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बृजमोहन श्रीवास्तव का व्यंग्य : कहां खो गया कवि मतवारा

कहाँ खो गया कवि मतवारा -बृजमोहन श्रीवास्तवसाहित्य और संस्कृति पर विविध प्रकार से प्रहार होता रहा है और वह निरंतर बढ़ता जा रहा है। अश्लील चित्रों ने संस्कृति पर और अश्लील भाषा ने साहित्य पर अपने प्रहार बढ़ा दिए हैं। व्यक्ति को वाक एवं लेखन की स्वतंत्रता है। जब स्वतंत्रता निरपेक्ष और दायित्वहीन हो जाती है तो स्वेच्छाचारिता हो जाती है। वहां यह बात ध्यान में नहीं रखी जाती है की यह स्वतंत्रता विधि सम्मत नहीं है। और किसी दूसरे की स्वतंत्रता में बाधक तो नहीं है। ज्ञान और भावों का भण्डार ,समाज का दर्पण। ज्ञान राशि का संचित कोष यदि मानव कल्याणकारी नहीं है तो उसे में साहित्य कैसे कहूं मेरी समझ से बाहर है। जीवन के सूक्ष्म और यथार्थ चिंतन सामाजिक चरित्र का प्रतिपादन करती रचनाओं पर प्रतिकूल या अश्लील टिप्पणियाँ कहाँ तक स्वागत योग्य है मेरी समझ से बाहर हैं ।कितनी हास्यास्पद बात है एक सज्जन कह रहे थे की चाहे जमाने भर में साहित्य का स्तर गिर जाए हमारे जिले में नहीं गिर सकता पूछा क्यों ? तो बड़ी सादगी से बोले हमारे जिले में साहित्यकार कोई है ही नहीं। जहाँ तक में समझता हूँ आमतौर पर कवि छपने के लिए ही र…

राम स्वरूप त्रिपाठी की पुस्तक समीक्षा

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समीक्षा काव्य संग्रह-‘‘अभिलाषा”कवि - कृष्ण कुमार यादवसमीक्षक - डॉ. राम स्वरूप त्रिपाठीव्यक्तिगत सम्बन्धों की कविता में सामाजिक सहानुभूति का मानस-संस्पर्शमनुष्य को अपने व्यक्तिगत सम्बन्धों के साथ ही जीवन के विविध क्षेत्रों से प्राप्त हो रही अनुभूतियों का आत्मीकरण तथा उनका उपयुक्त शब्दों में भाव तथा चिन्तन के स्तर पर अभिव्यक्तीकरण ही वर्तमान कविता का आधार है। जगत के नाना रूपों और व्यापारों में जब मनीषी को नैसर्गिक सौन्दर्य के दर्शन होते हैं तथा जब मनोकांक्षाओं के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करने में एकात्मकता का अनुभव होता है, तभी यह सामंजस्य सजीवता के साथ समकालीन सृजन का साक्षी बन पाता है। युवा कवि एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने अपने प्रथम काव्य संग्रह ‘‘अभिलाषा” में अपने बहुरूपात्मक सृजन में प्रकृति के अपार क्षेत्रों में विस्तारित आलंबनों को विषयवस्तु के रूप में प्राप्त करके ह्नदय और मस्तिष्क की रसात्मकता से कविता के अनेक रूप बिम्बों में संजोने का प्रयत्न किया है। “अभिलाषा” का संज्ञक संकलन संस्कारवान कवि का इन्हीं विशेषताओं से युक्त कवि कर्म है, जिसमें व्यक्तिगत स…

