भीगा सारा अंग -अंग
पिया नाचे संग -संग
डोला मन का मतंग
हो रहे है सब दंग
छोड़ो अब सारी जंग
उठी जीवन तरंग
उड़ी फिर से पतंग
होली मन की उमंग
होली मन की उमंग...-----आओ होली मनाएं...होली के बहाने
देश में अब आए दिन मन रही है होली
जल रहा, किसी का घर
तो क हीं चल रही बंदूक से गोली
दीवाली भी यदाकदा मन जाती मेरे देश में
धमाकों के शोर में, सब कुछ दब सा जाता है
सनसनी तो आए दिन फैलती ही रहती है
जिस्म मे मेरे ,दहशत की
रंगों की जगह खून भी बहता रहता है
मेरे देश वासियों के जिस्म से
होली के बहाने आओ आज,
फिर से गले लग जाएं.
गोली के बहाने छोड़ ,
ह्म फिर से दीवाने बन जाएं.
माना कि दीवारें मिट्टी की
खींची है जमीं के टु़कड़े पर
दिल की दीवारें ,आज मिटाएं
आओ, गले मिलें ,फिर..होली मनाएं...

सीमा सचदेव की कविता कथा - महलों की रानी

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कविता-कथा
1.महलों की रानी

सीमा सचदेव
एक कहानी बड़ी पुरानी
आज सुनो सब मेरी जुबानी
विशाल सिन्धु का पानी गहरा
टापू एक वहाँ पर ठहरा

छोटा सा टापू था प्यारा
कुदरत का अदभुत सा नजारा
स्वर्ग से सुन्दर उस टापू पर
मछलियाँ आ कर बैठती अकसर

धूप मे अपनी देह गर्माने
टाप पे बैठती इसी बहाने
उस पर इक जादू का महल था
जिसका किसी को नहीं पता था

चाँद की चाँदनी में बाहर आता
और सुबह होते छुप जाता
उसको कोई भी देख न पाता
न ही किसी का उससे नाता

इक दिन इक भूली हुई मछली
रात को टापू की राह पे चल दी
सोचा रात वही पे बिताए
और सुबह होते घर जाए

देखा उसने अजब नजारा
चमक रहा था टापू सारा
सुन्दर सा इक महल था उस पर
फूल सा चाँद भी खिला था जिस पर

देख के उसको हुई हैरानी
पर मछली थी बड़ी सयानी
जाकर खड़ी हुई वह बाहर
पूछा ! बोलो कौन है अन्दर

क्यों तुम दिन मे छिप जाते हो?
नज़र किसी को नही आते हो?
अन्दर से आई आवाज़
खोला उसने महल का राज

रानी के बिन सूना ये महल
इसलिए रक्षा करता है जल
ढक लेता इसे दिन के उजाले
क्योंकि दुनिया के दिल काले
..................
..................
मछली रानी बड़ी सयानी
समझ गई वो सारी कहानी
चली गई वो महल के अन्दर
अब न रहेगा महल भी खण्डहर
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