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May 2008
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कहाँ खो गया कवि मतवारा

 

-बृजमोहन श्रीवास्तव

 

साहित्य और संस्कृति पर विविध प्रकार से प्रहार होता रहा है और वह निरंतर बढ़ता जा रहा है। अश्लील चित्रों ने संस्कृति पर और अश्लील भाषा ने साहित्य पर अपने प्रहार बढ़ा दिए हैं। व्यक्ति को वाक एवं लेखन की स्वतंत्रता है। जब स्वतंत्रता निरपेक्ष और दायित्वहीन हो जाती है तो स्वेच्छाचारिता हो जाती है। वहां यह बात ध्यान में नहीं रखी जाती है की यह स्वतंत्रता विधि सम्मत नहीं है। और किसी दूसरे की स्वतंत्रता में बाधक तो नहीं है। ज्ञान और भावों का भण्डार ,समाज का दर्पण। ज्ञान राशि का संचित कोष यदि मानव कल्याणकारी नहीं है तो उसे में साहित्य कैसे कहूं मेरी समझ से बाहर है। जीवन के सूक्ष्म और यथार्थ चिंतन सामाजिक चरित्र का प्रतिपादन करती रचनाओं पर प्रतिकूल या अश्लील टिप्पणियाँ कहाँ तक स्वागत योग्य है मेरी समझ से बाहर हैं ।

कितनी हास्यास्पद बात है एक सज्जन कह रहे थे की चाहे जमाने भर में साहित्य का स्तर गिर जाए हमारे जिले में नहीं गिर सकता पूछा क्यों ? तो बड़ी सादगी से बोले हमारे जिले में साहित्यकार कोई है ही नहीं। जहाँ तक में समझता हूँ आमतौर पर कवि छपने के लिए ही रचनाएं लिखता है। चाहता है कविता के साथ उसका नाम अखबार में छपे फोटो साथ में छपे तो और भी मज़ा। कवि सम्मेलनों में भी कवि चाहता है की उसका नाम पुकारा जाए मगर एक तो सबसे पहले नहीं और दूसरे किसी अच्छे कवि के बाद नहीं

आश्चर्य तब होता है जब कवि कविताएँ लिख कर गुमनाम हो जाता है। जमाना बडे शौक से सुन रहा था। हमीं खो गए दास्तान कहते कहते। हाँ कुछ रचनाएं गुमनाम जरूर होती हैं परन्तु वे होते हैं देवी देवताओं के नाम लिखे पत्र। उनमें पाने वाले का पता होता है और लेखक गुमनाम होता है। साथ ही प्रतिबंध होता है की अमुक मात्रा में पत्र की नकल भेजना अनिवार्य है। पत्र डालने पर अमुक फायदा और न डालने पर अमुक नुकसान होगा। फलां ने डाला तो लाटरी खुल गई और फलां ने नही डाला तो उसकी भैंस मर गयी। ऐसी रचनाओं से लेखक और पाठक के बीच कोई सुद्रढ़ सम्बन्ध निर्मित हों या विकसित हों इसके पूर्व ही लेखक गुम हो जाता है। साहित्य के द्वारा आत्मीय और आध्यात्मिक सम्बन्ध घनिष्ट हों तो आनंद की बात है। और यदि सम्बन्ध विकृत हों तो ?

जिस तरह किसी देश की राजनैतिक प्रणाली से भ्रष्टाचार के उन्मूलन में वहाँ की व्यवस्था असफल हो जाती है उसी तरह विद्रुप साहित्य के रचयिता को ढूंढने में जासूस तक असफल हो जाते हैं और साहित्यकार अपनी विद्रूपता का दर्शन जन मानस को करा ही देता है। और लोग हैं की विद्रूपता पसंद कर रहे हैं। जो अश्रेष्ठ है। जो अपरिमार्जित है ,वह लोगों की आत्मा को तृप्त कर रहा है और रचनाकार भ्रम में है की कीर्तिमानों की लम्बी श्रंखला में उसने एक कड़ी और जोड़ दी। अश्लील तुकबन्दी फूहड़ हास्य नेताओं को गलियां परोसकर कवि समझता है की उसने बडा तीर मार लिया। वाणी और स्वतंत्रता का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए। इजहारे ख्याल बुरा नहीं होता। उसकी अभिव्यक्ति ऐलानियाँ और खुल्लम खुल्ला की जा सकती है बशर्ते की ख्याल गरिमामय हो भाषा सुसंस्कृत और परिमार्जित हो बात दुशाले में लपेट कर भी कही जा सकती है

जोश मलीहाबादी ने कहा था की "अज्राह- ऐ- करम मुझ नीम जां को भी खबर कर दें ,अगर इस कूचागर्दी में कोई इंसान मिल जाए।

हमारे यहाँ की सुप्रसिद्ध शायरा अंजुम रहबर ने कहा है-

आदमी तो बहुत हैं जहाँ में ,ऐसा लगता है इंसान कम हैं।

इसी प्रकार मेरा भी यही कहना है की कवि तो बहुत हैं जहाँ में, ऐसा लगता है साहित्यकार कम हैं।

समीक्षा

abhilasha

काव्य संग्रह-‘‘अभिलाषा”

 

कवि - कृष्ण कुमार यादव

 

समीक्षक - डॉ. राम स्वरूप त्रिपाठी

 

व्यक्तिगत सम्बन्धों की कविता में सामाजिक सहानुभूति का मानस-संस्पर्श

मनुष्य को अपने व्यक्तिगत सम्बन्धों के साथ ही जीवन के विविध क्षेत्रों से प्राप्त हो रही अनुभूतियों का आत्मीकरण तथा उनका उपयुक्त शब्दों में भाव तथा चिन्तन के स्तर पर अभिव्यक्तीकरण ही वर्तमान कविता का आधार है। जगत के नाना रूपों और व्यापारों में जब मनीषी को नैसर्गिक सौन्दर्य के दर्शन होते हैं तथा जब मनोकांक्षाओं के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करने में एकात्मकता का अनुभव होता है, तभी यह सामंजस्य सजीवता के साथ समकालीन सृजन का साक्षी बन पाता है। युवा कवि एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने अपने प्रथम काव्य संग्रह ‘‘अभिलाषा” में अपने बहुरूपात्मक सृजन में प्रकृति के अपार क्षेत्रों में विस्तारित आलंबनों को विषयवस्तु के रूप में प्राप्त करके ह्नदय और मस्तिष्क की रसात्मकता से कविता के अनेक रूप बिम्बों में संजोने का प्रयत्न किया है। “अभिलाषा” का संज्ञक संकलन संस्कारवान कवि का इन्हीं विशेषताओं से युक्त कवि कर्म है, जिसमें व्यक्तिगत सम्बन्धों, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक समस्याओं और विषमताओं तथा जीवन मूल्यों के साथ हो रहे पीढि़यों के अतीत और वर्तमान के टकरावों और प्रकृति के साथ पर्यावरणीय विक्षोभों का खुलकर भावात्मक अर्थ शब्दों में अनुगुंजित हुआ है। परा और अपरा जीवन दर्शन, विश्व बोध तथा विद्वान बोध से उपजी अनुभूतियों ने भी कवि को अनेक रूपों में उद्वेलित किया है। इन उद्वेलनों में जीवन सौन्दर्य के सार्थक और सजीव चित्र शब्दों में अर्थ पा सके हैं।

संकलन की पहली कविता है- “माँ” के ममत्व भरे भाव की नितान्त स्नेहिल अभिव्यक्ति। जिसमें ममता की अनुभूति का पवित्र भाव-वात्सल्य, प्यार और दुलार के विविध रूपों में कथन की मर्मस्पर्शी भंगिमा के साथ कथ्य को सीधे-सीधे पाठक तक संप्रेषित करने का प्रयत्न बनाया है। शब्द जो अभिधात्मक शैली में कुछ कह रहे हैं वह बहुत स्पष्ट अर्थान्विति के परिचायक हैं, परन्तु भावात्मकता का केन्द्र बिन्दु व्यंजना की अंतश्चेतना संभूत व आत्मीयता का मानवी मनोविज्ञान बनकर उभरा है। गोद में बच्चे को लेकर शुभ की आकांक्षी माँ बुरी नजर से बचाने के लिये काजल का टीका लगाती है, बाँह में ताबीज बाँधती है, स्कूल जा रहे बच्चे की भूख-प्यास स्वयं में अनुभव करती है, पड़ोसी बच्चों से लड़कर आये बच्चे को आँचल में छिपाती है, दूल्हा बने बच्चे को भाव में देखती है, कल्पना के संसार में शहनाईयों की गूँज सुनती है, बहू को सौंपती हुई माँ भावुक हो उठती है। नाजों से पाले अपने लाड़ले को जीवन धन सौंपती हुई माँ के अश्रु, करूणा विगलित स्नेह और अनुराग के मोती बनकर लुढ़क पड़ते हैं। कवि का ‘माँ” के प्रति भाव अभ्यर्थना और अभ्यर्चना बनकर कविता का शाश्वत शब्द सौन्दर्य बन जाता है।

कृष्ण कुमार यादव का संवेदनशील मन अनुमान और प्रत्यक्ष की जीवन स्मृतियों का जागृत भाव लोक है, जहाँ माँ अनेक रूपों में प्रकट होती है। कभी पत्र में उत्कीर्ण होकर, तो कभी यादों के झरोखों से झांकती हुई बचपन से आज तक की उपलब्धियों के बीच एक सफल पुत्र को आशीर्वाद देती हुई। किसी निराश्रिता, अभाव ग्रस्त, क्षुधित माँ और सन्तति की काया को भी कवि की लेखनी का स्पर्श मिला है, जहाँ मजबूरी में छिपी निरीहता को भूखी कामुक निगाहों के स्वार्थी संसार के बीच अर्धअनावृत आँचल से दूध पिलाती मानवी को अमानवीय नजरों का सामना करना पड़ रहा है। माँ के विविध रूपों को भावों के अनेक स्तरों पर अंकित होते देखना और कविता को शब्द देना आदर्श और यथार्थ की अनुभूतियों का दिल में उतरने वाला शब्द बोध है।

नारी का प्रेयसी रूप सुकोमल अनुभूतियों से होकर जब भाव भरे ह्नदय के नेह-नीर में रूपायित होता है तब स्पर्श का सुमधुर कंकड़ किस प्रकार तरंगायित कर देता है, ज्योत्सना स्नान प्रेम की सुविस्तारित रति-रजनी के आगोश में बैठे खामोश अंर्तमिलन के क्षणों को इन पंक्तियों में देखें-रात का पहर/जब मैं झील किनारे/ बैठा होता हूँ/चाँद झील में उतर कर/नहा रहा होता है/कुछ देर बाद/चाँद के साथ/एक और चेहरा/मिल जाता है/वह शायद तुम्हारा है/पता नहीं क्यों/ बार-बार होता है ऐसा/मैं नहीं समझ पाता/सामने तुम नहा रही हो या चाँद/आखिरकार झील में/एक कंकड़ फेंककर/खामोशी से मैं/ वहाँ से चला आता हूँ।

तलाश, तुम्हें जीता हूँ, तुम्हारी खामोशी, बेवफा, प्रेयसी, तितलियाँ, प्रेम, कुँवारी किरणें, शीर्षक कवितायें जिन वैयक्तिक भावनाओं की मांसल अभिव्यक्तियों को अंगडा़इयों में उमंग से भरकर दिल के झरोखों से झाँकती संयोग और वियोग की रसात्मकता का इजहार करती हैं, वह गहरी सांसों के बीच उठती गिरती जन्म-जन्म से प्यासी प्रीति पयस्विनी के तट पर बैठे युगल की ह्नदयस्पन्दों में सुनी जाने वाली शरीर की खुशबू और छुअन का स्मृति-स्फीत संसार है। इनमें आंगिक चेष्टाओं और ऐन्द्रिक आस्वादनों की सौन्दर्यमयी कल्पना का कलात्मक प्रणयन ह्नदयवान रसज्ञों के लिये रसायन बन सकता है। ‘प्रेयसी’ उपखण्ड की इन कविताओं में सुकोमल वृत्तियों की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हो सकती हैं- सूरज के किरणों की/पहली छुअन/ थोड़ी अल्हड़-सी/ शर्मायी हुई, सकुचाई हुई/ कमरे में कदम रखती है/वही किरण अपने तेज व अनुराग से/वज्र पत्थर को भी/पिघला जाती है/शाम होते ही ढलने लगती हैं किरणें/जैसे कि अपना सारा निचोड़/ उन्होंने धरती को दे दिया हो/ठीक ऐसे ही तुम हो।

जीवन प्रभात से प्रारम्भ होकर विकास, वयस्कता, प्रौढ़ता और वार्धक्य की अवस्थाओं को लांघती कविता की गम्भीर ध्वनि मादकता के उन्माद को जीवन सत्य का दर्शन कराने में सक्षम भी हो जाती है। नारी के स्त्रीत्व को मातृत्व और प्रेयसी रूपों से आगे बढ़ाता हुआ कवि, शोषण, उत्पीड़न, अनाचार, अन्याय के पर्याय बन चुके संदेश से दलित व अबला जीवन से भी साक्षात्कार कराता है, जहाँ महीयसी की महिमा, खंड-खंड हो रही भोग्या बनकर देह बन जाती है। स्त्री विमर्श की इन कविताओं में सामाजिक और वैयक्तिक विचारणा की अनेक संभावनाओं से साक्षात्कार करता कवि भाव और विचार में पूज्या पर हो रहे अनन्त अत्याचारों का पर्दाफाश करता है। बहू को जलाना, हवस का शिकार होना तथा “वो” बन कर सड़क के किनारे अधनंगी, पागल और बेचारी बनी बेचारगी क्या कुछ नहीं कह जाती, जो इन कविताओं में बेटी और बहू के रूप में कर्तव्यों की गठरी लादे जीवन की डगर पर अर्थहीन कदमों से जीने को विवश हो जाती है। स्त्री विमर्श का यथार्थ, दलित चेतना की सोच इन कविताओं में वर्तमान का सत्य बन कर उभरी हैं।

ईश्वर की कल्पना मनुष्य को जब मिली होगी, उसे आशा का आस्थावन विश्वास भी मिला होगा। कृष्ण कुमार यादव ने भी ईश्वर के भाव रूप को सर्वात्मा का विकास माना है। उनका मानना है कि धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर घरौंदों का निर्माण न तो उस अनन्त की आराधना है, और न ही इनमें उसका निवास है। कवि ने ईश्वर के लिए लिखा है-मैं किसी मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारे में नहीं/मैं किसी कर्मकाण्ड और चढ़ावे का भूखा नहीं/नहीं चाहिए मुझे तुम्हारा ये सब कुछ/मैं सत्य में हूँ, सौन्दर्य में हूं, कर्तव्य में हूं /परोपकार में हूँ, अहिंसा में हूँ, हर जीव में हूँ/अपने अन्दर झांको, मैं तुममें भी हूँ/फिर क्यों लड़ते हो तुम/बाहर कहीं ढूँढते हुए मुझे। कवि ईश्वर की खोज करता है अनेक प्रतीकों में, अनेक आस्थाओं में और अपने अन्दर भी। वह भिखमंगों के ईश्वर को भी देखता है और भक्तों को भिखमंगा होते भी देखता है, बच्चों के भगवान से मिलता है और स्वर्ग-नरक की कल्पनाओं से डरते-डराते मन के अंधेरों में भटकते इन्सानों की भावनाओं में भी खोजता है।

बालश्रम, बालशोषण और बाल मनोविज्ञान को “अभिलाषा” की कविताओं में जिन शीर्षकों में अभिव्यक्त किया गया है, उनमें प्रमुख हैं-अखबार की कतरनें, जामुन का पेड़, बच्चे की निगाह, वो अपने, आत्मा, बच्चा और मनुष्य तथा बचपन। इन रचनाओं में बाल मन की जिज्ञासा, आक्रोश, आतंक, मासूमियत, प्रकृति, पर्यावरण आदि का मनुष्य के साथ, पेड़-पौधों के साथ व जीव-जन्तुओं के साथ निकट सम्बन्ध आत्मीयता की कल्पना को साकार करते हुए, अतीत और वर्तमान की स्थितियों से तुलना करते हुए, आगे आने वाले कल की तस्वीर के साथ व्यक्त किया गया है। बहुधा जीवन और कर्तव्य बोध से अनुप्राणित इस खण्ड की कविताओं में कवि ने बच्चे की निगाह में बूढ़े चाचा को भीख का कटोरा लिए हुए भी दिखाया है और हुड़दंग मचाते जामुन के पेड़ तथा मिट्टी की सोधी गंध में मौज-मस्ती करते भी स्मृति के कोटरों में छिपी अतीत की तस्वीर से निकालकर प्रस्तुत करते पाया है। बच्चों के निश्छल मन पर छल की छाया का स्वार्थी प्रपंच किस प्रकार हावी होता है और झूठे प्रलोभन व अहंकार के वशीभूत हुए लोग उन्हें भय का भूत दिखाते हैं और जीवन भर के लिये कुरीतियों का गुलाम बना देते हैं, यह भी इन कविताओं में दृष्टव्य हुआ है।