कृष्ण कुमार यादव की दो कविताएं

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कविताएं-कृष्ण कुमार यादवआटा की चक्कीगाँव की एक अनपढ़ महिलाने मुझसे पूछासुना है, अमरीका नेआटा चक्की को पेटेंटकरा लिया हैबेटा, इससे क्या होता है?मैंने बतायादेखो अम्माअब हमें आटा चक्कीखोलने से पहलेउनकी इजाजत लेनी होगी।वह भड़क गईऐसा कैसे हो सकता हैयह तो हमारे पुरखों की अमानत है।मैंने सोचा,गाँव की एक अनपढ़महिला भी यह सोचती हैपर पता नहीं ऊपर बैठेपढ़े-लिखों को कब चेत आयेगा।----ये इंसानयह कैसा देश हैजहाँ लोग लड़ते हैं मजहब की आड़ मेंनफरत के लिएपर नहीं लड़ता कोई मोहब्बत की खातिरदूसरों के घरों को जलाकरआग तापने वाले भी हैंपर किसी को खुद के जलतेघर को देखने की फुर्सत नहींएक वो भी हैं जो खुद को जलाकरदूसरों को रोशनी देते हैंपर नफरत है उन्हें उस रोशनी से भीकहीं इस रोशनी में उनका चेहरा न दिख जायेफिर भी वे अपने को इंसान कहते हैंपर उन्हें इंसानियत का पैमाना ही नहीं पताडरते हैं वे अपने अंदर के इंसान को देखने सेकहीं यह उनको ही न जला दे।------.जीवन वृत्तनाम : कृष्ण कुमार यादवजन्म : 10 अगस्त 1977, तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0)शिक्षा : एम0 ए0 (राजनीति शास्त्र), इलाहाबाद विश्वविद्यालयविधा : कविता, कहानी, लेख, लघु…

आकांक्षा यादव की कविताएं

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कविताएं-आकांक्षा यादवश्मशानकंक्रीटों के जंगल मेंगूँज उठते हैं सायरन शुरू हो जाता हैबुल्डोजरों का ताण्डवखाकी वर्दियों के बीचदहशतजदा लोगनिहारते हैं याचक मुद्रा मेंऔर दुहायी देते हैंजीवन भर की कमाई काबच्चों के भविष्य कापर नहीं सुनता कोई उनकीठीक वैसे हीजैसे श्मशान मेंचैनलों पर लाइव कवरेज होता हैलोगों की गृहस्थियों के श्मशान में बदलने का।--------.सिमटता आदमीसिमट रहा है आदमीहर रोज अपने मेंभूल जाता है भावनाओं की कद्रहर नयी सुविधा और तकनीक घर में सजाने के चक्कर मेंदेखता है दुनिया कोटी० वी० चैनल की निगाहों सेमहसूस करता है फूलों की खुशबू कागजी फूलों मेंपर नहीं देखता पास-पडोस का समाजकैद कर दिया है बेटे को भीचहरदीवारियों मेंभागने लगा है समाज सेचौंक उठता हैकॉलबेल की हर आवाज परमानो खड़ी हो गयी होकोई अवांछित वस्तुदरवाजे पर आकर।---रचनाकारा परिचय:जीवन-परिचय नाम-            आकांक्षा यादव जन्म -                   ३० जुलाई १९८२, सैदपुर, गाजीपुर (उ० प्र०) शिक्षा-                 एम० ए० (संस्कृत) विधा-            कविता और लेख
प्रकाशन-          देष की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प…

साक़िब अहमद की कविताएं

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यादें-साक़िब अहमदतुम्हारी कुछ यादें,दिल में आती जाती हैं.बातें, तुम्हारी प्यारी प्यारी बातें,यादें बन कर दिल को तड़पाती हैं.तुम्हारी आखों की वो शरारत,तुम्हारी प्यारी सी मुस्कुराहट,मुझसे मिल कर तुम्हारा वो मचलना,आंखों आंखों वक्त गुजरना,मुझको हर पल की याद आती है.यादें बन दिल को तड़पाती हैं.हमने साथ गुजारे थे जो पल,खायी थी प्यार भरी जो कसमें,थाम कर हाथ, हाथ में हमने,किये थे साथ निभाने के जो वादे,उन कसमों वादों की याद आती है.यादें बन दिल को तड़पाती हैं.क्यूं तुम मुझसे दूर चली गयी,क्यूं मुझको तन्हा छोड़ चली गयी.......‘बेजान फूल’जब आखिरी बार,मैंने देखा था तुम्हें.तुम कितनी मासूम लग रही थी.तुम्हारा संदली चेहरा,जैसे हरसिंगार का फूल,जो, सूरज की पहली किरण पड़ते ही,साख से जुदा हो कर,जमीन पर आ गिरा हो.खामोश, बेजान फूल...........मगरतन्हा मुझको छोड़ कर,तुम चली तो गई,मगर, तुम भी मेरी ही तरह,तड़पती होगी.एक मजबूरी, एक बेचैनी,साथ तुम्हारे भी तो होगी.पास मेरे हर पल,साया बन रहती तुम होगी.मेरी तन्हाई, मेरी खामोशी,तुझसे कुछ कहती तो होगी......गमजाऊं कहा मैं,गम से घबरा कर.यह गम तो,सौंपी हुई तुम्हारी, विरासत …

अनुज खरे का व्यंग्य : ये अपुन का बजट है मामू...

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बजट : ए टेलीफिल्मये अपुन का बजट है मामू-- अनुज खरेसमयावधि : अनंतकाल तक कभी भी देख लें।वैधानिक चेतावनी : ढेर सारे सास-बहूनुमा सीरियलों से अघाए धैर्यशील प्राणियों के लिए बिल्कुल नया रियलटी शो पेश है। पात्रों का चयन देश-काल की सीमा से परे जाकर किया गया है। पात्रों की वर्तमान देश के निवासियों से संरचनात्मक एकरूपता दुर्योगमात्र है।सूत्रधार-संदेश (अर्थात् ब्रीफ में चल क्या रहा है की जानकारी) : बजट पेश किए जाने की बेला है। कब के मुक्त को प्राप्त हो चुके एक पुरातनकालीन महानुभाव धरा पर गमन कर रहे हैं। दिल्ली में विचरण करते हुए उनकी मुलाकात मुंबइया किस्म के एक मनुष्य से हो जाती है। बजट उर्फ वित्तीय खरीते पर उनकी निश्छल जिज्ञासाएं और टपोरी बीडू (नाम अपनी सुविधा से आप चाहे टीटी उर्फ टपोरी टाइप रख लें) के सहज भाईनुमासमाधानों के टकराने का प्रसंग संसद के नेपथ्य में तैयार है। संवाद प्रारंभ होने को आतुर है। अतैव, रिमोट छोडें दृश्य पर ध्यान दें।अहा! कैसा शुभ प्रसंग है। मनुष्य मात्र की चिंताओं के निवारणार्थ एक ज्ञानी कितना बुद्धि-वाणी श्रम कर रहा है? वंदनीय! दृश्य दृष्टिगोचर है।टीटी उर्फ टपोरीटाइप…

अशोक कुमार वशिष्ट का आलेख : निर्बलता

आलेखनिर्बलता-अशोक कुमार वशिष्टज्ञानी कहते हैं कि प्रभु आनंद है। वे प्रभु को परमानंद कहते हैं।हम उस परमानंद के अंश हैं। और हम भी आनंद हैं। लेकिन हम अपने आनंद को भूल गए हैं। हमने अपना आनंद खो दिया है। इसीलिए हर मानव की कोशिश होती है कि वह आनंद को प्राप्त करे। चाहे वह आनंद खाने से मिले‚ पीने से मिले‚ सोने से मिले‚ खेल कूद से मिले‚ संगीत से मिले‚ भोग से मिले या फिर योग से मिले,,,,,। बच्चे से लेकर बूढ़े तक की यही कोशिश होती है। हां‚ बुद्धि का स्तर अलग अलग होने से‚ हर मानव का आनंद प्राप्त करने का ढंग अलग अलग होता है। कोई गलत तरीके से पाता है तो कोई सही तरीके से। कोई कम पाता है तो कोई अधिक पाता है। लेकिन हर प्राणी का उद्देश्य एक ही होता है। चाहे वह किसी भी देश या धर्म का हो। चाहे वह किसी भी जाति का हो। चाहे वह कोई भी भाषा बोलने वाला हो। वह आनंद‚ आनंद और सिर्फ आनंद ही चाहता है।जिस तरह कहीं पहुंचने के लिए‚ उस स्थान का पता जानना जरूरी होता है‚ तभी वहां पहुंचा जा सकता है। हर मंजिल तक जाने के लिए कोई रास्ता अवश्य होता है। नहीं तो मानव भटक भी सकता है। उसी तरह आनंद प्राप्ति के लिए भी सही और उचित रा…