मन के एकांत में जीवन की गहन चेतना के गम्भीर स्वर समाहित होते हैं। जब मनुष्य आत्मदर्शी होकर प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करता है, तब संसार के हलचल भरे माहौल से अलग, उसे मखमली घास और पेड़ों के हरित संसार में रची-बसी अलौकिक सुन्दरता का दर्शन होता है और चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देती है। वह मन की खिड़की खोल कर देखता है तभी उसे अपने अस्तित्व के दर्शन होते हैं। अकेलेपन का अहसास कराती नीरवता, मानव जीवन की हकीकत, बचपन से जवानी और बुढ़ापे तक का सफर अनेक आशाओं और निराशाओं का अंधेरा और उजाला नजर आने लगता है अकेलेपन में। इस प्रकार की कविताएं भी इस संकलन की विशेषता हैं।

वर्तमान समय की ग्राम्य और नगर जीवन स्थितियों में पनप रही आपा-धापी का टिक-टिक-टिक शीर्षक से कार्यालयी दिनचर्या, अधिकारी और कर्मचारी की जीवन दशायें, फाइलें, सुविधा शुल्क तथा फर्ज अदायगी शीर्षकों में निजी अनुभव और दैनिक क्रियाकलापों का स्वानुभूत प्रस्तुत किया गया है। प्रकृति के साथ भी कवि का साक्षात्कार हुआ है-पचमढ़ी, बादल, नया जीवन तथा प्रकृति के नियम शीर्षकों में। इनमें मनुष्य के भाव लोक को आनुभूतिक उद्दीपन प्रदान करती प्रकृति और पर्यावरण की सुखद स्मृतियों को प्रकृतस्थ होकर जीवन के साथ-साथ जिया गया है।

नैतिकता और जीवन मूल्य कवि के संस्कारों में रचे बसे लगते हैं। उसे अंगुलिमाल के रूप में अत्याचारी व अनाचारी का दुश्चरित्र-चित्र भी याद आता और बुद्ध तथा गाँधी का जगत में आदर्श निष्पादन तथा क्षमा, दया, सहानुभूति का मानव धर्म को अनुप्राणित करता चारित्रिक आदर्श भी नहीं भूलता। वर्तमान समय में मनुष्य की सद्वृत्तियों को छल, दंभ, द्वेष, पाखण्ड और झूठ ने कितना ढक लिया है, यह किसी से छिपा नहीं है। इन मानव मूल्यों के अवमूल्यन को कवि ने शब्दों में कविता का रूप दिया है।

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कृष्ण कुमार यादव ने “अभिलाषा” में कविता को वस्तुमत्ता तथा समग्रता के बोध से साधारण को भी असाधारण के अहसास से यथार्थ दृष्टि प्रदान की है, जो प्रगतिशीलता चेतना की आधुनिकता बोध से युक्त चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब है। इसमें कवि मन भी है ओर जन मन भी। मनुष्य इस संसार में सामाजिकता की सीमाओं में अकेला नहीं रहता। उसके साथ समाज रहता है, अतः अपने सम्पर्कों से मिली अनुभूति का आभ्यन्तरीकरण करते हुए कवि ने अपनी भावना की संवेदनात्मकता को विवेकजन्य पहचान भी प्रदान की है। रूढ़ि और मौलिकता के प्रश्नों से ऊपर उठकर जब हम इन कविताओं को देखते हैं तो लगता है कि सहज मन की सहज अनुभूतियों को कवि ने सहज रूप से सामयिक-साहित्यिक सन्दर्भों से युग-बोध भी प्रदान करने का प्रयास किया है। दायित्व-बोध और कवि कर्म में पांडित्य प्रदर्शन का कोई भाव नहीं है, फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि विचार को भाव के ऊपर विजय मिली है। कविता समकालीन लेखन और सृजन के समसामयिक बोध की परिणति है सो ‘‘अभिलाषा” की रचनाएँ भी इस तथ्य से अछूती नहीं हैं।

भाषा और शब्द भी आज के लेखन में अपनी पहचान बदल रहे हैं। वह “वो” हो गया है, वे और उन का स्थान भी तद्भव रूपों ने ले लिया है। श्री यादव ने भी अनेक शब्दों के व्याकरणीय रूपों का आधुनिकीकरण किया है।

वैश्विक जीवन दृष्टि, आधुनिकता बोध तथा सामाजिक सन्दर्भों को विविधता के अनेक स्तरों पर समेटे प्रस्तुत संकलन के अध्ययन से आभासित होता है कि श्री कृष्ण कुमार यादव को विपुल साहित्यिक ऊर्जा सम्पन्न कवि ह्रदय प्राप्त है, जिससे वह हिन्दी भाषा के वांगमय को स्मृति प्रदान करेंगे।

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समालोच्य कृति- अभिलाषा (काव्य संग्रह)

k k yadav

(कवि- कृष्ण कुमार यादव)

 kkyadav.y@rediffmail.com

प्रकाशक- शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर

पृष्ठ- 144, मूल्य- 160 रुपये

समीक्षक- डा0 राम स्वरूप त्रिपाठी पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, डी0ए0वी0 कालेज, कानपुर

कविताएं

k k yadav

-कृष्ण कुमार यादव

 

आटा की चक्की

गाँव की एक अनपढ़ महिला

ने मुझसे पूछा

सुना है, अमरीका ने

आटा चक्की को पेटेंट

करा लिया है

बेटा, इससे क्या होता है?

मैंने बताया

देखो अम्मा

अब हमें आटा चक्की

खोलने से पहले

उनकी इजाजत लेनी होगी।

वह भड़क गई

ऐसा कैसे हो सकता है

यह तो हमारे पुरखों की अमानत है।

मैंने सोचा,

गाँव की एक अनपढ़

महिला भी यह सोचती है

पर पता नहीं ऊपर बैठे

पढ़े-लिखों को कब चेत आयेगा।

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ये इंसान

यह कैसा देश है

जहाँ लोग लड़ते हैं मजहब की आड़ में

नफरत के लिए

पर नहीं लड़ता कोई मोहब्बत की खातिर

दूसरों के घरों को जलाकर

आग तापने वाले भी हैं

पर किसी को खुद के जलते

घर को देखने की फुर्सत नहीं

एक वो भी हैं जो खुद को जलाकर

दूसरों को रोशनी देते हैं

पर नफरत है उन्हें उस रोशनी से भी

कहीं इस रोशनी में उनका चेहरा न दिख जाये

फिर भी वे अपने को इंसान कहते हैं

पर उन्हें इंसानियत का पैमाना ही नहीं पता

डरते हैं वे अपने अंदर के इंसान को देखने से

कहीं यह उनको ही न जला दे।

 

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जीवन वृत्त

नाम : कृष्ण कुमार यादव

जन्म : 10 अगस्त 1977, तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0)

शिक्षा : एम0 ए0 (राजनीति शास्त्र), इलाहाबाद विश्वविद्यालय

विधा : कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, व्यंग्य, बाल कविताएं इत्यादि

प्रकाशन : देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। विभिन्न स्तरीय संकलनों और वेब पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन।

प्रसारण : आकाशवाणी लखनऊ से कविताओं का प्रसारण।

कृतियाँ : अभिलाषा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट-150 ग्लोरियस इयर्स (अंगे्रजी-2006), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह-2007), क्रान्ति यज्ञ : 1857-1947 की गाथा (2007)। बाल कविताओं का एक संकलन और कहानियों का एक संकलन प्रकाशन हेतु प्रेस में।

सम्मान : विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा सोहनलाल द्विवेदी सम्मान, कविवर मैथिलीशारण गुप्त सम्मान, महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, काव्य गौरव, राष्ट्रभाषा आचार्य, साहित्य मनीषी सम्मान, साहित्यगौरव, काव्य मर्मज्ञ, अभिव्यक्ति सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान और भारती-रत्न से अलंकृत। बाल साहित्य में योगदान हेतु भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा सम्मानित।

विशेष : सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित लोकप्रिय पत्रिका बाल साहित्य समीक्षा एवं इलाहाबाद से प्रकाशित कविता आधारित पत्रिका गुफ्तगू द्वारा कृतित्व पर विशोषांक प्रकाशित।

साहित्य सम्पर्क पत्रिका में सम्पादन सहयोग एवं विभिन्न स्मारिकाओं का सम्पादन।

अभिरूचियाँ : सामाजिक व साहित्यिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी, रचनात्मक लेखन व अध्ययन, बौद्धिक चर्चाओं में भाग लेना, डाक टिकटों का संग्रह।

सम्पर्क : कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर-208001

ई-मेलः kkyadav.y@rediffmail.com

कविताएं

-आकांक्षा यादव

akansha yadav

श्मशान

कंक्रीटों के जंगल में

गूँज उठते हैं सायरन

शुरू हो जाता है

बुल्डोजरों का ताण्डव

खाकी वर्दियों के बीच

दहशतजदा लोग

निहारते हैं याचक मुद्रा में

और दुहायी देते हैं

जीवन भर की कमाई का

बच्चों के भविष्य का

पर नहीं सुनता कोई उनकी

ठीक वैसे ही

जैसे श्मशान में

चैनलों पर लाइव कवरेज होता है

लोगों की गृहस्थियों के

श्मशान में बदलने का।

--------.

सिमटता आदमी

सिमट रहा है आदमी

हर रोज अपने में

भूल जाता है भावनाओं की कद्र

हर नयी सुविधा और तकनीक

घर में सजाने के चक्कर में

देखता है दुनिया को

टी० वी० चैनल की निगाहों से

महसूस करता है फूलों की खुशबू

कागजी फूलों में

पर नहीं देखता

पास-पडोस का समाज

कैद कर दिया है

बेटे को भी

चहरदीवारियों में

भागने लगा है समाज से

चौंक उठता है

कॉलबेल की हर आवाज पर

मानो

खड़ी हो गयी हो

कोई अवांछित वस्तु

दरवाजे पर आकर।

---

रचनाकारा परिचय:

जीवन-परिचय

नाम-            आकांक्षा यादव

जन्म -                   ३० जुलाई १९८२, सैदपुर, गाजीपुर (उ० प्र०)

शिक्षा-                 एम० ए० (संस्कृत)

विधा-            कविता और लेख

                 
प्रकाशन-          देष की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। वेब-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। विभिन्न काव्य संकलनों में कविताओं का प्रकाशन।

                   
सम्पादन-         ‘‘क्रान्ति यज्ञ : १८५७-१९४७ की गाथा‘‘ पुस्तक में सम्पादन सहयोग।
सम्मान-           विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा साहित्य गौरव, साहित्य श्री, साहित्य रत्न से सम्मानित।
     राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘ एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा
     ’’वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान’’ से अलंकृत।
अभिरूचियाँ-    रचनात्मक अध्ययन व लेखन।नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक समस्याओं सम्बन्धी विषय में विशेष रूचि

सम्प्रति-         प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज, नरवल, कानपुर (उ०प्र०)-२०९४०१

                          
सम्पर्क-             आकांक्षा यादव, पत्नी-श्री कृश्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिश्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर

 

kk_akanksha@yahoo.com

यादें

saquib 29 (WinCE)

-साक़िब अहमद

 

तुम्हारी कुछ यादें,

दिल में आती जाती हैं.

बातें, तुम्हारी प्यारी प्यारी बातें,

यादें बन कर दिल को तड़पाती हैं.

तुम्हारी आखों की वो शरारत,

तुम्हारी प्यारी सी मुस्कुराहट,

मुझसे मिल कर तुम्हारा वो मचलना,

आंखों आंखों वक्त गुजरना,

मुझको हर पल की याद आती है.

यादें बन दिल को तड़पाती हैं.

हमने साथ गुजारे थे जो पल,

खायी थी प्यार भरी जो कसमें,

थाम कर हाथ, हाथ में हमने,

किये थे साथ निभाने के जो वादे,

उन कसमों वादों की याद आती है.

यादें बन दिल को तड़पाती हैं.

क्यूं तुम मुझसे दूर चली गयी,

क्यूं मुझको तन्हा छोड़ चली गयी.

......

‘बेजान फूल’

जब आखिरी बार,

मैंने देखा था तुम्हें.

तुम कितनी मासूम लग रही थी.

तुम्हारा संदली चेहरा,

जैसे हरसिंगार का फूल,

जो, सूरज की पहली किरण पड़ते ही,

साख से जुदा हो कर,

जमीन पर आ गिरा हो.

खामोश, बेजान फूल.

..........

मगर

तन्हा मुझको छोड़ कर,

तुम चली तो गई,

मगर, तुम भी मेरी ही तरह,

तड़पती होगी.

एक मजबूरी, एक बेचैनी,

साथ तुम्हारे भी तो होगी.

पास मेरे हर पल,

साया बन रहती तुम होगी.

मेरी तन्हाई, मेरी खामोशी,

तुझसे कुछ कहती तो होगी.

.....

गम

जाऊं कहा मैं,

गम से घबरा कर.

यह गम तो,

सौंपी हुई तुम्हारी,

विरासत है मुझको.

हजार कोशिशें कर भी लूं लेकिन,

दिल है मेरा कि,

बहलता नहीं है.

मेरी जिंदगी तो,

सिर्फ तुम्हारे लिए ही थी.

तुम ही थी मेरी मसीहा.

तन्हा मुझे छोड़ कर,

तुम चली तो गयी मगर,

अभी तक ढूंढ़ती हैं तुम्हें मेरी निगाहें,

अभी तक तुम्हारी,

सिर्फ तुम्हारी जरूरत है मुझको.

-------------.

 

संपर्क-

साक़िब अहमद

सी@1447@5, इंदिरा नगर, लखनऊ.

ई मेल - saquibdilse@gmail.com

budget cartoon

बजट : ए टेलीफिल्म

ये अपुन का बजट है मामू

-- अनुज खरे

 

समयावधि : अनंतकाल तक कभी भी देख लें।

वैधानिक चेतावनी : ढेर सारे सास-बहूनुमा सीरियलों से अघाए धैर्यशील प्राणियों के लिए बिल्कुल नया रियलटी शो पेश है। पात्रों का चयन देश-काल की सीमा से परे जाकर किया गया है। पात्रों की वर्तमान देश के निवासियों से संरचनात्मक एकरूपता दुर्योगमात्र है।

सूत्रधार-संदेश (अर्थात् ब्रीफ में चल क्या रहा है की जानकारी) : बजट पेश किए जाने की बेला है। कब के मुक्त को प्राप्त हो चुके एक पुरातनकालीन महानुभाव धरा पर गमन कर रहे हैं। दिल्ली में विचरण करते हुए उनकी मुलाकात मुंबइया किस्म के एक मनुष्य से हो जाती है। बजट उर्फ वित्तीय खरीते पर उनकी निश्छल जिज्ञासाएं और टपोरी बीडू (नाम अपनी सुविधा से आप चाहे टीटी उर्फ टपोरी टाइप रख लें) के सहज भाईनुमासमाधानों के टकराने का प्रसंग संसद के नेपथ्य में तैयार है। संवाद प्रारंभ होने को आतुर है।

अतैव, रिमोट छोडें दृश्य पर ध्यान दें।

अहा! कैसा शुभ प्रसंग है। मनुष्य मात्र की चिंताओं के निवारणार्थ एक ज्ञानी कितना बुद्धि-वाणी श्रम कर रहा है? वंदनीय! दृश्य दृष्टिगोचर है।

टीटी उर्फ टपोरीटाइप : ऐ... बोले तो भाषा की दुकान! ईजी वर्ड बोलने का, हमारे फाइनेंस मिनिस्टर भाईहैं। अभी आंकडों के वोल्डर तेरेइच्च सिर पे मारेगा। तू अपनी चिंता भी भूल जाएगा बीडू।

महानुभावः लेकिन बंधु, ये इतने सारे प्रियजन कितना रस लेकर इनकी भाषण कला में निमग्न हैं।

टीटी : तू ऐडा है क्या? आंखों का शटर खोल निमग्ननहीं देख, सो रहे हैं। आंकडेबाजी के जाल में तडप रहे हैं, मछली के माफिक। बोले तो बाप भोत डेंजर बात बोल रहा है। तू कानों में अंगुली ठूंस, कल्टी कर यहां से ।

महानुभाव : ओह कैसा अप्रिय विलाप है आपका। इनके व क्तव्य में बीच-बीच में अन्न-आवास, रथ-ईंधन इत्यादि वस्तुओं की ध्वनि कर्णपटल की ओर चलायमान है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि यह मनुष्यमात्र का चिंतक, उसकी आवश्यकताओं का सचेतक, धरा पर मानव कल्याण को समर्पित मनीषी दीख पडता है।

टीटीः अबे पुराने जमाने का नया सामान तूने आज तक कोई सिंपल बातें नईं बोली क्या? भाई जो बता रैला है उस पे मत जा। ये इस जेब से देता है दूसरी से निकालता है। भोत टैम से ये हो रहा है। बोले तो लोग वहींच्च हैं, सरकारी आदमी बोत आगे बढ गयेला है। डेमोक्रेसी के फंडे नईंना जानता तू... जनता डंप, कार में अफसर। अपुन की तो यहीच्च डेफिनिशनहै। अब तू बता किस जुगाड में यहां फिरैला है?

महानुभाव : आप तो सदेच्छाओं के प्रति निष्ठुर व्यक्त जान पडते हैं? ये कितनी निपुणता से धन का राष्ट्रवासियों की भलाई में उपयोग किए जाने की तत्परता दिखा रहे हैं। आप मिथ्या वक्तव्य दे रहे हैं?

टीटी : तू समझेगा इच्च नईं, बाप। मिथ्या नईं मत्था तो तेरा फिरैला है। तू कहीं खानों में रहता है क्या? समझा, ‘फाइनेंस भाईतो मूनिसपिल्टी टाइप काम करता है। अच्छा-अच्छा देता है, तो फौरन ही टैक्स की टंगडी मार देता है। ये मुंबई की बारिश नहीं बीडू कि जब चाहे नहा लिया, ये तो सरकारी नल है इदर पानी ले, उदर जेब ढीली कर। अबी समझा कि नाईं कि तेरे कान के नीचे बजाकर तेरी आत्मा का दरवाजा भडभडा दूं।

महानुभाव : बंधुवर, विचार तो आफ उचित ही प्रतीत हो रहे हैं। यदि अपना देय-पण्यसमय पर नहीं निस्तारित करेंगे, तो समुचित विकास होगा भला।

टीटी : अबे तू तो ज्ञानी जैसा दिखरेला है बाप, जनता की पॉकिट से माल निकल जाता है। बोले तो वो तो गरीबीइच्च ही रैती है, पन चांद की बुझी चांदनी तूने कबी थिंकिंग किएला कि ये अमीर और अमीर कैसे होता जा रहैला है। बीडू अपुन का भेजा तो इसी टेंशन में आदा घिस गयेला है। ऐसेइच्च चलेगा तो अपुन खाएगा-पिएला किदर से । सोचा तूने, कबी झोपडपट्टी देखी है क्या? एकबार देख ले ये भारी शब्दों की टोकरी सर से गिर जाएगी तेरी। तू यहां से सरपट हो लेगा।

महानुभाव : आपने मेरी कई जिज्ञासाओं का हल किया। अब आपसे अंतिम समाधान हेतु मन उत्कंठित है?

टीटी : बोल न, प्यारे तू कुछ बी पूछ

महानुभाव : जब जीवन प्रवाह इतना विपरीत दिशा में प्रवाहमान है तो क्यों लोग यहां निवासित हैं? बेहतर जीवन की प्रत्याशा में क्यों नहीं पलायन का प्रयत्न करते?

टीटी : अपुन का देश है बीडू, अपुन का। भाइयों को छोडकर किदरीइच्च रहेगा। दिल में रखते हैं दिल में। सहलेंगे पन किदरीइच्च नईं जाने का।

महानुभाव : वंदन श्रीमान् आपकी सदेच्छाएं चहुंदिशा में विस्तारित हों। अच्छा अब विदाई दो मित्र, शुभकामनाएं।

सूत्रधार का पुनः प्रकटन : देखा आपने सदेच्छाओं पर ही बेहतर कल की नींव बनाई जा सकती है। उफ! ज्ञान तो वे दे गए मैं क्यों ट्राई मार रहा हूं। खैर, वे दोनों तो गमनायितहो गए। आप भी दूरस्थ यंत्र को कष्ट दें टीवी बंद करें, ताकि मैं भी अपना मजमा कहीं लगाऊं।

जय बजट-जय भारत।

(सौजन्य दैनिक भास्कर)

आलेख

निर्बलता

 

-अशोक कुमार वशिष्ट

 

ज्ञानी कहते हैं कि प्रभु आनंद है। वे प्रभु को परमानंद कहते हैं।हम उस परमानंद के अंश हैं। और हम भी आनंद हैं। लेकिन हम अपने आनंद को भूल गए हैं। हमने अपना आनंद खो दिया है। इसीलिए हर मानव की कोशिश होती है कि वह आनंद को प्राप्त करे। चाहे वह आनंद खाने से मिले‚ पीने से मिले‚ सोने से मिले‚ खेल कूद से मिले‚ संगीत से मिले‚ भोग से मिले या फिर योग से मिले,,,,,। बच्चे से लेकर बूढ़े तक की यही कोशिश होती है। हां‚ बुद्धि का स्तर अलग अलग होने से‚ हर मानव का आनंद प्राप्त करने का ढंग अलग अलग होता है। कोई गलत तरीके से पाता है तो कोई सही तरीके से। कोई कम पाता है तो कोई अधिक पाता है। लेकिन हर प्राणी का उद्देश्य एक ही होता है। चाहे वह किसी भी देश या धर्म का हो। चाहे वह किसी भी जाति का हो। चाहे वह कोई भी भाषा बोलने वाला हो। वह आनंद‚ आनंद और सिर्फ आनंद ही चाहता है।

जिस तरह कहीं पहुंचने के लिए‚ उस स्थान का पता जानना जरूरी होता है‚ तभी वहां पहुंचा जा सकता है। हर मंजिल तक जाने के लिए कोई रास्ता अवश्य होता है। नहीं तो मानव भटक भी सकता है। उसी तरह आनंद प्राप्ति के लिए भी सही और उचित रास्ते का पता होना जरूरी है। लेकिन ज्ञान के अभाव के कारण जीव आनंद की जगह‚ दु:खों के पीछे भागने लगता है। वह दु:ख को आनंद समझ लेता है और अपने जीवन को उसी में गर्क कर देता है। जब उसे इसका अहसास होता है कि उसका रास्ता गलत है और वह बहुत दूर आ चुका है तो वह बहुत पछताता है। वह वहां से निकलने‚ भागने का भरसक प्रयास करता है। लेकिन उस समय उसके पास विवशता और आंसुओं के सिवा कुछ नहीं होता। तड़पने और कष्ट सहने के सिवा कुछ नहीं होता। अपनी हार और पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं होता। जब उसे यह ज्ञात होता है कि अब उसके पास जीवन नहीं बचा। आयु नहीं बची। और न ही शक्ति और हिम्मत बची है। उस समय उसकी क्या हालत होती है‚ ये तो बस वही जानता है। उस समय वह स्वयं को प्रभु के प्रति समर्पित कर देता है और प्रभु से प्रार्थना करता है कि‚ हे प्रभु मुझे शक्ति दे‚ हिम्मत दे और बुद्धि दे‚ ताकि मैं सही रास्ते पर चल सकूं और आनंद को पा सकूं‚ तुझे पा सकूं। प्रार्थनाओं में चाहे लाख असर हो‚ लेकिन इस सॄष्टि का एक नियम है। जीवन का एक नियम है। और उस नियम का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। उस नियम के अनुसार‚ हर जीव की एक आयु होती है। और अपनी आयु से अधिक कोई भी जी नहीं सकता। हर जीव को अपनी अपनी आयु के अनुसार‚ इस संसार को विदा कहना ही पड,ता है। अपने जीवन को और अपने शरीर को छोड़ना ही पड़ता है।

भारतीय समाज में गुरू को भगवान के दूत का दरजा दिया गया है। ऐसा मानव जो है तो संसार में‚ लेकिन जिसकी पहुंच भगवान के लोक तक की है। जिसके ज्ञान चक्षु पूर्ण रूप से खुल चुके हैं। जो सॄष्टि के हर रहस्य को जान चुका है। इसीलिए वह ज्ञान देता है। मानव समाज को दिशा देता है। सही रास्ता बताता है। सही और गलत की खबर देता है। पर कितना खेद और दुर्भाग्य है कि हम गुरू को सुनते तो हैं। पूजते भी हैं। लेकिन अपनी निर्बलता के कारण‚ उसकी आज्ञाओं का और शिक्षाओं का पालन नहीं करते। और अक्सर वही रास्ता चुनते हैं‚ जिस पर चलने के लिए गुरू मना करते हैं। हममें इतनी शक्ति‚ इतनी हिम्मत‚ इतनी बुद्धि और इतना नियंत्रण नहीं होता कि हम सही रास्ते पर चल सकें। आनंद को पा सकें और प्रभु को पा सकें। जीवन के आनंद को सही और ठीक ढंग से पा सकें। अपनी आयु का उचित उपयोग कर सकें। लेकिन अपनी निर्बलता के कारण हम हार जाते हैं। हम न तो प्रभुके नियमों का पालन कर पाते हैं और न ही स्वयं पर नियंत्रण रख पाते हैं। परिणाम स्वरूप हम दु:खों को और विनाश को गले लगा लेते हैं। यूं ही जीवन पर जीवन बीतते चले जाते हैं। हम जन्म पर जन्म लेते जाते हैं। आखिर दु:ख और विनाश ही हमारा भूत‚ वर्तमान और भविष्य बन जाते हैं।

चंद कविताएं

 

-सीमा सचदेव

seema sachdev ki kavitayen

1.कविता के लिए वध

कहते हैं....?
कविता कवि की मजबूरी है
उसके लिए वध जरूरी है
जब भी होगा कोई वध
तभी मुँह से फूटेंगे शब्द
दिमाग मे था बालपन से ही
कविता पढ़ने का कीड़ा
न जाने क्यूँ उठाया
कविता लिखने का बीड़ा?
किए बहुत ही प्रयास
पर न जागी ऐसी प्यास
कि हम लिख दे कोई कविता
बहा दे हम भी भावों की सरिता
कहने लगे कुछ दोस्त
कविता के लिए तो होता है वध
कितने ही मच्छर मारे
ताकि हम भी कुछ विचारे
देखे वधिक भी जाने-माने
पर नहीं आए जज्बात सामने
नहीं उठा मन मे कोई बवाल
छोड़ा कविता लिखने का ख्याल
पर अचानक देख लिया एक नेता
बेशर्मी से गरीब के हाथों धन लेता
तो फूट पड़े जज्बात
निकली मुँह से ऐसी बात
जो बन गई कविता
बह गई भावों की सरिता
सुना था जरूरी है
कविता के लिए वध
फिर आज क्यों
निकले ऐसे शब्द ?
फिर दोस्तों ने ही समझाया
कविता फूटने का राज बताया
नेता जी वधिक हैं साक्षात
वध किए हैं उसने अपने जज्बात
जिनको तुम देख नहीं पाए
और वो शब्द बनकर कविता में आए

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2.प्यास

चौराहे पर खड़ा विचारे
बन्द मार्ग सारे के सारे
मुड़ जाता है उसी दिशा में
जिधर से भी कोई उसे पुकारे
न कोई समझ न सोच रही है
बन गई दिनचर्या ही यही है
जिम्मेदारी सिर पर भारी
चलता है जैसे कोई लारी
दूध के कर्ज़ की सुने दुहाई
कभी जीवन संगिनी भरमाई
माँगे रखते है कभी बच्चे
बॉस के भी है नौकर सच्चे
हाँ मे हाँ मिलाता रहता
बस खुद को समझाता रहता
करता है उनसे समझौते
जो राहों के पत्थर होते
किसे देखे किसे करे अनदेखा?
कौन से कर्मों का देना लेखा?
बचपन से ही यही सिखाया
जिस माँ-बाप ने तुमको जाया
उनका कर्ज़ न दे पाओगे
भले जीवन मे मिट जाओगे
पत्नी सँग लिए जब फेरे
कस्मे-वादों ने डाले डेरे
दफ्तर में बैठा है बॉस
दिखाता रहता अपनी धौंस
चाहकर भी न करे विरोध
अन्दर ही पी जाता क्रोध
समझे कोई न उसकी बात
न दिन देखे न वो रात
अपनी इच्छाओं के त्याग
नहीं है कोई जीवन अनुराग
पिसता है चक्की मे ऐसे
दो पाटों में गेहूँ जैसे
सबकी इच्छा ही के कारण
कितने रूप कर लेता धारण
फिर भी खुश न माँ न बीवी
क्या करे यह बुद्धिजीवी ?
माँ तो अपना रौब दिखाए
और बीवी अधिकार जताए
एक अकेला किधर को जाए?
किसको छोड़े किसको पाए ?
साँप के मुँह ज्यों छिपकली आई
यह कैसी दुविधा है भाई
छोड़े तो अन्धा हो जाए
खाए तो दुनिया से जाए
हर पल ही है पानी भरता
और अन्दर ही अन्दर डरता
पुरुष है नहीं वो रो सकता है
अपना दुख न धो सकता है
आँसु आँखो मे जो दिखेगा
तो समाज भी पीछे पड़ेगा
.....................
पुरुष है पर नहीं है पुरुषत्व
नहीं अच्छा आँसुओं से अपनत्व
बहा नहीं सकता अश्रु अपने
न देखे कोई कोमल सपने
दूसरों की प्यास बुझाता रहता
खुद को ही भरमाता रहता
स्वयं तो रहता हरदम प्यासा
जीवन मे बस मिली निराशा
पाला बस झूठा विश्वास
नहीं बुझी कभी उसकी प्यास

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3.कलाकार


ईश्वर से
बिछुड़ी आत्मा का
सुखद सँयोग, सम्भोग
प्रकृति के संग
भरता नई उमंग
हुआ
कोमल भावनाओं का जन्म
जो
मिल गई
हृदयासागर मे बन कर तरंग
बहे भाव
सरिता की भांति
एकाकार ,निश्चल, निष्कपट
निरन्तर प्रवाहित सुविचार
चक्षुओं पर प्रहार
सोच पर अत्याचार
और बन गया कलाकार
***************************************

4.माँ

नि:शब्द है
वो सुकून
जो मिलता है
माँ की गोदी में
सर रख कर सोने में

वो अश्रु
जो बहते है
माँ के सीने से
चिपक कर रोने में

वो भाव
जो बह जाते है अपने ही आप

वो शान्ति
जब होता है ममता से मिलाप

वो सुख
जो हर लेता है
सारी पीड़ा और उलझन

वो आनन्द
जिसमे स्वच्छ
हो जाता है मन
.......................................................
........................................................

माँ
रास्तों की दूरियाँ
फिर भी तुम हरदम पास

जब भी
मैं कभी हुई उदास

न जाने कैसे?
समझे तुमने मेरे जज्बात

करवाया
हर पल अपना अहसास
और
याद हर वो बात दिलाई

जब
मुझे दी थी घर से विदाई

तेरा
हर शब्द गूँजता है
कानों में संगीत बनकर

जब हुई
जरा सी भी दुविधा
दिया साथ तुमने मीत बनकर

दुनिया
तो बहुत देखी
पर तुम जैसा कोई न देखा

तुम
माँ हो मेरी
कितनी अच्छी मेरी भाग्य-रेखा

पर
तरस गई हूँ
तेरी
उँगलिओं के स्पर्श को
जो चलती थी मेरे बालों में

तेरा
वो चुम्बन
जो अकसर करती थी
तुम मेरे गालों पे

वो
स्वादिष्ट पकवान
जिसका स्वाद
नहीं पहचाना मैंने इतने सालों में

वो मीठी सी झिड़की
वो प्यारी सी लोरी
वो रूठना - मनाना
और कभी - कभी
तेरा सजा सुनाना
वो चेहरे पे झूठा गुस्सा
वो दूध का गिलास
जो लेकर आती तुम मेरे पास
मैने पिया कभी आँखें बन्द कर
कभी गिराया तेरी आँखें चुराकर

आज कोई नहीं पूछता ऐसे
???????????????????
तुम मुझे कभी प्यार से
कभी डाँट कर खिलाती थी जैसे

******************************************

5.पीर पराई

गम की लू से
सूखे पत्ते के समान
पतझड़ मे डाली से टूटकर
गिरते किसी फूल की कली सी
जिसकी खुशबू नदारद
सहमी सिमटी
पहाड़ सी जिन्दगी
कुरलाती है
अपने आप मे
एक व्यथा बताती है
क्या........?
यही है जीवन
कि ........
स्वयं को कर दो अर्पण
केवल
किसी की कुछ पल की
तसल्ली के लिए
जीवन भर जिल्लत का
बोझ उठा कर जिए
नहीं जाने कोई
उस पीड़ा और जिल्लत
की गहराई
जिसने बना दिया सबसे पराई
न घर मिला न चाहत
न ही मन में मिली कभी राहत
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संपर्क:

 