सीमा सचदेव की कविताएँ : कविता के लिए वध

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चंद कविताएं-सीमा सचदेव1.कविता के लिए वधकहते हैं....?
कविता कवि की मजबूरी है
उसके लिए वध जरूरी है
जब भी होगा कोई वध
तभी मुँह से फूटेंगे शब्द
दिमाग मे था बालपन से ही
कविता पढ़ने का कीड़ा
न जाने क्यूँ उठाया
कविता लिखने का बीड़ा?
किए बहुत ही प्रयास
पर न जागी ऐसी प्यास
कि हम लिख दे कोई कविता
बहा दे हम भी भावों की सरिता
कहने लगे कुछ दोस्त
कविता के लिए तो होता है वध
कितने ही मच्छर मारे
ताकि हम भी कुछ विचारे
देखे वधिक भी जाने-माने
पर नहीं आए जज्बात सामने
नहीं उठा मन मे कोई बवाल
छोड़ा कविता लिखने का ख्याल
पर अचानक देख लिया एक नेता
बेशर्मी से गरीब के हाथों धन लेता
तो फूट पड़े जज्बात
निकली मुँह से ऐसी बात
जो बन गई कविता
बह गई भावों की सरिता
सुना था जरूरी है
कविता के लिए वध
फिर आज क्यों
निकले ऐसे शब्द ?
फिर दोस्तों ने ही समझाया
कविता फूटने का राज बताया
नेता जी वधिक हैं साक्षात
वध किए हैं उसने अपने जज्बात
जिनको तुम देख नहीं पाए
और वो शब्द बनकर कविता में आए*************************************…

अश्विनी केशरवानी का आलेख - छत्तीसगढ़ के विस्मृत साहित्यकार: पंडित हीराराम त्रिपाठी

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छत्तीसगढ़ के विस्मृत साहित्यकार: पंडित हीराराम त्रिपाठी प्रो. अश्विनी केशरवानी छत्तीसगढ़ में अनेक स्वनामधन्य साहित्यकार हुए जो महानदी की अजस्र धारा से पल्लवित और पुष्पित हुए और काल के गर्त में समाकर गुमनाम बने रहे। ऐसे बहत से साहित्यकार हैं जिनका आज कोई नाम लेने वाला नहीं है। हालांकि साहित्य के क्षेत्र में उनके अवदान को भुलाना संभव नहीं है। उन्हीं साहित्यकारों में एक पंडित हीराराम त्रिपाठी भी हैं। मैं स्वयं महानदी से संस्कारित हूं। जब भी मैं छत्तीसगढ़ के गुमनाम साहित्यकारों पर विचार करता हूं तो पाता हूं कि वे किसी न किसी रूप में महानदी से जुड़े हुये हैं। महानदी छत्तीसगढ़ की पुण्यतोया नदी है। इस नदी के संस्कार मोक्षदायी होने के कारण इसके तटवर्ती ग्राम सांस्कृतिक तीर्थ के रूप में जाने गये। मगर महानदी के तट पर बसा नगर शिवरीनारायण सांस्कृतिक और साहित्यिक दोनों तीर्थ है। सन् 1861 में जब बिलासपुर को जिला बनाया गया तो प्रशासनिक सुविधा के लिए बिलासपुर के अलावा शिवरीनारायण और मुंगेली को तहसील बनाया गया। सन् 1880 में सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के मित्र और सहपाठी ठाकुर जगमो…

शालिनी मुखरैया की कविता : मेरे गीले बिस्तर को माँ तुमने, अपने आंचल से सुखा दिया

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कविताएं

- शालिनी मुखरैया


माँ


जग में किसने देखा ईश्वर को
आखें खोलीं तो पहले पाया तुझको
मुझको लाकर इस संसार में
”माँ” मुझ पर तुमने उपकार किया
मुझे अपने रक्त से सींचा तुमने
मुझे सांसों का उपहार दिया
मेरे इस माटी के तन को
माँ तुमने ही आकार दिया
कैसे यह करज चुकाऊं मैं
इतना तो बता दे ”राम” मेरे
पहले ”माँ ” का कर्ज चुका लूं
फिर आऊं मैं द्वारे तेरे .

मेरी हर इच्छा को तुमने
बिन बोले ही पहचान लिया
सुख की नींद मैं सो पाऊं
अपनी रातों को भुला दिया
मेरे गीले बिस्तर को माँ तुमने
अपने आंचल से सुखा दिया
गर डिगा कहीं विश्वास मेरा
मुझे हौसला तुमने दिया
मुझे हर कठिनाइयों से
टकराने का साहस तुमने दिया

मेरी छोटी बड़ी सभी नादानियों को
तुमने हंसते हंसते बिसरा दिया
मेरे लड़खड़ाते कदमों को माँ तुमने
अपनी उंगली से थाम लिया
तेरे इस बुढ़ापे में माँ तेरी
लाठी मैं बन जाऊं
मुझको सहारा दिया था कभी तूने
तेरा सहारा मैं बन जाऊं हर दम
फिर भी न अहसान चुका पाऊं
चाहे ले लूं मैं कितने जनम