सीमा सचदेव एम.ए.(हिन्दी),एम. एड., पीजीडीसीटीटीएस, ज्ञानी

7ए,3रा क्रास

रामजन्या लेआउट

मारथाहल्ली

बैंगलोर -560037

भारत

e-mail:- ssachd@yahoo.co.in , sachdeva.shubham@yahoo.com

छत्तीसगढ़ के विस्मृत साहित्यकार: पंडित हीराराम त्रिपाठी

प्रो. अश्विनी केशरवानी

छत्तीसगढ़ में अनेक स्वनामधन्य साहित्यकार हुए जो महानदी की अजस्र धारा से पल्लवित और पुष्पित हुए और काल के गर्त में समाकर गुमनाम बने रहे। ऐसे बहत से साहित्यकार हैं जिनका आज कोई नाम लेने वाला नहीं है। हालांकि साहित्य के क्षेत्र में उनके अवदान को भुलाना संभव नहीं है। उन्हीं साहित्यकारों में एक पंडित हीराराम त्रिपाठी भी हैं। मैं स्वयं महानदी से संस्कारित हूं। जब भी मैं छत्तीसगढ़ के गुमनाम साहित्यकारों पर विचार करता हूं तो पाता हूं कि वे किसी न किसी रूप में महानदी से जुड़े हुये हैं। महानदी छत्तीसगढ़ की पुण्यतोया नदी है। इस नदी के संस्कार मोक्षदायी होने के कारण इसके तटवर्ती ग्राम सांस्कृतिक तीर्थ के रूप में जाने गये। मगर महानदी के तट पर बसा नगर शिवरीनारायण सांस्कृतिक और साहित्यिक दोनों तीर्थ है। सन् 1861 में जब बिलासपुर को जिला बनाया गया तो प्रशासनिक सुविधा के लिए बिलासपुर के अलावा शिवरीनारायण और मुंगेली को तहसील बनाया गया। सन् 1880 में सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के मित्र और सहपाठी ठाकुर जगमोहनसिंह जो एक बहुत अच्छे कवि और आलोचक थे, छत्तीसगढ़ के धमतरी में तहसीलदार होकर आये। दो वर्ष वे यहां रहे और स्थानान्तरित होकर शिवरीनारायण आ गये। यहां के नदी-नाले और पहाड़ी का प्राकृतिक सौंदर्य उन्हें बहुत भाया और यहां रहते हुए उन्होंने कई ग्रंथों की रचना कर डाली। शिवरीनारायण को उनकी कार्यस्थली कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां उन्होंने काशी के ‘‘भारतेन्दु मंडल‘‘ की तर्ज में ‘‘जगमोहन मंडल‘‘ बनाकर छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को समेटने का सद्प्रयास किया जिसमें वे सफल भी हुए। कदाचित् यही कारण है कि शिवरीनारायण एक ‘‘साहित्यिक तीर्थ‘‘ के रूप में भी प्रसिद्धि पा सका। पंडित हीरराम त्रिपाठी जगमोहन मंडल के एक जगमगाते नक्षत्र थे।

भूले बिसरे रचनाकारों को याद करना अपनी परम्परा की पहचान के साथ ऋण शोध भी है। वर्तमान की सही पहचान के लिए अतीत की साझेदारी आवश्यक है। अतीत को उलटने पलटने का मकसद उन भूली बिसरी कड़ियों से अपने को जोड़ना है जिनसे हमारा वर्तमान समूर्तित हुआ है। जातीय स्मृतियों से जुड़कर ही साहित्य युगबोध की सही पहचान कर सकता है। बहुआयामी और बहुरंगी रचनाधर्मिता की पहचान हिन्दी में पहली बार भारतेन्दु युग में मिलती है। कविता के प्रवाह के समानान्तर नाटक, निबंध, उपन्यास और समालोचना का प्रवाह इसी काल में दिखाई देता है। भारतेन्दु यंग का महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय तथ्य है- हिन्दी कविता का केंद्र संक्रमण। इस युग में हिन्दी कविता व्यक्तिगत और दरबारी रूचियों से हटकर नगर रूचियों में संक्रमित होती है। इनसे काव्य संचेतना के सामूहिक विकास के नये केंद्रों को जन्म दिया। काशी ऐसा ही एक प्रमुख केंद्र था और इस केंद्र के न्यूक्लियस थे- बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र। आलोचकों और इतिहासकारों ने बड़ी शिद्दत के बाद इस तथ्य को स्वीकार किया है कि उस समय की साहित्यिक गतिविधियां भारतेन्दु हरिश्चंद्र की परिष्कृत साहित्यिक सुरूचि एवं जागरूकता के फलस्वरूप केंद्रित होकर नये वातावरण नियोजित करने में प्रतिफलित हुई थी। उस युग की साहित्यिक गतिविधियों की एक झलक हमें छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिलती है। इन साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र महानदी का तटवर्ती ग्राम शिवरीनारायण था और ठाकुर जगमोहनसिंह उसके नाभिकेंद्र थे। उन्होंने यहां के आठ सज्जन व्यक्तियों का परिचय अपनी कृति ‘‘सज्जनाष्टक‘‘ में दिया है जिनमें पंडित यदुनाथ भोगहा, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, माखन साव, पंडित हीरराम त्रिपाठी, मोहन पुजारी, ऋषिराम और रमानाथ प्रमुख हैं। सज्जनाष्टक के बारे में वे लिखते हैं:-

रहत ग्राम एहि विधि सबै सज्जन सब गुन खान

महानदी सेवहिं सकल जननि सब पय पान ।

यौ जगमोहन सिंह रचि तीरथ चरित पवित्र

सावन सुदि आठै बहुरि मंगलवार विचित्र ।

संवत् विक्रम जानिए इन्दु वेद ग्रह एक

शबरीनारायण सुभग जहां जन बहुत विवेक ।

सज्जनाष्टक में पंडित हीराराम त्रिपाठी के बारे में वे लिखते हैं:-

अपर एक पंडित गुनखानी मानी हीरारामा ।

हीरा सो अति विमल जासुजस छहरत चहुं छवि धामा।

यह पुरान मनु भयो वांचि कै दस अरू आठ पुराना

जीति सकल इंद्रिन अब बैठ्यो शिव सरूप अभिरामा।

पंडित हीराराम त्रिपाठी महंत गौतमदास के अत्यंत प्रिय थे। उन्हीं की आज्ञानुसार उन्होंने पंडित ऋषिराम द्विवेदी और पंडित विश्वेश्वरप्रसाद त्रिपाठी के सहयोग से ‘‘श्री शिवरीनारायण महात्म्य‘‘ को संस्कृत से हिन्दी भाषा में अनुवाद करके संशोधित किया। यह पुस्तक संवत् 1944 में बलराम प्रेस राजनांदगांव से प्रकाशित हुई। इसकी भूमिका प्रजाहितैषी के संपादक श्री भगवानदत्त शर्मा ने लिखी है। श्री शिवरीनारायण महात्म्य के बारे में त्रिपाठी जी लिखते हैं:-

शिवरीनारायण कथा गौतमदास महंत

लखि इच्छा रच्यौ द्विज हीरा यह ग्रंथ।

वे यह भी लिखते हैं कि यह क्षेत्र आदिकाल से सिद्धपीठ रहा है और इसी कारण हर युग में इस क्षेत्र की अपनी विशेषता रही है। कदाचित् यही कारण है कि ऋषि मुनियों ने इसे अपनी साधना का क्षेत्र बनाया। सतयुग के उत्तरार्द्ध में यहां मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम था, जिसे विश्व का प्राचीनतम् गुरूकुल विश्व विद्यालय माना जाता है। शबरी यहां की परिचारिका थी जिसके जूठे बेर खाने श्रीराम और लक्ष्मण यहां आये थे। बाल्मिकी रामायण में भी उल्लेखित है:-

मतंगशिष्यातस्त त्रासन्नृषसः सुसमाहिताः

तेषां भाराभितप्रानां वन्यमाहरतां गुरो ।

इस क्षेत्र को सिद्धिपीठ कहे जाने की पुष्टि यहां के मंदिरों में देवताओं की माला लिए साधनारत मूर्तियों से होती है। कहना न होगा कि यहां ऋषि-मुनियों को सिद्धि प्राप्त होती थी। कदाचित् इसी कारण अलग अलग युगों में यहां की महिमा का बखान करते हुए पंडित हीराराम त्रिपाठी लिखते हैं- ‘‘सौनकादिक ऋषियों के श्री नारायण क्षेत्र के बारे में पूछने पर सूत जी भगवत् ध्यानकर इस महा उत्ाम महात्म्य कहते भये कि हे मुनिगण एकाग्रचित्ा होकर सुनिये। नारायण क्षेत्र को साक्षात् भगवत्धाम जानिये। वह नारायण का कला रूप है। इस क्षेत्र का आदि नाम विष्णुपुरी, द्वितीय नाम रामपुर, तृतीय नाम बैकुण्ठपुर और चतुर्थ नाम नारायणपुर युगानुक्रम से जानिये। वहां चित्रोत्पला-गंगा के तट पर पुण्यरूपी कानन मंडित सिंदूरगिरि पर्वत के निकट साक्षात् अविनाशी श्री नारायण विराजमान हैं। उनकी चरण को स्पर्श करती हुई पवित्र ‘‘रोहिणी कुंड‘‘ स्थित है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री बटुसिंह चैहान ने राहिणी कुंड को एक धाम बताया है:- ‘‘रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर‘‘ जबकि पंडित मालिकराम भोगहा ने उसे मोक्षदायी बताया है:-

रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि चित्रोत्पल जल न्हाय।

योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय ।।

तब त्रिपाठी जी की यह कल्पना कि यहां बसने वाले संत, सज्जन और भगवत भक्त हैं, अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है। देखिये उनका एक भाव:-

चित्रउतपला के निकट श्री नारायण धाम।

बसत संत सज्जन सदा शिवरीनारायण धाम।।

श्री शिवरीनारायण महात्म्य के अलावा त्रिपाठी जी ने दो पुस्तकें और लिखीं हैं जिनमें भक्ति विषयक पदावलियां हैं। हस्तलिखित उनकी ये पुस्तकें अप्रकाशित ही रहीं और काल के गर्त में समा गई। उनकी भक्ति विषयक पदावलियां छत्तीसगढ़ी रहस में खूब प्रचलित थी। आज भी यत्र तत्र उनके द्वारा लिखित पौराणिक कथाओं का वाचन पंडित लोग करते हैं। उनके काव्य तो लोगों को कंठस्थ थे। देखिए उनका एक काव्य:-

समरस गोपी एक कन्हैया तामे देखे तामे है।

एक से एक बनी सखियां सब दामिनि जनु मेघा में है।

नील मनि मनि बीच कनकके जनुग्रंथित बलमा में है।

कोई बामा कह गये स्थान के कोई लपटात हिया में है।

है अविनासी घट घट वासी सुद्ध असुद्ध घिया में है।

जानत उनके भाव भुवनपति जाके ज्यों न जिया में है।

पंडित हीराराम त्रिपाठी निहायत सज्जन पुरूष थे। वे गहरे आस्थावान व्यक्ति थे। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनमें गहरी भक्ति थी। जन कल्याण चेतना से उनका व्यक्तित्व सम्पन्न था। वे अहं चैतन्य से शून्य भोले भाले उदार मनुष्य थे। सहृदयता तो उनमें कूट कूटकर भरी थी। श्री शिवरीनारायण महात्म्य को उन्होंने महंत गौतमदास जी की प्रेरणा से संशोधित और अनुवादित किया था। इस बात को वे स्वयं कहते हैं:-

गौतमदास महंत को प्रेम पुनीत विचार,

द्विजहीरा अल्था कियो पंडित लेहु सुधार।

हरिदासन की दास्यता सदा बसै मनमोर,

मांगत हीराराम द्विज संतन सो कर जोर।

ऐसे सत्पुरूष का जन्म सन् 1826 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के दुर्बन नामक ग्राम में हुआ था। वे किसी कार्य के सिलसिले में छत्तीसगढ़ के बेमेतरा ग्राम आये। वहां से वे रतनपुर आये। यहां उनकी मुलाकात कसडोल के मालगुजार मिसिर जी से हुई। वे उन्हें कसडोल ले आये। कसडोल में त्रिपाठी जी मालगुजारी की देखरेख आम मुख्तियार के रूप में करने लगे। आम मुख्तियार के रूप में उन्होंने मालगुजारी को बहुत अच्छे ढंग से चलाया। यहां की प्रकृति प्रदत्त सुषमा उनके कवि मन को जगा दिया और वे यहां काव्य रचना करने लगे। तभी शिवरीनारायण के तत्कालीन तहसीलदार और सुप्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहनसिंह कासडोल आये और हीराराम त्रिपाठी की काव्य धारा से बहुत प्रभावित हुये। उन्होंने त्रिपाठी जी को शिवरीनारायण आने का निमंत्रण दिया। बाद में उनकी नियुक्ति यहां तहसील के खजांची के पद पर कर दी। सन् 1891 में तहसील मुख्यालय शिवरीनारायण से जांजगीर आ गया और इसी के साथ त्रिपाठी जी सपरिवार जांजगीर आ गये। यहां वे अर्जीनवीसी करने लगे। जीवन की अंतिम यात्रा भी उन्होंने यहीं पूरी की। उनके मृत्योपरांत उनका परिवार कहां चला गया, इसकी सही जानकारी नहीं मिलती।

त्रिपाठी जी की रचनाएं एक आस्थावान व्यक्ति की भावानुभूति है। एक सीमित सरोकार को लेकर उनका रचना संसार हमारे सामने आता है। यह सीमित सरोकार धर्म और आस्था का है। उनमें आस्था के नाम पर वैष्णववादिता है। उनकी वैष्णववादिता मध्य युगीन वैष्णववादिता से अलग है। उनके काव्य में जो भक्ति निरूपण है, उसका स्वरूप व्यापक आंदोलन या सामाजिक व्याप्ति में न होकर सीमित तथा संकीर्ण व्यक्तिगत निष्ठा पर है। त्रिपाठी जी की भक्ति भावना में आस्था का संप्रदायिक रूप नहीं है। उनकी भक्ति भावना में सगुन निर्गुण सभी एकाकार है। उनके जीवन की राममय झांकी प्रस्तुत है:-

रामनाम जपत अनेक धर्म सिद्ध होत, रामनाम जपत यमन तर जात है।

रामनाम जपत खपत कलिमल सब, रामनाम जपत कीर तिफरात है।

रामनाम श्रवण करत युक्ति मुक्ति होत, रामनाम सुनत कलुष महरत है।

रामप्रताप शिव नपित है आपु रामनाम लेत द्विजहीरा हर्षित है।

----

रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी

चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)


कविताएं

-
शालिनी मुखरैया


माँ



जग में किसने देखा ईश्वर को
आखें खोलीं तो पहले पाया तुझको
मुझको लाकर इस संसार में
”माँ” मुझ पर तुमने उपकार किया
मुझे अपने रक्त से सींचा तुमने
मुझे सांसों का उपहार दिया
मेरे इस माटी के तन को
माँ तुमने ही आकार दिया
कैसे यह करज चुकाऊं मैं
इतना तो बता दे ”राम” मेरे
पहले ”माँ ” का कर्ज चुका लूं
फिर आऊं मैं द्वारे तेरे .

मेरी हर इच्छा को तुमने
बिन बोले ही पहचान लिया
सुख की नींद मैं सो पाऊं
अपनी रातों को भुला दिया
मेरे गीले बिस्तर को माँ तुमने
अपने आंचल से सुखा दिया
गर डिगा कहीं विश्वास मेरा
मुझे हौसला तुमने दिया
मुझे हर कठिनाइयों से
टकराने का साहस तुमने दिया

मेरी छोटी बड़ी सभी नादानियों को
तुमने हंसते हंसते बिसरा दिया
मेरे लड़खड़ाते कदमों को माँ तुमने
अपनी उंगली से थाम लिया
तेरे इस बुढ़ापे में माँ तेरी
लाठी मैं बन जाऊं
मुझको सहारा दिया था कभी तूने
तेरा सहारा मैं बन जाऊं हर दम
फिर भी न अहसान चुका पाऊं
चाहे ले लूं मैं कितने जनम

इस धरती पर ”माँ ”
ईश्वर का ही रूप है
कितने बदनसीब होते हैं वे
जो ढूंढते हैं ईश्वर तुझको
मंदिर, मस्जिद गुरूद्वारों में
अपने घर में झांक तो लें
वह मिलेगा तुझे माँ की छांव में

ना जानूं मैं काबा तीरथ
ना जानूं हरिद्वारे
ना जानूं मैं काशी मथुरा
ना ही तीरथ सारे
मैं तो जानूं ”माँ” बस तुझको
सारे तीरथ बस तेरे ही द्वारे.


भंवर


रिश्तों के भंवर में खुद को घिरा पाते हैं
कैसे समझायें दिल को समझ नहीं पाते हैं
उम्र गुजर जाएगी तुम को समझने में
फिर भी न समझ पाऐंगे हम तुम को

क्या चाहा था जिंदगी म हमने
बस दो कदम तुम साथ चलो
फिर भी कभी साथ न चल पाये हम मगर
शायद खुदा को यही मंजूर था

मयस्सर नहीं था इन रिश्तों को एक दूजे का विश्वास
फिर भी लगाए रहे मिलने की आस
कहीं न कहीं एक रिश्ता तो था हम दोनों के बीच
प्यार न सही नफरत तो थी हमारे बीच

कैसे कोई समझायें कि बेवफा हम नहीं
मगर इसमें भी किसी की कोई गलती नहीं
साथ अगर चलना होता तो क्यों बिछड़ते हम
रिश्तों की इस भंवर में क्यों घिरते हम .

---
अस्तित्व का प्रश्न

आस्थाओं पर नित नये प्रश्न उठते हैं
क्या फिर भी हम अपने को इंसान कहते हैं
आज बुद्धिजीवी न जाने क्यों परेशान हैं
“राम” थे या नहीं हैरान हैं .
क्या एक दिन स्वयं इंसान को
अपने अस्तित्व का देना होगा प्रमाण
क्यों हम भूल जाते हैं
कि इस जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है
मगर यह उस प्रश्न का हल नहीं है

हर चीज वक्त के साथ छोड़ जाती है अपने निशां
अब तक य ही चलता आया है वक्त का कारवां
अगर य ही आस्थाओं पर प्रश्न उठते रहे
तो क्या हमें भी देना होगा अपने अस्तित्व का प्रमाण
क्या भविष्य की पीढ़ियाँ भी करेंगी प्रश्न
“ तुम” थे या नहीं, हमें भी दो इसका प्रमाण.

यदि इस तरह हम करते रहेंगे
एक दूसरे के अस्तित्व पर सवाल
इन्सान का इन्सान पर से उठ जाएगा विश्वास
क्या संस्कार दे पाएंगे हम आने वाली पीढीयों को

जो कभी वर्तमान था, आज भूत है
आज हम वर्तमान हैं, कल हो जाएंगे भूत
सिलसिला य ही अनवरत चलता रहेगा
अगर चाहते हो कि आने वाली पीढ़ियाँ रखें हमें याद
तो बन्द करो आस्थाओं पर झूठे सवाल .
क्यों कि हम जो बोते हैं, वही काटना पड़ता है
अपना किया खुद भी भुगतना पड़ता है



संपर्क:

श्रीमती शालिनी मुखरैया
लिपिक व खजांची
पंजाब नैशनल बैंक
क्षेत्रीय कार्यालय
अलीगढ.
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१८, बैंक कालोनी
मौरिस रोड, अलीगढ .उप्र.

भाषा सम्प्रेषण का एक लोकप्रिय माध्यम है। भाषा का प्रयोग लिखकर या बोलकर किया जाता है। रोजमर्रा के जीवन में ज्यादातर हम अपने विचारों का आदान-प्रदान बोलकर ही करते हैं। क्या कभी विचार किया है कि हमने बोलना कैसे सीखा ?

भाषा के बिना बोलना असंगत-सा प्रतीत होता है। प्रारम्भ से ही मनोवैज्ञानिकों की रूचि भाषा के विकास एवं कार्यों के अध्ययन में रही है। इनमें से कुछ मनोविज्ञानविदों ने अपने सिद्धान्तों के आधारों पर यह
बताने की कोशिश की है कि हम बोलना कैसे सीखते हैं? मनोवैज्ञानिकों का मत है कि भाषा का विकास शरीर से मात्रा एक अंग से नहीं बल्कि रसना (जीभ), दन्त,तालू और नाक के विकास पर निर्भर करता है। हम जब बाल्यावस्था में होते है तो हम अपने आप अपने वातावरण में उपलब्ध उद्दीपकों या बड़ों का अनुकरण कर के बोलना सीखते हैं। उद्दीपकों-अनुक्रिया के बीच साहचर्य हो जाने से भी हम बोलना सीखते हैं । उदाहरणार्थ किसी बच्चे को ‘सेब‘ दिखाकर बार-बार ‘सेब‘ शब्द का उच्चारण करेंगे तो बच्चे के मस्तिष्क में ‘सेब‘ की छवि अंकित हो जाती है और बच्चा ‘सेब‘ के अर्थ को समझने लगता है।

बोलना हमारे प्रारम्भिक विकास, अधिगम सिस्टम के परिवर्तनों और परिपक्वता पर भी निर्भर करता है। भाषा का सीखना, स्नायुविक संरचना के कार्यों पर निर्भर करता है। हमारे मस्तिष्क के दो भाग होते हैं। भाषा का सम्बन्ध मस्तिष्क के बाएं भाग से होता है। यदि बचपन में दो-तीन साल की उम्र में बायां भाग यानी हेमिस्फेयर श्रतिग्रस्त हो जाता है तो निश्चय ही भाषा विकास पिछड़ जाता है। बचपन में १२-१८ माह की अवधि में स्पीच मैकेनिजम (Speech Mechanism)और मस्तिष्क का साहचर्य क्षेत्र इतना परिपक्व हो जाता है कि बोलना सीखा जा सके बशर्ते अभ्यास के लिए पर्याप्त अवसर और उपयुक्त वातावरण भी उपलब्ध होना चाहिए।

संरक्षकों द्वारा बालकों को बोलने के लिए प्रेरित किया जाता है। उदाहरणार्थ यदि कुछ संरक्षक बालक को बोलने के बजाय उसके रोने पर ही या संकेत करने पर ही उसके मनमाफिक चीज उपलब्ध करा देते हैं, ऐसे में बालक बोलने के लिए प्रेरितन होकर बोलने की कोशिश करना बन्द कर देता है । आगे जाकर जो सम्प्रेषण बाधाओं का रूप धारण कर लेता है। कुछ माँ-बाप बच्चे को निर्देशन देने का पर्याप्त ज्ञान नहीं रखते तथा कुछ इस मुआमले में आलसी होते हैं जो कि निर्देश देना नहीं चाहते। ऐसे में उन बच्चों भाषा विकास सम्मुच्य ढंग से नहीं हो पाता। ऐसी परिस्थिति में माँ-बाप को चाहिए को बच्चे के सामने उचित निर्देशन के लिए मॉडल शब्द प्रयुक्त करें और इन शब्दों को शुद्ध रूप में बोलने के लिए बालकों को प्रेरित करें ताकि बच्चा उन्हें ग्रहण कर सके। मॉडल जितने ही अच्छे होते हैं बालकों का विकास उतना ही जल्दी और उन्नत होता है और बालक बड़ा होकर सही सम्प्रेषण करने में परिपक्व हो पाता है।
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नोट- इस लेख के लेखक एवम लेखिका-डॉ० अनुज नरवाल रोहतकी और डॉ०अन्जू नरवाल रोहतकी हैं।

हमारा पता....... डॉ० अन्जू व डॉ० अनुज नरवाल रोहतकी
४५४/३३ नया पडाव,काठ मण्डी, रोहतक-हरियाणा

कुछ कविताएं

-संजय सेन सागर



बस इतनी सी इनायत

बस इतनी सी इनायत मुझ पर एक बार कीजिए
कभी आ के मेरे जख्मों का दीदार कीजिये ।

हो जाये बेगाने आप शौक से सनम
आप हैं आप ही रहेंगे एतबार कीजिए ।

पढ़ने बाले ही डर जाये देख कर उसे
किताबें दिल को इतना ना दागदार कीजिए ।

ना मजबूर कीजिये मैं उनको भूल जाउं
मुझे मेरी वफाओं का ना गुनाहगार कीजिए ।

इन जलते दियों को देखकर ना मुस्कुराइये
जरा हवाओं के चलने का इंतजार कीजिये ।

करना है इश्क आपसे , करते रहेंगे हम
जो भी करना है आपको मेरे सरकार कीजिये ।

फिर सपनों का आशियां बना लिया हमने
फिर आंघियों को आप खबरदार कीजिये ।

हमें न दिखाइये ये दौलत ,ये शोहरत
हम प्यार के भूखे हैं हमें बस प्यार कीजिये ।
...........

कब तक सताओगे तुम

कब तक सताओगे तुम , कब तक रूलाओगे
निकलने को है जॉ बताओ कब आओगे ।

गुजर जायेंगे हम तुझे य ही तन्हा छोड़कर
कहो साथ बिताये लम्हों को भुला पाओगे ।

ना यादों में नसीब होंगे ,ना ख़्यालों में आयेंगे
तेरे आंसू से नम मिट्टी में यूं ही महक जायेंगे।

खबर है हमें कि तू मुस्कुराता रहता है हर वक्त
मेरे खून से भीगे अपने दिल को जला पाओगे ।

अहसास है हमें की जाने वाला कभी नहीं आता
मेरे जाने के बाद क्या मुझे तुम बुला पाओगे ।

-------.

हमें यकीं जिन पर होता

हमें यकीं जिन पर होता है, वही दगा दे जाते हैं
जिन्हें पता हम बेगुनाह हैं वही सजा दे जाते हैं

चलो ये देश अच्छा है जहां लुटेरों से लुटते हैं लोग
हमारे देश में अक्सर दरोगा लूट जाता हैं ।

ना हमराही है यहां कोई ना कोई साथ देता है
यहां तो अपना साया भी साथ छोड़ जाता है ।

सुना तो हमने भी यारो बड़े बड़े वीर बसते है
जे तूफां आने से पहले ही घरोंदा छोड़ जाते हैं।

नहीं मतलब निकलता अब यहां आंसू बहाकर भी
यहां तो हर शख्स अपने अश्क दिखाकर गुजर जाता है

नहीं प्यासा यहां कोई जो मयखाने को जाता हो
यहां बसने वाले पपीहों को सागर चूम जाता है ।
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शब्द और संस्कृति'- हमारे समय, लोक और संस्कृति का अर्थपूर्ण अवगाहन
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डा. जीवन सिंह के अब तक के किये-धरे को लक्ष्य करके यह कहने में तनिक भी संशय न होगा कि उनकी आलोचना-दृष्टि सदैव लोक के पक्ष में, समय के सापेक्ष और जीवन-गतिकी के रचनात्मक क्रियाशीलनों से भासमान रही है जहाँ एकांगी, अधूरे, निष्कर्षमूलक, खंडित और वक्र विचारों को कभी 'स्पेस' नहीं मिली। उनकी आलोचना में विषय-वस्तु और विचार सहजता किंतु समग्रता से प्रवेश पाते हैं और एक उदार विकसित जीवन के पक्ष में बड़ी दृढ़ता और निष्पक्षता से अपनी बात पाठकों के समक्ष रखते हैं। यह उनकी आलोचना-विधा का एक विशेष गुण समझा जाना चाहिए जो पाठकों को पाठ के दरम्यान उस वितृष्णा और ऊब से उबारता है (जो प्रायः किसी गंभीर लेख के शास्त्रीयता और विचार-विथियों के अध्ययन-क्रम में अनुभवनीय होती है) और, पाठक लेख के अंत तक आलोच्य विषय-रस के आस्वादन में अपने को बँधे पाते हैं। कहना न होगा कि श्री सिंह आलोच्य-वस्तु के भीतर बड़े निस्पृह भाव से अपनी पैठ बनाते हैं, उसको गुनते और तरल बनाते हैं, फिर अपने मानसपत्र पर सोखकर हमारे समय, लोक और संस्कृति के निकष पर उसे धार देते हैं और जब वह उनकी अपनी वस्तु बन जाती है तो बड़ी सहजता से कागज पर रख देते हैं, जो अध्येताओं को सहज स्वीकरणीय होती है। परंतु ऐसा करते हुए उनमें अपनी विद्वता का लेशमात्र भी अहमन्य भाव नहीं झलकता। इसी कारण डा सिंह की कृतियाँ मात्र आलोचना न होकर, एक रचना का भी आभास दे जाती है जिसमें कविता की-सी सरसता और बोधगम्यता भी होती है। संप्रेषणीयता के इस गुण के कारण पाठक के मन में उनके आलोच्य-वस्तु का विचार गहरे उतरता है और आत्मसात हो जाता है। यही वजह है कि इनकी काव्यालोचना और वैचारिकी, दोनों पाठकों-कवियों को न सिर्फ़ गहरी समझ प्रदान करते हैं, अपितु क्लासिकी और शैली-शिल्प के स्तर पर भी उसकी समझ को परिमार्जित कर उसे समृद्ध बनाते हैं। निश्चय ही, यह उनके सतत आलोचनाभ्यास, गंभीर अध्ययनशीलता और अप्रतिम हुनर का परिणाम है जो उनके श्रमफल के रूप में उनकी कृतियों में उद्भासित होता है।

एक ऐसे समय में, जब संप्रति रची जा रही आधी-अधूरी और खंडित आलोचना से साहित्य का भला नहीं हो रहा, बल्कि अपूरणीय क्षति हो रही है, विचार-बोध की सकारात्मक आलोचना परंपरा, जिसमें जनपदीय संस्कार और लोकजीवन के प्रति अटूट आस्था हो, की महती आवश्यकता महसूस की जा रही है क्योंकि देखने वाली बात यह है कि हिन्दी आलोचना का रचना-संबंध ज्यादातर आज व्यक्ति-संबंध में बदल चुका है जिसे आलोचना की गिरोहबन्दी भी कहना अत्युक्ति न होगा! पहले आलोचना व्यक्ति-आच्छन्न न होकर रचना के गुण-दोषों पर केंद्रित होती थी। पर आज अधिकतर यह प्रायोजित होती है जिसके पीछे या तो बाजार और पूँजी का गणित काम करता है या फिर सबके अपने-अपने पूर्वग्रह, आत्ममोह और अपने कृतित्व के प्रति सम्मोहन होते हैं। इसलिये दूर-दराज के इलाकों में, जनपदों में जो लेखक-कवि यदि महत्वपूर्ण भी सिरज रहे हैं तो उनकी रचनाओं की कद्र नहीं। वे उपेक्षाओं की टोकरी में पड़े रहते हैं। फलतः चीजे शिनाख्त के अभाव में धीरे-धीरे अपनी पहचान खो देती हैं और रचनाकार भी निराश और शिथिल हो बैठने लगते हैं, उसकी रचनाशीलता भी क्रमशःखराब होती चली जाती है। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सुविधाओं की तृष्णा बड़े लेखकों -आलोचकों को नगरों-महानगरों में खींच लाती है जहाँ वे जनपदीय चेतना और स्पन्दन से दूर रहते हैं, अतएव जनपदों में रचे जा रहे महत्वपूर्ण साहित्य के प्रति अन्यमनस्क होते हैं। इसलिये डा. जीवन सिंह के शब्दकर्म की उपादेयता स्वयंसिद्ध है, कारण कि वे प्रधानतः जनपद के ही आलोचना परंपरा से सरोकार रखते हैं और उसी को अपनी आलोचना का आधार बनाते हैं। साथ ही उन विचारधाराओं का तर्कसंगत प्रतिवाद भी करते हैं जिनसे जीवन और लोक का अहित हो रहा हो। श्रम के भावलोक की प्रतिष्ठा और पूँजी के प्रभाव से फलित रूपवाद और निरा कलावाद को जीवन का प्रतिपक्ष मानते हुए उसका विरोध इन प्रतिवादों में आसानी से लक्षित किया जा सकता है।

'कविता की लोकप्रकृति' और 'कविता और कविकर्म' के बाद डा.जीवन सिंह की नई आलोचना-कृति 'शब्द और संस्कृति' आयी है जो आलोचना-साहित्य के एक सुखद भविष्य की आश्वस्ति देती है। दो सौ पृष्ठों की इस आलोचना-कृति में कुल इक्कीस विचारालेख हैं, जो विभिन्न अवसरों पर उनके द्वारा दिये गये साहित्यिक-वैचारिक व्याख्यान हैं, जिसे यहाँ एक माला के रूप में सिलसिलेवार गुँथकर प्रस्तुत किया गया है। समय और संस्कृति को परत-दर-परत खोलते हुए, भारतीयता से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सवालों और उसकी अस्मिता की गहराई से पड़ताल करते हुए, मानवपक्षीय सत्य की निरंतर टटोल जारी रखते हुए, श्रम की भावभूमि पर जनगण के जीवन-संघर्ष की कथा का मर्म बतलाते हुए, वैश्वीकरण के सर्वग्रासी विचार से हजारों सालों की चिंतनपरम्परा से निःसृत अपनी संस्कृति के विनष्ट हो जाने के आसन्न संकटों से सावधान करते हुए और मनुष्यता की संस्कृति का सबल पक्ष उद्घाटित करते हुए डा. सिंह ने जिन मूल्यों की स्थापना इस आलोच्य-पुस्तक में की है, उनकी नींव पर ही अब तक की मानव सभ्यताएँ नफासत से टिकी हुई है और उसका अस्तित्व हर समय वजूद में होना जीवन के लिये अनिवार्य है जिससे जुड़े सवालों का सूक्ष्मता से अवगाहन करने की जरुरत है क्योंकि अब हम एक गुलामी से निकलकर दूसरी गुलामी की ओर चल रहे हैं। यह परतंत्रता इतनी प्रच्छन्न और (अपनी भाषा में कहें तो) कपटपूर्ण इंद्रजाल की माया है कि हमें अहसास तो होता है कि इस दौर में हम सबसे ज्यादा उन्मुक्त हो गये हैं, पर काम करने की जगह से लेकर बिस्तर और अत्यंत निजी अंतरंगता की जगह तक भी वह हमें अपने लपेटे में ले चुकी है। वैश्वीकरण की कोख से उद्भूत उदारीकरण के नाम पर सारे संसार में फैलाया गया भ्रमपूर्ण विचारजाल ही वस्तुतः वह उत्तर-आधुनिकता है जिसने मानव जीवन के चंद्रमा को राहु की तरह आज ग्रस लिया है। इसलिये डा. सिंह ने पुस्तक के आमुख में ही कहा है कि - "पूँजी का पक्ष इतना निरंकुश होकर हमारी छाती पर बैठ चुका है कि कविता, संस्कृति और स्वभाषायें जिन्दगी के सरोकारों से लगभग बाहर होते जा रहे हैं। हम उत्तर-आधुनिक समय के एक ऐसे चक्रव्यूह में घिर गये हैं कि इससे मुक्ति के उपाय ढूँढ पाना कठिन हो रहा है। सारे वैकल्पिक जबाब वस्तुस्थिति की आलोचना से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। जो भी उत्तर निकलकर आते हैं, उनमें आगत से ज्यादा विगत की गंध होती है। यदि विकल्प की सोच को कोई टेक मिलती है तो ले-देकर मार्क्स और गाँधी की विचार परंपराओं में। कुछ लोग दोनों को मिलाक भी सोचते हैं। फिर भी मनुष्यता के लिये भविष्य का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं बन पा रहा है। न देशी, न विदेशी। एक संभ्रम जैसी स्थिति है।"