इस धरती पर ”माँ ”
ईश्वर का ही रूप है
कितने बदनसीब होते हैं वे
जो ढूंढते हैं ईश्वर तुझको
मंदिर, मस्जिद गुरूद्वारों में
अपने घर में झांक तो लें
वह मिलेगा तुझे माँ की छ…

अन्जू - अनुज नरवाल का भाषा सम्प्रेषण पर आलेख

भाषा सम्प्रेषण का एक लोकप्रिय माध्यम है। भाषा का प्रयोग लिखकर या बोलकर किया जाता है। रोजमर्रा के जीवन में ज्यादातर हम अपने विचारों का आदान-प्रदान बोलकर ही करते हैं। क्या कभी विचार किया है कि हमने बोलना कैसे सीखा ?

भाषा के बिना बोलना असंगत-सा प्रतीत होता है। प्रारम्भ से ही मनोवैज्ञानिकों की रूचि भाषा के विकास एवं कार्यों के अध्ययन में रही है। इनमें से कुछ मनोविज्ञानविदों ने अपने सिद्धान्तों के आधारों पर यह
बताने की कोशिश की है कि हम बोलना कैसे सीखते हैं? मनोवैज्ञानिकों का मत है कि भाषा का विकास शरीर से मात्रा एक अंग से नहीं बल्कि रसना (जीभ), दन्त,तालू और नाक के विकास पर निर्भर करता है। हम जब बाल्यावस्था में होते है तो हम अपने आप अपने वातावरण में उपलब्ध उद्दीपकों या बड़ों का अनुकरण कर के बोलना सीखते हैं। उद्दीपकों-अनुक्रिया के बीच साहचर्य हो जाने से भी हम बोलना सीखते हैं । उदाहरणार्थ किसी बच्चे को ‘सेब‘ दिखाकर बार-बार ‘सेब‘ शब्द का उच्चारण करेंगे तो बच्चे के मस्तिष्क में ‘सेब‘ की छवि अंकित हो जाती है और बच्चा ‘सेब‘ के अर्थ को समझने लगता है।

बोलना हमारे प्रारम्भिक विकास, अधिगम सिस्टम के पर…

संजय सेन सागर की कविताएं

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कुछ कविताएं

-संजय सेन सागर


बस इतनी सी इनायत

बस इतनी सी इनायत मुझ पर एक बार कीजिए
कभी आ के मेरे जख्मों का दीदार कीजिये ।

हो जाये बेगाने आप शौक से सनम
आप हैं आप ही रहेंगे एतबार कीजिए ।

पढ़ने बाले ही डर जाये देख कर उसे
किताबें दिल को इतना ना दागदार कीजिए ।

ना मजबूर कीजिये मैं उनको भूल जाउं
मुझे मेरी वफाओं का ना गुनाहगार कीजिए ।

इन जलते दियों को देखकर ना मुस्कुराइये
जरा हवाओं के चलने का इंतजार कीजिये ।

करना है इश्क आपसे , करते रहेंगे हम
जो भी करना है आपको मेरे सरकार कीजिये ।

फिर सपनों का आशियां बना लिया हमने
फिर आंघियों को आप खबरदार कीजिये ।

हमें न दिखाइये ये दौलत ,ये शोहरत
हम प्यार के भूखे हैं हमें बस प्यार कीजिये ।
...........

कब तक सताओगे तुम

कब तक सताओगे तुम , कब तक रूलाओगे
निकलने को है जॉ बताओ कब आओगे ।

गुजर जायेंगे हम तुझे य ही तन्हा छोड़कर
कहो साथ बिताये लम्हों को भुला पाओगे ।

ना यादों में नसीब होंगे ,ना ख़्यालों में आयेंगे
तेरे आंसू से नम मिट्टी में यूं ही महक जायेंगे।

खबर है हमें कि तू मुस्कुराता रहता है हर वक्त
मेरे खून से भीगे अपने दिल को जला पाओगे ।