इस पुस्तक में अध्ययन के दृष्टिकोण से आलेख तीन खंडों में विभाजित किया गया है। हरेक का अलग नाम भी है, - कविता, संस्कृति और भाषा। प्रथम खंड में आठ लेख हैं जिनमें एक को छोड़कर शेष मध्यकालीन संत-कवियों पर हैं। द्वितीय खंड 'संस्कृति' में छः और 'भाषा' पर सात आलेख हैं।

दूसरे और तीसरे खंड के अध्ययन से प्रथम खंड में कबीर, सूर, तुलसी, बिहारी और सुभद्रा कुमारी चौहान के ऊपर लिखे विचार का उद्देश्य स्वयमेव उजागर हो जाता है जिसकी चर्चा मैं अंत में करना चाहूँगा जिससे बात को रखने में सुविधा होगी।

संस्कृति के विविध विषयों पर केंद्रित दूसरे खंड के सभी आलेख इतिहास और संस्कृति-निर्माण की प्रक्रिया का उद्भेदन करते हुए अपनी संस्कृति के तत्व, संकट और उसके सतीत्व के रक्षार्थ उन क्रियाशीलनों को समझने की अंतरदृष्टि देता है जिसके मूल में लोक की वे परंपराएँ और जीवनोंन्मुख गतिविधियाँ हैं जो मनुष्य की आंतरिक उन्नति के द्वार खोलती है और मानवता की संस्कृति रचने में सहाय्य और अग्रगामी होती है। इस खंड का पहला अध्याय 'प्रकृति, दर्शन और संस्कृति' है। यहाँ संस्कृति की रचना -प्रक्रिया को समझाते हुए जीवन जी ने प्रकृति, धर्म, परंपराएँ और विकास से उसके अंतर्संबंधों और द्वंद्वों को इतनी बारीकी और सघनता से चित्रित किया है कि पूरा आलेख ही एक शोध-आलेख सा लगता है। एक उदाहरण देखिए संस्कृति और परंपरा के अंतर्संबंधों पर -

"परंपरा का काम तो बस इतना है कि वह संस्कृति के अपने शिशु को वर्तमान को सौंप देती है। इसके बाबजूद संस्कृति के क्षेत्र में प्रायः यह देखा जाता है कि प्राचीनता के प्रति हठ की हद तक अनुराग होता है, जो उस बन्दरिया में भी दिखाई देता है, जो अज्ञानतावश अपने मृतशिशु के ठठरी को अपने वक्षस्थल से चिपकाये घूमती है। कहने का मतलब यह है कि हम संस्कृति के कर्मकांड से बचकर ही उसके जीवित और स्वस्थ पक्ष का विकास कर सकते हैं। कर्मकांड और अनुष्ठान, संस्कृति के बाहरी परिधान होते हैं उसकी आत्मा नहीं। मनुष्य को सदैव आत्मिक विकास की जरुरत होती है, न कि बाहरी वैचित्र्य की।"

इस आलेख की बड़ी खूबी यह है कि यहाँ संस्कृति को आदमी के अंतस-विकास की प्रक्रिया से जोड़कर देखा गया है जिसमें प्रकृति के सहयोग और संघर्ष के अवदान और साथ ही भूमंडलीकरण के नकारात्मक भूमिका को भी लक्षित किया गया है। बकौल समालोचक "मानव-जाति का ध्यान मानव-संस्कृति पर केंद्रित न रहकर, वस्तु और उसके उपभोग पर केंद्रित हो गया है। पूँजी का महत्व हर समय रहा है लेकिन वह पहले कभी मनुष्य की स्थानापन्न नहीं बन पायी थी, जबकि अब वह उसका स्थान लेती दिखाई दे रही है, यह संस्कृति-प्रेमियों के लिये सबसे बड़ी चिंता की बात होनी चाहिए। भविष्य का संघर्ष पूँजी और संस्कृति का ही संघर्ष होगा।" देखा जाय कि इस संघर्ष में मनुष्य कितना विजीत और कितना पराजित होता है!

'संस्कृति' खंड के आलेख इतिहास की प्रक्रिया को समझने के लिये बहुमूल्य विचार प्रस्तुत करते हैं। यहाँ मै एक दिलचस्प बात यह कहना चाहता हूँ कि मैं खुद भी इतिहास का विद्यार्थी रहा हूँ और मुझे आयोग की परीक्षा-तैयारी के दिनों, सांस्कृतिक इतिहास का विवरणात्मक अध्ययन भी करना पड़ा था। परंतु मुझे इतिहास-वेत्ताओं की मोटी-मोटी किताबों से उस समय उतना लाभ नहीं हुआ जितना कि फिलवक्त इस छोटी सी पुस्तक के 'संस्कृति' खंड के आलेखों से, पर अफसोस कि उस वक्त तक यह पुस्तक प्रकाश में नहीं आयी थी। इन आलेखों के पढ़ने के उपरांत अगर कोई भारत के सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन करे तो मेरे विचार से वह इसके उद्भव और विकास की जटिल-संश्लिष्ठ प्रक्रिया को अधिक गहराई से समझ पायेगा क्योंकि इन आलेखों में निहित विचार, संस्कृति के आधुनिक भावबोध को चेतना के स्तर पर जाग्रत कर हमें उस सत्यांवेषण की ओर मोड़ते हैं जहाँ, विवाद की परिधि से अलग, इतिहास अपने मूल रूप में घटित हुआ है। इसलिये पुस्तक का यह खंड मात्र साहित्य-सचेताओं के लिये ही नहीं, संस्कृति और इतिहास के शोधार्थ - विद्यार्थी के लिये एक महत्वपूर्ण पुस्तक (a manual to understand the cultural heritage in India) साबित होगी।

इनमें संस्कृति के ऊपर 'धर्म और संस्कृति' और 'भूमंडलीकरण और संस्कृति' नाम से दो विशद आलेख तो हैं ही, 'भारतीयता के ज्वलंत और बेहद विवादित, उलझे हुए मुद्दे पर 'भारतीयता का सवाल' शीर्षक से लिखा गया एक मात्र इतना गहन-गंभीर, बहुप्रस्तरीय (multi layered) और बहुआयामी (multi dimensional) विचारालेख भी है कि इसे इस पुस्तक का 'मेनिफेस्टो' भी कहा जा सकता है जो पुस्तक को 'सर्वजन हिताय' और कीमती बनाते हैं क्योंकि बकौल समालोचक 'यह एक ऐसा सवाल है जो आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। हजारों सालों की परम्पराओं का बल हमारे पीछे जो है। कैसी विडम्बना है कि आज की 'भारतीयता' में राम की उस संस्कृति को उलटा जा रहा है, जिसमें कुर्सी लेने के बजाय कुर्सी छोड़ देने की होड़ रही है।'

इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर कदम रखने के साथ ही समय की गति इतनी तीव्र हो गयी है कि अब स्वगति, स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता जैसे विचार पिछड़ेपन के द्योत्तक हो गये हैं जिसमें गाँधी की मूल अवधारणा के अंत कर देने का भी बिगुल फूँक दिया गया है क्योंकि डा. सिंह के अनुसार "अर्थव्यवस्था में अब सब कुछ इतना गड्ड-मड्ड है कि देशी-विदेशी, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय, जातीय और विजातीय शक्लों की पहचान की सूक्ष्म रेखाएँ तक मिटने को हैं। ... इससे किसी समाज, देश और राष्ठ्र की भावसत्ता की कोई इकहरी और एकरेखीय पहचान नहीं होती... इसलिये इस क्षेत्र में जो केवल भारतीय मनीषा ने रचा है वह उसका अपना है। वही हमारी भारतीयता है।" वास्तव में इस शोधालेख के माध्यम से भारतीयता की जो खोजबीन की गयी है, उसमें यहाँ के दर्शन, ऋषि-चिंतन परम्परा, संस्कृति की समरसता का आत्मसाती चारित्रिक पक्ष, मानव-व्यवहार और संबंध-भावना को बखूबी सामने रखा गया है। इसके सुफल के रूप में भारतीयता का जो प्रतिमान यहाँ प्रस्तुत है, वह इस अर्थ में अन्यतम है कि वह ही काल के प्रवाह में टिक सका तो टिक पायेगा, बाकी सब ऐसा प्रतीत होता है, तथाकथित उत्तराधुनिकता के प्रबल वेग में बह जायेंगे, इतिहास जिसका सदियों से साक्षी रहा है।

यह डा. जीवन सिंह की अत्यंत महत्वपूर्ण स्थापना है कि अनेक झंझावातों के बावजूद भारतीयता के मूल में 'करुणा' रही है जो हमारी समस्त दर्शन-परम्परा का निचोड़ भी है पर जो वैश्वीकरण की छ्द्म संस्कृति के पास नहीं है उल्टे, उदारवाद की आड़ में शोषण और क्रूरता का गन्दा खेल चन्द बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा खेला जा रहा है। साथ ही यहाँ, इस बाहरी बयार में भारतीयता की करुणाधारा के क्षीण हो जाने के संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की गयी है।

इसी भाँति, इसके बाद के आलेख 'धर्म और संस्कृति' में धर्म के प्रति मार्क्सवादी दृष्टिकोण में संप्रति फलित हो रहे विवेकहीन, भ्रामक विचारों को आड़े हाथों लेते हुए जीवन जी ने धर्म के मूल और सत्तात्मक, दोनों पक्षों का विश्लेषण किया है क्योंकि धर्म के मूल में मानवीय करुणा, सचाई, निश्छलता, संवेदनशीलता, आशा जैसे हृदय के आत्मिक भाव हैं पर जब कोई भी धर्म, डा. सिंह के अनुसार "सत्तात्मक स्थिति में तब्दील हो जाता है तो अपनी उस मानवीय पहुँच से दूर होने लगता है, जो मानव जाति के एक समूह के लिये एक समय शांति का सन्देश लेकर आयी थी। तब रह जाती है उसकी आनुष्ठानिकता, उसका कर्मकांड, उसका शरीर। धीरे-धीरे उसकी आत्मा नष्ट जाती है और वह एक ढाँचा मात्र बनकर रह जाता है।" इस रहस्य को कोई जीवन सिंह सरीखे समालोचक की कुशाग्रबुद्धि ही जान सकती है कि मार्क्स ने धर्म की इसी उल्टी प्रकृति को जनता के लिये अफीम बताया था जो धर्म की मानवीय भूमिका के विपरीत है, न कि उस धर्म को जो क्षुद्रतम प्राणी के लिये भी करुणा और शील का व्यवहार लेकर संसार के कल्याणार्थ अवतरित होता है। यहाँ धर्म के सांस्कृतिक पक्ष के उद्‌घाटन में समालोचक की मेधा अतुलनीय प्रतीत होती है जो आदमी के विश्वास को धर्म से डिगने से बचाती भी है।

'भूमंडलीकरण और संस्कृति' नाम के आलेख में, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट भी है, वैश्वीकरण से संस्कृति' पर आसन्न खतरों की बहुकोणीय पड़ताल की गयी है। यहाँ लेखक ने यह संधान और संकेत करने की कोशिश की है कि यदि बाजार, तकनीक इत्यादि आधुनिक शोधों का उपयोग मानवीय गुणवत्ता के लिये किये जायें तो स्थिति बदल सकती है जो कि एक विचारणीय स्थापना है।

आलेख 'कला की मूल्य प्रक्रिया' कवि-पाठकों के लिये विशेष लाभकारी है क्योंकि इसमें काव्य-कला के जिन मूल्यों को महान बताया गया है,वह गहन मानवीय प्रक्रिया के मार्ग से होकर जाता है। किस तरह जाता है, यह सुधी पाठक आलोचना पढ़ कर आसानी से समझ सकते हैं। इस पाठ से गुजर कर ऐसे कलावाद और रूपवाद से मोहभंग भी होता है जो जीवन की प्रक्रिया से बाहर है।

जैसा कि ऊपर बताया गया है, 'भाषा' पर इस पुस्तक पर सात आलेख है। ये आलेख विश्वविद्यालयी छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं में अपने वैकल्पिक विषय हिन्दी साहित्य चुनने वालों को विशेषोपयोगी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराता है जो उनके भाषा संबंधी सिलेबस पर गहरी पकड़ बनाने के काम आ सकता है। साथ ही यहाँ 'हिन्दी जाति' की संकल्पना को वृहत्तर, उदारवादी परिप्रेक्ष्य में विवेचित किया गया है जो हिन्दी क्षेत्र के अलावा अहिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी के विकास और प्रसार की नई संभावनाएँ और दिशाएँ खोलती हैं। साथ ही सभी जातीय भाषाओं के उन्नयन और आत्म-गौरव का मार्ग प्रशस्त करती है, 'हिंग्लिश' के प्रभाव में दिन-दिन निष्प्राण हो रही जनभाषा हिन्दी को अक्षुण्ण रखने के निहितार्थ भारतीय आत्मबल को सही दिशा और सोच प्रदान करती है।

इस प्रकार यह साफ है कि द्वितीय और तृतीय खंड में संस्कृति और भाषा के सन्दर्भ में डा. जीवन सिंह द्वारा भारतीय समय और लोक को समझने का सराहनीय और अभिनव प्रयास किया गया है जिसमें उन नवाचारी विचारों का प्रतिफलन हुआ है जो भारतीय लोक और जीवन के पक्ष में है। इसी लक्ष्य की प्राप्ति, कविता खंड के आलेखों का भी अभिप्रेत है। अतएव अब मैं पहला खंड, जो कविता विषयक पाठों पर आधृत है पर आता हूँ। इस खंड में आठ विचार हैं, जिनमें पाँच मध्यकालीन संत -कवियों के कृतित्व पर, एक रीति-कवि बिहारी, एक स्वतंत्रता के गायक स्त्री-कवि सुभद्रा कुमारी चौहान और एक कविता के गद्य-रूप पर है।

डा. सिंह कबीर, सूर, तुलसी और मीरा को लोक जीवन के अत्यंत प्रतिभावान कवि के रूप में देखते हैं। यहाँ लोक और भक्ति पृथक-पृथक नहीं है। इन संत-कवियों का सबसे विलक्षण गुण यह है कि ये भक्ति में योग-साधना के पक्ष को जीवन और लोक की गहराई में उतर कर प्रतिपादित करते हैं, न कि उसकी अवहेलना कर। और एक प्रेममय, भावपूर्ण संसार की रचना करते हैं। आदिकाल की कवियों की तरह इनमें भक्ति का पक्ष जीवन और लोक से कटा हुआ नहीं है। समालोचना में इस विचार को प्रतिष्ठा मिली है कि आज के कवियों की रचनाधर्मिता भले ही उन संत-कवियों की रचनाधर्मिता से आगे की हो, पर उनके सृजन के गहन मानवीय अर्थों को अभी समग्र रूप से समझना बाकी है क्योंकि उनकी कविताओं का लोक-समय अब के कवियों से कहीं अधिक समृद्ध है। इन लेखों का सबसे महीन और सघन पहलू है उनमें व्यैक्तिक भिन्नता ((individual difference), जो बहुत रोचक भी है। जीवन जी की स्थापना है कि "कबीर संस्कृति की बुनियाद पर खड़े हैं जबकि तुलसी उसके कंगूरों पर।...दरअसल, कबीर हमारे आधुनिक भावबोध के बहुत नजदीक हैं, इस मामले में तुलसी उनसे पीछे हैं।.., इसलिये तुलसी सामंजस्य और समन्वयवाद के पोषक हैं। वे टूटे-फूटे को जोड़ने का काम ज्यादा करते हैं.....कबीर समन्वयवाद के पोषक नहीं हैं। वे संस्कृति को अंतर्वस्तु में बदलते हैं और पहले से चली आती हुई खंड-संस्कृति में उपेक्षित को शामिल करते हैं। किंतु जब संस्कृति के स्तर पर 'स्त्री' का मामला आता है तो कबीर भी पिछड़ जाते हैं। कबीर के व्यापक जीवनानुभवों में स्त्री की पीड़ा नहीं समा पाती। इस मोर्चे को सँभालती हैं मीरां।" सूर पर लिखे गये आलेख 'ये ब्रज के लोग' में वे सबसे महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि सूर ने नागर सभ्यता के ऊपर ग्राम्य सभ्यता को प्रतिष्ठित किया है जिनमें प्रेम और जीवन के राग हैं। पर कैसे? यह सब जानने के लिये सिंह जी के प्रिय पाठकों को पूरे आलेख से गुजरना होगा, सब उद्धरण यहाँ देना समीचीन नहीं क्योंकि यह तो पुस्तक-चर्चा है जिसमें मैंने मात्र अपनी पाठकीय समझ ही अभिव्यक्त की है।

हाँ, एक बात और भक्तिकालीन कवियों पर, वह यह कि प्रेम-रस के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि मलिक मो. जायसी की कमी इस खंड में खलती है, जो मध्यकालीन संत-कवियों की लड़ी को पूरी होने से रोकती हैं। परंतु पुस्तक के आमुख में डा. सिंह की स्वीकारोक्ति है कि "जायसी पर कोई मौका नहीं मिल पाया तो वे चाहते हुए भी छूट गये।" पर उनसे आशा की जानी चाहिए कि इस पुस्तक के आगामी संस्करण में इस कमी को दूर कर लिया जायेगा।

'शब्द और संस्कृति' को पूरा पढ़ लेने के उपरांत जब मैंने कृतिकार डा. जीवन सिंह जी से फोन पर जिज्ञासावश पूछा कि इतना अच्छा और तात्त्विक ढंग से कैसे लिख लेते हैं, तो वे सहजता से मुस्कुराकर टाल गये। लगा कि स्वमुख प्रशंसा से बचना चाहते थे। पर उनको सांगोपांग पढ़कर स्वयं यह अनुभव किया जा सकता है कि उनकी सोच में प्रगाढ़ पार्थिवता विद्यमान है जो उनकी आलोचना को श्रेष्ठ और अर्थवान बनाती है। ठीक ही कहा है किसी ने कि "शौक-ए-दीदार' गर है तो नज़र पैदा कर।" उनमें यह नज़र अर्थात आलोचना -दृष्टि इसी पार्थिवता से उत्पन्न होती है।

मैं समझता हूँ, साहित्य के गद्य और पद्य, दोनों पाठकों के लिये अपने लोक, वर्तमान और भारतीय संस्कृति के समझ को विकसित करने की एक अनूठी और अनिवार्य पुस्तक साबित होगी- 'शब्द और संस्कृति' जो उनके सन्दर्भ-ग्रंथ के रूप में सहायक हो सकती है।

हमारे यहाँ जनपदीय स्पन्दन और लोकचेतना से सम्पन्न गंभीर समालोचकों की बड़ी कमी है। कुछ ही हैं जिन्हें उँगलियों पर गिनाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में जीवन सिंह एक ऐसे लोकधर्मी समालोचक हैं जिनके लेखन को देखकर लगता है कि आलोचना की दूसरी परम्परा न सिर्फ जन्म ले चुकी है, बल्कि साहित्य-परिसर में अपना पाँव पसारने लगी है जो साहित्यालोचना के स्वस्थ परम्परा के विकास के उज्ज्वल भविष्य की आश्वस्ति देती है।
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रचनाकार परिचय:
--सुशील कुमार
जन्म-13 सितम्बर,1964,पटना सिटी में किन्तु गत 24 वर्षों से दुमका (झारखंड) में निवास,शिक्षा- बी-एड तक ।

कविता के बीज मेरे मन में कब गिरे और कैसे फलित हुए, ठीक-ठीक नहीं कह सकता । किन्तु जनपदीय धूल-धक्कड़ से सने श्रमशील श्वांसों में धड़कते अपने लोकजीवन और समय के स्पंदन को कहीं महसूसता हूं तो वह कविता में ही, क्योंकि वह मुझे बेहद भाता है जहां कि मैं जन्मा-पला हूं । पिता के मानसिक असंतुलन की वज़ह से पिछले चौबीस सालों से बहिन-भाईयों यानि कि, पूरे परिवार को तबाही और टूटन से बचाने की जबाबदेही मेरी ही रही है क्योंकि मै ज्येष्ठ पुत्र हूं मां -बाप का । यही मेरी पाठशाला है जिसमें मुझे संघर्षशील जीवन का तत्वज्ञान भी हुआ । पहले प्राईवेट ट्यूशन, फ़िर बैंक की नौकरी । 1996 में राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्णकर शिक्षा सेवा में ।
संप्रति: +2 जिला स्कूल चाईबासा (झारखंड) में प्रिंसिपल के पद पर । मैं समझता हूं , कविता सिर्फ़ अंतरतम की पिपासा को ही तृप्त नहीं करती , बल्कि दिन-दिन अमानवीय हो रही व्यवस्था पर अनिवार्य आघात भी कर सकती है, करती है।
हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-पढ़ने में गहरी रुचि रखता हूं । कविता और काव्यालोचना ही अपना मुख्य शब्द-कर्म है। हिंदी की सुपरिचित -प्रतिष्ठित प्रिंट पत्रिकाओं में सतत प्रकाशन भी ,पर कविता को लेकर मैं किसी मुगालते में नहीं रहता । बेब-पत्रिकाओं से जुड़ने की कोशिश कर रहा हूं ।
सौम्य-शांत जीवन जिसमें संघर्ष की स्वीकृति हो, मुझे पसंद है। कृति और प्रकृति से मुझे प्यार है, आत्मानुशासन से लगाव पर प्रशासन-व्यवस्था ,राजनीति और कृत्रिमता से आले दर्जे की नफ़रत ।
पता- हंसनिवास /कालीमंडा/हरनाकुंडी रोड/डाकघर-पुराना दुमका/जिला-दुमका/झारखंड- 814 101
ईमेल- sk.dumka@gmail.com

व्यंग्य
एक ‘कला’ के पतन पर विमर्श

-अनुज खरे


लो वे धर लिए गए... अबे, कौन धर लिए गए एक उवाच।
वे ही तुम्हारे मिश्राजी... रामदुलारे... रिश्वत ले रहे थे। पची नहीं, लेते ही पुते हाथों धर लिए गए।
हे! भगवान देश का क्या होगा? समवेत चिरंतन चिंता की उच्चतान।
ऐसी घटनाओं पर सहज राष्ट्रीय एकता और सामान्य सामाजिकता के ट्रेलर आप हर कहीं गली-मोहल्लों में अक्सर देखते ही होंगे। सो, ऐसे ही किसी गली-मोहल्ले में बैठे विषय पर ‘थीसिस’ लिखते दो पात्र मुखातिब हैं।
सो, इसमें विशेष क्या है? भाईजान, अबकी बार पात्र प्रकटायमान है।

विशेष...! गुरु, विशेष है हमारे देश में ‘स्किल’ का इतना पतन। दूसरा पात्र भी फेड ऑफ से सीन में ‘इन’ हो रहा है।
अबे, इसमें काहै का ‘स्किल’, नासमझी भरा पारंपरिक पात्र क्रंदन।
‘स्किल’ ही तो है गुरु, हमारे इस महान देश में सदियों से लेन-देन की कला निरंतर प्रतिष्ठा को प्राप्त होती रही हो। वहां, ऐसे नासमझ, लेते ही पकड़ लिए जाने वाले दुष्ट, पातक, नर्क के भागी नहीं तो और क्या हैं। पात्र कुटिलता से सीन में स्थापित होने का प्रयत्न कर रहा है।

इतने भोले भंडारी हैं तो लेते क्यों हैं रिश्वत। नासमझ पात्र कुछ गुरु गंभीर सा दिखाई दे रहा है।
अबे, ‘शिक्षा’ की कमी के कारण से छोटी-छोटी नासमझियां कर जाते हैं। दोनों पात्र अब शिला पर विराजमान हैं। इकठ्ठे होकर देश में रिश्वत लेने में पकड़े जाने अर्थात् कला में अद्योःपतन पर भंयकर रूप से चिंतातुर दिखाई दे रहे हैं।
समझ का फेर है गुरु, नजर का फेर। अब गुण ग्राहकता तो रही नहीं, समझ ही नहीं पाते हैं देने वाले के मंसूबे इधर ली नहीं, उधर टप्प से धर लिए गए।

पहले लेने वाले चार आंख रखते थे। लालच की चोटी पर चढ़कर भी नीचे नजरें गढाए रहते थे। दूसरा पात्र अब ज्ञान की साक्षात मूर्ति हो रहा था। पहले रकम का लेनदेन भी भरोसेमंद तरीके से होता था। लेने-देने वालों के बीच इतनी सौहर्दता होती थी कि कई लेने वाला देनेवाले के इसी सादगी पर निसार हो जाता था। लेकिन रकम टेबल पर ही रखवाते थे, फिर धीरे से बैग के अंदर सरकाते थे और बैग चपरासी के हाथों में पकडते थे। यानी रंगे हाथों का कोई चक्कर ही नहीं। और अब देखो रकम सीधे हाथों में लेते हैं, ताकि रंगे हाथों पकड़े जाने का सपना पूरा कर सकें।
मेरी समझ में तो गुरु ऐसे मूर्ख ही होते हैं।

मूर्ख नहीं ‘महामूर्ख’ मूर्खता का निरंतर विकास हो रहा है। ऐसे ही प्रकरणों में तो सामने आता है। विकास के ऐसे ही तो पैरामीटर नहीं गढे जाते हैं। पात्रों में जबर्दस्त द्वंद्वात्मक विमर्श होने लगा। विषय का प्रतिपादन अब बौद्धिकता की ऊंचाइयों की ओर जाने लगा है।
गुरु रोज तो अखबारों में आ रहा है। फलां-फलां रिश्वत लेते पकड़ा, फिर भी इतनी आसानी से झांसे में आ जाते हैं। फिर ‘मानवता’ का सहज सचेतक स्वर उभरा।
देने वाले ‘सयाणे’ हो रहे हैं भाई। लेने वाले तो अभी तक अपनी पारंपरिक ‘सिधाई’ से बाहर ही नहीं आ पा रहे हैं। गुरु का स्वर लेने वाले के प्रति न जाने क्यों ‘नेह’ से भीग सा जाता है।

अब उन्हें ही देखो...!
किन्हें, गुरु
अबे, उन्हीं वर्माजी को, रिश्वत लेने वालों के पितामह को। आज सुबह से ही वे इकदम उदास हैं। जब से अखबार में खबर पढ़ी है, मिश्राजी के रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने की, वे उदास हैं। चाय के साथ तीन की जगह डेढ़ ही बिस्कुट खाए हैं। अखबार को परे रखकर उदास नजरों से घर के बिलौटे को निहारने में लगे हुए ह। बिलौटा भी उनके बचे हुए बिस्कुटों पर दांव लगाने का पैंतरा ढूंढ रहा है। उनकी आंखें रिश्वत लेने की कला के इस भंयकर पतन पर सिकुडी-सिकुडी सी जा रही थीं। मैंने देखा वे गंभीर मुद्रा में छत को निहारने में लगे थे। ‘राष्ट्रीय’ तौर पर चिंतित होने की पारंपरिक पूर्ण उच्चता को प्राप्त करना चाहते थे।

-इस पीढ़ी से कोई काम ढंग से नहीं होता... जब वे बड़बड़ाने के बुजुर्गोंचित खेल का मजा लेने पर उतारू हो गए तो मैं वहां से खिसका था।
गुरु...!
अबे गुरु-गुरु काहै कर रहा है। रिश्वत तो वे लेते थे। एक से एक ‘ट्रिक’ भी उनके पास है, कभी पकड़े ही नहीं गए।
कैसे गुरु
कैसे क्या? एक बार तो ‘उन्होंने’ रिश्वत में गेहूं के पांच बोरे मंगवाकर सीधे खेतों में उतरवाए और वहीं बो दिए थे।

यानि...! गुरु
अबे, रिश्वत जमींदोज और क्या
गजब-गुरु गजब
अबे क्या गजब, गजब तो अब सुनो-एक बार तो उन्होंने रिश्वत लेने वाले पैसे अनाथालय में दान करवाकर उसकी रसीद मंगवा ली थी।

हैं...! रसीद क्यों...?
रसीद इनकम टैक्स में लगाकर पैसे बचा लिए। तो हुई न नए तरह की समझदारी।
गुरु वर्माजी तो वक्त से आगे की चीज दिखते हैं।
बिल्कुल हैं ही। वे तो आजकल इसी विषय पर कोचिंग खोलने की योजना बना रहे हैं, ताकि ‘कर्मियों’ को विधिवत रूप से इस विषय में दक्ष किया जा सके। बल्कि वे कर्मचारियों को सेवा पूर्व प्रशिक्षण में ही इस विषय को रखवाने के हिमायती हैं। प्रतिवेदन भी तैयार कर लिया था।
फिर गुरु भेजा कहां?

कहां भेजते। कोचिंग के कांपटिशन में दूसरे उतर ना आए, यही सोचकर आयडिया ड्राॅप कर दिया।
गजब ज्ञानी लोग बसते हैं धरा पर गुरु
अबे और वहीं तो क्या। एक बार तो उन्होंने एक से रिश्वत में छह लोगों का रेलवे रिजर्वेशन करवा लिया था। ‘एसी’ में। रंगे हाथों पकड़े जाना तो उन्हें बिल्कुल भी गवारा न था।
इसलिए तो आजकल के लोगों की नादानियां देख-देखकर उनका दिल कला की ऐसे पतन पर उसी अवस्था पर जार-जार रोता है।

सो तो है गुरु
अबे सो तो क्या तू एक और सुन
एक और है गुरु
अबे, कई किस्से पड़े हैं।
तो गुरु किताब क्यों नहीं छपवा लेते।
छपेगी बेटा, जरूर छपेगी। इस क्षेत्र की बेस्टसेलर छपेगी।

तू पहले किस्सा तो सुन-एक बार तो उन्होंने रिश्वत ली और नोट लेकर तालाब में छलांग लगा ली। तैर कर दूसरे किनारे निकल गए। बेचारे इस किनारे पर एसीबी वाले टापते रह गए। ऐसे हैं अपने वर्माजी।
धन्य है गुरु, धन्य है। फिर तो वर्माजी के बडे मजे रहे होंगे पूरी जिंदगी। आजकल क्या कर रहे हैं?
ऐश चल रही है। अभी तो लौटे हैं...
कहां से गुरु विदेश से?
अरे नहीं, जेल से एक बार पकड़े गए तो लंबे नपे थे।

हांय गुरु ऐसी गति... राम-राम।
गुरु शिला से उतरकर सरपर घर जाते दिख रहे हैं।
कैमरा उनकी पीठ पर, सीन टाइट क्लोजअप में धीरे-धीरे फेड ऑफ हो रहा है।

कविताएं

-डॉ. अनुज नरवाल रोहतकी

नज्म
सागर में गिरा रहा हूं
आंख से अपनी इक आसूं
आंसू ये जब तक न मिलेगा
मेरा दिल करता रहेगा
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार
ये मन का सूरज मेरे यारा
करता रहेगा जब-तक उजियारा
रोशनी धड़कन में रहेगी जब-तक
करता रहूंगा यार मैं तब-तक
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार
गुल में रहेगी जब-तक खुशबू
चमकते रहेंगे जब-तक जुगनू
तब-तक तेरा बनकर मजनू
लेकर तेरे इश्क का जुनूं
हंसता रहेगा, करता रहेगा
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार
ये जमीं ये आस्मां है जब-तक
जमीं पर हवा रवां है जब-तक
तारों में रोशनी जब-तक है बाकी
जीवन जब-तक साथ है साथी
तेरा ये दीवाना करता रहेगा
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार
मौसम बदलते रहेंगे जब-तक
चाँद-सूरज निकलते रहेंगे जब-तक
बादलों में बूंदों का खजाना रहेगा
जब-तक बहारों का आना-जाना रहेगा
मेरा इश्क तुमपर मरता रहेगा
और ये दिल करता रहेगा
तुमसे ही प्यार, तुमसे ही प्यार

....
जब भी तुम जन्मदिन बनाओ
याद करके उस दिन एक पेड़ लगाओ
वो पेड़ हमें ताजी हवा देगा
हमारे जीवन को बढ़ा देगा
जन्मदिन पर जो आएं मेहमान
खिलौने,चॉकलेट अगर लाएं मेहमान
उनको कहना, माफ करना श्रीमान
मुझको खिलौने या चॉकलेट नहीं चाहिए
मुझे केक या आमलेट नहीं चाहिए
तोहफा ही देना चाहते हैं आप अगर
तो पेड़ लगाना, घर के आंगन में जाकर
जब वो पेड़ बडा होगा
ताजी-ताजी हवा देगा
खाने को मीठे-मीठे फल देगा
मेरे जन्मदिन का यह तोहफा
सबको साफ सुथरा कल देगा
(नोट- यह कविता २० जनवरी २००८ के दैनिक ट्रिब्यून के रविवारीय अंक में
प्रकाशित हो चुकी है।)

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रक्तदान मौजू पर कुछ दोहे

१,बडे पुण्य का है काम
रक्तदान, रक्तदान, रक्तदान

२,मेरी बात पर दें आप विशेष ध्यान
तीन महीनें में एक-बार जरूर करें रक्तदान

३, हमें मालूम हैं मानी रक्तदान के
काम आता है इन्सान,इन्सान के

४,आफ रक्तदान से बच सकती है किसी की जान
फिर संकोच कैसा, जी भरकर करें रक्तदान

५, ये सच है दुनियावालों, रक्तदान महादान होता है
जो करता है रक्तदान, सही माइने में वही इन्सान होता है।