अहसास है हमें की जाने वाला कभी नहीं आता
मेरे जाने के बाद…

सुशील कुमार की पुस्तक समीक्षा : शब्द और संस्कृति

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शब्द और संस्कृति'- हमारे समय, लोक और संस्कृति का अर्थपूर्ण अवगाहन
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डा. जीवन सिंह के अब तक के किये-धरे को लक्ष्य करके यह कहने में तनिक भी संशय न होगा कि उनकी आलोचना-दृष्टि सदैव लोक के पक्ष में, समय के सापेक्ष और जीवन-गतिकी के रचनात्मक क्रियाशीलनों से भासमान रही है जहाँ एकांगी, अधूरे, निष्कर्षमूलक, खंडित और वक्र विचारों को कभी 'स्पेस' नहीं मिली। उनकी आलोचना में विषय-वस्तु और विचार सहजता किंतु समग्रता से प्रवेश पाते हैं और एक उदार विकसित जीवन के पक्ष में बड़ी दृढ़ता और निष्पक्षता से अपनी बात पाठकों के समक्ष रखते हैं। यह उनकी आलोचना-विधा का एक विशेष गुण समझा जाना चाहिए जो पाठकों को पाठ के दरम्यान उस वितृष्णा और ऊब से उबारता है (जो प्रायः किसी गंभीर लेख के शास्त्रीयता और विचार-विथियों के अध्ययन-क्रम में अनुभवनीय होती है) और, पाठक लेख के अंत तक आलोच्य विषय-रस के आस्वादन में अपने को बँधे पाते हैं। कहना न होगा कि श्री सिंह आलोच्य-वस्तु के भीतर बड़े निस्पृह भाव से अपनी पैठ बनाते हैं, उसको गुनते और तरल बनाते हैं, फिर अपने मानसपत्र पर सोखकर हमारे समय, लोक और संस्कृति के निकष पर …

अनुज खरे का व्यंग्य : हमारे मिश्रा जी

व्यंग्य
एक ‘कला’ के पतन पर विमर्श

-अनुज खरे

लो वे धर लिए गए... अबे, कौन धर लिए गए एक उवाच।
वे ही तुम्हारे मिश्राजी... रामदुलारे... रिश्वत ले रहे थे। पची नहीं, लेते ही पुते हाथों धर लिए गए।
हे! भगवान देश का क्या होगा? समवेत चिरंतन चिंता की उच्चतान।
ऐसी घटनाओं पर सहज राष्ट्रीय एकता और सामान्य सामाजिकता के ट्रेलर आप हर कहीं गली-मोहल्लों में अक्सर देखते ही होंगे। सो, ऐसे ही किसी गली-मोहल्ले में बैठे विषय पर ‘थीसिस’ लिखते दो पात्र मुखातिब हैं।
सो, इसमें विशेष क्या है? भाईजान, अबकी बार पात्र प्रकटायमान है।

विशेष...! गुरु, विशेष है हमारे देश में ‘स्किल’ का इतना पतन। दूसरा पात्र भी फेड ऑफ से सीन में ‘इन’ हो रहा है।
अबे, इसमें काहै का ‘स्किल’, नासमझी भरा पारंपरिक पात्र क्रंदन।
‘स्किल’ ही तो है गुरु, हमारे इस महान देश में सदियों से लेन-देन की कला निरंतर प्रतिष्ठा को प्राप्त होती रही हो। वहां, ऐसे नासमझ, लेते ही पकड़ लिए जाने वाले दुष्ट, पातक, नर्क के भागी नहीं तो और क्या हैं। पात्र कुटिलता से सीन में स्थापित होने का प्रयत्न कर रहा है।

इतने भोले भंडारी हैं तो लेते क्यों हैं रिश्वत। नासमझ पात्र कुछ गुरु गं…

अनुज नरवाल रोहतकी के नज़्म, कविता व दोहे

कविताएं

-डॉ. अनुज नरवाल रोहतकी

नज्म
सागर में गिरा रहा हूं
आंख से अपनी इक आसूं
आंसू ये जब तक न मिलेगा
मेरा दिल करता रहेगा
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार
ये मन का सूरज मेरे यारा
करता रहेगा जब-तक उजियारा
रोशनी धड़कन में रहेगी जब-तक
करता रहूंगा यार मैं तब-तक
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार
गुल में रहेगी जब-तक खुशबू
चमकते रहेंगे जब-तक जुगनू
तब-तक तेरा बनकर मजनू
लेकर तेरे इश्क का जुनूं
हंसता रहेगा, करता रहेगा
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार
ये जमीं ये आस्मां है जब-तक
जमीं पर हवा रवां है जब-तक
तारों में रोशनी जब-तक है बाकी
जीवन जब-तक साथ है साथी
तेरा ये दीवाना करता रहेगा
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार
मौसम बदलते रहेंगे जब-तक
चाँद-सूरज निकलते रहेंगे जब-तक
बादलों में बूंदों का खजाना रहेगा
जब-तक बहारों का आना-जाना रहेगा
मेरा इश्क तुमपर मरता रहेगा
और ये दिल करता रहेगा
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार