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संपर्क:
डॉ. अनुज नरवाल रोहतकी
454/33 नया पड़ाव, काठ मंडी, रोहतक -124001 हरियाणा, भारत

e-mail- dr.anujnarwalrohtaki@gmail.com

कहानी

देव
-राजेश कुमार पाटिल


निर्मला, समय कितनी तेज गति से चलता है हम यह सोच ही नहीं पाते, वह न तो किसी के लिये ठहरता है न किसी के साथ चलता है, वह तो अपनी गति से निरंतर चलायमान रहता है । ह जीवन में सफलता के लिये हमें हर कदम उसके साथ चलना पड़ता है । देखो ना कल हमारे विवाह को तीस साल पूरे जाएंगे । अतीत की तरफ मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि जैसे यह कल की बात हो । इन तीस सालों में मैंने तुम्हें क्या दिया ऐसा कुछ खास तो मुझे दिखता नह है, किंतु तुमने मुझे इतना कुछ दिया है कि मैं उसकी गिनती नहीं कर सकता । हमारी शादी के बाद मेरे जीवन में कितने दुःख, कितनी मुसीबतें आईं, किंतु तुम हर परिस्थिति में मेरे साथ पूरी दृढ़ता से खड़ी रहीं । मेरी हर आशा, हर उम्मीद को तुमने यथार्थ का धरातल दिया है । बच्चों की अच्छी परवरिश, उनके अच्छे संस्कार, अच्छी शिक्षा, सास श्वसुर की सेवा, ननदों-देवरों की शादियाँ और क्या कुछ नहीं किया तुमने मेरे और मेरे परिवार के लिये । बीते सालों में मुझे ऐसी कोई घटना, ऐसी कोई बात या ऐसा कोई पल याद नहीं है, जब तुमने मेरे हृदय को ठेस पहुंचाई हो । हाँ मनोविनोदपूर्ण कई छोटी-छोटी नोंकझोंक तो हमारे बीच यदाकदा होती रही है, किंतु ऐसी कोई गंभीर बात तुमने कभी नहीं कही जिससे मुझे दुःख हुआ हो और निर्मला तुम इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकती कि इतने लम्बे वैवाहिक जीवन में एक पुरूष के लिये यह कितनी बड़ी उपलब्धि है ? इस बात को तो विवाहित पुरूष ही समझ सकते हैं कि वास्तव में यह कितनी बड़ी बात है । तुम्हारे व्यवहार और कामों की मैं चर्चा करने लगूं तो शायद दो-चार दिन कम पड़ जाएंगे, मैं तो तुम्हें आज वह बात बताने जा रहा हूं जिसको जानने के लिये तुम कितनी बार मुझ से कह चुकी हो । तुमने मेरे मित्र देवनारायण की कहानियाँ पत्र पत्रिकाओं में तो बहुत पढ़ी है । मैं आज तुम्हें खुद देव की कहानी सुनाता हूं । वैसे उसकी कहानी में कुछ नया नहीं है, बस थोड़े से धैर्य और पारस्परिक सामंजस्य के अभाव में एक अच्छे परिवार के टूटकर बिखरने की दुखद दास्तां है ।

देवनारायण बिलकुल देव ही था । न काहु से दोस्ती न काहु से बैर । तम्बाखू, गुटखा, बीड़ी -सिगरेट, मांस मदिरा दुनिया की तमाम व्यसनकारी चीजों से कोसों दूर सादा जीवन और उच्च विचार की उक्ति को पूरे मन, आत्मा और अपने विनम्र व्यवहार से चरितार्थ करता, अत्यधिक कम बोलनेवाला धीर, गंभीर देव । मितभाषी इतना कि १२ घंटे के लंबे सफर में सामने बैठे सहयात्री से यह तक नहीं कह पाये कि आप कहाँ तक जा रहे है । शौक था तो बस शब्दों में उलझकर भावनाओं को शाब्दिक आकार देने का, कविता और कहानियाँ लिखने का । अपने माता-पिता का इकलौता बेटा । तुम्हें तो पता ही है मेरी उससे खूब बनती थी । वह मुझसे अपने जीवन की हरबात बता दिया करता था या यूं कहो अपने मन की बात मुझसे कहने के लिये वह सदा आतुर रहता था । मैं भी उससे अपनी कोई भी बात छुपाता नहीं था चाहे वह अपने घर परिवार ऑफिस या और कहीं की हो । तुम्हारी और मेरी जोड़ी को वह कहता था यार तुम्हारी तो सीता राम जैसी जोड़ी है । तुम बहुत खुशनसीब हो कि तुम्हें निर्मला जैसी लड़की जीवन साथी के रूप में मिली । वह खुद तो तुम्हारी तारीफ करता ही था, किंतु यदि मैं तुम्हारी तारीफ करता तो कहता यार मत बता मुझे तुझसे जलन होने लगती है । पुरूष के जीवन में एक स्त्री का क्या स्थान होता है उसकी क्या महत्ता होती है इसका वास्तविक अहसास मुझे तब हुआ जब से तुम मेरी पत्नी बनकर मेरे जीवन में आई । तुम्हारी विनम्रता, तुम्हारा व्यवहार, तुम्हारा परिश्रम, अपने परिवार के प्रति तुम्हारा समर्पण . . . . क्या-क्या कहूं तुम्हारे गुणों की तारीफ करने के लिये शब्द कम पड़ते हैं । तुम्हें याद है, मैं शादी के पहले से ही कितनी ज्यादा सिगरेट पीया करता था और शादी के बाद भी मैं तुम्हारे मना करने के बावजूद तुम से छुप छुप कर निरंतर सिगरेट पीया करता था, पर तुमने एक दिन गांधीजी वाला ऐसा सीधा रास्ता निकाला कि जिस दिन तुम मुझे सिगरेट पीता देखती, उस दिन तुम खाना ही नहीं खाती, एक दिन, दो दिन मैं तुमको कितने दिन भूखा रख सकता था । तुम मेरी सिगरेट की लत छुड़ाने के लिये भूखी रहती वह भी बिना किसी गुस्से के, बिना कुछ कहे बस मुस्कराते रहती तुम्हारे इस रास्ते ने मुझे एक दिन में ही सिगरेट छोड़ने पर विवश कर दिया ।

निर्मला, तुम्हें शायद याद न हो हमारी शादी के एक साल बाद ही देव की शादी हुई थी । शादी के एक-दो साल तक उसका वैवाहिक जीवन ठीकठाक चलता रहा, किंतु संयुक्त परिवार में रहना उसकी पत्नी को शायद रास नहीं आ रहा था । और बस यहीं से पारिवारिक कलह के कीटाणु पनपने शुरू हो गये । पिता की असमय मृत्यु होने से उसपर आई जिम्मेदारियों और इकलौता पुत्र होने से परिवार की आर्थिक कठिनाइयों के कारण देव अपनी गृहस्थी अलग कर पाने में असमर्थ था । सबकुछ जानते हुए भी देव की पत्नी का उसके परिवार के साथ सामंजस्य नहीं बन पा रहा था । वह देव क सदा ही अपनी पर्सनल प्रापर्टी समझती रही, वह यह कभी नहीं समझ सकी कि देव उसका पति होने के साथ-साथ किसी का बेटा, किसी का भाई भी है उसकी अपने मां-बाप अपने भाई बहन के प्रति भी जिम्मेदारियां हैं । न जाने क्यों देव की पत्नी उसके परिवार में पूरे मन से सम्मिलित ही नहीं हो पाई । उसे हमेशा बस अपनी अलग गृहस्थी बसाने की ही धुन लगी रही । बात-बात पर परिवार के लोगों का अपमान करना, कभी भी अपने मायके चले जाना उसकी आदत में शामिल हो गया था । निर्मला, परिवार के संचालन में बेशक पति की अपनी जिम्मेदारी होती है, किंतु यह तभी संभव है जब उस पति के पीछे उसका संबल बनकर दुख सुख में साथ निबाहनेवाली समझदार पत्नी खड़ी हो । किसी भी घर परिवार की सुख शांति उस परिवार की स्त्री के व्यवहार पर निर्भर करती है । यदि वह विनम्र और व्यवहारकुशल हो तो अपने घर परिवार को स्वर्ग सा सुन्दर बना सकती है और यदि वही स्त्री छोटी-छोटी बातों पर नागिन की तरह फुफकारने वाली अभिमानी, कलहकारी गुणों वाली हो तो एक अच्छे घर परिवार को नरक में परिवर्तित होते देर नहीं लगती । पति-पत्नी में छोटी-छोटी बातों पर लडाई, हमेशा किसी न किसी बात पर अनबन रोज-रोज की पारिवारिक कलह के चलते देव इतना अधिक अवसाद में चला गया था कि लगता था जैसे वह कभी भी आत्महत्या कर लेगा, किंतु मेरे समझाने पर बड़ी मुश्किल से वह इस आत्मघाती विचार से बाहर निकल पाया । ऐसा नहीं कि उसने अपनी पत्नी को समझाने का प्रयत्न न किया हो, किंतु हर संभव प्रयास करने के बाद भी वह पारिवारिक कलह से मुक्त नहीं हो पाया और घोर निराशा के बीच एक दिन वह घर छोड़कर कहीं चला गया । निर्मला, किसी समस्या का हल निकालने की बजाय उससे मुंह मोड़कर दूर भाग जाना उस समस्या का निराकरण नहीं हो सकता, किंतु अपने सामने ही अपने माता-पिता का निरंतर अनादर होते देखना, स्वयं के आत्मसम्मान की रक्षा न कर पाना, देव जैसे अत्यंत भावुक व्यक्ति के लिये असहनीय था । और शायद इसी कारण उसने रोज-रोज की झंझटों से मुक्ति के लिये घर ही छोड़ दिया । निर्मला, सफल विवाह क्या है एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान, एक दूसरे के हिस्से की खुशियों-गमं का बंटवारा, एक दूसरे के गुणों-अवगुणों को समझकर सहर्ष स्वीकारना, परस्पर विश्वास के साथ एक दूसरे के स्वाभिमान का सम्मान करना और निर्मला मुझे लगता है बिना आपसी प्रेम के कदाचित यह संभव नहीं है वस्तुतः त्याग, समर्पण, सामंजस्य, धैर्य सेवाभाव, जैसी भावनाओं से मिलकर ही यथार्थ प्रेम की कोमल भावना का आविर्भाव होता है, किंतु इतने वर्ष एक साथ रहने के उपरांत भी उसकी पत्नी के मन में देव के प्रति ऐसी कोई भावना जन्म नहीं ले पायी और प्रेम को किसी के मन में जबरन उपजाया तो नहीं जा सकता और जहां प्रेम न हो वह घर, घर कहने लायक नहीं रहता । पति-पत्नी के आपसी कलह और लड़ाई का सीधा असर उनके दोनों बच्चों पर पड़ा । बेटी ने कॉलेज पढते-पढते ही अपने सहपाठी से प्रेमविवाह कर लिया और बेटा तो अपने जीवन में कुछ कर ही नहीं पाया । जैसे तैसे दसवीं तक पढ़ पाया और गुंडे-बदमाशों की संगत में पड़कर चोरियाँ करने लगा । कई बार जेल जा चुका है और अब पता नहीं आजकल कहाँ है ।

श्रीमान जी, आपने मुझे देवनारायणजी की सारी कहानी तो बता दी, किंतु इतने साल बीत जाने के बाद भी आपने अपने दोस्त से मुझे कभी मिलवाया नहीं । नहीं, ऐसी बात नहीं है, तुम तो उससे मिल चुकी हो बल्कि पिछले दो-तीन साल से तो उससे हर साल ही मिल रही हो । कब ! कहां ? मैं कुछ समझी नहीं ? अरे श्रीमतीजी, हम अपनी शादी की सालगिरह पर वृद्धाश्रम में, बढी हुई दाढी, लंबे बिखरे बालोंवाले जिस दीनहीन बूढ़े को सबसे पहले मिठाई का डिब्बा देते हैं और वह बड़ी मिन्नत के बाद उसमें से बमुश्किल एकआध टुकड़ा उठाता है वही तो है देव, मेरे बचपन का दोस्त देवनारायण, देवनारायण पांडे ।

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संपर्क:

राजेश कुमार पाटिल
म.नं. डी.के.१/२ (दानिशकुंज गेट के बगल में)
दानिशकुंज, कोलार रोड, भोपाल
ई-मेल- patilbhopal@yahoo.co.in
(उक्त कहानी दिनांक १९.०३.२००८ को नव भारत के ‘सुरूचि‘ में प्रकाशित)

व्यंग्य

रोड इंस्पेक्टर

- उमेश कुमार गुप्ता



रोड इंस्पेक्टर उर्फ सड़क छाप मजनूं, समाज के ऐसे चिर-परिचित जीव हैं, जिनसे सभी परिचित हैं। ये नेता, अभिनेता, गुन्डे, बदमाशों की तरह समाज के अनिवार्य तत्व हैं। इनके बिना समाज का पूर्ण निर्माण नहीं हो पाता है, क्योंकि इनके कारण ही नारी जाति से जुड़ी दहेज की तरह की समस्या , छेड़छाड़ का अस्तित्व, समाज में मौजूद रहता है जो किसी बुजुर्ग के आशीर्वाद की तरह दिन दूना रात चौगुनी दर से महंगाई की तरह बढती चली जा रही है। इससे घर की गृहणी हो , स्कूल-कालेज जाती छात्रा हो, दफ्तरों में काम करती प्रौढा हो, कोई भी नहीं बचा है। सभी को घर से बाहर निकलते ही रोड इंस्पेक्टर की छेड़छाड़ का शिकार होना पड़ता है।

रोड इंस्पेक्टर सुबह से लेकर रात तक बस एक ही काम छेड़छाड़ करते है। जिस दिन गलती से ये छेड़छाड़ नहीं कर पाते है।, उस दिन ये उपवास धारण कर लेते हैं, क्योंकि बिना छेड़छाड़ के इन्हें खाना नहीं पचता है। समाज में इन्हें तलाशने के लिए कोई विशेष चश्मा लगाने की जरूरत नहीं है। ये पॉप स्टार माइकल जैक्शन की तरह बाल बढाये, अपने शरीर की चौडाई के बराबर बैगी पेंट कम पैजामा पहने गोविंदा चाल, अमीरखान मुस्कान के साथ अलग से सड़क पर घूमते नजर आ जाते हैं ये अपनी उपस्थिति का एहसास हमें स्वयं कराते हैं जब भी किसी कन्या को देखते है। तो अपने अर्द्धनारीश्वर बालों के पीछे हाथ फेरकर अपना रोड इंस्पेक्टर होने का परिचय देना यह प्रथम फर्ज समझते है।

रोड इंस्पेक्टरों के जीवन में सड़कों के किनारे स्थित पान ठेले का उतना ही महत्व ह, जितना कि नेताओं के पहनने के लिए खादी के कुर्त्ते के पैजामा का, चारा सुर्खियों में रहने के लिए घोटाले का है। इनकी सारी जवानी पान के ठेले पर सड़क ताकते हुए कट जाती है। ये सुबह सात बजे से रात दस बजे तक एक आदर्श सिपाही की तरह पान के ठेले पर ड्यूटी देते है। जिस तरह यातायात सिपाही की नजर से कोई ट्रक बचकर निकल नहीं पाता , उसी तरह इनकी गिद्ध निगाहों से कोई लड़की बचकर नहीं जा सकती हैं जो भी लड़की इन्हें भांती है उसके पीछे ये शहद की मक्खी की तरह लग जाते हैं और एक आदर्श पारिवारिक सदस्य की तरह उसे रोज घर से कालेज व कालेज से घर छोड़कर आते है। इस बीच में जितना भी समय इन्हें रास्ते में आसपास की मोटर कारों, ट्रकों, टैम्पों से बचने के बाद मिलता है, उतना समय ये प्रेम इजहार ( छेड़छाड़ ) करने में लगाते है। ऐसा दिन में ये चार -पांच लड़कियों के साथ अवश्य करते है।

रोड इंस्पेक्टर छेड़छाड़ में एक से एक चुनिंदा शब्दों का इस्तेमाल करते हैं इनकी कल्पनाओं के आगे कवियों की कल्पनायें भी फीकी पड़ जाती है। ये लोग अंग्रेज दिखती लड़की को परी सिन्ड्रेला, मिनी स्कर्ट छाता ली ऊंची एडी वाली लड़की को महारानी विक्टोरिया , घास न डालने वाली , पत्थर का जवाब ईंट से देने वाली लड़की को महारानी लक्ष्मीबाई, सैंडिल मारने वाली को महारानी दुर्गावती , जैसे ऐतिहासिक पात्रों से पुकारते हैं, इनमें कम पढे-लिखे आवारा नवयुवक ही नहीं, एम.ए.,बी.ए, पी.एच.डी., धारक पढे-लिखे समझदार लोग भी शामिल रहते हैं। जो अक्सर छेड़छाड़ में दुष्यंत की शकुंतला, तुलसी की रत्नावली, महाभारत की पांचाली , वृदावनलाल वर्मा की मृगनयनी जैसे साहित्यक पात्रों का इस्तेमाल करते हैं। ये लोग लड़कियों के संबंध में के.जी.बे.के जासूसों की तरह घर वालों से ज्यादा जानकारी रखते हैं।

रोड इंस्पेक्टर अपने आप को भगवान कृष्ण का अनुयायी समझते है। इसलिए सड़क चलती कन्याओं को बृज की गोपिकाओं की तरह छेड़ता ये अपना प्रथम कर्त्तव्य समझते है। ये लोग अपने गुरू का उपदेश ’कर्म किये जा फल की चिंता न कर’ पर विश्वास करते है। इसलिए ये अपना कर्म करते जाते हैं और उसका फल लात-जूते खाना, समाज में बदनामी होना, सर के बालों का चौराहा बनवाना, लड़कियों द्वारा एक से एक शब्दों -बंदर , गधा, खजूर, टिंगू, कद्दू जैसे शब्दों से संबोधित होना , मार खा जाना, आदि का इन पर कोई असर नहीं पड़ता है।

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

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