....
जब भी तुम जन्मदिन बनाओ
याद करके उस दिन एक पेड़ लगाओ
वो पेड़ हमें ताजी हवा देगा
हमारे जीवन को बढ़ा देगा
जन्मदिन पर जो आएं मेहमान
खिलौने,चॉकलेट अगर लाएं मेहमान
उनको कहना, माफ करना श्रीमान
मुझको खिलौने या चॉकलेट नहीं चाहिए
मुझे केक या आमलेट …

राजेश कुमार पाटिल की कहानी : देव

कहानी

देव
-राजेश कुमार पाटिल

निर्मला, समय कितनी तेज गति से चलता है हम यह सोच ही नहीं पाते, वह न तो किसी के लिये ठहरता है न किसी के साथ चलता है, वह तो अपनी गति से निरंतर चलायमान रहता है । ह जीवन में सफलता के लिये हमें हर कदम उसके साथ चलना पड़ता है । देखो ना कल हमारे विवाह को तीस साल पूरे जाएंगे । अतीत की तरफ मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि जैसे यह कल की बात हो । इन तीस सालों में मैंने तुम्हें क्या दिया ऐसा कुछ खास तो मुझे दिखता नह है, किंतु तुमने मुझे इतना कुछ दिया है कि मैं उसकी गिनती नहीं कर सकता । हमारी शादी के बाद मेरे जीवन में कितने दुःख, कितनी मुसीबतें आईं, किंतु तुम हर परिस्थिति में मेरे साथ पूरी दृढ़ता से खड़ी रहीं । मेरी हर आशा, हर उम्मीद को तुमने यथार्थ का धरातल दिया है । बच्चों की अच्छी परवरिश, उनके अच्छे संस्कार, अच्छी शिक्षा, सास श्वसुर की सेवा, ननदों-देवरों की शादियाँ और क्या कुछ नहीं किया तुमने मेरे और मेरे परिवार के लिये । बीते सालों में मुझे ऐसी कोई घटना, ऐसी कोई बात या ऐसा कोई पल याद नहीं है, जब तुमने मेरे हृदय को ठेस पहुंचाई हो । हाँ मनोविनोदपूर्ण कई छोटी-छोटी नोंकझोंक…

उमेश कुमार गुप्ता का व्यंग्य : रोड इंसपेक्टर

व्यंग्य

रोड इंस्पेक्टर

- उमेश कुमार गुप्ता


रोड इंस्पेक्टर उर्फ सड़क छाप मजनूं, समाज के ऐसे चिर-परिचित जीव हैं, जिनसे सभी परिचित हैं। ये नेता, अभिनेता, गुन्डे, बदमाशों की तरह समाज के अनिवार्य तत्व हैं। इनके बिना समाज का पूर्ण निर्माण नहीं हो पाता है, क्योंकि इनके कारण ही नारी जाति से जुड़ी दहेज की तरह की समस्या , छेड़छाड़ का अस्तित्व, समाज में मौजूद रहता है जो किसी बुजुर्ग के आशीर्वाद की तरह दिन दूना रात चौगुनी दर से महंगाई की तरह बढती चली जा रही है। इससे घर की गृहणी हो , स्कूल-कालेज जाती छात्रा हो, दफ्तरों में काम करती प्रौढा हो, कोई भी नहीं बचा है। सभी को घर से बाहर निकलते ही रोड इंस्पेक्टर की छेड़छाड़ का शिकार होना पड़ता है।

रोड इंस्पेक्टर सुबह से लेकर रात तक बस एक ही काम छेड़छाड़ करते है। जिस दिन गलती से ये छेड़छाड़ नहीं कर पाते है।, उस दिन ये उपवास धारण कर लेते हैं, क्योंकि बिना छेड़छाड़ के इन्हें खाना नहीं पचता है। समाज में इन्हें तलाशने के लिए कोई विशेष चश्मा लगाने की जरूरत नहीं है। ये पॉप स्टार माइकल जैक्शन की तरह बाल बढाये, अपने शरीर की चौडाई के बराबर बैगी पेंट कम पैजामा प…

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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